Monday, December 3, 2012

ANCIENT GURU TEACHER-TAUGHT RELATIONSHIP IN INDIA सनातन भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा

GURU ARADHNA गुरु आराधना 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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गुर्वष्टकम्गुर्वष्टकम् श्री गुरु स्तोत्र :: गुरु अष्टक 
शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं, यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम्। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥1॥ 
यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्तिचारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्री चरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?
कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं, गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥2॥ 
सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हों, किंतु गुरु के श्री चरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?
षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या, कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥3॥ 
वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु केश्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः, सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥4॥ 
जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?
क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः, सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥5॥ 
जिन महानुभाव के चरण कमल पृथ्वी मण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?
यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥6॥ 
दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगांतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणोंमें आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ, न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥7॥ 
जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?
अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये, न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥8॥ 
जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु केश्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारीअनासक्त्तियों का क्या लाभ?
गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही, यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥9॥ 
जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवंब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है। 
GURU VANDNA गुरु भक्ति  :: These are (गुरु मन्त्र Guru Mantr) are Sanskrit stanzas-rhymes addressed to the teacher- the गुरु Guru). These Shlok are recited  for praising the गुरु Guru for his proximity to God.
Photoअखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Akhand Mandala Karam Vyaptam  Yen Chra Chram;
Tatpdam Darshitm Yen Tasmae Shri Gurve Namah.
I bow before my teacher-the enlightened-Noble Guru, who has made it possible to realise the state which pervades the entire cosmos, everything animate and inanimate.
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Agyan  Timi Randhasy Gyana Anjan Shlakya; 
Chakshu Run Meelitm Yen Tasmae Shri Gurve Namah.
I bow in front of my virtuous-noble Guru, who has opened my eyes, blinded by darkness of ignorance with the collyrium-stick of knowledge.
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Gurur Brahma Gurur Vishnuh Gurur Devo Maheshwarah;
Guru Sakshat Para Brahm Tasmae Shri Gurve Namah.
My salutation to my teacher, who to me are Brahma, Vishnu and Maheshwar, the Ultimate Par Brahm, the Supreme reality.
Guru Vandna: This is recited to pay salutation to teacher  (-गुरु, guru) in evening. 
स्थावरं जंगमं व्याप्तं यत्किंचित्सचराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Sthavram Jangmam Vyaptam Yatkim Chits Chra Chram;
Tatpdam Darshitam Yen Tasmae Shri Gurve Namah.
I beg pray to the noble Guru, who has made it possible to realise Him, by whom all that is sentient and insentient, movable and immovable is pervaded.
चिन्मयं व्यापियत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्।तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Chinmyam Vyapiyatsarwam  Trelokyam Sachracharam;
Tatpdam Darshitam Yen Tasmae Shri Gurve Namah.
My salutation to the noble Guru, who has made it possible to realise Him who pervades in everything, sentient and insentient, in all three worlds.
त्सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजित पदाम्बुजः।वेदान्ताम्बुजसूर्योयः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Tsarw Shruti Shiro Ratn Virajit Pdambujah;
Vedantambuj Suryoyh Tasmae Shri Gurve Namah.
I salute the noble Guru, whose lotus feet are radiant with (-the lustre of) the crest jewel of all Shruti and who is the sun that causes the Vedant Lotus (-knowledge) to blossom.
चैतन्यः शाश्वतःशान्तो व्योमातीतो निरंजनः।बिन्दुनाद कलातीतः तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Chaitanyh Shashvath Shanto Vyomateeto Niranjnah;
Bindunad Kalateetah Tasmae Shri Gurve Namah.
My salutation to the noble Guru, who is the ever effulgent, eternal, peaceful, beyond space, immaculate, and beyond the manifest and unmanifest.
ज्ञानशक्तिसमारूढः तत्त्वमालाविभूषितः।भुक्तिमुक्तिप्रदाता च तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Gyan Shakti Sma Rudhh  Tattv Mala Vibhushitah;
Bhukti Mukti Pradata Ch Tasmae Shri Gurve Namah.
I pay my tributes, regards to the noble Guru, who is established in the power of knowledge-enlightenment, adorned with the garland of various principles and is the bestow-er of prosperity and liberation.
अनेकजन्मसंप्राप्त कर्मबन्धविदाहिने।आत्मज्ञानप्रदानेन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Anek Janm Samprapt  Karm Bandh Vidahine;
Atm Gyana Pradanen Tasmae Shri Gurve Namah.
Salutation to the noble Guru, who by bestowing the knowledge of the Self burns up the bondage created by accumulated actions of innumerable births.
