HINDU MARRIAGE हिन्दु-विवाह पद्धति

HINDU MARRIAGE हिन्दु विवाह पद्धति 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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(I). Marriages are made in the heaven and broken on the earth.
Census 2011 figures have revealed that out of the 3 women only 1 gets remarried after divorce, separation or her husbands death. It’s an institution, which brings two families together. It’s not just a relationship, it’s far beyond leading to interactions, mixing, interacting and helping each other in an hour of crises-need.
One has to be extremely cautious-careful, before making a commitment. Both sides should satisfy-acquaint themselves thoroughly, regarding the background and family status of each other. They should inquire about the family religion, caste, original place to which they belong-native place, family income, assets-financial position, reputation-educational qualification-job, business etc. etc. Efforts should be made to inquire about the temperament-moods-modalities-lifestyle and behavior as well. Family’s health status-genetic diseases, current health status should be considered-analysed. Marriages among equals last long.
So called love, is merely guided-influenced by physical attractions, infatuations, sensuality, flirtations, lust, sex desire, passions, etc. One should understand the meaning of love and must be able to differentiate between love and all these and other related factors, otherwise the love story may terminate in court, since quarrels begins soon after the marriage, over tit bots due to ego, finances, family interference, irrational behavior by either of the two partners etc.
Marriages need thorough understanding, tolerance, compromise, adjustment, compatibility, rationality, frankness, humour  politeness, expression etc. There may be occasions, when the spouse has to hide the weaknesses of the counterpart and protect-shield, as well. They have to stand together, merging their identity into one. Difference of opinion may be there, due to difference in education, environment, liking and disliking, tastes, upbringing etc., but there is always a scope for compromise. Issues can be resolved, amicably through negotiations, dialogue, discussions, talking and mediation. One should always weigh pros and cons of the contentious issues and better avoid them as far as possible. Open hearted talks, never let any confusion to crop between the two. Quick conclusions pertaining to contentious issues must be avoided. It’s not essential to agree with everything said, by the spouse, but diplomacy and tact are meant to resolve-defuse the situation. Assent may be given to the proposals which are unlikely to cause harm to the family or to put it in danger, or it may harm at a later stage.
Couple should adjust to the traditions, rituals and practices of the other side. A blatant no, must be avoided. In laws and other members must be respected, depending upon their age and position in the family-hierarchy. The girl has joined the other family, thus her position becomes crucial. She should wait and watch before making any move. She should be extra careful pertaining to the obligations. It’s she who has to shoulder the burden the traditions-social cultural-religious responsibilities, one day or the other. Initially, it may appear to be difficult, but slowly, gradually and surely, she will win the hearts of the in laws. Ultimately, she is the one who will pass on, all such faculties-traditions-practices to the next generation. 
The in laws are duty bound to provide all sorts of help to accommodate her in the new environment. They should take extra  care of  her needs.They should not expose the other members of the family to her, otherwise, they may have self invited trouble, in future. They should not interfere with the day today working-interactions of the couple. It's good not to criticize the bride for everything or to make attempts to degrade her.Her dignity should be maintained, side by side.
It's most sincerely and honestly advised that marriages should take place among the equals- people of same status, belonging to the same caste-religion-region, following identical traditions, compatibility of both the bride and  the groom should also be tested-examined-identified-ascertained.
Avoid marriage in such families in which:
1. Cultural aesthetics-ethics, morals, values are missing,
2. Male child is not born,
3. Scriptures are not honoured-virtue, piousity, righteousness is absent,
4. Both male and female members have long hairs all over the body,
5. Medical history shows presence of piles (बबासीर -अर्श ), tuberculosis (तपेदिक ), indigestion (-मन्दाग्नि), white patches (-सफ़ेद दाग ), leprosy (-कुष्ठ ), epilepsy (-मिर्गी), HIV, genetic diseases (-वंशानुगत बीमारियाँ ).
Avoid marrying two real sisters to one person or to real brothers. However they can be married off to step brothers.[Suk Sagar-Shri Mad Bhagwat]
हिन्दु विवाह पद्धति :: वर्तमान काल  में हिन्दु मैरिज एक्ट के लागु होने के बाद से ही शादी के तौर तरीके बदलने शुरू हो गये थे। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार शादी विवाह के लिये नाई व ब्राह्मण वर की तलाश करते थे और दोनों परिवारों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने में अहम् भूमिका का निर्वाह करते थे। लड़के-लड़की का चुनाव घर के बड़े-बूढ़ों के द्वारा किया जाता था और अक्सर दूल्हा-दुल्हन एक दूसरे को पहले  देख-जान नहीं पाते थे।
समय का चक्कर  चलते हुए कलयुग  दस्तक दे चुका है। लड़कियाँ अब पढ़-लिख रही हैं-नौकरी कर रही हैं। पश्चिमी सभ्यता अपना प्रभाव स्थापित कर चुकी है। लड़कियाँ अब स्वाबलंबी-स्वतंत्र-स्वछन्द-उच्चंखल-आत्म निर्भर-जागरूक होती जा रही हैं। जाति-बिरादरी-धर्म-देश-पद्धति-सामाजिक-प्रांतीयता-परम्पराओं के  बंधन अब टूटते जा रहे हैं। 
हिन्दु धर्म में भी अब विवाह अनेक विकल्पों और समझौतों का विषय बनता  जा रहा है। लड़के  और लड़कियां एक-दूसरे को काम-वासना से पीड़ित होकर पसंद करते हैं और स्वेच्छा पूर्वक शादी से पहले ही शारीरिक सम्बंध स्थापित कर लेते हैं, ये शादी पहले तो होती ही नहीं, अगर होती भी है तो टूट जाती है-जिनकी परिणति संबन्ध-विच्छेद या तलाक में होती है।  पारंपरिक हिन्दु  विवाह पद्धति में विकल्पों के लिए कोई स्थान नहीं  था। यह दो परिवारों के बीच होनेवाला एक ऐसा संबंध था, जिसे लड़के और लड़की को स्वीकार करना होता था। इसके साथ  ही उनका बचपना समाप्त माना जाता था और वे वयस्क समझे जाते थे। हिन्दु धर्म में तलाक के लिये कोई स्थान नहीं था। परन्तु यह भी सत्य है कि कई-कई शादियों के रहते वधु-पत्नियाँ बहुत बुरी जिदगी बिताने को मजबूर होती थीं, जिसका कोई निराकरण-समाधान मरते दम तक नहीं था। पुरानी मान्यतायें-रीति-रिवाज-सामाजिक ढांचा, आज से अलग था। ज्यादातर परिवार बड़े और संयुक्त होते थे। सामान्तया पुरुष प्रधान परिवार में स्त्री आत्म निर्भर-स्वतंत्र नहीं थी। कुछ परिवारों में उन्हें आश्रित भी माना जाता था। इसके साथ यह भी सत्य है कि स्त्री का सम्मान भी सर्वोपरि था। उसे पिता-भाई-पति-पुत्र-स्वसुर का सहयोग-प्यार-इज्जत-संरक्षण   सदैव प्राप्त थे। 
पूर्व काल में शाषक वर्ग में कन्या वर का चुनाव स्वयं-स्वयंबर द्वारा करती थी। 
हर प्रान्त-जाति-वर्ग के वैवाहिक संस्कार-तौर तरीके-पद्धति में कुछ न कुछ अंतर-विविधताएँ थीं।  मगर मूल भावना एक ही होती थी। परंपरागत पद्धति में विवाह का आयोजन चातुर्मास अथवा वर्षाकाल की समाप्ति के बाद होता है। इसकी शुरुआत तुलसी विवाह से होती है जिसमें विष्णुरूपी गन्ने  का विवाह लक्ष्मीरूपी तुलसी के पौधे के साथ किया जाता है। सगाई नौ दुर्गे-नौ रात्रि से ही शुरू हो जाती हैं। देव उठनी एकादशी-देवठान के तुरन्त बाद,  विवाह के रीति-रिवाज़ शुरू हो जाते हैं और देव सोने तक  तक जारी रहते हैं। असूझ विवाह भड़रिया नौमी के दिन सम्पन्न हो जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, भाँवर-फेरे, यज्ञ-हवन, कन्या दान, दहेज, वेदी, बारात-बाराती, भोज सभी जगह-पद्धितियों में थे। सामान्यतया विवाह रात्रि में भोर बेला-प्रात: काल में सम्पन्न होते हैं और उसके तुरंत बाद विदा की रस्म पूरी कर ली जाती हैं। 
आजकल अख़बार, नैट, व्यक्तिगत सम्बन्ध, जान-पहचान, परिचय यहाँ तक कि दलालों का सहारा भी  लिया जा रहा है। कुछ लोग बिचौलिये की भूमिका अदा करते हैं और हर तरह की बातचीत को आगे बढ़ाने-सँभालने-तय करने-सम्पादित करने में बगैर कुछ लिए, पूरा सहयोग करते हैं। वे इसे एक सामाजिक-धार्मिक-अवैतनिक कार्य के रूप  में पूरी लग्न-निष्ठा-ईमानदारी-समर्पण की भावना के साथ तो करते ही हैं और साथ साथ अपनी ओर से दान दहेज भी समर्पित करते हैं। आजकल कुछ सामाजिक संस्थाएँ बहुत बड़े पैमाने पर विवाहों का आयोजन करती हैं,  और लाखों रूपये खर्च करती हैं। 
लड़के और लड़की को एक साथ मिलने-जुलने, बातचीत करने, घूमने-फिरने, जानने-समझने  का पूरा अवसर-मौका प्रदान किया जाता है। उनकी स्वीकृति के तदुपरान्त अँगूठी-गोद भराई, की रस्म अदा  की  जाती है। सगाई के लिए उचित-शुभ मुहूर्त निकाला जाता है और घर-परिवार-मित्रादि-परिजनों  की उपस्थिति में पंडित जी के द्वारा सभी रस्मों को पूरा कराया जाता है। इस अवसर पर संगीत, नृत्य, गाना-बजाना, लाइटिंग, खाने-पीने  आदि का आयोजन भी होता है। पारिवारिक संगीत की रस्म में वधु के परिवार की महिलायें रात  के समय नाच-गान करती  हैं। 
विवाह की रस्में हल्दी-उबटन और मैंहंदी से शुरू होती हैं। इसमें वर और वधु को विवाह के लिए तैयार कर, आकर्षक रूप दिया जाता है। हल्दी और चन्दन दोनों ही एंटिसेप्टिक का कार्य करते हैं।  हल्दी व चन्दन आदि का लेप लगाकर स्नान कराया जाता  हैं। घर की  स्त्रियाँ पैरौं में महावर (-लाल रंग) लगाती हैं। पूरे घर में रंगाई-पुताई किया जाता है। 
वर और वधु को तैयार होकर अपने पितरों-पुरखों का आह्वान करते हैं। विवाहोपरांत लड़की  का  गोत्र बदल जाता है। शादी से पहले वर पक्ष को वधु पक्ष से पीली चिट्ठी-निमंत्रण पत्रिका भेजी जाती है, जिसमें लग्न-महुर्त का विवरण होता है।
वर पक्ष बारात लेकर वधु के घर जाता है। आजकल ज्यादातर शादियाँ घर से अलग कहीँ सामुदायिक भवन, टैंट, मॉल, गार्डन, फार्म हाउस आदि में सम्पन्न होती हैं। दूल्हा घोड़ी पर सवार होता है। उसका चेहरा सेहरे से ढंका होता है। इसे चढ़त कहा जाता है। पूरी धूम-धाम, बैंड-बाजे, ढोल-ताशे-नगाड़े, आतिश बाजी के साथ बारौठी होती है। नाच-गाना, पीना-पिलाना, मौज-मस्ती एक आम बात है।  कुछ बाराती जरूरत से ज्यादा हुडदंगी होते हैं।  घर पर द्वार-चार, नेग-पूजा-आरती की  जाती है।  यह क्रिया  वधु पक्ष की महिलाएं लड़की की  माँ के साथ मिलकर करती हैं। कुछ लोग इसी जगह दान भेंट आदि की  रस्म करते हैं। आजकल इसी वक्त वर-माला की  कार्यवाही भी  पूरी कर लेते हैं।  कुछ लोग दान-भेंट आदि की  रस्म जनवासे में करते हैं। लड़की का भाई अपने जीजा को पान-मिठाई अर्पित करता है।
बारात खाने-पीने में लग जाती है। मेहमान नवाज़ी और यथोचित स्वागत पर विशेष ध्यान दिया जाता है। खान पान के बाद बाराती शगुन-भेंट-नेग या उपहार आदि अर्पित कर,  घर के लोगों से विदा लेते हैं। 
भोर की बेला में पण्डित जी वैदिक मन्त्रों के जाप से समस्त विधि-विधान सम्पन्न करते हैं। पंडित जी  यज्ञ वेदी में अग्नि  प्रज्वलित कर समस्त देवताओं का आहवाह्न करते हैं। सप्त-फेरे मंत्रोपचार-मंगल ध्वनि, रस्म रिवाज को प्रारम्भ करते हैं और सूर्योदय से पूर्व सभी संस्कार पूरे कर, विदाई की  रस्म अदा कर दी जाती हैं। आजकल गौने का रिवाज खत्म हो गया है, इसलिए पट्टा-फेर करा दिया जाता है। पिता कन्यादान करता है और वर उसे स्वीकार कर पूरी जिन्दगी हर-हाल में साथ निभाने का वायदा करता है। 
HINDU WEDDING (शादी-विवाह) :: The Veds emphasise that the basis of happy and blissful-fulfilling married life is the sense of unity, intimacy and love between husband and wife both physically, mentally and spiritually. Hence, wife is considered to be the Ardhangani (-better half) of husband, traditionally. Marriage is not for self-indulgence, but is considered a lifelong social and spiritual responsibility. Married life is considered to be an opportunity for the two people to grow as life partners,soul mates and the further perpetuation of life .
Hindu wedding is ceremony is named Vivah Sanskar. Its solemnised with the recitation-enchantment-singing of Mantr-Shlok in Sanskrat. The local dialect-language of the natives is used for general conversation, in between. Great significance-importance is associated with marriage. The ceremony is generally vibrant-colourful, which used to be extended to a number of days. All sorts of festivities-pomp and show are observed during this period. These days, it is solemnised with in a few hours.
The rituals and processes in a Hindu wedding vary widely. Nevertheless, there are a few key rituals common to all Hindu weddings: like Kanya Dan-Vag Dan-Pani Grahan and Sapt Padi, which are respectively, gifting-donating away of daughter by the father, voluntarily holding hands of the prospective couple near the auspicious fire Vedi, to signify union and walking seven steps together round it. With each step a vow/promise is made to  each other . The Hindu wedding ceremony, at its core is essentially a Vedic Yagy, associated with Hawan-Agni Hotr-rituals. The primary witness of a Hindu marriage is Agni-the deity of fire, along with family members-relatives and friends. All deities-demigods are invited to bless the couple. First invitation goes to Lord Ganpati-son of Bhagwan Shiv and Man Parwati to seek protection from from all ills-troubles-disturbances.
The pre-wedding and post-wedding rituals and celebrations vary from one region to another, preferences or the resources of the groom, bride and their families. They used to be single day to many days events. Pre-wedding ceremonies include engagement (-involving Vag Dan or betrothal and Lagn-Patrika written declaration-invitation to the other party). Groom's marriage procession reaches the bride's residence, accompanied with band, Dhol-Nagada-drums-Atishbaji (-fireworks) while dancing with music.
The post-wedding Abhishek,include Abhishek, Anna Prashan, Ashirvad, and Grah Pravesh-the welcoming of the bride to her new home.
7 VOWS-OATHS TAKEN BY THE BRIDE AND GROOM AT THE TIME OF HINDU MARRIAGE
 (हिन्दू विवाह में वर-वधू द्वारा लिये गये सात वचन)  
तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी॥1॥ 
कन्या कहती है कि हे स्वामि! तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ कर्म तुम मेरे साथ ही करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूँ। 
The bride wishes to be assured and says that she will come by his left side if he promised to attend Tirth-pilgrimage, fasting, opening of fast, Yagy, Dan-charity-donations and all pious activities along with her. 
हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्॥2॥ 
कन्या वर से कहती है कि यदि तुम हव्य देकर देवताओं को और कव्य देकर पितरों की पूजा करोगे तब ही मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूँ,अर्थात पत्नी बन सकती हूँ। 
The bride wants assurance that the groom will perform prayers Yagy-Hawan-Shraddh, devoted to the ancestors and Pitr-Manes and that she be part of it. 
कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्॥3॥ 
कन्या वर से कहती है कि यदि तुम मेरी तथा परिवार की रक्षा करो तथा घर के पालतू पशुओं का पालन करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूँ यानी पत्नी बन सकती हूँ।
The bride tells the groom she will be on her side only if assures to protect her and her family and that he will protect-nurture the animals. 
आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्॥4॥ 
कन्या वर से कहती है कि यदि तुम धन-धान्य आदि का आय-व्यय मेरी सहमति से करो तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूँ अर्थात् पत्नी बन सकती हूँ। 
The bride asks the groom that he will seeks her consent in spending and earning if he desires her to be his wife.
देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्॥5॥ 
कन्या वर से कहती है कि यदि तुम यथा शक्ति देवालय, बाग, कूआं, तालाब, बावड़ी बनवाकर पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूँ, अर्थात् पत्नी बन सकती हूँ।
The bride wishes to be assured that she be consented beforehand should the groom decide to contribute towards the erection of a Temple, creation of a garden, digging of a well or performing of religious rituals.
देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्॥6॥ 
कन्या वर से कहती है कि यदि तुम अपने नगर में या विदेश में या कहीं भी जाकर व्यापार या नौकरी करोगे और घर-परिवार का पालन-पोषण करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती  हूँ यानी पत्नी बन सकती हूँ।
The bride requests that her consent be obtain should the groom decides to conduct business at home or abroad. 
न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्॥7॥ 
कन्या वर से कहती है यदि तुम जीवन में कभी पराई स्त्री को स्पर्श नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूँयानी पत्नी बन सकती हूँ। 
The bride requests that at no time should the groom’s affection grow lesser towards her and that his actions adhere strictly to Divine Laws. From here on she requests him to regard every female as his mother, sister or daughter.
Now the husband seeks assurances from the bride:
The groom reassures that :: 
(1). The bride will not indulge in intoxicating drink; visit places where precious time will be wasted. Nor should she belong to a group of which he does not approve. 
(2) the bride’s behaviourism be such that it may create only favourable condition both in and away from home &  
(3)  the bride to sit on his left side as a symbol of divine amiability as ordained by Vedic and ancient injunctions. This position, which has need righteously reserved for her, is now duly occupied.
शास्त्रों के अनुसार पत्नी का स्थान पति के वाम अंग की ओर यानी बाएं हाथ की ओर रहता है. विवाह से पूर्व कन्या को पति के सीधे हाथ यानी दाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है और विवाह के बाद जब कन्या वर की पत्नी बन जाती है, जब वह बाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है। 
SEQUENCE OF EVENTS AT THE HINDU MARRIAGE CEREMONY
No Hindu marriage is binding and complete without the ritual of seven steps and vows in the auspicious presence of fire (Sapt Padi) is completed by the bride and the groom together, legally or socially.
