Monday, December 29, 2014

FORCIBLE CONVERSIONS हिन्दुओं का इस्लाम में बलात् धर्मांतरण

FORCIBLE CONVERSIONS हिन्दुओं का इस्लाम में बलात् धर्मांतरण
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh  Bhardwaj  
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ENEMIES OF FAITH AND INDIA धर्म और देश के दुश्मन :: 
(1). भारतीय महाद्वीप में जितने भी मुसलमान हैं,उनके पूर्वज कभी हिन्दु थे, जिनको मुस्लिम बादशाहों ने जबरन मुसलमान बना दिया था। दुर्भाग्य की बात है कि विदेशी पैसों के बल पर इस्लाम के एजेंट ऐसे हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराने में लगे रहते हैं, जो इस्लाम की असलियत से अनभिज्ञ हैं या जिनको हिन्दु धर्म का आधा अधूरा ज्ञान होता है। ऐसे हिन्दु युवक-युवतियां सेकुलर विचार वाले होते हैं जिन्हें इस्लाम के प्रचारक आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं।  ऐसे व्यक्तियों के लिए कुछ प्रश्न हैं जिनका जबाब उन्हें जानना ही चाहिये। 
(1.1).  मुसलमानों का दावा है कि कुरान अल्लाह की किताब है, लेकिन कुरान में बच्चों की खतना करने का हुक्म नहीं है, फिर भी मुसलमान खतना क्यों कराते है? क्या उनके अल्लाह-खुदा में इतनी भी शक्ति नहीं है कि मुसलमानों के खतना वाले बच्चे ही पैदा कर सके ?
(1.2).  मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह ने फ़रिश्ते के हाथो कुरआन की पहली सूरा लिखित रूप में मुहम्मद को दी थी, लेकिन अनपढ़ होने से वह उसे नहीं पढ़ सके, इसके अलावा मुसलमान यह भी दावा करते हैं कि विश्व में कुरान एकमात्र ऐसी किताब है जो पूर्णतयः सुरक्षित है, तो मुसलमान कुरान की वह सूरा पेश क्यों नहीं कर देते जो अल्लाह ने लिख कर भेजी थी, इससे तुरंत पता हो जायेगा कि वह कागज कहाँ बना था और अल्लाह की लिखाई  कैसी थी ? अगर ऐसा नहीं है तो अल्लाह और कुरान दोनों ही फर्जी मन खडंत हैं। 
(1.3). इस्लाम के मुताबिक यदि 3 दिन/माह का बच्चा मर जाये तो उसको कयामत के दिन क्या मिलेगा-जन्नत या जहन्नुम और किस आधार पर ?
(1.4). मरने के बाद जन्नत में पुरुष को 72 हूर (अप्सराऐं) मिलेंगी, तो स्त्री को क्या मिलेगा-हूरा (पुरुष वेश्या) और अगर कोई बच्चा पैदा होते ही मर जाये तो क्या उसे भी हूरें मिलेंगी और वह हूरों का क्या करेगा ?
(1.5). यदि मुसलमानों की तरह ईसाई, यहूदी और हिन्दु मिलकर मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद करें तो मुसलमान इसे धार्मिक कार्य मानेंगे या अपराध और क्यों ?
(1.6).यदि कोई गैर मुस्लिम (काफ़िर) यदि अच्छे गुणों वाला हो तो भी, क्या अल्लाह उसको जहन्नुम की आग में झोंक  देगा और क्यों और, अगर ऐसा करेगा तो क्या ये अन्याय नहीं हुआ ?
(1.7).कुरान के अनुसार मुहम्मद सशरीर जन्नत गए थे और वहां अल्लाह से बात भी की थी, लेकिन जब अल्लाह निराकार है और उसकी कोई छवि-मूर्ति-पहचान नहीं है तो मुहम्मद ने अल्लाह को कैसे देखा और कैसे पहचाना कि वह अल्लाह है या शैतान ?
(1.8).  मुसलमानों का दावा है कि जन्नत जाते समय मुहम्मद ने येरूसलम की बैतूल मुक़द्दस नामकी मस्जिद में नमाज पढ़ी थी, लेकिन वह मुहम्मद के जन्म से पहले ही रोमन लोगों ने नष्ट कर दी थी। मुहम्मद के समय उसका नामो निशान नहीं था, तो मुहम्मद ने उसमे नमाज कैसे पढ़ी थी ? मुहम्मद को झूठा है या फिर सच्चा ?
(1.9).अल्लाह ने अनपढ़ मुहम्मद में ऐसी कौन सी विशेषता देखी, जो उनको अपना रसूल नियुक्त कर दिया,क्या उस समय पूरे अरब में एक भी ऐसा पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं था, जिसे अल्लाह रसूल बना देता और जब अल्लाह सचमुच सर्वशक्तिमान है तो अल्लाह मुहम्मद को 53 साल में भी अरबी लिखने या पढने की बुद्धि क्यों नहीं दे पाया ?
(1.10). जो व्यक्ति अपने जिहादियों की गैंग बना कर जगह जगह बलात्कार, चोरी, डकैती,लूट करवाता हो, निर्दोषों को मरवाता हो, दूसरे शांति पसंद मुल्कों पर आक्रमण करवाता हो, लूट के माल से बाकायदा अपने लिए पाँचवाँ हिस्सा (20 %) रख लेता हो, उसे उसे अल्लाह का रसूल कहने की जगह लुटरों का सरदार क्यों न कहें ?