शोषणं भवसिन्धोश्च ज्ञापणं सारसंपदः।गुरोः पादोदकं सम्यक् तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Shoshnam  Bhav Sindhoshch Gyapnam Sar Sampdah;
Guroh Padodkam Samyak Tasmae Shri Gurve Namah.
I pray to the noble Guru, by washing whose feet, the ocean of transmigration, endless sorrows is completely dried up and the Supreme wealth is revealed.
न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।तत्त्वज्ञानात्परं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Na Guror Dhikam Tattvam Na Guror Dhikam  Tapah;
Tattv Gyanatpram Nasti Tasmae Shri Gurve Namah.
I pray to the noble illustrious Guru, beyond whom there is no higher truth, there is no higher penance and there is nothing higher attainable than the true knowledge.
मन्नाथः श्रीजगन्नाथः मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः।मदात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Man Nathah Shri Jagan Nathah Mad Guruh Shri Jagad Guruh;
Madatma Sarw Bhutatma Tasmae Shri Gurve Namah.
I pray to the noble Guru, who is my master and the Master of the Universe, my Teacher and the Teacher of the Universe, who is the Self in me and the Self in all beings.
गुरुरादिरनादिश्च गुरुः परमदैवतम्।गुरोः परतरं नास्ति तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
Gurura Dir Nadishch Guruh Param Daevtam;
Guroh Partram Nasti Tasmae Shri Gurve Namah.
I bow before the noble Guru, who is both the beginning and beginning less, who is the Supreme Deity than whom there is none superior.
त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ॥
Tvamev Mat Ch Pita Tvamev, Tvamev Bandhushch Sakha Tvamev;
Tvamev Vidya Ch Dravinam Tvamev, Tvamev Sarvam Mam Dev Dev.
This is a prayer dedicated to the Almighty who is the Ultimate Guru. (Oh Guru!) You are my mother and father; you are my brother and companion; you alone are knowledge and wealth. Oh the Almighty, you are everything to me.
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SERVING THE GURU  गुरु सेवा  :: Mother is the first teacher-Guru, father is the second Guru and the third Guru is the teacher who educated the human beings for becoming a descent-honest-pious citizen in future.The occasion when one can pay respect to his teachers, falls on Guru Purnima. Special significance is attached to this full Moon night since Bhagwan Ved Vyas was born on this auspicious day. He is one who dictated Maha Bharat to Ganesh Ji. This is known as Vyas Purnima as well, after his name. Kaurav dynasty prolonged due to his conceiving-inseminating, the wives of Chitr Viry and Vichitr Viry, King Shantunu's sons when his mother Saty Wati invited him to do so.
माता-जननी, पहला गुरु, पिता दूसरा गुरु तथा तीसरा गुरु वह व्यक्ति है एक अनघड़ बालक को समाज के योग्य बनता है।आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है इसलिए यह कहा गया है। 
ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरु के पूजन का पर्व। गुरु की पूजा, गुरु का आदर किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है अपितु गुरु के देह के अंदर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा है उसका आदर है, ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।
I pay respect-reverence (valuing, respect, prising, cherishing, treasuring, admiration, regard, esteem, high opinion, acknowledgement, recognition, realisation) to the Guru, since he guided to me become a respectable citizen-a human being. guru Poornima is the day when I can remember him and pay my tributes and felicitate him. Honouring the teacher is honouring the Almighty present in our hearts. Bhagwan Shiv is considered to be the one who is aware of the Almighty-The Par Brahm Parmeshwar and is considered to be the ultimate Guru. Honouring a teachers means we honor learning-enlightenment knowledge.
Special significance is attributed-attributed to the status of teacher since he is one who creates-generated to good qualities-virtues-morals-righteousness-piousness-honesty in his disciple. Its he who inculcates the qualities-abilities to make the student learn how to interact-mingle in the society and earn his livelihood through intelligence-prudence-learning-skills-ability. He is the one who help the learner in over powering the wickedness-evils-demonic tendencies-wretchedness in him self.
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥ 
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। 
Its the teacher who grants second birth-life to the child. he takes the follower from darkness to aura-light-brightness.
हिंदू धर्म में सदैव गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को नवजीवन प्रदान करता है उन्हें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
The break up of Guru is Gu-darkness and ru light-enlightenment. Thus the Guru is the one who directs the learner from unawareness to awareness. he is the one ensures success for his disciple.
गुरु शब्द में ही गुरु का महिमा का वर्णन है। गु का अर्थ है अंधकार और रु का अर्थ है प्रकाश। इसलिए गुरु का अर्थ है: अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला अर्थात जीवन में सफलता हेतु  विद्यार्थी का उचित मार्गदर्शन करने वाला। 
One who obtains the blessing of his teachers-elders-pundits-scholars-philosopher gets success in life. 
