AYURVED (1-3) आयुर्वेद

 AYURVED (1-3) आयुर्वेद  
A TREATISE  ON ANCIENT SYSTEM OF MEDICINE
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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MIRACLE AMAZING WONDER HERBS चमत्कारी जड़ी बूटियाँ ::


आयुर्वेद :: यह अथर्ववेद का उपवेद है। यह विज्ञान, कला और दर्शनपर प्रकाश डालता है। आयु+वेद=आयुर्वेद चिकित्साशास्त्र है।आयुर्वेद नाम का अर्थ है ::  जीवन का ज्ञान और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। 
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥ [च.सू.1/40]
CHAPTER (1.1) :: A number of chapters are available in Agni Puran, which describes a number of herbs-preparations, which have miraculous-wonderful curative effects, in addition to increasing life span. All these, all freely available in the market at extremely low prices. These are tried and trusted for ages, still one may subject them to clinical tests. No one should try to obtain patents, anywhere in the world, since these medicines are in use in Ayurvedic system of medicine and cure.
LONGEVITY 100-1,000 YEARS  मृत्युन्जय-योग 
सौ साल तक आयु :: (1). निम्ब के  तैल की मधु सहित नस्य लेने से मनुष्य सौ साल जीता है और उसके बाल हमेशां काले बने रहते हैं।(2). कमल गन्ध का चूर्ण भांगरे  के रस की भावना देकर मधु और घृत की साथ लेने पर सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है। (3). असगन्ध, त्रिफला, चीनी, तैल, घृत में सेवन करने वाला सौ साल तक जिन्दा रह सकता है। (4). गदहपूर्ना  का चूर्ण एक पल मधु, घृत और दुग्ध के साथ खाने वाला शतायु होता है। (5). अशोक की छाल का एक पल चूर्ण मधु और घृत के साथ दुग्धपान करने से रोग नाश होता है। (6). बहेड़े के चूर्ण को एक तोला मात्रा में शहद, घी और दूध के साथ पीने वाला शतायु होता है। (7). पिप्पली युक्त त्रिफला, मधु और घृत के साथ। (8). खांड युक्त दूध पीने से। Drinking of milk with raw sugar enhances longevity up to 100 years. (9). शर्करा, सैन्धव और सौंठ के साथ अथवा पीपल, मधु, एवं गुड़ के साथ प्रति दिन दो हर्रे का सेवन करें। 
दो सौ वर्ष की आयु :: (1). कड़वी तुम्बी के एक तोले भर तैल का नस्य दो सौ वषों की आयु प्रदान करता है। (2). सौंठ का चित्रक व विडंग के साथ प्रयोग भी लम्बी आयु दायक है। 
तीन सौ वर्ष की आयु :: (1). लौह भस्म व शतावरी को भृंगराज रस में भावना देकर मधु व घी के साथ लेने से तीन सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है।  (2). त्रिफला,पीपल और सौंठ का प्रयोग तीन सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है। (3). त्रिफला, पीपल और सौंठ का चित्रक के साथ प्रयोग भी तीन सौ वर्ष की आयु प्रदान करता है। (4) मधु (-honey), त्रिफला, घृत (-clarified butter), गिलोय।  Cures all diseases and extends life span up to 300 years, provided its added with chastity. (5). हरीतकी चूर्ण भृंगराज रस की भावना देकर एक तोले की मात्रा में घृत और मधु के साथ सेवन करने वाला रोगमुक्त होकर तीन सौ साल की उम्र तक जीता है। (6) हर्रे, चित्रक, सौंठ, गिलोय और मुसली का चूर्ण गुड़ के साथ खाने पर सभी रोगों का नाश होता है और 300 वर्ष की आयु प्राप्त होती है। 
पाँच सौ साल की आयु :: (1) ताम्र भस्म, गिलोय, शुद्ध गंधक को सामान भाग घी कुंवार के रस में घोंट कर दो-दो रत्ती की गोलियां बनायें। इनका सेवन घृत के साथ करने से पाँच सौ साल की आयु प्राप्त होती है। (2). गेठी, लोह चूर्ण, शतावरी को समान भाग से भृंगराज रस तथा घी के साथ लेने से पांच सौ वर्ष की आयु प्राप्त होती है (3). पलाश-तैल का मधु के साथ,1 तोले, दूध के साथ प्रति दिन 6 मास तक सेवन करने से आयु 5 सौ वर्ष हो जाती है। (4). बिल्व-तैल  का नस्य एक मास तक लेने से आयु  को 500 साल तक बढ़ाता है। Extends age up to 500 years. (5). त्रिफला  4 तोले (12 gm), 2 तोले  या  1 तोला।  Extends age up to 500 years.
एक सहस्त्र वर्ष की आयु :: (1) पथे के एक पल चूर्ण को मधु घृत और दूध के साथ सेवन करते हुए दुग्धान्न का भोजन करने वाला निरोग रहकर एक सहस्त्र वर्ष की आयु का उपभोग करता है।(2) कांगनी के पत्तों का रस या त्रिफला दूध के साथ लेने से 1 हजार वर्ष की आयु प्राप्त होती है। (3) शतावरी का त्रिफला, पीपल और सौंठ का प्रयोग सहस्त्र वर्ष की आयु व अत्यधिक बल प्रदान करता है। 
हजारों वर्ष की आयु :: 4 तोले शतावरी-चूर्ण (-powdered Asparagus racemosus), घृत व मधु के साथ लेने से हजारों वर्ष की आयु प्राप्त होती है।
PROTECTION FROM AGEING & DEATH अपमृत्यु और वृद्धावास्था ::  (1). भिलावा और तिल का सेवन रोग, अपमृत्यु और वृद्धावास्था  को दूर करता है। (2). 4  तोले मधु+घी+सोंठ  की 4 तोले की मात्रा का प्रति दिन प्रातः काल उपयोग  करने से व्यक्ति मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है।  Anyone who consumes around 40 grams of honey+ghee+Sounth (-dried powdered ginger), every day in the morning wins death. (3). मधु (-honey-Mel despumatus) के साथ उच्चटा (-भुईं आंवला ) को एक तोले की मात्रा में खाकर दुग्धपान करने वाला मनुष्य मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है। Death is  conquered  by the use of this combination, regularly. (4). मेउड़ की जड़ का चूर्ण या पत्र स्वरस रोग एवं मृत्यु का नाश करता है। (5). नीम (-Azadirachta indica) के पंचांग-चूर्ण को ख़ैर के क्वाथ (काढ़ा) की भावना देकर भृंगराज (-Eclipta alba) के रस  साथ एक तोला भर सेवन करने मनुष्य रोग को जीत कर अमर हो सकता है। (6). रुदन्तिका चूर्ण घृत और मधु के साथ सेवन करने से या केवल दुग्धाहार से मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है। 
झुर्रियां व बाल सफ़ेद पर रोक: ब्राह्मी चूर्ण के साथ दूध का सेवन करने चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं और बाल सफ़ेद नहीं होते व आयु वृद्धि होती है। Use of Brahmi(-Bacopa monnieri) powder with milk protect against wrinkle formation and greying of hair, in addition of boosting of age.
LONG LIFE :: त्रिफला, पीपल, सौंठ का लोह, भृंगराज, खरेटी, निम्ब-पञ्चांग, ख़ैर, निर्गुण्डी, कटेरी, अडूसा और पुनर्नवा के साथ या इनके रस की भावना देकर या इनके संयोग से बटी या चूर्ण बनाकर उसका घृत, मधु, गुड़ और जलादि के साथ सेवन करने से लम्बी उम्र की प्राप्ति होती है। 
ॐ ह्रूं स:, मन्त्र से अभिमंत्रित योगराज मृत संजीवनी के समान होता है, यह रोग व मृत्युपर विजय प्रदान करता है।
स्त्री संभोग :: उड़द, पीपल, अगहनी का चावल, जौ और गेंहू-इन सबका चूर्ण सामान मात्रा में लेकर घृत में पूरी बना लें इसका भोजन करके शर्करा युक्त दुग्ध का सेवन करें । 
स्त्री प्रिय :: आंवले के स्वरस से भावित, आंवले के चूर्ण को मधु, घृत तथा शर्करा के साथ चाट कर दुग्ध पान करें।
ॐ ह्रूं स: एवं ॐ जूं  स: मृतुन्जय मन्त्र हैं। यदि विधि-विधान के साथ इनका निरन्तर जप किया जाये तो अपेक्षित परिणाम मिलते हैं। 
CHAPTER (1.2)
This chapter will prove to be immense help to the health conscious,  if studied & practiced along with Pranayam and Longevity of this blog.
वात ज्वर :: बिल्वादि पंचमूल-बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटन, एवं अरणी का काढ़ा प्रयोग करें। 
पाचन :: पिप्पली मूल, गिलोय और सोंठ का क्वाथ प्रयोग करें।
ज्वर :: आंवला, अभया (बड़े हरै ), पीपल और चित्रक-यह आमल क्यादि  क्वाथ सब प्रकार के ज्वर का नाश करता है। 
खांसी, ज्वर, अपाचन, पार्श्व शूल और कास (-खाँसी) :: दश मूल-बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखुरू, पृष्टपर्णी, बृहती, (बड़ी कटेर ) का क्वाथ व कुश के मूल का क्वाथ-प्रयोग करें। Cough associated with fever, indigestion, extreme one side stomach pain.
वात और पित्त ज्वर :: गिलोय, पित्त पापड़ा, नगर मोथा, चिरायता, सौंठ-यह पञ्च भद्र क्वाथ, वात और पित्त ज्वर में देना चाहिये।
विरेचक व सम्पूर्ण ज्वर :: निशोथ, विशाला (इंद्र वारुणी ), कुटकी, त्रिफला, अमलतास का क्वाथ यवक्षार मिला कर पिलायें।  
COUGH CURE-कास रोग (-खांसी) :: (1). देवदारु,खरेठी, अडूसा, त्रिफला, व्योष (-सौंठ, काली मिर्च, पीपल), पद्द्काष्ठ, वाय विडंग और मिश्री सभी सामान भाग में, (2). अडूसे का रस, मधु और ताम्र भस्म सामान मात्र में लें। A  combination of these in equal quantity cures, 5 different kinds of cough.
HEART TROUBLE-ह्रदय रोग, गृहणी, हिक्का, श्र्वाष, पार्श्व रोग व कास रोग ::  दशमूल,कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकर मूल, काकड़ा सिंगी, भुई आंवला, भार्गी, गिलोय और पान इनसे विधि वत सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागू का पान करें। Heart trouble, hiccups, pain in one side of stomach, cough, breathing.
हिक्का-हिचकी :: मुलहठी (-चूर्ण), के साथ पीपल, गुड के साथ नागर और तीनों नमक (-सैंधा नमक, विड नमक, काला नमक)। 
अरुचि रोग :: कारवी अजाजी (-काला जीरा, सफ़ेद जीरा), काली मिर्च, मुन्नका, वृक्षाम्ल (-इमली), अनारदाना, काला नमक और गुड़, इन्हें समान भाग में मिला कर चूर्ण को शहद के साथ निर्मित कारव्यादी बटी का सेवन करें।  
अरुचि, कास रोग (-खांसी), श्र्वाष, प्रति श्याय (-जुकाम) और कफ विकार :: अदरक के रस के साथ मधु इनका  का नाश करते हैं। Lose of taste, cough, difficulty in breathing, sneezing.
VOMITING AND THIRST-प्यास और वमन-उल्टी :: वट-वटा ङ्कुर, काकड़ा सींगी,  शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहटी के चूर्ण में सामान भाग में मिश्री मिला कर मधु के साथ अवलेह (चटनी) बनायें तथा चावल के पानी के साथ लें। Thirst, vomiting.
कफ युक्त रक्त, प्यास, खांसी एवं ज्वर :: गिलोय, अडूसा, लोध और पीपल को शहद के साथ प्रयोग करें। Fever, cough, thirst and sputum with blood.
SNAKE POISONING & COUGH CURE :: सर्प विष व कास: शिरीष पुष्प  के स्वर रस में भावित सफेद मिर्च लाभ प्रद हैं।
CURE FROM PAIN वेदना-दर्द-पीड़ा :: मसूर सभी प्रकार की वेदना को नष्ट करता है। 
पित्त दोष :: चौंराई का साग।  
PROTECTION FROM POISONING-विष नाशक :: मेउड़, शारिवा, सेरू  और अङ्कोल। 
मूर्छा, मदात्यय रोग: सौंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकर मूल, पीपला मूल और पीपल का क्वाथ।  
उन्माद :: हींग, काला नमक एवं व्योष (सौंठ, मिर्च, पीपल), ये सब दो दो पल लेकर 4 सेर घृत और घृत  से 4 गुनी मात्रा  में गौ मूत्र में सिद्ध करने पर  प्रयोग करें। 
उन्माद और अपस्मार रोग का नाश व मेधा वर्धक :: शंख पुष्पी, वच, और मीठा कूट से सिद्ध ब्राह्मी रस को मिला कर इनकी गुटिका बना लें। 
LEPROSY कुष्ठ  नाशक :: (1). हर्रे, भिलावा, तेल, गुड़ और पिंड खजूर। (2). वाकुचि को तिलों के साथ एक वर्ष तक खाया जाये तो, वह साल भर में कुष्ठ रोग दूर कर देती है। (3). परवल की पत्ती , त्रिफला, नीम की छाल, गिलोय, पृश्र्निपर्णी, अडूसे  के पत्ते के साथ तथा करज्ज-इनको सिद्ध करने वाला घृत। यह वज्रक कहलाता है।  
(4). हर्रे के साथ पंचगव्य या घृत का प्रयोग। इस उपाय से कुष्ठ, अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्त रोग और बीस प्रकार के क़फ़ रोग, खांसी, पीनस (-बिगड़ा जुकाम) ठीक हो जाते हैं। (5). वाचुकी के पञ्चांग  के चूर्ण को खैर  (कत्था )-के क्वाथ के साथ 6 माह  तक प्रयोग करने से कुष्ठ पर काबू हो जाता है। 
 (1). नीम की छाल, परवल, कंटकारी-पंचांग, गिलोय और अडूसा-इन सबको दस दस पल लेकर कूट लें । 16 सेर पानी में क्वाथ बनाकर उसमें सेर भर घृत और 20 तोले त्रिफला चूर्ण का कल्क बनाकर डाल दें और चतुर्थांश शेष रहने तक पकाएं। (2). त्रिकुट युक्त घृत को तिगुने पलाश भस्म-युक्त जल में सिद्ध करके पीना है। (3). पाठा, चित्रक, हल्दी, त्रिफला और व्योष (-सौंठ, मिर्च, पीपल) इनका चूर्ण तक्र के साथ पीने से अथवा (4). गुड़ के साथ हरीतकी खाने से अर्श रोग दूर होता है। 
उपदंश की शांति : त्रिफला के क्वाथ या भ्रंग राज के रस से व्र णों को धोयें। परवल की पत्ती के चूर्ण  के साथ अनार की छाल या गज पीपर या त्रिफला का चूर्ण उस पर छोड़ें ।
PROTECTION FROM VOMITING वमन :: त्रिफला, लोह्चूर्ण, मुलहटी, आर्कव, (-कुकुरमांगरा ), नील कमल, कालि मिर्च और सैन्धव नमक सहित पकाये हुए तैल  के मर्दन से वमन की शांति होती है । 
वमन कारक: मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैया की छाल का कल्क और नीम का क्वाथ घौंट देने वमन कारक होता है। 
PREVENTION FROM GREYING HAIR-बाल पकने-सफ़ेद होने से रोकना :: दूध, मार्कव-रस, मुलहटी और नील कमल, इनकी दो सेर मात्रा को  पका  कर एक पाव तैल में बदल कर नस्य का प्रयोग करें। 
ज्वर, कुष्ठ, फोड़ा, फुंसी, चकत्ते :: नीम की छाल, परवल की पत्ती , गिलोय, खैर की छाल, अडूसा या चिरायता, पाठा , त्रिफला और लाल चन्दन। Fever, leprosy, boils, spots.
ज्वर और विस्फोटक रोग :: परवल की पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्त पापड़ा-इनके क्वाथ में खदिर मिलाकर लिया जाये। 
ज्वर, विद्रधि तथा शोथ :: दश मूल, गिलोय, हर्रे, गधह पूर्णा,  सहजना  एवं सौंठ । 
व्रण शोधक : महुआ और नीम की पत्ती  का लेप।  
बाह्य शोधन :: त्रिफला (हेड़, बहेड़ा, आंवला), खैर (कत्था), दारू हल्दी, बरगद की छाल , बरियार, कुशा, नीम के पत्ते तथा मूली के पत्ते का क्वाथ। 
घाव के क्रमि नष्ट करना :: करंज , नीम, और मेउड़  का रस। Destruction of worms in wound. 
व्रण रोपण: धय का फूल, सफ़ेद चन्दन, खरेठी,  मजीठ , मुलहठी, कमल, देवदारु तथा मेद घाव को भरने वाले हैं। 
नाड़ी व्रण, दुष्ट व्रण, शूल और भगन्दर :: गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सौंठ, मिर्च, पीपर  इन सबको समान भाग में पीस कर घृत में मिला कर प्रयोग करें। 
कफ और वात रोग :: गौ मूत्र में भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हर्र) को रेडी के तेल में भून कर सैंधा नमक के साथ प्रात प्रति दिन प्रयोग करें। ऐसी हरितकी कफ व वात से होने वाले रोगों को नष्ट करती है।
कफ प्रधान व वात प्रधान प्रकृति वाले मनुष्यों के लिए :: सौंठ, मिर्च, पीपल और त्रिफला का क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीने से विरेचन का काम करता है और  कफ वृधि को रोकता है। 
आम वात नाशक ::   पीपल, पीपला मूल, वच, चित्रक व सौंठ का क्वाथ या पेय बनाकर पीयें।
वात एवं संधि, अस्थि एवं मज्जा गत, आमवात: रास्ना, गिलोय, रेंडकी की छाल, देवदारु और सौंठ का क्वाथ में पीना चाहिये अथवा सौंठ के जल के साथ दशमूल का क्वाथ पीना चाहिये।
आम वात, कटिशूल और पांडु रोग :: सौंठ,एवं गोखरू का क्वाथ प्रतिदिन प्रात: सेवन करना है। शाखा एवं पत्र सहित प्रसारिणी (छुई मुई ) का तैल भी इस रोग में लाभप्रद है। 
वातरक्त रोग :: गिलोय का स्वरस, कल्क, चूर्ण या क्वाथ का दीर्घ काल तक प्रयोग करना चाहिए।
वातरक्त नाशक :: वर्धमान पिप्पली या गुड़ के साथ हर्रे का सेवन करना चाहिए।  
वातरक्त-दाहयुक्त रोग :: पटोल्पत्र, त्रिफला, राई, कुटकी, और गिलोय का पाक तैयार करें। 
वातजनित पीड़ा :: गुग्गुल को ठन्डे-गरम जल से, त्रिफला को सम शीतोष्ण जल से अथवा खरेठी, पुनर्नवा, एरंड मूल, दोनों कटेरी, गोखरू, का क्वाथ, हींग  तथा लवण  के साथ। एक तोला पीपला मूल,सैन्धव, सौवर्चल, विड्, सामुद्र एवं औद्भिद-पाँचों नमक, पिप्पली, चित्ता, सौंठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, शीतला, दंती, स्वर्ण क्षीरी (सत्य नाशी) और काकड़ा सिंगी-इनकी बेर के बराबर गुटिका बनायें और कांजी के साथ सेवन करें-शोथ तथा उससे हुए में भी इसका सेवन करें। उदर वृद्धि में निशोथ का प्रयोग न करें। 
गलगंड और गलगंड माल :: फूल प्रियंगु, कमल, सँभालू, वायविडंग, चित्रक, सैंधव लवण, रास्ना, दुग्ध, देवदारु और वच से सिद्ध चौगुना कटु द्रव्य युक्त तैल मर्दन करने से (-या जल के साथ ही पीसकर लेप करने से)। 
क्षय रोग-TUBERCULOSIS :: (1). कचूर, नागकेसर, कुमुद का पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीर विदारी, पीपल और अडूसा का कल्क दूध के साथ पका  कर लेने से लाभ होता है। (2). शतावरी, विदारीकंद, बड़ी हर्रे, तीनों खरेटी, असगन्ध, गदहपूर्णा और गोखरू का चरण शहद और घी के साथ चाटना चाहिये। 
गुल्म रोग, उदर रोग, शूल और कास रोग :: वचा, विडलवण, अभया (बड़ी हर्रे), सौंठ, हींग, कूठ, चित्रक और अजवाइन, इनके क्रमश: दो, तीन, छ:, चार, एक, सात, पाँच और चार भाग ग्रहण करके चूर्ण बनायें।  
गुल्म और पलीहा :: पाठा, दन्ती  मूल, त्रिकटु (-सौंठ, मिर्च, पीपल) त्रिफला और चित्ता  का चूर्ण गौमूत्र के पीस कर गुटिका बनालें। 
वात-पित्त :: अडूसा, नीम और परवल के साथ। 
PROTECTION FROM WORMS कृमि नाशक :: (1) वाय विडंग का चूर्ण शहद के साथ(2) विडंग, सैंधा नमक, यव क्षार एवं गौमूत्र के साथ हर्रे भी लेने पर। 
रक्तातिसार : शल्लकी (-शाल विशेष), बेर, जामुन, प्रियाल, आम्र और अर्जुन इन वृक्षौं की छाल का चूर्ण बना कर मधु में मिला कर दूध के साथ लेना है। 
DYSENTERY  DIARRHOEA अतिसार :: कच्चे बेल का सूखा गूदा, आम की छाल, धाय का फूल, पाठा, सौंठ और मोच रस (कदली स्वरस )-इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना लें गुड मिश्रित तक्र के साथ पीयें।
गुद  भ्रंश रोग :: चान्गेरी, बेर, दही का पानी, सौंठ और यवक्षार-इनका घृत सही क्वाथ पीने से। 
प्रदर रोग :: मजीठ, धाय के फूल, लोध, नील कमल-इनको दूध के साथ स्त्रियों को लेना चाहिये।
प्रदर रोग नाशक :: पीली कट सरैया, मुलहठी और चन्दन। 
PROTECTION OF FETUS गर्भ स्थिर करना :: श्वेत कमल  और नील कमल की जड़ तथा मुलहठी, शर्करा और तिल-इनका चूर्ण गर्भपात की आशंका होने पर गर्भ को स्थिर करने में सहायक है। 
शिरो रोग का नाश :: देव दारू, अभ्रक, कूठ, खस और सौंठ-इनको कांजी में पीस कर तैल मिला कर, लैप करने से शिरोरोग का नाश होता है। 
कर्ण शूल शमन :: सैन्धव-लवण को तैल में सिद्ध करके छान लें-हल्का गरम तैल कान में डालने से फायदा होगा। 
कर्णशूल हारी :: लहसुन, अदरक, सहजन और केला-इनमें से प्रत्येक का रस कर्णशूल हारी है। 
तिमिर रोग नाशक :: बरियार, शतावरी, रास्ना, गिलोय, कटसरैया और त्रिफला-इनको सिद्ध करके घृत का पान या इनके सहित घृत का उपयोग। 
आँखों (-चक्षुश्य), ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक :: (-त्रिफला, त्रिकुट एवं सेंधव नमक-इनसे सिद्ध किये हुए घृत का पान-आँखों, ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक-के लिए हितकर है।  
दिनौंधी, रतौंधी :: गाय के गोबर के रस के साथ नील कमल के पराग की गुटिका का अंजन। 
विरेचक :: (1). खूब चिकना तथा रेड़ी-जैसे तैल से स्निग्ध किया गया या पकाया गया हुआ यव का पानी विरेचक होता है। इसका अनुचित प्रयोग मंदाग्नि, उदार में भारीपन और अरुचि को उत्पन्न करता है। (2). निशोथ एवं गुड़ के साथ त्रिफला का क्वाथ। 
GENERAL PROTECTION FROM ALL DISEASES सर्व रोग नाशक व विरेचक ::  (1) हर्रे, सैन्धव लवण और पीपल-इनके समान भाग का चूर्ण गर्म जल के साथ लें। यह नाराच-संज्ञक चूर्ण सर्व रोग नाशक है। (2) कलौंजी। 
CHAPTER  (1.3) :: 36 VITAL HERBS
These herbs are divine in effect and may boost-prolong, limitless life span, if used under controlled conditions and specifications. Asceticism-chastity is an essential requirement. These herbs are said to have been used by Brahma Ji, Rudr and Indr. ब्रह्मा, रूद्र और इंद्र द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली अमरीकरण प्रदायक औषधियाँ :- हरीतकी (-हर्रे), अक्षधात्री (-आंवला), मरीच (-गोल मिर्च), पिप्पली-छोटी, शिफा (-जटा मांसी), वह्नि (-भिलावा), शुण्ठी (सौंठ), पीपल-बड़ी, गुडुची (गिलोय), वच, निम्ब, वासक (अडूसा), शतमूली (शतावरी), सैंधव (सेंधा नमक), सिंधुवार, कंटकारी (-कटेरी), गोक्षुर (-गोखरू), बिल्व (बेल), पुनर्नवा (-गदह पूर्णा), बला  (-बरियारा), रेंड, मुण्डी, रुचक (-बिजौरा-नींबू), भ्रंग (-दालचीनी), क्षार (-खारा नमक या यव क्षार), पर्पट (-पित्त पापड़ा), धन्याक (धनिया), यवानी (अजवाइन), जीरक (-जीरा), शत पुष्पी (-सौंफ), विडंग (-वाय विडंग), खदिर (-खैर), कृत माल (-अमलतास), हल्दी, वचा, सिद्धार्थ (-सफ़ेद सरसों)। 

CHAPTER (1.4)
अनुक्रम 
     औषधियों  की नामावली
उपयोगी
    प्रथम चतुष्क 

    विशेष संकेत 
    1 
भृंग राज 
   ऋत्विज 16
       2 
सहदेवी 
    वह्नि 3 गुण 
 3     मयूर शिखा
नाग 8
 4  
पुत्र जीवक 
  पक्ष   2  नेत्र 

धूप-उद्वर्तन 
  द्वितीय चतुष्क 
    विशेष संकेत 
  5 
अध: पुष्पा 
   मुनि 7 शैल 
     6 
रुदंतिका 
    मनु 14 इंद्र 

कुमारी 
  शिव 11
   8 
रूद्र जटा 
वसु 8

अनुलेप 
   तृतीय चतुष्क 
    विशेष संकेत 
  9 
विष्णु क्रांता 
 दिशा 10
    10 
श्वेतार्क 
  शर 5
  11
लज्जालुका 
      वेद 4 युग़ 
 12 
मोह्लता 
   ग्रह 9

अञ्जन 
    चतुर्थ चतुष्क 
   विशेष संकेत 
  13 
कृष्ण धत्तूर 
  ऋतु 6
14 
गोरक्षक कर्कटी
सूर्य 12
     15 
मेष श्रंगी
चंद्रमा 1
       16 
स्नुही 
तिथि 15