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहां हमारा; 
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसकी वो गुलसितां हमारा। 
मुहम्मद के अलावा अन्य क्रूर दस्यु-लुटेरे जिन्होंने न सिर्फ भारत पर आक्रमण किए, बल्कि जमकर लूटा भी ::
(2.1). चंगेज खान :: वह एक मंगोल छोटे से कबीले का शासक था, जिसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई थी। उसने अभियान चलाकर ईरान, गजनी सहित पश्‍चिम भारत के काबुल, कन्धार, पेशावर सहित कश्मीर पर भी अधिकार कर लिया था। इस समय चंगेज खान ने सिंधु नदी को पार कर उत्तरी भारत और असम के रास्ते मंगोलिया वापस लौटने की सोची, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया. हालांकि, वह अपने साथ भारत से अनगिनित बेशकीमती चीजें लूटकर ले जाने में कामयाब रहा। 
(2.2). हलाकु खान :: वह भी एक मंगोल ही था और  अपनी बर्बरता तथा साम्राज्य विस्तार के लिए कुख्यात रहा। भारत सहित संपूर्ण रशिया, एशिया और अरब देश हलाकु खान के नाम से ही कांपते थे। वह पश्‍चिम भारत सहित कई राज्यों में अधिकार करने में सफल रहा। इस क्रूर मंगोल योद्धा ने अपने हमलों में इस कदर लूटपाट और खून-खराबा किया कि भारत की एक बड़ी आबादी का सफाया हो गया। मुसलमानों के लिए तो हलाकू खान कहर का दूसरा नाम था। 
(2.3). तैमूर लंग :: वह दूसरा चंगेज़ ख़ां बनना चाहता था और  लंगड़ा था, इसलिए ‘तैमूर लंग’ कहलाता था। तुगलक वंश के शासन काल में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया. वह अपने साथ मंगोलों की फौज लेकर आया था। दिल्ली में वह 15 दिन रहा और उसने इस बड़े शहर में तबाही मचा दी. ढ़ेरों लोगों को उसने मौत के घाट उतार दिया। जब तक वह वापस गया तब तक दिल्ली मुर्दों का शहर बन चुका था। इस दौरान उसने दिल्ली में जमकर लूटपाट की. इसी के साथ तुगलकों का शासन भी खत्म हो गया था। 
(2.4). नादिर शाह :: वह ईरान का शासक था। उसने भारत पर आक्रमण कर कई तरह की लूटपाट की।  1739 में दिल्ली के शासक मुहम्मद शाह को हराने के बाद उसने कोहिनूर हीरे जैसी सम्पत्ति लूट ली। नादिरशाह ने मुगलों का सारा खजाना खाली कर दिया। इस खजाने में इसको करोड़ों की नकदी के अलावा हीरे-जवाहरात, सोने-चांदी की कीमती वस्तुएं भी मिलीं।  वह 1,000 हाथी, 7,000 घोड़े, 10,000 ऊंट आदि भी अपने साथ ले जाने में कामयाब रहा था। 
(2.5). अहमदशाह अब्दाली :: वो नादिर शाह का बेटा था. उसने अपने पिता की तरह भारत पर कई बार आक्रमण किए और लूटपाट करके खूब सारा पैसा हासिल किया। 1757 में उसने पहली बार दिल्ली पर आक्रमण कर लूटपाट की। इसके बाद उसका लालच बढ़ गया था। बाद में उसने आगरा और बल्लभगढ़ पर भी आक्रमण किया। वल्लभगण में उसने जाटों को हराया और आस-पास के क्षेत्रों में जमकर लूट-पाट की। 
(2.6). महमूद गजनवी :: उसने भारत पर 17 बार आक्रमण किए और अपने 9 वें आक्रमण में उसने मथुरा के पास महावन से अपार मात्रा में सोना, चांदी, हीरा और 80 हाथी लूटे।  वहीं 15 आक्रमण में उसने गुजरात को भी लगभग खाली ही कर कर दिया था। इससे भी जब उसका पेट नहीं भरा तो उसने 16वां आक्रमण सोमनाथ पर किया, जहां जहाँ से वह खूब सारा सोना लूटकर ले गया। इस बीस मील लम्बे काफिले में ऊँटों की दोनों ओर हीरे-ज्वाहरात भरे थे, बैल गाड़ियों में सोना-चाँदी और पीतल तथा तांबे के बर्तन आदि भरे थे। 17वें आक्रमण में उसने सिन्ध और मुल्तान के तटवर्ती क्षेत्रों के जाटों को पराजित किया और काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर से भी अपार संपत्ति लेकर भाग निकला। 
(2.7). मुहम्मद गोरी :: गोरी गजनी और हेरात के मध्य स्थित छोटे से पहाड़ी प्रदेश गोर का शासक था। उसने गुजरात और पंजाब के कई क्षेत्रों पर आक्रमण किए और वहाँ के सारे खजाने को लूटने में कामयाब रहा। अपनी बुरी नियत के साथ वह दिल्ली की ओर भी बढ़ा, लेकिन पृथ्वीराज के हाथों उसको अपने मुँह की खानी पड़ी।हालांकि, जयचंद की मदद से वह अंतत: पृथ्वीराज को हराने में कामयाब हो गया था। मंत्री और कवि चंद वरदाई ने चौहान को बताया "चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण ता ऊपर सुल्तान है मत चूके सुल्तान"। अंधे पृथ्वीराज चौहान ने उसे उसके ही घर काबुल में शब्द भेदी वाण से मारा। 
(2.8). मुहम्मद बिन कासिम :: उसने 8वीं सदी की शुरूआत में पर भारत पर आक्रमण किया था। 17 साल की उम्र में उसने सिन्ध और मुल्तान पर आक्रमण किया था. वह बेहद की क्रूर आक्रमणकारी था. उसने ने केवल कत्लेआम मचाया, बल्कि जमकर लूटपाट की। 22 साल की उम्र में उसकी मौत हो गई। कासिम को मुल्तान नगर से इतना धन मिला कि उसने इसे ‘स्वर्णनगर’ नाम दिया. इसने देबल में मंदिरों की भी लूट की थी। 
(2.9). सिकंदर :: उसने दुनिया पर अधिकार करने के उद्देश्य से सभी देशों को पराजित करता हुआ भारत पहुँचा था।  यहाँ पहुँचकर जब उसे यहां की सम्पन्नता का पता चला तो उसने लूटने के उद्देश्य से भारत के भीतर तक आक्रमण किये और धीरे-धीरे वह भारत के कई भागों में अधिकार करने में कामयाब रहा। वह जहां भी गया, वहाँ  का खजाना खाली करता गया। बाद में चाणक्य ने जब हारे हुए भारतीयों में नवचेतना का संचार किया तब उसे उलटे पांव वापस जाना पड़ा था। 