इस दिन जो व्यक्ति गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। महर्षि वेदव्यास ने भविष्योत्तर पुराण में गुरु पूर्णिमा के बारे में लिखा है ::
मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय: प्रयत्नत:। आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा॥ 
पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:। फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै:॥ 
दक्षिणाभि: सुपुष्टाभिर्मत्स्वरूप प्रपूजयेत। एवं कृते त्वया विप्र मत्स्वरूपस्य दर्शनम्॥ 
One should offer cloths, ornaments, fruits-sweets, gifts-money etc. on the occasion of Guru Poornima to be liberated.
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्म दिवस है। इसे गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन पूरी श्रृद्धा के साथ गुरु को सुंदर वस्त्र, आभूषण, गाय, फल, पुष्प, रत्न, स्वर्ण मुद्रा आदि समर्पित कर उनका पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं।
Those who suffer due to the retro-gate Jupiter must serve their elders-Guru-Pundits with dedication and seek their blessings. he should offer cloths with yellowish tinge-shade-colour to the needy-poor-elders-parents-grand parents and the virtuous. He should be attentive to the sages-ascetics-hermits-recluse and offer the basic amenities-essentials goods to survive if they need them without being asked and without disclosing the help-nature of help offered to them.
इस दिन सभी लोग अपने-अपने गुरु की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु की कृपा के बिना कहीं भी सफलता नहीं मिलती।जिन लोगों की कुंडली में गुरु प्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है। यह उपाय इस प्रकार हैं- (1). भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं। (2). साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें। (3). गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें। (4). पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें। (5). केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं। (6). गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें। (7). शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें। (8). जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं।
**गुरु बनने से पहले गुरु के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आये होंगे, अनेक अनुकूलताएं-प्रतिकूलताएं आयी होंगी, उनको सहते हुए भी वे साधना में रत रहे, ‘स्व’ में स्थित रहे, समता में स्थित रहे।
TRIBUTES TO THE GURU-TEACHER गुरु वन्दना ::
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं; द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं; भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥
brahmanandam paramasukhadaṃ kevalaṃ gyanmurtim; 
dvandvateetam gagansadrasham  tattvmasyadilkṣhyam.
ekam nityam vimlamchalam sarvdheesakshibhutam;
bhavateetam trigunrahitam sadgurum tam namami.
मैं उस सद्गुरु के समक्ष दण्डवत प्रणाम करता हूँ जो ज्ञानमूर्ति परब्रह्म परमेश्वर के सदृशय परमानन्द प्रदान करने वाले हैं, परमात्मतत्व के ज्ञाता हैं, जो द्वन्द-परेशानी-दुःख से मुक्ति प्रदायक हैं, जो आकाश के समान विस्तृत-विशाल हैं, जो सत्य की मूर्ति हैं, जो कि स्वयं अपने आप में परिपूर्ण (-मुकम्मल, निष्कलंक, बेदाग़, उत्तम), दृढ़ (- स्थिर, निरंतर, अचल, अडिग) सभी भावनाओं व त्रिगुणों से भी ऊपर हैं।  
One bow-offer his obeisances-tributes to the Guru-teacher who is like the Par Brahm Parmeshwar-the Almighty, Parmanand-bliss-Ultimate pleasure-joy, the only the source of true-tangible form manifestation-personification of knowledge-enlightenment, beyond the dilemma-tussle of joy-sorrow, life-death, like the sky which is fatherly protecting & vast, indicator-shower of great truths, indicates-explains-shows which are perennial, always unblemished (-complete, entire, whole, accomplished, impeccable, thoroughbred, taint less, stainless, flawless, unshaded, unspotted, soil less, unshadowed, spotless, unblamable, unshaded), steadfast (-good, perfect, masterly, surpassing, complete, finished, total, overall, thorough, firm, strong,  tenacious, resolute, determined, stable, static, stationary, constant, stagnant, continuous, sustained, continued, continual, unremitting, immovable, invariable, irreplaceable, unshakeable, still, wiry,  sure, unbending), witness-observer of everyone's cosmic intelligence, beyond existence or emotions, beyond the three GUN-characteristics i.e.,  Satv (-pure, pious, virtuous, honest, truth, Rajas (action) & Tamas (-inertia, lazy, lethargic).