स्नान 

धूप व उबटन रूद्रजटा, गोरख ककड़ी, मेढ़ा सिंगी-इनको पीस कर धूप में प्रयोग करें। 
धूप व उबटन : भृंगराज (-भँगरैया), सहदेवी (-सह्देइया), मयूर शिखा (-मोर की शिखा), पुत्र जीवक की छाल-इनके चूर्ण से धूप  बनायें अथवा पानी के साथ पीस कर उत्तम उबटन बनायें और अपने अंगों में लगायें।
अंजन : अपराजिता (-विष्णु क्रांता ), श्वेतार्क, लाजवंतीलता (-लज्जालुका) और मोहलत से अंजन तैयार कर आँखों में लगायें।  
स्नान : कृष्ण धत्तूर (-काला धतूरा), गोरक्षक कर्कटी (-गोरख ककड़ी), मेष श्रंगी (-मेढ़ा सिंगी) और स्नुही (-सेंहुड) से मिश्रित जल से स्नान करना चाहिये।
उबटन या अनुलेपन : अध: पुष्पा, रुदंतिका (-रूद्र दंती), कुमारी और रूद्रजटा को पीस कर अनुलेपन या उबटन बनायें। 
सम्मोहन-HYPNOSIS :: (1). ऋत्विक् ((भँगरैया), वेद (लाजवंती), ऋतु (काला धतुरा) तथा नेत्र (पुत्र जीवक) इन औषधियों से तैयार किया गया चन्दन का  तिलक, सब लोगों को मोहित करने वाला होता है। 
(2). तिथि (सेंहुड), दिक् (अपराजिता), युग (लाजवंती) और बाण (श्वेतार्क); इन औषधियों के द्वारा बने गई गुटिका (गोली) लोगों को वश में करने वाली होती है। भक्ष्य-भोज्य-पेय पदार्थ में एक गोली मिला दें। 
(3). ग्रह (मोह्लता), अब्धि (अध: पुष्पा), सूर्य (गोरक्षक कर्कटी) तथा त्रिदश (काला धतुरा); इन औषधियों द्वारा बनाई बटी सब को वश में करने वाली होती है (-SEDATIVE)। 
स्त्री वश में करना-SUBJECTION OF WOMAN  :: (1). सूर्य (-गोरख ककड़ी), त्रिदश (-काला धतुरा), पक्ष (-पत्र जीवक) और  पर्वत (अध: पुष्पा)-इन औषधियों का अपने शरीर पर लेपन करने स्त्री वश में हो जाती है। 
(2). चंद्रमा (-मेढ़ा सिंगी), इंद्र (-रुदंतिका), नाग(-मोरशिखा), रूद्र (-घी कुंआर)-इन औषधियोँ  को योनि में लेप करने से स्रियाँ वश में होतीं हैं।
सुख पूर्वक प्रसव-COMFORTABLE-EASY DELIVERY :: त्रिदश (काला धतुरा), अक्शि (पुत्र जीवक), शिव (घृत कुमारी), और सर्प (मयूर शिखा)-से उपलक्षित दवाओंका लेप करने से स्त्री सुख पूर्वक प्रसव कर सकती है। 
जुए में विजय-VICTORY IN GAMBLING :: सात (अध: पुष्पा), दिशा (अपराजिता), मुनि (अध: पुष्पा), तथा रंध्र (मोहलता) का लेपन वस्त्र में करने से जुए में विजय प्राप्त होती है। 
पुत्रोत्पत्ति-BIRTH OF SON :: काला धतुरा, नेत्र (-पुत्र जीवक), अब्धि (-अध: पुष्पा) तथा मनु (-रुदंतिका)-से उपलक्षित औषधियो का लिंग पर लेप करके रति करने पर जो गर्भाधान होता है, उससे पुत्र की उत्पत्ति होती है। 
अस्त्र शस्त्रों का स्तम्भन-NEUTRALISING/PROTECTION FROM ASTR-SHASTR :: ऋतविक (भंगरैया), ग्रह (मोह्लता), नेत्र (पुत्र जीवक) तथा पर्वत (अध: पुष्पा)-इन औषधियो को मुँह में धारण करने से अस्त्र शस्त्रों का स्तम्भन हो जाता है-वे आघात नहीं कर पाते।  
दुर्भगा से सुभगा :: तीन (-सहदेइया),  सोलह (-भंगरैया), दिशा (-अपराजिता) तथा बाण (-श्वेतार्क)-इन औषधियों का लेप करने से दुर्भगा स्त्री सुभगाबन जाती है।
सर्प क्रीडा :: त्रिदश (-काला धतुरा), अक्षि (-पुत्र जीवक), दिशा (-विष्णु क्रांता ) और नेत्र (-सह्देइया)-इन दवाओं का अपने शरीर पर लेप करने से मनुष्य सर्पों के साथ क्रीडा कर सकता है।   
CHAPTER (1.5) TREATMENT OF SNAKE BITE साँप  के काटे  का इलाज 
विष के पहले वेग में रोमांच, दूसरे वेग में पसीना, तीसरे में शरीर का काँपना, चौथे में श्रवण शक्ति का अवरुद्ध होना, पांचवें में हिचकी आना, छटे  में ग्रीवा लटकना, सातवें में प्राण निकलना। 
अवस्था 1 :: आँखों के आगे अँधेरा छा  जाये और शारीर में बार-बार जलन होने लगे, तो यह जानना चाहिये कि, विष त्वचा में है। आक की जड़, अपा मार्ग, तगर और प्रियंगु-को जल में घोंट कर पिलाने से विष शांत हो सकता है।
अवस्था 2 ::  त्वचा से रक्त में विष पहुँचने पर दाह और मूर्च्छा आने लगती  है व शीतल पदार्थ अच्छा लगता है। उशीर (खस), चन्दन, नीलोत्पल, सिंदुवार की जड़, धतूरे की जड़, कूट, तगर, हींग और मिर्च को पीसकर देना चाहिये। अगर इससे बाधा शांत न हो तो भटकैया, इन्द्रायण की जड़ और सर्पगंधा को घी में पीसकर देना चाहिए। इससे भी शांत न हो तो, सिंदुवार और हींग का नस्य देना चाहिये और पिलाना चाहिये। इसी का अंजन और लैप भी करना चाहिये, इससे रक्त में विष बाधा शांत हो जाती है। 
अवस्था 3 :: रक्त से पित्त में विष पहुँचने पर पुरुष उठ-उठ कर गिरने लगता है, शरीर पीला पड़ जाता है, सभी दिशाएँ पीली दिखती हैं। शरीर में दाह और प्रबल मूर्च्छा आती है-इस अवस्था में -पीपल, शहद, महुआ, घी, तुम्बे की जड़, इन्द्रायण की जड़ को गो मूत्र में पीसकर नास्य, लेपन तथा अंजन करने विष का वेग हट जाता है।
अवस्था 4 :: पित्त से विष के कफ़ में प्रवेश करने पर शरीर जकड जाता है, श्वास भली भांति नहीं आती, कंठ में घर-घर शब्द होने लगता है, मुहं से लार गिरने लगती है-पीपल, मिर्च, सौंठ, श्लेष्मातक (-बहुबार वृक्ष), लोध, एवं, मधुसार को सामान भाग में पीसकर गौमूत्र में लेपन और अंजन और पिलाना भी चाहिए। ऐसा करने विष का वेग शांत हो जाता है।
अवस्था  5 :: कफ से वात में विष प्रवेश करने पर पेट फूल जाता है, कोई भी पदार्थ दिखाई नहीं पड़ता, द्रष्टि भंग हो जाती है-ऐसा होने पर : शोणा (सोनागाछा) की जड़, प्रियाल, गज पीपल, भ्रंगी ,वचा, पीपल, देवदारु, महुआ, मधुसार, सिंदुवार और हींग-इन सब को पीस कर गोली बना कर रोगी को खिलाएं एवं अंजन और लेपन करें। यह सभी विषों का हरण करती है।  
अवस्था  6 :: वात से मज्जा  में विष पहुँच जाने पर द्रष्टि नष्ट हो जाती है, सभी अंग बेसुध हो शिथिल हो जाते हैं। ऐसा लक्षण होने पर घी, शहद, शर्करा युक्त, खस और चन्दन को घोंट कर पिलाना चाहिये और नस्य भी देना चाहिए। ऐसा करने विष का वेग हट जाता है।
अवस्था 7 :: मज्जा से मर्म स्थानों पर विष पहुँचने पर सभी इन्द्रियां निश्चेष्ट हो जाती हैं और मरीज धरती पर गिर पड़ता है। काटने से रक्त नहीं निकलता, केश उखड़ने पर कष्ट नहीं होता-रोगी को म्रत्यु आधीन ही समझना चाहिये। जिसके पास सिद्ध मन्त्र और औषधि होगी वही इलाज कर पायेगा : (i). मोर का पित्त, मार्जार का पित्त और गंध नाड़ी की जड़, (ii). कुंकुम, तगर, कूट, कास मर्द की छाल तथा  (iii) उत्पल, कुमुद और कमल-इन तीनों के केसर-सभी का समान भाग लेकर उसे गोमूत्र में पीस कर  नस्य दें, अंजन लगाएं। यह मृत संजीवनी औषधि है। 
CHAPTER (1.6) HERBAL TREATMENT FOR INFANTS-CHILDREN 
शिशु चिकित्सा-बालोषधि 
अतिसार तथा  माता के दूध दोषों में :: अडूसा, मुलहठी या कचूर, दोनों प्रकार की हल्दी और इन्द्रयब। 
खांसी, वमन, और ज्वर: पीपल और अतीस के साथ काकड़ा श्रंगी का अथवा केवल अतीस का चूर्ण मधु के साथ चटायें। 
वाक शक्ति, रूप संपत्ति, आयु, बुद्धि और कांति :: दुग्ध, घृत अथवा तैल के साथ वच का सेवन अथवा मुलहठी और शंख पुष्पि के साथ दुग्धपान। 
बुद्धि वर्धक :: वच, कलिहारी, अडूसा, सौंठ, पीपल, हल्दी, कूट, मुलहठी और सैंधव का चूर्ण प्रात: काल चटायें ।
कृमि रोगों का नाश :: देव दारू, सहजन, त्रिफला और नागर मोथा का क्वाथ अथवा पीपल और मुनक्का  का कल्क। 
नेत्र रोग :: शुद्ध रांगे को त्रिफला, भ्रंग राज तथा अदरख के रस या मधु घृत में अथवा भेड़ या गौमूत्र में अंजन।
नाक से बहने वाला रक्त : दूर्वा रस का नस्य।
कर्ण शूल नाशक व ओष्ठ रोग : (1). लहसुन, अदरख और सहजन का रस कान में डालना। (2). केवल अदरख का रस कान में डालना होगा। 
दन्त पीड़ा :: जायफल, त्रिफला, व्योष (-सौंठ, मिर्च, पीपल), गौमूत्र, हल्दी, गौ दुग्ध तथा बड़ी हर्रे  के कल्क  से सिद्ध किये हुए तिल के  तैल से कुल्ला करना।
जिव्हा रोग नाशक :: कांजी, नारियल का पानी, गौमूत्र, सुपारी तथा सौंठ के क्वाथ को कवल मुख में रखना होता है।    
haritaki tree
हरीतकी 
गल गंड रोग व गंड माला :: कलिहारी के कल्क (-पिसे हुए) में निगुण्डी  के रस के साथ सिद्ध किया हुआ तैल का नस्य नाक में डालना। 
सभी चर्म रोग :: आक, काटा, करंज, थूहर, अमलतास और चमेली के पत्तों के साथ गौमूत्र का उबटन लगाना है।
प्रमेह रोग :: (1) त्रिफला, दारुहल्दी, बड़ी इन्द्रायण और नागर मोथा-इनका क्वाथ या (2) आंवले का रस, हल्दी, कल्क और मधु के साथ पीना चाहिये। 
प्लीहा रोग :: पिप्पली का प्रयोग करें। 
वातरक्त :: अडूसे की जड़, गिलोय और अलमतास के क्वाथ में शुद्ध अरण्ड का तेल मिलकर पीयें।  
पेट रोग :: थूहर के दूध में अनेक बार भावना दी हुई पिप्पली उपयोगी है। 
अरुचि रोग : चित्रक, त्रिकुट, विडंग के क्लक से सिद्ध दूध का सेवन हितकारी है।
ग्रहणी, अर्श, पाण्डु, गुल्म,और कृमि रोगों का इलाज :: (1). पीपला मूल, वच, हर्रे, पीपल और विडंग को घी में मिलाकर सेवन करें  या (2). तक्र का एक मास तक सेवन करें।
कामला सहित पाण्डु रोग :: त्रिफला, गिलोय, अडूसा, कुटकी, चिरायता। इनका क्वाथ शहद के साथ पीने से रोग दूर होता है। 
रक्त-पित्त रोग :: (1). अडूसे का रस मिश्री और शहद मिलाकर लाइन से या (2). शतावरी, दाख, खरेटी और सौंठ का सिद्ध किया हुआ दूध पीने से लाभ होगा। 
विदृधि की गाँठ को पकाना :: हरे, सहजन,करञ्ज, आक, दालचीनी, पुनरर्वा, सौंठ और सैंधव को गौ मूत्र के मिलाकर लेप करें। 
भगन्दर ::  निशोथ, जीवन्ती, दन्तीमूल, मजिष्ठा, दोनों हल्दी, रसांजन और नीम के पत्ते का लेप करना चाहिये। नासूर शोधन: अमलतास, हरिद्रा, लाक्षा, और अडूसा के चूर्ण को गौ घृत और शहद के साथ बत्ती बनाकर नासूर में देवें। 
घाव :: (1). पीपली, मुलहटी, हल्दी, लोध, पद्मकाष्ठ, कमल, लाल चन्दन एवं मिर्च को गौ दुग्ध में सिद्ध किया हुआ तैल इस्तेमाल करें। (2). श्री ताड़ कपास की पत्तियों की भस्म, त्रिफला, गोलमिर्च, खरेटी और हल्दी का गोल बनाकर घाव का स्वेदन करे और इन औषधियों के तेल को घाव पर लगायें। 
व्रण :: (1). दूध के साथ कुम्भी सार-गुग्गल का सार, आग पर जलाकर वर्ण पर लेप करें। (2). गुग्गल सार को दूध में मिलकर आग से जले हुए व्रण पर लेप करें। (3). जलकुम्भी को जलाकर दूध में मिलाकर लगाने से सभी प्रकार के व्रण टेक हो जाते हैं। (4). नारियल के जड़ की मिट्टी में घृत मिलाकर सेक  करने से व्रण का नाश होता है। 
अतिसार :: सौंठ, अजमोद, सैंधा नमक, इमली की छाल, इन सबके समान भाग हर्रे को तक्र या समान भाग जल के साथ पीना चाहिये। 
आम सहित अतिसार-रक्तातिसार : इंद्रयव, अतीस, सौंठ, बेलगिरी नागरमोथा का क्वाथ। 
उदरशूल :: (1). ठंडे थूअर में सैंधा नमक भरकर आग में जला लें और यथोचित मात्रा को गर्म जल के साथ ग्रहण करें। (2). सैंधा नमक, हींग, पीपल, हर्रे का प्रयोग गर्म जल के साथ। 
प्यास :: (1). वरकी वरोह, कमल और धान की खील के चूर्ण को शहद में भिगोकर, कपड़े की पोटली में रखकर चूसें। (2). कुटकी, पीपल, मीठा कूट एवं धान का लावा मधु के साथ मिलाकर पोटली में रखकर मुँह में रखें और चूसें। 
मुखपाक-रोग :: पाठा, दारू हल्दी, चमेली के पत्र, मुनक्का की जड़ और त्रिफला का क्वाथ बनाकर उसमें शहद मुँह में रखें।
PROTECTION FROM THROAT TROUBLE कण्ठरोग :: पीपल, अतीस, कुटकी,इन्द्रयव, देवदारु, पाठा और नगर मोथा -इनका गौ मूत्र में बना क्वाथ मधु के साथ लेने पर सभी कण्ठ रोगों का नाश करता है।  
मूत्र कृच्छ् :: हर्रे, गोखरू, जवासा, अमलतास एवं पाषाण-भेद; इनके क्वाथ में शहद मिलाकर पीने से कष्ट दूर होता है। 
अश्मरी रोग :: बाँस का छिलका, वरुण की छाल का क्वाथ शर्करा के साथ उपयोग करें।
श्लीपद रोग :: शाखोटक (-सिंहोर)  की छाल का क्वाथमधु और दुग्ध के साथ पान करें। 
पाद रोग नाशक :: उड़द, मदर की पत्ती तथा दूध, तैल, मोम एवं सैंधव लवण का योग  पाद रोग नाशक है। 
मलबन्ध रोग :: (1). सौंठ, काला नमक और हींग या (2). सौंठ के रस के साथ सिद्ध किया गया घी अथवा (3). इनका क्वाथ पीने से मलबन्ध दोष और तत्सम्बन्धी रोग नष्ट होते हैं। 

गुल्मरोगी :: (1). सर्जक्षार, चित्रक, हींग और अजमोद के रस के साथ या (2). विडंग और चित्रक के रस के साथ तक्र पान करें। 
विसर्परोग :: (1). आँवला, परवल और मूँग के क्वाथ का घी के साथ सेवन करें। (2). सौंठ, देवदारु और पुननर्वा या बन्सलोचन का दूधयुक्त क्वाथ प्रयोग करें। 
वमनकारक-उलटी कराना :: वच और मैनफल के क्वाथ का जल। 
झुर्रियों से मुक्ति :: भृंगराज के रस में भावित त्रिफला सौ पल, बायविडंग और लोहचूर दस भाग एवं शतावरी, गिलोय और चिचक पच्चीस पल ग्रहण करके उसका चूर्ण बना कर घी, मधु और तेल के साथ चाटना  चाहिये। इससे झुर्रियाँ नहीं होती और बाल नहीं पकते। 
मधु और शर्करा के साथ त्रिफला का सेवन सर्व रोग नाशक है। 
त्रिफला और पीपल का मिश्री, मधु और घी के साथ भक्षण पूर्वोक्त सभी फल-लाभ देता है। 
जपा-पुष्प को थोड़ा मसलकर जल में मिला लें उस जल को थोड़ी सी मात्रा में तेल में मिला देने पर तेल घृताकार हो जाता है। बिल्ली की गर्भ की झिल्ली की धूप से चित्र दिखलाई नहीं देता। फिर शहद की धूप देने से पूर्ववत दिखाई देने लगता है। पाकड़ की जड़, कपूर, जोंक और मेंढक का तेल पीसकर दोनों पैरों में लगाकर मनुष्य जलते हुए अंगारों पर चल सकता है। 
चमत्कारिक-सिद्धि देने वाली जड़ी-बूटी :: गुलतुरा (-दिव्यता के लिए), तापसद्रुम (-भूतादि ग्रह निवारक), शल (-दरिद्रता नाशक), भोजपत्र (-ग्रह बाधाएं निवारक), विष्णुकांता (-शत्रुनाशक), मंगल्य (-तांत्रिक क्रिया नाशक), गुल्बास (-दिव्यता प्रदान कर्ता), जीवक (-ऐश्वर्य दायिनी), गोरोचन (-वशीकरण), गुग्गल (-चामंडु सिद्धि), अगस्त (-पितृदोष नाशक), अपमार्ग (-बाजीकरण), आंधीझाड़ा (-भस्मक रोग, भूख-प्यास नाशक), श्वेत अपराजिता (-दरिद्रानाशक), हत्था जोड़ी (-वशीकरण), समोवल्ली (-मृत्य नाशक), शिलाजीत (-नपुंसकता नाशक), अश्‍वगंधा (-वीर्य वर्धक) आदि। बांदा (-चुम्बकीय शक्ति प्रदाता), श्‍वेत और काली गुंजा (-भूत पिशाच नाशक), उटकटारी ( -राजयोग दाता), मयूर शिका (-दुष्टात्मा नाशक) और काली हल्दी (-तांत्रिक प्रयोग हेतु) आदि ऐसी अनेक जड़ी-बूटियां हैं, जो व्यक्ति के सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन को साधने में महत्वपूर्ण हैं। 
इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्ध सूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते ॥  [रसेन्द्र चूड़ामणि 6.6.9]
जिसके पन्द्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है, जहाँ से पत्ते निकलते हैं-वे गाँठें लाल होती हैं, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लाई हुई पँचांग (-मूल, डंडी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को बद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाया हुआ पँचांग (-मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बाँधना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परन्तु सोमवल्ली और सोमवृक्ष-इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुण वाली है। इस सोमवल्ली का कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्लपक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह लता बढ़ती रहती है।पूर्णिमा के दिन इस इस लता का कन्द निकाला जाय तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्षभेदी हो जाता है अर्थात एक गुणा बद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त दुर्लभ है। 
कूटज, Kutaj Bark :: Hydrocotyle asiatica, Indian Pennywort, Holarrhena antidysenterica, Wrightia antidysenterica. Kutaj is used in treating diarrhoea, irritable bowel syndrome etc. It is used in preparing very common Ayurvedic medicines like Kutaj Arisht, Kutaj Ghan Vati etc.
भुई अमला-भुम्यमलाकि Bhui Amla-Bhumyamalaki :: Phyllanthus Nerurie. It is helpful for indigestion, Jaundice, hyper acidity and for flatulence. It is also effective for chronic cough, asthma, fevers, toxic conditions and supports digestive system. It is a good rejuvenating and revitalising herb. It has excellent blood purification properties thus help to remove toxins from human system and removes cause of disease. is used It is used in general debility in elderly and debilitating patients. Paste of Bhumyamalaki made with buttermilk is recommended in jaundice.
Phyllanthus primarily contains lignans (e.g., phyllanthine and hypophyllanthine), alkaloids, and bioflavonoids (e.g., quercetin).
It is found to be effective in  HIV cure as well. 
It has  been used for gonorrhoea, frequent menstruation diabetes, skin ulcers, sores, swelling and itchiness. It is a very effective liver remedy that is also used for clearing gall and bladder stones. Juice of whole plant is given for liver protection. The young shoots of the plant are administered in the form of an infusion for the treatment of chronic dysentery.
मंजिस्था :: Varny (improving the complexion), Jvarahara-febrifuge, Visaghna-detoxifier) and purisa sangra haniya (gives from to the feaces). Pitt Samsaman-Pacifies the Pitt doshas. It is Rasayan-Rejuvenative.
The plant grows throughout India, in hilly districts upto 3500 meters height. It is a perennial, herbaceous climber. The stems are often long, rough and grooved, with woody base. The leaves often in whorls of four. They are 5-10 cm long, variable, cordate-ovate to cordate-lanceolate, rough above and smooth beneath. The flowers, 0.3-2.5 cm long, blackish or greenish black, in terminal panicled glabrous cymes. The fruits are globose, fleshy, smooth, purplish black when ripe and shining. The roots are 4-8 cm long, reddish, cylindrical, flexuous, with a thin red bark.
Manjistha is bitter, astringent and sweet in taste, pungent in the post digestive effect and has hot potency. It alleviates all the three doshas. It possesses dry and heavy (to digest attributes. It is a potent blood purifier and anti diarrhoeaial.
USES :: The plant is used both, internally as well as externally. The roots of Manjistha are used for medicinal purpose. Externally, Manjistha is highly recommended in skin diseases associated with edema (सूजन, फुलाव, त्वचा शोथ, oedema, swelling, swell, protuberance, bloating, blotch, distension, heave) and oozing. The wound and ulcers dressed with Manjistha Ghrat heal promptly and get dried up and well cleansed. Especially the chronic non-healing and cozying wounds respond very will. The Manjistha ointment medicated with Sat Dhaut Ghrat, is the best panacea for erysipelas. The burns and scalds heal up magically without scar formation, when treated with Manjistha Ghrat. The chronic wounds are washed with the decoction of Manjistha and dressed with its Ras Kriya (solid extract). In fractures, the external splint of Manjistha, Madhuk skin and Amlaki leaves is beneficial. The root powder works well, with ghee, for the medicament of acne. Used externally as a paste by itself or with honey, it heals inflammation and gives the skin an even tone and smoothness. It is a powerful dye, imparting a reddish tinge to the skin and is used in dying the clothes also. Internally, Manjistha is valuable in a vast range of diseases. In Diarrhoea, Manjistha works well when combined with Lodhra (Symplicos racemosa) skin powder. Manjistha is benevolent in gastrointestinal ailments like loss of appetite, dyspepsia and worm infestations, as it is an appetiser, digestant, destroys aanv (आंव) and is a vermicide (-a poisonous to worms). Manjistha Kvath-extract, is widely used as a blood purifier. It acts mainly on Ras and Rakt Srotasas (Srotas refer to the channels of circulation in the body. As per Ayurveda, the Dosh-Vat, Pitt and Kaph move from one part of the body to another through Srota)alleviates the Kaph and Pitt Dosh and eliminates toxins. This ameliorates the vitiation of Bhrajak Pitt (Pitt from the skin) and imparts better complexion to the skin. Manjistha was held in high esteem by ancient sages in the treatment of skin diseases. It is widely used, till today, in various skin disorders like erysipelas, eczema, acne, scabies and allergic manifestations. Manjistha helps in controlling the irritation of nerves and pacifies the mind, hence salutary in epilepsy, especially of pitta type. The decoction of Manjistha, Triphala, Daruharidr, Guduchi, Katuk, Nimb and Vac is used in gout with benefit.
The cold infusion of Manjistha improves the menstrual bleeding and relieves the pain in dysmenorrheal. It stimulates and cleanses the uterus, so useful in postnatal ailments. The decoction of Manjistha is useful in oligomenorrhea and amenorrhea. Manjistha is useful as an adjunct in treating hepatitis. It is an effective medicament for hoarseness of voice, due to vitiated Kaph Dosh and cough. It is also anti-diabetic and useful in treating urinary calculi. The plant is widely used as a rejuvenative in pigment disorders of the skin and in general debility.
Maha Manjistha Kvath is one of the popular preparations, used as a blood purifier and in treating various skin diseases. Its helpful in treating acne vulgaris.
अश्वगंधा WITHANIA RADIA-SOMNIFERA :: Its as an adaptogen, an aphrodisiac, an immune stimulant and a tonic. Its leaves, roots, whole plant are used to balances Kaph and Vat dosh. Its used as a general tonic, adaptogen, anti inflammatory, antiviral, hepato protection, antioxidant, anti tumour, anti stress effects, memory improvement, immuno modulator, lowers high blood pressure.
यह एक शक्तिवर्धक रसायन और श्रेष्ठ प्रचलित औषधि, टॉनिक है। इसे संजीवनी बूटी कहा जाए तो भी गलत नहीं होगा। यह शरीर की बिगड़ी हुई-ख़राब अवस्था (प्रकृति) को सुधार कर सुसंगठित कर शरीर का बहुमुखी विकास करता है। इसका शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढाती है और बुद्धि का विकास भी करती है। अश्वगंधा में एंटी एजिड, एंटी ट्यूमर, एंटी स्ट्रेस तथा एंटीआक्सीडेंट के गुण भी पाये जाते हैं।
घोडे जैसी महक वाला अश्वगंधा इसको खाने वाला घोड़े की तरह ताकतवर हो जाता है। इसकी जड़, पत्तियाँ, बीज, छाल और फल अलग अलग बीमारियों के इलाज में प्रयोग किया जाता है। यह हर उम्र के बच्चे जवान बूढ़े नर नारी का टोनिक है; जिससे शक्ति, चुस्ती, सफूर्ति तथा त्वचा पर कान्ति (चमक) आ जाती है। अश्वगंधा का सेवन सूखे शरीर का दुबलापन ख़त्म करके शरीर के माँस की पूर्ति करता है। 
यह चर्म रोग, खाज खुजली गठिया, धातु, मूत्र, फेफड़ों की सूजन, पक्षाघात, अलसर, पेट के कीड़ों, तथा पेट के रोगों के लिए यह बहुत उपयोगी है, खांसी, साँस का फूलना अनिद्रा, मूर्छा, चक्कर, सिरदर्द, हृदय रोग, शोध, शूल, रक्त कोलेस्ट्रॉल कम करने में 
स्त्रियों को गर्भधारण में और दूध बढ़ाने में मदद करता है, श्वेत प्रदर, कमर दर्द एवं शारीरिक कमजोरी दूर हो जाती हैं।
(1). अश्वगंधा की जड़ के चूर्ण का सेवन 1 से 3 महीने तक करने से शरीर मे ओज, स्फूर्ति, बल, शक्ति तथा चेतना आती है। अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण सेवन तीन माह तक लगातार सेवन करने से कमजोर (बच्चा, बड़ा, बुजुर्ग, स्त्री, पुरुष) सभी की कमजोरी दूर होती है, चुस्ती स्फूर्ति आती है चेहरे, त्वचा पर कान्ति (चमक) आती है शरीर की कमियों को पूरा करते हुए धातुओं को पुष्ट करके मांशपेशियों को सुसंठित करके शरीर को गठीला बनाता है। लेकिन इससे मोटापा नहीं आता।
वीर्य रोगों को दूर कर के शुक्राणुओं की वृद्धि करता है, कामोत्तेजना को बढ़ाता है और एक शक्तिवर्धक रसायन है। इसकी जड़ का चूर्ण दूध या घी के साथ लेने से निद्रा लाता है तथा शुक्राणुओं की वृद्धि करता है।
पाचन शक्ति को सुधारता है। अश्वगंधा और विधारा चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर सुबह शाम एक चम्मच  दूध के साथ लेने से वीर्य में वृद्धि होती है और संभोग क्षमता बढ़ती है।  
समान मात्रा में अश्वगंधा, विधारा, सौंठ और मिश्री को लेकर बारीक चूर्ण बना लें। सुबह और शाम इस एक एक चम्मच चूर्ण को दूध के साथ सेवन करने से शरीर में शक्ति, ऊर्जा वीर्य बल बढ़ता है। या सुबह-शाम एक-एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण को घी और मिश्री मिले हुए दूध के साथ लेने से शरीर में चुस्ती स्फूर्ति आ जाती है।
सुखा और क्षय रोगों मे लाभकारी है। अश्वगंधा का चूर्ण 15 दिन तक दूध या पानी से लेने पर बच्चो का शरीर पुष्ट होता है। अश्वगंधा कमजोर, सूखा रोग पीड़ित बच्चों व रोगों के बाद की कमजोरी में, शारीरिक और मानसिक थकान बुढ़ापे की कमजोरी, मांसपेशियों की कमजोरी व थकान आदि में अश्वगंधा की जड़ का चूर्ण देसी गाय का घी और पाक निर्धारित मात्रा में सेवन कराते हैं । मूल चूर्ण को दूध के अनुपात के साथ देते हैं।
शक्ति दायक और हर तरह का बदन दर्द को दूर करता है। 
रूकी पेशाब भी खुल कर आती है। 
इसके पत्तों को पीस कर त्वचा रोग, जोड़ों की सूजन, घावों को भरने तथा अस्थि क्षय के लिए किया जाता है। 
गैस की बीमारी, एसिडिटी, जोडों का दर्द, ल्यूकोरिया तथा उच्च रक्तचाप में सहायक और कैंसर से लड़ने की क्षमता आ जाती है। अश्वगंधा एक आश्चर्यजनक औषधि है, कैंसर की दवाओं के साथ अश्वगंधा का सेवन करने से केवल कैंसर ग्रस्त कोशिकाएँ ही नष्ट होती है, जबकि स्वस्थ (जीवन रक्षक) कोशिकाओं को कोई क्षति नही पहुँचती।
अश्वगंधा मनुष्य को लंबी उम्र तक जवान रखता है और त्वचा पर लगाने से झुर्रियां मिटती है।
समय से पहले बुढ़ापा नहीं आने देती और इसके तने की सब्जी बनाकर खिलाने से बच्चों का सूखा रोग बिलकुल ठीक हो जाता है।
यदि कोई वृद्ध व्यक्ति शरद ऋतु में इसका एक माह तक सेवन करता है तो उसकी माँस मज्जा की वृद्धि और विकास हो कर के वह युवा जैसा हल्का व् चुस्त महसूस करने लगता है।
मोटापा दूर करने के लिए अश्वगंधा, मूसली, काली मूसली की समान मात्रा लेकर कूट छानकर रख लें, इसका सुबह 1 चम्मच की मात्रा दूध के साथ लेना चाहिए। 
डायबिटीज के लिए अश्वगंध और मेथी का चूर्ण पानी के साथ लेना चाहिए।
इसके नियमित सेवन से हिमोग्लोबिन में वृद्धि होती है।
कैंसर रोगाणुओं से लड़ने की क्षमता बढाती है।
अश्वगंधा और बहेड़ा को पीसकर चूर्ण बना लें और थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर इसका एक चम्मच( टी स्पून) गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। इससे दिल की धड़कन नियमित और मजबूत होती है। दिल और दिमाग की कमजोरी को ठीक करने के लिए एक एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण सुबह-शाम एक कप गर्म दूध से लें।
अश्वगंधा का चूर्ण को शहद एवं घी के साथ लेने से श्वांस रोगों में फायदा होता है और दर्द निवारक होने के कारण बदन दर्द में लाभ मिलता है।
अश्वगंधा के चूर्ण को शहद के साथ चाटने से शरीर बलवान होता है।हाई ब्लड प्रेशर के लिए 10 ग्राम गिलोय चूर्ण, 20 ग्राम सूरजमुखी बीज का चूर्ण, 30 ग्राम अश्वगंधा जड़ का चूर्ण और 40 ग्राम मिश्री लेकर इन सब को एक साथ मिळाले और शीशे के जार में भर कर रख ले और एक एक टी स्पून दिन में 2-3 बार पानी के साथ सेवन करें हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होगा।
एक गिलास पानी में अश्वगंधा के ताजा पत्ते उबाल कर छानकर चाय की तरह तीन-चार दिन तक पीयें, इससे कफ और खांसी ठीक होती है।
अश्वगंधा की जड़ से तैयार तेल से जोड़ों पर मालिश करने से गठिया जकडन को कम करता है तथा अश्वगंधा के पत्तों को पिस कर लेप करने से थायराइड ग्रंथियों के बढ़ने की समस्या दूर होती है।
अश्वगंधा पंचांग यानि जड़, पत्ती, तना, फल और फूल को कूट छानकर एक-डेढ़ चम्मच (टेबल स्पून) सुबह शाम सेवन करने से जोड़ों का दर्द ठीक होता है। आधा चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण को सुबह-शाम गर्म दूध तथा पानी के साथ लेने से गठिया रोगों को शिकस्त मिलती है तथा समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और घी में थोडा शक्कर मिलाकर सुबह-शाम खाने से संधिवात दूर होता है।
अश्वगंधा का चूर्ण में बराबर का घी मिलाकर या एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण में आधा चम्मच सोंठ चूर्ण और इच्छानुसार चीनी मिला कर सुबह-शाम नियमित सेवन से गठिया में आराम आता है।
अश्वगंधा और मेथी की समान मात्रा और इच्छानुसार गुड़ मिलाकर रसगुल्ले के समान गोलियां बना लें। और सुबह-शाम एक एक गोली दूध के साथ खाने से वात रोग खत्म हो जाते हैं।
अश्वगंधा और विधारा चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर सुबह शाम एक चम्मच दूध के साथ लेने से स्नायुतंत्र ठीक होकर क्रोध नष्ट हो जाता है, बार-बार आने वाले सदमे खत्म हो जाते हैं और जोड़ो का दर्द खत्म हो जाता है।
एक चम्मच अश्वगंधा के चूर्ण के साथ एक चुटकी गिलोय का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से सभी रोगों में लाभ मिलता हैं।
गिलोय की छाल और अश्वगंधा को मिलाकर शाम को गर्म पानी से सेवन करने से जीर्णवात ज्वर ठीक हो जाता है।
जीवाणु नाशक औषधियों के साथ अश्वगंधा चूर्ण को क्षय रोग (टी. बी.) के लिए देसी गाय के घी या मिश्री के साथ देते हैं।
एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण के क्वाथ (काढा) में चार चम्मच घी मिलाकर पाक बनाकर तीन माह तक सेवन करने से गर्भवती महिलाओं की शारीरिक दुर्बलता दूर होती हैं।
अश्वगंधा, शतावरी और नागौरी तीनों को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बनायें, फिर देशी घी में मिलाकर इस चूर्ण को मिट्टी के बर्तन में रखें, इसी एक चम्मच चूर्ण को मिश्री मिले दूध के साथ सेवन करने से स्तनों का आकार बढ़ता है।
मासिक-धर्म शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले समान मात्रा में अश्वगंधा चूर्ण और चीनी मिला कर रख ले इस चूर्ण की दो चम्मच सुबह खाली पेट पानी से सेवन करे। मासिक-धर्म शुरू होते ही इसका सेवन बंद कर दे। इससे मासिक धर्म सम्बन्धी सभी रोग समाप्त होंगे।
अश्वगंधा चूर्ण का लगातार एक वर्ष तक सेवन करने से शरीर के सारे दोष बाहर निकल जाते हैं पुरे शरीर की सम्पूर्ण शुद्धी होकर कमजोरी दूर होती है।
दूध में अश्वगंधा को अच्छी तरह पका कर छानकर उसमें देशी घी मिलकर माहवारी समाप्त होने के बाद महिला को एक दिन के लिए सुबह और शाम पिलाने से गर्भाशय के रोग ठीक हो जाते हैं और बाँझपन दूर हो जाता है।
अश्वगंधा का चूर्ण, गाय के घी में मिलाकर मासिक-धर्म स्नान के पश्चात् प्रतिदिन गाय के दूध या ताजे पानी के साथ 1 चम्मच महीने भर तक नियमित सेवन करने से स्त्री निश्चित तोर पर गर्भधारण करती है।अथवा अश्वगंधा की जड़ के काढ़े और लुगदी में चौगुना घी मिलाकर पकाकर सेवन करने से भी स्त्री गर्भधारण करती है।
गर्भपात का बार-बार होने पर अश्वगंधा और सफेद कटेरी की जड़ का दो-दो चम्मच रस गर्भवती महिला 5 - 6 माह तक सेवन करने से गर्भपात नहीं होता।
गर्भधारण न कर पाने पर अश्वगंधा के काढे़ में दूध और घी मिलाकर स्त्री को एक सप्ताह तक पिलाए या अश्वगंधा का एक चम्मच चूर्ण मासिक-धर्म के शुरू होने के लगभग सप्ताह पहले से सेवन करना चाहिए।
समानं मात्रा में अश्वगंधा और नागौरी को लेकर चूर्ण बना ले। मासिक-धर्म समाप्ति के बाद स्नान शुद्धी होने के उपरांत दो चम्मच इस चूर्ण का सेवन करें तो इससे बांझपन दूर होकर महिला गर्भवती हो जाएगी।
यह औषधि काया कल्प योग की एक प्रमुख औषधि मानी जाती है एक वर्ष तक नियमित सेवन काया कल्प हो जाता है।
रक्तशोधन के लिए अश्वगंधा और चोपचीनी का बारीक चूर्ण समान मात्रा में मिला कर हर रोज सुबह-शाम शहद के साथ चाटें।
साधारणत: सामान्य आदमी अश्वगंधा जड़ का आधा चम्मच चूर्ण सुबह खाली पेट पानी से ले ऊपर से एक कप गर्म दूध या चाय लें सकते है।नाश्ता 15-20 मिनट बाद ही करें। किसी भी जडी -बूटी को सवेरे खाली पेट सेवन करने से अधिक लाभ होता है।
कोई भी और्वेदिक औषधि तीन माह तक नियमित सेवन के बाद 10-15 दिन का अंतराल देकर दोबारा फिर से शुरू कर सकते है
भले ही कोई बीमारी न हो तो भी अश्वगंधा का तीन माह तक नियमित सेवन किया जा सकता है। इससे शारीरिक क्षमता बढ़ने के साथ साथ सभी उक्त बिमारियों से निजात मिल जाती है|
सामान्य चेतावनी :-गर्म प्रकृति वालों के लिए अश्वगंधा का अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक होता है। 
अग्नि मंथ, Agni Manth :: Clerodendrum phlomidis Lin.
अहि फीन, Ahiphene :: Papaver somniferum. 
अयपन, Ayapan :: Eupatorium triplinerve. 
अजमोदा, Ajamoda :: Apium graveolens. 
अकर करा, अकलकरा, अकल्लक, Akalkara, Akallaka :: Pellitory, Anacyclus, Akarakaraba-Anacyclus pyrethrum.
अंकोला, धेरा, अकोला, अंकोता, ताम्रफल, Ankola, Dhera, Akola, Ankota, Tamraphala :: Sage-leaved, Alangium. अर्क, Ark :: Calotropis procera.
अगर, अगुरु, लौह, कृमिज, Agar, Aguru, Lauha, Krimija :Eagle Wood, Aquilaria agallocha.अर्ग वेद, Arag Ved :: Cassia fistula Linn.
अरंड-एरंडी Erand :: Ricinus communis. 
अडूसा, अरुसा, अमसा, Adussa, Arusa, Amsa :: Vasa, Vajidanta :: Malabar Nut, Adhatoda vasica. 
अतीस, अरुणा, घुन प्रिय,विस्, Atis, Aruna, Ghunapriya, Visa :: Atis Root Aconitum heterophyllum.
अनानास, बहुनेत्र, Ananas, Bahunetra :: Pineapple, Ananas .
अज्मुद, अजमोदा, डोरु,रंधुनि, Ajmud, Ajmoda, Doroo, Randhuni :: Celeryand Parsley. 
अश्वगंधा, Ashw  Gandha :: Withania somnifera-Ativisha-Aconitum heterophyllum.
अनन्त मूल, Anant Mul :: Hibiscus rosa, Hibiscus Flower. 
अपराजिता, Aparajita :: Clitorea ternatea. 
अफ़ीम Afim :: Opium, Poppy copium seed   Papaver somniferum linn.
अमलतास,  Amaltas, Kritamala, Vyadhighata, Sampaka :: Indian Laburnum, Purging Cassia, Cassia fistula.
अमारा, अम्बाड़ा,  अम्बाड़ी, Amara, Ambad, Ambar :: Ambaadii Spondias, Pinnata.
अर्जुन Arjun :: Terminalia Arjun.
अदरक, Adrak, Shati-Shunti ::  Ginger, Zingiber officinale, Acacia intsia.
अध पुष्पा, व्रत पुष्पा, गंध पुष्पा,  Adh Pushpa :: Anthocephalus,
अशोक की छाल, अशोक, कंकेली, अशोक सीता, Ashok BarkAshok, Kankeli, Ashok Sita  :: Saraca indica, Ashok Tree, Sorrowless tree. 
असगंध, अश्वगंधा, हयगंध, वाजीगंध, Asgandh, Ashwagandha, Hayagandha, Vajigandha ::  Winter Cherry, Withania somnifera Dunal Pennel.
आम्र, Amr :: Mangifera indica. 
आसन Aasan :: Terminalia alata B.
आंवला, अमला, अमलकी, अमृत फल, धात्री फल, Amla, Amalaki, Amritaphala, Dhatriphala :: Indian Gooseberry, Emblic Myrobalan, Emblica officinalis, Phyllanthus, Amla Emblica, Indian Gooseberry, Amlaki Fruit.
कचनार, Kach Nar :: Bauhinia variegata.
उलटकंबल, Ulatkambal, Pishach karpas :: Devil's Cotton, Abroma.  
कवची, चरोली, Kavch, Charoli :: Cudpah nut,  Clams Teesrya.
केबु, केमुक, केमबुक, Kebu, Kemuk, Kemua, Kemuka, Kembuka, Kebuka, Kembu :: Spiral Flag, Costus speciosus. केसर-ज़ाफ़रान, Kesar or Zafran :: Saffron Coloured.
कंघी, कंगली, काकहि, कण कंटिका, Kanghi, Kakahi, Kankatika, Risyaprokta :: Country Mallow, Indian Mallow, Abutilon.
काल मेघ, चरायता, किरियत, भूनीम्ब, Kal Megh, Kiriyat, Charayeta, Bhunimba :: Creat, Andrographis paniculata . 
कान्तिकारी, Kantakari :: Sida cordifolia, Solanum xanthocarpum, Wild Eggplant. 
काम पिल्लिका, Kam Pillaka :: Mallotus philippinensis.
काव्या, Cavya :: Pipper chaba Hunter. 
कुचला, Kuchla :: Nux Vomica.
कुर्ची,  Kurchi :: Conessi tree, conessi bark. 
कुप्पी, Kuppi, कुप्पी खोखली Kuppi Khokhali :: Acalypha Indica, Indian Acalypha, Acalypha Paniculata, Indian Copperleaf.
कुलंजन, बराकुलंजन, मलयवच, सुगंध मूल, स्थूल ग्रंथि, Kulanjan, Barakulanjana, Malayavacha,Sugandhamoola, Sthulagranthih, Mahabharivacha, Rasna :: Greater Galangal, Alpinia. 
कूटज, Kutaj Bark :: Hydrocotyle asiatica, Indian Pennywort, Holarrhena antidysenterica, Wrightia antidysenterica. 
कोट्टु, Kottu :: Buck wheat or Buckwheat Kottu. 
खरपात,  Kharpat :: Garuga Pinnata.
खसखस, Khus-Khus :: Poppy Seeds, Opium, Poppy copium seeds. 
खैर, गायत्री, Khair, Gayatri,  Katha ::  Cutch Tree, Black Catechu, Acacia.
गदापूर्ण, लालपुनर्नवा, Gadapurna, Lalpunarnava :: Punarnava, Kathilla, Sophanghni :: Hog Weed, Horse Purslene, Boerhaavia diffusa.  
गम्भरी, Gambhari :: Gmelina arborea. 
गँध प्रसारणी, Gandh Prasarani :: Paederia foetida.
ग्वार पाठा, घी कुंवर, घी कुमारी, घृत कुमारी, कुमारी, Ghee Kumari, Gwar Patha, Ghee Kunwar, Ghrat Kumari, Kumari :: Aloes, Aloe Vera, Tourn,  Aloe Barbadensis, Agathi leaves, Agasti. 
गोक्षुर, Gokshur :: Tribulus terrestris, Land-Caltrops, Puncture Vine. 
गुडूची, Guduchi :: Tinospora cordifolia. 
गुग्गुल, गूगल, गुग्गुलु, महिसकस, कौसिक, Guggul, Gugal, Guggulu, Mahisaksa, Kausika :: Indian Bedelium, Gum-Gugul, Commiphora mukul. 
गुंची, रत्ती, Gunchi,  Ratti :: Abrus Precatorius Crab Eyed Creeper. 
गुह बबूल, Guh Baboool, Gukikar, Gandh Babool :: Acacia farnesiana Mimosa bush, Needle bush
गिलोय, Giloy, Guduchi ::  Tinospora cordifolia, Heartleaf Moonseed. 
घुनघुनिया, Ghunghunia :: Crotalaria verucosa linn.
चक्रफूल, Chakr Phool  :: Star Anise.चंदन, संदल, Chandan, Sandal :: Santalum album linn, Sandal wood.
चंगेरी, Changeri :: Oxalis corniculata. 
चित्रक, Chitrak :: Plumbago zeylanica, Ceylon Leadwort.
चित्रा, चिरा, चित्त, चित्रक, अग्नि, वह्नि, Chitra, Chira, Chita, Chitraka, Agni, Vahni :: Lead Wort, Plumbago zeylanica. 
चिड़चिड़ी, Chid Chidi :: Achyranthes Aspera Rough cheff.
चिरचिटा, लटजीरा, अपामार्ग, मयूर, प्रत्यक्पुष्पा, Chirchita, Latjira, Apamarg, Mayura, Pratyakpuspa ::  Prickly chaff flower, Achyranthes. 
चिरायता, Chirata :: Swerita Chirata, Swertia Chirayita.
छतिवन, सतवन, सतपर्णी, Chhativan, Satawana, Saptaparni, Saptahva, Saptacchada :: Dita, Alstonia. 
छोटी इलायची, इलायची, Choti Elachi, Ilayechi,  Sookshma Ela :: Lesser Cardamom, Elettaria cardamomum.  
ढाक, टेसू किंसुक, रक्त पुष्प, Dhak, Tesu, Kimsuka, Raktapuspaka :: Bastard Peak, monosperma.
जम्बु, Jambu :: Syzygium cumini. 
जटामांसी, Jatamansi :: Nardostachys jatamansi.
जति, Jati :: Jasminum grandiflorum. 
जयपाल, Jayapala :: Croton tiglium.
जवास, यवस, यवस्का, यश, Javasa, Yavasa, Yavasaka, Yasa :: Persian Manna plant, Alhagi .
जायफ़ल, Jaiphal :: Nutmeg.
ज्योतिष्मती, Jyotishmati :: Celastrus paniculata. 
झिंटी, कटसरैया, सैरयक, Jhinti, Katsreya, Sairayaka :: Yellow Barleria, Barleria prionitis.
तुलसी, Tulsi :: Holy Basil. 
तिल, Til :: Sesame, seas mum, indium-sesame. 
तेजपत्र, तमालपत्र, पत्र, वरंग, कोका, Tejpatra, Tamalapatra, Patra, Varanga, Coca :: Indian Cinnamon, Cinnamomum tamala.  
दन्ती, Danti :: Baliospermum montanum Red Physic Nut, wild castor.
द्राक्ष, Draksh :: Vitis vinifera. 
दाड़िम, Dadima :: Punica granatum. 
दारु हरिद्रा, Daru Haridra :: Berberis aristata. 
देवदारु, Dev Daru :: Cedrus deodara. 
दीर्घवृन्त, Dirgh Vrant  :: Indian Trumpet, Broken Bones Plant, Shyonak.
दालचीनी, दारुसित, Dalchini, Darusit:Cinnamon Bark, Cinnamomum zeylanicum. 
धनिया, धनिक, वितुन्नक, कुस्तुम्बुरु, Dhaniya, Dhanika, Dhanya, Vitunnaka, Kustumburu :: Coriander fruit, Coriandrum sativum.
धातकी, Dhatki :: Woodfordia fruticosa. 
धतूरा, Dhatura :: Datura stramonium.
निर्गुण्डी,  Nirgundi :: Vitex negundo, Cut-Leaf Chaste Tree,  Withania somnifera.
नागर मोथा, मोथा, मुस्तक, वरीद,  Nagarmoth, Motha, Mustaka, Varida :: Nut Grass, Cyperus rotundus 
नीम, निम्ब, अरिस्ट, पिछु मर्द, Neem, Nimba, Arista, Pichhumarda :: Margosa Tree, Azadirachta indica.
परात्प्रिय, Parat Priy :: Saccharum spotaneum Linn Thatch grass. पाताल, Patal :: Stereospermum suaveolens, Trumpet Flower.
पाठा, पाढ़, अकनन्दी, अम्बस्थकी, ambasthaki Patha, Padh, Akanadi, Ambasthaki :: Velvet Leaf Tree, Cissampelos pareira.
प्रश्निपर्णी, Prashni Parni :: Uraria picta, Papilionaceae, Fabaceae Family. 
पिप्पल, पीपरमूल, पिप्पली, मगधी, ग्रन्थिका,  Pippal, Piparamula, Pippali, Magadhi, Granthika :: Long Pepper, Piper longum, Cayenne Pepper. 
पीपल, Peepal : Ficus religiosa.
पुनरर्वा, Punarrva :: Boerhaavia diffusa, Horse-purslane, Hogweed.
पुष्पकरमूल, Pushkarmool :: Inula racemosa.  
फेनिल, रिष्ट, रिष्टक, phenil, risht,  rishtak :: Sapindus trifoliatus Linn. Phaenilum, South India Soapnut.
बबूल, Babul, Babura, Kikar, Bavari, Kinkirat :: Indian Gum Arabic, Acacia arabica, Acacia nilotica. बकुची, Bakuchi :: Psoralea corylifolia.
बकुल, Bakul :: Mimusops Elengi.
बचनाग, कलिहारी, Bach Nag, Kalihari :: Glariosa superba linn Malabar glory lily, Superb lily. 
बाला, Bala :: Sida cordifolia, Country Mallow.
बांस, Bans :: Bambusa aurandinacea Retz. Bamboo. 
बिभीतकि-बिभितकरि, Bibhitaki :: Terminalia bellirica Belleric Myrobalan,
बिल्व, बेल पत्थर, Bilv ::  Aegle marmelos, Stone Apple.
बिस्वाल, अग्ल बेल, Biswal,  Agl Bel :: Acacia Pennata Climbing Acacia, Saraca.बेल, श्रीफल, Bel, Shri Phal :: Bengal Quince, Bael fruit, Aegle marmelos.
बोला, Bola :: Commiphora myrrha.
ब्रह्म मंडुकी, Brahm Manduki :: Centella asiatica Indian Pennywort. 
ब्राह्मी, ब्रह्मा माण्डुकी, माण्डुकी, मंडूकपर्णी, सरस्वती, कपोतवनक, Brahmi, Brahma Manduki, Manduki, Manduk Parni, Saraswati, Kapot Vank :: Thyme leaved gratiola, Bacopa, Centella asiatica, Indian Pennywort, Gotu kola, Bacopa monnieri, Thyme-leaved Gratiola,  Darduracchada, Centella asiatica 
बृहती, Brahati :: Solanum indicum, Poison Berry.
भल्लातक, Bhallataka :: Semecarpus anacardium.
भाँग, Bhang :: Cannabis sativa.
भ्रंगराज, Bhrang Raj :: Eclipta alba, Trailing Eclipta Plant.
भृङ्गी, अंगारवल्ली  Bharangee, Angaravalli, Brahmanayastika :: Bharangee, Clerodendron serratum.भुई अमला-भुम्यमलाकि, Bhui Amla-Bhumyamalaki :: Phylanthus Nerurie Linn, Euphorbiaceae.
भूकुशमंडी, Bhukushmandi :: Pueraria Tuberosa. 
भेटकी, बेतकी, Bhetki, Betki :: Bhetki. 
भोजपत्र, भुर्ज पत्रः, मृदुच्छड़ भुर्जग्रंथि,  Bhojapatra ::  Bhurja Patrah, Mriducchada, Bhurjagranthi