The Pundit-Priest adopts almost same procedure-method in rituals-ceremonies. There are some variations depending upon, who solemnise the marriage. Regional-family-caste-language variations are always there. 
DHARTI POOJAN: It involves digging of earth and placing it under the Kalsh, under the Mandap-shade made up of bamboo.
DWAR CHAR-POOJA: The groom is honoured.  at the entrance of the bride’s home i.e., door, where the fathers of both bride and groom greet each other.
PAIR CHHUNA-VAR POOJA: Girls parents tough the feet of the groom and offer some gifts. women sing auspicious songs. Other family members too honor the groom and offer gifts as token of their deep appreciation.
JANWASA: This is the resting place for the Baratis-marriage party accompanying the groom. It used to a ceremony extended up to 7 days earlier. The Barat had to travel a long distance in ox driven carts. Arrangements were made to humour the guests.
MADHU PARK: Sweets are offered to develop the bond of affection. This is followed by Achman (-touching sacred water as a witness the marriage), Ang-sparsh (-touch, holding hands) and Swasti Vachan and Pooja--rituals, Agnihotr-Hawan.
JAI MALA: Soon after the welcome of Barat-marriage procession the bride puts the garland in the neck of the groom who too reciprocates, immediately. The Baratis-guests become busy with eating and giving gifts-cash.
RAKSHA SUTRA: It's a sacred thread provided by the groom’s elder brother to the bride and vows to be her council guide and to protect her in times of distress and problems. (-The Hindu system of life recognises the need for constructive dialogue to resolve problematic situations which are inevitable factors of life.) 
NAV GRAH SHANTI :: Its essential component of marriage. The Pundit-Priest perform Yagy-Hawan to pacify the 9 heavenly bodies for reducing their negative impact over the newly weds.
PANI GRAHAN: The Pundit recite sacred Mantr-Shlok in the presence of fire-Agni Hotr-Hawan. This is called Yagy, which is an essential component of Vedic-Hindu marriages. Agni Dev is the primary witness to marriage, when the girl-bride accepts the groom as her husband and the groom repeats the act by holding her hand.
KANYA-DAN: Bride’s father gives the hand of the bride in wedding ceremony to the groom. Sankalp is read, and the Gods are petitioned for their divine blessings. (The bride’s brother pour pure water-Ganga Jal, while the Sankalp is read and the relationship between the bride and the groom will remain pure and unbroken as the water is poured on this sacred gift.) 
Normally the father donates the daughter to the groom. In his absence brother-uncle-elders-guardians may perform this sacred duty. In the morning when the girl is sent (-vida) to the in laws house, all those who wish to seek Kanya Dan, take part-contribute in this ceremony of their own and bless the pair with some cash or gifts, like the parents.  This is considered to be a sacred act.
GATH  BANDHAN :: Tying of the knot signifies that an everlasting bond is formed between the marring parties.
MANGAL MANTR: The bride and groom perform their first Pooja to Bhagwan.
HAWAN: Bride and groom make offerings to the deities.
BHANWAR :: Circumambulation of the fire. A show of commitment to each other before man and God. And the petition to Narayan for protection and guidance, removal of fear and distress, request for happiness, show of compassion of love for God, a commitment to live a sinless life, prayer for long and healthy life and petition to Agni for success and happiness at all times.
SHILA-ROHAN: The bride demonstrates that her commitment to the groom and to her marriage is as firm and solid as the rock on which she places her feet. 
SAT-VACHAN: Seven vows taken before man and God.
LOT PATA: Exchange of positions. 
HRADAY SPARSH: Attuned and unison of the two hearts and minds. 
GARLAND, SINDUR DAN: A distinguished mark placed on the forehead of the bride signifying to the world of her marriage. This mark also commands the respect of others.
EXCHANGE OF RINGS: An incorporation of a modern practice and signing of marriage certificate. 
SEVEN STEPS-SAPT PADI: Seven steps symbolic of their joint journey in life. Their steps towards the North Star-Dhruv Tara, is symbolic in that their joint journey is firm and immovable as the north star. 
SAT PHERE (-seven feet, circumambulation round the fire, अग्नि परिक्रमा):- The event is marked with the acceptance of the groom by the bride as her husband. Hymens of Kam Sukt are pronounced, in the presence of the father, the bride, the groom, friends, relatives. 
Initially the bride moves ahead of the groom round the Agni Kund-sacrificial fire (-Agni Pradakshina, प्रदक्षिणा ). In the seventh fera-round, the groom becomes ahead of her. Its rare to find the Pundits conforming to the seven round rule. This is followed by the assurances-promises sought by the Pundit from newly married pair-couple.
The Pundit-priest, ask the pair to repeat  a series of vows-promises together. Priest's preface: The world of men and women, united in the bond of marriage by Sapt Padi, to further promote the joy of life, together listen with triumph and promise to abide by them through out their life. 
Step (1). The groom, representative of Vishnu takes the first step for the attainment of food and the bride, representative of Lakshmi, replies that she will use it for beneficial purposes. 
The groom seeks a  vow from the bride to  feed life-sustaining, nourishing  food to visitors, friends, parents, off springs, guests.  She would regard-respect him as the Goddess Laxmi does for Bhagwan Vishnu.The bride agrees to him and promise to prepare the food with the earning made by him through honest-means and hard work. She accepts to take care of his parents, friends, relatives, visitors and guests.
Step (2). The groom takes the second step for the sake of strength and courage and the bride steps with him and his and her happiness and that of relatives as well. 
The groom promises to be able bodied and hard working. He expects her to  managed home in a descent manner, with purity of behavior and thought. She replies in affirmative to honor his words regarding management-duties of the home, according to her ability reasonably, besides taking care of his health, strength and energy.
Step (3). The groom declares that for the accumulation of wealth, he takes the third step and the bride declares that she will execute her Dharm in relation to him as a wife.
The groom promises to devote himself to earning a livelihood by fair means, to discuss-let her manage and preserve their earnings to prosperity.The bride promises to join-help-coordinate him, in managing the income and expenditure along with seeking his consent for managing-expenses-growth and sustenance of the family.
Step (4). The groom takes the fourth step towards mutual happiness (-emphasising that his happiness depends of her) and the bride declares that his happiness and difficulties are also hers.
The groom's vows  to trust her decisions regarding the household and her choices-selections and promises to dedicate himself to help the prosperity of the community and household, along with family honours. He vows to stand by her in an hour of need. The Bride's  promises to strive to do her best for happiness of the family.
Step (5). The groom takes the fifth step towards the protection of cattle, horses and other animals and the bride reaffirms her devotion and commitment of her support.
The groom's vows to consult her and involve her in the up keep of cattle, farm-agriculture and income; in addition of contributing to the country-nation. She  promises to participate and protect the cattle, agriculture and business. She promises to maintain animal husbandry-the primary source of yogurt, milk, ghee and income, essential  for happiness in agrarian societies.
Step (6). For the enjoyment of seasons and seasonal changes, the groom takes the sixth step and the bride states that in addition, she will also support in giving alms, performing religious scarifies and making oblations. 
The groom promises to  love and have  children from her only, to have a family life and experience all the seasons-colours of life. She promise to develop-grow the  feeling of oneness with him and assert that she will be the means of sensual proximity pleasures-comforts. She vows to have only him in all seasons of life, cherish him  in her heart. She determines to worship him and make him a complete person. 
Step (7). This step is a request for fidelity, righteousness, modesty and chastity. The bride declares that since the honor guests and celestial beings are witness to the marriage ceremony performed according to Vedic injunctions as ordained by God, her joy knows no bounds.
The groom requests her to be his friend-consort-wife. She too promises to develop ultimate-intimate friendship with him. Together they promise to remember the vows they just took and adore each other, forever sincerely, with their heart.
The gist of  the recitation-hymens-Mantr-Shlok is that: The  father has offered his beloved daughter to the groom, who was awarded to him by Kam Dev. The groom promises to love-respect her, fulfilling her desires. Love is given and accepted mutually. The groom promises in the presence of earth and sky to protect her through out his life and work out for prosperity. The father requests the groom to take care of her and stand by her in the pursuits of Dharm, Arth, Kam and Moksh. The groom promises to do so.The groom promises-under take to take care of her till both of them survive.Its believed that the relation survives to the next seven births.Its promised that the duties awarded-bestowed upon them by the Deities Bhag, Aryma, Savita and Purandhi will be fulfilled to perform the duties-chores of  house holder-family. They together take oath-vow to mutually love-respect, share strength and taste. They undertake not to humiliate each other either in public or privately. They vows to work together in unison for the welfare-prosperity of their children.
The Pundit speak-utter these words/phrases and the couple repeats them: I have completed the Seven Fere with you. I have become yours, forever. I will live with you and discharge all my duties-piously-religiously-virtuously-faithfully-honestly. I will always share my joy-happiness-pleasure with you.Together, both of us will be  like word and meaning, thought and reality, plan and action, night and day, earth and heavens, plants and shrubs, sun and moon. Let all the deities and cows bless/shower  us with bliss-ultimate pleasure. Let the heavens, earth, mountains, whole universe be stable and provide stability-strength to our relation.
Marriage  पाणिग्रहण 
The essence of marriage is described in Ved (-वेद). The procedure & rituals (-कर्मकाण्ड) are described in Ved, pertaining to different kinds of marriages. There is a series of rituals followed by sacred Shloks-Mantr-Vedic Rhymes which have their cosmic impact over the couple through out their lives if uttered properly. All scriptures describes these events with references to the marriage of Bhagwan Shri Ram and Mata Sita, Bhagwan Shiv and Parvati. Some of the sacred rhymes are given below:
इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती। प्रजयौनौ स्वस्तकौ विस्वमायुर्व्यऽशनुताम्॥
O Indr-The king of heavens! May you bring together this newly married couple in the same manner as a pair of Chakr Vaak birds; let them enjoy marital bliss and along with their progeny, live a full life. [अथर्ववेद Atharv Ved]
धर्मेच अर्थेच कामेच इमां नातिचरामि।धर्मेच अर्थेच कामेच इमं नातिचरामि॥
In my duty, in my financial commitments, in my needs, I will not violate you. [विवाह कर्मकाण्ड -Vivah Karm Kand]
गृभ्णामि ते सुप्रजास्त्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः।
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यांत्वादुःगार्हपत्याय देवाः॥
I hold your hand so that we may have worthy children and may we be blessed to be inseparable. May Indr, Varun and Savita bless me to be an ideal householder with your kindly support.  [विवाह कर्मकाण्ड -Vivah Karm Kand]
सखा सप्तपदा भव, सखायौ सप्तपदा बभूव।सख्यं ते गमेयम्।सख्यात् ते मायोषम्। सख्यान्मे मयोष्ठाः।
You have walked seven steps with me; be my friend. We have walked seven steps together; let us be friends. Let me get your friendship. Let me not part from your friendship. May you not part from my friendship. [विवाह कर्मकाण्ड -Vivah Karm Kand]
धैरहं पृथिवीत्वम्। रेतोऽहं रेतोभृत्त्वम्।मनोऽहमस्मि वाक्त्वम्।
सामाहमस्मि ऋकृत्वम्।सा मां अनुव्रता भव।
I am the sky and you are the earth. I am the giver of energy and you are the receiver. I am the mind and you are the word. I am (-Sam) music and you are the song (-Rik). You and I follow each other. [विवाह कर्मकाण्ड -Vivah Karm Kand]
चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम्।ध्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम्॥
Thought was pillow and the sight the collyrium of the eyes; heaven and earth were her treasure box, when Sury went to her spouse Som (-not Chandr). [Rig Ved-ऋग्वेद; Bhagwan Marriage of Sury with Som]
गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्थासः।
भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥
I your husband, take your hand for perfect enjoyment with me; may you attain long life. Bhag, Aryama, Savitar and Purnadhi have given you to me to be my home's mistress.  [Rig Ved-ऋग्वेद; Bhagwan Marriage of Sury with Som]
काश्यप उवाच  
ययोतेरिव शर्मिष्ठा भर्तुर्बहुमता भव।सुतं त्वमपि सम्राजं सेव पूरुमवाप्नुहि॥
May you be cherished by your husband, as Sarmishtha was cherished by Yadati and may you bear a son, as did Puru, who shall be sovereign of the world. [-Abhigyan Shakuntlam, अभिज्ञान शाकुन्तलम्]
अभी वेदिं परितः क्लृप्तधिष्ण्याः समिद्वन्तः प्राप्तसंस्तीणदर्भाः।
अपघ्नन्तो दुरितं हव्यगन्धौवैर्तानास्त्वां वह्नयः पावयन्तु॥
Let these sacrificial fires, whose places are fixed round the altar, fed with holy wood, having the Durv grass (-दूर्व घास) strewn around their margins, removing sin by the perfume of the oblations, purify you. [-Abhigyan Shakuntlam, अभिज्ञान शाकुन्तलम्]
शुश्रूषस्व गुरुन्कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने; भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः।
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी; यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामाः कुलस्याध्यः॥
Pay respectful attention to your elders; treat other women of family as your dear friends; should your husband wrong you, let not your resentment lead your disobedience. Be ever courteous towards your servants; not puffed with pride in your fortune. By such behaviour, young women become honoured wives; but perverse wives are the bane of a family. [-Abhigyan Shakuntlam, अभिज्ञान शाकुन्तलम्]
अर्थो हि कन्या परकीय एव तामध्य संप्रेष्य परिग्रहीतुः।
जाते मामायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा॥
In truth a daughter is another's property; and having today sent her to her lord, I find my soul has become quite clear as if after restoring a deposit. [-Abhigyan Shakuntlam, अभिज्ञान शाकुन्तलम्]
प्रयुक्तपाणिग्रहणं यदब्यद् वधूवरं पुष्यति कान्तिमग्रयाम्।
सांइध्ययोगाद्नयोस्तदानीं किं कथ्यते श्रीरुभयस्य तस्य॥
When, by the presence of these (Uma and Shiva) other couples, on the eve of their marriage, attain a rare splendour, who could describe the glory of them both? [-Kumar Sambhav, कुमारसम्भवम्]
प्रदक्षिणप्रक्रमणात् कृशानोर् उदर्चिषस्तन् मिथुनं चकाशे।
मेरोरुपान्तेष्विव वर्तमानम् अन्योन्यसंसक्तमहस्त्रियामम्॥
By going round these blazing fire, the couple shone like night and day, clinging each other and revolving round the fringe of mount Meru.[-Kumar Sambhav, अग्नि परिक्रमा, कुमारसम्भवम्]
LEGAL POSITION: Hindu Marriage Act 1955, enacted by the Parliament of India, for all legal purposes, Hindus of any caste, creed or sect i.e., Sikh, Buddhist and Jain are deemed Hindus and can intermarry.  Special Marriage Act, 1954, allows a Hindu to marry a person who is not Hindu, employing any ceremony, provided specified legal conditions are fulfilled. According to Section 7 of Hindu Marriage Act, no Hindu marriage is binding and complete before the seventh step of the Sapt Padi/ritual in the presence of fire, by the bride and the groom together. In some cases, like South Indian Hindu marriages, even this is not essential.
PROPOSED AMENDMENTS IN HINDU MARRIAGE ACT :: A law is proposed to give the married woman half-a part of property to her, in case of divorce. This proposal is myopic and sure to boost number of litigation divorces. Highly illogical-objectionable-unethical-ill-advised and its improper clauses are sure to spoil the family life of Hindus.
There was a time when dowry deaths were reported regularly in newspapers. No one ever tried to investigate the real-true cause-factors behind such deaths. The reported deaths were common-frequent in those communities, which had settled in metros having been displaced-migrated. Dowry-gifts are quite common, everywhere, in the world. A large number of people refuse to take such gifts and make pictures-videos of the whole wedding ceremony to come out clean from the allegations later.
Anti-dowry laws are heavily laden-loaded in favor of the cruel daughter in law-the one, who insults-stings husband, in laws and uses foul language against them too often.
Neither she nor her parents contributed even a single penny to the property of her husband or the in laws, still the law makers wish to give the hard earned money-property to her. She is not earning and wastes money at will, without restriction. What is the logic to give her a cut from the property?
Recent surveys published in reputed newspapers indicate that today’s bride, is neither innocent nor virgin. She wishes to continue with her per marital alliances.
She misbehaves, taunts, torture, humiliates, uses foul-abusive language, against her in laws and the husband, still the government wish, the in laws and the husband to part with their hard earned money-property in her favor.
VERDICT-COURT RULINGS :: They must remember that more than half of marriages take to divorce courts sooner or later. There are the chances that marriages are solemnised just to squeeze-extract money from the gullible in laws.
VERDICT (I):Mumbai: The court has observed that a woman can not be asked to continue hi s marital relations with a woman who has breached marital trust. The court accepted the plea for divorce by the husband on the grounds of cruelty and adultery.[Mumbai: 09.11.2013]
VERDICT (II):The wife is a graduate from Delhi University along with diploma in library science and husband is studied up to higher secondary level only. Her plea for interim maintenance/relief has been rejected by the trial court relying over a judgement of MP high court. The woman should have tried to obtain a job instead of sitting idle just to squeeze money from the estranged husband. The couple had moved the court for separation and the woman wanted Rs. 25,000 per month from her husband.[Delhi:09.11.2013]
VERDICT (III): A woman has the right to her husband's property but she can't claim the right to her in laws property.The appellant is a doctor in a government hospital, capable of maintaining herself. Her husband lives in Chandigarh, separated from her for several years. Legal right can not be granted to her, even if she is permitted live in her in laws house, violation of which is punishable. Under any circumstances the in laws can not be made to suffer the burdens of their sons estranged marriages. The woman had challenged the trial court's order.[18.11.2013]
VERDICT (IV): The supreme Court said that the domestic violence Act could not be invoked by a woman in a live in relationship with a married man. She knew his marital status.She could be sued for damages by the man's wife and children for alienating them from the love and care of their husband/father. [29.11.2013]
VERDICT (V): The Supreme Court has said that women are increasingly using anti dowry law to harass the innocent in laws and restrained police from mechanically arresting the husband and his relatives on mere lodging of a complaint under section 498 A of Indian Penal Code. The police has been directed to satisfy themselves about the necessity for arrest under parameters (-check list) provided under section 41 of Criminal Procedure Code. It will examine the possibility of absconding by the accused. Authorisation of arrest will be essential by the magistrate. [04.07.2014] 
Section 498 a, is a curse on Hindu society, giving a tool in the hands of greedy parents of the girls to extract money and favours from the groom’s parents. The girls who wish to divorce or separate from the groom are continuously making it a tool in their blood stained hands. The girls side offer several proposals and incentives beyond their reach to the grooms family, which they can never afford or are unwilling to give. This notorious Section was introduced in the year 1983 to protect married women from being subjected to cruelty by the husband or his relatives treating it as a non-bailable offence with a three years punishment plus a hefty fine. One can not deny the fact that it happens even today.
The Home Ministry ordered the review following increasing number of complaints from groups representing the interests of men charging that they had been wronged by the current law. This coincided with about 35 per cent rise in number of deaths of husbands caught in dowry dispute during 2007-09. Dowry deaths in case of women grew by just about 3.5 per cent during the period. The facts remains that the young boys are forced to commit suicide by the girls under the influence of their parents or lovers whom they are unable to forget.
As per the latest figures compiled by the National Crime Record Bureau (NCRB), between 2007 and 2009 a total of 24,648 women died due to dowry disputes as against 169 in the case of men.