प्रज्ञावर्धन स्तोत्र :: इस स्तोत्र का पाठ प्रात:, सूर्योदय के समय रवि पुष्य या गुरु पुष्य नक्षत्र से प्रारम्भ करके आगामी पुष्य नक्षत्र तक,पीपल वृक्ष की जड़ के समीप पूर्व दिशा में मुँह करके करना चाहिये। पाठ करते समय माता पार्वती व भगवान् शिव के पुत्र भगवान् कार्तिकेय जी का ध्यान करना चाहिये।  27  दिन में एक पश्चरण होगा।  फिर हर रोज घर में इसका पाठ करना चाहिये। दायें हाथ में जल लेकर विनियोग के बाद जल त्याग करके, स्तोत्र पाठ को शुरू करें। 
विनियोग: ॐ अथास्य प्रज्ञावर्धन, स्तोत्रस्य भगवान शिव ऋषि:, अनुष्टुप छंद:, स्कन्द कुमारो देवता, प्रज्ञा सिद्धयर्थे जपे विनिटिग:। यहाँ जल का त्याग कर दें। 
अथ स्तोत्रम
ॐ योगेश्वरो महासेन: कार्तिकेयोSग्निननन्दन; स्कन्द: कुमार : सेनानी स्वामी शंकरसंभव॥1॥ 
गांगेयस्ता म्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वज:; तारकारिरुमापुत्र: क्रौंचारिश्च षडानन:॥2॥ 
शब्दब्रह्मसमूहश्च सिद्ध: सारस्वतो गुह:; सनत्कुमारो भगवांन भोग- मोक्षप्रद प्रभु:॥3॥ 
शरजन्मा गणाधीशं पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत; सर्वांगं-प्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शक:॥4॥ 
अष्टाविंशति नामानि मदीयानीति य: पठेत; प्रत्यूषे श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत्॥5॥ 
महामन्त्रमयानीति नामानि कीर्तयत; महाप्रज्ञावाप्नोति नात्र कार्य विचारणा॥6॥ 
पुष्यनक्षत्रमारम्भय कपून: पुष्ये समाप्य च; अश्वत्त्थमूले प्रतिदिनं दशवारं तु सम्पठेत॥7॥ 
प्रज्ञावर्धन स्तोत्रों सम्पूर्णमयह स्तोत्र विद्यार्थोयों की बुद्धि को सन्मार्ग पर लगाने एवं विद्या में सफलता के लिये है। 
CURRENT EDUCATION SYSTEM :: Since ages, teacher has been considered to be the most respected-honourable-regarded-revered-worth person. He has been quoted to be the one, who commands more respect than the God. 
गुरु गोविन्द दोहू खड़े काके लागुन पायें बलि हरी गुरु आपने जिन गोविन्द दियो मिलाय। 
Both the teacher and the God are in front of me, its the greatness of the teacher who enabled to meet the Almighty.  Credit goes to my teacher, who made me capable of assimilating in the Ultimate.
शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान। 
Discovery-availability-search of  the right-potential-divine-Satvik-ascetic educator,  even at the cost of life, is cheap, desirable. Don't expect such people, during the modern times.
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात परम ब्रम्हा तस्मै श्री गुर्वे नम:॥  
The teacher is the creator of virtues-learning -prudence-righteousness, he is one who nurtures-nourishes learning-prudence and he is one who eliminates the evil-devil-impurities-wickedness from the disciple. He is like the Almighty  and its therefore that I bow respect, regard-honor him. 
Of late, Indians films have been portraying the revered person as a piece of joke-a comedian-laughing stalk-disrespectful person. TV is not far behind, it too depicts the honored-revered, as a person meant for fun.
There was a time when people did not choose this profession, willingly. Only those who miserably failed to get a good job, joined teaching. Women did not want to marry a teacher being low paid employee-exploited by the society. However demand for female teacher in the marriage market was noticeable. People used to take pity on him. In fact the salaries were too low and the poor teacher was not able to meet his daily requirements. He could not afford a decent life to his family members. 
Initially, teacher was over burdened with the teaching of 2 to 3 classes at a time, simultaneously, having more than 100 students. Even today, Delhi's Government schools have more than 100 students in one class-sitting in verandas or in the open.
The stuff to be handled is raw unwilling to learn. He lacks manners. No one ever taught -tried to discipline him. The child is grossly disobedient. There is no provision for moral teaching-discipline-respect-culture in the curriculum/syllabus. His background too is shaky. Most of the students are from such families, where first generation is coming to school. The poor one has, no other option but to join a municipal-district board-government school. The middle class families, too prefers public-private schools. Now a new breed of elite has emerged, who send their children to international school fitted with air conditioners. The parents have no time to help the child in studies of to listen-help him.
The teacher should be aware that he doesn't have to touch the child and behave with him in a polished manner. Under any circumstances, he should not touch or rebuke  the child. He must desist from punishing the child, otherwise, he is bound to be in trouble, since the rules are thoroughly against him. In today's climate, the teacher has no choice but to remain aloof from what the child is up to.  Its in the interest of the teacher not to force the child to mug up-learn-do home work. He should not be aggressive under any situation. However, he may report the matter to his superiors-authorities, without the hope of any kind of help. Never mind they too are helpless.