(2.10). बाबर (1519-1530) :: मुग़ल राज्य (1525 -1707) में, क़ुरान की कंठस्थ आयतों, कत्लेआम और गुलाम बनाने के लिए ही जाना जाता है।
मुगलवंश का संस्थापक बाबर एक लूटेरा था। उसने उत्तर भारत में कई लूटों को अंजाम दिया था। बाबर ने क्रूरतापूर्वक हिन्दुओं का नरसंहार किया। भूखे-प्यासे बाबर को एक ब्राह्मण ने भरी धूप-दोपहरी में अयोध्या से बाहर गुड़-चबेना खिलाकर, उसे आगरा का रास्ता क्या बताया कि वह उसका मुरीद हो गया और आगरा जाकर उसने 6 लाख रूपये, उस ब्राह्मण के लिये भेजे, जिन्हें मीर बाकी ने अयोध्या में राम जन्म भूमि पर निर्मित प्रसिद्ध मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बनवाने में लगा दिया। उसने ग्वालियर के निकट उरवा में अनेक जैन मंदिरों को नष्ट किया। उसने चंदेरी के प्राचित और ऐतिहासिक मंदिरों को भी नष्ट करवा दिया था, जो आज बस खंडहर है। 

मुसलमान बादशाहों में बाबर का नाम भारत में उसके द्वारा सबसे स्थायी मुगल साम्राज्य स्थापित करने का श्रेय प्राप्त होने के कारण प्रसिद्ध रहा है। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के कारण यह नाम बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। मुसलमानों के लिए तो उनके धर्मानुसार जितना ही काफिर-कुश कोई सुल्तान रहा हो उतना ही अधिक उनकी श्रद्धा और आदर का पात्र होगा। किन्तु आश्चर्यजनक बात यह है कि हमारे कुछ आधुनिक विद्वान भी धर्म निरपेक्षता का प्रमाण पत्र पाने की होड़ में उसे एक धर्म निरपेक्ष और हिन्दु तथा हिन्दु मंदिरों के प्रति सहानुभूति रखने वाला मजहबी कट्‌टरता से ऊपर सहदय बादशाह प्रमाणित करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाते फिरते हैं।
ऐसे विद्वानों का दुर्भाग्य है कि बाबर स्वरचित ‘तुजुके बाबरी’ में अपनी जीवन और विचारों का लेखा-जोखा छोड़ गया है। उसके जीवन-चरित्र में अयोध्या काल के कुछ पृष्ठ नहीं मिलते। हिन्दुओं में पढ़ने-पढ़ाने का प्रचलन कम है। इसलिये उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर कुछ भी कहा जा सकता है। उसका आत्म चरित्र ‘तुजुके बाबरी’ जिसका बेवरिज द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद भारत में सहज ही उपलब्ध है, बाबर के जीवन का प्रमाणिक ग्रंथ है-
स्वयं अपने कथन के अनुसार बाबर भारत में हिंदुओं की लाशों के पहाड़ लगाकर हर्षातिरेक से गुनगुना उठता है-
निकृष्ट और पतित हिन्दुओं का वध कर, गोली और पत्थरों से बना दिये मृत देहों के पर्वत, गजों के ढेर जैसे विशाल और प्रत्येक पर्वत से बहती रक्त की धाराएँ। हमारे सैनिकों के तीरों से भयभीत, पलायन कर छिप गये कुन्जों और कंदराओं में। इस्लाम के हित घूमता फिरा मैं बनों में, हिन्दु और काफिरों से युद्ध की खोज में।इच्छा थी बनूँगा इस्लाम का शहीद मैं उपकार उस खुदा का बन गया ‘गाज़ी’।
यह कोरी कवि कल्पना नहीं है। वह अपने प्रत्येक युद्ध के पश्चात्‌ हिन्दु युद्धबंदियों के सिरें एक-एक कर काटे जाने का रोमांचक दृश्य शराब की चुस्कियों के बीच देखता है। फिर उन सिरों की मीनारें खड़ी करवाता है। वह लिखता है कि एक बार उसे अपना डेरा तीन बार ऊँचे स्थान पर ले जाना पड़ा, क्योंकि भूमि पर खून ही खून भर गया था। बाबर का दुर्भाग्य था कि उसके पूर्व के सुल्तानों ने उसके तोड़ने के लिए बहुत मंदिर छोड़े ही नहीं थे। सोने की मूर्तियां का स्थान पहले पीतल और फिर पत्थर की मूर्तियों ने ले लिया था।
बाबर को भारत भूमि इतनी शुष्क और अप्रिय लगती थी कि उसने मृत्योपरान्त वहाँ दफन होना भी पसंद नहीं किया। अफ़गानिस्तान में उसका टूटा-फूटा मकबरा है। कहा जाता है कि मुस्लिम देश अफगानिस्तान के मुसलमान बाबर को एक विदेशी लुटेरा समझकर उसके मकबरे का रख रखाव नहीं करवाते। उनके लिए वह आदर का पात्र नहीं है। इन्दिरा गाँधी ने वहाँ जाकर फातिहा पढ़ा और कहा कि हिन्दुस्तान में उसके वंशज मुसलमानों (नेहरू) का शासन बरकरार है। यह विदेशमंत्री ने देखा-सुना और पुरे मुल्क को बता भी दिया कि वो  हिन्दु नहीं बल्कि एक मुसलमान ही थी। 
बाबर फरगना का रहने वाला दुष्ट विदेशी था जिसने उनके देश को पद-दलित किया था। अरब में सड़क चौड़ी करने के लिए मस्जिदें हटा दी गयीं है। किन्तु भारत के मुसलमान, पठानों, अरबों जैसे दूसरी श्रेणी के मुसलमान नहीं है। वह विदेशी आक्रमणकारियों बाबर, मौहम्मद बिन-कासिम, गौरी, गजनवी इत्यादि लुटेरों को और औरंगजेब जैसे साम्प्रदायिक बादशाह को गौरव प्रदान करते हैं और उनके द्वारा मंदिरों को तोड़कर बनाई गई मस्जिदों व दरगाहों को इस्लाम की काफिरों पर विजय और हिन्दु अपमान के स्मृति चिन्ह बनाये, रखना चाहते हैं जिससे हिन्दू अतीत में दीनदारों द्वारा प्रदरशित इस्लाम की कुव्वत को न भूल जायें और हिन्दु, कानून में विश्वास करने वाले, सुसंस्कृत, उदार, धर्मनिरपेक्ष, भले लोग प्रमाणित होना पसंद करते हैं। इसलिए हमारी सरकार इन लोदियों, मुगलों, पठानों, खिलजियों और गुलामों के मकबरों के रख-रखाव पर करोड़ों रुपया, जो वह मुखयतया हिन्दुओं से वसूलती है, प्रतिवर्ष खर्च करती है और उन बर्बर आक्रान्ताओं द्वारा अपने मंदिरों को अपवित्र और तोड़कर उनके स्थान पर बनाई गई मस्जिदों को इस देश की संस्कृति की धरोहर बताकर फौज पुलिस बिठाकर उनकी रक्षा करती है। संसार में क्या कोई ऐसा आत्म सम्मानहीन दूसरा देश और समाज देखने को मिलेगा?