The Commission backgrounder argued for a review on the ground that once a complaint (FIR) is lodged with the police it becomes an easy tool in the hands of the police to either arrest or threaten to arrest the husband and other relatives named in the FIR without even considering the intrinsic worth of the allegations and making a preliminary investigation. It concluded thus that when the members of a family are arrested and sent to jail without even the immediate prospect of bail, the chances of amicable re-conciliation or salvaging the marriage would be lost once and for all.
Pragmatic realities have to be taken into consideration while dealing with matrimonial matters with due regard to the fact that it is a sensitive family problem which shall not be allowed to be aggravated by over-zealous or callous actions on the part of the police by taking advantage of the harsh provisions of the Section 498 a, the commission pleaded. There is every bit of effort from the side of the policemen to extract lots and lots of money from the accused.
Earlier the Supreme Court issued directives to the police that before arresting the in laws of the woman it should obtain sufficient proof against them. But who cares for the Court verdicts?!
The Supreme Court refused to grant bail to a 70 year old lady accused of asking for dowry to the girl's parents.[15.05.2016]
VERDICT (VI): DIVORCE FOR DUMPING HUSBAND'S PARENTS: Lucknow bench of Allahabad High Court has, up held the ruling of a family court which allowed divorce to the couple, who got married on February 5, 1991, on the grounds of cruelty, shown to the in laws by the bride. She not only compelled her husband to through away the in laws but demanded Rs. 3,000 per month for her make up-cosmetics. Not only the brute threatened but implicated her husband and in laws in dowry cases. She demanded maintenance in spite of her earnings, more than the husband. The family court granted divorce on September 30, 2014 and refused alimony to the wife.[21.10.2014]
VERDICT (VII): FRAUDULENT LAWYERS PLAYING PRIESTS:: Fake and fraudulent marriages are made inside the lawyers chambers in Madras-Chennai, no matter those getting married are present or not. The cartel was exposed by the Madras High Court. A divisional bench of Justice S. Rajeshwaran and Justice P.N. Prakash was stunned, when it found that more than 3,500 such marriages were registered in just two registrar offices in 2013. The advocates conducted fake marriages issued certificates and then forced-bribed the registrars to register the marriages without physical presence of the couple. Of course their signatures were forged-bogus. The scandal came to light when many habeas corpus petitions were filed by the aggrieved grooms, who came to the court saying their wives were in illegal custody of their parents. Most of the girls acknowledged that the knew the groom but never got married to them. In a peculiar case a carpenter working in girl's house had registered her as his wife without her knowledge.[22.10.2014]
VERDICT (VIII): FALSE CHARGES OF INFIDELITY:: A family court in Mumbai has granted divorce to the deputy municipal commissioner whose wife implicated him adultery with his colleagues wife. The woman not only defamed her husband but tarnished the image of the innocent woman. The woman was a habitual in quarrelling, humiliating her husband. The two did not have sex since 2001. The court found it grave and weighty instance of cruelty committed by the wife.[25.10.2014]
VERDICT (IX): The supreme Court has ruled that if a woman complaints accusing her husband and in laws of cruelty under dreaded Section 498 A of IPC turns out to be false, then the man is entitled to divorce. The wife knowingly and intentionally filed a false complaint, calculated to embarrass and incarcerate the husband and seven members of his family and that such conduct unquestionably constitutes cruelty as postulated under section 13(1)(a) of Hindu marriage Act. The question arises that why did not the Court send this woman to jail for rest of her life?! [24.11.2014]
VERDICT (X): The Lucknow bench of Allahabad high court has ruled that levelling of baseless allegations of illicit relationship and extra-marital affairs against one's husband amounts to cruelty and is a ground enough for divorce. The question that arises in such a situation that why should the woman be let off without sentencing her to jail term for 7 years?! [24.11.2014]
VERDICT (XI): Supreme Court has observed that false cruelty cases are ruining the marriages. Old parents of the groom are taken to jail for no fault on their side under section 498 A. Sunita's marriage was dissolved, when the husband refused to take her back and offered to give property to her & showed willingness to look after the children.The court found that the woman had filed a wrong complaint, which is sufficient to constitute matrimonial cruelty.[09.12.2014]
VERDICT (XII): Bombay High court has ruled that every breach of promise to marry is not rape and pre marital sex is no longer shocking, at least in India's big cities.A couple in love may have a sexual relationship and later realize they are not compatible.The earlier physical contact can not be called rape. A marriage can not be imposed. The complainant women charged her mate with cheating and rape. The woman claimed to be 8 months pregnant.[28.12.2014]
VERDICT (XIII): The bride-woman has no claim-right over the property of in laws. Additional session judge Pulsty Premachal in Delhi, ruled that she could make the claim, had the house been owned by her husband.[06.01.2014]
VERDICT (XIV): A family court in Mumbai rejected the plea of a dietitian-a qualified woman for maintenance, by sitting idle. The woman had blamed the in laws and her husband for dowry demand, before moving to her parents house. The woman was already earning more than Rs.50,000 per month.[08.03,2015]
VERDICT (XV): The Supreme Court has set aside the high court judgement not permitting divorce to the man, who got married in 1997 and has a 16 years old son. The wife refused to be with him. She got pregnant and moved to her parents house and had a son there. Her husband got her posted in a hospital at his place of posting. But she did not join her duties there. The court has granted a sum of Rs. 10 Lakh for the care of his son to be given to the divorced wife.[12.03.2015]
VERDICT (XVI): The Supreme Court has ruled that the daughter in law has no right in the property of the in laws self earned property. She has been asked to evacuate the said property in Delhi.[13.03.2015]
VERDICT (XVII): The Supreme Court has ruled that a woman who was in live in relation with a man for 20 years was entitled for benefits arising out the distribution of his property after his death, provided sufficient proofs were available. In the case the grand children had already agreed to her being a concubine-kept of their grandfather.[13.04.2015]
VERDICT (XVIII): The Supreme Court has ruled on Saturday, that abusing in laws and not allowing them to live in the matrimonial  home by a woman amounts to cruelty to her spouse, ground enough for divorce, while allowing an NRI's plea for legal separation from his wife.[26.04.2015]
VERDICT (XIX): The Supreme Court has approved the ruling of Bombay high court which recommended the payment of maintenance to the woman having live in relation. 
This type of judgement are sure to boost cases related to concubines, prostitutes, call girls or the women who lure people to have illicit relations with them and exploit them later. They in fact black mail them through legal instruments. Every one is aware of the piling cases in the courts which have been filed by the woman who seduced the male into having sex, compelled them for marriage and the moved the court, with malafide intentions.[07.05.2015]
VERDICT (XX): A court in Tamil Nadu annulled the marriage between a Hindu and Christian on the grounds that one of the spouses should have changed his religion before marriage. Both of them should belong to the same religion for the marriage to be recognized. [22.11-21-5]
VERDICT (XX) :: Latest ruling of the court reads that both the spouses are responsible-liable for the sustenance-maintenance of the children if they prefer to be separated legally or otherwise. [31.03.2016]
Women are becoming more and more bold and ambitious these days. They can go to any extent for the satisfaction of their lust-desires-passions. They may go against their husband, in laws at the slightest possible reason & opportunity. In fact the parents of the girls have made them tools to extract money from the opposite side. There are the fathers and brothers who had sexual relations with the girls and now they feel the urge for both money and sex. They exploit & blackmail the girl, who in turn commit suicide and then they file cases against the in laws.There are girls who commit suicide due to the torture-black mail of their former boy friend-lover, but the blame is passed on to the husband and his family even though the girl never blamed them. This month two decisions came against such women.
VERDICT (XXI) :: The supreme Court has held that the property bought by the husband in his wife's name belongs to him, since he invested the money earned by him.
VERDICT (XXII) :: A girl who has MBA degree, got married in 2010 was found exploiting her husband in spite of earning sufficient money. Her bank account details exposed her game plan to tease the former husband. She showed her income to be merely Rs. 12,000 only. She was demanding more compensation and maintenance every month from the husband. The court held that the provisions of the law were for those parents and women who did nor earn or were helpless. Her appeal was dismissed.[17.08.2016]
VERDICT (XXIII) :: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला  दिया है कि यदि पत्नी सास-ससुर से अलग रहने की जिद करे तो पति उसको तलाक दे सकता है। अगर कोई स्त्री अपने पति को बूढ़े माँ-बाप से अलग रहने को मजबूर करती है तो उसे उसका पति तलाक दे सकता है। कोर्ट ने टिप्पणी की है कि हिन्दु लॉ के मुताबिक कोई भी महिला किसी भी बेटे को उसके माँ-बाप के प्रति पवित्र दायित्वों के निर्वहन से मना नहीं कर सकती। जस्टिस अनिल आर दवे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की खंडपीठ ने कहा कि एक महिला शादी के बाद पति के परिवार की सदस्य बन जाती है। वह इस आधार पर उस परिवार से अपने पति को अलग नहीं कर सकती है कि वो अपने पति की आय का पूरा उपभोग नहीं कर पा रही है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि माता-पिता से अलग रहने की पश्चिमी सोच हमारी सभ्यता-संस्कृति और मूल्यों के खिलाफ है। कोर्ट ने कर्नाटक की एक दंपत्ति के तलाक की अर्जी को मंजूरी देते हुए ये टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है, “भारत में हिन्दु परिवारों में न तो यह सामान्य बात है और न ही प्रचलन में है कि कोई भी बेटा अपनी पत्नी के कहने पर शादी के बाद बूढ़े माँ-बाप को छोड़ दे। खासकर तब, जब बेटा ही परिवार में एक मात्र कमाऊ सदस्य हो। एक बेटे को उसके माँ-बाप ने न केवल जन्म दिया है बल्कि पाल-पोसकर भी उसे बड़ा किया, पढ़ाया, लिखाया और समर्थ बनाया। अब उसकी नौतिक और कानूनी जिम्मेवारी बनती है कि वह बूढ़े माँ-बाप की देखभाल करे। खासकर तब जब उनकी आय या तो बंद हो गई है या कम हो गई है।”[16.07.2017]
SATI SYSTEM & WIDOW REMARRIAGE सती प्रथा और विधवा विवाह :: Sati system is an ancient practice in Hinduism which is purely voluntary and shows deep attachment for the husband on the part of the wife and lack of desire by the wife to survive in his absence. Its considered to be a means of Liberation from the cycle of birth and death. Sati means entering the flames of the funeral pyre of the husband by the wife to immolate her self. This word Sati comes from the incarnation of Maa Bhagwati in the form of Sati the daughter of Daksh Prajapati, who was married to Bhagwan Shiv and immolated herself through he Yogic divine fire-flames in protest of her fathers prejudice and insult of the destroyer Bhagwan Shiv.
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि। हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सम्बभूथ।।
Udirshv Narybhi Jeevlokam Gatasumetmup Shesh Ehi;
Hastghrabhasy Didhishostvedam Patyurjnitvambhi Sambbhuth.
O! The pious woman come out of the funeral pyre of your husband, who is lifeless-dead. You have completed the period of your journey with him-one who loved you, as a wife.
A woman is protected by the father as a child, thereafter by the husband and in the old age both by the husband and the son. Even the grand children may look after her. In their absence she becomes helpless. When she is young and helpless every one tries to exploit her. People are there who may turn her into a whore-prostitute-concubine for want of security. As long as the society is male dominated this will continue as has been the practice since ages.  In such a situation, if the widow is allowed to marry again its good-beneficial for the society as a whole.
When the Rig Veda itself, not only allows, but also encourages widow remarriage.
धनुर्हस्तादाददानो मर्तस्यास्मे कषत्राय वर्चसेबलाय। 
अत्रैव तवमिह वयं सुवीरा विश्वा सप्र्धोभिमातीर्जयेम॥  
Dhanurhastadaddano Martsyasme Kastray Varchseblay; 
Atraiv Tvamih Vayam Suvieea Vishwa Saprdhobhimatirjyem.
The bows which were taken by her at the time of marriage to be by her husbands side in all conditions-circumstances-situations stand null and void. Now she is free to decide about her future action. From his dead hand I take the bow be carried, that it may be our power and might and glory. She should over come all adversities in the course of her future action. [Rig Ved  10-18]
DRACONIAN DOWRY LAWS :: More than half of the marriages turn to divorce these days in cities. Each and every where, the groom is blamed for seeking dowry. The helpless in laws are taken to police station, insulted, made to cough up money and jailed for no guilt of theirs. Even the groom is not spared. This is the situation, where no dowry is desired-accepted-demanded. Reputation of the in laws is tarnished and they are considered as criminals.
There are innumerable reasons behind this, which can easily be summarised.
1.The girl had friendship with boys at school-college level and she developed friendship with other boys at the place of work as well. It may be equally true for the boy-groom.
2.The socio-economic status of the married was different.
3.The couple belonged to two different castes-religions-regions-countries-cultures-life styles.
4.Their incomes were unequal.
5. Extravagant spending, by one of the two partners.
6. Different working hours, tastes, liking-disliking. Tiredness due to hard work.
7. Lack of compatibility.
8. Indulgence in sex before marriage and maintenance of premarital sex relations.
9. Interference of girls parents in her family life-visiting too frequently and overstaying.
10. Lack of morals-values-ethics-culture, in the family.
11. Use of narcotics, alcohol, party drugs.
12. Late night parties.
13. Early puberty before 10 and early menopause before 30.
14. Gay-lesbian relations.
15. Bad habits-masturbation in child and thereafter as well.
16. Access to pornography-blue films-nudity vulgarity.
17. Unlimited freedom from parents and undue backing.
18. Eating meat, eggs, fish, garlic and the goods which boosts desire for sex.
19. Evil-bad company.
20. Crookedness of the brides family, bad intentions-desires to extract money-wealth, from the grooms family.
21. Impact of films-internet social (-antisocial, indeed) sites on the web-fashion shows and lack of discretion.
22. Uncanny, whims-desires.
23. Lack of proper direction-guidance-counselling before marriage.
24. Ego-super ego-pride, tendency to consider, oneself to be supreme.
25. Use of foul language, abusive words, violent behavior, domestic violence.
26. tendency to degrade the spouse in front of others.
27. Lack of willingness to compromise.
28. The groom suffered from impotency-erectile dysfunction-low sperm count.
29. The girl had been a call-girl, sex worker-prostitute.
30. Un natural sex-sodomy.
31. Offering-forcing wife to have sex, with others-seniors-family members.
32. Use of Aphrodite.
Divorce laws should be made simple-hassle free. Various women's organisations are aware of this social evil and the stigma. Still no efforts has been made to protect the innocent, at any level. Disparities in relevant laws should be rectified and notified immediately. The knot should be broken-opened without delay. There should be no provision for lengthy debate, arguments, affidavits, lawyers. Mutual consent should reign supreme. There should be no claim-counter claim over assets-property-valuables.
The woman who files complaint should give comprehensive evidence in her favor beforehand  pertaining to cruelty, harassment, torture and simultaneously the cause of delay in filing such complaints. Material evidence should be a must.
Respite will not come unless-until, the fire engulfs-reaches the families of the law makers-law enforcing agencies.
More than 1,70,000 cases have been registered for violence-cruelty against the husband.There is a sharp rise of 42% in these cases for the crime against the husband.
DOWRY  दहेज़ :: It's age old age-ancient tradition amongest the rich-honoured-respected to offer-provide gifts to the bride at the time marriage. Girl has a natural-sentimental attachment with the father, which usually make him generous at this once in the life time occasion. Even after the marriage the girl continued to get generous gifts-valuables from the parents and brothers. Affection-bonds were ever lasting.
Weaker sections-poor too imitate these traditions. They too make expenditure over and above their capacity. They obtain loans-sell/mortgaged their property-valuable for this occasion. There are the greedy people, who compel-force the daughters parents to pay cash and other valuables. In case the girls parents fail to meet the ever increasing demands of the grooms family, the girl is traumatised-brutalised-tortured-killed.
If there is any one to be blamed for this, it's the girl's family which did not care to make thorough inquiry about the grooms family status, social image, reputation, financial position, background, lineage,  family history and did not make plain talk with the opposite side. They select the boy from a family which do not match with their status-position. This is why marriages are prescribed within the-caste-region-religion-circle-extended circle.
A tradition prevails for the settlement of dowry in advance through the middle man-negotiators. Each and every aspect-fine detail, is discussed in detail to avoid controversy confusion later. One becomes frank enough to discuss the minor details. With the slightest glitch-doubt-misunderstanding, talks-deal is terminated.
Woman's Loyalty-fidelity :: Three reason are there for a woman to be devoted-honest-loyal-dedication to her husband:
1. Detachment/distaste for the other person, 
2. Love and affection for the husband, and
3. Capability-capacity-strength-power to protect herself.
One can keep his wife under control through four means:1. Excellent woman: By means of incantation, understanding, good will, love and affection.
2. Middle order/medium/ordinary woman: Through gifts, fulfillment of needs-desires-essentials.
3. Lower status/order/inferior/base/mean woman: By bribing, threat, differentiation and punishment, and
4. Lower status/order/inferior/base/mean/wretched woman: Through guile.
One should reconcile with the inferior woman (-make her happy/please) through gifts, love and flattery/praise, after punishment-reproach.A characterless woman who acts against her husband is like the venom-poison. She deserve to be divorced-separated-rejected-doomed.
A woman born in a noble-respected-honourable family, blessed with values-ethics-virtues-piousity-righteousness, must be honoured, loved, admired, praised.
Extreme poverty, extreme beauty, company of wicked person, free-independent-bold nature, volatile nature, betrays husband, uses  alcohol-narcotics, eats banned-improper-harmful food (-meat, fish, onion garlic etc),  likes-visits social gatherings (-against the desire of her family-husband-parents-in laws) alone, shirks work,  avoids sex with her husband, involves-does black magic-bewitch-enchantment-seductive-alluring acts, nun-beggar, whore-prostitute-woman who seduce/attracts other women/girls to prostitution, flirts-liaison with other male, wet nurse-mid wife, acrobat-dancer-actor-film star-mischievous-naughty-playful-roguish,  loves the company of bad-rough-wicked-undignified woman, visits celebrations-functions-religious places/shrines/temples/holy places beyond limit against the desires of her husband/family or intermixes with saints-religious/social/public personalities,  separates-desert-ditches-be fools-dodges-cheats her husband, mixes-enjoys-likes the company of male, extremely cruel, portrays to be extremely diligent-though in fact not so, dare devil, envious, cunning and miser, under the control/impression of other woman etc., are the acts/deeds which leads to the down fall/destruction/spoiling of a woman. One should distance himself from such wretched women. One who is under the control of such a woman is incapable/incompetent. A person of this attitude-inclination always invite criticism-defame-bad name.
The  pious-ethical-virtuous-respected-honourable woman constitute the better half of a man and one must not  act against her. Without the association of wife all religious ceremonies-acts-rites-donations/charity become fruitless-ineffective.