One might witness the  hot headed parents reaching the school to manhandle-insult-misbehave with the teacher, without any fault on his side. The child is too notorious to be fool his parents to become aggressive and torture the teacher physically, mentally, emotionally-socially. They do not understand the game played by their children-who are not willing to learn. The parents make a mountain of the mole, just for a little rebuff by the teacher.They pour their anguish over the poor teacher. Their love and concern for the child is questionable. Its easy to take the horse to water, but impossible to make him drink. This is not the proper mode of showing concern for the ward-child-student by the parents. Education can not be attained without respecting the teacher. Still  the teacher should do the best from his side and leave it up to the child, whether he has grasped-understood-followed or not. Save the skin, first.
The need of the hour is to forget "spare the rod spoil the child".
Every one is not alike. The teacher may be sympathetic with the child. He may develop rapport with him. He should be soft spoken-polite-possessive. Understanding with the child, fellow teachers, seniors, superiors is a must, on the part of the teacher.
He must be well prepared before entering the class. Concepts must be very-very clear to him. He should be ready-willing to elaborate-explain again and again, without being restless. He should be capable of inculcating -evolving understanding, skills, aptitude, adaptability,  interest, appreciation,  applicability, practicability, knowledge, values, virtues,  power to analyse, observation in the child. Its rightly said that "the teacher is the best friend, philosopher and guide".गुरु बिन होए न ज्ञान . There is no learning without the teacher.
Teachers role in Indian politics, is crucial. Those who targeted-ignored-deprived the teachers of their logical dues, lost elections. The teacher showed his might, when BJP lost in Lok Sabha, Rajasthan and MP-assemblies and Delhi Municipal Corporation elections. Teacher helped the BJP to win elections in Delhi, but turned their back, when the BJP did not notify the recommendations of 5th pay commission, though two of its Chief Ministers in Delhi were from Delhi's teaching community. On the contrary Congress not only accepted the legitimate demands it, showed concern for teachers cause, by giving 2 years extension in service-though the terms and conditions are abusive in nature. A backward teacher in UP became Chief Minister, but acted against the teacher community only to be dislodged.  One of Delhi's  scheduled caste female teachers could manage to become the Chief Minister of Uttar Pradesh-housing largest electorate in India as well. A primary school teacher claiming to be a back ward of  this state, not only became a Chief Minister, he became the king maker at the center as well, just by extending some favours to the school teachers and the community as a whole-never mind by be fooling the Muslims. A primary school teacher functioned as the Deputy Prime Minister of India under the person, whose father was a teacher. Still no one takes the teacher seriously. The time  is ripening fast for the teacher to show-exert-assert, his might
There are the teachers, whose wholehearted efforts, devotion, pains elevated their students to the highest echelons of power. They are loved-regarded-respected by their students. At one point of time 16 secretary rank officials were from a NDMC school.
One will invariably come across a section of teachers, who never go to the class, what to talk of teaching. They are real blot-shame-slur on the name of this pious-noble profession. Some teacher are clever enough to draw their salaries sitting inside the home. Some teachers take keen interest in clerical work, flattery of the head, personal work of the head, including embezzlement-fraud-forgery. One can observe some teachers busy in helping students  in the use of unfair means like promoting the non deserving, copying, enhancement of marks etc. ,taking bribes in admissions, forging certificates-marks sheets for admission purpose and jobs as well.
A little segment of teachers used to engage himself in tuition due to financial difficulties, because of low salaries. They are drifting away from tuition because of the bad name-slur brought to this pious activity by those who are neither qualified nor experienced as teachers. One can find people claiming to be engineers taking tuition-spoiling the reputation of teachers, doing all sorts of nefarious acts like rape-kidnapping-murder-cheating-stealing papers from boards office etc. Parents must check the antecedents of the person, before engaging him for tuition purpose.
A doctor becomes dean-director, an NDA pass out becomes Army general, but a teacher can not become  a director-secretary in his department-what a tragedy? He is ruled by the babus, who do not understand the abc... of teaching and the department.
There is a saying, "ब्राह्मण (मास्टर, पंडित ), कुत्ता और हाथी, नहीं जात  के साथी", that the teacher, dog and elephant can not pull together. Unless-until  the teachers unite, social change-upliftment of society can not come.
One should not mix up the term tutor with teacher, since tutors, who take home-group-individual tuition are found indulged in all sorts of nefarious deeds. Any Tom and Harry can become a tutor. The parents must verify antecedents of such-those people, who take private tuition.  They are found indulged in rape, murders, kidnappings, and what not? The government should allow the school teachers to help the parents from exploitation.
BRAHMNS TODAY वर्तमान में ब्राह्मण ::  Traditionally the Brahmns had been doing the job of imparting Education and guidance to the society.
