YOG POSTURES योगाभ्यास मुद्राएँ

YOG POSTURES योगाभ्यास मुद्राएँ
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM BY :: Pt. Santosh Bhardwaj
santoshkipathshala.blogspot.com   santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com   hindutv.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatguru.blog.com   jagatgurusantosh.blog.com
Image result for योगाभ्यास मुद्राएँ IMAGESमहामुद्रा महाबंधो महावेधश्च, खेचरी। उड्यान मूलबन्धश्च बंधो जालन्धरमिघ:॥ 
करणी विपरीताख्या बज्रोली शक्ति चालनम्। इंदहि मुद्रादशंक जरामरण नाशनम्॥ 
योगाभ्यास की इन 10  मुद्राओं को सही तरीके से अभ्यास करने से बुढ़ापा जल्दी नहीं आ सकता :: महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयान बंध, मूलबंध, जालंधर बंध, विपरीत करणी, बज्रोली और शक्ति चालन। 
ये दो मुद्रा-आसन कुंडलिनी जागरण में उपयोगी हैं :: सांभवी मुद्रा, खेचरी मुद्रा।
Image result for योगाभ्यास मुद्राएँ IMAGESमुख्यतः  6 आसन मुद्राएँ मानी गई हैं ::  (1). व्रक्त मुद्रा, (2). अश्विनी मुद्रा, (3). महामुद्रा, (4). योग मुद्रा, (5). विपरीत करणी मुद्रा और  (6). शोभवनी मुद्रा।
ये पंच मुद्राएँ  राजयोग का साधन हैं ::  (1). चाचरी, (2). खेचरी, (3). भोचरी, (4). अगोचरी, (5). उन्न्युनी मुद्रा।
इसी प्रकार मुख्‍यत: दस हस्त मुद्राएँ मानी गई हैं:-
इनके अलावा प्रमुख दस मुद्राएँ ये हैं :: (1). ज्ञान मुद्रा, (2). पृथवि मुद्रा, (3). वरुण मुद्रा, (4). वायु मुद्रा, (5). शून्य मुद्रा, (6). सूर्य मुद्रा, (7). प्राण मुद्रा, (8). लिंग मुद्रा, (9). अपान मुद्रा और (10). अपान वायु मुद्रा।
मुद्राओं के लाभ :: कुंडलिनी या ऊर्जा स्रोत को जाग्रत करने के लिए मुद्राओं का अभ्यास सहायक सिद्ध होता है। कुछ मुद्राओं के अभ्यास से आरोग्य और दीर्घायु प्राप्त ‍की जा सकती है। इससे योगानुसार अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव है। यह संपूर्ण योग का सार स्वरूप है।
Image result for योगाभ्यास मुद्राएँ IMAGESहस्त मुद्राएँ :: हाथों की 10 अँगुलियों से विशेष प्रकार की आकृतियाँ बनाना ही हस्त मुद्रा कही गई है। हाथों की सारी अँगुलियों में पाँचों तत्व मौजूद होते हैं; जैसे अँगूठे में अग्नि तत्व, तर्जनी अँगुली में वायु तत्व, मध्यमा अँगुली में आकाश तत्व, अनामिका अँगुली में पृथ्वी तत्व और कनिष्का अँगुली में जल तत्व। अँगुलियों के पाँचों वर्ग से अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अँगुलियों का योगानुसार आपसी स्पर्श करते हैं, तब रुकी हुई या असंतुलित विद्युत बहकर शरीर की शक्ति को पुन: जगा देती है और  शरीर निरोग होने लगता है। ये अद्भुत मुद्राएँ करते ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं।
हस्त मुद्रा के लाभ :: मुद्रा संपूर्ण योग का सार स्वरूप है। इसके माध्यम से कुंडलिनी या ऊर्जा के स्रोत को जाग्रत किया जा सकता है। इससे अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों की प्राप्ति संभव है। सामान्यत: अलग-अलग मुद्राओं से अलग-अलग रोगों में लाभ मिलता है। मन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। शरीर में कहीं भी यदि ऊर्जा में अवरोध उत्पन्न हो रहा है तो मुद्राओं से वह दूर हो जाता है और शरीर हल्का हो जाता है। जिस हाथ से ये मुद्राएँ बनाते हैं, शरीर के उल्टे हिस्से में उनका प्रभाव तुरंत ही नजर आना शुरू हो जाता है।
Image result for योगाभ्यास मुद्राएँ IMAGESषट्‍कर्म :: शरीर को स्वस्थ्य और शुद्ध करने के लिए छ: क्रियाएँ विशेष रूप से की जाती हैं। जिन्हें षट्‍कर्म कहा जाता है। क्रियाओं के अभ्यास से संपूर्ण शरीर शुद्ध हो जाता है। किसी भी प्रकार की गंदगी शरीर में स्थान नहीं बना पाती है। बुद्धि और शरीर में सदा स्फूर्ति बनी रहती है। ये क्रियाएँ हैं :: (1). त्राटक, ( 2). नेती, (3). कपालभाती,  (4). धौती, (5). बस्ती और (6). नौली।
Image result for योगाभ्यास मुद्राएँ IMAGESत्राटक क्रिया विधि :: जितनी देर तक मनुष्य बिना पलक झपके किसी एक बिंदु, क्रिस्टल बॉल, मोमबत्ती या घी के दीपक की ज्योति पर देख सकता है देखे और उसके बाद आँखें बंद कर लें। कुछ समय तक इसका अभ्यास करने से एकाग्रता बढ़ती है। त्राटक के अभ्यास से आँखों और मस्तिष्क में गरमी बढ़ती है, इसलिए इस अभ्यास के तुरंत बाद नेती क्रिया का अभ्यास करना चाहिए। आँखों में किसी भी प्रकार की तकलीफ हो तो यह क्रिया ना करें। अधिक देर तक एक-सा करने पर आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। ऐसा जब हो, तब आँखें झपकाकर अभ्यास छोड़ दें। यह क्रिया भी जानकार व्यक्ति से ही सीखनी चाहिए, क्योंकि इसके द्वारा आत्मसम्मोहन घटित हो सकता है। आँखों के लिए तो त्राटक लाभदायक है ही साथ ही यह एकाग्रता को बढ़ाती है। स्थिर आँखें स्थिर चित्त का परिचायक है। इसका नियमित अभ्यास कर मानसिक शां‍ति और निर्भिकता का आनंद लिया जा सकता है। इससे आँख के सभी रोग छूट जाते हैं। मन का विचलन खत्म हो जाता है। त्राटक के अभ्यास से अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है। सम्मोहन और स्तंभन क्रिया में त्राटक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह स्मृतिदोष भी दूर करता है और इससे दूरदृष्टि बढ़ती है।