Latin name: Himalayan Silver Birch, Betula utilis.  
मलकांगनी, ज्योतिष्मती, Malkangani, Jyotishmati :: Staff Tree, Celastrus paniculatus.  मंजिस्था, Manjistha :: Indian madder, Rubia Cordifolia. 
मुलहटी, जेठीमधु, यस्तीमधुका, Mulethi, Jethimadhu, Yastimadhuka :: Liquorice, Glycyrrhiza glabra.  
मीठा विष, बचनाग, Meetha Visha, Bachhnaag, Vatsnabha, Amrita, Vajranaga :: Monks hood, Aconite, Aconitum.
यष्टिमधु,  Yashtimadhu Root :: Glycyrrhiza glabra, Licorice Root.
रतनपुरुष, Ratan Purush ::  Hybanthus Enneaspermus Spade Flower, Pink ladies slipper. 
रत्ती, घुंगची, रक्तिका, ककन्ति, Ratti, Ghungchi, Raktika, Kakananti :: Jequirity, Abrus. 
रीठा, शिकाकाई, Reetha, Shikakai :: Acacia concinna, soap nut. 
वच, उग्र गंध, उग्र, सद गंध, Bach, Gora-Bach, Vacha, Ugragandha, Ugra, Sadgrantha :: Sweet Flag, Acorus.
वच-वसाका, Vach-Vasaka :: Adhatoda vasaka, Calamus Root. 
वचनाग, Vach Nag :: Aconitum ferox Wall, Indian Aconite.
वंशलोचन, Vansh Lochan :: Manna.
विडंग, Vidang Fruit :: Embelia ribes, Embelia.
वज्रदंती, Vajradanti :: Barlenia Priontis.
वरुण, Baruna, Barna,  Varana :: Three Leaved Caper, Crataeva nurvala.
विधार, घाव पत्ता, समुद्र सोख, वृद्धदारु, Vidhara, Ghavapatta, Samudrasokha, Vridhadaru :Elephant Creeper, Argyreia speciosa. शतावरी, सतावर, सतमूली, नारायणी, वरि, अभिरु, अतिरस, Shatavari, Satavar, Satmuli, Narayani, Vari, Abhiru, Atirasa :: Wild Asparagus, Asparagus racemosus.
शतवार, सूतमूली, Sootmooli :: Asparagus Shatwar or Halyan.
शलाकी, Shallaki :: Boswellia serrata, Indian Frankincense. 
शालपर्णी, स्थिर, विदारि गंध, Shalaparni, Sarivan, Shalparni, Sthira, Vidarigandha :: Shal Leaved Bush, Desmodium gangetcium, Magnolia, Fabaceae Family. 
शिरीष, शीतपुष्प, सुकप्रिय, Sirish, Siri, Shirsha, Sitapuspa, Sukapriya :: Siris Tree, Lebbeck Tree, Albizzia lebbeck. 
सफ़ेद तिल, Safed til ::  Sesamum indicum dc Gingily. 
साल, मूसल साल, तुन, Saal, Muusal saal,  Tun :: Shorea robusta gaertn Saul Tree. 
सिस्टि-सल्बिया, Seesti-Salbia :: Sefakuss, Sage herb-Salvia officinalis. 
सौंठ :: Sounth-Shunthi-zingiber-officinale. 
सौंफ, Saunf :: Foeniculum vulgare, Fennel.
सलाई, लुबान, सल्लकी, Salai, Luban, Sallakie, :: Indian Olibanum, Boswellia serrata. 
सुपारी, छाली, क्रमुक, घोंट,  Supari; Chhali, Kramuka; Ghonta :: Areca Nut, Betel Nut, Areca catechu.
सेनाय, स्वर्णपत्री, Senaya, Svarnapatri :: Indian Senna, Tinnevelly senna.Cassia angustifolia. 
हल्दी, हरिद्रा, Haldi, Haridra :: Turmeric, Curcuma longa. Curcuma aromatica salisb Round zeodary. 
हल्दी जंगलीJungli Haldi :: Curcuma longa Linn.
हरितकी, हरड़, हरै, Haritki :: Fruit Terminalia chebula, Chebulic Myrobalan, Belleric Myrobalan.
हिंगु, Hingu :: Ferula foetida.  
क्षीरिणी, Kshirini, कराला Karala :: Indian Sarsaparilla. 
AYURVED (2) आयुर्वेद MEDICINAL PROPERTIES OF INDIAN SPICES भारतीय मसालों के औषधि गुण :: Indian spices are consumed the world over, from time immemorial. They have established medicinal properties. In fact they are Ayurvedic medicines. They not only make the food tasty but also gives, protection to the human body, as well. One must not consume them, beyond a certain limit.
SPICES (मसाले, MASALE) :: 
अरंडी, Arandi :: Castor.
अजवाइन, Ajwain ::  Carom seeds, Oregano, (Trachyspermum ammi). 
अनार दाना, Anar dana ::  Dried Pomegranate seeds.
अमचूर, Amchur :: Dried Mango powder-Khatai.
इमली, Imli :: Tamarind.
इलायची छोटी, Elaichi Chhoti  ::  Green Cardamom. 
इलायची बड़ी, Elaichi Badi ::  Black Cardamom. 
कलौंजी, Kalaunji :: Nigella-Onion Seeds.
कसूरी मेथी, Kasoori Methi :: Fenugreek Dry. 
काली मिर्च, Goal Mirch, Kali Black :: Peppercorn.
केवड़ा, Kewra :: Vetiver. 
केसर, ज़ाफ़रान, Kesar Zafran :: Saffron, Crocus sativus linn.
ख़सखस, Khas-Khas, Khus khus :: Poppy Seeds.
गोल मिर्च सफ़ेद, Goal Mirch, Safed :: White Peppercorn.
गोल मिर्च पीली, Goal Mirch, Pilli :: Yellowish Green Peppercorn. 
जपा, Japa :: Holarrhena antidysenterica, Tellicherry Bark. 
जावित्री, Javitri :: Mace Myristica fragrans.
जायफ़ल, Jaifal :: Nutmeg. 
जीरा, Jeera :: Cumin seed.
जीरा सफ़ेद, Jeera Safed :: Cumin seed.
जीरा शाही, Jeera Shahi (Himali Jeera, Kala Jeera) :: Black Cumin. 
तेज़ पत्ता, Tej Patta :: Indian Bay leaf. 
तुलसी Tulsi :: Sweet Basil, Holy Basil, Ocimum Basilicum, Ocimum sanctum.
तुलसी जंगली, Jangali Tulsi:: Ocimum Tenuiflorum.
दाल चीनी, Dal Cheeni :: Cinnamon, Cinnamomum zeylanicum, Tvak. 
दाल चीनी, Dal Chini, Jungli Cassia. Substitution :: Cinnamon. 
देगी मिर्च, कश्मीरी मिर्च, Degi Mirch, Kashmiri Mirch :: Paprika.
धनिया,  Dhania :: Coriander seeds. 
धनिया हरा पत्ता, Dhania, Hara Patta :: Fresh Cilantro.
फिटकरी, Phitkari :: Alum.
करी पत्ता, मीठा नीम, Kari Patta,  Meetha Neem Patta :: Murraya koengii spreng Curry leaf.
रतनजोत, Ratan Jot) :: Alkanet. 
लाल मिर्च पिसी हुई, Lal Mirch Powder :: Red Chilly Powder. 
छोटी सौंफ, Chhoti Saunf ::  Chakr Phool, Star Anise. Aniseeds: विलायती सौंफ, Vilayati Saunf. 
लौंग, Laung, Lavang :: Cloves. 
सौंठ Sounth :: Dried Ginger. 
हरी मिर्ची, Hari Mirch :: Green Chilly. 
हींग, Heeng :: Asafetida-a tree sap fried and crumbled to powder. 
Bicarbonate Soda: मीठा सोडा (Meetha Soda),
Caraway Seeds: शाहजीरा (Shahjeera), Carom Seeds, Thyme Seeds, Bishop Weed, Cassia: जंगली 
Cayenne Pepper : लालमिर्च पाउडर ( Lal Mirch Powder), 
Dill: सोया (Soya),
Fennel: सौंफ (Saunf),
Garcinia Indica: कोकम (Kokum), 
Jaggery: गुड़ (Gur), 
Lemon zest /Peel: नींबू का छिल्का (Nimbu ka Chilka),
Long Pepper: पिप्पली (Pippali),
Mustard Seeds: राई, सरसों (Rai, Sarsoan), 
Rock Salt: काला नमक (Kala Namak), 
Sesame White: सफेद तिल (Safed Til), 
Sesame Black: काला तिल (Kale Til), 
Star Anise: चकरा (Chakra),  
Turmeric: हल्दी (Haldi), 
Vinegar :: सिरका (Sirka).

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NUTMEG जायफल 
जायफल ना केवल एक मसाला अपितु एक गुणकारी औषधि भी है। आयुर्वेद में इसे वात एवं कफ नाशक बताया गया है। उत्तेजक होने के कारण यह आमाशय में पाचक रस बढ़ाता है, जिससे भूख खुलती है। आंतों में पहुंचकर यह  गैस हटाता है। इससे कई बीमारियों में लाभ के साथ-साथ सौन्दर्य सम्बन्धी कई समस्याओं से निजात मिलती है।
* सुबह-सुबह खाली पेट आधा चम्मच जायफल चाटने से गैस्ट्रिक, सर्दी-खांसी की समस्या नहीं सताती है। पेट में दर्द होने पर चार से पांच बूंद जायफल का तेल चीनी के साथ लेने से आराम मिलता है।
* सिर में बहुत तेज दर्द होने पर जायफल को पानी में घिस कर लगाएं।
* सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल का एक टुकड़ा मुंह में रखकर चूसते रहिये।यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है
* भूख बढ़ाने के लिये  चुटकी भर जायफल चूसने से पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी और भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।
* दस्त या पेट दर्द की शिकायत में एक जायफल को भून कर उसका चौथाई भाग मरीज को 
सुबह शाम चूसने के लिए दें।  
* फालिज-लकवे का प्रकोप जिन अंगों पर हो, उन अंगों पर जायफल को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए। दो माह तक ऐसा करने से, अंगों में जान आ जाने की संभावना देखी गयी है।
* प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द ठीक हो जाएगा।
* फटी एडियों के लिए इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भरने से वे 15 दिन में ही ठीक हो जाती हैं।

* जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय स्वस्थ मज़बूत व  पेट  ठीक रहता है।
* अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो, तो जायफल को पीस कर वहां तब तक लेप करिये जब तककि गाठ ठीक न हो जाये ।
* अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लगने पर उसे जायफल को पानी में घिसकर उसे पिलायें।
* जी मिचलाने पर जायफल को पानी में घिस कर पिलायें।
*  घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से यह नेत्र ज्योति बढ़ाता है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म करता है।
* यह शक्ति बर्धक है और आवाज में सम्मोहन उत्पन्न करता है।
* जायफल, काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है और कील-मुहांसे ख़त्म होते हैं। चेहरे और त्वचा पर पड़ी झाईयों को हटाने के लिए, जायफल को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर लेप लगाने से त्वचा में निखार व झाईयों से निजात मिलेगी। चेहरे की झुर्रियां भी इस लेप से ठीक-दूर हो जाती हैं। इसे कच्चे दूध में घिसकर चेहरें पर  लगाने से  मुंहासे ठीक हो जाते हैं और चेहरे पर निखार आता है।
*  बार-बार पेशाब जाना पड़ता हो तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी के साथ निगलने से फायदा होगा। यह क्रम खाली पेट, 10 दिन दोहरायें।
* बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर 3 चुटकी, गाय के घी में मिलाकर बच्चे को सुबह शाम चटायें।
* आंखों के नीचे काले घेरे हटाने के लिए, सोते समय जायफल का लेप लगाकर सूखने पर इसे धो लें।ने से लाभ मिलता है।
* जायफल का लेप त्वचा पर लगाने से अनिंद्रा की शिकायत दूर होगी और त्वचा भी स्वस्थ व सुन्दर बनी रहेगी।
*  त्वचा पर चोट, नील और घाव के निशान हटाने के लिए जायफल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करें। इससे मालिश करने पर रक्त के संचार के ठीक होने के साथ-साथ शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी बनी रहेगी।
* जायफल के लेप की जगह इसके तेल का भी प्रयोग भी किया जा सकता है।
* दांत में दर्द होने पर जायफल का तेल रुई पर लगाकर दर्द वाले दांत या दाढ़ पर रखने से दर्द  ठीक हो जाता है और दांत के कीड़े भी मर जाते हैं।
* पेट दर्द ठीक करने के लिए जायफल के तेल की 2-3 बूंदें  बताशे में टपका कर खाने से  आराम मिलता है।
* जायफल को पानी में पकाकर  गरारे करने से मुंह के छाले और गले की सूजन ठीक हो जाती है।
* जायफल पाउडर दूध में मिला कर लेने से सर्दी का असर ठीक हो जाता है।
* सरसों का तेल और जायफल का तेल 4:1 की मात्रा में मिलाकर दिन में 2-3 बार शरीर की मालिश करने से जोड़ों का दर्द, सूजन, मोच आदि में राहत मिलती है और शरीर में  चुस्ती-फुर्ती-गर्मी आती है तथा पसीने के रूप में विकार निकल जाता है।
* जायफल, सौंठ और जीरे का चूर्ण भोजन करने से पहले पानी के साथ लेने से गैस और अफारा नहीं होता।
*  
बवासीर से छुटकारा: दस जायफल देशी घी में अच्छी तरह सेंककर पीस-छान लें।  इसमें दो कप गेहूं का आटा मिलाकर घी में फिर सेकें।और शक्कर मिलाकर रोजाना सुबह खाली पेट एक-एक चम्मच खाएं। 
* नीबू के रस में जायफल घिसकर भोजन के बाद सेवन करने से गैस और कब्ज की शिकायत दूर होती है।
* दूध पाचन:  शिशु को यदि ऊपर का दूध न पचता न हो तो दूध में आधा पानी मिलाकर, इसमें एक जायफल डालकर उबालें, कुनकुना गर्म, शिशु को पिलाएँ। यह दूध शिशु को हजम हो जाएगा।

सावधानी: ज्यादा मात्रा में सेवनकरने से यह मादक प्रभाव उत्पन्न करता है। इसका प्रभाव मस्तिष्क पर कपूर के समान होता है, जिससे चक्कर आना, प्रलाप आदि लक्षण प्रकट होते हैं।


 इलायची CARDAMOMS एला
इलायची दो प्रकार की होती है-छोटी और बड़ी। यह भारत तथा इसके आस पास के गर्म देशों में मात्रा में उगाई जाती है। इसके पौधे हल्दी के पेड़ के सामान होते हैं | इलायची खाने में स्वादिष्ट होती है अतः इसका प्रयोग खाद्य पदार्थों में किया जाता है | छोटी इलायची की तासीर ठंडी है। इसका सेवन 1-3 ग्राम की मात्रा में किया जाता है। यह कफ, खांसी, श्वास व बवासीर नाशक है और ह्रदय एवं गले की मलिनता को दूर करती है। इसको खाने से मुख की दुर्गन्ध दूर होती है और जी का मिचलाना बंद हो जाता है।


* लगभग 10 ग्राम इलायची को 1 लीटर पानी में डालकर पकाएं। जब एक चौथाई शेष रह जाए, तब उसे उतारकर ठंडा कर लें। इस पानी को थोड़ी-थोड़ी देर में, घूँट-घूँट करके पीने से, हैजा व मूत्रावरोध रोगों में लाभ होता है।
* Cardamom Pods are of two varieties: Small & Large. 
* Used to flavor curries, masala chai and certain vegetables and desserts and is one of the components of Garam masala.
* Used for its strong but very pleasing flavor.
* छोटी इलायची के दानों को तवे पर भून कर पीस लें। इस चूर्ण को शहद या देसी घी में मिलाकर सुबह-शाम चाटने से, खांसी में लाभ होता है | 
सावधानी:  अधिक मात्रा में उपयोग आँतों के लिए हानिकारक होता है। 


दालचीनी CINNAMON 
Its used for the sweet and pleasing flavor. It is the bark of the cinnamon tree and one of 
the spices in Garam masala. It is normally used to flavor curries, masala chai and certain vegetables and Indian desserts.
* इसका आमतौर पर मसालोँ में उपयोग होता है।  यह पेट रोग, इंफ्यूएंजा, टाइफाइड, टीबी और कैंसर जैसे रोगों में उपयोगी पाई गई है। दालचीनी का तेल बनता है। दालचीनी,साबुन, दांतों के मंजन, पेस्ट, चाकलेट, सुगंध व उत्तेजक के रूप में काम में आती है। चाय, काफी में दालचीनी डालकर पीने से स्वाद के साथ-साथ जुकाम भी ठीक हो जाता है।
* दालचीनी का तेल दर्द, घावों और सूजन दूर करता है।
* इसको तिल के तेल, पानी, शहद में मिलाकर उपयोग करना चाहिए। दर्द वाले स्थान पर मालिश करने के बाद इसे रात भर रहने देते है। मालिश अगर दिन में करें तो, 2-3 घंटे के बाद धोना चाहिये।
* यह त्वचा को निखारती है और खुजली के रोग को दूर करती है।
* यह सेहत के लिए लाभकारी है। यह पाचक रसों के स्त्राव को भी उत्तेजित करती है। यह दांतों को स्वस्थ रखने में भी उपयोगी है।
* रात को सोते समय नियमित रूप से एक चुटकी दालचीनी पाउडर शहद के साथ मिलाकर लेने से मानसिक तनाव में राहत मिलती है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
* दालचीनी का नियमित प्रयोग मौसमी बीमारियों को दूर रखता है।
* ठंडी हवा से होने वाले सिरदर्द से राहत पाने के लिए दालचीनी के पाउडर को पानी में मिलाकर पेस्ट बनाकर माथे पर लगाएं।
* दालचीनी पाउडर में नीबू का रस मिलाकर लगाने से मुंहासे व ब्लैक हैड्स दूर होते हैं।
* दालचीनी, डायरिया व जी मिचलाने में भी औषधी के रूप में काम में लाई जाती है।
* मुंह से बदबू आने पर दालचीनी का छोटा टुकड़ा चूसें। यह एक अच्छी माउथ फ्रेशनर भी है।

* दालचीनी में एंटी एजिंग तत्व उपस्थित होते हैं। एक नीबू के रस में दो बड़े चम्मच जैतून का तेल, एक कप चीनी, आधा कप दूध, दो चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर पांच मिनट के लिए शरीर पर लगाएं। इसके बाद नहा लें, त्वचा खिल उठेगी।
* दालचीनी पाउडर की तीन ग्राम मात्रा सुबह-शाम पानी के साथ लेने पर दस्त बंद हो जाते हैं।
* आर्थराइटिस का दर्द दूर भगाने में शहद और दालचीनी का मिश्रण बड़ा कारगर है।
* गंजेपन या बालों के गिरने की समस्या बेहद आम है। इससे छुटकारा पाने के लिए गरम जैतून के तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर का पेस्ट बनाएं। इसे सिर में लगाए और पंद्रह मिनट बाद धो लें।
* एक चम्मच दालचीनी पाउडर और पांच चम्मच शहद मिलाकर बनाए गए पेस्ट को दांत के दर्द वाली जगह पर लगाने से फौरन राहत मिलती है।
* सर्दी जुकाम हो तो एक चम्मच शहद में एक चौथाई चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर दिन में तीन बार खाएं। पुराने कफ और सर्दी में भी राहत मिलेगी।
* पेट का दर्द-शहद के साथ दालचीनी पाउडर लेने पर पेट के दर्द से राहत मिलती है।
* खाली पेट रोजाना सुबह एक कप गरम पानी में शहद और दालचीनी पाउडर मिलाकर पीने से फैट कम होता है। इससे मोटे से मोटा व्यक्ति भी दुबला हो जाता है।


CLOVE लौंग
Used for its pleasing flavor. and is one of the spices in Garam masala. It easily loses its flavor and is used to flavor curries, masala chai and certain vegetables.
* यह भोजन का जायका-स्वाद  बढ़ाना और दर्द से छुटकारा, दोनों में ही लौंग फायदेमंद है। सर्दी-जुकाम से लेकर कैंसर जैसे गंभीर रोग के उपचार में लौंग का इस्तेमाल किया जाता है। 
* मसाले के रूप में लौंग का इस्तेमाल शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें प्रोटीम, आयरन, कार्बोहाइड्रेट्स, कैल्शियम, फॉस्फोरस, पोटैशियम, सोडियम और हाइड्रोक्लोरिक एसिड भरपूर मात्रा में मिलते हैं। इसमें विटामिन ए और सी, मैग्नीज और फाइबर भी पाया जाता है।
* यह एक  बेहतरीन नैचुरल पेनकिलर है। इसमें मौजूद यूजेनॉल ऑयल दांतों के दर्द से आराम दिलाने में बहुत लाभदायक है। दांतो में कितना भी दर्द क्यों न हो, लौंग के तेल को उनपर लगाने से दूर हो जाता है। एंटीबैक्टीरियल गुणों की वजह से इसका इस्तेमाल  टूथपेस्ट, माउथवाश और क्रीम बनाने में किया जाता है।
फ्लेवोनॉयड्स अधिक मात्रा में होने से यह गठिया रोग में जोड़ों में होने वाले दर्द व सूजन से आराम के लिए भी लौंग का तेल बहुत फायदेमंद है। * लौंग के तेल को सूंघने से श्वास संबंधी रोगों-जुकाम, कफ, दमा, ब्रोंकाइटिस, साइनसाइटिस में तुरंत आराम मिल जाता है।
* लौंग व इसके तेल में एंटीसेप्टिक गुण होने के कारण  फंगल संक्रमण, कटने, जलने, घाव हो जाने या त्वचा संबंधी अन्य समस्याओं के उपचार में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
*  इसमें मौजूद तत्व 
पाचन संबंधी समस्याओं-अपच, उल्टी गैस्ट्रिक, डायरिया आदि समस्याओं से आराम दिलाने में मददगार हैं।