(6.41). हुमायूँ (1520-1556) :: हुमायूँ को शेरशाह सूरी ने अपदस्थ कर दिया। वह भारत में जान बचाता घूम रहा था। उसके अपने भाई और मुसलमान सरकारें उसके विरोधी हो रहे थे। उस कठिन समय में उसको कालिंजर-पति जैसे कुछ हिन्दू राजाओं ने सहायता दी। मुसलमान इतिहासकार लिखते हैं कि ‘बादशाह ने गुजरात के नवाब सुल्तान बहादुर पर आक्रमण करने की ठानी। जब हुमायूँ वहाँ पहुँचा तो सुल्तान चित्तौड़ पर घेरा डाले पड़ा था। हुमायूँ के आक्रमण के समाचार सुन युद्ध की सभा विचार विमर्श के लिए सुल्तान द्वारा बुलाई गई। बहुत से अफसरों ने तुरन्त घेरा उठाकर हुमायूँ का सामना करने की सलाह दी। किन्तु सदर खाँ ने, जो उमराओं का सदर था, कहा कि (चित्तौड़) में हम काफिरों से युद्ध कर रहे हैं। ऐसे समय में यदि कोई मुसलमान बादशाह हम पर आक्रमण कर दे तो उस पर इस्लाम के विरुद्ध कुफ्र को सहायता देने का पाप लगेगा। उसके माथे पर कलंक कयामत के दिन तक लगा रहेगा। इसलिये बादशाह हम पर आक्रमण नहीं करेगा। आप चित्तौड़ के विरुद्ध युद्ध जारी रखिये। जब हुमायूँ को पता लगा तो वह मार्ग में ही सारंगपुर में ठहर गया। सुल्तान बहादुर ने चित्तौड़ फतह कर लिया। उसके पश्चात हुमायूँ ने उससे युद्ध किया। 
हुमायूँ जैसा बादशाह भी, जो उन दिनों हिन्दू राजाओं के रहमों-करम पर जीवित था, हिन्दुओं के विरुद्ध, मुसलमान शत्रुओं को सहायता देने से बाज नहीं आया। प्रो. एस. आर. शर्मा अपनी पुस्तक ‘क्रीसेंट इन इंडिया’ में इस घटना को हुमायूँ की मूर्खता बताते हैं। यह उसकी मूर्खता नहीं थी। उसकी धार्मिक मजबूरी थी।
भारत के कुछ धर्मनिरपेक्ष इतिहासकार और विद्वान यह प्रचार करते हैं कि महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण केवल लूटपाट के लिए किये थे। यह धार्मिक युद्ध नहीं थे। प्रमाण स्वरूप वह कहते हैं कि उसने स्वयं खलीफा पर आक्रमण करने की धमकी दी। यदि वह धर्मान्ध व्यक्ति होता तो खलीफा पर आक्रमण करने की बात सोच भी नहीं सकता था।
हुमायूँ के उपरोक्त व्यवहार से उनके इस तर्क का समुचित उत्तर मिल जाता है। दो मुस्लिम शासकों के पारम्परिक मन मुटाव का यह अर्थ नहीं है कि वह काफिरों के प्रति भी धर्मनिरपेक्ष थे अथवा काफिरों के विरुद्ध युद्ध करना धार्मिक कर्तव्य नहीं समझते थे। उनमें आपस में कितना ही विरोध हो, कितना ही युद्ध होता हो, काफिरों के विरुद्ध युद्ध अथवा काफिर कुशी करने, उनकी संस्कृति को मिटाने में वह सब एक हैं ‘क्योंकि यह उनका धार्मिक कर्तव्य है।’
सर सैयद अहमद की पुस्तक ‘अथारुये सनादीद’ से हुमायूँ की इस्लामी प्रतिबद्धता का दूसरा प्रमाण मिलता है। वह लिखत हैं कि ‘नदी के किनारे जहानाबाद नगर के उत्तर पूर्व में एक घाट है। इसके विषय में कहा जाता है कि सम्राट युधिष्टर ने यहाँ यज्ञ किया था। उस स्थान पर हिन्दुओं ने एक विशाल छत्री (मंदिर) का निर्माण किया था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि हुमायूँ ने उस छत्री (मंदिर) को तुड़वाकर उसके स्थान पर नीली छत्री (मस्जिद) का निर्माण करवा दिया।
अकबर (1556-1605) :: उसने 5,00,000 लोगों को गुलाम बना मुसलमान बना दिया गया। चित्तौड़ ने जब उसकी सत्ता मानाने से इंकार कर दिया तो  30,000 काश्तकारों और 8,000 राजपूतों को तो मार दिया गया। एक दिन भरी दोपहर में 2,000 कैदियों का सर कलम किया था। उसके हरम में 5,000 महिलाएं थीं। उसके समय में ज्यादातर लड़कों को, खास तौर पर बंगाल से अपहरण किया जाता था और उन्हें हिजड़ा बना दिया जाता था। उसके मुख्य सेनापति अब्दुल्लाह खान उज़्बेग, की अगर मानी जाये तो उसने 5,00,000 पुरुष और गुलाम बना कर मुसलमान बनाया था और उसके हिसाब से क़यामत के दिन तक वह लोग एक करोड़ हो जायेंगे।अकबर का शासन भी इसी इस्लामी उन्माद से प्रारंभ हुआ। किन्तु धीरे-धीरे उसकी समझ में यह बात आ गई कि भारत में चैन से राज्य करना है तो मुसलमान अमीरों का भरोसा छोड़कर हिन्दुओं का, विशेष रूप से राजपूतों का, सहयोग और मित्रता प्राप्त करनी होगी। जहाँ मुसलमान अमीर अपने स्वार्थवश होकर शासन के विरुद्ध मंत्रणा करते रहते थे, राजपूतों के शौर्य और स्वामिभक्ति पर अकबर मुग्ध हो गया था। किन्तु यह बाद की बात है। 1568 में, अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। अबुल फजल अपने अकबरनामे में इस घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं-‘दुर्ग में राजपूत योद्धा थे किन्तु लगभग 40,000 (चालीस हज़ार) ग्रामीण थे जो केवल युद्ध देखने और वहाँ पर दूसरे काम के लिए एकत्रित थे। विजय के पश्चात्‌ प्रातःकाल से दोपहर तक महायोद्धा अकबर की तेजस्विता में ये अभागे लोग भस्म होते रहे। लगभग सभी आदमी कत्ल कर दिये गये। 