It's very-very difficult, rather impossible to follow-observe the self imposed restrictions-prohibitions-dictates in the life of a Brahmn. It's clearly the reason behind the evolution of the other tree Vern-caste-creed in Hindu religion- society.
One is free to become a Brahmn just by following the long-long list of do's and don'ts.
Daksh Prajapati, who was born out of the right foot-toe of Brahma Ji, should to considered to be a Shudr-  born out of the feet of Brahma Ji.
His 13 daughters, who were married to Kashyap-a Brahmn, who followed the dictates of Shashtr; gave birth to all life forms on earth.
Sanctity, righteousness, asceticism, virtuousness, religiosity, truthfulness, purity, piousity, poverty-misery, donations-charity-kindness, fasting-contentedness-satisfaction, teaching and learning-Purans-Veds-Epics-Shashtr, harmony-peace-soft spokenness-decent behavior, tolerance, not to envy-anger-greedy-perturbed-tease are synonyms to a Brahmn. 
They are blessed with high intelligence level, excellent memory-retention power, clairvoyance, clear vision, thoughtfulness, power to analyse and act,  religious ecstasy (spiritual uplift, fervour). 
Today's Brahmns are Brahmns only for the namesake They are just the carriers of the genes-chromosomes-DNA of their ancestors-Rishis-forefathers. They are changing with the changing times and do not hesitate-mind, adopting any profession-trade-business-job for the sake of earning money for survival in the ever increasing race of fierce competition-in a world, which is narrowing down, day by day, in an atmosphere of scientific advancement-discoveries-innovations-researches. However, whichever is the field, they work-choose, they assert their excellence-highly developed mental calibre-capabilities-capacities, and move ahead of others, facing-tiding over all turbulence-difficulties-resistances.
CHARACTERISTICS OF BRAHMAN ब्राह्मण गुण-धर्म :: Barring a few exceptions majority of Brahmns are blessed with certain characteristics which differentiate them with the other Verns. कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर ब्राह्मण अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर पहचाने जाते हैं।
High level of intelligence, highly developed brain power,excellent memory-retention-recapitulation, clairvoyance-exceptional insight, clear vision, religious ecstasy (-great joy-spiritual upliftment)-fervour: उच्च विकसित मस्तिष्क -तेज दिमांग-बुद्धि, याद  रखने  की शक्ति- याद दाश्त, सोचने समझने की ताकत, विचारशीलता,आत्मिक हर्ष, आध्यात्मिक विकास,  दूर द्रष्टि, अत्यधिक विकसित मस्तिष्क, मानसिक शक्ति,  कुशाग्र बुद्धि ।
Study  and teaching of Purans-Veds-epics-scriptures, पुराणों-वेदों-शास्त्रों-रामायण-महाभारत आदि का पढ़ना और पढ़ाना ।  
Courage, साहस, पौरुष।
Stout body and muscle power, मजबूत शरीर व मांसपेशियाँ-बाहुबल।
Learning-educating-meditation-prayers-Bhakti, पढ़ना-पढाना, स्वाद्ध्याय, चिंतन भक्ति।
Fair color, गौर वर्ण।
Non consumption of meat-meat products-fish-eggs, मांस-मच्छी-अंडा-मांसाहार न करना।
Non consumption of narcotics-drugs-wine, धुम्रपान-बीडी, सिग्रेट न पीना; नशा शराब से दूर रहना।
Not to think of other women, अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री के बारे में न सोचना।
Not to harm or trouble anyone, किसी को भी न सताना परेशान तंग न करना-हानि न पंहुचाना।
Tolerance-not to become angry- क्रोध न करना-काबु रखना।
Regular bathing, performance of rites-rituals-prayers, दैनिक स्नान पूजा पाठ प्रार्थना।
Making offerings to God-deities-ancestors भगवान देवी देवताओं पूर्वजों  को भेंट चढ़ाना।
Earning money through honest-righteous pure means, शुद्ध सात्विक साधनों द्वारा धन कमाना।