*  लौंग में मौजूद युजेनॉल नामक तत्व के कारण इसके इस्तेमाल से फेफड़े के कैंसर और त्वचा के कैंसर को रोकने में काफी मदद मिल सकती है। 
* इसका सेवन शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है और रक्त शुद्ध करता है। इसका इस्तेमाल मलेरिया, हैजा जैसे रोगों के उपचार के लिए दवाओं में किया जाता है। डायबिटीज में लौंग के सेवन से ग्लूकोज का स्तर कम होता है। लौंग का तेल दर्द निवारण के साथ-साथ मच्छरों को दूर भगाने में सहायक है। 
सावधानी: लौंग का तेल सीधे त्वचा पर न लगाकर किसी अन्य तेल में मिलाकर करना चाहिए।

TURMERIC-हल्दी
:: यह प्रायः एक मसाले के तौर पर प्रयुक्त होती है। दूध में मिलाकर पिनें से यह जमे हुए खून को पतला करती है और दर्द से मुक्ति खिलाती है। यह एक कीटाणुनाशक भी है। इसमें एंटीसेप्टिक, एंटीबायोटिक और दर्द निवारक तत्व पाए गए हैं। यह सूजन को कम करने में सहायक होते हैं। घाव पर हल्दी का लेप लगाने से वह ठीक हो जाता है। हल्दी-चुने के लेप से हड्डी का दर्द बहुत जलती निकलता है। चोट लगने पर दूध में हल्दी डालकर पीने से दर्द में राहत मिलती है। एक चम्मच हल्दी में आधा चम्मच काला गर्म पानी के साथ फांखने से पेट दर्द व गैस में राहत मिलती है। इसका प्रयोग चन्दन और नीबू के साथ एक सौंदर्य वर्ध्रक के रूप में भी किया जाता है। 
Turmeric is a root grown in India since time immemorial and used as a spice due to its medicinal properties from clotting of wounds-anti-inflammatory properties, to blood purifier and booster of immunity. it is found to have several nutrients, including dietary fibre, sodium, vitamin C, E, K, calcium, iron, zinc and magnesium.
(1).  It speeds up the healing process of wound of skin due to its antiseptic properties. When it is mixed with  aloe Vera gel, it becomes more effective.
(1.1). Its paste made with jaggery and lime is great help in removing the pus (a thick yellowish or greenish opaque liquid produced in infected tissue, consisting of dead white blood cells and bacteria with tissue debris and serum) from the infected wounds.
(2). It has been shown to affect cancer growth and has been used to prevent prostate cancer or even destroy the existing cancer cells when combined with cauliflower.
(3). It may promote metabolism and help you lose weight as it’s effective in reducing insulin resistance which is the key to weight loss. Turmeric also improves digestion, as well.
(4). Many spices that with anti-flammatory effects are being used to treat arthritis and one of the most promising of them is turmeric, as it contains chemicals that work similarly to some anti-inflammatory medicines.
(5). Turmeric can increase the production of bile by the gallbladder and the liver uses bile to detox the blood, this factor supports good liver health.
(6). It effects in preventing Alzheimer’s disease, since it contains several agents that block the formation of beta-amyloid, which is responsible for the plaques that slowly obstruct cerebral function in Alzheimer’s disease.
(7). The presence of curcumin makes turmeric good for treating depression, as curcumin may increase the serotonin levels, which does well in the regulation of memory, sleep, mood as well as learning, and it’s clear that these behaviours play a role in depression.
(8).  It can be used in treating diabetes, particular type-2 diabetes by helping reduce insulin resistance.
(9). It maintains cholesterol at a healthy level & reduce serum cholesterol levels.
(10). When one drinks a teaspoon of turmeric mixed in a glass of warm milk he feels better. It is quite helpful against  cold or flu. This is due to the substance called lipopolysaccharide present in it.
(11). It provides instant relief from body aches-pains of all sorts, especially muscular pains.
(12). Its used to protect the skin and mild rubbing of its paste all over the body is of great use.
(13). Its paste with sandal wood is applied over the face to clear the rashes and dark complexion.
GINGER-अदरक: 
यह स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है। इसके नियमित प्रयोग से पेट ठीक रहता है। रोजमर्रा बनाई जाने वाली सब्जियों में अदरक का उपयोग अच्छा होता है। इससे शरीर के होने वाले वात रोगों से मुक्ति मिलती है।
* अगर किसी व्यक्ति को खाँसी के साथ कफ भी हो गया हो, तो उसे रात को सोते समय दूध में अदरक उबालकर पिलाएँ। यह प्रक्रिया क़रीबन 15 दिनों तक अपनाएँ। इससे सीने में जमा कफ आसानी से बाहर निकल आएगा। इससे रोगी को खाँसी और कफ दोनों में आराम होगा। रोगी को अदरक वाला दूध पिलाने के बाद पानी न पीने दें। 

सर सर्द एक आम बीमारी है। सिरदर्द हो रहा हो तो सूखी अदरक को पानी के साथ पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे माथे पर लगाएं। इसे लगाने पर हल्की जलन जरूर होगी लेकिन यह सिरदर्द दूर कर देगा।

CHILLIES

green chili peppersThe chili pods belong to the nightshade family of Solanaceae, within the genus; capsicumIts a  perennial small shrub with woody stem growing up to a meter height and bears white colored flowers; grown in India since ages. Its pods are very variable in size, shape, color, and pungency. Depending on the cultivar type, they range from the mild, fleshy, bell peppers to the tiny, fiery, finger-like chili peppers. 

Red chilies peppers are available throughout the year, like cayenne pepper to add zest to flavor  dishes around the world along with health. 

They cause burning sensation-strong spicy taste, over the tongue which usually  bring out tears in the eyes; due to the presence of active alkaloid compounds: capsaicin, capsanthin and capsorubinThe hotness of chili is measured in Scoville heat units (-SHU). On the Scoville scale, a sweet bell pepper scores 0, a jalapeno pepper around 2,500-4,000 units, and a Mexican habaneros have 200,000 to 500,000 units.

dry chili peppers with seedsIt contains numerous tiny, white, or cream colored, circular and flat seeds. The seeds are actually clinging around the central white-placenta. To harvest, chilies can be picked up while they are green or when they reach complete maturity and dried in the plant. Usually, the fruits are picked up by hand, when they are mature having turned red. They are dried in sunlight, which causes them to shrivel. 

CONTENTS: Vitamin E: 13.7%, Vitamin-A: 8.8%, Fiber: 7.5%, Vitamin-B: 66.4%, Vitamin-K: 6.3%, Copper: 5.5%, Iron: 5.1%, Manganese: 4.5%, Vitamin B-1 (-Thiamine):33.9%, Vitamin B-6 (-Pyridoxine): 23.8%, Potassium: 3%-7%. 100 gm fresh chilies provide about 143.7 µg or about 240% of RDA, a good source of Vitamin C. 

HEALTH BENEFITS

* Capsaicin-major content of chilies, has anti-bacterial, anti-carcinogenic, analgesic and anti-diabetic properties. It also found to reduce LDL cholesterol levels in obese individuals.

* They are also good in other antioxidants like vitamin A and flavonoids like ß-carotene, α-carotene, lutein, zea-xanthin and cryptoxanthin. These antioxidant substances in capsicum help to protect the body from injurious effects of free radicals generated during stress, diseases conditions. Presence of Vitamin A helps in curing troubles like night blindness and improves ability to fight off infections.
* Chilies contain a good amount of minerals like potassium, manganese, iron, and magnesium. Potassium is an important component of cell and body fluids that helps controlling heart rate and blood pressure. Manganese is used by the body as a co-factor for the antioxidant enzyme, super-oxide dismutase.
* Chilies are also good in B-complex group of vitamins such as niacin, pyridoxine (vitamin B-6), riboflavin and (vitamin B-1). These vitamins are essential in the sense that body requires them from external sources to replenish.

*Natural Pain Relief: Topical capsaicin is a recognized treatment option for osteoarthritis pain. Several review studies of pain management for diabetic neuropathy have listed the benefits of topical capsaicin to alleviate disabling pain associated with this condition. Patients having symptoms associated with psoriasis, when treated with capsaicin   showed significant improvement. 

*Cardiovascular Benefits: Red chili peppers, such as cayenne, have been shown to reduce blood cholesterol, triglyceride levels, and platelet aggregation, while increasing the body's ability to dissolve fibrin, a substance integral to the formation of blood clots. Cultures where hot pepper is used liberally have a much lower rate of heart attack, stroke and pulmonary embolism.

*Spicing  meals with chili peppers may also protect the fats in the blood from damage by free radicals-a first step in the development of atherosclerosis. Rate of oxidation (-free radical damage to cholesterol and tri-glycerides) is significantly lowered by the consumption of green chilies. Resting heart rate is reduced and amount of blood reaching the heart is enhanced.

*Clear Congestion: Capsaicin not only reduces pain, but also stimulates secretions that help clear mucus from stuffed up nose or congested lungs.

*Boost Immunity: Vitamin C coupled with vitamin A acts as anti-infection agent protects mucous membranes, which line the nasal passages, lungs, intestinal tract and urinary tract and serve as the body's first line of defense against invading pathogens. Carotenoids present in it  helps in improving insulin regulation.

Vitamin C is a potent water-soluble antioxidant. It is required for the collagen synthesis in the body. Collagen is the main structural protein in the body required for maintaining the integrity of blood vessels, skin, organs, and bones.  Vitamin C helps the body in the protection of body from scurvy; develop resistance against infectious agents (-boosts immunity) and scavenge harmful, pro-inflammatory free radicals from the body. Presence of vitamin C helps in fighting  anemia, bleeding under the skin and horrible gum problems.

*Help Stop the Spread of Prostate Cancer: It stops the spread of prostate cancer cells. 

*Prevent Stomach Ulcers: It helps prevention of ulcers by killing bacteria ingested in the body, while stimulating the cells lining the stomach to secrete protective buffering juices.

*Lose Weight: Even sweet red peppers have been found to contain substances that significantly increase thermogenesis (-heat production) and oxygen consumption, leading to weight loss.

*Lowers risk of Type 2 Diabetes: It help in reducing hyper-insulinemia (-high blood levels of insulin), a disorder associated with type 2 diabetes. It result in a lower ratio of C-peptide-insulin, an indication that the rate at which the liver is clearing insulin has increased. 

WARNING: One must keep the level of chilies in the food to minimum possible.

CORIANDER धनिया 
BINOMIAL NAME: CORIANDER SATIVUM 
SCIENTIFIC CLASSIFICATION
KINGDOM: Plantae, (Angiosperms, Eudicots, Asterids)
ORDER: Apiales
FAMILY: Apiaceae
GENUS: Coriandrum
SPECIES:  Sativum
Coriandrum sativum - Köhler–s Medizinal-Pflanzen-193.jpgThe most common use of coriander is in curry powders. It is an essential ingredient of garam masala गर्म मसाला, pickling spices and pudding spices and also used in cakes, breads and other baked foods. Besides being used as a fragrant flavor, Coriander seeds also have a health-supporting reputation.
 NUTRITIONAL VALUE (-per 100 g):
Energy: 95 (23 k cal), Carbohydrates: 3.67 g, Sugars:  0.87, Dietary fiber: 2.8 g, Fat: 0.52 g, Protein: 2.13 g.
VITAMINS: Vitamin A: 337 μg, Thiamine (B-1):0.067 mg, Riboflavin (B-2):    (14%) 0.162 mg, Niacin (B-3): 1.114 mg, Pantothenic acid (B-5): 0.57 mg, Vitamin (B-6): 0.149 mg, Folate (B-9): 62 μg, Vitamin C: 27 mg, Vitamin E: 2.5 mg, Vitamin K: 310 μg.
TRACE METALS: Calcium: 67 mg, Iron: 1.77 mg, Magnesium: 26 mg, Manganese: 0.426 mg, Phosphorus: 48 mg, Potassium: 521 mg, Sodium: 46 mg, Zinc: 0.5 mg.
MAIN COMPONENT (-Water): 92.21 g.
HEALTH BENEFITS:
(3). DIABETES: It stimulates the production of insulin which helps in maintaining blood sugar. It reduces LDL (-bad cholesterol) and increases HDL (-good cholesterol) in the blood. Its used in traditional treatment for type 2 diabetes. It has been found that coriander extract initiates both insulin-releasing and insulin-like activity.
(4). ANTI BACTERIAL: Chemicals derived from coriander leaves were found to have antibacterial activity against Salmonella choleraesuis and this activity was found to be caused in part by these chemicals acting as non-ionic surfactants. Many food and water borne diseases like cholera, typhoid, food poisoning, dysentery etc. are caused by bacteria (-Salmonella). Essential oil produced from Coriandrum sativum has been shown to exhibit antimicrobial effects.
(5). ANEMIA: Iron is a measure component of hemoglobin, RBC's in the blood. Women are helped a lot by it after pregnancy due to rich iron. It cures the dark skin below the eye lids, formed due to deficiency of iron.
(6). DETOX REMEDY:  It's seeds contain natural compounds which help to detox the body and remove all the traces of heavy toxic metals like lead, arsenic, mercury, aluminium etc. which get accumulated in the body leading to serious health problems like Alzheimer’s disease, loss of memory, defective vision-eyesight, improper functioning of cardio-vascular and neurological system.
(7). EYE CARE: High antioxidant content reduces redness, itchiness and inflammation in the eyes due to conjunctivitis (-red soar eye).
(8). WOMAN'S HEALTH: It helps to prevent menstrual irregularities, if the seeds are boiled and the filtered extract is consumed thrice every day.  
(9). SKIN DISEASES: It's quite effective for curing various skin diseases like eczema, itchy skin, rashes and inflammation. Gargle with boiled coriander water reduces mouth ulcers and sores. Paste of coriander seeds with a little bit of water and a teaspoon of honey when applied cures itchy skin and rashes providing instant relief.
(10). PIMPLES: Anti-bacterial properties of coriander seeds work as an effective home remedy for pimples, acne and blackheads. Its paste made with honey and turmeric provides effective cure-treatment. 
(11). DARK LIPS: A mixture of coriander and lemon juice applied over the lips overnight for some days, turn the lips to pink.
(12). HAIR LOSS: A paste made of powdered coriander seeds and hair oil used to massage the  scalp at least twice a week prevents further hair fall and help stimulate the roots for the growth of new hair.
WARNING: Coriander can produce an allergic reaction in some people.

CUMIN-जीरा
SCIENTIFIC CLASSIFICATION:
KINGDOM: Plantae, Angiosperms, Eudicots, Asterids, ORDER: Apiales, FAMILY: Apiaceae, GENUS: Cuminum, SPECIES: Cyminum, BINOMIAL NAME: Cuminum Cyminum.
In Sanskrat, Cumin is known as Jeera (-जीरा) that helps in digestion of food. It’s the dried seed of Cuminum cyminum-a herb and a member of the parsley family. Its plant grows to a height of 30–50 cm and is harvested by hand. Its seeds have been used as a spice for taste, distinctive flavor and aroma. It can be used both in powdered form and whole seeds. It’s fried with onions to brown color before mixing vegetables or pulses in it. In some cases it fried till it turns black. Its fried to blackness and then added as a powder to yogurt.
MEDICINAL USES: In Ayurvedic system of medicine, dried Cumin seeds are used for medicinal purposes in different forms like kashy (-कष्य, decoction), arisht (-अरिष्ट fermented decoction), vati (-वटी गोली tablet, pills), and processed with ghee (-clarified butter). It is used internally and sometimes for external application also. It is known for its actions like enhancing appetite, taste perception, digestion, vision, strength, and lactation. It is used to treat diseases like fever, loss of appetite, diarrhea, vomiting, abdominal distension, edema and puerperal disorders.
Jal Jeera (-जल जीरा) is a popular drink in India, made by boiling cumin seeds in water. It is understood that cumin is beneficial for heart disease, swellings, tastelessness, vomiting, poor digestion and chronic fever. Jeera water is believed to improve saliva secretion, provide relief in digestive disorders.
METABOLITES:
Cuminaldehyde, cymene and terpenoids are the major volatile components of cumin. It   can be used as an antioxidant. The anti-oxidative potential is correlated with the phenol content of cumin. Cuminaldehyde has also antimicrobial and anti-fungal properties with Escherichia coli and Penicillium chrysogenum.
जल जीरा 
NUTRITIONAL COMPONENTS: 
Carbohydrates: 44.24 g, Sugars: 2.25 g, Dietary fiber: 10.5 g, Fat: 22.27 g, Saturated Fats: 1.535 g, Monounsaturated Fats:14.04 g, Polyunsaturated Fats: 3.279 g, Protein:17.81 g, Vitamins: Vitamin A equiv.- (8%) 64 μg, Beta-carotene-(7%) 762 μg, Vitamin A 1270 IU, Thiamine (B 1) (55%) 0.628 mg, Riboflavin (B2) (27%) 0.327 mg, Niacin (B 3) (31%) 4.579 mg, Vitamin B 6 (33%) 0.435 mg, Folate (B 9) (3%) 10 μg, Vitamin B 12 (0%) 0 μg, Choline (5%) 24.7 mg, Vitamin C (9%) 7.7 mg, Vitamin D (0%) 0 μg, Vitamin D (0%) 0 IU, Vitamin E (22%) 3.33 mg, Vitamin K (5%) 5.4 μg, Trace metals, Calcium (93%) 931 mg, Iron (510%) 66.36 mg, Magnesium (262%) 931 mg, Manganese (159%) 3.333 mg, Phosphorus (71%) 499 mg, Potassium (38%) 1788 mg, Sodium (11%) 168 mg, Zinc (51%) 4.8 mg
Other constituents: Water 8.06 g.
HEALTH BENEFITS
(1) DIABETES: It lowers blood sugar levels helping in maintenance of proper blood content levels in the body by increasing insulin level in the body, serving as a boon for people suffering from Diabetes.
(2) ANEMIA: Rich in Iron- an essential ingredient of blood it helps in the treatment of anemia by enhancing hemoglobin and RBC's in the blood.
(3). ASTHMA:  Thymoquinone present in it which reduces inflammatory processes and other mediators that cause asthma acting as a bronchodilator.
(4). IMMUNITY: Anti-oxidant and free radicals present in it makes the body immune against microbes. It is found to control metabolic activities as well.
(5). MENSTRUAL CYCLE: It helps in correcting the disorders pertaining to periods of women of all ages.
(6). CANCER: It is helpful in treating colon and breast cancer due to the presence of thymoquinone , dithymoquinone, thymohydroquinone and thymol which are anti-carcinogenic agents.
(7). COLD & RESPIRATORY DISEASES: Presence of Vitamin C helps in fighting common cold and resists microbes like fungus.
(8). DIGESTION: It can stimulate the production of pancreatic enzymes and helps in digestion.
(9). MEMORY LOSS: It’s protective against memory loss and the damaging effects of stress on the body.
(10). BOILS: Regular usage of cumin in the food helps in keeping skin free from boils, rashes, pimples etc. because of Cuminaldehyde, Thymol and phosphorus. Acne or boils may be treated by using powdered cumin with vinegar.
(11). SKIN DISORDERS: High content of Vitamin E keeps the skin healthy and glowing. Application of cumin paste on boils, pimples, eczema, psoriasis and other skin disorders helps in quick healing. Fiber helps in removing toxins. It acts as an anti-ageing agent.
(12). RELIEF FROM HEAT-LOO: Drinking cumin-Jeera water relieves the burning sensation of the palms and the soles. It is specially used in summers.
(13). FACE PACK: You can prepare a face pack by mixing Fine turmeric and cumin powder mixed in the ratio 3: 1 along with honey is used as a face pack. Jojoba oil is applied after washing off the face.
(14). HAIR PROTECTION: It helps to replenish hair, combat thinning of hair, baldness and falling hair if a mixture of black cumin oil and olive oil, is applied after a bath. Not only this it’s helpful growing long and shiny hair in addition to removing dandruff.


BLACK PEPPER-काली मिर्च 
* यह घरेलू नुस्खों से रोगों को भी ठीक करने के लिए भी प्रयोग की जाती है। 
* इसमें कैल्शियम, मैंगनीज, आयरन, फास्फोरस, कैरोटीन, थायमीन रिबोफ्लोवीन, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन आदि पौषक तत्व पाये जाते हैं। 
* इसमें मौजूद पिपराइन नामक यौगिक, त्वचा में पिगमेंट-रंग बनाने में सहायक होता है । यह विटिलिगो के कास्मेटिक्स से किए जाने वाले इलाज की अपेक्षा कहीं ज्यादा कारगर साबित होता है।यह एक एंटीऑक्सीडेंट भी है।
* यह उदरपीड़ा, डकार और अफारा मिटाकर कामोत्तेजना एवं विरेचन का कार्य करती है। 
* ये अरुचि, जीर्ण, ज्वर, दांत दर्द, मसूड़ों की सूजन, पक्षाघात, नेत्ररोग आदि में  भी हितकारी है।
* जुकाम होने पर काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर गर्म दूध के साथ करें।
* खांसी होने पर आधी-आधी चम्मच काली मिर्च और सौंठ का चूर्ण, शहद मिलाकर दिन में 3-4 बार चाटें। 
* गैस की शिकायत होने पर पानी में नीबू का रस, काली मिर्च का चूर्ण व काला नमक मिलाकर नियमित रूप से सेवन करें।
 * गला बैठने पर काली मिर्च को घी और मिश्री के साथ मिलाकर चाटने से बंद गला खुल जाता है और आवाज़ साफ़ हो जाती है।
 * बारीक पिसी काली मिर्च, मुलहठी और मिश्री को शहद के साथ मिला कर खाने से गले की तकलीफ में लाभ होता है तथा आवाज भी साफ होती है। 
* काली मिर्च पानी में उबालकर इस पानी से गरारे करने  से गले का संक्रमण दूर हो जाएगा।
* त्वचा रोग  में काली मिर्च को घी में बारीक पीसकर लेप करने से दाद-फोड़ा, फुंसी आदि रोग दूर हो जाते हैं।
*  पिसी काली मिर्च घी के साथ मिला कर रोजाना सुबह-शाम नियमित खाने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
* पेट में कीड़े होने पर काली मिर्च को किशमिश के साथ 2-3 बार चबाकर खा जाएं। छाछ में काली मिर्च का पाउडर मिलाकर पीने से भी पेट के कीड़े मर जाते हैं।
* पायरिया, कमजोर दाँत हों तो काली मिर्च को नमक के साथ मिलाकर दांतों पर लगाने से लाभ होता है। 
* वाय-गठिया  होने पर काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करेंऔर ठंडा होने पर उस तेल को मांस पेशियों पर लगाने से दर्द में आराम मिलेगा।
* याददाश्त बढ़ाने के लिये काली मिर्च को शहद में मिलाकर खाएं।
* पेट में कांटा, कांच का टुकडा आदि चले जाने पर पके हुए अनन्नास के साथ काली मिर्च और सेधा नमक लगाकर खाने से पेट में गया हुआ कांच या कांटा निकल आयेगा। 
* कब्ज होने पर काली मिर्च के चार-पांच साबुत दाने दूध के साथ रात को लेने से कब्ज में लाभ मिलता है।
* मलेरिया होने पर काली मिर्च के चूर्ण को तुलसी के रस में मिलाकर पीने से लाभ होता है।
* कम  ब्लड प्रेशर  होने पर कालीमिर्च के साथ किशमिश का सेवन करें। 
* काली मिर्च को सुई से छेद कर दीये की लौ से जलाएं। जब धुआं उठे तो इस धुएं को नाक से अंदर खीच लें। इस प्रयोग से सिर दर्द ठीक हो जाता है। हिचकी चलना भी बंद हो जाती है। 
* काली मिर्च, जीरा और शक्कर या मिश्री कूट-पीस कर मिला लें। इसे सुबह-शाम पानी के साथ फांकने से  लें। बवासीर रोग में लाभ होता है।
* इसका प्रयोग नेत्र ज्योति में बडा सहायक होता है।  
* श्वास संबन्धी रोग, खांसी में इसका चूर्ण गुड में मिला कर चाटने से  आराम मिलता है। 
* पानी में तुलसी, काली मिर्च, अदरक लौंग और इलाइची को चाय के साथ उबाल कर पीने से जुखाम व बुखार में लाभ होता है।  
* नींबू के टुकडों से बीज निकालकर इसमें पिसा काला नमक और काली मिर्च पाउडर भर कर गर्म कर के चूसने से बदहजमी में लाभ मिलता है। 
*  गर्म पानी में पिसी काली मिर्च के साथ नींबू का रस मिला कर पीने से गैस की शिकायत दूर होती है। 
* आटे में देशी घी और शक्कर मिलाकर इसमें सफेद काली मिर्च का पाउडर मिला कर सुबह-शाम सेवन करने से अथवा त्वचा पर कहीं भी फुंसी उठने पर काली मिर्च पानी के साथ पत्थर पर घिस कर लगाने  से  फुंसी बैठ जाती है।
* कालीमिर्च, हींग, कपूर का (-सभी पांच-पांच ग्राम) मिश्रण बनाएं और राई के बराबर गोलियां बना कर तीन -तीन घंटे बाद एक गोली लेने से उल्टी, दस्त बंद हो जाते हैं। 
AJWAIN-CAROM SEEDS-BISHOP'S WEED
Beside being used as a culinary and aromatic spice in various cuisines, it's widely recommended for medicinal purposes like as a calming herb to ease intestinal colic, stimulating the appetite, treatment of diarrhea, bronchitis, bronchial asthma and in laryngitis as a gargle. Another main use has been to increase milk flow in nursing mothers. 
1. INDIGESTION:  It’s the only plant in the world with the highest amount of thymol-a chemical which is very effective in helping the stomach release gastric juices that speed up digestion. It corrects indigestion, flatulence, nausea and relieve colicky pain in babies.
2. PREGNANCY AND LACTATION: It helps to improve digestion, ward off constipation due to pregnancy and strengthens the muscles of the uterus, in expecting mothers. After pregnancy Ajwain is known to heal the woman’s body internally, reduce inflammation and helps maintain good blood circulation. It improve the production of milk in lactating mothers.
3. COUGH AND ASTHMA: The thymol, present in it is a great local anesthetic, anti-bacterial and anti-fungal. It is known to relieve congestion due to formation of phlegm even in severe cases. 
4. RHEUMATIC AND ARTHRITIC PAIN: Due to its anti-inflammatory  and anesthetic properties, it helps in rheumatism and arthritis. Besides consuming it orally, its paste can be applied over the affected area for instant relief.
5. EAR ACHE: Due to its antiseptic properties Ajwain mixed with garlic and sesame oil, provides instant relief from ear ache. Ear ache due to congestion is relieved, if ajwain boiled in milk is consumed. 
6. APHRODISIAC: Drinking of a mixture of powdered Ajwain & Tamarind with honey, ghee and milk, helps in increasing vitality and libido.
7. PROTECTION OF HEART: Presence of niacin and thymol, in it along with other vitamins, helps in preserving heart. It improve nerve impulses and overall circulation of blood. Consumption of boiled Ajwain in hot water on an empty stomach regularly protects the heart from diseases.
8. HICCUPS: Due to it's ability to reduce inflammation and soothing of nerves, it's used to stop hiccups instantly. 
9. ACIDITY: A mixture of powdered Ajwain & Jeera helps in relieving acidity. The thymol content helps release stomach acids which helps reduce the regurgitation of acids. 
10. MIGRAINE:  Sniffing the fumes of Ajwain or applying its paste on the head helps relieve the pain due to migraines. When the seed is burned or crushed into a poultice, it releases its essential oils high in thymol content, which provides a pain relieving-soothing effect.
METHI मेथी FENUGREEK 
This is a basic but not essential Indian spice which is actually a lentil and is used for its strong, bitter taste. After turmeric it has the most medically useful item in the Indian kitchen.कढ़ी, काशीफल जैसी गैस-वायु बनाने वाली सब्जियों में इसका उपयोग अत्यावश्यक है। 
It has a long history of medical uses in Indian and has been used for numerous indications, including labor induction, aiding digestion, and as a general tonic to improve metabolism and health.
1. SKIN INFLATION: Methi seeds serve as an effective topical treatment for a variety of skin-related problems. It can treat boils, abscesses, eczema, muscle pain, burns and gout among other problems. It can relieve local inflammatory pain and swelling when used as a poultice.
2. ACNE-BLACKHEADS-WRINKLES: It can be safely applied over the face by mixing it with honey as a mask to treat  cystic acne, blackheads and wrinkles effectively.  It draws out toxins accumulated underneath the epidermis and tones the outer layers of the skin. Ingestion and external application of this is useful to help one get that desired glow over the skin.
3. ANTI AGING: It's a natural anti-ageing remedy. It combats free radicals in the body; repairs damaged skin cells; and regenerates new ones, effectively. All of these together help delay the signs of ageing like wrinkles, age spots, fine lines and blemishes.
4. EXFOLIATES & LIGHTENS SKIN: Its used to lighten the complexion along with treating-curing under-eye dark circles
5. PREVENTS SUN BURNS: It effectively protects the skin from sun burns-cosmic radiations-ultra violet light. It treats skin blemishes under the eyes, as well. 
6. HAIR GROWTH:  It can be incorporated in diet or applied directly on hair in the form of a paste.It contain proteins and nicotinic acid which are a great source for hair growth. It contains large amounts of lecithin which makes the hair healthy and strong, and hydrates the hair. It helps to reduce the dryness of the hair, cures dandruff, acts against baldness, conditions the hair, prevent premature graying, keeps the scalp cool and treats a variety of scalp issues. It is highly effective against hair fall and provides strength from the roots.
It's extremely effective in strengthening the hair from the roots and treating follicular problems. The seeds contain hormone antecedents that enhance hair growth and help in rebuilding the hair follicles. The lecithin in methi helps in strengthening dry and damaged hair. The natural tonic helps in moisturizing the hair and bringing back the luster and bounce. This is why methi seeds for hair growth has been an ancient technique prevalent in India.
7. BLOOD CHOLESTEROL: It helps  helps in lowering the cholesterol level, specially the bad cholesterol or LDL & reduces the risk of cardiovascular disease. Its consumption can lower the risk of heart attacks. Due to its high potassium content, it counters the action of sodium to effectively control your blood pressure.
8. DIABETES: Controls Diabetes: Its beneficial to the people who are affected by Type 2 diabetes. It contains galactomannan which is a natural soluble fiber and this decreases the rate at which sugar is absorbed into the blood. It contains amino acids which induce insulin production. 
9. HEART BURN & ACIDITY: Due to the presence of high quantities of mucilage, its consumption helps soothe digestive inflammation by coating the lining of our stomach and intestine. 
10.  DIGESTION: Its seeds have a high content of Vitamin A and C, calcium, iron, proteins, carbohydrates and trace minerals. It provides an effective treatment for gastritis and indigestion. It helps prevent constipation & digestive problems created by stomach ulcers. Its known to detoxify the liver as well.
11. WEIGHT LOSS: Its seeds are known to induce weight loss by suppressing appetite. Seeds soaked overnight and chewed  in the morning with an empty stomach, contains natural fiber which swells inside and gives a feeling of fullness, thereby helping to suppress one’s appetite and in turn induces weight loss. 
12. FEVER & SORE THROAT: When its consumed thrice a day with a teaspoon of lemon and honey, fever is reduced. Due to the presence of mucilage, it also has a soothing effect, helping to relieve the pain of a sore throat.
13. BREAST ENLARGEMENT: Women with flat chest or small breast may try this natural remedy, as  balance the hormones with its oestrogen like properties.
14. LACTATION: Diosgenin contained in methi seeds helps to increase milk production in lactating mothers. Hence, this is essential for nursing mothers. It contains phyto-estrogen, & diosgenin which boosts milk production in lactating mothers.  Its extract is well known to stimulate uterine contraction, which helps to speed up and ease childbirth.  Use this remedy only after consulting the doctor.
15. WOMEN'S HEALTH PROBLEMS: It's known to relieve menstrual cramps, hot flushes, discomfort and moodiness due to its calming effect on the hormonal system. It's very effective in treating the symptoms of menopause like hot flashes, insomnia and anxiety.
16. PROTECTS KIDNEY: It immensely aids the prevention and treatment of painful kidney stones by reducing calcification in the kidney and flushing it out via urine.
17. PREVENTS BLOOD CLOTTING & HYPERTENSION: Being an amazing liver detoxifier, it purifies the blood and prevent clotting of blood. It also benefits people suffering from hypertension. 
18. PREVENTS CANCER: Diosgenin, a compound found in it is believed to have anti-carcinogenic properties, which may help to ward off cancer cells. The saponins present in the seeds inhibit bile salts re-absorption and toxins in the food to protect the colon mucous membranes from cancer.
19. ANTI OXIDANTSThe antioxidants in it act as a scavenger to destroy the free radicals found in the body.
20. PREVENTION OF RESPIRATORY PROBLEMS: It disperses mucus from the respiratory tract to cure bronchitis. It also benefits people suffering from chronic sinusitis by clearing the sinuses. A gargle prepared from its seeds can be very helpful in treating sore throats
PRECAUTION-CAUTION: Nausea & gastrointestinal discomforts like gastritis and diarrhea are common side effects associated with its consumption. Side effects like bloating, flatulence may also be there, if  consumed orally. It can also cause a mild skin irritation if, applied topically. People suffering from anemia should avoid its consumption as it may interfere with iron absorption. It can also cause thyroid imbalance, so avoid taking it if one is suffering from a thyroid problem. It contains mucilaginous fiber which has the potential to interfere with the absorption of oral medication. If one is under medication, he should consume this herb at least two hours before or after the medicines. Children below 2 years should not be given this in any form. 
लहसुन GARLIC:  लहसुन प्रकृति से तामसिक होने के बावज़ूद एक रामवाण अचूक औषधि के रूप में प्रयुक्त हो सकता है खासकर कड़ी सर्दी के मौसम में। ज्यादातर लोग इसे सिर्फ मसाले के तौर पर ही इस्तेमाल करते हैं।इसकी गंध बहुत ही तेज होती है जिसे बदबू की संज्ञा देते हैं। इसका स्वाद तीखा होता है। इसमें एलियम नामक एंटीबायोटिक होता है जो कि बहुत से रोगों से  बचाव में समर्थ है। इससे ब्लडप्रेशर बाबू में रहता है और हृदय संबंधी रोग होने की संभावना में कमी आती है। इसके प्रयोग से गैस्टिक ट्रबल और एसिडिटी की शिकायत नहीं होती। इसको पीसकर त्वचा पर लेप करने से विषैले कीड़ों के काटने या डंक मारने से होने वाली जलन कम हो जाती है। जुकाम और सर्दी में तो यह बेहद उपयोगी है। गठिया और अन्य जोड़ों के रोग में भी इस का सेवन बेहद लाभदायक है। इसका प्रयोग करने वाले मनुष्य के दांत, मांस व नाखून बाल व बद रंग नहीं होते हैं।  यह पेट के कीड़े मारता है व खाँसी दूर करता है। यह कब्ज निवारक और व आँखों के रोग दूर करने वाला माना गया है। इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन, खनिज, लवण यथा फॉस्फोरस, आयरन व विटामिन ए, बी व सी भी पाए जाते हैं। 
AYUR VED (3) आयुर्वेद AUSPICIOUS-USEFUL  TREES-PLANTS पवित्र-उपयोगी वृक्ष :: 
THE DIVINE TREE KALP TARU-VRAKSH कल्प तरु-वृक्ष :: Kalp Vraksh is a mythological, wish-fulfilling divine tree.[Rig Ved 1.75; 17.26]. 
When Indr-the king of the demigods-deities-heaven, lost his kingdom, he went to Bhagwan Shri Hari Vishnu, for help to regain it, who in turn advised him to churn the ocean to bring out Amrat (-elixir-nectar) so that Indr and the demigods could partake the Amrat which would make them immortal (-for one Man Vantar) and help them regain their lost kingdom. 
Fourteen treasures came out of the ocean during the churning, along with Kalp Vraksh-the wish fulfilling tree, Kam Dhenu-the wish-fulfilling cow and Dhanvantri-the master physician, an incarnation of Bhagwan Vishnu, the enemy of disease, who brought with him Ayurved, the science of healing. 
 
