भद्रकाली- यमुना देवी मन्दिर - जामा मस्जिद

भद्रकाली-यमुना देवी मन्दिर - जामा मस्जिद 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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जामा मस्जिद के स्थान पर पहले माँ भद्र काली और यमुना देवी का मंदिर था। लालकिला शाहजहाँ के जन्म से सैंकड़ों साल पहले महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय द्वारा सन 1060 में दिल्ली को बसाने के क्रम में ही उसे बनाया गया था, जो कि पाण्डु-अर्जुन के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे। लाल किले का असली नाम लाल कोट है। पुरानी दिल्ली में अन्य भग्नावेश अभी भी मौजूद हैं। शाहजहाँ का जन्म उनके सैकड़ों वर्ष बाद 1592 ईस्वीं में हुआ था। इसके पूरे साक्ष्य पृथ्वीराज रासो में मिलते हैं। किले के मुख्य द्वार के बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है। इस्लाम मूर्ति का विरोधी है। राजपूत लोग हाथियों के प्रेम के लिए विख्यात थे। इसके अलावा लाल किले के महल में लगे वराह-सूअर  के मुँह वाले चार नल अभी भी हैं। यह भी इस्लाम विरोधी प्रतीक चिन्ह है। महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय माँ भद्र काली के उपासक थे तथा भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री उनकी कुल देवी थीं। इन्हीं के लिये उन्होंने अपने आवास लाल कोट-लाल किला के निकट ठीक सामने ही पवित्र भगवे रंग के पत्थरों से भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था तथा प्रत्येक राज उत्सव उसी परिसर में हुआ करते था। यहाँ की इमारतों में उपस्थित अष्ट दलीय पुष्प, जंजीर, घंटियाँ, आदि वहाँ हिंदु परम्परा और वास्तुकला के प्रमाण हैं। मंदिरों को भगवा रंग के अनुरूप भगवा पत्थरों से बनाया जाता था, जबकि मुसलमानों की  इमारतें सफेद चूने से बनी होती थीं और उन पर हरे रंग का प्रयोग किया जाता था। दिल्ली के जामा मस्जिद में कोई भी मुस्लिम प्रतीक चिन्ह निर्माण काल से प्रयोग नहीं हुआ था। इस मस्जिद की बनावट इसके आकार वास्तु आदि हिंदुओं के भव्य मंदिर के अनुरुप हैं। शाहजहाँ 1627 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद वह गद्दी पर बैठा उसने ऐसी इच्छा जाहिर की कि उसका दरबार ख़ुदा-भगवान् दरबार से ऊँचा हो। खुदा के घर का फर्श उसके तख्त और ताज से ऊपर हो, इसीलिए उसने महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय द्वारा स्थापित माँ भद्र काली तथा भगवान्  श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री, जो कि महाराज अनंगपाल कुल देवी थीं, की मूर्तियों को तुड़वा कर, मंदिर से जुड़ी हुई भोजला नामक छोटी सी पहाड़ी, जहाँ महाराज अनंगपाल राजकीय उत्सव के समय उत्सव देखने आने वालों के घोड़े बँधते थे, उसे भी मस्जिद परिसर में मिलाने के लिये चुना और 6 अक्टूबर 1650 को मस्जिद को बनाने का काम शुरू हो गया। मस्जिद बनाने के लिए 5,000 मजदूरों ने छह साल तक काम किया। आखिरकार दस लाख के खर्च करके और हजारों टन पत्थर की मदद से माँ भद्र काली मंदिर के स्थान पर ये आलीशान मस्जिद बनवाई गयी। 80 मीटर लंबी और 27 मीटर चौड़ी इस मस्जिद में तीन गुंबद बनाए गए। साथ ही दोनों तरफ 41 फीट ऊँची मीनारें तामीर की गईं। इस मस्जिद में एक साथ 25 हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं। भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी देवी “यमनोत्री” के नाम के कारण मुसलमान “य” की जगह “ज” शब्द का उच्चारण करते हैं। अत: मस्जिद ए जहाँनुमा रखा गया। जिसे लोगों ने फिर से जामा मस्जिद कहना शुरू कर दिया। मस्जिद के तैयार होते ही उज्बेकिस्तान के एक छोटे से शहर बुखारा के सैय्यद अब्दुल गफूर शाह को दिल्ली लाकर उन्हें यहाँ का इमाम घोषित किया गया और 24 जुलाई, 1656 को जामा मस्जिद में पहली बार नमाज अदा की गई। इस नमाज में शाहजहाँ समेत सभी दरबारियों और दिल्ली के अवाम ने हिस्सा लिया। नमाज के बाद मुगल बादशाह ने इमाम अब्दुल गफूर को इमाम-ए-सल्तनत की पदवी दी और ये ऐलान भी किया कि उनका खानदान ही इस मस्जिद की इमामत करेंगे। उस दिन के बाद से आज तक दिल्ली की जामा मस्जिद में इमामत का सिलसिला बुखारी खानदान के नाम हो गया। सैय्यद अब्दुल गफूर के बाद सय्यद अब्दुल शकूर इमाम बने। इसके बाद सैय्यद अब्दुल रहीम, सैय्यद अब्दुल गफूर, सैय्यद अब्दुल रहमान, सैय्यद अब्दुल करीम, सैय्यद मीर जीवान शाह, सैय्यद मीर अहमद अली, सैय्यद मोहम्मद शाह, सैय्यद अहमद बुखारी और सैय्यद हमीद बुखारी इमाम बने। एक वक्त ऐसा भी था जब 1857 के बाद अंग्रेजों ने जामा मस्जिद में नमाज पर पाबंदी लगा दी और मस्जिद में अंग्रेजी फौज के घोड़े बाँधे जाने लगे। आखिरकार 1864 में मस्जिद को दोबारा नमाजियों के लिए खोल दिया गया। नमाजियों के साथ-साथ दुनिया के कई जाने माने लोगों ने जामा मस्जिद की जमीन पर सजदा अदा किया है। चाहे वो सऊदी अरब के बादशाह हों या फिर मिस्त्र के नासिर। कभी ईरान के शाह पहलवी तो कभी इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्नो, सबने यहाँ सिजदा किया। लेकिन इनमें से कोई भी यह नहीं जानता था कि जामा मस्जिद वास्तव में महाराज अनंगपाल तोमर द्वितीय स्थापित माँ भद्र काली तथा भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी देवी यमनोत्री का मंदिर था जिसे शाहजहाँ जैसे विधर्मी, व्यभिचारी और अय्याश  ने तुड़वा कर जामा मस्जिद बनवाया था। 
इमाम का कोई क़ानूनी वज़ूद नहीं है। फिर भी विश्वनाथ सिंह की सरकार ने उसे 25 लाख रूपये जामा मस्जिद की मरम्मत, देख-रेख के लिये दिये, जिनको इस इमाम ने अपनी कोठी बनवाने में खर्च कर दिया। यह शख्श जब-तब भारत और हिंदु धर्म विरोधी भाषण देता रहता है जिन्हें वोटों की लालची, सरकार देख कर भी अनदेखा कर देती हैं। 

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