दिति की बात सुनकर कश्यप जी मन ही मन पछताने लगे और मन ही मन कहने लगे: स्त्रियों का चरित्र कौन नहीं जानता। इनका मुँह तो ऐसा है, जैसे शरद ऋतु का खिला हुआ कमल।  बातें सुनने में ऐसी मीठी होती हैं, मानों अमृत घोल रखा हो।  परन्तु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है मानों छुरे की धार। [श्रीमद्भागवत 6-18-41]
इसमें संदेह नहीं कि स्त्रियाँ लालसाओं की कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसी से प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाई तक को मार डालती हैं या मरवा डालती हैं।  [श्रीमद्भागवत 6-18-42]
उर्वशी ने पुरुरवा से कहा:  स्त्रियों की किसी के साथ मित्रता नहीं होती। उनका और भेड़िये का हृदय एक जैसा होता है। [श्रीमद्भागवत 9-14-36]
स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता उनमें स्वाभाविक होती है।  तनिक सी बात पर चिढ़ जाती हैं और अपने सुख के लिए बड़े-बड़े साहस के काम के बैठती हैं। थोड़े से स्वार्थ के लिये विश्वास दिलाकर अपने पति, भाई तक को मार डालती हैं। [श्रीमद्भागवत 9-14-37]
इनके हृदय में सौहार्द तो है ही नहीं। भोले भाले लोगों को झूँठ-मूँठ का विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं। नये-नये पुरुष की चाहत-चाट से कुलटा और स्वेच्छाचारिणी बन जाती हैं। [श्रीमद्भागवत 9-14-38]  
***यह उपरोक्त वृतान्त दूषित चरित्र की स्त्रियों पर सटीक बैठता है। 
स्त्रियों के धर्म: पति  की सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, उसके सम्बन्धियों को प्रसन्न रखना और सर्वदा पति के नियमों की रक्षा करना, पति को ही ईश्वर मानने वाली पतिव्रता स्त्रियों के धर्म हैं। [श्रीमद्भागवत 7-12-25] 
साध्वी स्त्री को चाहिए कि घर की देखभाल-उचित व्यवस्था, साफ-सफाई के साथ-साथ स्वयं को भी मनोहर वस्त्राभूषणों से अलंकृत रखे।  [श्रीमद्भागवत 7-12-26] 
अपने पति देव की छोटी बड़ी इच्छाओं को समय के अनुसार पूर्ण करे। विनय, इन्द्रिय संयम, सत्य एवं प्रिय वचनों से प्रेम पूर्वक पतिदेव की सेवा करे। [श्रीमद्भागवत 7-12-27] 
जो कुछ भी मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहे। किसी भी वस्तु के लिये ललचावे नहीं।  सभी कार्यों में चतुर एवं धर्मज्ञ हो। सत्य और प्रिय बोले। अपने कर्तव्य में सावधान रहे। पतिव्रता और प्रेम से परिपूर्ण होकर, यदि पति पतित नहीं हो तो, उसके साथ सहवास करे। [श्रीमद्भागवत 7-12-28] 

जो लक्ष्मी के समान पतिपरायण होकर अपने पति की साक्षात् भगवान् स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पति वैकुण्ठ लोक में भगवत्सारुप्य को प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मी के समान उनके साथ आनन्दित होती है। [श्रीमद्भागवत 7-12-29 ] 
पतिव्रत  धर्म :: स्त्री के पतिव्रता होने के तीन कारण हैं (1) पर पुरुष से विरक्ति, (2) पति प्रीति व (3) अपनी रक्षा की सामर्थ।उत्तम स्त्री साम से, माध्यम स्त्री दान और भेद से तथा अधम स्त्री को भेद व दंड नीति से वश में रखा जा सकता है। अधम स्त्री को दंड के उपरांत साम-दान आदि से प्रसन्न कर लेना चाहिये। भर्ता-पति का अहित करने वाली, व्यभिचारणी स्त्री काल कूट विष के समान होती है, उसका परित्याग करना ही श्रेयकर है। उत्तम कुल में उत्पन्न पतिव्रता, पति का हित चाहने वाली स्त्री का सदा ही आदर-सत्कार  करना चाहिये। 
दरिद्रता, अति-रूपवान, असत-जनों से संग, स्वतंत्र, पेयादी (मदिरा, नशा) करने वाली, अभक्ष्य-भक्षण करने वाली, कथा-गोष्ठी पसंद वाली, काम से बचने वाली, जादू-टोना करने वाली, भिक्षुणी, कुट्टनी, दाई, नटी, दुष्ट स्त्रियों का संग करने वाली, उद्यान-यात्रा-निमन्त्रण-अत्यधिक तीर्थ यात्रा या देवता के दर्शन करने-घूमने वाली, पति से वियोग वाली, कठोर व्यवहार करने वाली, पुरुषों से अत्यधिक वार्तालाप करने वाली, अति क्रूर, अति सौम्य, अति निडर, ईर्षालु तथा कृपण, अन्य स्त्री के वशी भूत आदि- स्त्री के दोष व उसके विनाश के कारण-हेतु बनते हैं। ऐसी स्त्री के आधीन होना पुरुष की अयोग्यता ही है। ऐसा पुरुष निंदा का पात्र बनता है। 
नारी पुरुष का आधा शरीर है। अत: सदैव उसका आदर करने चाहिए क्योंकि उसके बिना धर्म-क्रियाएँ सफल नहीं होतीं। अत: उसके प्रतिकूल नहीं जाना चाहिये। 
GAY MARRIAGE :: Those people who advocate gay marriage are abnormal. Any act against nature is bound to doom-perish. This  is not going to control population as well. Who these people are? Are they insane-frustrated-mentally retired people? Do they belong to broken families? They should be treated for mental imbalance and need counselling. This is bound to increase crime graph, since mental racks will make efforts to drag more and people to their fore. Sodomy and lesbianism are the other distortions of this act. Most curious part of this episode is the silence of the Church. Legalisation of such acts clearly shows that a large population of people find solace in unnatural acts. Main function of marriage is to have offspring-children-progeny. 
May the God give the peace-solace-tranquillity.
DIVORCE तलाक :: भारतीय समाज में तलाक का रोग-चलन दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। आज बम्बई मे हर दूसरी महिला तलाक चाहती है। दिल्ली में हर साल तलाक के नये 4500 मुकदमे शुरू हो जाते हैं। अगर तलाक ही चाहिए था तो शादी की ही क्यों थी? शादी करने से पहले उचित छान-बीन क्यों नहीं कि गई ! ज्यादातर मुकदमे लव मैरिज के बाद तलाक के हैं।
THE LAW ALLOWS HUSBAND TO SEEK MAINTENANCE FROM WIFE: Section 24 of Hindu Marriage Act 1955 provides that the court, in case of either the wife or the husband having no independent income sufficient for her or his support, may on application of either of the spouses order to pay to the petitioner the expenses of proceedings such sum as having regard to the petitioners own income and the income of the respondent, it may seem to the court to be reasonable. So, under this section, even the husband can file an application claiming maintenance pendent elite in the pending DIVORCE CASE  The only prerequisite is that he should not have sufficient income to maintain and support self in consonance with the life style and income of wife. Assuming that the wife is earning much more than the husband, the husband only in that eventuality shall have the locus to file for maintenance.[15.05.2014]
PRENUPTIAL PACTS: Prenuptial pacts are the order of the day in the light of mounting divorce cases in India. This is a contract made by a couple before marriage regarding spousal refusal support and division of property in the event of divorce or separation.
Law does not recognize prenuptial knot in Hindu marriage where it is considered to be a sacrosanct relation between two human beings rather than a contract.
Justice Krashna Iyar has ruled in a case pertaining to one of the minority communities held that marriage is essentially a contract.Though marriage is social institution yet, it is regarded solemn all over the civilised world, including the minorities.
It's a matter of great concern that the young boys and girls enter into sexual relations without marriage and some times they marry too, to seek divorce or separated, later.[14.06.2014]
तलाक या विवाह विछेदन::सनातन संस्कृति के मुताबिक मनुष्य जीवन में सोलह संस्कारों को बताया गया है जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण है विवाह का संस्कार। सनातन संस्कृति में शादीशुदा जीवन पति-पत्नी का धार्मिक रूप से इकट्ठे जीवन बिताने का एक सभ्य तरीका है। वैदिक विवाह संस्कार में भावी पति-पत्नी आजीवन साथ रहने और कभी भी एक दूसरे से अलग न होने की कामना रखते हुए पाणिग्रहण संस्कार कर वैदिक अनुष्ठान करते हैं। वैदिक धर्म में विवाह विछेदन अर्थात तलाक की कल्पना भी नहीं जाती। संस्कृत शब्द "विवाह" का अर्थ है उत्तरदायित्व का वहन करना। कुछ लोग दांपत्य जीवन से घोर असंतुष्ट होकर भी आजीवन दुख सहन कर भी अलग नहीं होते। परंतु कुछ लोग अपने दांपत्य में उपेक्षापूर्ण स्थितियों से ही विचलित होकर फैसले लेने हेतु कोर्ट की शरण लेते हैं।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जातक की कुंडली के दूसरे, पंचवें, सातवें, आठवें व बारहवें भाव तथा इनके स्वामी द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश का दांपत्य जीवन में सुख दुख प्रेम व कलह व विघटन हेतु निरीक्षण किया जाता है। इसके अलावा स्त्री हेतु नैसर्गिक कारक ग्रह बृहस्पति व पुरुष हेतु नैसर्गिक कारक ग्रह शुक्र का निरीक्षण किया जाता है। विवाह की दृष्टि से जातक की जन्मकुंडली के वर्गों का निरीक्षण भी किया जाता है इनमे सबसे प्रमुख रूप से नवां वर्ग नवमांश, सतवां वर्ग सप्तमांश, चालीसवां वर्ग ख्वेदामांश का निरीक्षण किया जाता है। विवाह विघटन के निरीक्षण हेतु विशेष रूप से सातवें आठवें बरहवें भाव में उपस्थित विशिष्ट क्रूर व पापी ग्रह जैसे मंगल व सूर्य तथा शनि व राहू की स्थिति को भी देखा जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विवाह भंग अर्थात तलाक या विवाह विछेदन योग अर्थात सेपरेशन का परिणाम समुदाय अष्टकवर्ग में भावों द्वारा प्राप्त बिन्दु पर भी निर्भर करता है, इसके साथ-साथ भिन्नाय अष्टकवर्ग में द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश द्वारा प्राप्त अंक, पंचवें, सातवें, आठवें व बारहवें भावों का बल, द्वितेश पंचमेश, सप्तमेश, अष्टमेश, द्वादशेश का इष्ट और कष्ट फल पर भी निर्भर करता है। परंतु सर्वाधिक रूप से इस बात पर निर्भर करता है के सप्तम भाव और सप्तम भाव का स्वामी किस पापी और क्रूर ग्रह से सर्वाधिक रूप से प्रताडि़त है। सप्तम भाव में सूर्य, राहू शनि व मंगल की उपस्थिती या सप्तमेश का नीच या वेधा स्थान में बैठकर पापी व क्रूर ग्रह से पीड़ित होना तलाक या सेपरेशन का कारण बनता है।
तलाक के ज्योतिषीय कारण: सातवें भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। बारहवें भाव में बैठें सप्तमेश से राहु की युति हो तो तलाक होता है। पंचम भाव में बैठे द्वादशेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। पंचम भाव में बैठे सप्तमेश से राहू की युति हो तो तलाक होता है। सातवें भाव का स्वामी और बाहरवें भाव का स्वामी अगर दसवें भाव में युति करता हो तो में तलाक होता है। सातवें घर में पापी ग्रह हों व चंद्रमा व शुक्र पापी ग्रह से पीड़ित हो पति-पत्नी के तलाक लेने के योग बनते हैं। सप्तमेश व द्वादशेश छठे आठवें या बाहरवें भाव में हो और सातवें घर में पापी ग्रह हों तो तलाक के योग बनते है। सातवें घर में बैठे सूर्य पर शनि के साथ शत्रु की दृष्टि होने पर तलाक होता है। 
ज्योतिषशास्त्र में जहां समस्याएं हैं तो साथ-साथ उनके शतप्रतिशत समाधान भी मौजूद हैं। दांपत्य कलह, सेपरेशन और तलाक से मुक्ति पाने का सबसे आसान और सरल समाधान है एकादश रुद्रावतार हनुमान जी। जैसे हनुमानजी ने भगवान राम और सीता माता का मिलन करवाया। उर्मिला व सीता के सुहाग की रक्षा हेतु उन्होंने अपने प्राणों तक के बारे में भी विचार नहीं किया। हनुमान जी ने राम जी की पत्नी सीता हेतु समुद्र तक लांघ लिया जैसे हनुमान जी के कारण ही उत्तर रामायण के अनुसार लव कुश राम सीता पूरा परिवार एकत्रित हो जाता है ठीक उसी तरह शनि, मंगल, राहु और सूर्य की सप्तम भाव में युति के पश्चात् भी हनुमान जी की शरण जाकर दांपत्य जीवन सामान्यतः सुखद सिद्ध हो सकता है। आइए जानते हैं कैसे। 
तलाक से मुक्ति पाने हेतु ज्योतिषीय सरल उपाय::(1) घर की उत्तर दिशा में हनुमान जी का वीर रूपक चित्र लगाएं, (2) दक्षिमुखी हनुमान मंदिर से प्राप्त सिंदूर जीवनसाथी के चित्र पर लगाएं, (3) राहू के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार शाम के समय दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में 7 नारियल चढ़ाएं, (4) राहू के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार शाम के समय दक्षिणमुखी हनुमान जी की उल्टी सात परिक्रमा लगाएं, (5) शनि के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार हनुमान जी के चित्र पर गुड़ का भोग लगाकर काली गाय को खिलाएं, (6) सूर्य के कारण तलाक की स्थिति में सात रविवार दिन के समय पूर्वमुखी हनुमान मंदिर में 7 कंधारी आनर चढ़ाकर किसी नव दंपति को भेंट करें, (7) मंगल के कारण तलाक की स्थिति में सात मंगलवार तांबे के लोटे में गेहूं भरकर उस पर लाल चन्दन लगाकर लोटे समेत हनुमान मंदिर में चढ़ाएं, (8) तलाक टालने हेतु सात मंगलवार 7 लौंग, 7 नींबू, 7 सुपारी, 7 जायफल, 7 मेलफल, 7 सीताफल 7 तांबे के त्रिकोण टुकड़े लाल कपड़े मेंं बांधकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं, (9)सूर्य के कारण तलाक की स्थिति में सात रविवार दिन के समय पूर्वमुखी हनुमान मंदिर में गुड़ की रोटी व टमाटर के साग का भोग लगाकर किसी वृद्ध दंपति को खिलाएं, (10) शनि के कारण तलाक की स्थिति में सात शनिवार 7 जैतून, 7 अमरूद, 7 काले जामुन, 7 बेर, 7 बादाम, 7 नारियल, 7 काले द्राक्ष काले कपड़े में बांधकर हनुमान मंदिर में चढ़ाएं, (11) तलाक की स्थिति को शत प्रतिशत समाप्त करने के लिए एक-एक दाना 12 मुखी + 11 मुखी + 10 मुखी + गौरीशंकर + 8 मुखी +7 मुखी + 6 मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित करवाकर पहनें। 
LOVE JIHAD धोखे की शादी के माध्यम से धर्म परिवर्तन 
भारत में धर्म परिवर्तन कोई नई बात नहीं है। लगभग 650 साल में 20 करोड़ ऐसे लोग पैदा हो चुके हैं जिनको जबरन, बहला-फुसलाकर, बहकाकर, लालच देकर मुसलमान बनाया गया। इस पूरे प्रकरण में  सिवाय धोखे-चालबाजी के कुछ नहीं है। ना कहीं प्यार ना मोह्हबत। ऐसे बहुत से बड़े नाम चीन व्यक्ति हैं, जिन्होंने हिन्दु धर्मांम्वलियों से शादी की। 
फ़िरोज़-इंदिरा गाँधी, नवाब पटौदी-शर्मिला, अज़रुद्दीन-संगीता बिजलानी, सैफ-अमृता व करीना, शाहरुख़-गोरी, शाहनवाज और नक़वी, आमेर। फ़िलहाल ऐसा कोई कानून नहीं है जो, इन पर रोक लगा सके और भविष्य में भी शायद ऐसा न हो सके। 
अगर कोई लड़की इस तरह की शादी कर रही है तो, क्या उसकी आँखें, माँ-बाप, भाई-रिस्तेदार नहीं थे, जो यह सब जानते-जाँचते-परखते?!उम्र के दोराहे पर आकर अक्सर लड़कियां ऐसी गलती कर डालतीं हैं, जिसका परिणाम उन्हें ता उम्र भुगतना पड़ता है। 
जो लोग अपना धर्म छुपाकर ये गुनाह कर रहें और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करा रहें वो तो गुनहगार-अपराधी हैं। उनपर तो धोखेबाजी-चारसौ बीसी आदि के मुकदमे दर्ज हो ही सकते हैं।  [12.09.2014]
(II). HINDU MARRIAGE RITES हिंदु विवाह संस्कार :: हिन्दु धर्म में विद्याध्ययन-ब्रह्मचर्य काल की समाप्ति के पश्चात सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। विवाह-दाम्पत्य मात्र शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, अपितु एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना है। 'धन्यो गृहस्थाश्रमः' क्योंकि मात्र इसके शास्त्रोक्त पालन से व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं और अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं। 
विवाह एक ऐसी सामाजिक और धार्मिक प्रक्रिया जो कि दो आत्माओं को पवित्र बन्धन में बाँधती है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।
वर्तमान काल-कलयुग में, विवाह वासना-प्रधान हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है। नौकरी-आमदनी, पद, रुतवा या प्रतिष्ठा को विवाह के योग्य युवती-युवतियाँ महत्व-प्रधानता देते हैं। सभी उम्र के लोगों ने बगैर विवाह किये ही, साथ रहना, पश्चिमी विश्व की तर्ज पर खुलकर यौन सम्बन्ध स्थापित करना शुरु कर दिया है। ऐसे सम्बन्ध पहले भी होते थे, मगर उन्हें गिरी हुई निगाह से देखा जाता था। इस प्रकार से सम्बन्ध रखने वाली स्त्रियॉं रखैल-वैश्या कहलाती थीं। 
पिछले दिनों पुरुषों का व्यवहार स्त्रियों के साथ छली-कपटी और विश्वासघातियों जैसा रहा है। रूप, यौवन के लोभ में कुछ दिन मीठी बातें करते हैं, पीछे क्रूरता एवं दुष्टता पर उतर आते हैं। पग-पग पर उन्हें सताते और तिरस्कृत करते हैं। प्रतिज्ञाओं को तोड़कर आर्थिक एवं चारित्रिक उच्छृंखलता बरतते हैं और पत्नी की इच्छा की परवाह नहीं करते। समाज में ऐसी घटनाएँ कम घटित नहीं होतीं। ऐसी दशा में ये प्रतिज्ञाएँ औपचारिकता मात्र रह जाने की आशंका हो सकती है। सन्तान न होने पर लड़कियाँ होने पर लोग दूसरा विवाह करने पर उतारू हो जाते हैं। पति सिर पर हाथ रखकर कसम खाता है कि दूसरे दुरात्माओं की श्रेणी में उसे न गिना जाए। इस प्रकार पत्नी भी अपनी निष्ठा के बारे में पति को इस शपथ-प्रतिज्ञा द्वारा विश्वास दिलाती है।वर्तमान काल में शादी-शुदा औरतें भी कुछ कम नहीं हैं। 
दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से, एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर रहा है। शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटने शुरु हो जाते हैं। इनमें अभिमान-अहँकार का भी बहुत बड़ा हाथ है। खाली दिल्ली में ही 5,000 से 10,000 तलाक के नये मुकदमे शुरु हो जाते हैं। लड़के-लड़कियाँ शादी से पहले ही 10-20 लोगों से सहवास कर चुके होते हैं। इस  विवाह में शरीरिक रोमान्च -आनन्द भी नहीं रहता। लड़के अक्सर नामर्दी के शिकार हो जाते हैं और लड़कियों की माहवारी अनियमित हो जाती है। इस प्रकार के व्यक्तियों को एड्स, गुप्त रोग तो होने स्वाभाविक ही हैं। 
लड़की-लड़के के चुनाव में घर-परिवार गौण हो गये हैं। मनु-स्मृति में व्यक्त किये गये वैज्ञानिक नियम, धर्म-जाति भी गौण हो गये हैं। शादी से पहले लड़की के शरीर पर पाये जाने वाले चिन्हों को तो कोई भी व्यक्ति न जानता है और न ही जानना चाहता है। अन्तर्जातीय, अन्तरप्रांतीय, अंतर्देशीय विवाह आम हो गये हैं। संस्कृति, धर्म, भाषा, रंग-रुप भी गौंण हो गये हैं। 
विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से ही की जाती हैं। आजकल तो शादी-विवाह घर से हटकर किसी खुले स्थान, बारातघर, किराये का पंडाल आदि में आयोजित किये जाते हैं। हर प्रकार की व्यवस्था का ठेका दे दिया जाता है। खाना, सजावट, स्वागत, पंडित, फोटोग्राफर, वीडियोग्राफर, ड्रोन, वेटर आदि की व्यवस्था अलग-अलग लोग करते हैं। 
सामूहिक विवाह का प्रचलन भी शुरु हो गया है। प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रखी जाती है। कमर्काण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त किया जाता है। एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं। सामान्य व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कमर्काण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए। उसके सूत्र इस प्रकार हैं। वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं। मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए। यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए। विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही लिख ली जाए तो बेहतर है। वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें। कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें। ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों। शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए। हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए। ‍वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए। 
संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें। सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं। विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है। अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है। यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए। ‍जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाता है। द्वारचार (द्वार पूजा),  स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण तय वक्त में कर लेने चाहिये। वर-दूल्हे को ‍विशेष आसन पर बिठाकर सत्कार किया जाना चाहिये। फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ। परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं। 
वर वरण-तिलक :: वर पूर्वाभिमुख तथा तिलक करने वाले (पिता, भाई आदि) पश्चिमाभिमुख बैठकर निम्नकृत्य सम्पन्न करें। मङ्गलाचरण, षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन आदि। इसके बाद कन्यादाता वर का यथोचित स्वागत-सत्कार (पैर धुलाना, आचमन कराना तथा हल्दी से तिलक करके अक्षत लगाना) करें। ‍तदुपरान्त 'वर' को प्रदान की जाने वाली समस्त सामग्री (थाल-थान, फल-फूल, द्रव्य-वस्त्रादि) कन्यादाता हाथ में लेकर निम्न संकल्प मन्त्र बोलते हुए वर को प्रदान कर दें। 
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य, अद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीये पर्राधे श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे, भूर्लोके, जम्बूद्वीपे, भारतवर्षे, भरतखण्डे, आर्यावर्त्तैकदेशान्तर्गते, .......... क्षेत्रे, .......... विक्रमाब्दे .......... संवत्सरे .......... मासानां मासोत्तमेमासे .......... मासे .......... पक्षे .......... तिथौ .......... वासरे .......... गोत्रोत्पन्नः ............(कन्यादाता) नामाऽहं ...............(कन्या-नाम) नाम्न्या कन्यायाः (भगिन्याः) करिष्यमाण उद्वाहकमर्णि एभिवर्रणद्रव्यैः ...............(वर का गोत्र) गोत्रोत्पन्नं ...............(वर का नाम) नामानं वरं कन्यादानार्थं वरपूजनपूर्वकं त्वामहं वृणे, तन्निमित्तकं यथाशक्ति भाण्डानि, वस्त्राणि, फलमिष्टान्नानि द्रव्याणि च...............(वर का नाम) वराय समपर्ये।
तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न तथा शान्ति पाठ करते हुए कार्यक्रम समाप्त करें।
हरिद्रालेपन :: विवाह से पूर्व वर-कन्या के हल्दी चढ़ाने का संक्षिप्त विधान :- सवर्प्रथम षट्कर्म, तिलक, कलावा, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। तत्पश्चात् निम्न मंत्र बोलते हुए वर/कन्या की हथेली-अङ्ग-अवयवों में (लोकरीति के अनुसार) हरिद्रालेपन करें। 
ॐ काण्डात् काण्डात्प्ररोहन्ती, परुषः परुषस्परि। एवा नो दूवेर् प्र तनु, सहस्त्रेण शतेन च॥13. 20॥
इसके बाद वर के दाहिने हाथ में तथा कन्या के बायें हाथ में रक्षा सूत्र कंकण (पीले वस्त्र में कौड़ी, लोहे की अँगूठी, पीली सरसों, पीला अक्षत आदि बाँधकर निम्नलिखित मन्त्र के उच्चारण सहित पहनाएँ :-
ॐ यदाबध्नन्दाक्षायणा, हिरण्य शतानीकाय, सुमनस्यमानाः। तन्मऽआबध्नामि शतशारदाय, आयुष्माञ्जरदष्टियर्थासम्॥ 34.52॥ 
तत्पश्चात् क्षमा प्राथर्ना, नमस्कार, विसजर्न, शान्तिपाठ के साथ कायर्क्रम पूर्ण करें।
द्वार पूजा :: विवाह हेतु बारात जब द्वार पर आती है, तो सर्वप्रथम 'वर' का स्वागत-सत्कार इस प्रकार किया जाता है :- 'वर' के द्वार पर आते ही आरती की प्रथा हो, तो कन्या की माता आरती कर लें। तत्पश्चात् 'वर' और कन्यादाता परस्पर अभिमुख बैठकर षट्कर्म, कलावा, तिलक, कलशपूजन, गुरुवन्दना, गौरी-गणेश पूजन, सर्वदेवनमस्कार, स्वस्तिवाचन करें। इसके बाद कन्यादाता वर सत्कार के सभी कृत्य आसन, अर्घ्य, पाद्य, आचमन, मधुपर्क आदि (विवाह संस्कार से) सम्पन्न कराएँ। 
तत्पश्चात् ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां........... (पृ० .....) से तिलक लगाएँ तथा ॐ अक्षन्नमीमदन्त ...... (पृ० ....) से अक्षत लगाएँ। माल्यार्पण एवं कुछ द्रव्य 'वर' को प्रदान करना हो, तो निम्नस्थ मन्त्रों से सम्पन्न करा दें- माल्यापर्ण मन्त्र- ॐ मंगलं भगवान विष्णुः ............ (पृ०...) द्रव्यदान मन्त्र - ॐ हिरण्यगर्भः समवत्तर्ताग्रे ......... (पृ०...) तत्पश्चात् क्षमाप्रार्थना, नमस्कार, देवविसर्जन एवं शान्तिपाठ करें।
विवाह संस्कार का विशेष कमर्काण्ड :: विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मङ्गलाचरण 'भद्रं कणेर्भिः.......' मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ। कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे। कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए। पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें। सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों। पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ। वर-सत्कार-(अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकता नहीं है।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए। (1). आसन, (2). पाद्य, (3). अर्ध्य, (4). आचमन और (5). नैवेद्य आदि निधार्रित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ।
दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है। गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है। उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं। श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कत्तर्व्य हो जाता है। दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए।
वर का अर्थ होता है :- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य। कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान से प्राथर्ना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें।
वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ। जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी, आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसके प्रति उमड़ती ही रहे। ऐसा सम्भव हो, तो पारिवारिक सम्बन्धों में देवोपम स्नेह-मधुरता का संचार अवश्य होगा।
इन दिव्य भावों के लिए सबसे अधिक घातक है, संकीर्ण स्वाथर्परक लेन-देन का आग्रह। दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो ही जाती है, द्वेष और प्रतिशोध के दुर्भाव उभर आते हैं। वर-वधू के सुखद भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसे अप्रिय प्रसंगों को विष मानकर उनसे सवर्था दूर रहना चाहिए। ध्यान रखें कि सत्कार में स्थूल उपचारों को नहीं हृदयगत भावों को प्रधान माना जाता है। उन्हीं के साथ निधार्रित क्रम पूरा किया-कराया जाए। क्रिया और भावना- स्वागतकत्तार् हाथ में अक्षत लेकर भावना करें कि वर की श्रेष्ठतम प्रवृत्तियों का अचर्न कर रहे हैं। देव-शक्तियाँ उन्हें बढ़ाने-बनाये रखने में सहयोग करें। निम्न मन्त्र बोलें- ॐ साधु भवान् आस्ताम्। अचर्यिष्यामो भवन्तम्। [पा.गृ.1.3.4]
वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागत कर्ता की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं। बोलें :- 'ॐ अचर्य।' 
आसन :- स्वागत कर्ता आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें। भावना करें कि वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो। हमारे स्नेह में उसका स्थान बने। 
ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम्। [पा.गृ.सू.1.3.6] 
वर कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। [पा.गृ.सू1.3.7] 
उसे बिछाकर बैठ जाए, इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए :- ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर्ः। इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥ [पा.गृ.सू०.1.3.8]
पाद्य :- स्वागतकत्तार् पैर धोने के लिए छोटे पात्र में जल लें। भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं। 
कन्यादाता कहें :- ॐ पाद्यं, पाद्यं, पाद्यं, प्रतिगृह्यताम्। [पा.गृ.सू.1.3.6]
वर कहें :- ॐ प्रतिगृह्णामि। [पा.गृ.सू.1.3.7]
भावना करें कि आदर्शों की दिशा में चरण बढ़ाने की उमंग इष्टदेव बनाये रखें। पद प्रक्षालन की क्रिया के साथ यह मन्त्र बोला जाए। ॐ विराजो दोहोऽसि, विराजो दोहमशीय मयि, पाद्यायै विराजो दोहः। [पा.गृ.सू.1.3.12] 
अर्घ्य :: स्वागत कर्ता  चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्यपुरुषार्थ में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अर्घ्य दे रहे हैं। 
कन्यादाता कहे :- ॐ अर्घो, अर्घो, अर्घः प्रतिगृह्यताम्। [ पा.गृ.सू.1.3.6] 
जल पात्र स्वीकार करते हुए वर कहे :- ॐ प्रतिगृह्णामि। [पा.गृ.सू.1.3.7] 
भावना करें कि सुगन्धित जल सत्पुरुषार्थ के संस्कार दे रहा है। जल से हाथ धोयें। 
क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए :-
ॐ आपःस्थ युष्माभिः, सवार्न्कामानवाप्नवानि। ॐ समुद्रं वः प्रहिणोमि, स्वां योनिमभिगच्छत। 
अरिष्टाअस्माकं वीरा, मा परासेचि मत्पयः। [पा.गृ.सू.1.3.13-14] 
आचमन :- स्वागत कर्ता आचमन के लिए जल पात्र प्रस्तुत करें। भावना करें कि वर-श्रेष्ठ अतिथि का मुख उज्ज्वल रहे, उसकी वाणी उसका व्यक्तित्व तदनुरूप बने।
कन्यादाता कहे :- ॐ आचमनीयम्, आचमीयनम्, आचमीनयम्, प्रतिगृह्यताम्॥ 
वर कहे :- ॐ प्रतिगृह्णामि। [पा.गृ.सू.1.3.6] 
भावना करें कि मन, बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। तीन बार आचमन करें। यह मन्त्र बोला जाए :- ॐ आमागन् यशसा, स सृज वचर्सा। तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं, पशूनामरिष्टिं तनूनाम्। [पा.गृ.सू.1.3.15] 
नैवेद्य :- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें। स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें। भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवधर्क आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे। 
कन्यादाता कहे :- ॐ मधुपकोर्, मधुपकोर्, मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम्। [ पा.गृ.सू.1.3.6] 
वर पात्र स्वीकार करते हुए कहे :- ॐ प्रतिगृह्णामि। 
वर मधुपर्क का पान करे। भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अजिर्त करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं। 
पान करते समय यह मन्त्र बोला जाए:- ॐ यन्मधुनो मधव्यं परम रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण, रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि।[पा.गृ.सू.1.3.20] 
तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए। स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे। इसके बाद चन्दन धारण कराएँ। यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए। इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ। रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए।
विवाह घोषणा :: यह संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं। इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए। बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धामिर्क एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं। जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सवर्साधारण के समक्ष की जानी चाहिए। समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है। घोषणापूवर्क विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं।
स्वस्ति श्रीमन्नन्दनन्दन चरणकमल भक्ति सद् विद्या विनीतनिजकुलकमलकलिकाप्रकाशनैकभास्कार सदाचार सच्चरित्र सत्कुल सत्प्रतिष्ठा गरिष्ठस्य .........गोत्रस्य ........ महोदयस्य प्रपोत्रः .......... महोदयस्य पोत्र.......... महोदयस्य पुत्रः॥ ....... महोदयस्य प्रपौत्री, ........ महोदयस्य पौत्री .........महोदसस्य पुत्री प्रयतपाणिः शरणं प्रपद्ये। स्वस्ति संवादेषूभयोवृर्द्धिवर्रकन्ययोश्चिरंजीविनौ भूयास्ताम्।
मङ्गलाष्टक :: विवाह घोषणा के बाद, सस्वर मङ्गलाष्टक मन्त्र बोलें जाएँ। इन मन्त्रों में सभी श्रेष्ठ शक्तियों से मङ्गलमय वातावरण, मङ्गलमय भविष्य के निमार्ण की प्रार्थना की जाती है। पाठ के समय सभी लोग भावनापूर्वक वर-वधू के लिए मङ्गल कामना करते रहें। एक स्वयं सेवक उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करता रहे।
ॐमत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः। 
प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लाङ्गलधरः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥1॥
गङ्गा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ, गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गङ्गाधरो गौतमः।
 गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी, गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥2॥
नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं, तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम्। 
गङ्गावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्, संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥3॥
बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः, जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः। मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः, पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥4॥
गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती। स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी, वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥5॥
गङ्गा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका। 
शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥6॥
लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः। 
अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे, रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥7॥
ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः, शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः। विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मङ्गलम्॥8॥