Durvasa Muni meditated under the Kalp Vraksh. Ashok Sundari, Bhagwan Shiv's daughter was created from it, by Mata Parvati, to alleviate her loneliness. The tree was gifted to heaven-paradise.Its branches bore every kind of fruit and flower one wished for and the apple of the tree was believed to have the virtue of conferring eternal life upon one who tasted it. 
Baobab-known as the Chemist Tree, has an average life of more than 2500 years and is one of the trees, which are traditionally used for health promoting effects. It might appear to be identical to Kalp Vraksh, but it is not Kalp Vraksh. 
Pari Jat-Har Shrangar was also recovered from the churning of the ocean. It was also taken to the paradise. But it was brought to the earth-in Dwarka-the abode of Bhagwan Shri Krashn  by Saty Bhama & Bhagwan Shri Krashn. It too has some medicinal properties.
Joshi Math in Uttaranchal, which commemorates the residence of Adi Guru Shankara Chary, has a large, ancient bodhi tree which too is locally known as the Kalp Vraksh. This tree is Peepal. Banyan tree is the mis under stood to be Kalp Vraksh.
PEEPAL (Holy fig) TREE पीपल वृक्ष :: (Holy fig-ficus religiosa) TREE is worshiped throughout India due to its medicinal and spiritual value. Shri Krashn got absorbed in meditation under this divine tree while  and his 9th incarnation Buddh  too attained nirvan under the bodhi vraksh-peepal tree. 
Bhagwan Shri Krashn said that what ever is excellent-best ultimate on this earth represents him.  He said that the peeple vraksh was one of his incarnations. So, divinity is associated with it.
 Its said to be the only tree which releases oxygen at night. It strengthens the environmental balances. Vishnu forms the roots, Keshav forms-constitutes the trunk and the Narayan forms the branches of it; representing land, fire and water respectively. Its believed that if one sleep under this tree for 6 months is relieved of many ailments-diseases.  Though tasteless monkeys are found eating them regularly due to its medicinal value.  Its bark too has medicinal impact over human skin and other organ. 
People offer water and other goods to it to protect them selves from the harmful effects-impact of Shani-The Saturn. The girl who is predicted to become widow is advised to have seven rounds around it with full marriage like ceremonies-rituals-Mantr and recitation-chanting of Vedic Shlok.
Sade Saati (71/2 years) and Dhaeiya's (2 1/2 years) bad impact is reduced/shelved completely, by the worship of Peeple. Earthen lamps having a wick soaked in mustered oil is lighted and placed near the root of this august tree, early in the morning before sun rise. The devotee should have freshen him self and chant Shani strotr/mantr Om Shnaeshwray Namo Nameh.   ॐ शनैश्वराय  नमो नम:, to appease Shani Dev. Kale Urad and kale til are offered along with water containing honey-flowers, scents, roli-moli etc.
Meditation under its shadow is always fruitful. Those who are haunted by wicked souls are also helped by it. Trouble created by witches-ghosts-phantom is also curtailed.
It provides long life and prosperity to the worshipers. The Satvik (Spiritual-pious-pure-righteous-virtuous) characters are enhanced, since it reduces the negative energy generated by the impact of Guru in ones horoscope. 
Its fruits break up and the seeds spread all over with air and automatically with the favorable season. Its planted in close proximity of religious places, Holy river, shrines but its advised not to plant it near the residences-housing complexes.
Image result for peepal leaves imagesअद्भुत पीपल-दिल के दौरे से बचने का सरल तरीका :: पीपल एक दिव्य वृक्ष है और इसके पत्तों में विलक्षण जीवन दायिनी शक्ति है। पीपल वास्तव में चमत्कारी वनस्पति है। ना केवल यह वातावरण को शुद्ध करता है, अपितु जीवन रक्षक भी है और ह्रदय की साफ़-सफाई भी बखूबी करता है। ह्रदय में पैदा हुई रूकावट को दूर करने का यह एक सरल-सस्ता और मुफ़ीत इलाज है। यह ह्रदय के 99 प्रतिशत तक अवरोध  को बखूबी दूर कर देता है। पुरुष यदि इसकी नई लाल रंग वाली कोंपलें खायें तो गर्भाधान का खतरा भी नहीं रहता। पीपल के ऐसे पत्ते जो साफ सुथरे एवं पूर्ण विकसित, जो लाल कोंपल से हरेपन को प्राप्त कर चुके हैं और नरम भी हैं, को ही प्रयुक्त करें। 15-20  पत्ते लेकर उनका ऊपर व नीचे का कुछ भाग काट दें और भली भाँति पानी से साफ कर लगभग एक लीटर पानी में धीमीं आँच पर उबालकर पकायें और एक तिहाई रहने पर छान लें। इसे ठंडे स्थान पर यथा फ़्रिज में रख लें। इस काढ़े को ह्रदय रोगी को दिन में तीन बार नियमित सेवन करना चाहिए। दिल का दौरा पड़ने के पश्चात यह काढ़ा रोगी को दें। काढ़े का सेवन कुछ हल्का-फुल्का खाकर ही करें। दिल के दौरे के बाद लगातार पंद्रह दिन तक इसका सेवन करने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और दिल का दौरा पड़ने की संभावना न्यूनतम रह जाती है। स्वस्थ व्यक्ति भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। तली चीजें, चावल, माँसाहार, मछली, अंडे, शराब, धूम्रपान, नमक (कम से कम प्रयोग करें) का प्रयोग बंद कर दें। खाने में गरिष्ठ भोजन यथा उड़द की दाल, राजमा, चने, गोभी, बैंगन, अरबी आदि का सेवन न्यूनतम कर दें। 
मसूर और मूँग की दाल, चौलाई व पालक का साग, अनार, पपीता, आँवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब का मुरब्बा, मौसंबी, किशमिश, गुग्गुल, दही, छाछ आदि का नियमित प्रयोग करें।
MUSTARD सरसों :: भारत में सरसों के तेल का उपयोग आदि काल से ही किया जाता है। इसका प्रयोग (I) खाने, (II) मालिश, (III) दवाई, (IV) प्रकाश-रोशनी  हेतु, (V) आँखों का काज़ल, (VI) सिर में लगाने आदि के लिये किया जाता रहा है। 
1. छौंकने-भूजने-तलने के लिये: दालें, सब्जियाँ, पकौड़े बनाने के लिए यह बहुत उपयोगी है।
2. दर्द नाशक: कान के दर्द में इसका प्रयोग एक दो पोदी  लहसुन या अजवाइन के साथ गर्म करके हल्के गुनगुने
 तेल की एक या दो बूँद डालने से फायदा होता है।
3. मालिश: इसके तेल से घुटनों के दर्द में मालिश करने से फायदा होता है। 
सर्दियों की धूप में बैठ कर शरीर की मालिश से शरीर की खुश्की दूर हो जाती है।
शरीर पर कील मुहासे-झाई-झुर्रियों को इसकी मालिश से रोका जा सकता है। 
नवजात शिशु और माँ दोनों की मालिश करने के लिए सरसों के  तेल की मालिश फयदेमंद है। बालों में मेहंदी का चूरा मिलाकर और छानकर लगाने से बाल झड़ना कम हो जाता है। 
धूप में  सरसों के तेल से मालिश करने के बाद नहलाने से  शिशु को सर्दी लगने का डर  नहीं रहता, यदि सर्दी लग भी गई हो तो भी ठीक हो जायेगी। 
चर्मरोगों में  आक के पत्तों का रस और थोड़ी सी हल्दी मिलाकर गर्म करके ठंडा होने पर, दाँतों में पायरिया होने पर सरसौं का तेल नमक/सैंधा नमक  के मिला कर मसूढ़ों पर  मलने से फायदा होता है। लगाने से दाद, खाज, खुजली आदि का नाश होता है।
कमर-पिडलियों के दर्द में हींग, लहसुन, अजवाइन को तेल में गर्म के हल्के गुनगुने तेल की मालिश फयदेमंद है।
गठिया-बाय की  शिकायत हो तो  सरसों के तेल में कपूर मिलाकर मालिश करने से दर्द में 
राहत मिलती है।   
4. सौंदर्य प्रसाधन: बेसन, हल्दी और चन्दन के साथ इसका उपयोग बतौर उबटन किया जाता है।
 छोटी बच्चियों  के शरीर के रोंये  इस उबटन को हल्के हाथ से रगड़ने से निकल जाते हैं।
5. स्वास्थ्य वर्धक: देशी घी के समान ही सरसौं का तेल शरीर को चुस्त दुरुस्त बनाता है।
भारत में लोग इसे सिर में लगाते हैं।
ज्यादातर लोग इसका प्रयोग थकान मिटाने के लिए करते हैं।   
इसके तेल के दिए से काजल बनाया जाता है जिसका प्रयोग ऑंखों को ठीक रखने के लिए किया जाता है। 
इसके तेल का दीया दीपावली पर  रौशनी के लिए व शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे शनि का प्रभाव कम करने के लिए जलाया जाता है। 
शनिवार के दिन लोग सरसौं के तेल का दान शनि के प्रभाव को कम करने के लिए करते हैं। 
इसके पत्तों का साग सर्दियों में बाजरे-मक्का और गेहूँ की रोटियों के साथ खाया जाता है, जिससे शरीर में आयरन-लोहे की  कमी दूर होती है और विटामिन्स भी मिलते हैं।          
RUDARAKSH रुद्राक्ष :: Rudraksh possess powers. Its beads have direct impact over the human body.It has natural healing powers.It is associated with self confidence, blood pressure, stress, anxiety, spirituality, marital/family bliss and material gains. One may opt it for the eradication of suffering.White Rudraksh is most suited for the Brahmns. Its garland with 108 pieces may be put in the neck.
  Rudraksh means-the eye of Rudr-Shiv. it  is considered to be the most potent manifestation of the Cosmic Force. Hence Rudraksh is the object of veneration and also the source to reach the higher self. Rudraksh is believed to provide the connection between the earth and the heaven. These beads constitute of the seeds of the Rudraksh fruit obtained from Rudraksh trees. The Rudraksh tree is botanically known as ELAEOCARPUS GANITRUS ROXB. Its English name is UTRASUM BEAD TREE.
Rudraksh is generally found in Java, Sumatra, Borneo, Bali, Iran, Java, Indonesia, India and  Nepal. 
There are clefts called Mukh-mouth-opening-holes on the surface of the beads. The number of  holes over the body of Rudraksh beads determine its quality. The Rudraksh bead ranges from single face to multiple faced bead. Indians/Hindus use Rudraksh beads traditionally.Yogis and Monks believes that wearing the Rudraksh beads provides astonishing-tremendous-mystical powers-tranquility- concentration  helping in  meditation along with spectacular control over their mind.
PRECAUTION: One should avoid wearing it during mating, in cremation ground, menstrual cycles-periods, toilets, new born babies or in the fingers.
They may have 1 to 21 holes.
Shiv Maha Puran, Shree Madhav Bhagwat, Padm Puran, Ling Puran, Asht Malikopnishad, Nirny Sindhu, Mantr Maharnav, Mahakal Sanhita, Rudrakshajabalopnishad, Vrihajjabalopnishad, Shivaswaroday and Sarvollastantr. Rudraksh evolved from the eyes of Bhagwan Shiv, so it's called Rudraksh. Rudr means Shiv and Aksh means eyes along with alphabets in Sanskrit called Vern. According to Halayudh Kosh, 51 letters from अ A  to क्ष ksh constitute Aksh. Rudraksh is the  seed in which all the   Sanskrit alphabets are present. 
Garland/Rosary made up of Rudraksh constitutes of 27, 54 or 108  beads.Extra bead attached to it is called the Sumeru which is not counted while chanting the Mantr-Shlok-Jap. Mala rests on ring finger and middle finger is used for Jap-recitation. Index-Jupiter and little-mercury finger are considered as inauspicious for touching the Mala during Jap process. Rudraksh Rosary is considered as the only Rosary, which can be used for Jap of all kinds. Rudraksh rosary has be worn with proper sanctification-chanting of  Mantr.
Wearing Rudraksh relieves from the  sins of previous births which are creating trouble-hindrances  in the present birth. Even the  Mallechchh and  Chandal (-impious and inhumane born with vices) can also attain the form of Bhagwan Shiv-Rudr by wearing Rudraksh accompanied with virtuousness. It works as a catalyst in attaining piousness-righteousness and Salvation. It helps in relieving the harmful impact of planetary disorders and negative energy.
रुद्राक्ष महिमा :: भगवान शिव ने रुद्राक्ष उत्पत्ति की कथा पार्वती जी से कही है। एक समय भगवान शिवजी ने एक हजार वर्ष तक समाधि लगाई। समाधि में से व्युत्थान होने पर जब उनका मन बाह्य जगत में आया, तब जगत के कल्याण की कामना वाले महादेव ने अपनी आंख बंद कीं। तभी उनके नेत्र से जल के बिंदु पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं से रुद्राक्ष के वृक्ष उत्पन्न हुए और वे शिव की इच्छा से भक्तों के हित के लिए समग्र देश में फैल गए। उन वृक्षों पर जो फल लगे, वे ही रुद्राक्ष हैं।
वे पापनाशक, पुण्यवर्धक, रोगनाशक, सिद्धिदायक तथा भोग मोक्ष देने वाले हैं। रुद्राक्ष जैसे ही भद्राक्ष भी हुए। रुद्राक्ष श्वेत, लाल, पीले तथा काले वर्ण वाले होते हैं। ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को श्वेत आदि के क्रम से ही पहनने चाहिए। रुद्राक्ष फलप्रद हैं। जितने छोटे रुद्राक्ष होंगे उतने ही अधिक फलप्रद हैं। वे संताप को दूर कर शांति देने वाले हैं। 
 रुद्राक्ष की माला धारण करने से पाप और रोग नष्ट होते हैं। साथ ही सिद्धि मिलती है। भिन्न-भिन्न अंगों में भिन्न-भिन्न संख्यावाले रुद्राक्ष धारण करने से लाभ होता है। शिव पुराण में इसका विस्तृत विवेचन है। भस्म, रुद्राक्ष धारण करके ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करने वाला मनुष्य, शिव रूप हो जाता है। 
भस्म रुद्राक्षधारी मनुष्य हो देखकर भूत प्रेत भाग जाते हैं, देवता पास में दौड़ आते हैं, उसके यहां लक्ष्मी और सरस्वती दोनों स्थायी निवास करती हैं तथा विष्णु आदि देवता प्रसन्न होते हैं। अतः सब शैव एवं वैष्णवों को नियम से रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
रुद्राक्षों के मुखःरुद्राक्ष गोल, चिकने, दृढ़ कांटेदार तथा एक छिद्र से दूसरी तरफ छिद्र तक सीधी बारीक रेखा वाला उत्तम गिना जाता है। जिसमें अपने आप छिद्र उत्पन्न हुआ हो वह उत्तम है। एक तरफ के छिद्र से दूसरे छिद्र तक जितनी सीधी रेखा जाती हों वह उतने ही मुख वाला माना जाता है।
(1) एक मुखी रुद्राक्ष: यह  शिव एवं बृह्म स्वरुप है। वह मुक्ति देता है। एक वक्त्रं तू रुद्राक्षपर तत्व स्वरुप्कम।  जहाँ यह रुद्राक्ष रहता है वहां लक्ष्मी स्थिर रहती है। 
(2) दो मुखी रुद्राक्ष: यह शिव पार्वती रूप है, जो इच्छित फल देता है। यह साक्षात अर्धनारीश्वर है। सर्व कम प्रद है। 
 (3) तीन मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष त्रिदेवरूप है, जो विद्या देता है। यह साक्षात अग्नि स्वरुप है। इसके धारण करने से श्री, तेज, आत्मबल की वृद्धि होती है।  
(4) चार मुखी रुद्राक्ष: यह ब्रह्मरूप है, जो चतुर्विध फल; अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पुर्षार्थों का दाता है। 
(5) पञ्च मुखी रुद्राक्ष: यह पंचमुख शिव-रूद्र रूप है, जो सब पापों को नष्ट करता है। यह सभी कामनाओं का दाता है। मोक्ष दायी, सर्व पाप हारी है। 108 दानों की माला धारण करें। 
(6) छः मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्रज्ञक्ष स्वामी कार्तिक-भगवान कार्तिकेय रूप है, जो शत्रुओं का नाश करता है, पापनाशक है। यह दायीं भुजा में धारण किया जाता है। यह ब्रह्म हत्या जैसे पाप का निवारक है। 
(7) सातमुखी रुद्राक्ष: यह कामदेव एवं  सप्त ऋषि स्वरुप है। यह गले में व दांयीं भुजा में धारण किया जाता है। इसके धारण करने वाला दरिद्र भी धनी हो जाता है। 
(8)  अष्टमुखी रुद्राक्ष: यह समस्त देव एवं नव दुर्गा-अष्ट भुजी देवीस्वरूप है। सब देवताओं को प्रसन्न करने वाला है। समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाला है।सभी विघ्नों को दूर करके पूर्ण आयु देता है। अल्पायु पुरुष भी इसको धारण करके आरिष्ट से मुक्त हो सकता है। 
(9) नव मुखी रुद्राक्ष: यह कपिल मुनि रूप तथा नव दुर्गारूप है, जो मनुष्य को सर्वेश्वर बनाता है। सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त करने के लिए इसको किया जाता है। 
(10) दस मुखी रुद्राक्ष: यह विष्णु रूप है, जो  सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सक्षम है। 
(11) एकादश रुद्ररूप: यह साक्षात हनुमान स्वरुप है। सब जगह विजय दिलाने वाला, आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करने में सहायक है। 
(12) बारह मुखी रुद्राक्ष: यह द्वादश आदित्य रूप है, जो प्रकाशित करता है। यह नेत्र ज्योति बढाता है। बुद्धि व स्वास्थ्य देता है। 
(13) तेरह मुखी रुद्राक्ष: यह रुद्राक्ष विश्वरूप-देवराज इन्द्र का स्वरूप है।जो सौभाग्य मंगल देता हैं। यह  सौभाग्य व मंगलदायी है। यह कामसिद्धि प्रदायक है। 
(14) चौदह मुखी रुद्राक्ष: यह अत्यंत दुर्लभ रुद्राक्ष परम शिव स्वरुप है, जो धारण करने से शांति देता है। यह सभी देवों की कृपा इसमें रहती है। 
इस प्रकार 14 मुखी रुद्राक्ष का वर्णन मिलता है। इनको धारण करने के लिए शिव पुराण में मंत्र भी दिए गए हैं। मंत्र के द्वारा धारण करने से रुद्राक्ष इच्छित फल देते हैं।
Rudraksh’s Mukhi-opening-Holes-facets:: There area unit Mukhi-openings on the surface of beads. The Mukhi on the surface helps in determinant the standard of beads. These Mukhi’s ranges from one to twenty one and is delineate below:
(1). Single facet Rudraksh :: The One Mukhi Rudraksh is that the image of Godhood, Supreme Truth and Attainment of Eternity. The one Mukhi Rudraksh is Bhagwan Shankar and this Rudraksh is high most among all Rudrakshs. One Mukhi Rudraksh is found in spherical and also the 0.5 moon form. This form of Rudraksh is incredibly rare. It's praised for its miraculous qualities-effects. It found in Asian countries and specifically in Shri Lanka-Ceylon.
(2).  Two facet  Rudraksh :: The two Mukhi Rudraksh is the symbol of Ardh Narishwar, a joint image of the Bhagwan Shiv and Goddess Maa Bhagwati Parvati (-Shakti). It effectively controls the ruinous effects of Moon in physical as well as spiritual level such as diseases of kidney, Left eye, intestine in physical level and lack of harmony in relationship etc. in the spiritual level. Two Mukhi Rudraksh has two lines or faces and it is available in two varieties :- Nepal and Haridwar (India). It brings unity like the family and remove the differences of opinions between the father and the son, the husband and the wife and friends.
(3). Three facet Rudraksh :: The three Mukhi Rudraksh contains the Trinity of Gods: Brahma, Vishnu and Mahesh. Three Mukhi Rudraksh is known to be one of the most powerful Rudraksh for stopping all problems created in the past and existing in the present and those which may take place in the Future. This Rudraksh Bead combined with appropriate Mantr helps to dramatically change a person’s life for the better in the 40 days. The best virtue of 3 Mukhi Rudraksh is that it makes the wearer free from chronic fever.
(4). Four facet Rudraksh:: The four Mukhi Rudraksh represents Goddess Saraswati and Brahma Ji. It has four linings from head to bottom at equal distance. It is beneficial to researchers, artists, and journalists. It helps to reduce the malefic effects of Jupiter like intellectual dullness of mind, lack of grasping and understanding power, difficulty in effective communication and also neurotic conditions of mind.
(5). Five facet Rudraksh :: The five Mukhi Rudraksh is the form of Rudr named Kalagni. It rectifies all the faults of Jeev and makes him pure and Jeev gains the form of Pashupati. By wearing its mala-rosary the wearer’s mind remains peaceful. There is no doubt that the wearer of five Mukhi Rudraksh mala never gets untimely death.
(6). Six facet Rudraksh :: The six Mukhi Rudraksh is the center of the power of Bhagwan Shiva’s second son, Kumar Kartikey. It gives wisdom, knowledge and increases will power. It is very good for businessmen, journalists and editors etc. This Rudraksh removes malefics associated with planet Mars like cuts, wounds, surgery and injury by weapons, itching of the skin, bone fractures, hemorrhoids, miscarriages and abortions.
(7). Seven facet Rudraksh :: The seven Mukhi Rudraksh is the symbol of Anang Shiv and it represents Goddess Mata Maha Laxmi. It is Sapt Matradi Daevat, Sapt Ashy Daevat and Sapt Muni Daevat. It affects entire physical neuro-physiology and psychological. It reduces the malefic effects of  Shani Dev.
(8).Eight facet Rudraksh: It is the second form of reflection of the second son of Bhagwan Shiv, Ganesh who is worshiped prior to other demigods-deities. The eight linings on it make it a very effective. Its wearer becomes unaffected by miseries: physical, divine or mental. Wearing of it prevents from the malefic effects of the planet Ketu.
(9). Nine facet Rudraksh: it is the form of the Goddess Maa Durga (-Shakti). It contains the power of Nine Deities. The worshippers of the Goddess Maa Durga must wear this Rudraksh. All Rudraksh are the symbol of Bhagwan Shiv but nine Mukhi Rudraksh contains special nine qualities. It gives the wearer devotion and salvation.
(10). Ten facet Rudraksh: It represents Bhagwan Vishnu, the nurturer-preserver who pervades the whole universe and its living beings. He is associated with the primeval waters. It is to be believed to have been omnipresent before the creation of the world.
(11). Eleven facet Rudraksh: It is regarded as the light mass of Bhagwan Rudr-Shiv (Eleven Rudrs). It is the most effective and most successful Rudraksh for all the worshipers of Bhagwan Shiv. It represents the 11 Rudr and the eleventh is Hanuman Ji Maha Raj. It is the symbol of Indr as well. It gives the permanent happiness to the wearer.
(12). Twelve facet Rudraksh: It is the radiance and strength of 12 forms of the Bhagwan Sury-Sun. It is one of the most important Rudraksh for the person who needs to attract knowledge and riches and all the earthly pleasures. This Rudraksh is the most useful for the administrators and give happiness and material gains and protects from accidents.
(13). Thirteen facet Rudraksh: It is a form of Dev Raj Indr. The worshiper wears this to make Dev Raj happy. It fulfills all the desires of the wearer and gives eight accomplishments. It provides all attainments connected with chemistry.
(14). Fourteen facet Rudraksh: It represents Bhagwan Shiv and is most rare. It awakens the sixth sense so that the wearer foresees the future happenings. The wearer never fails in his decisions and gets rid of all the miseries, worries. One is safe and rich and becomes dear to Bhagwan Shiv.
(15). Fifteen facet Rudraksh: It represents Bhagwan Pashupati Nath and is very rare Rudraksh. It pacifies emotional disturbance in the mind caused by the limitations caused by Paash or bondage.
(16). sixteen facet Rudraksh: This is the Maha Mratyunjay form of Bhagwan Shiv-Maha Kal. it protects one from physical illness due to mal placement placement of planets.
(17). Seventeen facet Rudraksh: It represents Mata Katyani which is sixth form of Goddess Maa Durga. Its  wearer gets the reward-fruits of Arth, Kam, Dharm, and Moksh. It removes obstacles in path and gives immense prosperity.
(18). Eighteen facet (-holes, openings, faces) Rudraksh:  Its a form of Goddess mother earth. It is ideal for the people in real-estate and land dealings.If worn by ladies who are prone to abortions, it protects the unborn child and she is able to give birth to a healthy beautiful baby.
(19). Nineteen facet Rudraksh: It is a form Bhagwan Narayan & grants success in business along with good health. The wearer gets blessings of Bhagwan Shri Hari Vishnu and Goddess Maa Laxmi and is blessed with beauty and prosperity.
(20). Twenty facet Rudraksh: It makes one Brahm Swarup. It has energy of the nine planets, Eight Dikpals (Indr, Varun, Yam, Kuber, Agni, Vayu, Niriti and Ishan) and Tri Devs (-Brahma, Vishnu & Mahesh).
(21). twenty one facet Rudraksh: It represents Kuber the treasurer of the demigods-deities granting-blessing immense prosperity and materialistic desires.
रुद्राक्ष का मन्त्र ::  मुखे ब्रह्माजी मध्ये विष्णु लिंग नाम महेश्वरा; सर्व देव नमस्कारम रुद्राक्षाये नमो नम:। 
एक मुखी रुद्राक्ष :: भगवान् शिव-श्री रुद्र। 
दो मुखी रुद्राक्ष :: चंद्र सूरज-कंठ। 
तीन मुखी रुद्राक्ष :: तीन लोक-मस्तक।  
चतुर्मुखी रुद्राक्ष :: चारों वेद-दाहिनी भुजा। 
 पाँच मुखी रुद्राक्ष :: पाँच पांडव-मस्तक। 
छः मुखी रुद्राक्ष  :: षटदर्शन-बायीं भुजा। 
सात मुखी रुद्राक्ष :: सप्तऋषि-सप्त समुद्र-गला। 
अष्ट मुखी रुद्राक्ष :: अष्ट कुली नाग-दाहिनी हथेली। 
नव मुखी रुद्राक्ष :: नव नाथ-आसन ऊपर। 
दस मुखी रुद्राक्ष :: दस अवतार-हृदय स्थान। 
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष :: ग्यारह रुद्र-दाहिनी भुजा।  
द्वादश मुखी रुद्राक्ष :: बारह पंथ-जटाएँ। 
तेरह मुखी रुद्राक्ष :: तैतीस कोटि देवता-हृदय स्थान।  
चौदह मुखी रुद्राक्ष  :: चौदह भुवन-दाहिनी हथेली। 
पंद्रह मुखी रुद्राक्ष :: पंद्रह तिथियाँ-आसन ऊपर। 
सोलह मुखी रुद्राक्ष :: सोलह श्रंगार-बाई भुजा। 
सत्रह मुखी रुद्राक्ष :: माता सीता-आसन के नीचे, धरती के ऊपर। 
अठारह मुखी रुद्राक्ष :: अठारह भार वनस्पतियाँ-अठारह पुराण-आसन के नीचे धरती के ऊपर। 
उन्नीस मुखी रुद्राक्ष :: अलष पुरुष-बाई हथेली।  
बीस मुखी रुद्राक्ष  :: भगवान् विष्णु-गला।
इक्कीस मुखी रुद्राक्ष :: इक्कीस ब्रह्मांड-भगवान् शिव-बाईं हथेली।  
निरमुखि रुद्राक्ष :: निराकार-भगवान् शिव की जटाएँ। 
शिव कवच-शिव सिद्धि सर्व रक्षाकारक प्रासाद कवच
विनियोग :: 
ॐ अस्य श्रीसदा-शिव-प्रासाद-मन्त्र-कवचस्य श्रीवामदेव ऋषिः, 
पंक्ति छंद, श्रीसदा-शिव देवता, अभीष्ट-सिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः। 
ऋषादि न्यास :: 
श्रीवामदेव-ऋषये नमः शिरसी। पंक्तिश्छंद से नमः मुखे।
श्रीसदा-शिव-देवतायै नमः ह्रदि। अभीष्ट-सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे। 
ॐ शिरो मे सर्वदा पातु प्रासादाख्यः सदा-शिवः; षडक्षर-स्वरूपो मे, वदनं तु महेश्वरः॥1॥ 
अष्टाक्षरः शक्ति-रूद्रश्चक्षुषी मे सदावतु; पंचाक्षरात्मा भगवान् भुजौ मे परी-रक्षतु॥2॥ 
मृत्युन्जयस्त्रि-बीजात्मा, आयु रक्षतु मे सदा। वट-मूल-समासीनो,दक्षिणा-मूर्त्तिरव्ययः॥3॥ 
सदा मां सर्वतः पातु, षट-त्रिंशार्ण-स्वरुप-धृक; द्वा-विंशार्णात्मको रुद्रः,कुक्षी मे परी-रक्षतु॥4॥ 
त्रि-वर्णात्म नील-कंठः, कंठं रक्षतु सर्वदा;चिंता-मणिर्बीज-रूपो, अर्द्व-नारीश्वरो हरः॥5॥
सदा रक्षतु मे गुह्यं, सर्व-सम्पत-प्रदायकः; एकाक्षर-स्वरूपात्मा, कूट-रुपी महेश्वरः॥6॥ 
मार्तंड -भैरवो नित्यं, पादौ मे परी-रक्षतु; तुम्बुराख्यो महा-बीज-स्वरूपस्त्रीपुरान्तकः॥7॥
सदा मां रण-भूमौ च, रक्षतु त्रि-दशाधिपः;उर्ध्व-मूर्द्वानमीशानो, मां रक्षतुसर्वदा॥8॥
दक्षिणास्यां तत्पुरुषोsव्यान्मे गिरी-विनायकः; अघोराख्यो महा-देवः, पूर्वस्यां परी-रक्षतु॥9॥
वामदेवः पश्विमस्यां, सदा मे परी-रक्षतु; उत्तरस्यां सदा पातु, सद्योजात-स्वरुप-धृक॥10॥
TULSI-तुलसी :: समुंद्र मंथन में प्राप्त चार कन्याओं में तीसरी कमोदा थीं जो अमृत की लहरों से प्रकट हुईं और वृक्ष के रूप में तुलसी के नाम से विख्यात हुईं। बिना स्नान किये देव कार्यों के हेतु तुलसी का पत्ता नहीं तोडना चाहिये। तुलसी दुःख भोग और दरिद्रता जैसे पापों को शीघ्रता से दूर कर देती है। तुलसी का पत्ता, फूल, मूल, फल, शाखा, छाल, तना और मिट्टी आदि सभी पावन हैं। अग्नि शाला अथवा चिता में घी के साथ तुलसी काष्ठ से प्रज्वलित अग्नि मनुष्य के सभी पातक भस्म कर देती है। भगवान को तुलसी काष्ठ की धूप सौ यज्ञानुष्ठान तथा सौ गोदान का पुण्य देती है। इसका तिलक चन्दन के समान सुख दाई है। 
Ocimum tenuiflorum2.jpgजिस-जिस घर में तुलसी का बगीचा है, उन घरों में उसके दर्शन से बृह्म हत्या आदि सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। उस घर में जगदीशवर विष्णु प्रसन्न चित्त निवास करते हैं और वहाँ दरिद्रता, वियोग, दुःख, भय, रोग कभी नहीं ठहरते।  तुलसी की जड़ में बृह्मा, मध्य भाग में भगवान जनार्दन तथा मंजरी में श्री रूद्र का निवास होता है। 
पत्रं पुष्पं फलं मूलं शाखा त्वक् स्कन्धसंज्ञितम्। 
तुलसीसंभवं सर्वं पावनं मृत्तिकादिकम्।।
 तुलसी का पत्ता, फूल, फल, मूल, शाखा, छाल, तना और मिट्टी आदि सभी पावन हैं।
यदि तुलसी की लकड़ी से बनी हुई मालाओं से अलंकृत होकर मनुष्य देवताओं और पितरों के पूजनादि कार्य करे तो वह कोटि गुना फल देने वाला होते हैं। जो मनुष्य तुलसी की लकड़ी से बनी हुई माला भगवान विष्णु को अर्पित करके पुनः प्रसाद रूप से उसे भक्तिपूर्वक धारण करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।
तुलसी दर्शन करने पर समस्त पापों का नाश होता है, स्पर्श करने पर शरीर पवित्र होता है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुंचाती है, तुलसी का पौधा लगाने से जातक भगवान के समीप आता है। तुलसी को भगवद चरणों में चढ़ाने पर मोक्ष रूपी फल प्राप्त होता है। गले में तुलसी की माला धारण करने से शरीर में विद्युत शक्ति का प्रवाह बढ़ता है तथा जीव-कोशों द्वारा धारण करने के सामर्थ्य में वृद्धि होती है। अंत काल के समय तुलसीदल या आमलकी को मस्तक या देह पर रखने से नरक का द्वार बंद हो जाता है।
घर में एक तुलसी का पौधा जरूर लगाएं। इसे उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्वी दिशा में लगाएं या फिर घर के सामने भी लगा सकते हैं। पारंपरिक ढंग के बने मकानों में रहने वाले ज्यादा सुखी और शांत रहते थे; क्योंकि इनमें  तुलसी चौरा, क्यारी और वहां सुबह के वक्त चढ़ाया जाने वाले जल के अलावा शाम के समय दीपक भी जलाया जाता था। 
मान्यता है कि तुलसी का पौधा घर में होने से घर वालों को बुरी नजर प्रभावित नहीं कर पाती और अन्य बुराइयां भी घर और घर वालों से दूर ही रहती हैं। तुलसी का पौधा घर का वातावरण पूरी तरह पवित्र और कीटाणुओं से मुक्त रखता है। इसके साथ ही देवी-देवताओं की विशेष कृपा भी उस घर पर बनी रहती है।
Tulsi is worshiped in India due to religious belief and its medicinal properties. Its called Holy Basil with the botanical name of Ocimum Tenuiflorum. Hindus grow Tulsi plant and keep it  in the veranda-corridors-courtyard, of their house. Its used as a medicine in Ayurved and treated as elixir. Its mentioned in Chrak Sanhita and is considered an adaptogen performing balancing act in the body. It relives stress. It has strong aroma and astringent taste, which promote longevity. Its a cough and cold curative. Tulsi leaves prevent bacterial growth. Its leaves helps in digestion, when chewed. One should avoid chewing of Tulsi leaves as they can remove the upper layer of the teeth due to the presence of mercury in them. Its is cultivated for religious and medicinal uses, and for its  oil. People use it for making tea along with ginger. Its fragrance repels mosquitoes. Its a shrub which acquires a height of 50 centimeters. It has two varieties distinguished by the green and purple 
(-Shyama Tulsi) color of their leaves. The color of the flowers is purplish. Its  flowers are elongate racemes in close whorls.
तुलसी के बीज का महत्त्व :: तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने-सूखने पर तोड़ कर बीजों को अलग कर लेना चाहिये। तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते हैं मगर बीजों की तासीर ठंडी होती है।  इसका प्रयोग फालूदा में भी किया जाता है । भिगाने से यह जेली की तरह फूल जाता है।  दूध या लस्सी में  देशी गुलाब की पंखुड़ियां मिलाकर लेने से  गर्मी से राहत मिलती है। इससे पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी  दूर होती है, पित्त दोष कम होता है।  यह  त्रीदोषनाशक तथा  क्षुधावर्धक भी है।  शीघ्र पतन एवं वीर्य की कमी: तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ प्रयोग करें।  नपुंसकता: तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में वृद्धि  होगी।  मासिक धर्म की अनियमियता: मासिक के चलते  तुलसी के बीज 5-5 ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक की समस्या के साथ गर्भधारण भी   ठीक हो जाता है। 
TULSI MAA तुलसी माँ  is the earthly manifestation-incarnation of the Tulsi, a consort of Bhagwan Vishnu. She is matchless and called Vaishnavi-Vishnu Ballabh-beloved of  Bhagwan Vishnu. The offering of its leaves is mandatory in ritualistic worship of Vishnu and his forms like Krashn and Vithoba. It is an essential component of Charnamrt-Prashad to be   distributed amongest the devotees, who are attending the ceremony.
Garlands made of 10000 tulsi leaves are offered to Bhagwan Shri Krashn and Vishnu. Vaishnavs traditionally use Jap malas-necklace-garland-rosary (a string of beads made from Tulsi stems or roots). Tulsi malas are  auspicious to the wearer. Tulsi plants are used to pacify evil spirits and keep them away.
HAR SHRANGAR-PAARI JAT :: As a result of  churning of the ocean (-Smudr Manthan), 14 gems-jewels-Ratn emerged from the Kshir Sagar including Paarijat the divine flowering tree with blossoms that never fade or wilt and  the Kalp Vrksh-the wish granting tree. The tree was brought back to the earth by Lord Krishna from the garden of Indr-the lord of Heaven to ful fill the desire of Saty Bhama. The original tree along with the court room, went back to heaven after Bhagwan Shri Krashn left earth for Gau Lok.
 Paarijat-botanical name, Nyctanthes Arbortristis, appears in Bhagwat Puran, Maha Bharat and Vishnu Puran. Further on, Saty Bhama  planted  the tree in the backyard of her palace.
The  tree is the store house of many chemicals which are extremely helpful in maintaining the fitness of human body. Its wood is used to form a food batten base for tile or grass thatch roofs, while the young branches are suitable for making baskets. 
Its fresh leaves are crushed to form a paste and is used in combination with other herbs for treating inflammation, sciatica, pruritis (itching) fever, bronchitis, asthma, cough, dyspepsia (-difficulty with digestion associated with pain, flatulence, heartburn and nausea) and icterus. During constipation its used as anti-bacterial, anti-inflammatory, digestive, expectorant, sudorific, diuretic and laxative properties.