त्रिबंधासन :: इसमें तीनों बंध (-उड्डीयान, जालंधर और मूलबंध) को एक साथ लगाकर अभ्यास किया जाता है, इसलिए इसे बंध त्रय या त्रिबंधासन कहते हैं। (1). सिद्धासन में बैठकर श्वास को बाहर निकालकर फेंफड़ों को खालीकर दें। (2). अब श्वास अंदर लेते हुए घुटने पर रखें हाथों पर जोर देकर मूलबंध करें अर्थात गुदा को ऊपर की ओर खींचते हुए पेट को अंदर की ओर खींचें। (3). फिर श्वास छोड़ते हुए पेट को जितना संभव हो पीठ से पिचकाएँ अर्थात उड्डीयान बंघ लगाएँ। साथ ही ठोड़ी को कंठ से लगाकर जलन्धर बंध भी लगा लें। उक्त बंध की स्थिति में अपनी क्षमता अनुसार रुकें और फिर कुछ देर आराम करें। इस आसन का अभ्यास स्वच्छ व हवायुक्त स्थान पर करना चाहिए। पेट, फेंफड़े, गुदा और गले में किसी भी प्रकार का गंभीर रोग हो तो यह बंध नहीं करें।
इससे गले, गुदा, पेशाब, फेंफड़े और पेट संबंधी रोग दूर होते हैं। इसके अभ्यास से दमा, अति अमल्ता, अर्जीण, कब्ज, अपच आदि रोग दूर होते हैं। इससे चेहरे की चमक बढ़ती है। अल्सर कोलाईटिस रोग ठीक होता है और फेफड़े की दूषित वायु निकलने से हृदय की कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
देव ज्योतिमुद्रा योग :: यह  सभी तरह के नेत्र रोग में लाभदायक है। इस मुद्रा को करने से कम दिखना, आंखों में जाला और सूजन आदि जैसे रोग दूर हो जाते हैं। जिन बच्चों को कम उम्र मे ही चश्मा लग चुका हो वो अगर रोजाना देव ज्योतिमुद्रा का अभ्यास करें तो उनका चश्मा उतर सकता है। हाथ की तर्जनी अंगुली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगाने से देव ज्योतिमुद्रा बन जाती है। यह कुछ कुछ वायु मुद्रा जैसी है। लगभग 40-60 सेकंड तक इसी मुद्रा में रहने का अभ्यास सुबह-शाम चार से 6 बार करना चाहिए। 
ज्ञानमुद्रा :: यह मनुष्य की तंद्रा को तोड़ती है। हाथों की ग्रंथियों का संबंध मस्तिष्क से होता है। दाएँ हाथ का संबंध बाएँ और बाएँ हाथ का संबंध दाएँ मस्तिष्क से माना गया है। ज्ञानमुद्रा से मस्तिष्क के सोए हुए तंतु जाग्रत होकर मानव के होश को बढ़ाते हैं। ज्ञान का अर्थ ढेर सारी जानकारी या वैचारिकता से नहीं बल्कि होश से है। होशपूर्ण व्यक्तित्व के चित्त पर किसी भी प्रकार के कर्म या विचारों का दाग नहीं बनता। अँगूठे को तर्जनी (-इंडेक्स) अँगुली से स्पर्श करते हुए शेष तीन अँगुलियों को सीधा तान दें। इस मुद्रा के लिए कोई विशेष समय अवधि नहीं है सिद्धासन में बैठकर, खड़े रहकर या बिस्तर पर जब भी समय मिले इसका अभ्यास किया जा सकता है। 
ज्ञानमुद्रा ज्ञान-विवेक को बढ़ाती है। अँगुलियों के दोनों ओर की ग्रंथियाँ सक्रिय रूप से कार्य करती हैं। इससे मस्तिष्क तेज और स्मृति शक्ति बढ़ती है। यह मुद्रा एकाग्रता को बढ़ाकर अनिद्रा, हिस्टीरिया, गुस्सा और निराशा को दूर करती है। यदि इसका नियमित अभ्यास किया जाए तो सभी तरह के मानसिक विकारों तथा नशे की आदतों से मुक्ति मिल सकती है। इसके अभ्यास से मन प्रसन्न रहता है

पद्मासन :: पद्म अर्थात कमल, इसलिए इस आसन को कमलासन भी कहते हैं। इससे रक्त संचार तेजी से बढ़कर उसमें शुद्धता आती है तथा यह पैरों को लचिला, लेकिन मजबूत बनाता है। यह आसन बैठकर किया जाता है। पहले पैर लंबे कर आपस में सटाकर  और फिर बाएँ हाथ से दाएँ पैर का अँगूठा पकड़कर दाहिने पैर को बाएँ पैर की जंघा पर रखते हैं। फिर बाएँ पैर को ऊपर की दाहिनी जंघा पर स्थापित करते हैं। ‍तब दोनों हाथ की कलाइयों को घुटनों पर सीधा रखा जाता है।  दोनों हाथ अँगूठे के पास वाली अँगुली अँगूठे से मिलाकर  बाकी तीन अंगुलियाँ सीधी रखी जाती हैं। आँखें बंद तथा रीढ़ की हड्डी सीधी रखी जाती है। गर्दन सीधी तथा नासाग्र दृष्टि बनाए रखनी होती है अथवा भृकुटी पर चित्त को एकाग्र-स्थिर किया जाता है।समस्त दुर्भावनाओं का विनाशक यह पद्मासन है। यह समस्त व्याधियों को नष्ट करता है। समस्त व्याधियों से अभिप्राय दैहिक, दैविक और भौतिक व्याधियों से है। पद्मासन में प्राणायाम करने से साधक या रोगी का चित्त शांत होता है। साधना और ध्यान के लिए यह आसन श्रेष्ठ है। इससे चित्त एकाग्र होता है। चित्त की एकाग्रता से धारणा सिद्ध होती है। इससे पैरों का रक्त-संचार कम हो जाता है और अतिरिक्त रक्त अन्य अंगों की ओर संचारित होने लगता है जिससे उनमें क्रियाशीलता बढ़ती है। यह तनाव हटाकर चित्त को एकाग्र कर सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाता है। छाती और पैर मजबूत बनते हैं। वीर्य रक्षा में भी मदद मिलती है। नियमित अभ्यास से पेट कभी बाहर नहीं निकलता। पैरों में किसी भी प्रकार का अत्यधिक कष्ट होने पर इसको तुरन्त बंद कर देना चाहिए।  साइटिका अथवा रीढ़ के निचले भाग के आसपास किसी प्रकार का दर्द हो या घुटने की गंभीर बीमारी हो तो भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए। 
PRANAYAM-YOG प्राणायाम योग साधना :: It has nothing to do with religion. Its purely an exercise form, to improve health and vitality. It helps one in becoming slim and lose weight. The health conscious may opt for this in his daily routine.  Those who wish to prolong their lifespan-longevity, should devote 10-15 minutes initially, extending to 1 hour subsequently, since this is hassle free. 