परस्पर उपहार :: वर पक्ष की ओर से कन्या को और कन्या पक्ष की ओर से वर का वस्त्र-आभूषण भेंट किये जाने की परम्परा है। यह कार्य श्रद्धानुरूप पहले ही हो जाता है। वर-वधू उन्हें पहनाकर ही संस्कार में बैठते हैं। यहाँ प्रतीक रूप से पीले दुपट्टे एक-दूसरे को भेंट किये जाएँ। यही ग्रन्थि बन्धन के भी काम आ जाते हैं। आभूषण पहिनाना हो, तो अँगूठी या मङ्गलसूत्र जैसे शुभ-चिह्नों तक ही सीमित रहना चाहिए। दोनों पक्ष भावना करें कि एक-दूसरे का सम्मान बढ़ाने, उन्हें अलंकृत करने का उत्तरदायितव समझने और निभाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। 
नीचे लिखे मन्त्र के साथ परस्पर उपहार दिये जाएँ :-
ॐ परिधास्यै यशोधास्यै, दीघार्युत्वाय जरदष्टिरस्मि। शतं च जीवामि शरदः, पुरूचीरायस्पोषमभि संव्ययिष्ये। [पा.गृ.सू. 2.6.20] 
पुष्पोहार (माल्यापर्ण) वर-वधू एक-दूसरे को अपने अनुरूप स्वीकार करते हुए, पुष्प मालाएँ अपिर्त करते हैं। हृदय से वरण करते हैं। भावना करें कि देव शक्तियों और सत्पुरुषों के आशीर्वाद से वे परस्पर एक दूसरे के गले के हार बनकर रहेंगे। 
निम्न मन्त्रोच्चार के साथ पहले कन्या वर को फिर वर-कन्या को माला पहनायें :-
ॐ यशसा माद्यावापृथिवी, यशसेन्द्रा बृहस्पती। यशो भगश्च मा विदद्, यशो मा प्रतिपद्यताम्। [पा.गृ.सू. 2.6.21; 1.9.27] 
हस्तपीतकरण :: कन्यादान करने वाले कन्या के हाथों में हल्दी लगाते हैं। हरिद्रा मङ्गलसूचक है। अब तक बालिका के रूप में यह लड़की रही। अब यह गृहलक्ष्मी का उत्तरदायित्व वहन करेगी, इसलिए उसके हाथों को पीतवर्ण-मङ्गलमय बनाया जाता है। उसके माता-पिता ने लाड़-प्यार से पाला, उसके हाथों में कोई कठोर कत्तर्व्य नहीं सौंपा। अब उसे अपने हाथों को नव-निमार्ण के अनेक उत्तरदायित्व सँभालने को तैयार करना है, अतएव उन्हें पीतवर्ण माङ्गलिक-लक्ष्मी का प्रतीक-सृजनात्मक होना चाहिए। पीले हाथ करते हुए कन्या परिवार के लोग उस बालिका को यही मौन शिक्षण देते हैं कि उसे आगे सृजन शक्ति के रूप में प्रकट होना है और इसके लिए इन कोमल हाथों को अधिक उत्तरदायी, मजबूत और माङ्गलिक बनाना है।
क्रिया और भावना :: कन्या दोनों हथेलियाँ सामने कर दे। कन्यादाता गीली हल्दी उस पर मन्त्र के साथ मलें। भावना करें कि देव सान्निध्य में इन हाथों को स्वाथर्परता के कुसंस्कारों से मुक्त कराते हुए त्याग परमार्थ के संस्कार जाग्रत् किये जा रहे हैं।
निम्न मन्त्रोच्चार करें  :-  
ॐ अहिरिव भोगैः पयेर्ति बाहुँ, ज्याया हेतिं परिबाधमानः। हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान्, पुमान् पुमा सं परिपातु विश्वतः। [29.51]
कन्यादान-गुप्तदान :: कन्यादान के समय कुछ अंशदान देने की प्रथा है। आटे की लोई में छिपाकर कुछ धन कन्यादान के समय दिया जाता है। दहेज का यही स्वरूप है। बच्ची के घर से विदा होते समय उसके अभिभावक किसी आवश्यकता के समय काम आने के लिए उपहार स्वरूप कुछ धन देते हैं, पर होता वह गुप्त ही है। अभिभावक और कन्या के बीच का यह निजी उपहार है। दूसरों को इसके सम्बन्ध में जानने या पूछने की कोई आवश्यकता नहीं। दहेज के रूप में क्या दिया जाना चाहिए, इस सम्बन्ध में ससुराल वालों को कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं। न उसके प्रदशर्न की आवश्यकता है, क्यों कि गरीब-अमीर अपनी स्थिति के अनुसार जो दे, वह चर्चा का विषय नहीं बनना चाहिए, उसके साथ निन्दा-प्रशंसा नहीं जुड़नी चाहिए। एक-दूसरे का अनुकरण करने लगें, प्रतिस्पर्द्धा पर उतर आएँ, तो इससे अनर्थ ही होगा। कन्या-पक्ष पर अनुचित दबाव पड़ेगा और वर-पक्ष अधिक न मिलने पर अप्रसन्न होने की धृष्टता करने लगेगा। इसलिए कन्यादान के साथ कुछ धनदान का विधान तो है, पर दूरर्दशी ऋषियों ने लोगों की स्वाथर्परता एवं दुष्टता की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह नियम बना दिया है कि जो कुछ भी दहेज दिया जाए, वह सर्वथा गुप्त हो, उस पर किसी को चर्चा करने का अधिकार न हो। आटे में साधारणतया एक रुपया इस दहेज प्रतीक के लिए पयार्प्त है। यह धातु का लिया जाए और आटे के गोले के भीतर छिपाकर रखा जाए।
कन्यादान का अर्थ :: अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना। अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा। कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा। कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है। कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है। हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है। कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता। फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो। व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है। लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें। ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा। 
विवाह उभयपक्षीय समझौता है, जिसे वर और वधू दोनों ही पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वाह कर सफल बनाते हैं। यदि कोई किसी को खरीदी या बेची सम्पत्ति के रूप में देखें और उस पर पशुओं जैसा स्वामित्व अनुभव करें या व्यवहार करें, तो यह मानवता के मूलभूत अधिकारों का हनन करना ही होगा। कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूवर्क निबाहना चाहिए। पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है। इसलिए इस आरम्भिक सन्धिवेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे। कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये, कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है। उन्हें भी लड़की के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है। क्रिया और भावना-कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर सङ्कल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं। वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है। भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं। कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे। कन्या को यह भावनात्मक पुरुषार्थ करने तथा पति को उसे स्वीकार करने या निभाने की शक्ति देवशक्तियाँ प्रदान कर रही हैं। इस भावना के साथ कन्यादान का सङ्कल्प बोला जाए। सङ्कल्प पूरा होने पर सङ्कल्प कर्ता  कन्या के हाथ वर के हाथ में सौंप दें।
अद्येति.........नामाहं.........नाम्नीम् इमां कन्यां/भगिनीं सुस्नातां यथाशक्ति अलंकृतां, गन्धादि - अचिर्तां, वस्रयुगच्छन्नां, प्रजापति दैवत्यां, शतगुणीकृत, ज्योतिष्टोम-अतिरात्र-शतफल-प्राप्तिकामोऽहं ......... नाम्ने, विष्णुरूपिणे वराय, भरण-पोषण-आच्छादन-पालनादीनां, स्वकीय उत्तरदायित्व-भारम्, अखिलं अद्य तव पतनीत्वेन, तुभ्यं अहं सम्प्रददे। वर उन्हें स्वीकार करते हुए कहें- ॐ स्वस्ति।
गोदान :: गौ पवित्रता और परमार्थ परायणता की प्रतीक है। कन्या पक्ष वर को ऐसा दान दें, जो उन्हें पवित्रता और परमार्थ की प्रेरणा देने वाला हो। सम्भव हो, तो कन्यादान के अवसर पर गाय दान में दी जा सकती है। वह कन्या के व उसके परिवार के लोगों के स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त भी है। आज की स्थिति में यदि गौ देना या लेना असुविधाजनक हो, तो उसके लिए कुछ धन देकर गोदान की परिपाटी को जीवित रखा जा सकता है। क्रिया और भावना-कन्यादान करने वाले हाथ में सामग्री लें। भावना करें कि वर-कन्या के भावी जीवन को सुखी समुन्नत बनाने के लिए श्रद्धापूवर्क श्रेष्ठ दान कर रहे हैं। मन्त्रोच्चार के साथ सामग्री वर के हाथ में दें।
ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनां, स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा, गामनागामदितिं वधिष्ट॥ [ऋ. 8.10.1.15; पा.गृ.सू.1.3.27] 
मर्यादाकरण :: कन्यादान-गोदान के बाद कन्यादाता वर से सत् पुरुषों और देव शक्तियों की साक्षी में मर्यादा की विनम्र अपील करता है। वर उसे स्वीकार करता है। कन्या का उत्तरदायित्व वर को सौंपा गया है। ऋषियों द्वारा निधार्रित अनुशासन विशेष लक्ष्य के लिए हैं। अधिकार पाकर उस मयार्दा को भुलकर मनमाना आचरण न किया जाए। धर्म, अर्थ और काम की दिशा में ऋषि प्रणीत मयार्दा का उल्लंघन अधिकार के नशे में न किया जाए। यह निवेदन किया जाता है, जिसे वर प्रसन्नतापूवर्क स्वीकार करता है।
क्रिया और भावना :: कन्यादान करने वाले अपने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत लें। भावना करें कि वर को मयार्दा सौंप रहे हैं। वर मयार्दा स्वीकार करें, उसके पालन के लिए देव शक्तियों के सहयोग की कामना करे।
ॐ गौरीं कन्यामिमां पूज्य! यथाशक्तिविभूषिताम्। गोत्राय शमर्णे तुभ्यं, दत्तां देव समाश्रय॥ 
धमर्स्याचरणं सम्यक्, क्रियतामनया सह। धमेर् चाथेर् च कामे च, यत्त्वं नातिचरेविर्भो॥ 
वर कहें :- नातिचरामि।
पाणिग्रहण :: वर द्वारा मर्यादा स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। यह क्रिया हाथ से हाथ मिलाने जैसी होती है। मानों एक दूसरे को पकड़कर सहारा दे रहे हों। कन्यादान की तरह यह वर-दान की क्रिया तो नहीं होती, फिर भी उस अवसर पर वर की भावना भी ठीक वैसी होनी चाहिए, जैसी कि कन्या को अपना हाथ सौंपते समय होती है। वर भी यह अनुभव करें कि उसने अपने व्यक्तित्व का अपनी इच्छा, आकांक्षा एवं गतिविधियों के संचालन का केन्द्र इस वधू को बना दिया और अपना हाथ भी सौंप दिया। दोनों एक दूसरे को आगे बढ़ाने के लिए एक दूसरे का हाथ जब भावनापूर्वक समाज के सम्मुख पकड़ लें, तो समझना चाहिए कि विवाह का प्रयोजन पूरा हो गया।
क्रिया और भावना :: निम्न मन्त्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाये, वर उसे अँगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं।
ॐ ये दैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा। हिरण्यपणोर् वै कणर्ः, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ॥ [पा.गृ.सू.1.4.15] 
ग्रन्थिबन्धन :: वर-वधू द्वारा पाणिग्रहण एकीकरण के बाद समाज द्वारा दोनों को एक गाँठ में बाँध दिया जाता है। दुपट्टे के छोर बाँधने का अर्थ है-दोनों के शरीर और मन से एक संयुक्त इकाई के रूप में एक नई सत्ता का आविर्भाव होना। अब दोनों एक-दूसरे के साथ पूरी तरह बँधे हुए हैं। ग्रन्थिबन्धन में धन, पुष्प, दूर्वा, हरिद्रा और अक्षत यह पाँच चीजें भी बाँधते हैं। 
पैसा इसलिए रखा जाता है कि धन पर किसी एक का अधिकार नहीं रहेगा। जो कमाई या सम्पत्ति होगी, उस पर दोनों की सहमति से योजना एवं व्यवस्था बनेगी। ‍
पुष्प परस्पर प्रेम और महक-सुगंधी का प्रतीक है। पुष्प का अर्थ है, हँसते-खिलते रहना। एक-दूसरे को सुगन्धित बनाने के लिए यश फैलाने और प्रशंसा करने के लिए तत्पर रहें। कोई किसी का दूसरे के आगे न तो अपमान करे और न तिरस्कार।  
दूर्वा का अर्थ है कि कभी निजीर्व न होने वाली प्रेम भावना। दूर्वा का जीवन तत्त्व नष्ट नहीं होता, सूख जाने पर भी वह पानी डालने पर हरी हो जाती है। इसी प्रकार दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अजस्र प्रेम और आत्मीयता बनी रहे। चन्द्र-चकोर की तरह एक-दूसरे पर अपने को न्यौछावर करते रहें। अपना कष्ट कम और साथी का कष्ट बढ़कर मानें, अपने सुख की अपेक्षा साथी के सुख का अधिक ध्यान रखें। अपना आन्तरिक प्रेम एक-दूसरे पर उड़ेलते रहें। 
हरिद्रा का अर्थ है आरोग्य, एक-दूसरे के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को सुविकसित करने का प्रयतन करें। ऐसा व्यवहार न करें, जिससे साथी का स्वास्थ्य खराब होता हो या मानसिक उद्वेग पैदा होता हो। 
अक्षत, सामूहिक-सामाजिक विविध-विध उत्तरदायित्वों का स्मरण कराता है। कुटुम्ब में कितने ही व्यक्ति होते हैं। उन सबका समुचित ध्यान रखना, सभी को सँभालना संयुक्त पति-पत्नी का परम पावन कत्तर्व्य है। ऐसा न हो कि एक-दूसरे को तो प्रेम करें, पर परिवार के लोगों की उपेक्षा करने लगें। इसी प्रकार परिवार से बाहर भी जन मानस के सेवा की जिम्मेदारी हर भावनाशील मनुष्य पर रहती है। ऐसा न हो कि दो में से कोई किसी को अपने व्यक्तिगत स्वार्थ सहयोग तक ही सीमित कर ले, उसे समाज सेवा की सुविधा न दे। इस दिशा में लगने वाले समय व धन का विरोध करे। अक्षत इसी का संकेत करता है कि आप दोनों एक-दूसरे के लिए ही नहीं बने हैं, वरन् समाजसेवा का व्रत एवं उत्तरदायित्व भी आप लोगों के ग्रन्थिबन्धन में एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में विद्यमान है। इस प्रकार दूर्वा, पुष्प, हरिद्रा, अक्षत और पैसा इन पाँचों को रखकर दोनों का ग्रन्थिबन्धन किया जाता है और यह आशा की जाती है कि वे जिन लक्ष्यों के साथ आपस में बँधे हैं, उन्हें आजीवन निरन्तर स्मरण रखे रहेंगे। ‍
ग्रन्थिबन्धन, आचार्य या प्रतिनिधि या कोई मान्य व्यक्ति करें। दुपट्टे के छोर एक साथ करके उसमें मंगल-द्रव्य रखकर गाँठ बाँध दी जाए। भावना की जाए कि मंगल द्रव्यों के मंगल संस्कार सहित देव शक्तियों के समथर्न तथा स्नेहियों की सद्भावना के संयुक्त प्रभाव से दोनों इस प्रकार जुड़ रहे हैं, जो सदा जुड़े रहकर एक-दूसरे की जीवन लक्ष्य यात्रा में पूरक बनकर चलेंगे। ऐसा करते वक्त निम्न मंत्रोचार करें :-
ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः, समापो हृदयानि नौ। सं मातरिश्वा सं धाता, समुदेष्ट्री दधातु नौ॥ [ऋ.10.85.47;  पा.गृ.सू. 1.4.14]
वर-वधू की प्रतिज्ञाएँ :: किसी भी महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण के साथ शपथ ग्रहण समारोह भी अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। कन्यादान, पाणिग्रहण एवं ग्रन्थि-बन्धन हो जाने के साथ वर-वधू द्वारा और समाज द्वारा दाम्पत्य सूत्र में बँधने की स्वीकारोक्ति हो जाती है। इसके बाद अग्नि एवं देव-शक्तियों की साक्षी में दोनों को एक संयुक्त इकाई के रूप में ढालने का क्रम चलता है। इस बीच उन्हें अपने कर्त्तव्य धर्म का महत्त्व भली प्रकार समझना और उसके पालन का संकल्प लेना चाहिए। इस दिशा में पहली जिम्मेदारी वर की होती है। अस्तु, पहले वर तथा बाद में वधू को प्रतिज्ञाएँ कराई जाती हैं।
वर-वधू को आचार्य एक-एक करके प्रतिज्ञाएँ व्याख्या-अर्थ सहित समझाएँ।
वर की प्रतिज्ञाएँ :: 
धमर्पतनीं मिलित्वैव, ह्येकं जीवनामावयोः। अद्यारम्भ यतो मे त्वम्, अर्द्धांगिनीति घोषिता॥1॥ 
आज से धमर्पतनी को अर्द्धांगिनी घोषित करते हुए, उसके साथ अपने व्यक्तित्व को मिलाकर एक नये जीवन की सृष्टि करता हूँ। अपने शरीर के अंगों की तरह धमर्पतनी का ध्यान रखूँगा।
स्वीकरोमि सुखेन त्वां, गृहलक्ष्मीमहन्ततः। मन्त्रयित्वा विधास्यामि, सुकायार्णि त्वया सह॥2॥ 
प्रसन्नतापूर्वक गृहलक्ष्मी का महान अधिकार सौंपता हूँ और जीवन के निधार्रण में उनके परामर्श को महत्त्व दूँगा।
रूप-स्वास्थ्य-स्वभावान्तु, गुणदोषादीन् सवर्तः। रोगाज्ञान-विकारांश्च, तव विस्मृत्य चेतसः॥3॥ 
रूप, स्वास्थ्य, स्वभावगत गुण दोष एवं अज्ञानजनित विकारों को चित्त में नहीं रखूँगा, उनके कारण असन्तोष व्यक्त नहीं करूँगा। स्नेहपूर्वक सुधारने या सहन करते हुए आत्मीयता बनाये रखूँगा।
सहचरो भविष्यामि, पूणर्स्नेहः प्रदास्यते। सत्यता मम निष्ठा च, यस्याधारं भविष्यति॥4॥ 
पत्नी का मित्र बनकर रहूँगा और पूरा-पूरा स्नेह देता रहूँगा। इस वचन का पालन पूरी निष्ठा और सत्य के आधार पर करूँगा।
यथा पवित्रचित्तेन, पातिव्रत्य त्वया धृतम्। तथैव पालयिष्यामि, पतनीव्रतमहं ध्रुवम्॥5॥ 
पत्नी के लिए जिस प्रकार पतिव्रत की मर्यादा कही गयी है, उसी दृढ़ता से स्वयं पतनीव्रत धर्म का पालन करूँगा। चिन्तन और आचरण दोनों से ही पर नारी से वासनात्मक सम्बन्ध नहीं जोडूँगा।
गृहस्याथर्व्यवस्थायां, मन्त्रयित्वा त्वया सह। संचालनं करिष्यामि, गृहस्थोचित-जीवनम्॥6॥ 
गृह व्यवस्था में धर्म-पत्नी को प्रधानता दूँगा। आमदनी और खर्च का क्रम उसकी सहमति से करने की गृहस्थोचित जीवनचयार् अपनाऊँग।
समृद्धि-सुख-शान्तीनां, रक्षणाय तथा तव। व्यवस्थां वै करिष्यामि, स्वशक्तिवैभवादिभि॥7॥ 
धमर्पत्नी की सुख-शान्ति तथा प्रगति-सुरक्षा की व्यवस्था करने में अपनी शक्ति और साधन आदि को पूरी ईमानदारी से लगाता रहूँगा।
यतनशीलो भविष्यामि, सन्मागर्ंसेवितुं सदा। आवयोः मतभेदांश्च, दोषान्संशोध्य शान्तितः॥8॥ 
अपनी ओर से मधुर भाषण और श्रेष्ठ व्यवहार बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयतन करूँगा। मतभेदों और भूलों का सुधार शान्ति के साथ करूँगा। किसी के सामने पतनी को लाञ्छित-तिरस्कृत नहीं करूँगा।
भवत्यामसमथार्यां, विमुखायाञ्च कमर्णि। विश्वासं सहयोगञ्च, मम प्राप्स्यसि त्वं सदा॥9॥ 
पत्नी के असमर्थ या अपने कर्त्तव्य से विमुख हो जाने पर भी अपने सहयोग और कर्त्तव्य पालन में रत्ती भर भी कमी न रखूँगा।
कन्या की प्रतिज्ञाएँ ::
स्वजीवनं मेलयित्वा, भवतः खलु जीवने। भूत्वा चाधार्ंगिनी नित्यं, निवत्स्यामि गृहे सदा॥1॥ 
अपने जीवन को पति के साथ संयुक्त करके नये जीवन की सृष्टि करूँगी। इस प्रकार घर में हमेशा सच्चे अर्थों में अर्द्धांगिनी बनकर रहूँगी।
‍शिष्टतापूवर्कं सवैर्ः, परिवारजनैः सह। औदायेर्ण विधास्यामि, व्यवहारं च कोमलम्॥2॥ 
पति के परिवार के परिजनों को एक ही शरीर के अंग मानकर सभी के साथ शिष्टता बरतूँगी, उदारतापूवर्क सेवा करूँगी, मधुर व्यवहार करूँगी।
त्यक्त्वालस्यं करिष्यामि, गृहकायेर् परिश्रमम्। भतुर्हर्षर्ं हि ज्ञास्यामि, स्वीयामेव प्रसन्नताम्॥3॥ 
आलस्य को छोड़कर परिश्रमपूवर्क गृह कार्य करूँगी। इस प्रकार पति की प्रगति और जीवन विकास में समुचित योगदान करूँगी।