The leaves for Anthelmintic, Anti-inflammatory, Hepatoprotective, Immunopotential, Anti pyretic, Antioxidant and Anti fungal treatments. They are fried and used as a recipe in Assamese food. The leaves extract obtained by boiling with tea and sipped, relieves body pain and boosts resistance against cough, joint pain. They are used for polishing wood and ivory. The leaves were also considered anti dot for reptile venom. 
Various preparations of the fresh flowers were found useful in treating diseases like colic, dyspepsia, flatulence, grayness of hair and baldness as they were astringent, useful in stomachache and carminative in nature. The plant is useful for dyeing as well. 
The flowers are Diuretic, Anti-bilious, Antioxidant, Anti-inflammatory, Sedative and Antifilarial. Its dried flowers are used as components of recipe in Assamese food.Its flower oil yield exotic perfume.
Its seeds show Antibacterial, Anti fungal, Immunomodulatory and Antileishmanial properties. The powdered seeds  prepared as a paste  cure scurvy and affections of the scalp.
Its bark shows Anti-microbial properties, used as a tanning material. The bark  chewed with betel nut and leaves  promote expectoration. 
The stem shows Antipyretic and Antioxidant properties.
MAENHDI-Henna मेंहदी :: Its is a traditional medicine for the  treatment of a vast number of ailments.  Its bark and seeds are used in Siddh, Unani and Ayurvedic medicines. Henna is a middle-sized shrub with many branches. It yields small white or pinkish fragrant flowers in large terminal bunches and small round fruits. This fascinating plant is known world-wide for the beautiful coloring dye, used by the orientals to color their hands and body.
Henna oil is used during medicinal treatment of wide range of ailment ranging from headache to leprosy and skin dis orders.  As a medicinal plant henna is used as an astringent, anti-hemorrhagic intestinal anti-neoplastic, cardiac-inhibitory, hypertensive,  detergent, cooling and a sedative. The Henna extracts exhibit antibacterial, anti fungal, and ultraviolet light screening activity. 
A paste made of flowers in vinegar, has curative effect over headaches caused by  sun stroke, when applied over forehead and  provide quick relief from  the pain caused by  temples. 
Its seed oil is used for relieving muscular pains, in deodorants and regulation of menstruation disorders causing hardening of the liver and diaphragm. The oil induce sleep, cure headaches and bruises. It can be applied to the skin to treat eczema, scabies, fungal infections and burns. The oil is useful in rheumatic and  arthritis pains. Its powdered seeds mixed with ghee are converted into small balls for consuming with water. 
Its oil obtained form the seeds is used in perfumery.
Its bark is  used to treat symptoms of jaundice, enlargement of the liver and spleen. Its active elements provide cooling and astringent action along with protection against many surface fungi and bacteria to the skin. The bark is very effective in the treatment of dysentery, as well.  The bark of Maenhdi is very effective in the treatment of liver dis orders like Jaundice and enlargement of the liver, by consuming small dozes-1/4th of spoon in powdered form. 
 Its leaves  normally used for cooling and coloring properties, are very effective in treating skin disorders like boils,  burns, vitiligo (-pale patches on the skin, where pigment is lost). Its fresh leaves mixed with vinegar or lime juice, are bandaged onto the soles of the feet to treat burning athletes foot-a symptom of beriberi, rashes,  ringworm and sunblock. Its leaves are used as an ointment, decoction or tea, as well.
The dried leaf powder  mixed with  lemon/orange juice or vinegar, on being applied in the hair, covered with plastic wrap, provides permanent bind to the dyed hair strands. Maenhdi mixed with warm water  gives a light color, which  fades easily. It provides natural protection for hair loss along with maintaining overall hair quality. Its regular use  is known to seal and repair the hair cuticle which in turn prevents the breakage of hair and also helps in retaining the shine of the hair and prevents premature hair fall. It provides effective natural cure against dryness, dandruff and premature graying of hair. It helps in conditioning of hair by nourishing them through the root, making them silky, soft, lustrous, shining. One should soak it  in  curd, before applying over the head for better results. 
Its juice extract provides relief from pain-headaches, when applied to forehead.
 Maenhdi leaves boiled in mustard oil and applied regularly after cooling-filtering, helps in curing baldness and hair growth.
Its generally used as a hair dye.
Freshly prepared Maenhdi leaves paste, helps soothing, providing relief from prickly heat when applied over the affected area along with  scrapes and burns. 
Its found to be effective in treating cracking nails, by drinking water in which leaves are soaked  overnight,  for 10 days. Butter and Maenhdi powder mixed together are used to treat pus filled swellings, mange and scabies.
Other Uses and Applications: (I) Its paste is used for  decorating feet and hands, in marriage rituals for decorating the bride due to its healing properties as a skin healer and cleanser, (II) It was used to stain the fingers of pharaohs, before their mummification, in Egypt, (III) It makes the individual more sensitive to  Earth’s energies, (IV) Temporary tattoos, (V) Nourisher or hair conditioner as shampoo, (VI) Skin care products, (VII) Natural hair dyes, (VIII) Body decoration, (IX) Hair tonic, (X) Essential Oils, (XI) Its leaves have been used in India to treat wounds, ulcers, mouth ulcers, bruises, sprains, swelling, burns, stomach pain caused by childbirth, sore throats, gonorrhea, obesity, to promote menstruation, to induce abortion and (XII) It might be useful in hysteria or violent temper, rheumatism joint pain-inflammatory swelling, bruises & leprosy, natural dyes, textiles dying, fever etc.
CAUTION: MAENHDI is dangerous to people with glucose-6-phosphate dehydrogenase deficiency, more common in males as compared to females. Infants and children are especially vulnerable to its inflammatory effects. Health risks involved with the pre mix Maenhdi used for tanning-staining skin are significant. Its reported to cause allergic reactions, chronic inflammatory reactions.
ALOE VERA ग्वार पाठा :: Aloe Vera a succulent and part of the lily (-Liliaceae)-garlic-onions family, is an incredible plant. It contains over 200 active components like vitamins, minerals, amino acids, enzymes, polysaccharide and fatty acids. The leaf-bulk of the Aloe Vera leaf is filled with a clear gel like puffy substance, with 99% water. Aloe Vera contains  vitamins  A, C, E, folic acid, choline, B-1, B-2, B-3 (-niacin), B-6, B-12. Nearly 20 minerals are found in it, including most essential ones-calcium, magnesium, zinc, chromium, selenium, sodium, iron, potassium, copper and manganese. Amino acids-the building blocks of proteins of which 22 are  essential, for the human body are found in it. Aloe Vera possesses-three plant sterols, which constitute fatty acids like-cholesterol (-which lowers fats in the blood), campesterol, and B-sito sterol, helpful in reducing symptoms of allergies along with indigestion. Some other fatty acids are: linoleic, linolenic, myristic, caprylic, oleic, palmitic, and  stearic.
1. Adaptogen: It contains chemicals which boosts immunity-resistivity, by balancing the body systems, stimulating the defense and adaptive mechanisms, helping in  enhanced power to cope up with stress (-physical, mental. emotional and environmental stress). 
2. Digestion: It soothe and cleanse the digestive tract,helping in curing constipation or diarrhea-irritable bowel syndrome-acid re-flux decrease the amount of unfriendly bacteria.  Its  a vermifuge-helps in removal of worms.
3. Detoxification: It's being a gelatinous  food,  absorbs toxins from the intestine and the colon, helping in proper elimination of waste and detoxification of the body. 
4. Alkalinity: For good health,  body should form juices in the ratio of 80:20 i.e., 80% alkaline  and 20% acidic. This is a supplement, which boosts alkalinity in the body, helping in maintaining, over all balance. 
5. Cardiovascular System: Aloe Vera extract injected into the blood, improves oxygen-intake as an oxidant, enhancing the diffusion capabilities of the red blood cells. Beta sitosterol helps in lowering cholesterol, regulation of blood pressure, improvement of blood circulation along with blood oxidation, lowering the risk of heart disease.
6.  General Immunity: The polysaccharides present in it stimulate macro phages, which constitute the white blood cells of immunity system which fight against viruses, microbes. It has high level of anti-oxidants, which help combat the unstable compounds known as free-radicals, contributing to the aging (-free radicals are a bi-products in the human body). Being anti pyretic  it prevents fever.
7. Skin protection: Its skin healing, anti pruritic (-relieves or prevents itching) and analgesic  (-pain reliever) property makes it, vulnerary. Its application to burns, abrasions, psoriasis and even in bug bites is useful.  As an astringent it causes the contraction of body tissues, which reduces bleeding from minor abrasions. It helps in  moisturizing and rejuvenate the skin as well. It boosts skin elasticity by making it more flexible through collagen and elastin repair. As an emollient, it helps in softening and soothing the skin. It's found to be useful in frostbite, rashes, pimples,  acne, psoriasis, irritations, Eczema, pigmentation-dark spots, sun exposure or sun burn, wrinkles, minor vaginal irritations.etc.
8. General Disinfectant: It’s active ingredients like sulphur, lupeol, salicylic acid, cinnamic acid,  nitrogen and phenol, make it anti-biotic-microbial-germicidal-bacterial, anti-septic, anti-fungal & anti-viral, which helps in fighting internal and external infections.
9.  Anti-Inflammatory:  12 ingredients, like B-sisterole, helps in reducing inflammation i.e.,  joint pain and stiffness with improved joint flexibility.
10. Weight Loss: The added advantage is reduced weight, giving proper shape to body.
11. Asthma:  The patient may in hail in its vapors for relief. Its leaves, boiled in water are helpful in reducing diabetics.
12.  Teeth and gums: It promotes strong and healthy teeth and gums, if its gel is rubbed over them.
13.  Hair growth: It speeds up hair growth by massaging it into the scalp for  30 minutes and rinsing the head there after; reduce dandruff when applied by mixing the juice with coconut milk and wheat germ oil. 
 14.  Other uses: It help in healing herpes outbreaks, fighting in athlete's foot, swab over blisters, rosacea, warts etc.
 CATION: It's long-term use may lead to loss of electrolytes, especially potassium. Avoid it, during pregnancy, menstruation, if one is suffering from hemorrhoids or degeneration of the liver and gall bladder.
GILOY-AMRT गिलोय अमृत :: Its is an ancient  and  famous Ayurvedic herb, used extensively in medicines for a wide variety of diseases, having references in Veds-scriptures, including Ramayan and Durga Sapt Shati. This perennial climbing herb is also called Amrt (-nectar), since it grew at the places where drops of Amrt fell while the demon were running, with it. Its botanical name is Tinospora cordifolia with another common name Guduchi. Its an herbaceous vine, which belongs to  the family of Menispermaceae, indigenous to the tropical areas of India, Myanmar and Sri Lanka.
Charak recognized it for: Vyasthapan-rejuvenation, Deh Prashman-reduction in burning sensation, Trshna Nigrah- mitigate excessive thirst, Trptighn-relives early satiation, Stan Shodhan-cleanse breast milk. 
Sushrut  and Bhav Prakash's classification: Guduchyadi, Patoladi, Valli Panch Mul, Kakolyadi and Aragvadhadi group of herbs. Ras (-Taste): Kashay (-astringent)/Tikt (-bitter), Vipak ( -Taste conversion after digestion):-Madhur(-sweet), Gun (-characters-qualities):-Laghu (-light to digest), Snigdh (-oily, unctuous), Veery (-potency): Ushn (-hot/warm).
Karm (-functions,working): Rsayni  (-रसायनी)-rejuvenate, Sangrahini (संग्रणी)-brings about absorptive nature to stomach and intestines, useful in mal absorption syndrome, diarrhea, Balya- improves strength, Agni Deepani – Improves digestion power, Tridosh (त्रिदोश नाशक)-Vat, Pitt and Kaph nashak, Anv Hra- relieves Anv-improves indigestion, Trshna  Hra-relieves excessive thirst (as seen in fever), Daah Hra (-जलन)-relieves burning sensation in the body, Megh Hra-useful in treatment of diabetes, urinary tract disorders, Pandu Hra -पांडु रोग)-relieves anemia, Kamla (-पीलिया)-useful in treatment of jaundice and related diseases of liver, Kushth (कोढ़)-useful in skin diseases, Vat  (-Vat Rakt (-वात रक्त)-useful in gout-arthritis, Jvr (ज्वर)-useful in fever, most ayurvedic medicines for fever contain, it as an essential ingredient, Krami Hra (-कृमि नाशक): clears intestinal worms, Vami Hra (उलटी)-relieves vomiting, Prameh (-प्रमेह-धातु रोग)-useful in diabetes and urinary tract disorders, Swans(-स्वांस):useful in difficulty in breathing, (dyspepsia), asthma, bronchitis, Kas (-कफ़, बलगम)-cough, cold, Arsh (-piles-बबासीर), hemorrhoids, Krichr-difficulty in passing urine, Hrady Rog (-हृदय रोग) -Vat nut-useful in heart diseases with Vat symptoms such as pain. 
Every component of it is useful. Stem and root are dried and powered for use. Leaves are boiled in water and the extract is sipped in small quantities. Its threads were used for stitching of operated skin being strong and blessed with healing property. 
Anti oxidants: Vitamin A, Vitamin B, Vitamin E, Selenium, Lycopene, Lutein and Beta-carotene present in it, control the formation of free harmful radicals.
Wound healer, anti pyretic (fever- reducing) and anti-viral.
Immunity: It improves the efficiency of  WBC (-white blood cells). It boosts immunity against jaundice, hepatic fibrosis and seasonal fevers. 
Skin diseases: Use giloy extract with Neem and Amla.
Piles:  Use of Giloy extract with butter milk is very useful.
Toxins: Its juice is considered very effective in removing exogenous and endogenous toxins, along with improving mental function-dis orders.
Asthma: Chewing of giloy, helps controlling-relieving Asthma. 
Diabetes: Its juice may be consumed regularly for diabetes control.
Menstruation, VD-venereal diseases:   2 to 3 ml of extract helps in curing sexually transmitted diseases such as gonorrhea, along with helping in menstrual cycle.
Malaria, dengue, swine flue, bird flew:  Its extract mixed with papaya leaves extract helps in recovery and enhancement of platelet count.
Indigestion-constipation: Small quantities of its extract with butter milk (Chhachh-छाछ) are of great use.
Diuretic agent: It helps in removing renal stones and  urea from the blood. 
Regeneration of the liver: Its very effective in preventing fibrous changes and regeneration of liver.
Anti cancer and radio protective.
Aphrodisiac: Its  a good tonic and aphrodisiac.
Treatment and Prevention Of Malaria, Yellow Fever, Encephalitis, Dengue Fever: Use ½ tsp powdered white inner bark of Neem , Daru haldi and Satv Giloy in equal quantity, with warm water. 
Antibacterial, anti-inflammatory, anti-rheumatic, and anti-allergic actions:
It can cure allergic conditions effectively without side effects.
CATION: Though good for sugar-diabetes and pregnancy, yet medical supervision is essential, since it may reduce blood sugar level further.
शतावरी :: सौ रोगों को हरने वाली यह शतावरी एक झाड़ीनुमा लता है, जिसके  फूल मंजरियों में, एक से दो इंच लम्बे गुच्छोँ में होते हैं और फल मटर के आकार वाले जो पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं। शतावरी पुराने से पुराने रोगी के शरीर को रोगों से लड़ने क़ी क्षमता प्रदान करती है। इसे शुक्र जनन, शीतल, मधुर एवं दिव्य रसायन माना गया है। आचार्य चरक ने शतावर को बल्य और वयः स्थापक (-चिर यौवन को बरकार रखने वाला) माना है। शतावरी क़ी जड़ को हृदय रोगों में प्रभावी माना जाता है। 
 * यह अनिद्रा से मुक्ति प्रदान करती है।  इसकी क़ी जड़ को खीर के रूप में पका कर गाय के घी के साथ सेवन करें। यह तनाव से मुक्ति और अच्छी नींद प्रदान करती है। 
 * इसकी ताज़ी जड़ को यवकूट करके स्वरस निकालें और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पकाकर मालिश करें। इससे  माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लाभ होता है। 
 * 1.5 ग्राम शतावरी चूर्ण, 2.5 मिली वासा के पत्ते का स्वरस, मिश्री के साथ लेने से पुरानी खांसी में लाभ होता है। 
* प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने क़ी समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण, पांच ग्राम गाय के दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है।
  *  पुरुष यौन शिथिलता में शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है।  
* मूत्र या मूत्र वह संस्थान से सम्बंधित विकृति हो तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है।  
* शतावरी की पत्तियों का कल्क बनाकर घाव पर लगाने से भी घाव भर जाता है। 
 *  शतावरी मूल का चूर्ण 2.5 ग्राम, मिश्री 2.5 ग्राम को एक साथ मिलाकर, शाम को गाय के दूध के साथ लेने से प्रमेह-प्री मेच्युर इजेकुलेशन (-स्वप्न-दोष ) में लाभ मिलता है। इसकी जड के चूर्ण 5-10 ग्राम क़ी मात्रा में दूध से नियमित से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है। 
 * गाँव के लोग इसकी जड़ का प्रयोग गाय या भैंसों को खिलाने में करते हैं जिससे उनका दूध बढ़ता है। प्रसूता स्त्रियों पर भी इसका यही प्रभाव होता है।
  * वातज ज्वर में शतावरी एवं गिलोय के रस का या इनके क्वाथ का सेवन ज्वर (-बुखार) से मुक्ति प्रदान करता है। 
 * इसका रस को शहद के साथ लेने से जलन, दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारीयों में लाभ मिलता है। 
NEEM-MARGO TREE नीम वृक्ष  :: NEEM (-azadirachta indica)-the miracle tree known as Nimb-Margosa tree or Arishth, a reliever of the sickness; is a tropical evergreen tree native to India.  It is a tall evergreen tree with small bright green leaves, is up to 100 feet tall. It blossoms with small and white flowers, during spring. Its grayish bark is hard-rough-scaly with fissures.  Its alternate leaves, consists of several leaflets with segregated edges.  Newly born babies are laid upon the Neem leaves to provide them with the protective aura.   Its olive like edible fruit is oval, round and thin skinned. 
Its seeds, bark and leaves contain compounds with proven antiseptic, antiviral, anti pyretic, anti-inflammatory, anti-ulcer and anti fungal properties. 
Neem has a bitter odor and  taste. 
Charak-Sanhita and Sushrut-Sanhita are the ancient documents, listing its vital powers for cure and maintenance of good health. 
Neem is called Arist (-अरिष्ट) i.e., perfect-complete-imperishable, due to its healing versatility.
Nimb’ is derived from Nimbati Swasthyam Dadati, sarv rog nivarini,  the curer of all ailments, blessing with good health.
Energizing tonic: The indigenous people of Nilgiris consume its dried and powdered tubules  for rejuvenating.
Crops Protection:  Its a potent Insecticide,  Organic fertilizer, Pesticide-Nematicide which helps in nitrification of soil. Neem cake is widely used in India as fertilizer for sugarcane, vegetable and other cash crops.
Contraceptive-Spermicidal: Its very effective when used regularly.
Treatment of chickenpox and warts: When the paste of its leaves is applied  directly  to the skin, it helps drastically. Bathing in warm water having the extract of neem leaves, protects it from  various fungal diseases-infections.
Immunity: Leaves extract obtained by boiling in water helps in malaria. 
Insecticide: It has also been reported to work against termites.  Neem leaves are also used in storage of grains and cloths.
Neuro muscular pains: It cures leaves are used effectively as pain reliever. 
Toothbrushes: A brush made by chewing its soft twig  and rubbed over the teeth  for cleaning, does the duel function of cleaning and protection from dental diseases.
Pain relieving, anti-inflammatory and fever reducing: Compounds present in its leaves and bark aid in the healing of cuts, burns, earaches, sprains and headaches, along with fevers.
Control fleas & ticks on pets: Its bark and roots in powdered form  are quite helpful.
 Anti-bacterial properties that help in fighting against skin infections such as acne, psoriasis, scabies, eczema, etc. 
Diabetes, AIDS, cancer, heart disease, herpes, allergies, ulcers, hepatitis and several other diseases find its application.
Chickenpox: Its is believed that Shitla Maata the deity-goddess who protects the humans from small pox-chicken pox resides in the Neem tree-an embodiment of the Sun. 
Blood purifier: Its a potent blood purifier.
Neem bark contains tannins which is used in tanning and dyeing.
LEMON-नींबू :: Lemon is used in traditional Indian system of medicine called Siddh and Ayurved. Its small evergreen tree, with yellow elliptical citrus fruit found in India and believed to have the curative powers of nectar-the Amrt. The fruit is used for culinary and non-culinary purposes throughout the world, mainly for its juice. Its juice has a sour taste. During summers Indians enjoy Shikanji made with it by adding sugar and water to it. Lemonade is an identical preparation.
Constituents: Carbohydrates, Sugars, Fiber, Fat, Protein, Vitamins and Minerals.
Vitamins: Thiamine Vitamin B-1, Riboflavin Vitamin B-2, Niacin Vitamin B-3, Pantothenic acid Vitamin B-5, Vitamin B-6, Folate Vitamin B-9, Citric acid, Choline, Vitamin C.
Minerals: Calcium, Iron, Magnesium, Manganese, Phosphorus, Potassium and Zinc.
It provides  effective protection against a variety of poisons.
Weight loss: It helps in weight loss if taken along with honey regularly. A few drops of lemon juice in cooked vegetables too help.Its pectin, along with metabolism and circulation boosting nutrients  which help in lowering cholesterol. Its a potent digestive aid and liver cleanser.
Cough & cold: Vitamin C provides resistance to virus, affecting the mucous membranes in the nose and throat.  Its antibacterial, antiviral and  promote immunity against  infections. It acts as an antiseptic and prevents illness due to allergy.
Marmalade and lemon liqueur: are prepared by using its  juice and rind. 
Garnish for food and drinks is made by using Lemon slices and lemon rind.
Flavor to baked goods, puddings, rice and other dishes, is added by using Lemon zest-the grated outer rind of the fruit.
Cleaning agent: Lemon juice along with salt or backing powder is used for cleaning-brightening copper-brass-bronze cookware, door fittings, statues. it dissolves the tarnish and the abrasives. As a deodorizer it remove grease, bleach stains, and disinfects; when mixed with baking soda.It is used for cleaning and polishing wood.
Short-term preservative: It helps in the protection of certain food items which tend to oxidize and turn brown after being sliced, like apples, bananas and avocados.
Nontoxic insecticide treatment: is provided by Lemon oil.
Finger moistener: Cashiers use it  for  counting large amounts of currency notes.
Aromatherapy: Lemon oil aroma may enhance mood and stimulate brain activity.Lemon balm has a soothing effect helps in releasing fatigue, exhaustion, dizziness, anxiety, nervousness and tension. Lemon oil helps in increasing concentration and alertness. It may be used as a room freshener in offices.
Cankers: The proven antibacterial and antiviral properties of lemons can accelerate the healing process in the case of cankers. 
Battery: It  produces feeble currents, when electrodes are attached to it.
Lemon pickle or mixed pickle-lemon+green chilly+garlic+ginger with spices like rai chilly, pepper, salt, sounf,  is part of everyday food every where in  India.
 Sore throat & tonsillitis: Gargle with the juice and salt added in water relieves the throat.
Corns and calluses: Lemon poultices applied overnight provides  remedy for corns and calluses.  Honey too has anti-inflammatory effect which strengthens the healing impact of lemon.
Refreshing: Long distance walkers-travelers-explorers are relaxed from fatigue, when they consume Shikanji. 
Acidity: Its regular use-few drops in food prevents acidity.Dehydration: It can be given to patients suffering from dehydration by mixing it with soda.
Jaundice: During jaundice and fever, it gives a soothing effect.
Insects repellent: Its smell repels insects instantaneously.
Relieves anxiety and promote sleep:  Lemon balm combined with other calming herbs (such as Valerian, hops, and chamomile) helps in reducing anxiety before sleep. 
Pain-reliever:  Inflammation and pain are eased by  massage  of  lemon oil mixed with jojoba oil.
ACNE: Citric acid  present in it,  can  treat acne effectively.
CATION: One suffering from heartburn, kidney or gall bladder problems, citrus allergy should consult the doctor before using these remedies or drinking lemon juice. To protect the  teeth enamel, wait at least half an hour before brushing your teeth after chewing, drinking or rinsing with lemon juice. Rubbing lemon juice or oil and drinking lemon juice may not be suitable for children under the age of 10.
नींबू एक ऐसा रसीला फल है जो सब्जियों में प्रयुक्त होता है। इसके रस से किसी भी सब्जी का स्वाद बढ़ जाता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ विटामिन सी से भरपूर भी है।
* एक गिलास पानी में एक नींबू निचोड़कर रात को सोते समय पीने से पेट साफ़ हो जाता है।   
* एक गिलास गुनगुने पानी में एक नींबू का रस व एक चम्मच शहद मिलाकर पीने से कब्ज दूर होती है और शरीर का वजन घटने लगता है।   
* नींबू के रस के सेवन से पेट के कीड़े मर जाते हैं।  
* नींबू के रस में जैतून का तेल मिलाकर चहरे पर मलने से दाग-धब्बे, मुहांसे तथा झाईयां समाप्त होती हैं।  
BUTEA  परसा, ढाक-पलाश
देवताओं के हित के लिये कामदेव ने ढाक के पेड़ पर चढ़ कर भगवान् शिव की समाधि को भंग किया था। भगवान् शिव ने अपने तीसरे नेत्र से  कामदेव को भस्म कर दिया। कामदेव के साथ-साथ ढाक का वृक्ष भी जलने लगा।  ढाक के वृक्ष ने भगवान् शिव से प्रार्थना की कि हे प्रभु ! इसमें मेरा कोई दोष नहीं है, मुझे क्षमा कीजिये ! 
भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम्हारे पत्ते मेरे तीन नेत्र के समान हो जायें और तुम्हारे पुष्प अग्नि की तरह लाल हो जाये !
"लिंग पुराण" में जिक्र आया है कि पलाश की समिधा से "ૐ नमः शिवाय" मंत्र के द्वारा 10 हजार आहुतियाँ दें तो सभी रोगों का शमन होता है। इसीलिये इसे ब्रह्मवृक्ष भी कहा जाता है। इसकी समिधा यज्ञ में प्रयुक्त होती है। इसको परसा, टेसू , किंशुक, केसू आदि नामों से भी जाना जाता है।  
बसंत शुरू होने के साथ ही पलाश खिलना शुरू हो जाता है। पेड़ों पर पलाश के फूल होली के कुछ दिन बाद तक रहते हैं और फिर झडऩा शुरु कर देते है। पलाश के फूल ही नहीं इसके पत्ते, टहनी, फली तथा जड़  का भी आयुर्वेदिक तथा धार्मिक महत्व है। 
इसके पत्तों का उपयोग गाँव में भोज आदि के लिये दोने, पत्तल बनाने में किया जाता है। ब्रज में टेसू से होली खेलने की परंपरा है। मथुरा, आगरा, हाथरस, दाऊजी, गोकुल, नंदगांव बरसाने की लट्ठमार होली हो या फिर दाऊजी का हुरंगा, इनमें टेसू के फूलों का जमकर प्रयोग होता है। बिहारी जी के मंदिर में खेली जाने वाली होली में भी टेसू के फूलों का प्रचलन है।
औषधीय गुण ::
स्वस्थ बच्चे :: नारी को गर्भ धारण करते ही अगर गाय के दूध में पलाश के कोमल पत्ते पीस कर पिलाये जायें तो शक्तिशाली और हृष्ट-पुष्ट;  बल-वीर्यवान संतान की प्राप्ति होती है।
अनचाहा गर्भ :: पलाश के बीजों का मात्र लेप करने से नारियाँ अनचाहे गर्भ से बच सकती हैं।
पेशाब में जलन-पेशाब रुक रुक आना :: पलाश के फूलों का एक चम्मच रस निचोड़ कर दिन में 3 बार पीना चाहिये।
दस्त व संग्रहणी :: इसका गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।   
Dysentery-diarrhoea :: Palash Gum Powder, cinnamon powder (each 1/4 teaspoon) are taken with warm water.  Flower infusion is also given.
बवासीर :: इसके पत्तों की सब्जी घी व तेल में बनाकर दही के साथ खाने से फायदा होगा। 
बुखार :: यदि शरीर बहुत तेज बुखार से दहक रहा हो तो पलाश के पत्तों का रस शरीर पर लगाने से 15 मिनट में सारी जलन ख़त्म हो जाती है।
घाव भरना  :: पलाश की गोंद का बारीक चूर्ण छिड़कने से लाभ होता है।
Boils :: Prepare paste of leaves and apply on affected area.
फीलपांव या हाथीपाँव :: पलाश की जड़ के रस में सरसों का तेल मिला कर बराबर मात्रा में मिलाकर फिर सुबह शाम 2-2 चम्मच पीन चाहिये।     
वीर्य विकार :: इसकी मुँह मुदी-बिल्कुल नई कोपलों को छाया में सुखाकर कूट-छानकर गुड़ में मिलाकर लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से वीर्य-विकार नष्ट हो जाता है। 
शीघ्रपतन :: इसकी जड़ का रस निकालकर उस रस में 3 दिन तक गेहूं के दाने को भिगो दें। उसके बाद दोनों को पीसकर हलवा बनाकर खाने से प्रमेह, शीघ्र पतन-धातु का जल्दी निकल जाना और काम शक्ति की कमजोरी दूर होती है।
Sexual dysfunction, intestinal infection, ulcers :: Its flowers and leaves are diuretic, aphrodisiac, astringent and increase flow of blood in pelvic region. Powdered Butea, 1 teaspoon, should be taken twice a day with Mishri-sugar crystals  and milk.
वीर्य वृद्धि, मजबूत अस्थियाँ, शरीर पुष्ट शरीर :: इसका 1 से 3 ग्राम गोंद अस्थियाँ मजबूत बनाता है। मिश्री युक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है और शरीर पुष्ट होता है। 
वाजीकरण (सेक्स पावर) :: 5 से 6 बूंद टेसू के जड़ का रस प्रतिदिन 2 बार सेवन करने से अनैच्छिक वीर्यस्राव (शीघ्रपतन) रुक जाता है और काम शक्ति बढ़ती है।  
लिंग की दृढ़ता :: पलाश के बीजों के तेल कि हल्की मालिश लिंग पर करने से वह दृढ होता है। यदि तेल प्राप्त ना कर सकें तो पलाश के बीजों को पीसकर तिल के तेल में जला लें तथा उस तेल को छानकर प्रयोग करें। 
स्तम्भन एवम शुक्र शोधन हेतु :: इसके लिए पलाश कि गोंद घी में तलकर दूध एवम मिश्री के साथ सेवन करें। दूध यदि देसी गाय का हो तो श्रेष्ठ है।
नपुंसकता :: इसके बीज पीसकर अन्य दवाओं में मिला के प्रयोग करें। टेसू के बीजों के तेल से लिंग की सीवन सुपारी छोड़कर, शेष भाग पर मालिश करने से कुछ ही दिनों में हर तरह की नपुंसकता दूर होती है और काम शक्ति में वृद्धि होती है। 
शरीर में अन्दर गांठ गाँठ :: इसके पत्तों को गर्म करके या उनकी चटनी पीस कर गरम करके उस स्थान पर लेप करने  होगा। 
दाद खाज खुजली :: इसके बीजों को नीबू के रस में पीस कर लगाने से दाद-खाज-खुजली में आराम मिलता है।
Ring worms :: Dust crushed seeds of Palash on affected body area. 
असाध्य चर्मरोग :: टेसू के फूल को घिस कर चिकन पाक्स के रोगियों को लगाया जाता है। यह असाध्य चर्म रोगों में भी लाभप्रद होता है। हल्के गुनगुने पानी में डालकर सूजन वाली जगह धोने से सूजन समाप्त होती है। इन फूलों को पानी में उबालकर बनाये गये केसरी रंग को पानी में मिलाकर स्नान करने से ग्रीष्म ऋतु की तपन से रक्षा होती है।
मेह-मूत्र संबंधी विकार ::  इसके फूलों का काढ़ा (50 मि.ली.) पानी में मिलाकर पीयें।
(1). बालकों की आँत्रवृद्धि (Hernia) में छाल का काढ़ा (25 मि.ली.) बनाकर पिलायें।
(2). नाक, मल-मूत्रमार्ग अथवा योनि द्वारा रक्तस्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (50 मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलायें।
प्रमेह :: इसकी मुँह मुदी-बिल्कुल नई कोपलों को छाया में सुखाकर कूट-छानकर गुड़ में मिलाकर लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से प्रमेह नष्ट हो जाता है। 
नाक-मल-मूत्रमार्ग अथवा योनि द्वारा रक्तस्राव :: छाल का काढ़ा (50 मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलाकर पीने से फायदा होगा।  
महिलाओं के मासिक धर्म, पेशाब में रूकावट, अण्डकोषों की सूजन :: फूलों को उबालकर पुल्टिस बना के पेड़ू पर बाँधने  लाभ होगा। अण्डकोषों की सूजन भी इस पुल्टिस से ठीक होजायेगी।