It provides relaxation and reduces fatigue. 
With the start up, it starts up controlling blood pressure and pulse. It cures asthma, respiratory troubles, bronchitis, lung cancer.
It cure digestive problems. When the stomach is moved inside towards the spinal cord during exhalation-release of breath, a tough layer-coating developed in due course of time, inside the intestines, breaks away, leading to better absorption of digested food.
When the spinal cord-back bone-vertebral column is erect-straight and the diaphragm moves towards the back bone during exhalation,  gases trapped in the stomach are released through the mouth and anus. This process helps in reducing gastric trouble. Continued practice leads to complete cure.
Gas gets accumulated close to the heart leading to chest etching-pain. Release of gas relieves this trouble. Chest pain due to gas resemble the due to heart attack.
Heaviness experienced in the head is reduces by the release gas from the stomach due to Yogabhyas (-regular practice of Yog).
The stomach is like an inflated balloon the thickness of which goes on increasing with the deposition of fat layers. Each deep breath helps in reducing this thickness.
During inhalation excess of oxygen is absorbed by the hemoglobin in the blood forms oxy-hemoglobin, which helps in breaking down of food particles into energy, water and nitrogenous waste. 
Most of the hostile-cancerous cells break down in this process deep breathing-inhalation & exhalation.
It can be compared to artificial breathing-resuscitation. It improves resistivity and is a wonderful cure to incurable diseases. 
There is no boundations-restriction of time and place. However, one has to  be empty stomach-fresh, like other exercises.
Oxygen is a basic component of air required to break food into energy, carbon dioxide, nitrogenous waste, which are segregated by the kidneys and the lungs. Nitrogen is another component needed by the body to maintain-cop up, with the atmosphere. Unwanted cells-cancer and the like, needed to be eliminated from the circulatory system-which is done by this age-generation old- tried and trusted-most scientific technique-therapy. 
ANULOM-VILOM अनुलोम-विलोम :: It involves three  stages :- (I) Inhaling-suction, (II) Holding and (III) Exhaling (-creation of vacuum) air from the lungs. One may opt for a posture, in which the back is kept vertically straight and the legs are crossed. In the morning sit-perform facing east-Sun the source of energy on the earth and in the evening the north-the magnetic alignment for keeping-normalization of blood circulation, since it constitutes of hemoglobin a composition of iron.
Inhaling :- Considering thumb as the 1st finger, Jupiter finger as the 2nd finger, Saturn finger as the 3rd finger, Sun finger as the 4th finger and the Mercury finger as the 5th finger; use the 2nd and 3rd (-or 3rd and 4th finger) fingers to block the left nostril. The thumb will stand erect, while 4th and 5th fingers will bend inside, into the fist. Now, hold the left nostril and take long breath to fill the lungs with air slowly, for a few seconds. The diaphragm, will be pressed inwards and the chest will bulge a bit in an outward direction. One may concentrate over Allah-God-Almighty-Christ-a deity of your choice, or even the devil, as per your liking. However, there is no compulsion.
As soon air enters lungs it allows the oxygen to get mixed with hemoglobin to form oxy-hemoglobin and reach each and every cell of the body, leading to formation of new cells and decomposition of the old-unwanted-undesirable cells, keeping one young-fit and full of energy.
Holding the breath for a few seconds, will help in the exchange of gases, in the bronchial, inside the lungs. Oxygen will be mixed with the blood and carbon dioxide will be liberated.
Exhaling will be done by chocking the right nostril with the thumb. Carbon dioxide is exhaled, in addition to other gases, simultaneously.
2nd inhaling is done with the right nostril still choked  holding is done by reverting the two fingers to the left nostril and the air is exhaled again.
All these postures requires the practitioner to sit with straight back. chest bulges slightly and the stomach is pulled in side. Immediate gains are in the form of relief from the gas filled-stored inside the stomach and burning sensation. It prevent chest congestion and digestive disorders. learning with straight back helps in sharpening of memory. 
KAPAL BHATI कपाल भाती :: Start with deep breathing-inhalation and exhalation of air in the lungs, while sitting in comfortable posture keeping the back straight, twice or thrice. Its better if one  does this in open air.
Now suck the air into the lungs without jerking the body and reject it there after one second. repeat it for 5-10 minutes initially and the rise time up to 15 minutes.
Have faith in you (-and the God, perhaps) and proceed. Yog (-literally plus,addition+ ) means associating with the God through physical means.
Have a good day. Best of luck.
CATION :: All these exercises are performed with empty stomach.
Take juice or milk after drying sweat and bathing, low calorie diet is advised.
One may keep his eyes closed. He may focus over some religious thought-idea. Try to think of good-virtuous-pious-righteous deeds-plans, at least till you are busy with this simple exercise. Results are wonderful and observed within a week. This is a wonderful healer.
Yog boosts confidence, internal strength, vitality, vigor and brings peace-tranquility.
Have faith in you (-and the God, perhaps) and proceed. Yog (-literally plus, addition + ) means associating with the God through physical means.
Have a good day. Best of luck.
You will experience amazing results like weight loss, cure of respiratory ailments, gas trouble, good sleep, loss of tension, improvement of vision etc.
BHRAMARI PRANAYAM ::  Close the two ears with thumbs, place the second finger over the head , third and fourth fingers by the side of nose and the fifth finger will occupy the position, just below the nostrils.  Now suck air-deep breathing,  hold it for a moment and  then release along with the sound of om.  