यह क्रूरता और सभ्य लोगों के युद्ध नियमों का उल्लंघन, अकबर के माथे पर कलंक है जो कभी नहीं छूटा। छूटेगा भी नहीं।
अकबर ने राजपूतों से विवाह संबंध बनाने के प्रयत्न किये क्योंकि इस रिश्ते से ही वह उन्हें स्थायी रूप से अपनी ओर मिला सकता था। किन्तु राजपूत तो आपस में छोटे बड़े वर्गों में बंटे थे। उच्च वंश के राजपूत नीचे वंश के राजपूत को अपनी बेटी नहीं देते थे, फिर तुर्क को कैसे दें?
अकबर ने राजपूतों से कहा भी वह बादशाह है, और अपने देश से बहुत दूर है। इसलिये न तो वहाँ से शहजादियों को विवाह कर ला सकता है और न अपनी शहजादियों को वहाँ ब्याह सकता है। इसलिये आप लोग, जो यहाँ राजा हैं, हमारी शहजादियाँ लें और हमें अपनी शहजादियाँ दें। किन्तु राजपूत, मुगल शहजादियाँ लेने को, अपने धर्म खो देने के भय से, तैयार नहीं हुए। कभी भय और कभी लोभ से, अपनी बेटियाँ मुगलों को देने को मजबूर हो गये। अकबर के काल में ही कम से कम 39 (उन्तालीस) राजकुमारियाँ शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं। 12 अकबर को, 17 शहज़ादा सलीम को, छः दानियाल को, दो मुराद को और एक सलीम के पुत्र खुसरो को। 
जहांगीर (1605-1627) :: उसके और उसके पिता के शासन काल में 5 से 6,00,000 मूर्ति पूजकों का कत्ल किया गया था और सिर्फ 1619-20 में ही इसने 2,00,000 हिन्दु गुलामों को ईरान में बेचा था।
जहाँगीर ने गद्‌दी प्राप्त करते ही अपने पिता अकबर की नीतियाँ बदल डालीं। वह आलसी, क्रूर और अत्यधिक शराबखोरी, अफीमखोरी जैसे दुर्व्यसनों में लिप्त था। जहाँगीर की परिस्थितियों और उसकी प्रकृति ने, उसे मुल्लाओं की गोद में जा बैठने के लिए मजबूर किया। उसने सिक्खों के गुरु अर्जुन सिंह का क्रूरतापूर्वक वध करवाया। कांगड़ा के हिन्दु दुर्ग पर विजय प्राप्त करने पर उसने वहाँ के मंदिर में गाय कटवा कर उसको अपवित्र किया। वह अपनी आत्मकथा ‘तुजुके जहाँगीरी’ में इन क्रूर कर्मों पर गर्व करता है।
शाहजहाँ (1627-1658) :: सके राज में इस्लाम का ही कानून था। या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उत्तर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4,000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतरा था। जवान लड़कियाँ  इसके हरम भेज दी जाती थीं।
शाहजहाँ के आते-आते मुगल शासन पुराने मुसलमानी ढर्रे पर चल पड़ा था। उसके इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी क’बादशाहनामे’ के अनुसार शाहजहाँ के ध्यान में यह बात लाई गई कि पिछले शासन में बहुत से मूर्ति मंदिरों का निर्माण प्रारंभ किया गया था किन्तु कुफ्र के गढ़ बनारस में बहुत से मंदिरों का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। काफिर उनको पूरा करना चाहते थे। धर्म के रक्षक बादशाह सलामत ने आदेश दिया कि बनारस और उसके पूरे साम्राज्य में तमाम नये मंदिर ध्वस्त कर दिये जायें। इलाहाबाद के सूबे से सूचना आई कि बनारस में  76 (छिहत्तर) मंदिर गिरा दिये गये हैं। यह घटना 1633 की है।
1634 में शाहजहाँ के सैनिकों ने बुन्देलखंड के राजा जुझारदेव की-जो जहाँगीर के कृपा पात्रों में था-रानियों, दो पुत्रों, एक पौत्र और एक भाई को पकड़कर शाहजहाँ के पास भेजा। शाहजहाँ ने दुर्गाभान और दुर्जनसाल नामक अवयस्क एक पुत्र और पौत्र को बलात्‌ मुसलमान बनवाया। एक वयस्क पुत्र उदयभान और भाई श्यामदेव का, इस्लाम स्वीकार न करने के कारण, वध करवा दिया। रानियों को हरम में भेज दिया गया। (गुलामी के लिये अथवा व्यभिचार के लिये)
इस मुस्लिम व्यवहार के विपरीत दुर्गादास राठौर ने औरंगजेब की पौत्री सफीयुतुन्निसा और पौत्र बुलन्द अखतर को जिन्हें औरंगजेब का पुत्र शाहजहाँ का पौत्र शाहजादा अकबर उसके संरक्षण में छोड़ गया था, नियमानुसार इस्लाम की शिक्षा दिलाकर,सम्मानपूर्वक औरंगजेब को 13 वर्ष के बाद जब वह जवान हो गये थे, वापिस कर दिया। यह इस्लाम और हिन्दु धर्म की शिक्षा के कारण हुआ। यह दो ऐतिहासिक उदाहरण हिन्दु और मुसलमान मानसिकता के अंतर पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त हैं।