To keep own needs to the barest possible minimum; अपनी आवश्कताओं को न्यूनतम स्तर पर सीमित   रखना।
Tendency not to store for future. संग्रह की प्रवरति का अभाव।
Should be devoted to for the development-growth-upliftment of society. समाज के उत्थान-विकास का प्रयास।
Harmonious relations-cordial relations with all creatures. सभी प्राणियों में सामंजस्य।
Weighs stones, gems and jewels equally, धन, जवाहरात, गहनों व पत्थरों को  एक समान समझना।
Inclination to sex with own wife only and that is too, during the ovulation period, during night only, avoidance of Rahu Kalam and eclipse. अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से गर्भाधान न करना वह भी केवल ऋतु काल में-रात्रि में व ग्रहण में नहीं।
Pure vegetarian limited food, descent behavior; शुद्ध सात्विक आचार वयवहार, निरामिष सीमित  भोजन , सदाचार। 
ब्राह्मण संस्कार :- ब्राह्मण के तीन जन्म  होते हैं: (1) माता के गर्भ से, (2) यज्ञोपवीत से, व (3) यज्ञ की दीक्षा लेने  से।यज्ञोपवीतके समय गायत्री माता व और आचार्य पिता होते हैं। वेद की शिक्षा देने से आचार्य  पिता कहलाता है। यज्ञोपवीत के बिना, वह किसी भी वैदिक कार्य का अधिकारी नहीं होता। जब तक वेदारम्भ न हो, वह शूद्र के समान है।     
जिस ब्राह्मण के 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हों, वही ब्रह्म लोक व ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। इनके बिना वह शूद्र के समान है। 
गर्वाधन, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकार के
वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्च महायज्ञ(जिनसे पितरों, देवताओं, मनुष्यों, भूतऔर ब्रह्म की तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री, शूलगव, आश्र्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणि, सप्त्सोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। ये चालीस ब्राह्मण के संस्कार हैं। 
इनके साथ ब्राह्मण में 8 आत्म गुण भी होने चाहियें : 
अनसूया: दूसरों के गुणों में दोष बुद्धि न रखना, गुणी  के गुणों को न छुपाना, अपने गुणों को प्रकट न करना, दुसरे के दोषों को देखकर प्रसन्न न होना। 
दया: अपने-पराये, मित्र-शत्रु में अपने समान व्यवहार करना और दूसरों का  दुःख दूर करने की इच्छा रखना। 
क्षमा: मन, वचन या शरीर से दुःख पहुँचाने वाले पर क्रोध न करना व वैर न करना। 
अनायास: जिन शुभ कर्मों को करने से शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म को हठात् न करना। 
मंगल: नित्य अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों को न करना। 
अकार्पन्य: मेहनत, कष्ट व न्यायोपार्जित धन से, उदारता पूर्वक थोडा-बहुत नित्य दान करना।  
शौच: अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करना, निन्दित पुरुषों का संग न करना और सदाचार में स्थित रहना। 
अस्पृहा: ईश्वर की कृपा से थोड़ी-बहुत संपत्ति से भी संतुष्ट रहना और दूसरे के धन की, किंचित मात्र भी इच्छा न रखना। 
जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् संपन्न हुए हों और वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो, तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है।  
Image result for hanuman jiशिष्यत्व-गुरु भक्ति :- संकटमोचक श्री हनुमान जी के गुरु भगवान् सूर्य हैं। उनका जन्म गुरु पूर्णिमा को माना जाता है। मनुष्य को गुरु के प्रति समर्पण की भावना रखनी चाहिये। हनुमान जी महाराज ने अपने गुरु भगवान् के प्रति समर्पण के अतिरिक्त निम्न गुणों का प्रदर्शन भी किया। वे एक आदर्श विद्यार्थी और गुणी शिष्य हैं। 
(1). विनम्रता :- गुणी और ताकतवर होने पर भी शिष्य घमण्ड अहंकार (-Ego, pride, arrogance ) से दूर रहे। मन में हमेशा विनम्रता और सीखने का भाव मन में कायम रखें।
(2). मान और समर्पण :- शिष्य गुरु और प्रभु के प्रति समर्पित-तत्पर रहे। प्रभु के आस्था, निष्ठा, प्रेम, भक्ति भाव कायम रखे। 
Image result for BHagwan Surya(3). धैर्य और निर्भयता :- शिष्य को चाहिये कि हनुमान जी से धैर्य और निडरता का सूत्र ग्रहण करे जो कि जीवन की तमाम मुश्किल हालातों में भी मनोबल देता है। इसके बल-बूते ही लंका में जाकर हनुमान ने रावण राज के अंत का बिगुल बजाया।