अपने शरीर के भीतर रहने वाली वायु को प्राण कहते हैं और उसे रोकने को आयाम अर्थात प्राणवायु को रोकना प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम करने के लिये पद्मासन, पालती या एक पैर दूसरे पर रख कर आसन लगाना चाहिये। इस मुद्रा में परमात्मा का चिंतन करना चाहिये। प्राणायाम करने  के लिये समतल भूमि का चुनाव करें और स्थिर आसन बिछावें जो कि  ज्यादा ऊँचा-नीचा न हो। पहले मूंज-कुशासन, फिर मृगचर्म और इनके ऊपर कपड़ा बिछावें। 
मृगचर्म उपलब्ध नहीं होगी, इसलिये पक्के फर्श-तख़्त पर रुई का बढ़िया गद्दा, कालीन, दरी, कम्बल या चटाई बिछा लें। 
मन और इन्द्रियों की चेष्टाओं को काबू कर चित्त को एकाग्र करें तथा अंत:करण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास शुरू करें। शरीर, मस्तक, और गले को अविचल-बगैर हिलाए डुलाए, एक सीध में रखते हुए स्थिर बैठें। केवल नासिका के अग्र भाग को देखें और कमर को सीधा रखें। प्रात: काल  में मुख पूर्व व शाम को उत्तर दिशा में रखें तथा अन्य दिशाओं में द्रष्टि पात न करें। दोनों एड़ियों से अंड कोष और लिंग को बचाते हुए, दोनों जांघों के ऊपर भुजाओं को तिरछी करके रखें तथा बायें हाथ की हथेली पर दाहिने हाथ के पृष्ठभाग को स्थापित करें और मुंह को कुछ ऊँचा करके सामने की ओर स्थिर करें। 
रेचन: दायें  नथुने से वायु बाहर निकलने के लिये दूसरी व तीसरी ऊँगली को माथे पर रखें तथा चौथी व पांचवी ऊँगली से  बांया नथुना बंद करें धीरे-धीरे वायु बाहर निकालें, अंगूठे को स्वतंत्र  रखें।
पूरक: अब पूर्वावस्था में धीरे-धीरे साँस भीतर खींचें। पर्याप्त वायु भरकर स्थिर बैठें । 
कुम्भक: इस स्थिति में वायु को रोकना है, वायु  न अन्दर जाये न बाहर आए।शुरू में 24 सेकंड, कुछ दिनों के अभ्यास के बाद 48 सेकंड और फिर 72 सेकंड।
इन तीनों प्रक्रियाओं को धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते हुए करना चाहिये। एक दिन में आधे घंटे का अभ्यास पर्याप्त है। इस क्रिया के दौरान पसीना आना अच्छा है, कम्कपी आना उत्तम तथा अभिघात लगना सर्वोत्तम है। ध्यान के साथ प्राणायाम अति उत्तम है। ज्ञान व वैराग्य से युक्त प्राणायाम, इन्द्रियों पर विजय प्रदान करता है। शास्त्र तपस्या व प्राणायाम को बराबर मानता है।                                     
भ्रामरी प्राणायाम : अंगूठों से दोनों कानों को बंद करें, दूसरी अंगुली माथे पे रखें, तीसरी और चौथी अंगुली को नाक के बगल में व पांचवी अंगुली को नासिका द्वार के निचे स्थिर करें।अब गहरी साँस खिंच कर उसे ॐ शब्द के उच्चारण के साथ बाहर निकालें। 
अपने शरीर के भीतर रहने वाली वायु को प्राण कहते हैं और उसे रोकने को आयाम अर्थात प्राणवायु को रोकना प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम करने के लिये पद्मासन, पालती या एक पैर दूसरे पर रख कर आसन लगाना चाहिये। इस मुद्रा में परमात्मा का चिंतन करना चाहिये। प्राणायाम करने  के लिये समतल भूमि का चुनाव करें और स्थिर आसन बिछावें जो कि  ज्यादा ऊँचा-नीचा न हो। पहले मूंज-कुशासन, फिर मृगचर्म और इनके ऊपर कपड़ा बिछावें। 
मृगचर्म उपलब्ध नहीं होगी, इसलिये पक्के फर्श-तख़्त पर रुई का बढ़िया गद्दा, कालीन, दरी, कम्बल या चटाई बिछा लें। 
मन और इन्द्रियों की चेष्टाओं को काबू कर चित्त को एकाग्र करें तथा अंत:करण की शुद्धि के लिए योगाभ्यास शुरू करें। शरीर, मस्तक, और गले को अविचल-बगैर हिलाए डुलाए, एक सीध में रखते हुए स्थिर बैठें। केवल नासिका के अग्र भाग को देखें और कमर को सीधा रखें। प्रात: काल  में मुख पूर्व व शाम को उत्तर दिशा में रखें तथा अन्य दिशाओं में द्रष्टि पात न करें। दोनों एड़ियों से अंड कोष और लिंग को बचाते हुए, दोनों जांघों के ऊपर भुजाओं को तिरछी करके रखें तथा बायें हाथ की हथेली पर दाहिने हाथ के पृष्ठभाग को स्थापित करें और मुंह को कुछ ऊँचा करके सामने की ओर स्थिर करें। 
रेचन :  दायें  नथुने से वायु बाहर निकलने के लिये दूसरी व तीसरी ऊँगली को माथे पर रखें तथा चौथी व पांचवी ऊँगली से  बांया नथुना बंद करें धीरे-धीरे वायु बाहर निकालें, अंगूठे को स्वतंत्र  रखें।
पूरक : अब पूर्वावस्था में धीरे-धीरे साँस भीतर खींचें। पर्याप्त वायु भरकर स्थिर बैठें । 
कुम्भक: इस स्थिति में वायु को रोकना है, वायु  न अन्दर जाये न बाहर आए।शुरू में 24 सेकंड, कुछ दिनों के अभ्यास के बाद 48 सेकंड और फिर 72 सेकंड।
इन तीनों प्रक्रियाओं को धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते हुए करना चाहिये। एक दिन में आधे घंटे का अभ्यास पर्याप्त है। इस क्रिया के दौरान पसीना आना अच्छा है, कम्कपी आना उत्तम तथा अभिघात लगना सर्वोत्तम है। ध्यान के साथ प्राणायाम अति उत्तम है। ज्ञान व वैराग्य से युक्त प्राणायाम, इन्द्रियों पर विजय प्रदान करता है। शास्त्र तपस्या व प्राणायाम को बराबर मानता है। 