अकबर ने उन किसानों के परिवारों को गुलाम बनाने और बेंचने पर प्रतिबंध लगा दिया था,जो सरकारी लगान समय से नहीं दे पाये थे। शाहजहाँ ने इस प्रथा को फिर चालू कर दिया। किसानों को लगान देने के लिये अपनी स्त्रियों और बच्चों को बेचने पर मजबूर किया जाने लगा।
मनुक्की के अनुसार ‘किसानों को बलात्‌ पकड़ कर (गुलामी में) बेंचने के लिये मंडियों और मेलों में ले जाया जाता था। उनकी अभागी स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिये रुदन करती चली जातीं थीं।
काजबीनी के अनुसार शाहजहाँ के आदेश थे कि ‘इन हिन्दू गुलामों को हिन्दुओं के हाथ न बेचा जाये। मुसलमान मालिकों के पास गुलामों का अन्ततः मुसलमान हो जाना निश्चित था।
आज का मुसलमान भी अपने पूर्वजों की तरह ही पूरी तरह असहिष्णु, धर्मान्ध, हिंसक, लूटपाट में विश्वास रखने वाला है।  विश्वास करना जान की आफत मोल लेना है।
औरंगज़ेब (1658-1707) :: उसके बारे में तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि जब तक वो सवा मन जनेऊ नहीं तुलवा लेता था, पानी नहीं पीता था। मथुरा के मंदिर 200 सालों में बने थे और उसने अपने 50 साल के शासन में मिट्टी में मिला दिये। गोलकुंडा में 1659 में  22,000 लड़कों को हिजड़ा बनाया था।
औरंगजेब ने भी भारत को जमकर लूटने का काम किया। उसने हजारों की तादाद में मन्दिरों को ध्वस्त करवाया और उनके पत्थरों को अजमेर भिजवा दिया जिनमें से कुछ को ढाई-दिन का झोंपड़ा बनवाने में इस्तेमाल किया गया। उसने कश्मीरी ब्राह्मणों को इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया। इस पर जब कश्मीरी ब्राह्मणों ने सिक्खों के नौवें गुरु तेगबहादुर से मदद मांगी और तेगबहादुर ने इसका विरोध किया तो औरंगज़ेब ने उन्हें फांसी पर लटका दिया। इस दिन को सिक्ख आज भी अपने त्यौहारों में याद करते हैं।  
कालनेमि नाम का राक्षस ही औरंगजेब के रुप में पैदा हुआ। इस बादशाह के हिन्दुओं पर अत्याचारों पर एक अलग ही पुस्तक लिखी जा सकती है। अनेक लोग, जो मुसलमान बनने को तैयार नहीं हुए, नौकरी से निकाल दिये गये। नामदेव को इस्लाम ग्रहण करने पर 400 का कमाण्डर बना दिया गया और अमरोहे के राजा किशनदास के पोते देवसिंह को इस्लाम स्वीकार करने पर इम्तियाज गढ़ का मुशरिफ बना दिया गया। ‘समाचार पत्रों में नेकराम के धर्मान्तरण का जो राजा बना दिया गया और दिलावर का, जो 10,000 का कमाण्डर बना दिया गया का वर्णन है। लोभ के कारण और जिजिया कर से बचने के लिये बड़ी सँख्या में हिन्दुओं का धर्मान्तरण हुआ।
हिन्दु गृहस्थों और रजवाड़ों की लड़कियाँ, किस प्रकार बलात्‌ उठाकर गुलाम रखैल बना ली जाती थी, उसका एक उदाहरण मनुक्की की आँखों देखा अनुभव है। वह नाचने वाली लड़कियों की एक लम्बी सूची देता है जैसे– हीरा बाई, सुन्दर बाई, नैन ज्योति बाई, चंचल बाई, अफसरा बाई, खुशहाल बाई, केसा बाई, गुलाल, चम्पा, चमेली, एलौनी, मधुमति, कोयल, मेंहदी, मोती, किशमिश, पिस्ता, इत्यादि। वह कहता है कि ये सभी नाम हिन्दु हैं और साधारणतया वे हिन्दु हैं जिनको बचपन में विद्रोही हिन्दु राजाओं के घरानों में से बलात उठा लिया गया था। नाम हिन्दुजरूर है, अब पर वे सब मुसलमान हैं।
मराठों के जंजीरा के दुर्ग को जीतने के बाद सिद्‌दी याकूब ने उसके अंदर की सेना को सुरक्षा का वचन दिया था। 700 व्यक्ति जब बाहर आ गये तो उसने सब पुरुषों को कत्ल कर दिया। परन्तु स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाकर उनके मुसलमान बनने पर मजबूर किया।
औरंगजेब के गद्‌दी पर आते ही लोभ और बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण ने भीषण रूप धारण किया। अप्रैल में चार 1667 हिन्दु कानूनगो बरखास्त किये गये। मुसलमान हो जाने पर वापिस ले लिये गये। औरंगजेब की घोषित नीति थी ‘कानूनगो बशर्ते इस्लाम’ अर्थात्‌ मुसलमान बनने पर कानूनगोई।