श्रद्धया पालयिष्यामि, धमर्ं पातिव्रतं परम्। सवर्दैवानुकूल्येन, पत्युरादेशपालिका॥4॥ 
पतिव्रत धर्म का पालन करूँगी, पति के प्रति श्रद्धा-भाव बनाये रखकर सदैव उनके अनूकूल रहूँगी। कपट-दुराव न करूँगी, निदेर्शों के अविलम्ब पालन का अभ्यास करूँगी।
सुश्रूषणपरा स्वच्छा, मधुर-प्रियभाषिणी। प्रतिजाने भविष्यामि, सततं सुखदायिनी॥5॥ 
सेवा, स्वच्छता तथा प्रियभाषण का अभ्यास बनाये रखूँगी। ईर्ष्या, कुढ़न आदि दोषों से बचूँगी और सदा प्रसन्नता देने वाली बनकर रहूँगी।
‍मितव्ययेन गाहर्स्थ्य-सञ्चालने हि नित्यदा। प्रयतिष्ये च सोत्साहं, तवाहमनुगामिनी॥6॥ 
मितव्ययी बनकर फिजूलखर्ची से बचूँगी। पति के असमर्थ हो जाने पर भी गृहस्थ के अनुशासन का पालन करूँगी।
‍देवस्वरूपो नारीणां, भत्तार् भवति मानवः। मत्वेति त्वां भजिष्यामि, नियता जीवनावधिम्॥7॥ 
नारी के लिए पति, देव स्वरूप होता है- यह मानकर मतभेद भुलाकर, सेवा करते हुए जीवन भर सक्रिय रहूँगी, कभी भी पति का अपमान न करूँगी।
पूज्यास्तव पितरो ये, श्रद्धया परमा हि मे। सेवया तोषयिष्यामि, तान्सदा विनयेन च॥8॥ 
जो पति के पूज्य और श्रद्धा पात्र हैं, उन्हें सेवा द्वारा और विनय द्वारा सदैव सन्तुष्ट रखूँगी।
विकासाय सुसंस्कारैः, सूत्रैः सद्भाववद्धिर्भिः। परिवारसदस्यानां, कौशलं विकसाम्यहम्॥9॥ 
परिवार के सदस्यों में सुसंस्कारों के विकास तथा उन्हें सद्भावना के सूत्रों में बाँधे रहने का कौशल अपने अन्दर विकसित करूँगी।
प्रायश्चित होम :: गायत्री मन्त्र की आहुति के पश्चात् पाँच आहुतियाँ प्रायश्चित होम की अतिरिक्त रूप से दी जाती है। वर और कन्या दोनों के हाथ में हवन सामग्री दी जाती है। प्रायश्चित होम की आहुतियाँ देते समय यह भावना दोनों के मन में आनी चाहिए कि दाम्पत्य जीवन में बाधक जो भी कुसंस्कार अब तक मन में रहे हों, उन सब को स्वाहा किया जा रहा है। किसी से गृहस्थ के आदर्शों के उल्लंघन करने की कोई भूल हुई हो, तो उसे अब एक स्वप्न जैसी बात समझकर विस्मरण कर दिया जाए। इस प्रकार की भूल के कारण कोई किसी को न तो दोष दे, न सन्देह की दृष्टि से देखे। इसी प्रकार कोई अन्य नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन रहा हो या स्वभाव में कठोरता, स्वाथर्परता, अहंकार जैसी कोई त्रुटि रही हो, तो उसका त्याग कर दिया जाए। साथ ही, उन भूलों का प्रायश्चित करते हुए भविष्य में कोई ऐसी भूल न करने का संकल्प भी करना है, जो दाम्पत्य जीवन की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे।
वर-वधू हवन सामग्री से आहुति करें। भावना करें कि प्रायश्चित आहुति के साथ पूर्व दुष्कृत्यों की धुलाई हो रही है। स्वाहा के साथ आहुति डालें, इदं न मम के साथ हाथ जोड़कर नमस्कार करें। 
ॐ त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्, देवस्य हेडो अव यासिसीष्ठाः। 
यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो, विश्वा द्वेषा सि प्र मुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ [21.3]
ॐ स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती, नेदिष्ठो अस्या ऽ उषसो व्युष्टौ। 
अव यक्ष्व नो वरुण रराणो, वीहि मृडीक सुहवो न ऽ एधि स्वाहा। इदमग्नीवरुणाभ्यां इदं न मम॥ [21.4]
ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य, नभिशस्तिपाश्च, सत्यमित्वमयाऽ असि। अया नो यज्ञं वहास्यया, नो धेहि भेषज स्वाहा। इदमग्नये अयसे इदं न मम। [का.श्रौ.सू.25.1.11] 
 ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं, यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः, तेभिनोर्ऽअद्य सवितोत विष्णुः, विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वकार्ः स्वाहा। इदं वरुणायसवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकेर्भ्यश्च इदं न मम।
[का.श्रौ. सू.25.1.11] 
ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं, विमध्यम श्रथाय। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो, अदितये स्याम स्वाहा। इदं वरुणायादित्यायादितये च इदं न मम। [12.12]
शिलारोहण :: शिलारोहण के द्वारा पत्थर पर पैर रखते हुए प्रतिज्ञा करते हैं कि जिस प्रकार अंगद ने अपना पैर जमा दिया था, उसी तरह हम पत्थर की लकीर की तरह अपना पैर उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिए जमाते हैं। यह धर्मकृत्य खेल-खिलौने की तरह नहीं किया जा रहा, जिसे एक मखौल समझकर तोड़ा जाता रहे, वरन् यह प्रतिज्ञाएँ पत्थर की लकीर की तरह अमिट बनी रहेंगी, ये चट्टान की तरह अटूट एवं चिरस्थाई रखी जायेंगी।
मन्त्र बोलने के साथ वर-वधू अपने दाहिने पैर को शिला पर रखें, भावना करें कि उत्तरदायित्वों के निवार्ह करने तथा बाधाओं को पार करने की शक्ति हमारे संकल्प और देव अनुग्रह से मिल रही है। 
ॐ आरोहेममश्मानम् अश्मेव त्वं स्थिरा भव। अभितिष्ठ पृतन्यतोऽ, वबाधस्व पृतनायतः॥ [पा.गृ.सू.1.7.1]
लाजाहोम एवं परिक्रमा (भाँवर) :: प्रायश्चित आहुति के बाद लाजाहोम और यज्ञाग्नि की परिक्रमा (भाँवर) का मिला-जुला क्रम चलता है। लाजाहोम के लिए कन्या का भाई एक थाली में खील (भुना हुआ धान) लेकर पीछे खड़ा हो। एक मुट्टी खील अपनी बहिन को दे। कन्या उसे वर को सौंप दे। वर उसे आहुति मन्त्र के साथ हवन कर दे। इस प्रकार तीन बार किया जाए। कन्या तीनों बार भाई के द्वारा दिये हुए खील को अपने पति को दे, वह तीनों बार हवन में अपर्ण कर दे। लाजाहोम में भाई के घर से अन्न (खील के रूप में) बहिन को मिलता है, उसे वह अपने पति को सौंप देती है। कहती है बेशक मेरे व्यक्तिगत उपयोग के लिए पिता के घर से मुझे कुछ मिला है, पर उसे मैं छिपाकर अलग से नहीं रखती, आपको सौंपती हूँ।‍अलगाव या छिपाव का भाव कोई मन में न आए, इसलिए जिस प्रकार पति कुछ कमाई करता है, तो पत्नी को सौंपता है, उसी प्रकार पत्नी भी अपनी उपलब्धियों को पति के हाथ में सौंपती है। पति सोचता है, हम लोग हाथ-पैर से जो कमायेंगे, उसी से अपना काम चलायेंगे, किसी के उदारतापूर्वक दिये हुए अनुदान को बिना श्रम किये खाकर क्यों हम किसी के ऋणी बनें। इसलिए पति उस लाजा को अपने खाने के लिए नहीं रख लेता, वरन् यज्ञ में होम देता है। जन कल्याण के लिए उस पदार्थ को वायुभूत बनाकर संसार के वायुमण्डल में बिखेर देता है। इस क्रिया में यहाँ महान मानवीय आदर्श सन्निहित है कि मुफ्त का माल या तो स्वीकार ही न किया जाय या मिले भी तो उसे लोकहित में खर्च कर दिया जाए। लोग अपनी-अपनी निज की पसीने की कमाई पर ही गुजर-बसर करें। मृतक भोज के पीछे भी यही आदर्शवादिता थी कि पिता के द्वारा उत्तराधिकार में मिले हुए धन को लड़के अपने काम में नहीं लेते थे, वरन् समाजसेवी ब्राह्मणों के निर्वाह में या अन्य पुण्यकार्यों में खर्च कर डालते थे। यही दहेज के सम्बन्ध में भी ठीक है। पिता के गृह से उदारतापूवर्क मिला, सो उनकी भावना सराहनीय है, पर आपकी भी तो कुछ भावना होनी चाहिए। मुफ्त का माल खाते हुए किसी कमाऊ मनुष्य का गैरत आना स्वाभाविक है। उसका यह सोचना ठीक ही है कि बिना परिश्रम का धन, वह भी दान की उदार भावना से दिया हुआ उसे पचेगा नहीं, इसलिए उपहार को जन मंगल के कायर् में, परमार्थ यज्ञ में आहुति कर देना ही उचित है। इसी उद्देश्य से पत्नी के भाई के द्वारा दिये गये लाजा को वह यज्ञ कार्य में लगा देता है। दहेज का ठीक उपयोग यही है, प्रथा भी है कि विवाह के अवसर पर वर पक्ष की ओर से बहुत सा दान-पुण्य किया जाता है। अच्छा हो जो कुछ मिले, वह सबको ही दान कर दे। विवाह के समय ही नहीं, अन्य अवसरों पर भी यदि कभी किसी से कुछ ऐसा ही बिना परिश्रम का उपहार मिले, तो उसके सम्बन्ध में एक नीति रहनी चाहिए कि मुफ्त का माल खाकर हम परलोक के ऋणी न बनेंगे, वरन् ऐसे अनुदान को परमार्थ में लगाकर उस उदार परम्परा को अपने में न रोककर आगे जन कल्याण के लिए बढ़ा देंगे। कहाँ भारतीय संस्कृति की उदार भावना और कहाँ आज के धन लोलुपों द्वारा कन्या पक्ष की आँतें नोच डालने वाली दहेज की पैशाचिक माँगें, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। जिसने अपने हृदय का, आत्मा का टुकड़ा कन्या दे दी, उनके प्रति वर पक्ष का रोम-रोम कृतज्ञ होना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि इस अलौकिक उपहार के बदले में किस प्रकार अपनी श्रद्धा-सद्भावना व्यक्त करें। यह न होकर उल्टे जब कन्या पक्ष को दबा हुआ समझ कर उसे तरह-तरह से सताने और चूसने की योजना बनाई जाती है, तो यही समझना चाहिए कि भारतीय परम्पराएँ बिल्कुल उल्टी हो गयीं। धर्म के स्थान पर अधर्म, देवत्व के स्थान पर असुरता का साम्राज्य छा गया। लाजाहोम वतर्मान काल की क्षुद्र मान्यताओं को धिक्कारता है और दहेज के सम्बन्ध में सही दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।
‍परिक्रमा :: अग्नि की पति-पतनी परिक्रमा करें। बायें से दायें की ओर चलें। पहली चार परिक्रमाओं में कन्या आगे रहे और वर पीछे। चार परिक्रमा हो जाने पर लड़का आगे हो जाए और लड़की पीछे। परिक्रमा के समय परिक्रमा मन्त्र बोला जाए तथा हर परिक्रमा पूरी होने पर एक-एक आहुति वर-वधू गायत्री मन्त्र से करते चलें, इसका तात्पयर् है- घर-परिवार के कार्यों में लड़की का नेतृत्व रहेगा, उसके परामर्श को महत्त्व दिया जाएगा, वर उसका अनुसरण करेगा, क्योंकि उन कामों का नारी को अनुभव अधिक होता है। बाहर के कार्यों में वर नेतृत्व करता है और नारी उसका अनुसरण करती है, क्योंकि व्यावसायिक क्षेत्रों में वर का अनुभव अधिक होता है। जिसमें जिस दिशा की जानकारी कम हो, दूसरे में उसकी जानकारी बढ़ाकर अपने समतुल्य बनाने में प्रयतनशील रहें। भावना क्षेत्र में नारी आगे है, कर्म क्षेत्र में पुरुष। दोनों पक्ष अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं। कुल मिलाकर नारी का वचर्स्व, पद, गौरव एवं वजन बड़ा बैठता है। इसलिए उसे चार परिक्रमा करने और नर को तीन परिक्रमा करने का अवसर दिया जाता है। गौरव के चुनाव के 4  मत कन्या को और 3 मत वोट को मिलते हैं। इसलिए सदा नर से पहला स्थान नारी को मिला है। सीताराम, राधेश्याम, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश आदि युग्मों में पहले नारी का नाम है, पीछे नर का।
लाजा होम और परिक्रमा का मिला-जुला क्रम चलता है। शिलारोहण के बाद वर-वधू खड़े-खड़े गायत्री मन्त्र से एक आहुति समर्पित करें। अब मन्त्र के साथ परिक्रमा करें। वधू आगे, वर पीछे चलें। एक परिक्रमा पूरी होने पर लाजाहोम की एक आहुति करें। आहुति करके दूसरी परिक्रमा पहले की तरह मन्त्र बोलते हुए करें। इसी प्रकार लाजाहोम की दूसरी आहुति करके तीसरी परिक्रमा तथा तीसरी आहुति करके चौथी परिक्रमा करें। इसके बाद गायत्री मन्त्र की आहुति देते हुए तीन परिक्रमाएँ वर को आगे करके परिक्रमा मन्त्र बोलते हुए कराई जाएँ। आहुति के साथ भावना करें कि बाहर यज्ञीय ऊर्जा तथा अंतःकरण में यज्ञीय भावना तीव्रतर हो रही है। परिक्रमा के साथ भावना करें कि यज्ञीय अनुशासन को केन्द्र मानकर, यज्ञाग्नि को साक्षी करके आदर्श दाम्पत्य के निवार्ह का संकल्प कर रहे हैं।
लाजाहोम :: 
ॐ अयर्मणं देवं कन्या अग्निमयक्षत। स नोऽअयर्मा देवः प्रेतो मुञ्चतु, मा पतेः स्वाहा। 
इदम् अयर्म्णे अग्नये इदं न मम॥ 
ॐ इयं नायुर्पब्रूते लाजा नावपन्तिका। आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां, ज्ञातयो मम स्वाहा। इदम् अग्नये इदं न मम॥ 
ॐ इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ, समृद्धिकरणं तव। मम तुभ्यं च संवननं, तदग्निरनुमन्यतामिय स्वाहा।
 इदं अग्नये इदं न मम॥ [पा.गृ.सू.1.6.2] 
परिक्रमा मन्त्र ::  
ॐ तुभ्यमग्ने पयर्वहन्त्सूयार्ं वहतु ना सह। पुनः पतिभ्यो जायां दा, अग्ने प्रजया सह॥[ऋ.1o.85.38; पा.गृ.सू०.1.7.3]
सप्तपदी :: भाँवरें फिर लेने के उपरान्त सप्तपदी की जाती है। सात बार वर-वधू साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर सैनिकों की तरह आगे बढ़ते हैं। सात चावल की ढेरी या कलावा बँधे हुए सकोरे रख दिये जाते हैं, इन लक्ष्य-चिह्नों को पैर लगाते हुए दोनों एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं, रुक जाते हैं और फिर अगला कदम बढ़ाते हैं। इस प्रकार सात कदम बढ़ाये जाते हैं। प्रत्येक कदम के साथ एक-एक मन्त्र बोला जाता है।
पहला कदम अन्न के लिए, दूसरा बल के लिए, तीसरा धन के लिए, चौथा सुख के लिए, पाँचवाँ परिवार के लिए, छठवाँ ऋतुचर्या के लिए और सातवाँ मित्रता के लिए उठाया जाता है। विवाह होने के उपरान्त पति-पत्नी को मिलकर सात कायर्क्रम अपनाने पड़ते हैं। उनमें दोनों का उचित और न्याय संगत योगदान रहे, इसकी रूपरेखा सप्तपदी में निधार्रित की गयी है।
प्रथम कदम अन्न वृद्धि के लिए है। आहार स्वास्थ्यवर्धक हो, घर में चटोरेपन को कोई स्थान न मिले। रसोई में जो बने, वह ऐसा हो कि स्वास्थ्य रक्षा का प्रयोजन पूरा करे, भले ही वह स्वादिष्ट न हो। अन्न का उत्पादन, अन्न की रक्षा, अन्न का सदुपयोग जो कर सकता है, वही सफल गृहस्थ है। अधिक पका लेना, जूठन छोड़ना, बतर्न खुले रखकर अन्न की चूहों से बबार्दी कराना, मिचर्-मसालो की भरमार उसे तमोगुणी बना देना, स्वच्छता का ध्यान न रखना, आदि बातों से आहार पर बहुत खर्च करते हुए भी स्वास्थ्य नष्ट होता है, इसलिए दाम्पत्य जीवन का उत्तरदायित्व यह है कि आहार की सात्त्विकता का समुचित ध्यान रखा जाए।
दूसरा कदम शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि के लिए है। व्यायाम, परिश्रम, उचित एवं नियमित आहार-विहार से शरीर का बल स्थिर रहता है। अध्ययन एवं विचार-विमर्श से मनोबल बढ़ता है। जिन प्रयतनों से दोनों प्रकार के बल बढें, दोनों अधिक समर्थ, स्वस्थ एवं सशक्त बनें-उसका उपाय सोचते रहना चाहिए।
तीसरा कदम धन की वृद्धि के लिए है। अर्थ व्यवस्था बजट बनाकर चलाई जाए। अपव्यय में कानी कौड़ी भी नष्ट न होने पाए। उचित कार्यों में कंजूसी न की जाए- फैशन, व्यसन, शेखीखोरी आदि के लिए पैसा खर्च न करके उसे पारिवारिक उन्नति के लिए सँभालकर, बचाकर रखा जाए। उपार्जन के लिए पति-पत्नी दोनों ही प्रयतन करें। पुरुष बाहर जाकर कृषि, व्यवसाय, नौकरी आदि करते हैं, तो स्त्रियाँ सिलाई, धुलाई, सफाई आदि करके इस तरह की कमाई करती हैं। उपार्जन पर जितना ध्यान रखा जाता है, खर्च की मर्यादाओं का भी वैसा ही ध्यान रखते हुए घर की अर्थव्यवस्था सँभाले रहना दाम्पत्य जीवन का अनिवार्य कत्तर्व्य है।
चौथा कदम सुख की वृद्धि के लिए है। विश्राम, मनोरंजन, विनोद, हास-परिहास का ऐसा वातावरण रखा जाए कि गरीबी में भी अमीरी का आनन्द मिले। दोनों प्रसन्नचित्त रहें। मुस्कराने की आदत डालें, हँसते-हँसाते जिन्दगी काटें। चित्त को हलका रखें, 'सन्तोषी सदा सुखी' की नीति अपनाएँ।
पाँचवाँ कदम परिवार पालन का है। छोटे बड़े सभी के साथ समुचित व्यवहार रखा जाए। आश्रित पशुओं एवं नौकरों को भी परिवार माना जाए, इस सभी आश्रितों की समुचित देखभाल, सुरक्षा, उन्नति एवं सुख-शान्ति के लिए सदा सोचने और करने में लापरवाही न बरती जाए।
छठा कदम ऋतुचर्या का है। सन्तानोत्पादन एक स्वाभाविक वृत्ति है, इसलिए दाम्पत्य जीवन में उसका भी एक स्थान है, पर उस सम्बन्ध में मयार्दाओं का पूरी कठोरता एवं सतर्कता से पालन किया जाए, क्योंकि असंयम के कारण दोनों के स्वास्थ्य का सर्वनाश होने की आशंका रहती है, गृहस्थ में रहकर भी ब्रह्मचर्य का समुचित पालन किया जाए। दोनों एक दूसरे का भी सहयोगी मित्र की दृष्टि से देखें, कामुकता के सर्वनाशी प्रसंगों को जितना सम्भव हो, दूर रखा जाए। सन्तान उत्पन्न करने से पूर्व हजार बार विचार करें कि अपनी स्थिति सन्तान को सुसंस्कृत बनाने योग्य है या नहीं। उस मर्यादा में सन्तान उत्पन्न करने की जिम्मेदारी वहन करें।
सातवाँ कदम मित्रता को स्थिर रखने एवं बढ़ाने के लिए है। दोनों इस बात पर बारीकी से विचार करते रहें कि उनकी ओर से कोई त्रुटि तो नहीं बरती जा रही है, जिसके कारण साथी को रुष्ट या असंतुष्ट होने का अवसर आए। दूसरा पक्ष कुछ भूल भी कर रहा हो, तो उसका उत्तर कठोरता, कर्कशता से नहीं, वरन् सज्जनता, सहृदयता के साथ दिया जाना चाहिए, ताकि उस महानता से दबकर साथी को स्वतः ही सुधरने की अन्तःप्रेरणा मिले। बाहर के लोगों के साथ, दुष्टों के साथ दुष्टता की नीति किसी हद तक अपनाई जा सकती है, पर आत्मीयजनों का हृदय जीतने के लिए उदारता, सेवा, सौजन्य, क्षमा जैसे शस्त्र की काम में लाये जाने चाहिए।
सप्तपदी में सात कदम बढ़ाते हुए इन सात सूत्रों को हृदयंगम करना पड़ता है। इन आदर्शों और सिद्धान्तों को यदि पति-पत्नी द्वारा अपना लिया जाए और उसी मार्ग पर चलने के लिए कदम से कदम बढ़ाते हुए अग्रसर होने की ठान ली जाए, तो दाम्पत्य जीवन की सफलता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता।
तत्पश्चात वर-वधू खड़े हों। 
प्रत्येक कदम बढ़ाने से पहले देव शक्तियों की साक्षी का मन्त्र बोला जाता है, उस समय वर-वधू हाथ जोड़कर ध्यान करें। उसके बाद चरण बढ़ाने का मन्त्र बोलने पर पहले दायाँ कदम बढ़ाएँ। इसी प्रकार एक-एक करके सात कदम बढ़ाये जाएँ। भावना की जाए कि योजनाबद्ध-प्रगतिशील जीवन के लिए देव साक्षी में संकल्पित हो रहे हैं, संकल्प और देव अनुग्रह का संयुक्त लाभ जीवन भर मिलता रहेगा।
(1). अन्न वृद्धि के लिए पहली साक्षी-पहला चरण :: 