MEDITATION-ध्यान :: स्थिर चित्त से भगवान  का चिंतन, ध्यान कहलाता है। समस्त उपाधियों से मुक्त मन सहित आत्मा का ब्रह्म विचार में परायण होना ध्यान है। ध्येय रूप आधार में स्थित एवं सजातीय प्रतीतियों से युक्त चित्त को जो विजातीय प्रतीतियों से रहित प्रतीति  होती है, उसको भी ध्यान कहते हैं। जिस किसी प्रदेश में भी ध्येय वस्तु के चिंतन में एकाग्र हुए चित्त को प्रतीति  के साथ जो अभेद-भावना होती है, उसका नाम भी ध्यान है। ध्यान परायण होकर जो व्यक्ति अपने शरीर का त्याग करता है, वह अपने कुल स्वजन और मित्रों का उद्धार करके स्वयं भगवत स्वरुप हो जाता है। प्रति दिन श्रद्धा पूर्वक श्री हरी का ध्यान करने से मनुष्य वह गति पाता  है, जो कि सम्पूर्ण महायज्ञों के द्वारा भी अप्राप्य है
चलते-फिरते, उठते-बैठते-खड़े होते, सोते-जागते, आँख खोलते-मींचते, शुद्ध-अशुद्ध अवस्था में भी निरंतर परमेश्वर का ध्यान करना चाहिए।
भगवान मृत्युंजय, ध्यान करने पर अकाल-मृत्यु  को दूर करने वाले हैं।
साधक को पहले मन को स्थिर करने के लिए स्थूल-मूर्त रूप का ध्यान करना चाहिये। मन के स्थिर हो जाने पर उसे सूक्ष्म तत्व-अमूर्त के चिंतन में लगाना चाहिये।
ध्यानावस्था में मनुष्य-साधक को समस्याओं का समाधान मिल जाता है। 
ध्यान-योगध्यान तीन प्रकार का है :: 
(I). स्थूल ध्यान :- स्थूल चीजो के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते है। स्थूल-ध्यान वह कहा जाता है जिसमें मूर्तिमान् अभीष्ट देवता का अथवा गुरू का चिन्तन किया जाय। 
(I-1). प्रथम-ध्यान :- साधक अपने नेत्र बन्द करके हृदय में ऐसा ध्यान करे कि एक अति उत्तम अमृत सागर बह रहा है। समुद्र के बीच एक रत्नमय द्वीप है, वह द्वीप रत्नमयी बालुका वाला होने से चारों और शोभा दे रहा है। इस रत्न द्वीप के चारों ओर कदम्ब के वृक्ष अपूर्व शोभा पा रहे है। नाना प्रकार के पुष्प चारों ओर खिले हुऐ हैं। इन सब पुष्पों की सुगन्ध में सब दिशाएँ सुगन्ध से व्याप्त हो रही हैं। साधक मन में इस प्रकार चिन्तन करे कि इस कानन के मध्य भाग में मनोहर कल्पवृक्ष विद्यमान है, उसकी चार शाखाएँ हैं, वे चारों शाखाएँ चतुर्वेदमयी हैं और वे शाखाएँ तत्काल उत्पन्न हुए पुष्पों और फलों से भरी हुई हैं। उन शाखाओं पर भ्रमर गुंजन करते हुए मँडरा रहे हैं और कोकिलाएँ उन पर बैठी कुहू-कुहू कर मन को मोह रही है। फिर साधक इस प्रकार चिन्तन करे कि इस कल्पवृक्ष के नीचे एक रत्न मण्डप परम शोभा पा रहा है। उस मंडप के बीच में मनोहर सिंहासन रखा हुआ है। उसी सिंहासन पर इष्ट देव विराजमान हैं। इस प्रकार का ध्यान करने पर स्थूल-ध्यान की सिद्धि होती है।
(I-2). द्वितीय ध्यान :- मनुष्य के हृदय के मध्य अनाहत नाम का चौथा चक्र विद्यमान है। इस के 12 पत्ते है, यह ॐकार का स्थान है। इस के 12पत्तों पर पूर्व दिशा से क्रमशः – चपलता, नाश, कपट, तर्क, पश्चाताअप, आशा-निराशा, चिन्ता, इच्छा, समता, दम्भ, विकल्प, विवेक और अहंकार विद्यमान रहते है। अनाहत चक्र के मण्डप में ॐ बना हुआ है। साधक ऐसा चिन्तन करे कि इस स्थान पर सुमनोहर नाद-बिन्दूमय एक पीठ विराजमान है और उसी स्थल पर भगवान् शिव विराजमान है, उनकी दो भुजायें है, तीन नेत्र है और वे शुक्ल वस्त्रों में सुशोभित है। उनके शरीर पर शुभ्र चंदन लगा है, कण्ठ में श्वेत वर्ण के प्रसिद्ध पुष्पों कि माला है। उनके वामपार्श्व में रक्तवर्णा शक्ति शोभा दे रही है। इस प्रकार शिव का ध्यान करने पर स्थूल-ध्यान सिद्ध होता है।
(I-3). तृतीय ध्यान  :- मस्तक में जो शुभ्र-वर्ण का कमल है, योगी प्रभात-काल में उस पदम् में गुरू का ध्यान करते है कि वह शांत, त्रिनेत्र, द्विभुज है और वह वर एवं अभय मुद्रा धारण किये हुये है। इस प्रकार यह ध्यान, गुरू का स्थूल ध्यान है। (विश्वसारतंत्र) 
साधक ऐसा ध्यान करे कि जिस सहस्त्र-दल कमल में प्रदीप्त अन्तरात्मा अधिष्ठित है, उसके ऊपर नाद-बिन्दु के मध्य में एक उज्ज्वल सिंहासन विद्यमान है, उसी सिंहासन पर अपने इष्ट देव विराज रहे हैं, वे वीरासन में बैठे है, उनका शरीर चाँदी के पर्वत के सदृश श्वेत है, वे नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं और शुभ्र माला, पुष्प और वस्त्र धारण कर रहे हैं, उनके हाथों में वर और अभय मुद्रा हैं, उनके वाम अंग में शक्ति विराजमान है। इष्ट देव करुणा दृष्टि से चारों ओर देख रहे हैं, उनकी प्रियतमा शक्ति दाहिने हाथ से उनके मनोहर शरीर का स्पर्श कर रही हैं। शक्ति के वाम कर में रक्त-पद्म है और वे रक्तवर्ण के आभूषणों से विभूषित हैं, इस प्रकार ज्ञान-समायुक्त इष्ट का नाम-स्मरण पूर्वक ध्यान करे।(कंकालमालिनी तन्त्र) 