नेत्रों की ज्योति :: पलाश के फूलों का रस निकाल कर उसमें शहद मिलाकर आँखों में काजल की तरह लगाकर सोना चाहिये। अगर रात में दिखाई न देता हो तो पलाश की जड़ का अर्क आँखों में लगाना चाहिये। इसकी जड़ अनेक नेत्ररोगों में लाभदायी है।
रतौंधी :: प्रारम्भिक अवस्था में फूलों का रस आँखों में डालने से लाभ होता है।
आँख आना Conjunctivitis:: फूलों के रस में शुद्ध शहद मिलाकर आँखों में आँजें।
कृमिनाशक :: पलाश के बीज उत्तम कृमिनाशक व कुष्ठ (त्वचारोग) दूर करने वाले हैं।इसके बीजों में पाया जाने वाला पैलासोनिन उत्तम कृमिनाशक है। 3 से 6 ग्राम बीज-चूर्ण सुबह दूध के साथ तीन दिन तक लेने से, चौथे दिन सुबह 10 से 15 मि.ली. अरण्डी का तेल गर्म दूध में मिलाकर पीने से  पेट के कृमि निकल जाते है। 
Intestinal parasites :: Its seeds are anthelmintic, laxative & have anti-parasitic propertiesThe fresh seed juice can be administered with honey. Seed kernel powder is also used for treating parasitic infestation. The seeds are soaked in water and seed coat is removed to get the kernel. The kernels are dried and powdered. The powder is taken in dose of 1/2 teaspoon with honey for three days.
बिच्छूदंश :: पलाश के बीज + आक (मदार) के दूध में पीसकर बिच्छूदंश की जगह पर लगाने से दर्द मिट जाता है। 
Snakebite :: The traditional remedy for snakebite (that is used in some parts of India), is to give mix of equal amount of Palash bark and ginger orally.
पित्तजन्य रोग :: इसके पुष्प मधुर व शीतल हैं। उनके उपयोग से पित्तजन्य रोग शांत हो जाते हैं।
पलाश के पाँचों अंग (पत्ते, फूल, फल, छाल, व मूल) औषधीय गुणों से सम्पन्न हैं। यह रसायन (वार्धक्य एवं रोगों को दूर रखने वाला), नेत्रज्योति बढ़ाने वाला व बुद्धिवर्धक भी है। पलाश से एक ऐसा रसायन भी बनाया जाता है जिसको अगर खाया जाए तो बुढापा और रोग आस-पास नहीं फटकते।
इसके पत्तों से बनी पत्तलों पर भोजन करने से चाँदी के पात्र में किये गये भोजन के समान लाभ प्राप्त होते हैं पहले लोग शादी ब्याह और अन्य संस्कार में पत्तल और दोने पलाश (ढाक) का ही करते थे और आज की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ रहते थे। 
पलाश व बेल के सूखे पत्ते, गाय का घी व मिश्री समभाग मिलाकर धूप करने से बुद्धि शुद्ध होती है व बढ़ती भी है।
वसंत ऋतु में पलाश लाल फूलों से लद जाता है। इन फूलों को पानी में उबालकर केसरी रंग बनायें। यह रंग पानी में मिलाकर स्नान करने से आने वाली ग्रीष्म ऋतु की तपन से रक्षा होती है, कई प्रकार के चर्मरोग भी दूर होते हैं।
Bengal Kino-the gum extracted from Plash bark, has astringent action and is useful in case of haemorrhage.
Many Ayurvedic medicines such as Krimi-worms Kuthar Ras, Maha Narayani Tail, Janm Ghutti, Palas Beejadi Churn, contain Palash as an ingredient.
Crotch itch-Dhobi (washer man) itch or jock itch :: One teaspoon Palash seeds pounded in one teaspoon lemon juice when applied to the affected area help in cure of crotch itch.
Arthritis-Inflammation, sprain, swelling :: Its flowers cooked in steam are applied over the affected region.
Blood purification :: Palash flowers are used to remove body toxins. For this purpose dried or fresh flowers can be used. Take dried flowers and grind in mortar and pestle to make powder. Take 1-2 gm daily.
Diabetes, discharge :: Consume powdered Butea, (2 gm). 
Dosage of various Palash parts :: 
Stem bark :- 5-10 g powder; Decoction of bark – 50-100 ml twice a day,
Fresh leaves juice :- 10-15 ml, twice a day,
Flower :– 3-6 g powder,
Seed powder :- 0.5-1 g,
Gum :- 25-50 mg twice a day.
PRECAUTION :: It may have side effects like anti-contraceptive and anti-implantation activity, pregnancy terminating and reduction in the number of implantation sites in dose dependent manner. It shows weak estrogenic (Estrogens are hormones that are important for sexual and reproductive development, mainly in women.) activity. The seeds must be used as medicine for short duration and in recommended dosage. 
POMEGRANATES :: This ruby-red fruit has been shown to be a cure-all for just about any ailment. It helps in stomach upsets, menopausal hot flashes, haemorrhoids, conjunctivitis, osteoarthritis, lowers blood pressure, stimulates the immune system, wards off the flu, reduces inflammation, reduces risk of heart disease and lowers cholesterol. The peel is good for the heart and blood vessels; the white membrane is good for stopping diarrhea and good for wounds and ulcers of the mouth and throat. The fruit also strengthens the brain, cleanses the body and blood from toxins and is very good at expelling worms from the intestines. Pomegranates are used to make make dessert wine.
There is an old saying "एक अनार सौ बीमार" One Pomegranate desired by hundred of patients. Its a thick skinned  fruit ful of juicy seeds, with a brilliant red hue, touted as a wonder fruit by researchers. The name pomegranate derives from the French word Pomegranate the seeded apple. Its taste is a bit tart and sweet. 
Pomegranate provides Pelagic acid, Punic acid, omega-5 polyunsaturated fatty acid, which is essential for regeneration and proliferation. It contains antioxidants like anthrocyanine and allagice acid, and vitamins A, C and E along with minerals: calcium, phosphorous, potassium, iron, folic acid, niacin, thiamine, folates, riboflavin and flavonoids like quercetin.
1. Natural Aphrodite: It boosts the strength, rejuvenate and retard aging. It symbolizes fruitfulness, prosperity and fertility. Herbology cites pomegranate juice as a longevity treatment.
2. Heart Trouble: It keeps the arteries flexible and reduce  the inflammation in the lining of the blood vessels and atherosclerosis, one of the causes of heart disease. It  protects the arteries from blocked, causing  resistance  to the two way flow of blood, to the heart and brain having anti-atherogenic effect on the heart. It lowers the amount of LDL-bad cholesterol and increases the good cholesterol-HDL.
3. Diabetes:  Avoid packed juice, as it contains added sugar. Use freshly extracted juice which too contain fructose, but do not increase  the blood sugar level in the blood. 
4. Blood pressure:  It controls blood pressure and reduces high blood pressure and act over lesions and the inflammation of blood carriers vessels. Natural aspirin, contained by it checks blood coagulation and clot formation, acting as a blood thinner. 
5. Cancer: Its juice eliminates free radicals from the body and checks the growth and development of cancer and other diseases. Its high contents of anti-oxidants stimulate the WBC to neutralize toxins in the body, thereby promoting a strong and healthy immune system.
It is said to induce apoptosis, a process where the cells destroy themselves. Regular consumption slows down the growth of cancerous cells in prostate cancer. It blocks growth of aromataze-an enzyme, which converts androgen to estrogen-the hormone, which plays a crucial role in the development of breast cancer.
It possesses anthologists and hydrolysable tannins having strong anti-oxidant and anti-tumor promoting properties. When applied directly on the skin, ellagic acid, a poly-phenol antioxidant found in pomegranates inhibits the growth of cancer of the skin.
6. Stomach: The  juice is good for  the treatment of diarrhea and dysentery leading to the secretion of enzymes, which helps in proper digestion.  One  teaspoon of honey mixed in a glass of pomegranate juice, ascertain curing of  indigestion problems.
7. Immunity: It possesses both anti-bacterial and anti-microbial properties which help fight microbes, viruses and bacteria and boost  immunity. It checks the microbes which are responsible for teeth cavities and staph infections. Its an effective inhibitor of HIV transmission as compared to other fruits.
8. Anemia: Anemia is a state of the deficiency of red blood cells in the body. Sufficient quantity of iron present in it helps, in over coming deficiency of RBC-red blood cells in the body. A few drops of the juice mixed with candied sugar in the nostrils controls nose bleeding. It is relaxes red or sore eyes and  checks falling of eye lashes.
 9. Digestion: Pomegranate juice aids in the smooth functioning of the stomach, heart and liver. This juice induces hunger and can even control thirst. It soothes urinary tract infection and eases the flow of urine. The high amount of dietary fiber, both soluble and insoluble in pomegranate juice helps to improve digestion and regulate bowel movement. Since, it has no saturated fats or cholesterol, it is highly recommended for one aiming loss weight.
10. Regeneration of Cartilages: Pomegranate juice acts as an inhibitor on enzymes that are responsible for damaging the cartilage. It's therefore, highly recommended for patients suffering from osteoarthritis, a chronic condition characterized by the breakdown of the joint’s cartilage. Studies conducted have proved the application of this juice to reduce deterioration of the cartilage. Unsweetened juice relieves symptoms of arthritis and bone inflammation. A regular intake of this juice may curb the onset of neurological problems like Alzheimer disease. It is also known to dissolve kidney stones and cure erectile dysfunction in men.
11. Prenatal care: The juice is extremely beneficial for pregnant women for the overall development of fetus. The potassium content present in it, help prevent leg cramps associated with pregnancy. It  lowers the risk of premature child birth and ensures proper weight at the time of birth
12. Skin Care: This is quite good at providing a glowing skin, by providing  moisturization and hydration to the skin.  Thus it soothes, dry and irritated skin. Its content of Punic acid, and omega 3 fatty acid keeps the skin constantly hydrated by sealing in the moisture. It keeps the  oily skin, free from pimples. Application of pomegranate juice on oily skin prevents the outbreak of pimples and controls the production of sebum.
 13. Reduction of  wrinkles : It reduces wrinkles and fine lines on the face, with regeneration of the skin cells, prevention of hyper pigmentation and occurrence of dark spots.
14. Healing scars: It helps in the regeneration of cells in the epidermal and dermal layers of the skin. It enhances the healing of wounds. The oil extracted from its seeds has nutrients beneficial for the regeneration of skin-epidermis. It protects the skin from sun burns and heals the damage caused to the skin due to constant exposure to the sun.
15. Skin texture: Pomegranates are also known to extend the life of fibroblasts which are responsible for the production of collagen and elastin which tightens the skin and prevent the formation of fine lines and wrinkles. Collagen and elastin provide strength and support to the skin. When 
the fibers of collagen and elastin break down, the skin develops laxity which causes wrinkles and
jowl. Pomegranate is also very useful for brightening the skin tone. Its regular consumption ensures a fair and glowing skin.
16. Face cleansing: Application of one teaspoon each of powdered green papaya, grape seed oil and grape seed extract with two teaspoons of its juice over the face, for an hour and washing it off, with lukewarm water, helps in cleansing of facial skin.
17. Hair growth: It strengthen the hair follicles  preventing hair fall,  giving them  a new lease of life accompanied with healthy and lustrous appearance.
Warning: (I) One suffering from influenza, cough, and constipation or for those with a phlegmatic condition should avoid it.(II) One should avoid consumption while under medication for low blood pressure, lower cholesterol levels, anti depressants, medication for AIDS and narcotic pain relievers.(III) One having  plant allergies, asthma, vomiting, red itchy eyes, hives and difficulty in breathing should avoid it. 
आँवला ANVLA  :: Brahma Ji created ANVLA FRUIT for the welfare of the three Loks. Therefore, it has been worshipped, since ages. It  belongs to the Euphorbiaceae family. One who uses a small quantity of Anvla except Sundays may survive up to hundred years, easily. Health benefits of  Amla can be attributed to the high content of vitamin C, present in it.The Vitamin C present in it, is bonded with tannin, which protects it, from being destroyed by heat or light. It tastes sour. Both dried and fresh fruits are used. It is used as murraba, chutney, candies and various other ways.
The fresh fruit contains more than 80% water, protein, minerals, carbohydrates and fiber
It contains many minerals and vitamins like Calcium, Phosphorus, Iron, Carotene and Vitamin B Complex. Anvla is a powerful antioxidant with the Calorific value of 96.5. Approximate proportion of various ingredients : Water: 80%,  Minerals: 0.7%, Fiber: 3.4%,  Protein: 0.9%, Fat: 0.1%,  Carbohydrate: 6.9%,  Calcium:  3.4%,  Iron: 1.2%,  Vitamin B-1 0.02%,  Vitamin B-2 0.08%, Vitamin-C 4.63%.
IMMUNITY: It boosts immunity, improves body resistance, lowers consumption, helps the body in fighting  infections, due to its antibacterial qualities. It helps boost protein metabolism along with lose of weight.
POTENCY-REJUVENATING: It prevents hyperlipidaemia, through attenuating oxidative stress in the ageing process, being most important and essential ingredient of CHAYVANPRASH (-meant for males only) which is anti aging-rejuvenating, stimulating and increases sperms (-viry वीर्य) count and potency.  It strengthens all the seven tissues (-dhatu धातु), including the reproductive tissue of male genital.
COUGH CURE: It helps in chronic cough, bronchitis (-throat inflammation), tuberculosis and allergic asthma. 
ANTIOXIDANTS:  Antioxidants present in it protects the body, from free radicals, which are harmful, since they damage the cells, leading to cancer and other possible diseases.
DIGESTION: Its essential  constituent of Triphala (three fruits-haed-हैड़, bheda-बहेड़ा, anvla-आँवला) powder, which detoxify-strengthens the liver, flush out toxins and improve digestion. It  helps the body in absorbing and assimilating nutrients from the foods.It reduces acidity-gastric syndrome and hyperchlorhydria (burning sensation in abdomen).
CONSTIPATION: Regular  use  of anvla powder (-Triphala) reduces constipation problem, as it is rich in fiber and a gentle laxative.
DIARRHEA & DYSENTERY: Its cooling and laxative properties makes it  useful for the remedies of diarrhea and dysentery. 
ANTI INFLAMMATORY: It  acts as anti-inflammatory agent, thereby reducing arthritis pain, by helping in reducing the swelling and pain of the joints of knees. 
PIMPLES & ACNE: It inhibits pitt (-पित्त) provide relief from skin disorders like pimples and acne formed due to liver and bladder, over run by toxins.  It quite good for clear complexion.
HAIR TREATMENT: Hair constitute a bi product of bones. It helps in absorption of Calcium from the digested food leading to healthier, rich,  lustrous hair and minimises hair loss. Anvla powder prevents dandruff. It enriches hair growth and hair pigmentation-maintains color while strengthening roots of hair. Grounded seeds of Anvla mixed with lemon, applied on the scalp and washed after some time, clears the lice from the hair.
REDUCES BLOOD SUGAR: Its juice taken with a pinch of turmeric twice a day, before meals in small quantity, stimulate the isolated group of cells, which secrete the hormone insulin to reduces blood sugar and improves eye sight. One teaspoon of Anvla and the Jamun juices mixed together and taken twice a day, too help in curing diabetes.Presence of chromium in it, is beneficial to the diabetics. Application of a small quantity of Anvla oil over the head before bathing cures the eye diseases, night blindness and bilious giddiness. 
MENSTRUAL DISORDERS: Relieves menstrual cramping-disorders making it regular.
PREVENTION OF OSTEOCLASTS: Anvla extracts slows down the activity of osteoclasts-the cells which break down bones. It strengthens teeth and nails and protects the body from radiation.
BLOOD PURIFIER: Its juice or powder with honey purifies blood, cures cardiovascular illness & anemia,  lowers cholesterol level- LDL (-bad cholesterol), VLDL and triglycerides level by over 40%, Increases the level of HDL (-good cholesterol) significantly, increases red blood cells & Hemoglobin and strengthens heart muscles. 
PILES (बबासीर-अर्श): Fresh anvla juice consumed with half tea spoon of ghee and 1 tea spoon of honey and 100 ml of milk-some time after lunch, helps in curing piles problem.
MEMORY: To revitalize brain take a cupful of sugar free milk with the murbba (-मुरब्बा) of anvla, once a week.
NOURISHES NERVES: It provides nourishment to the nerves, helps in paralytic situations and protects the urinary system by flushing out toxins simultaneously.Taking Anvla powder with radish helps in checking stone in bladder by breaking the stones and throwing it out with urine.
VENEREAL DISEASES: Amla confection is used in syphilis, flatulence.
LEUCORRHOEA: Anvla taken with honey every day, for a month cures the problem of leucorrhoea.
MOUTH ULCER: One suffering from mouth ulcers, may use anvla juice in half cup of water , should it for gargles, every day.
CURES SLEEPLESSNESS: It provide relief to the people suffering from insomnia.
GALL BLADDER STONE: It considerably reduces the risk of gall bladder stone formation, when there is excess cholesterol in the bile. Vitamin C, converts the cholesterol into bile acid in the liver.
Cures infections and ulcers: It helps to cure infections, ulcers and reduces fever due to its anti bacterial, astringent and anti-inflammatory properties.
PREVENTION OF SCURVY AND JAUNDICE: Drinking anvla juice early in the morning with an empty stomach, is a natural tonic which prevents scurvy and jaundice.
CIGARETTE SMOKING:  Intake of anvla juice regularly reduces ill effects of the cigarette smoke in the lungs.
* वमन(उल्टी): हिचकी तथा उल्टी में आंवले का 10-20 मिलीलीटर रस, 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर देने से आराम होता है। इसे दिन में 2-3 बार लेना चाहिए। केवल इसका चूर्ण 10-50 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ भी दिया जा सकता है।
* त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) से पैदा होने वाली उल्टी में आंवला तथा अंगूर को पीसकर 40 ग्राम खांड, 40 ग्राम शहद और 150 ग्राम जल मिलाकर कपड़े से छानकर पीना चाहिए। 
* आंवले के 20 ग्राम रस में एक चम्मच मधु और 10 ग्राम सफेद चंदन का चूर्ण मिलाकर पिलाने से वमन (उल्टी) बंद होती है।
 * आंवले के रस में पिप्पली का बारीक चूर्ण और थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आने के रोग में लाभ होता है।
 * आंवला और चंदन का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 1-1 चम्मच चूर्ण दिन में 3 बार शक्कर और शहद के साथ चाटने से गर्मी की वजह से होने वाली उल्टी बंद हो जाती है। 
* आंवले का फल खाने या उसके पेड़ की छाल और पत्तों के काढ़े को 40 ग्राम सुबह और शाम पीने से गर्मी की उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं।
 * आंवले के रस में शहद और 10 ग्राम सफेद चंदन का बुरादा मिलाकर चाटने से उल्टी आना बंद हो जाती है।
 * संग्रहणी: मेथी दाना के साथ इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार पिलाने से संग्रहणी मिट जाती है।
 * मूत्रकृच्छ (-पेशाब में कष्ट या जलन होने पर): आंवले की ताजी छाल के 10-20 ग्राम रस में दो ग्राम हल्दी और दस ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से मूत्रकृच्छ मिटता है। 
* आंवले के 20 ग्राम रस में इलायची का चूर्ण डालकर दिन में 2-3 बार पीने से मूत्रकृच्छ मिटता है। 
* विरेचन (दस्त कराना): रक्त पित्त रोग में, विशेषकर जिन रोगियों को विरेचन कराना हो,उनके लिए आंवले के 20-40 मिलीलीटर रस में पर्याप्त मात्रा में शहद और चीनी को मिलाकर सेवन कराना चाहिए।
 * अर्श (बवासीर): आंवलों को अच्छी तरह से पीसकर एक मिट्टी के बरतन में लेप कर देना चाहिए। फिर उस बरर्तन में छाछ भरकर उस छाछ को रोगी को पिलाने से बवासीर में लाभ होता है। बवासीर के मस्सों से अधिक खून के बहने में 3 से 8 ग्राम आंवले के चूर्ण का सेवन दही की मलाई के साथ दिन में 2-3 बार करना चाहिए।
 * सूखे आंवलों का चूर्ण 20 ग्राम लेकर 250 ग्राम पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में रात भर भिगोकर रखें। दूसरे दिन सुबह उसे हाथों से मलकर छान लें तथा छने हुए पानी में 5 ग्राम चिरचिटा की जड़ का चूर्ण और 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पीयें। इसको पीने से बवासीर कुछ दिनों में ही ठीक हो जाती है और मस्से सूखकर गिर जाते हैं।
 * सूखे आंवले को बारीक पीसकर प्रतिदिन सुबह-शाम 1 चम्मच दूध या छाछ में मिलाकर पीने से खूनी बवासीर ठीक होती है।
 * आंवले का बारीक चूर्ण 1 चम्मच, 1 कप मट्ठे के साथ 3 बार लें।
 * आंवले का चूर्ण एक चम्मच दही या मलाई के साथ दिन में तीन बार खायें। 
* शुक्रमेह: धूप में सुखाए हुए गुठली रहित आंवले के 10 ग्राम चूर्ण में दुगनी मात्रा में मिश्री मिला लें। इसे 250 ग्राम तक ताजे जल के साथ 15 दिन तक लगातार सेवन करने से स्वप्नदोष(-नाइटफॉल, शुक्रमेह आदि रोगों में निश्चित रूप से लाभ होता है।
 * खूनी अतिसार (रक्तातिसार): यदि दस्त के साथ अधिक खून निकलता हो तो आंवले के 10-20 ग्राम रस में 10 ग्राम शहद और 5 ग्राम घी मिलाकर रोगी को पिलायें और ऊपर से बकरी का दूध 100 ग्राम तक दिन में 3 बार पिलाएं।
 * रक्तगुल्म(खून की गांठे): आंवले के रस में कालीमिर्च डालकर पीने से रक्तगुल्म खत्म हो जाता है। 
* प्रमेह(-वीर्य विकार) : आंवला, हरड़, बहेड़ा, नागर-मोथा, दारू-हल्दी, देवदारू इन सबको समान मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाकर 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम प्रमेह के रोगी को पिला दें। 
* आंवला, गिलोय, नीम की छाल, परवल की पत्ती को बराबर-बराबर 50 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो पानी में रातभर भिगो दें। इसे सुबह उबालें, उबलते-उबलते जब यह चौथाई मात्रा में शेष बचे तो इसमें 2 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से पित्तज प्रमेह नष्ट होती है। 
* पित्तदोष: आंवले का रस, शहद, गाय का घी इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर आपस में घोटकर लेने से पित्त दोष तथा रक्त विकार के कारण नेत्र रोग ठीक होते हैं|
APPLE सेब  :: Its rich in taste with anti-oxidants strength (ORAC value of 5900) per 100 g. Phyto-nutrients, flavonoids, quercetin epicatechin and procyanidin B2 are present in it. Tartaric acid present in it gives it a tart flavor. It protects the body from deleterious effects of free radicals. Polyphenolics  present in it, are essential for normal growth, development and overall well-being.
 LOW CALORIFIC VALUE: 100 g of fresh fruit provide  50 calories. 
WEIGHT LOSS: People who eat 3 apples  a day lose weight considerably since its low in calories, loaded with water and fiber which are digested slowly to keep one satisfied for a longer period.
FIBER: Its rich in dietary fiber, which helps prevent absorption of dietary-LDL or bad cholesterol in the gut. The fiber also saves the colon mucous membrane from exposure to toxic substances by binding to cancer-causing chemicals inside the colon. 
VITAMIN C: Apple fruit contains sufficient quantities of vitamin-C and beta-carotene, a powerful natural antioxidant, which develop resistance against infectious agents and scavenge harmful, pro-inflammatory free radicals from the body.
VITAMIN B COMPLEX: Its a good source of B-complex vitamins such as riboflavin, thiamine, and pyridoxine (vitamin B-6). Together these vitamins help as co-factors for enzymes. 
CARDIOVASCULAR DISEASE: An apple snack soaked with tangerine juice, lowers cardiovascular risk in children. Eating the apple/tangerine snack improves the kids’ blood pressure, lipid levels and antioxidant defenses, while reducing inflammatory markers linked to heart risk. 
TEETH PROTECTION: The crisp, abrasive texture stimulates the gums and removes coating from the teeth, while the mildly acidic flavor increases saliva flow to rinse away plaque, protecting from tooth loss and gum disease. 
DIABETES: It lowers the  risk for 2 types of  diabetes.  Eating whole fruit is more useful as compared to drinking its juice. 
CANCER : It significantly lowers the risk of oral cancer and cancers of the voice box (larynx), breast, esophagus, colon, kidney, prostate and ovary. There’s evidence that when fiber in apples ferments in the colon, it produces cancer fighting compounds like procyanidins, which trigger cancer cell death.
HEART ATTACK: Significant evidence is available to shows that it prevents deaths from cardiovascular disease.
ALZHEIMER'S DISEASE: Regular consumption of apple juice may protect against the damage of brain cells,  associated with Alzheimer’s disease.
REJUVENATING: Apple juice improves brain health,  reduction in age-related memory and cognitive impairment. 
RISK FACTORS:  Apples are vulnerable to worms and  pests. They may contain significant quantities of pesticides, as well.
SUGAR CANE :: Sugarcane Juice extracted by crushing it raw, along with the white mass over its surface which is rich in penicillin protects from a number of diseases. When extracted with lemon, beat, ginger and mint. Its very tasty-nutritious and relishing. It is used for obtaining jaggry and sugar main ingredient of sweets and many food products.
1. It helps in reducing burning sensation associated with urinary tract infections, kidney stones and prostration.
2. It reduces burning sensation and normalize sore throat cold and flu.
3. It helps the body in fighting against cancer, especially prostate and breast cancer.