ॐ एको विष्णुजर्गत्सवर्ं, व्याप्तं येन चराचरम्। हृदये यस्ततो यस्य, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥ 
ॐ इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥1॥
(2). बल वृद्धि के लिए दूसरी साक्षी-दूसरा चरण ::
 ॐ जीवात्मा परमात्मा च, पृथ्वी आकाशमेव च। सूयर्चन्द्रद्वयोमर्ध्ये, तस्य साक्षी प्रदीयताम्॥
ॐ ऊजेर् द्विपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥2॥
(3). धन वृद्धि के लिए तीसरी साक्षी-तीसरा चरण ::
 ॐ त्रिगुणाश्च त्रिदेवाश्च, त्रिशक्तिः सत्परायणाः। लोकत्रये त्रिसन्ध्यायाः, तस्य साक्षी प्रदीयताम्। 
ॐ रायस्पोषाय त्रिपदी भव सा मामनुव्रता भव। 
विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥3॥
(4). सुख वृद्धि के लिए चौथी साक्षी-चौथा चरण ::
 ॐ चतुर्मुखस्ततो ब्रह्मा, चत्वारो वेदसंभवाः। चतुयुर्गाः प्रवतर्न्ते, तेषां साक्षी प्रदीयताम्।
ॐ मायो भवाय चतुष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। 
विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥4॥
(5). प्रजा पालन के लिए पाँचवी साक्षी-पाँचवाँ चरण ::
 ॐ पंचमे पंचभूतानां, पंचप्राणैः परायणाः। तत्र दशर्नपुण्यानां, साक्षिणः प्राणपंचधाः॥ 
ॐ प्रजाभ्यां पंचपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥5॥
(6). ऋतु व्यवहार के लिए छठवीं साक्षी-छठवाँ चरण ::
 ॐ षष्ठे तु षड्ऋतूणां च, षण्मुखः स्वामिकातिर्कः। षड्रसा यत्र जायन्ते, कातिर्केयाश्च साक्षिणः॥  
ॐ ऋतुभ्यः षट्ष्पदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥6॥
(7). मित्रता वृद्धि के लिए सातवीं साक्षी-सातवाँ चरण ::
 ॐ सप्तमे सागराश्चैव, सप्तद्वीपाः सपवर्ताः। येषां सप्तषिर्पतनीनां, तेषामादशर्साक्षिणः॥ 
 ॐ सखे सप्तपदी भव सा मामनुव्रता भव। विष्णुस्त्वानयतु पुत्रान् विन्दावहै, बहूँस्ते सन्तु जरदष्टयः॥7॥ [पा.गृ.सू. 1.8.1-2; आ.गृ.सू.1.7.19]
आसन परिवतर्न :: सप्तपदी के पश्चात् आसन परिवतर्न करते हैं। तब तक वधू दाहिनी ओर थी अर्थात् बाहरी व्यक्ति जैसी स्थिति में थी। अब सप्तपदी होने तक की प्रतिज्ञाओं में आबद्ध हो जाने के उपरान्त वह घर वाली अपनी आत्मीय बन जाती है, इसलिए उसे बायीं ओर बैठाया जाता है। बायें से दायें लिखने का क्रम है। बायाँ प्रथम और दाहिना द्वितीय माना जाता है। सप्तपदी के बाद अब पत्नी को प्रमुखता प्राप्त हो गयी। लक्ष्मी-नारायण्, उमा-महेश, सीता-राम, राधे-श्याम आदि नामों में पत्नी को प्रथम, पति को द्वितीय स्थान प्राप्त है। दाहिनी ओर से वधू का बायीं ओर आना, अधिकार हस्तांतरण है। बायीं ओर के बाद पतनी गृहस्थ जीवन की प्रमुख सूत्रधार बनती है।
ॐ इह गावो निषीदन्तु, इहाश्वा इह पूरुषाः। इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ, इह पूषा निषीदतु॥ [पा.गृ.सू.1.8.10] 
पाद प्रक्षालन :: आसन परिवतर्न के बाद गृहस्थाश्रम के साधक के रूप में वर-वधू का सम्मान पाद प्रक्षालन करके किया जाता है। कन्या पक्ष की ओर प्रतिनिधि स्वरूप कोई दम्पति या अकेले व्यक्ति पाद प्रक्षालन करे। पाद प्रक्षालीन करने वालों का पवित्रीकरण-सिंचन किया जाए। हाथ में हल्दी, दूवार्, थाली में जल लेकर प्रक्षालन करें। प्रथम मन्त्र के साथ तीन बार वर-वधू के पैर पखारें, फिर दूसरे मन्त्र के साथ यथा श्रद्धा भेंट दें। 
ॐ या ते पतिघ्नी प्रजाध्नी पशुघ्नी, गृहघ्नी यशोघ्नी निन्दिता, तनूजार्रघ्नीं ततऽएनांकरोमि, सा जीयर् त्वां मया सह॥ [पा.गृ.सू.1.11] 
ॐ ब्रह्मणा शालां निमितां, कविभिनिर्मितां मिताम्। इन्द्राग्नी रक्षतां शालाममृतौ सोम्यं सदः॥ [अथर्ववेद 9.3.19]
ध्रुव-सूर्य ध्यान :: ध्रुव तारा सौरमण्डल की तुलना में स्थिर है। अन्य सब तारागण गतिशील रहते हैं, पर ध्रुव अपने निश्चित स्थान पर ही स्थिर रहता है। अन्य तारे उसकी परिक्रमा करते हैं। ध्रुव दर्शन का अर्थ है :- दोनों पति-पत्नी अपने-अपने परम पवित्र कर्त्तव्यों पर उसी तरह दृढ़ रहेंगे, जैसे कि ध्रुव तारा स्थिर है। कुछ कारण उत्पन्न होने पर भी इस आदर्श से विचलित न होने की प्रतिज्ञा को निभाया जाए, व्रत को पाला जाए और संकल्प को पूरा किया जाए। ध्रुव स्थिर चित्त रहने की ओर, अपने कर्त्तव्यों पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है। इसी प्रकार सूर्य की अपनी प्रखरता, तेजस्विता, महत्ता सदा स्थिर रहती है। वह अपने निधार्रित पथ-मार्ग पर ही चलता है, यही भावना पति-पत्नी करें।
सूर्य ध्यान (दिन में) :: ॐ तच्चक्षुदेर्वहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं, जीवेम शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः, स्याम शरदः शतं, भूयश्च शरदः शतात्। [36.24]
ध्रुव ध्यान (रात में) :: ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि, ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं त्वादात् बृहस्पतिमर्यापत्या, प्रजावती सञ्जीव शरदः शतम्। [पा.गृ.सू.1.8.19] 
शपथ आश्वासन ::  पति-पत्नी एक दूसरे के सिर पर हाथ रखकर समाज के सामने शपथ लेते हैं, एक आश्वासन देकर अन्तिम प्रतिज्ञा करते हैं कि वे निस्संदेह निश्चित रूप से एक-दूसरे को आजीवन ईमानदार, निष्ठावान् और वफादार रहने का विश्वास दिलाते हैं। 
ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि, मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु। 
मम वाचमेकमना जुषस्व, प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्  [पा.गृ.सू.1.8.8] 
सुमङ्गली-सिन्दूरदान :: मन्त्र के साथ वर अँगूठी से वधू की माँग में सिन्दूर तीन बार लगाए। भावना करें कि मैं वधू के सौभाग्य को बढ़ाने वाला सिद्ध होऊँ :- 
ॐ सुमंगलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत। सौभाग्यमस्यै दत्त्वा याथास्तं विपरेतन। 
सुभगा स्त्री सावित्र्याास्तव सौभाग्यं भवतु॥ [पा.गृ.सू.1.8.9] 
मङ्गलतिलक :: वधू वर को मंगल तिलक करे। भावना करे कि पति का सम्मान करते हुए गौरव को बढ़ाने वाली सिद्ध होऊ :-
 ‍ॐ स्वस्तये वायुमुपब्रवामहै, सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः। 
बृहस्पतिं सवर्गणं स्वस्तये, स्वस्तयऽ आदित्यासो भवन्तु नः॥ [ऋ.5.51.12]  
इसके पश्चात् स्विष्टकृत होम, पूणार्हुति, वसोधार्रा, आरती, घृत-अवघ्राण, भस्म धारण, क्षमा प्रार्थना आदि कृत्य सम्पन्न करें। अभिषेक सिञ्चन वर-कन्या को बिठाकर कलश का जल लेकर उनका सिंचन किया जाए। भावना की जाए कि जो सुसंस्कार बोये गये हैं, उन्हें दिव्यजल से सिंचित किया जा रहा है। सबके सद्भाव से उनका विकास होगा और सफलता-कुशलता के कल्याणप्रद सुफल उनमें लगेंगे। 
पुष्प वर्षा के रूप में सभी अपनी शुभकामनाएँ-आशीर्वाद प्रदान करें :- 
गणपतिः गिरिजा वृषभध्वजः, षण्मुखो नन्दीमुखडिमडिमा। 
मनुज-माल-त्रिशूल-मृगत्वचः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥1॥ 
रविशशी-कुज इन्द्र-जगत्पतिः, भृगुज-भानुज-सिन्धुज-केतवः। 
उडुगणा-तिथि-योग च राशयः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥2॥ 
वरुण-इन्द्र कुबेर-हुताशनाः, यम-समीरण-वारण-कुंजरा: । 
सुरगणाः सुराश्च महीधराः, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥3॥ 
सुरसरी-रविनन्दिनि-गोमती, सरयुतामपि सागर-घघर्रा। 
कनकयामयि-गण्डकि-नमर्दा, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥4॥ 
हरिपुरी-मथुरा च त्रिवेणिका, बदरि-विष्णु-बटेश्वर-कौशला। 
मय-गयामपि-ददर्र-द्वारका, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥5॥ 
भृगुमुनिश्च पुलस्ति च अंगिरा, कपिलवस्तु-अगस्त्य च नारदः। 
गुरुवशिष्ठ-सनातन-जैमिनी, प्रतिदिनं कुशलं वरकन्ययोः॥6॥ 
ऋग्वेदोऽथ यजुवेर्दः, सामवेदो ह्यथवर्णः। रक्षन्तु चतुरो वेदा, यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
इसके बाद विसजर्न और आशीवचर्न के पुष्प प्रदान कर कृत्य समाप्त किया जाए।
आठ प्रकार के विवाह 8 KIND OF MARRIAGES ::
(1). ब्रह्म विवाह :: दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। 
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्। 
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तितः॥मनु स्मृति 3.27॥ 
अच्छे शील, स्वभाव वाले वर को स्वयं बुलाकर उसे अलंकृत और पूजित कर देना ब्राह्म विवाह है। 
The groom who is good natured and has been a celibate, should be invited, honoured-decorated and offered the daughter as a bride, by donating to him; is Brahm Vivah-marriage.
A boy from good respectable family with good manners-nature, is invited by the parents at their place and the girl is given-donated to him (-with her consent), along with gifts and useful commodities. 
This system involved gathering of thorough information about the boy, his antecedents, family, family background, lineage, sources of income, property, education, character etc. In olden days this information was collected through the Brahmns and the barber associated with him, who used to visit various villages/towns to solemnise marriages, rites etc.
(2). दैव विवाह :: किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
Auspicious ceremonies, rituals, Yagy, ceremonies are performed and the priest is honoured.
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते। अलंकृत्य सुतादानं देवन धर्मं प्रचक्षते॥मनु स्मृति 3.28॥ 
यज्ञ में सम्यक् प्रकार से कर्म करते हुए ऋत्विज को अलंकृत कर कन्या देने को दैव विवाह कहते हैं। 
Donation of the daughter decorated-decked with ornaments by performing rituals-sacrifices in the holy fire-Hawan when the demigods are invited to be present to bless the newly weds is called Dev Vivah. The priest is duly honoured and sufficient gifts and money-Dakshina are given to him to live happily. The daughter too is given numerous gifts and money to live happily, as per one's capability. However no demands are there. There is always a middle man to bridge the negotiations.
(3). आर्श विवाह :: कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना 'अर्श विवाह' कहलाता है। 
The bride groom offers two or three pairs of cows-bulls-oxen-bullocks for religious purposes, to the girls parents.
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मत:। कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते॥मनु स्मृति 3.29॥ 
वर से एक या दो जोड़े गाय, बैल धर्मार्थ लेकर विधिपूर्वक कन्या देने को आर्ष विवाह कहते हैं। 
When the father gives away his daughter by accepting one or two pairs of cows and oxen, according to the sacred rituals for charity, this practice is termed as Arsh Vivah.
(4). प्रजापत्य विवाह :: कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है। 
You should live together as husband and wife and rituals are observed to donate the girl to the  bridegroom.
सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च। कन्याप्रदानमभ्यच्र्य प्राजापत्यो विधि: स्मृतः॥मनु स्मृति 3.30॥ 
तुम दोनों एक साथ गृहधर्म की रक्षा करो, यह कहकर और पूजन करके जो कन्यादान दिया जाता है, वह प्राजापत्य विवाह कहलाता है। 
When the father hand overs his daughter to the groom, honour him and blesses the bride groom and his daughter by saying that you should enter into marital alliance and follow the duties of the household according to the scriptures; the wedding is termed as Parajapaty Vivah.
(5). गंधर्व विवाह :: परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था।  कन्या व वर की इच्छा से हुआ विवाह-किसी साक्षी या मन्त्रों के बगैर। रोती-पीटती कन्या का अपहरण करके लाना। 
The boy and girl indulge in sexual acts without any witness, as per their own will, without the consent of parents.  Premarital sex equals marriage, says madras High Court: An unmarried adult couple will be considered married and can be termed husband and wife, if they have sex. This is Gandharv Vivah which do not need witnesses-rituals-social recognition. Dushyant and Shakuntla's case is just one out of billions, especially in the west. Experts say that it is repressive and undue emphasis on sex is obnoxious.
इच्छयाSन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्र्च वरस्य च। 
गान्दर्भ: स तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसम्भवः॥मनु स्मृति 3.32॥ 
कन्या और वर की इच्छा से दोनों का संयोग होना गान्दर्भ विवाह है। यह काम-भोग की इच्छा से होता है और मैथुन के लिये हितकर है। 
Mating-sexual intercourse through mutual consent-voluntary union for the purpose of sex satisfaction-pleasure is Gandarbh marriage. 
Western impact fuelled by internet-films-magazines-porn is polluting the minds of this generation leading to have intercourse with multiple partners before marriage. They some times call it free sex as well. Nudity, vulgarity, boldness, freedom from the parents, late marriages and eating habits are behind this. Such couple look for frequent divorces. These days a new phenomenon has emerged by the name of LIVE IN RELATIONSHIP. In olden days this was compared to prostitution. Till recently such women were called kept-Rakael.
(6). असुर विवाह :: कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।कन्या के पिता आदि व कन्या को भी यथा शक्ति धन आदि देकर, स्वछंदतापूर्वक कन्या को गृहण  करना। 
Parents as well the girl is offered money to marry the bridegroom. 
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः। 
कन्याप्रदान स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते॥मनु स्मृति 3.31॥ 
कन्या के पिता आदि को और कन्या को भी यथाशक्ति धन देकर स्वच्छन्दता पूर्वक कन्या को ग्रहण करना आसुर विवाह है। 
To marry a girl by paying off to the girl's father, kinsman and the bride her self, as per his capacity i.e., one can afford and marry the girl arbitrarily, is called Asur-demonic marriage.
ARBITRARILY :: बगैर अंकुश या रुकावट के, निरंकुश, अपनी इच्छा के अनुसार, मनमर्जी; without restriction, contingent, solely upon one's discretion. 
This is just like buying a bride, they way the Jats are indulging in Haryana. Most horrific part of it is that 3-5 brothers and some times even the father too is involved as a marriage as a partner. This is slavery. Often these girls are sold off several times. Human traffickers are involved in this affair and flash trade.
(7). राक्षस विवाह :: कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता है। 
The crying girl is abducted and raped. 
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात्। 
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यतेमनु स्मृति 3.33॥ 
बाधा डालने वालों को मारकर, घायलकर, घर के दरवाजे आदि को तोड़कर रोती हुई कन्या को घर से जबर्दस्ती हरण कर ले जाने का नाम राक्षस विवाह। 
Abduction of the weeping-protesting girl from her home by slain-killing-murder or wounded-harming kinsman-those who resist, breaking of the doors of the house for the purpose of marriage is Rakshas-demonic system of marriage.
This system is  not recognised socially or culturally. No one appreciate this system. In fact this is a taboo in Hinduism.
(8). पैशाच विवाह :: कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है। सोई हुई, मद से मस्त मतवाली (-नशा कराकर), जो कन्या पागल हो गई है, उसे गुप्त रूप से उठा कर लाना, अधम कोटि का विवाह है।
The sleeping, drugged or insane girl is abducted-worst in nature.
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यन्नोपगच्छति। स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्र्चाष्ठोSधमः॥3.34॥ 
सोई हुई, मद से मतवाली या जो पागल हो उसके साथ एकान्त से संभोग करना, विवाह में अत्यन्त निकृष्ट पापों से भरा हुआ आठवाँ पैशाच विवाह है। 
Inter course with a girl who is sleeping or under the influence of extreme sexuality-passion-intoxication or the one who is mad-insane-mental disorder amounts to the worst kind of marriage called Paeshach Vivah. 
ब्राह्म विवाह व दैव विवाह ही सर्वोत्तम हैं। शेष 6 प्रकार के विवाह निकृष्ट-अधम-अहितकारी-अशुभ हैं। 
BRAHM  AND DEV VIVAH-MARRIAGE ARE EXCELLENT, WHILE THE REMAINING 6 ARE INAUSPICIOUS.
(III). Please refer to :: MANU SMRATI (3) मनु स्मृति तृतीयोSध्यायः  Shlok (1-63) santoshkipathshala.blogspot.com    for comprehensive learning. 

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