(II). ज्योतिर्ध्यान :: जिस ध्यान में तेजोमय ब्रह्म वा प्रकृति की भावना की जाय उसको ज्योतिर्ध्यान कहते हैं। मूलाधार और लिंगमूल के मध्यगत स्थान में कुण्डलिनी सार्पाकार में विद्यमान हैं। इस स्थान में जीवात्मा दीप-शिखा के समान अवस्थित है। इस स्थान पर ज्योति रूप ब्रह्म का ध्यान करें। एक और प्रकार का तेजो-ध्यान है जिसमें भृकुटि के मध्य में और मन के ऊर्ध्व-भाग में जो ॐकार रूपी ज्योति विद्यमान है, उस ज्योति का ध्यान करें। इस ध्यान से योग-सिद्धि और आत्म-प्रत्यक्षता शक्ति उत्पन्न होती है। 
(III). सूक्ष्म ध्यान ::  पूर्व जन्म के पुण्य उदय होने पर साधक की कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। यह शक्ति जाग्रत होकर आत्मा के साथ मिलकर नेत्ररन्ध्र-मार्ग से निकलकर उर्ध्व-भागस्थ अर्थात् ब्रह्मरन्ध्र की तरफ जाती है और जब यह राजमार्ग नामक स्थान से गुजरती है तो उस समय यह अति सूक्ष्म और चंचल होती है।
इस कारण ध्यान-योग में कुण्डलिनी को देखना कठिन होता है। साधक शाम्भवी-मुद्रा का अनुष्ठान करता हुआ, कुण्डलिनी का ध्यान करे, जिसमें बिन्दुमय ब्रह्म एवं कुल-कुण्डलिनी शक्ति का दर्शन लाभ हो। यही सूक्ष्म ध्यान है। इस दुर्लभ ध्यान-योग द्वारा- आत्मा का साक्षात्कार होता है और ध्यान सिद्धि की प्राप्ति होती है।
शाम्भवी-मुद्रा :- यह मुद्रा परम गोपनीय है। यह कुलवधु के समान है और वेदादि के सर्व सुलभ होने के कारण इसे गणिका के समान बताकर शाम्भवी-मुद्रा की श्रेष्ठता ही व्यक्त की गई है। शरीर में जो मूलाधारादि षट्चक्र है उनमें से जो अभीष्ट हो, उस चक्र में लक्ष्य बनाकर अन्तःकरण की वृत्ति और विषयों वाली दृष्टि जो निमेष-उन्मेष से रहित हो ऐसी यह मुद्रा ॠग्वेदादि और योग दर्शनादि में छिपी हैं। इससे शुभ की प्रत्यक्षता प्राप्त होती है, इसलिए इसका नाम शाम्भवी-मुद्रा हुआ।
ॐ त्वमसि आदि महाकाव्यों से जीवात्मा परमात्मा के अभेद रूप लक्ष्य में मन और प्राण का लय होने पर निश्चल दृष्टि खुली रह कर भी बाहर के विषयों को देख नहीं पाती, क्योंकि मन का लय होने पर इन्द्रियाँ अपने विषयों को ग्रहण नहीं कर सकती।
इस प्रकार ब्रह्म में लय को प्राप्त हुए मन और प्राण जब इस अवस्था में पहुँच जाते हैं, तब शाम्भवी-मुद्रा होती है। भृकुटी के मध्य में दृष्टि को स्थिर करके एकाग्रचित्त हो कर परमात्मा रूपी ज्योति का दर्शन करे अर्थात् साधक शाम्भवी-मुद्रा में अपनी आँखो को न तो बिल्कुल बन्द रखे और न ही पूर्ण रूप से खुली रखे, साधक कि आँखो की अवस्था ऐसी होनी चाहिये कि आँखें बन्द हो कर भी थोड़ी सी खुली रहे, जैसे कि अधिकतर व्यक्तियों की आँखें सोते वक्त भी खुली रहती है। इस तरह आँखो की अवस्था होनी चाहिये। ऐसी अवस्था में बैठ कर दोनों भौंहों के मध्य परमात्मा का ध्यान करे। इस को ही शाम्भवी-मुद्रा कहते हैं।
यह मुद्रा सब तन्त्रों में गोपनीय बतायी है। जो व्यक्ति इस शाम्भवी-मुद्रा को जानता है वह आदिनाथ है, वह स्वयं नारायण स्वरूप और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा स्वरूप है। जिनको यह शाम्भवी-मुद्रा आती है वे निःसन्देह मूर्तिमान् ब्रह्म स्वरूप है। इस बात को योग-प्रवर्तक शिव जी ने तीन बार सत्य कहकर निरूपण किया है। इसी मुद्रा के अनुष्ठान से तेजो ध्यान सिद्ध होता है। इसी उद्देश्य से इसका वर्णन यहाँ किया गया है। इस शाम्भवी-मुद्रा, जैसा अन्य सरल योग सरल योग दूसरा नहीं है। इसे गुरूद्वारा प्राप्त करने की जरूरत है।
शाम्भवी-मुद्रा करके प्रथम आत्म-साक्षात्कार करे और फिर बिन्दुमय-ब्रह्म का साक्षात्कार करता हुआ मन को बिन्दु में लगा दे। तत्पश्चात् मस्तक में विद्यमान ब्रह्म-लोकमय आकाश के मध्य में आत्मा को ले जावें और जीवात्मा में आकाश को लय करे तथा परमात्मा में जीवात्मा को लय करे, इससे साधक सदा आनन्दमय एवं समाधिस्थ हो जाता है। शाम्भवी-मुद्रा का प्रयोग और आत्मा में दीप्तिमान-ज्योति का ध्यान करना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह ज्योति, बिन्दु-ब्रह्म के रूप में दिखाई दे रही है। फिर ऐसा भी ध्यान करे कि हमारी आत्मा ही आकाश के मध्य में विद्यमान है। ऐसा भी ध्यान करे कि आत्मा आकाश में चारों ओर लिपटी है और वहाँ सर्वत्र आत्मा ही है और वह परमात्मा में लीन हो रही है। ध्यानबिन्दू -उपनिषद् के प्रारम्भ में ही कहा है कि- यदि पर्वत के समान अनेक योजन विस्तीर्ण पाप भी हों तो भी वे ध्यान योग से नष्ट हो जाते हैं, अन्य किसी प्रकार से भी नष्ट नहीं होते।
One is aware of deep-repeated thinking over certain issues-problems, which forces him to forget everything to find ways and means, to come out of the difficulty.  The thinker get involved with it, whole heartedly and all his energies are channelized into finding a solution. Ultimately, he approaches the God. Life in it self is full of difficulties and the prudent-enlightened makes a bid to come out of them. The easiest-simplest method is meditation by focusing-fixing-concentrating the brain-mind into the Almighty.