4. It helpful in the treatment of kidney disorders and facilitates smooth functioning of excretory system.
5. It can restore the proteins which were lost due to fever.
6. It provides relief to diabetics and its regular consumption enhances the wound healing properties, while prevent aging.
7. It is useful in controlling acne, blemishes and keeps the skin hydrated.
8. Its rich in calcium, cobalt,copper, magnesium, phosphorous, potassium and zinc.
9. It contains essential vitamins such as B-1, B-2, B-3, B-5 along with fiber and proteins.
10. Its helps in removal of white spots from the nails and keep them in shining condition.
11. It protects the teeth from tooth decay. 
12. It helps in quick recovery from jaundice. 
Health benefits Jaggery It has got a very good taste. One really relished eating Gur, too often, in his early childhood, sitting by the side of the furnace and looking at the boiling sugar cane juice in the huge open iron pot called Kadhaya-a large version of Kadhai, about 2 meters in diameter. The aroma was wonderful, tantalizing-mouth watering (-तरसानेवाला, मुंह में पानी लाने वाला, ललचाने वाला, लार टपकाने वाला, चाह जगाने वाला).
The quality of Gur-jaggery can be assessed by looking at its color, aroma and the crystals present in it. Eat a small piece and the secret is out. Generally dark colored jaggery, icon to grey, is good at taste. Crystalline one is too good. Avoid yellowish one since it contains lime.
Jaggery made of dates is also good at taste.
SWEETENER: Traditionally it has been used as  sweetener in villages. Villagers eat bread with it and ghee in the absence of vegetables and pulses. It is used with milk for eating bread. Farmers and laborers eat bread with it with a pot full of Chhachh-Lassi. Its mixed with Sattu (-सत्तू) made of roasted and powdered Chana (-चना, gram) and Jou (-barley, जौ) which is complete food for the poor.
The benefits of jaggery include its ability to cleanse the body, act as a digestive agent, sweeten the food in a healthy manner and provide good amounts of minerals. This is a store house of energy which can provide instant relief from fatigue, giddiness (-chakkar ana, चक्कर आना,  fainting, vertigo, dizziness). How ever one suffering from diabetes may avoid it.
 DIGESTIVE: One prefers to eat some jaggery after the meals, since it helps in digesting the food by activating enzymes, converting it self into acetic acid in the stomach, thereby reducing strain over the intestines and digestive tract. It clears the blood and cleans the metabolism. Consumption of jaggery with one glass of water or milk soothes the stomach. It checks gas formation, if consumed after meals. 
health benefits of gurCLEANSER: It effectively cleans the respiratory tracts, lungs, food pipe, stomach and intestines. It pulls out dust and unwanted particles from the body, while giving relief from constipation, perhaps due to presence of fiber in it. Reducing constipation and stimulating the movement of the bowels further cleanses the body of the toxins which jaggery just cleaned out and prepared for excretion.It soothes the skin by providing relief from acne.
MINERALS: Its rich in iron. One having black Melasma (-झाईयां) below the eyelids will certainly find it useful. Unlike sugar, jaggery is rich in minerals, mainly iron with traces of other mineral salts. Minerals essential for the human body are present in the sugar cane juice. Since, the juice does not undergo refinement or bleaching of any kind most of them are retained in it. Sugar cane juice contains good quantity of penicillin, which protects the body from infections. Being a good source of iron, it is very beneficial for patients with anemia. Iron helps in the production of hemoglobin which combines with oxygen to form oxy hemoglobin. The intake is very important especially for women.
Image result for hukka potPREVENTION OF CONSTIPATION: Jaggery helps prevent and relieve constipation by stimulating bowel movements. It activates the digestive enzymes in the body and thus helps in proper digestion of the food. This is the reason, why most people tend to eat Gur after their meals. Children suffering from stomach worms are given rice mixed with Gur to eat, which brings out worms along with stools.
CLEANSE THE LEVER: A small piece of jaggery, helps detoxify the liver by flushing out harmful toxins from the body.
FLUE, COUGH & COLD: Cough and cold, water retention, bloating and migraine are some of the minor health problems that one experiences almost everyday, during change of weather with the onset and offset of winter season. Gur helps in prevention of these if taken in small quantity with milk. It provides relief during Asthma attack if consumed with sesame seeds (-रेवड़ी, गज्जक, तिल पट्टी).
REDUCTION OF PMS: In case one experiences sudden mood swings just before periods, she should eat a small piece of jaggery daily to combat these symptoms of PMS. Caused due to fluctuating levels of hormones in the body, jaggery causes the release of endorphins aka happy hormones. This in turn relaxes the body and makes one feel good thereby preventing from (PMS) premenstrual syndrome.
ENHANCEMENT OF IMMUNITY: It is loaded with antioxidants and minerals like zinc and selenium, which help prevent free-radical damage and also boost resistance against infections. 
PERIOD PAINS: Women who have pain during periods should consume jaggery as it is quite beneficial for them. Soon after the delivery women are fed with meals prepared with Gur-jaggery.
ARTHRITIS: Gur mixed with roasted powered Mathi,  (-Fenugreek seed, मेथी), Azwain, (-Bishop's Weed, अज़वाइन), Sounth (-Dried Zinger, अदरक)  and Ghee helps relieve joint pain and relieves arthritis as well. 
PRECAUTION: It contains 4 kcal/gram. Hence, people who are on a weight loss diet or are diabetic should monitor their consumption as it can lead to weight gain and fluctuations in the blood sugar levels. It is best to consult the dietitian before one start eating jaggery to know how much is needed by his body.
SOME OTHER USES::
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 HUKKA CHILAM हुक्का चिलम 
JAGGERY SEASONING: Sugar cane juice is often used as a lining for the inner walls of earthen ovens and is meant for seasoning the materials cooked inside.
JAGGERY AS BUILDING MATERIAL: It is mixed with lime, sand and clay and used as cement for joining bricks. Jaggery, which is predominantly sucrose, upon reacting with calcium carbonate in lime and silica in clay, forms strong bonds and became very hard on drying. 
CATTLE FEED: Jaggery of low-quality is often mixed with cattle-feed to add taste and make the cattle eat more. It also sweetens the milk of the cattle.
HUNTING BAIT: Its used as a bait for hunting wild animals. It is dumped in the open to attract wild animals by its smell, to taste it and fall prey to the hunters. Since, jaggery contains salt, besides being sweet and having a strong aroma, animals like to lick it.
RELIGIOUS-CEREMONIAL PURPOSES: It is customary in Hinduism to take a bite of jaggery after attending a funeral, along with neem leaves, crushed black pepper and to touch fire and iron, to purify. Small idols of jaggery, rice paste and turmeric are prepared and offered to demigods and goddesses. 
CHILAM चिलम 
FISH BAIT: Its used as fish bait, mixed with ant eggs, ghee, edible oils, cardamom powder, nutmeg powder, mace, poppy seeds and a variety of other things, which forms an excellent bait mixture. Fishes cannot resist its smell and are pulled to the gaming spot where the hooks are waiting.
TOOTH PASTE: When jaggery is held-stored for a long period, it starts melting like a paste called seera (-सीरा) and forms various chemicals like alcohol. One in early childhood observed his grandparents mixing this stuff with tobacco grown in own fields, powered and mixed for smoking through Hukka and Chilam. Low-quality jaggery, mixed with the dust of tobacco, is used as tooth paste in many parts of India. Some people, who appear to have nothing to do, can be seen rubbing this stuff on their teeth the whole day and night, very lazily, in villages.This product is dangerous to both health and the teeth. Tobacco is a carcinogenic.
संतरा ORANGE :: नींबू परिवार का फल संतरा, विटामिन सी और अन्य पोषकीय तत्वों से भरपूर है। इसकी रोग निवारक क्षमता इसे  एक अत्यंत उपयोगी फल बनाती है।  एक सामान्य आकार के संतरे में प्रोटीन-0.25 ग्राम, कार्बोज 2.69 ग्राम, वसा 0.03 ग्राम, कैल्शियम 0.045 प्रतिशत, फास्फोरस 0.021 प्रतिशत, लोहा 5.2 प्रतिशत और तांबा 0.8 प्रतिशत तक पाया जाता है।  इसका रस शरीर के अंदर पहुंचते ही रक्त में रोग निवारण का कार्य प्रारंभ कर देता है।  इसमें पाए जाने वाले ग्लूकोज एवं डेक्सट्रोज पचकर शक्तिवर्धन का कार्य करते हैं। इसका रस अत्यंत दुर्बल व्यक्ति को भी दिया जा सकता है। यह अनेक शारीरिक रोगों से मुक्ति दिलाने में सक्षम है। * मितली और उल्टी में संतरे के रस में थोड़ी सी काली मिर्च और काला नमक मिलाकर लिया जाना लाभकारी रहता है। * रक्तस्राव, मानसिक तनाव, दिल और दिमाग की गर्मी में इसकी विशेष उपयोगिता है। * कब्जियत होने पर संतरे के रस का शर्बत और शिकंजी के साथ काला नमक, काली मिर्च और भुना जीरा मिलाकर लेना लाभकारी रहता है। *संतरे में लहसुन, धनिया, अदरख मिलाकर चटनी खाने से पेट के रोगों में लाभ मिलता है। * बुखार के रोगी को और पाचन विकार में संतरे के रस को हल्का गर्म करके उसमें काला नमक और सोंठ का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी रहता है। *संतरे और मुनक्के का मिश्रण लेने से आंव और पेट के मरोड़ से मुक्ति मिल जाती है। * सर्दी-जुकाम या इनफ्लुएंजा में एक सप्ताह एक गुनगुना संतरे का रस काली मिर्च और पीपली का चूर्ण मिलाकर लेना लाभकारी रहता है। * मुंहासे होने पर संतरे के रस का सेवन तथा उसके छिलके में हल्दी मिलाकर लेप लगाना लाभकारी रहता है। * चेहरे के सौंदर्य को निखारने के लिए हल्दी, चंदन, बेसन और संतरे के छिलके का चूर्ण दूध या मलाई में मिलाकर लगाएं।
केला BANANA :: केला खाने से भूख मिटती है और वजन भी बढ़ता है। इससे स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है क्योंकि यह अनेकानेक पौष्टिक तत्वों से भरपूर है।  
* केला खिलाड़ियों का प्रिय फल है क्योंकि यह तुरंत एनर्जी-ऊर्जा प्रदान करता है। इससे सूकरोज़, फ्रक्टोज़ और ग्लूकोज जैसे पोषक तत्व भी मिलते हैं। 
* इसमें पर्याप्त मात्र में प्रोटीन है, जो कि दिमाग को आराम तथा डिप्रेशन दूर करने में सहायक है। 
* दूध के साथ केला और शहद मिला कर पीने से अनिद्रा दूर हो जाती है।  
* केले में रेशा पाया जाता है, जिससे पाचन क्रिया मजबूत बनती है। गैस्ट्रिक व कब्ज़ की बीमारी वाले लोंगो के लिये केला बहुत प्रभावशाली उपचार है। अक्सर यात्रा के दौरान कब्ज की शिकायत हो जाती है। इसको दूर करने के लिये केला एक अच्छा विकल्प है। 
* केला शरीर के खून में हीमोग्लोबिन को बढाकर एनीमिया की शिकायत दूर करता है, क्योंकि इसमें आयरन-लोह तत्व की मात्र प्रचुर है। * केले में पोटैशियम पाया जाता है, जो उच्चरक्तचाप के रोगियों के लिए विशेष लाभकारी होता है। यह खाने से उच्च रक्तचाप सामान्य हो जाता है।  
* दो केले लगभग 100 ग्राम दही के साथ सेवन करने से दस्त व पेचिश में लाभ होता है। 
 * केले पर चीनी और इलायची डालकर खाने से खट्टी डकारें आनी बंद हो जाती हैं, क्योंकि इससे एसिडिटी की शिकायत दूर होती है। 
आलू POTATO :: ऐसा माना जाता है कि अंग्रेज अपने साथ आलू भारत में लाये। इसको अनेकानेक प्रकार से पकाया और खाया जाता है। इसका हलुआ बेहद लजीज और स्वाद से भरपूर होता है। इसकी सब्जियाँ-कचौड़ियाँ ऐसी होती हैं खाने वाला उँगलियाँ चाटता रह जाये। इसको खाने और पकाने के तरीकों का तो कहना ही क्या ! छिलके वाले छोटे-छोटे आलू मेथी की भूजी बनाने में प्रयुक्त होते हैं। इसको छिलके सहित पानी में उबालें और गल जाने पर ही खाएं। भारत मैं यह बारहों मास मिलता है काफी सस्ता भी है। MNC's चिप्स बना-बना कर इसके दामों को बढ़ाना शुरू कर दिया है। 
यह प्रोटीन और खनिज से भरपूर होता है। आलू में स्टॉर्च, पोटाश और विटामिन ए व डी की पर्याप्त मात्रा होती है। यह वजन भी बढ़ाता है।  आलू को तलकर तीखे मसाले, घी आदि लगाकर खाने से जो चिकनाई पेट में जाती है, वह चिकनाई मोटापा बढ़ाती है। आलू को उबालकर अथवा गर्म रेत या राख में भूनकर खाना लाभदायक और निरापद है।  आलू में विटामिन काफी मात्रा में पाया जाता है। इसे छिलके सहित गरम राख में भूनकर खाना बहुत गुणकारी है। 
* भुना हुआ आलू पुरानी कब्ज और अंतड़ियों की सड़ांध दूर करता है। आलू में पोटेशियम होता है जो अम्ल-पित्त को घटाता है। 
* चार आलू सेंक लें और फिर उनका छिलका उतार कर नमक, मिर्च डालकर नित्य खाने से से गठिया ठीक हो सकता है।
* आलू में 8.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। आलू का प्रोटीन बूढ़ों के लिए बहुत ही शक्ति देने वाला और बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने वाला होता है। 
* आलू में कैल्शियम, लोहा, विटामिन-बी तथा फास्फोरस बहुतायत में होता है। आलू खाते रहने से रक्त वाहिनियां बड़ी आयु तक लचकदार बनी रहती हैं तथा कठोर नहीं होने पातीं। 
 *  दो-तीन आलू उबालकर छिलके सहित थोड़े से दही के साथ खा लिए जाएं, तो ये एक संपूर्ण आहार का काम करते हैं। 
 *  चोट लगने पर नील पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाने से फायदा होता है। 
 * जलना,तेज धूप से त्वचा झुलसना, त्वचा पर झुर्रियां या  त्वचा रोग होने पर  कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता है।
 * गुर्दे की पथरी में केवल आलू खाते रहने पर लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर, बार-बार अधिक पानी पिलाते रहने से, गुर्दे की पथरियाँ और रेत आसानी से निकल जाता  हैं।  
* उच्च रक्तचाप के रोगी भी आलू खाएँ तो रक्तचाप को सामान्य बनाने में आसानी होती है। 
 * आलू को पीसकर त्वचा पर मलने से रंग गोरा हो सकता है। 
सावधानी : हरा भाग सोलेनाइन नामक विषैला पदार्थ  होने से खतरनाक बन जाता है। इसके अंकुरित हिस्से का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए।
ब्राम्ही-BRAHMI :: This is a wonderful herb which nourishes the brain. It can be used as salad along with meals. It relieves one from tensions-fatigue and helps in sound sleep.It reduces the impact of heat stroke during summers.Its a memory booster.Its anti aging and reduces fragility.
* खाने से पहले इसकी पत्तियो से चटनी बनाकर प्रयोग कर सकते हैं। 
* यह अच्छी नींद और दिमाग को राहत देने में बडी कारगर है।
* इसका शरबत बना कर पीने से गर्मी में भी मस्तिष्क को ठंडक मिलती है। 
* स्मरण शक्ति के अच्छा है| 
* बालों के स्वास्थ्य के लिए भी ये लाभप्रद है। 
* यह तनाव, मिर्गी, नसों और मस्तिष्क की बीमारियों में भी लाभप्रद है। 
बेल पत्थर :: यह वृक्ष लगभग  25 फुट ऊंचा होता है। इसके पत्ते जुड़े हुए त्रिफाक और गंधयुक्त होते हैं।  इसका फल लगभग 4 इंच व्यास का गोलाकार और पीले रंग का होता है| इसके बीज कड़े और छोटे होते हैं। इसके फल के गूदे और और बीज उत्तम विरेचक (-पेट साफ़ करने वाले) हैं। यह शर्करा को कम करने वाला, कफ व वात का नाश करने करने वाला; अतिसार, मधुमेह, रक्तार्श, श्वेत प्रदर व अति रज(-स्राव) को नष्ट करने वाला होता है। 
औषधीय गुण: पके हुए बेल का शर्बत पुराने आंव की महाऔषधि है। इसके सेवन से संग्रहणी रोग बहुत जल्दी ही दूर हो जाता है। 
* बेल का मुरब्बा पित्त व अतिसार में लाभप्रद है। पेट के सभी रोगों में बेल का मुरब्बा खाने से लाभ मिलता है । 
* 10 ग्राम बेल के पत्तों को 4-5 कालीमिर्च के साथ पीसकर उसमे 10 ग्राम मिश्री मिलकर शरबत 
बनाकर;  इसका दिन में तीन बार सेवन करने से पेट दर्द ठीक हो जाता है। 
* बेल के गूदे को गुड़ मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार (-खूनी दस्त ) ठीक हो जाता है। 
* मिश्री मिले हुए दूध के साथ बेल की गिरी के चूर्ण का सेवन करने से, खून की कमी व शारीरिक दुर्बलता
दूर होती है। 
* बेल के पत्तों को पीस-छानकर, इस 10 मिलीलीटर रस के प्रतिदिन सेवन से मधुमेह में शर्करा आना 
कम हो जाती हैं। 
सहजन :: यह पेड़ ज्यादातर दक्षिण भारत में पाया जाता है। इस पर पूरे वर्ष फली लगती हैं। इसका उपयोग सांबर बनाने में किया जाता है।
* उत्तर भारत में यह केवल एक बार फली देता है। 
* सर्दियां जाने के बाद इसके फूलों की भी सब्जी बना कर खाया जाता है। 
* इसकी नर्म फलियों की सब्जी भी बनाई जाती है।
संरचना: इसकी फली, हरी पत्तियों व सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी-कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
* इसमें बड़ी मात्रा में ओलिक एसिड होता है जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिये अति आवश्यक है।
औषधिक गुण: आयुर्वेद में सहजन से 300 बीमारियों का उपचार किया जाता है। 
* इसके फूल उदर रोगों व कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, शियाटिका,गठिया आदि में उपयोगी है।
* जड़ दमा, जलोधर, पथरी,प्लीहा रोग आदि के लिए उपयोगी है तथा छाल का उपयोग शियाटिका, 
गठिया, यकृत आदि रोगों के लिए श्रेयष्कर है।
* इसके  विभिन्न अवयवोँ के रस को मधुर,वातघ्न,रुचिकारक, वेदनाशक,पाचक आदि गुणों के रूप में जाना जाता है|
* सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात व कफ रोग शांत हो जाते है|
* इसकी पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया,साइटिका,पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका  के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखता है। 
*मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल के साथ आंच पर पकाकर मोच 
वाले स्थान पर लगाने से शीघ्र ही लाभ लगता है। 
* सहजन को अस्सी प्रकार के दर्द व बहत्तर प्रकार के वायु विकारों का शमन करने वाला  माना जाता है। 
* इसकी सब्जी खाने से पुराने गठिया, जोड़ों के दर्द, वायु संचय, वात रोगों में लाभ होता है। 
* सहजन के ताज़े पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है।  
* सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है।  
* इसकी जड़ की छाल का काढा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की
पथरी में लाभ होता है।  
* इसके पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है और उलटी दस्त भी रोकता है। 
* सुबह शाम इसका रस पीने से उच्च रक्तचाप में लाभ होता है। 
* इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे धीरे कम होने लगता है। 
* इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़ें नष्ट होते है और दर्द में आराम मिलता है। 
* इसके कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होती है। 
* इसकी जड़ का काढे को सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ मिलता है।  
* इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सूजन ठीक होते है। 
* सर दर्द में इसके पत्तों को पीसकर गर्म कर सिर में लेप लगाए या इसके बीज घीसकर सूंघने से पीड़ा
हरता है। 
* इसमें दूध की तुलना में 4 गुना कैलशियम और दुगना प्रोटीन पाया जाता है।
* इसके बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 
* इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीस कर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी 
प्राकृतिक शुद्धि करता बन जाता है।
* यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है। 
* कैन्सर व पेट आदि शरीर के आभ्यान्तर में उत्पन्न गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह काढ़ा साइटिका (-पैरों में दर्द, जोड़ो में दर्द, 
लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में लाभकारी है।
* सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द और शहद को दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है।
* इसके प्रयोग से विषाणु जनित रोग चेचक के होने का खतरा टल जाता है।
* सहजन में विटामिन सी की मात्रा काफी होती है जिसके कारण यह सरके कई रोगों से  निजात दिलाता है, खासतौर पर सर्दी जुखाम से। अगर सर्दी की वजह से नाक कान बंद हो चुके हैं तो,
 सहजन को पानी में उबाल कर उस पानी का भाप लेंने से जकड़न कम होगी।
* इसमें कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। 
* इसका अर्क-सत गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है। इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत 
मिलती है और डिलवरी के बाद भी माँ को तकलीफ कम हो। 
* सहजन में विटामिन ए होता है जो कि पुराने समय से ही सौंदर्य के लिये प्रयोग किया आता जा रहा है। 
इस हरी सब्जी को अक्सर खाने से बुढापा दूर रहता है। इससे आंखों की रौशनी भी अच्छी होती है।
* सहजन का सूप पीने में अच्छा लगता है और  रक्त शोधन कर पिंपल से मुक्ति दिलाता है।
Soursop Tree SOURSOP :: (1). It helps fight cancer. (2). It relieves Pain and Inflammation-have analgesic-pain relieving feature-heal the wound whilst it helps prevent pain in the wounded person. (3). Used as  decoction for treating backaches, dermatitis, mouth ulcers, acne and swelling of the sinus, nose and throat. It helps in avoiding discomfort by reduction of the quantity of mucus.(4) A Good Night’s Sleep-Sedative Properties. It contains Tryptophan, a chemical substance which encourages sleepiness as well as relaxation. Tryptophan is found in milk and that’s why we consume a glass of milk for insomnia. Soursop leaves are occasionally utilized in the form of aromatherapy and infusions for sleep.(5). Controls Hypertension:  Soursop helps to reduce the blood pressure and therefore controls hypertension.(6). Helps Prevent Constipation It is rich fiber content and helps to be a treatment for difficulties in bowel movement.(7). Helps to Cure Cold, Fever and Migraines:  Since it consists of rich quantities of vitamin C, it may be beneficial in dealing with cold and flu, cough and blocked nose. This is beneficial to individuals struggling with calcium deficiency. In Africa, kids are occasionally given a bath along with soursop leaves and given soursop tea to lessen their body temperature.(8). Soursop has riboflavin which prevents migraines.(9). Helps in Regulating Blood Sugar: Its leaves have the anti-diabetic properties. It may enhance the function of insulin-producing glands and regulate blood sugar which is very important for diabetics. (10). Helps Fight UTI: It is really an effective food source for moisture and acts as a diuretic, with nearly 84% of a Soursop fruit being water. Several use soursop like a natural diuretic for edema or perhaps retention of water that has resulted in swelling and also excess weight. Soursop’s higher moisture content likewise helps eliminate the urinary system for avoidance and extra support for dealing with UTI, urethritis, and also hematuria.
QUINCE-WOOD APPLE-AEGLE MORMELOS बिल्व वृक्ष :: बिल्व, बेल या बेल पत्थर, भारत में होने वाला एक फल का पेड़ है। इसे रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। इसके अन्य नाम हैं :- शाण्डिल्रू-पीड़ा निवारक, श्री फल, सदाफल इत्यादि। इसका गूदा या मज्जा बल्व कर्कटी कहलाता है तथा सूखा गूदा बेलगिरी।
इसके फल 5-17 सेंटीमीटर व्यास के होते हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं। बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह 10-15 खण्डों में विभक्त सा लगता है, जिनमें प्रत्येक में 6-10 बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं। प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है। इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है।
रासायनिक संगठन :: बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं :- म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स। इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं :- मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है।इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (लगभग 12%) भी रेचक होता है। शक्कर 4.3%, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त 2% भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।
आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आयुर्वेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी अत्यधिक लाभदायक है। चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।
बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जल अवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।
बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जल अवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।
(1). बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते
(2). अगर किसी की शव यात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।
(3). वायुमंडल में व्याप्त फल अशुध्दियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती ही है।
(4). उन चार पांच छः या सात पत्तो वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है ।
(5). बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है। और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।
(6). सुबह शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापो का नाश होता है।
(7). बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते है।
(8). बेल वृक्ष और सफ़ेद आक का पौधा (swallow-wort, calotropis gigantea) को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
(9). बेल पत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।
(10). अजीर्ण में बेल की पत्तियों के दस ग्राम रस में, एक-एक ग्राम काली मिर्च और सेंधानमक मिलाकर पिलाने से आराम मिल सकता है।
(11). अतिसार के पतले दस्तों में ठंडे पानी से लिया ५-१० ग्राम बिल्व चूर्ण आराम पहुँचाता है। कच्चे बेल की कचरियों को धूप में अच्छी तरह सुखा लें या पंसारी से साफ़ छाँट ले आएँ। इन्हें बारीक पीस कपड़ाछान करके शीशी में भर लें। यही बिल्व चूर्ण है। छोटे बच्चों के दाँत निकलते समय दस्तों में भी यह चुटकी भर चटा दें।
(12). आँखें दुखने पर पत्तों का रस, स्वच्छ पतले वस्त्र से छानकर एक-दो बूँद आँखों में टपकाएँ। दुखती आँखों की पीड़ा, चुभन, शूल ठीक होकर, नेत्र ज्योति बढ़ेगी।
(13). जल जाने पर बिल्व चूर्ण, गरम किए तेल को ठंडा करके पेस्ट बना लें। जले अंग पर लेप करने से फौरन आराम आएगा। चूर्ण न होने पर बेल का पक्का गूदा साफ़ करके भी लेपा जा सकता है।
(14). पाचन तंत्र में खराबी के कारण आंव आने लगती है, जो कुछ ही समय में रोगी को दुर्बल-असक्त बना देती है। ऐसे में बेलगिरी और आम की गुठली की गिरी बराबर मात्रा में कूट-छान लें। आधा ग्राम चूर्ण सुबह चावल की माड के साथ सेवन करें। आधा ग्राम यह चूर्ण पहले दिन दो-दो घंटे बाद चार बार, दूसरे दिन सुबह-दोपहर और तीसरे दिन सिर्फ़ सुबह लें। आंव बन्द हो जाने पर चूर्ण न लें।
(15). कब्ज से पेट-सीने में जलन रहने पर पचास ग्रामा गूदे में, पच्चीस ग्राम पिसी हुई मिश्री और ढ़ाई सौ ग्राम जल मिलाकर शर्बत बना लें। रोज़ पीने से कब्ज़ नष्ट होकर, चेहरे पर ओज आएगा।
(16). छाती में जमे कफ से तेज़ खाँसी उठती है। रोगी रातभर सो नहीं पाता। इसमें सौ ग्राम बेल गूदा आधा किलो पानी में हल्की आँच में पकायें। तीन सौ ग्राम रह जाने पर उतार कर छान लें। एक किलो मिश्री की एक तार चासनी बनाकर इसमें मिलाएँ। एक रती भर केसर और थोड़ी जावित्री डालकर इसे सुगंधित और पुष्टिकर बना लें। गुनगुना घूँट-घूँट कर पिएँ। सर्दियों में इस्तेमाल करने से कफ इकठ्ठा नहीं होगा।
(17). दमा में कफ निकालने के लिए बेल की पत्तियों का काढ़ा दस-दस ग्राम सुबह-शाम शहद मिला कर पिएँ। अथवा पाँच ग्राम रस में पाँच ग्राम सरसों का शुद्ध तेल मिला कर पिलाएँ।
(18). पचास ग्राम सूखे बेल पत्तों का चूर्ण, तीन ग्राम मात्रा में एक चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम देने अथवा पक्के गूदे में थोड़ी मलाई मिलाकर खाने से मूत्र और वीर्य दोष नष्ट होते हैं।
(19). ल्युकोरिया में बेलगिरी रसौत और नागकेसर समान मात्रा में कूट-पीस कर कपड़े से छान लें पाँच ग्राम चूर्ण, चावल के मांड के साथ दिन में दो या तीन बार दें।
(20). सौ ग्राम पानी में थोड़ा गूदा उबालें, ठंडा होने पर कुल्ले करने से मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं।
(21). पीलिया में बेल की कोंपलों का पचास ग्राम रस, एक ग्राम पिसी काली मिर्च मिलाकर सुबह-शाम पिलाएँ। शरीर में सूजन भी हो तो पत्र रस तेल की तरह मलिए।
(22). सिर दर्द में बेल पत्र के रस से भीगी पट्टी माथे पर रखें। पुराना सर दर्द होने पर ग्यारह पत्तों का रस निकाल कर पी जाएँ। गर्मियों में इसमें थोड़ा पानी मिला ले। कितना ही पुराना सर दर्द ठीक हो जाएगा।
(23). रक्त शुद्धि के लिए बेलवृक्ष की पचास ग्राम जड़, बीस ग्राम गोखरू के साथ पीस-छान लें। सुबह एक छोटा चम्मच चूर्ण आधा कप खौलते पानी में घोंलें। मिश्री या शहद मिला कर गरमा-गरम घूँट भरें। कुछ ही दिनों में लाभ दिखाई देने लगेगा।
(24). मोच अथवा अन्दरूनी चोट में बेल पत्रों को पीस कर थोड़े गुड़ में पकाइए। इसे थोड़ा गर्म पुल्टिस बन पीडित अंग पर बाँध दें। दिन में तीन-चार बार पुल्टिस बदलने पर आराम आ जाएगा।
(1). Snakes do not come near-in the surroundings of Bilw tree.
(2). If the funeral procession passes under the Bilw tree he is supposed to have qualified for salvation.
(3. It has wonderful capability to cleanse the atmosphere.
(4). The four, five, six or seven leaves offered to Bhagwan Shiv during prayers especially on Shiv Ratri, it helps one attaining Salvation and grants Shiv Bhakti.
(5). One who cuts a Bel tree leads to destruction of his lineage. On the other hand one who plants or sow Bel seeds is blessed with continued lineage.
(6). Harvesting-watering of Bel tree leads to satisfaction of Manes-Pitre Gun.
(7). The mere sight of the Bel tree in the morning and evening destroys sins.
(8). Bel tree planted along with swallow wort increases the wealth of the person, who does it. (9). Ancient alchemists-Rishi Munis used to prepare gold by making use of Bel fruits, leaves along with copper.
 AMARANTH चौलाई
चौलाई का उपयोग सब्जी और अनाज के रूप में किया जाता है। व्रत-उपवास में इसके लड्डू गुड़ के साथ मिलाकर बनाये जाते हैं। इसको भूनकर दूध में मिलकर भी खाया जाता है। यह हरे या लाल पत्तों वाली होती है।  इसके डंठल और पत्तों में पौष्टिक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। 
इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन ए, मिनिरल्स और आयरन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसमें सोना भी पाया जाता है जो किसी अन्य साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता। औषधि के रूप में चौलाई के पंचांग यानि पांचों अंग :- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं। इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। 
रक्त विकार, कफ और पित्त :: यह रक्त विकार कफ और पित्त का नाश करती है जिससे रक्त विकार दूर होते हैं। 
पेट और कब्ज :: इस का साग पेट और कब्ज विकार दूर करने के लिये बहुत उत्तम माना जाता है। 
रक्त व त्वचा विकार :: इसकी सब्जी का नियमित सेवन करने से वात, रक्त व त्वचा विकार दूर होते हैं। 
विषदन :: यह सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन नाम दिया गया है।
चर्म रोग :: किसी भी तरह के चर्म रोग में इसके पत्ते पीस कर लेप कर 21 दिनों तक लगातार लेप करने से वह ठीक हो जाता है। 
खून बहना :: शरीर में अगर कही भी खून बह रहा है और बंद नहीं हो रहा लाल पत्ते वाली चौलाई की जड़ को पानी में पीस कर पी लेने से ही रुक जाता है। एक बार पीने से नहीं रुक रहा तो बारह घंटे बाद दुबारा पीना चाहिये। गर्भाशय, मल द्वार या बलगम के साथ खून रोकने में यह मुफीत-लाभप्रद है। गर्भवती स्त्री को  यदि गर्भ के दौरान यदि खून दिखाई दे  तो फ़ौरन चौलाई का रस पीये ताकि गिरता हुआ गर्भ रुक जाये। जिनको गर्भ गिरने की बीमारी हो उन महिलाओं के लिये मासिक धर्म के समय में रोज जड़ पीस कर चावलों के पानी के साथ पिलाया जाता है।
सूजन :: इसके तेल में पेप्टाइड होता है जिसमें में एंटी-इफ्लेमेंटरी गुण होता है जो कि दर्द और पुरानी सूजन में राहत प्रदान करता है। 
फोड़े-फुंसी :: इसके पत्तों की पुल्टिस बना कर लगाने से फोड़ा जल्द पक कर फूट जाता है। सूजन होने पर उस स्थान पर इसका लेप करने से सूजन दूर होती है।
वजन कम करना :: प्रोटीन रक्त में इंसुलिन के स्तर को कम कर और हार्मोंन की विज्ञप्ति कर भूख को दबा देता है जिससे भूख कम महसूस होती है। इसमें लगभग 15 प्रतिशत प्रोटीन होता है जो आपके वजन घटाने में सहायता करता है।
रक्तचाप  :: इसमें मौजूद फाइबर और फिटोन्यूट्रीएंट्स रक्तचाप को कम करने में मदद करते है। जिससे यह कोलेस्ट्रॉल, सूजन और रक्तचाप के साथ प्रभावी ढ़ंग से लड़ता है और दिल की सेहत के लिए भी अच्छा होता है।
शरीर में रक्त की कमी :: इसके सेवन से शरीर में रक्त की कमी दूर होती है। 
कैंसर की रोकथाम :: इसमें मौजूद पेप्टाइड्स शरीर में सूजन को दूर करने के साथ-साथ कैंसर के विकास को रोकने में भी बहुत मददगार होता है। इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त होने से बचाता है जिससे कैंसर को रोकने में मदद मिलती है।
पाचक :: इसमें मौजूद फाइबर और अमीनो एसिड के कारण यह पचाने में बहुत आसान होता है। इसमें मौजूद फाइबर कारण यह आंतों से चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करता है जिससे पेट साफ होता है और पाचन संस्थान को शक्ति मिलती है। इसी कारण से इसे पारंपरिक रूप से बीमारी से उबर रहे मरीजों को दिया जाता है।
पेशाब की जलन :: पेशाब में होने वाली जलन को शांत करने के लिए चौलाई के रस का कुछ दिनों तक सेवन करने से मूत्रवृध्दि होती है और जलन ठीक होती है।
खूनी बवासीर :: खूनी बवासीर हो या मूत्र में खून आता हो तो चौलाई के पत्ते पीस कर मिश्री मिलाकर शरबत बनाकर 3 दिन तक लगातार पीना चाहिये।
प्रतिरक्षा प्रणाली :: ऐमरैन्थ का एक और स्वास्थ्य लाभ यह भी है कि मौजूद आवश्यक विटामिन, खनिज और शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ठीक रखने में मदद करते है। 
स्तनों का आकार :: स्त्रियों को अपने स्तनों का आकार ठीक करना हो तो अरहर की दाल के साथ चौलाई का साग पका कर चालीस दिनों तक लगातार, जड़ सहित पका कर खाना चाहिये है।
मांसपेशियाँ और ऊर्जा :: इसमें लाइसिन बहुत अधिक मात्रा में होने के कारण यह कैल्शियम को अवशोषित करने के लिए शरीर की मदद करता है। इस कारण से चौलाई मांसपेशियों के निर्माण और ऊर्जा के उत्पादन के लिए बहुत अच्छा होता है।
बालों का कालापन :: यह बालों को असमय सफेद होने से रोकने में काफी प्रभावीशाली है। 
पथरी :: इसका साग चालीस दिनों तक प्रतिदिन खाने पर पथरी गल जाती है।

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