पंजाब से बंगाल तक, अनेक मुस्लिम परिवारों में ऐसे नियुक्ति पत्र अब भी विद्यमान हैं जिनसे यह नीति स्पष्ट सिद्ध होती है। नियुक्तियों और पदोन्नतियों दोनों के द्वारा इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन दिया जाता था। 1648 में जब वह शहजादा था, गुजरात में सीताराम जौहरी द्वारा बनवाया गया चिन्तामणि मंदिर उसने तुड़वाया। उसके स्थान पर ‘कुव्वतुल इस्लाम’ मस्जिद बनवाई गई और वहाँ एक गार्य कुर्बान की गई। 1648 में मीर जुमला को कूच बिहार भेजा गया। उसने वहाँ के तमाम मंदिरों को तोड़कर उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी। 1666 में कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा में दारा द्वारा लगाई गई पत्थर की जाली हटाने का आदेश दिया-‘इस्लाम में मंदिर को देखना भी पाप है और इस दारा ने मंदिर में जाली लगवाई?' 1669 में ठट्‌टा, मुल्तान और बनारस में पाठशालाएँ और मंदिर तोड़ने के आदेश दिये। काशी में विद्गवनाथ का मंदिर तोड़ा गया और उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया। 1670 में कृष्णजन्मभूमि मंदिर, मथुरा, तोड़ा गया। उस पर मस्जिद बनाई गई। मूर्तियाँ जहाँनारा मस्जिद, आगरा, की सीढ़ियों पर बिछा दी गई। सोरों में रामचंद्र जी का मंदिर, गोंडा में देवी पाटन का मंदिर, उज्जैन के समस्त मंदिर, मेदनीपुर बंगाल के समस्त मंदिर, तोड़े गये। 1672 में हजारों सतनामी कत्ल कर दिये गये। गुरु तेग बहादुर का कश्मीर के ब्राह्मणों के बलात्‌ धर्म परिवर्तन का विरोध करने के कारण वध करवाया गया। 1669 में हिन्दुओं पर जिजिया कर फिर लगा दिया गया जो अकबर ने माफ़ कर दिया था। दिल्ली में जिजिया के विरोध में प्रार्थना करने वालों को हाथी से कुचलवाया गया। खंडेला में मंदिर तुड़वाये गये। जोधपुर से मंदिरों की टूटी मूर्तियों से भरी कई गाड़ियाँ दिल्ली लाई गईं और उनको मस्जिदों की सीढ़ियों पर बिछाने के आदेश दिये गये। 1680 में ‘उदयपुर के मंदिरों को नष्ट किया गया। 172 मंदिरों को तोड़ने की सूचना दरबार में आई। 62 मंदिर चित्तौड़ में तोड़े गये। 66 मंदिर अम्बेर में तोड़े गये। सोमेद्गवर का मंदिर मेवाड़ में तोड़ा गया। सतारा में खांडेराव का मंदिर तुड़वायागया। 1690 में एलौरा, त्रयम्वकेद्गवर, नरसिंहपुर एवं पंढारपुर के मंदिर तुड़वाये गये। 1698 में बीजापुर के मंदिर ध्वस्त किये गये। उन पर मस्जिदें बनाई गई। 1330  में मंगोलों ने आक्रमण किया। पूरी काद्गमीर घाटी में उन्होंने आग लगाने बलात्कार और कत्ल करने जैसे कार्य किये। राजा और ब्राह्मण शिक्षक तो भाग गये। परन्तु साधारण नागरिक, जो रह गये, दूसरा कोई विकल्प न देखकर धीरे-धीरे मुसलमान हो गये।इस प्रकार युद्ध से कैदी प्राप्त होते थे। कैदी गुलाम और फिर मुसलमान बना लिये जाते थे। नये मुसलमान दूसरे हिन्दुओं की लूट, बलात्कार और बलात्‌ धर्मान्तरण में उत्साहपूर्वक लग जाते थे क्योंकि वह अपने समाज द्वारा घृणित समझे जाने लगते थे।
मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा दी गई उपरोक्त घटनाओं के विवरण को पढ़कर जिनके अनेक बार वे प्रत्यक्ष थे, दरिन्दे थे। किसी भी मनुष्य का मन अपने अभागे  पूर्वजों हिन्दु के प्रति द्रवित होकर करुणा से भर जाना स्वाभाविक है। हमारे धर्मनिरपेक्ष शासकों द्वारा बहुधा प्रसंशित धर्मनिरपेक्ष अमीर खुसरो अपनी मसनवी में लिखता है :-

जहाँ राकदीम आमद ई रस्मो पेश: कि हिन्दु बुवद सैदे तुर्का हमेश।
अर्जी बेह मदॅ निस्बते तुर्की हिन्दु कि तुर्कस्त चूँ शो र, हिन्दु चु आहू।
जे रस्मे कि रफतस्त चर्खे रवां रा बुजूद अज पये तुर्क शुदं हिन्दुऑरा।
कि तुर्कस्त गालिब बरेशां चूँ कोशद कि हम गीरदोहम खरद फरोशद।
अर्थात्‌ ‘संसार का यह नियम अनादिकाल से चला आ रहा है कि हिन्दु सदा तुर्कों का शिकार रहा है।
तुर्क और हिन्दु का संबंध इससे बेहतर नहीं कहा जा सकता है कि तुर्क सिंह के समान है और हिन्दु हिरन के समान।
आकाश की गर्दिश से यह परम्परा बनी हुई है कि हिन्दुओं का अस्तित्व तुर्कों के लिये ही है।
क्योंकि तुर्क हमेशा गालिब होता है और यदि वह जरा भी प्रयत्न करें तो हिन्दु को जब चाहे पकड़े, खरीदे या बेचे।’
यह संसार का अद्‌भुत आश्चर्य ही है कि इस्लाम के जिस आतंक से पूरा मध्य पूर्व और मध्य एद्गिाया कुछ दशाब्दियों में ही मुसलमान हो गया वह 1,000 वर्द्गा तक पूरा बल लगाकर भारत की आबादी के केवल 1/5 भाग ही धर्म परिवर्तन कर सका।
इन बलात्‌ धर्म परिवर्तित लोगों में कुछ ऐसे भी थे जो अपनी संतानों के नाम एक लिखित अथवा अलिखित पैगाम छोड़ गये-‘हमने स्वेच्छा सेअपने धर्म का त्याग नहीं किया है। यदि कभी ऐसा समय आवे जब तुम फिर अपने धर्म में वापिस जा सको तो देर मत लगाना। हमारे ऊपर किये गये अत्याचारों को भी भुलाना मत।’