This is a state when one prevents the mind from roaming around, brings the mind-brain under self restraint-control. Inner self-sensuality-passions are made to fall in line with deep thinking-contemplation. A magic spell is cast, followed by enchantment-charm-delight-happiness.
One has to focus the mind over certain material object like a statue-picture-even Om-Allah-Khuda-Rab-God-Jesus-Bhagwan, written over the wall.  This can be done-achieved, while-talking-walking-moving-standing-sitting-sleeping-waking-opening or closing eyes-pure or impure body state continuously reciting-remembering the God. He should consider himself as an incarnation-organ-part-component of the God and that he has evolved out of the Almighty and merge into him.
Meditation relieves anxiety and helps in solving intricate problems.
Human brain has two lobes-compartments which drag him into different directions-channels. One may successfully perform two tasks, simultaneously. During emergency-difficulty the two lobes start functioning together. Repeated practice makes one achieve this state quite frequently. This act when utilized to focus-penetrate-channelize into the creator-nurturer-destroyer-all in one, the Almighty; relieves the devotee of all pains-sorrow-grief-problems-difficulty and the cycle of birth and rebirth, obviously.
For best results choice of a peaceful place-solitude is recommended. Continued efforts gives quick results associated with confidence-happiness-success.
STAUNCH-DEEP समाधि :: जो चैतन्य स्वरूप से युक्त और प्रशांत महासागर की भांति स्थिर हो,  जिसमें आत्मा  के सिवाय किसी अन्य वस्तु की प्रतीति न हो, उस ध्यान को समाधि  कहते हैं। जो ध्यान के समय अपने चित्त को ध्येय-परमात्मा, में लगा कर वायु हीन प्रदेश की अग्नि शिखा के भांति अविचल एवं स्थिर भाव से बैठा रहता  है, वह योगी समाधिस्थ कहा गया  है। जो न सुनता है, न सूँघता है, न देखता है, न रसास्वादन करता है , न स्पर्श का अनुभव करता है, न मन में संकल्प उठने देता है, न अभिमान करता है और न बुद्धि से किसी दूसरी-अन्य, वस्तु को जानता ही  है, केवल  काष्ठ (वृक्ष) की भांति अविचल भाव से ध्यान में स्थित रहता  है, ऐसे चिंतन परायण पुरुष को समाधिस्थ कहते हैं। जो अपने आत्म स्वरुप श्री विष्णु के ध्यान में संलग्न रहता है, उसके सामने अनेक दिव्य विघ्न उपस्थित होते हैं , वे सिद्धि की सूचनादेने वाले हैं। बड़े बड़े विघ्न, लालच, लोभ, ज्ञान, सिद्धियाँ, प्रतिभा, सद्गुण, सम्पूर्ण शील, कलाएँ, कन्याएँ बिना बुलाए उपस्थित होती हैं। जो इनको तिनके की भांति निस्सार मानकर त्याग देता है, उसी पर भगवान विष्णु की कृपा होती है और वे प्रसन्न होते हैं।
YOG THERAPY-PREVENTION FROM DRUGS :: Drug addiction claims thousands of lives annually.  Mostly people try drugs out of curiosity and become addicted to it. It  provides unification of body, mind and soul.  Yog can help prevent drug addiction and break  the vicious cycle. Rehabilitation centers are incorporating these familiar Yogic exercises to prevent drug addictions. One may prefer Yog to remain healthy. Numerous people in India and abroad use Yog to abstain from drugs, narcotics, wine-women." It’s really enjoying-pleasant, to do it every day for 20-30 minutes. It involves-engage various body systems, resulting in perfect health.
Rehabilitation means treatment for drug addiction, which involves several steps, involving detoxification leading to reduced dependence over drugs.One may experience withdrawal symptoms like anxiety and increased stress levels.Yogic practices-techniques are  utilized for clarity and stability. Experts are generally involved in the various phases of this process.Yog helps one in staying calm-quite ("Peace-Solace-Tranquility") and induces clarity of vision and thoughts, helping in  prevention from drug addiction. The newly induced clarity, allows one to see clearly and stop responding, in an impulsive manner. Yog also induces discipline, willpower and confidence. 
Boasting-improving health: Yog is all about relaxation from stress and anxiety. 
Increased-enhanced concentration power: One passing through recovery phase may be worried and stressed. One should have confidence in it for speedy recovery.

Cultivates awareness: One of the most important functions of Yog is to increase awareness. A person can calm himself whenever, he is facing anxiety-pain-stress.
Enhanced mental strength : Its clinically proven that different breathing modes-inhaling-ex hailing-holding, help in improving mental stability. Deep breathing increases blood circulation which smoothen brain functionality. Improved supply of oxygen to whole body and the brain shows miraculous impact-results.
Common Yogic techniques-practices-excises are:
Hath Yog हठ योग describes postures, breathing methods and medical treatment. Detoxification of harmful substances, along with body strength development which can be easily attained through various physical postures. The clarity of mind-vision is harnessed through various breathing techniques. Clarity of mind can also be achieved through medical therapies and use of many medications.
Shavasan  शवासन : Its final relaxation posture which constitutes the concluding phase of every Yogic exercise. All the tension and stress are released in this phase as you relax consciously.
Yog Nidra योग निद्रा : The drug addicts are usually faced with higher levels of stress and anxiety. This deep meditation technique often referred to as yogic sleep is practiced at least once a week. This exercise basically helps to release all the tension and anxiety, helping to minimize body imbalances and achieve clarity in thought.