(4). कृतज्ञता :- जीवन में दंभ रहित या आत्म प्रशंसा का भाव पतन का कारण होती है। शिष्य  हनुमान से कृतज्ञता के भाव को सीखे और जीवन में उतारे। अपनी हर सफलता में परिजनों, इष्टजनों और बड़ों का योगदान न भूलें। जैसे हनुमान ने अपनी तमाम सफलता का कारण श्रीराम को ही बताया।
(5). विवेक और निर्णय क्षमता :- हनुमान जी ने माता  सीता की खोज में समुद्र पार करते वक्त सुरसा, सिंहिका, मेनाक पर्वत जैसी अनेक बाधाओं का सामना किया। किंतु लालसाओं में न उलझ बुद्धि व विवेक से सही फैसला लेकर बगैर डावांडोल हुए अपने लक्ष्य की ओर बढें। शिष्य भी जीवन में सही और गलत की पहचान कर अपने मकसद से कभी न भटकें।
(6). तालमेल की क्षमता :- श्री हनुमान ने अपने स्वभाव व व्यवहार से हर स्थिति, काल और अवसर से तालमेल बैठाया। इससे ही वे हर युग और काल में सबके प्रिय बने रहे। अतः शिष्य को भी अपना आचार-व्यवहार, स्वभाव, परिस्थिति के अनुकूल रखना चाहिये। शिष्य प्रेम, सेवा, तत्परता, मधुर-संयत वाणी से सभी का दिल जीतकर जीवन यापन करे। 
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ब्राह्मण छात्र धर्म :- यज्ञोपवीत संपन्न हो जाने पर वटुक (-विद्यार्थी) को व्रत का उपदेश ग्रहण करना चाहिये और वेदाध्ययन करना चाहिये। यज्ञोपवीत के समय जो मेखला, चर्म, दंड, वस्त्र, यज्ञोपवीत आदि धारण करने को कहा गया है, उन्हीं को धारण करे। अपनी तपस्या हेतु ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर गुरु की सेवा में तत्पर रहे व नियमों का पालन करे। नित्य स्नान करके देवता, पितर और ऋषिओं का तर्पण करे। पुष्प, फल, जल, समिधा, मृतिका, कुश, और अनेक प्रकार के काष्ठों का संग्रह करे। मद्य, मांस, गंध,पुष्प माला, अनेक प्रकार के रस और स्त्रियों का परित्याग करे। प्राणियों की हिंसा, शरीर में उबटन लगाना, अंजन लगाना, जूता व छत्र धारण करना, गीत सुनना, नाच देखना, जुआ खेलना, झूंठ बोलना, निंदा करना, स्त्रियों के समीप बैठना,  काम-क्रोध-लोभादि के वशीभूत होना-इत्यादि ब्रह्मचारी के लिए वर्जित है-निषिद्ध हैं। उसे संयम पूर्वक एकाकी रहना है। उसे जल, पुष्प, गाय का  गोबर,  मृतिका और कुशा का संग्रह करे। 
आवश्कतानुसार भिक्षा नित्य लानी है। भिक्षा मांगते वक्त वाणी पर संयम रखे। जो ग्रहस्थी अपने कर्मों (वर्णाश्रम धर्म) में तत्पर हो, वेदादि का अध्ययन करे, यज्ञादि में श्रद्धावान हो उसके यहाँ से ही भिक्षा ग्रहण करे। इस प्रकार भिक्षा न मिलने पर ही, गुरु के कुल में व अपने बंधु-बांधव-पारिवारिक सदस्य-स्वजनों से भिक्षा प्राप्त करे। कभी भी एक ही परिवार से भिक्षा ग्रहण न करे। भिक्षान्न को मुख्य अन्न माने। भिक्षावृति से रहना, उपवास के बराबर माना गया है। महापातकियों से भिक्षा कभी स्वीकार न करे। इस प्रकार की भिक्षा को शास्त्र में भीख नहीं माना गया है। 
नित्य समिधा लाकर प्रतिदिन सायं काल व प्रात: काल हवन करे। 
ब्रह्मचारी गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गुरु की आज्ञा से ही बैठे, परन्तु आसन पर नहीं। गुरु के उठने से पूर्व उठे व सोने के बाद सोये, गुरु के समक्ष बड़ी विनम्रता से बैठे, गुरु का नाम न ले, गुरु की नक़ल न करे। गुरु की निंदा-आलोचना न करे, जहाँ  गुरु की निंदा-आलोचना  होती हो वहां से उठ जाये अथवा कान बंद कर ले।  गुरु निंदक-आलोचकों से  सदा दूर ही रहे। 
वाहन से उतर कर  गुरु को अभिवादन-प्रणाम करे। एक ही वाहन, शिला, नौका आदि पर बैठ सकता है। गुरु के गुरु-श्रेष्ठ सम्बन्धी-गुरु पुत्र के साथ गुरु के समान ही व्यवहार करे।गुरु की सवर्णा स्त्री को गुरु के समान ही समझे परन्तु पैर दवाना, उबटन लगाना, स्नान कराना निषिद्ध हैं।बहन-बेटी-माता के साथ  कभी भी एक ही आसन पर न बैठे। 
गाँव में सूर्योदय व सूर्यास्त न होने दे-जल के निकट-निर्जन स्थान पर दोनों संध्याओं में संध्या-वंदन करे।  
माता, पिता, आचार्य व भाई का विपत्ति में भी अनादर न करे, सदा आदर करे। 
माता, पिता,आचार्य की नित्य सेवा-शुश्रूषा करने से ही विद्या मिल जाती है। इनकी आज्ञा से ही किसी अन्य धर्म का आचरण करे अन्यथा नहीं।   
श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम्।


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