पञ्च प्राण-प्राणवायु-प्राणायाम :: प्राणी के शरीर के भीतर पाँच प्रकार की वायु पाई जाती है। ये पाँचों ही पवन देव के पुत्र हैं और प्राणी में प्रकृति के अंश  में उपस्थित रहते हैं।
प्राण :: वह वायु जो मनुष्य-प्राणी-जीव के शरीर को जीवित रखती है। शरीरांतर्गत प्राण वायु की उपस्थिति तक ही जीवात्मा इसमें निवास करता है। इस वायु का मुख्‍य स्थान हृदय में है।इस वायु के आवागमन को अच्छी तरह, भली-भाँति समझकर जो इसे साध लेता है वह लंबे काल तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है। वायु शरीर के अन्तर्गत खाद्य पदार्थों-भोजन को पोषक या हानिकारक पदार्थों में तब्दील करने-बदलने की क्षमता रखती है। मल का निर्माण और निष्कासन भी इसी के माध्यम से होता है। 
आयाम के दो अर्थ हैं:: प्रथम नियंत्रण या रोकना, द्वितीय विस्तार और दिशा। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता है तो पूर्णत: श्वास छोड़ देता है। प्राण जिस आयाम से आते हैं, उसी आयाम में चले जाते हैं। मनुष्य जब श्वास लेता है तो भीतर जा रही हवा या वायु पांच भागों में विभक्त हो जाती ह अर्थात  शरीर के भीतर पांच जगह स्थिर और स्थित हो जाता हैं। लेकिन वह स्थिर और स्थितर रहकर भी गतिशील रहती है।
पंचक  प्रकार हैं :: (1) व्यान, (2) समान, (3) अपान, (4) उदान और (5) प्राण।
वायु के इस पांच तरह से रूप बदलने के कारण ही व्यक्ति चैतन्य रहता है, स्मृतियां सुरक्षित रहती है, पाचन क्रिया सही चलती रहती है और हृदय में रक्त प्रवाह-स्पंदन होता रहता है।मन के विचार बदलने या  स्थिर रहने मे भी इसका योगदान रहता है रहता है। इस प्रणाली में किसी भी प्रकार का अवरोध पूरे शरीर, तंत्रिका-तंत्र को प्रभावित करता है। शरीर, मन तथा चेतना बीमारी, व्याधि, रोग और शोक से ‍ग्रस्त हो जाते हैं। नियमित प्राणायाम मन-मस्तिष्क, चरबी-मांस, आंत, गुर्दे, मस्तिष्क, श्वास नलिका, स्नायुतंत्र और खून आदि सभी को शुद्ध और पुष्ट, स्वस्थ रखता है।
ये सभी प्राण शरीर के अलग अलग भागों को नियंत्रित करते हैं।
(1). प्राणवायु :- ह्रदय से लेकर नासिका पर्यन्त जो प्राणवायु होती है, उसे प्राण कहते हैं।श्वास प्रश्वास को नासिका द्वारा लेना और छोड़ना, मुख और नासिका की गति, अन्न को पाचन योग्य बनाना, पानी को रक्त मूत्र एवं पसीने में परिवर्तित करना प्राणवायु के मुख्य कार्य है। इसका सम्बन्ध वायु तत्व एवं अनाहत चक्र (-ह्रदय) से है। प्राण वायु मनुष्य के शरीर का संचालन करती है। यह वायु मूलत: खून ऑक्सीजन (O2) और कार्बन-डाइऑक्साइड  (CO2) के रूप में रहती है। 
(2). अपान वायु :-  यह नाभि से लेकर पैरो तक विचरती है।नाभि से नीचे के अंग यथा प्रजनन अंग, गर्भाशय, कमर, घुटने, जंघाएँ, मलमूत्र पैर इन सभी अंगों का कार्य अपान वायु द्वारा होता है। इसका सम्बन्ध पृथ्वी तत्व और मूलाधार चक्र से है। इसकी गति नीचे की ओर होती है। अपान का अर्थ नीचे जाने वाली वायु। यह शरीर के रस में होती है।
(3). समानवायु :- यह नाभि से ह्रदय तक चलती है।पाचनक्रिया भोजन से रस निकलकर पोषक तत्वों को सभी अंगो में बाँटना इस वायु का कार्य है।इसका सम्बन्ध अग्नि तत्व और मणिपुर चक्र से है।समान नामक संतुलन बनाए रखने वाली वायु का कार्य हड्डी में होता है। हड्डियों से ही संतुलन बनता भी है।
(4). व्यान वायु :- यह समूचे शरीर में घूमती है। सभी स्थूल एवं सूक्षम नाड़ियों में रक्त संचार बनाये रखना इसका कार्य है। इसका सम्बन्ध जल तत्व और स्वाधिष्ठान चक्र से है। व्यान का अर्थ है चरबी तथा मांस से सम्बंधित कार्यों का सम्पादन करना। 
(5). उदान वायु :- यह कंठ से लेकर मस्तिष्क पर्यन्त  भ्रमण करती है।  इसका सम्बन्ध आकाश तत्व और विशुधि चक्र से है। उदान का अर्थ उपर ले जाने वाली वायु। यह हमारे स्नायुतंत्र में स्थित होती है।
प्राणिक मुद्राएँ :- पांचो प्राणों के नाम पर ही पांच प्राणिक मुद्राएँ हैं, जिनमें दो या दो से अधिक तत्वों का अग्नि के साथ मिलन होता है। उदाहरणार्थ :-   अग्नि + वायु + आकाश, अग्नि + आकाश+पृथ्वी, अग्नि + पृथ्वी + जल, अग्नि + वायु + आकाश +पृथ्वी और अग्नि + शेष चारों तत्व। इसी तरह से बनने वाली मुद्राओं को ही प्राणिक मुद्रा कहा जाता है।जब दो से अधिक तत्व आपस में मिलते हैं तो उनका प्रभाव तत्व मुद्राओं की तुलना में और भी अधिक बढ़ जाता है।जिस प्रकार से दो अथवा अधिक नदियों के मिलने से संगम का महत्व बढ़ जाता है उसी प्रकार इन मुद्राओं का महत्व भी बढ़ जाता है।  ये मुद्राएँ हैं :- (1). प्राण मुद्रा, (2). अपान मुद्रा, (3). व्यान मुद्रा, (4). उदान मुद्रा और (5). समान मुद्रा अथवा मुकुल मुद्रा।
प्राणायाम सम्बन्धी क्रियाएँ :- प्राणायाम  दौरान श्वास-निश्वास सम्बन्धी  तीन क्रियाएं  :- (1). पूरक, (2). कुम्भक और (3). रेचक।
उक्त तीन तरह की क्रियाओं को ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंदर रोकने को आंतरिक कुम्भक और बाहर रोकने को बाह्म कुम्भक कहते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

ENGLISH CONVERSATION (2) हिन्दी-अंग्रेजी बातचीत

ENGLISH CONVERSATION (3) हिन्दी-अंग्रेजी बातचीत

HINDU MARRIAGE हिन्दु-विवाह पद्धति