बताया जाता है कि जम्मू में तो एक ऐसा परिवार है जिसके पास ताम्र पत्र पर खुदा यह पैगाम आज भी सुरक्षित है। किन्तु हिन्दू समाज उन लाखों उत्पीड़ित लोगों की आत्माओं की आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहा है। काद्गमीर के ब्रहाम्णों जैसे अनेक दृष्टान्तं है जहाँ हिन्दूओं ने उन पूर्वकाल के बलात्‌ धर्मान्तरित बंधुओं के वंशजों को लेने के प्रद्गन पर आत्म हत्या करने की भी धमकी दे डाली और उनकी वापसी असंभव बना दी और हमारे इस धर्मनिरपेक्ष शासन को तो देखो जो मुस्लिम द्यशासकों के इन कुकृत्यों को छिपाना और झुठलाना एक राष्ट्रीय कर्तव्य समझता है।
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में विद्गनोई संप्रदाय के अनेक परिवार रहते हैं। इस सम्प्रदाय के लोगों की धार्मिक प्रतिबद्धता है कि हरे वृक्ष न काटे जाये और किसी भी जीवधारी का वध न किया जाये। राजस्थान में इस प्रकार की अनेक घटनाएँ हैं, जब एक-एक वृक्ष को काटने से बचाने के लिये पूरा परिवार बलिदान हो गया।सऊदी अरब के कुछ विशिष्ट आगुन्तकों को ग्रेट बस्टर्ड नामक पक्षी का राजस्थान में करने शिकार की जब भारत सरकार द्वारा अनुमति दी गई तो इन विश्नोईयों के तीव्र विरोध के कारण यह प्रोग्राम रद्‌द हो गया था। वह विद्गनोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक संत जाम्भी जी की समाधि पर बनी छतरी पर मुस्लिम काल में लोधी मुस्लिम सुल्तानों द्वारा अधिकार कर लिया गया था। अकबर जैसे उदार बादशाह से जब फरियाद की गई तो उसने भी इन पाँच शर्तों पर यह छतरी विश्नोई सम्प्रदाय को वापिस की-
(1). मुर्दा गाड़ो, (2). चोटी न रखो, (3). जनेऊ धारण न करो, (4). दाढ़ी रखो और (5). विद्गणु के नाम लेते समय विस्मिल्लाह बोलो।
विश्नोईयों ने मजबूरी की दशा में यह सब स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे जैसा कि अकबर को विश्वास था, विश्नोई दो तीन सौ वर्ष में मुसलमान अधिक, हिन्दु कम दिखाई देने लगे। हिन्दुओं के लिये वह अछूत हो गये। परन्तु उन्होंने अपनी मजबूरी को भुलाया नहीं। आर्य समाज के जन्म के तुरंत बाद ही उन्होंने उसे अपना लिया। बिजनौर जनपद के मौहम्मदपुर देवमल ग्राम के द्गोख परिवार और नगीना के विश्नोई तथा सराय के विश्नोई  इसके उदाहरण हैं।
(3). CONVERSIONS-धर्म परिवर्तन ::  Some TV channels are high lighting the conversion of a few rag picker (-who's facials resembles with the Bangla Deshi-intruders-trespassers) vigorously. Baj Rang Dal or VHP or any artillery of the RSS Sangh Pariwar is doing  a great dis service to Hinduism-Hindutv. They are bringing those people to its fold, who do not know the meaning of religion. They are illiterate-criminal minded people. Why are they trying to bring the waste-garbage -rage pickers in their pious house.!? The waste is recycled and used as a compost-fertiliser. But these people are of no use for the community. Only those who are rejected-useless without faith are converted to other religion-belief. If one who is pious, with the understanding of Hindu culture-ideology-scriptures joins willingly, he should be welcomed, otherwise not.

(4). CONVERSIONS पूर्वी बंगाल अर्थात वर्तमान बंग्‍लादेश में बलात् धर्मांतरण :: 
(4.1). दिल्ली के शीशगंज गुरुद्वारा और गुरु तेगबहादुर के बलियान का इतिहास बलात् धर्मांतरण  से जुड़ा है। बंगाल के एक राजा हुआ था जिसका नाम था कालाचंद राय। उनकी इस्‍लामी बर्बरता के लिए लोग उन्‍हें काला पहाड़ पुकारने लगे थे और इतिहास में वह इसी नाम से जाना जाता हैं। काला पहाड़ की बर्बरता का कारण घोर जातिवादी मानसिकता से भरे कुछ ब्राहणों की हठ धर्मिता थी, जिसका बदला उसने पूरे पूर्वी बंगाल को मुसलमान बनाकर लिया।
(4.2).कालाचंद राय एक बंगाली ब्राहण युवक था। पूर्वी बंगाल के उस वक्‍त के मुस्लिम शासक की बेटी से उसे प्‍यार हो गया। बादशाह की बेटी ने उससे शादी की इच्‍छा जाहिर की। वह उससे इस कदर प्‍यार करती थी कि उसने इस्‍लाम छोड़कर हिंदू विधि से उससे शादी की इच्‍छा जाहिर की। ब्राहमणों को जब पता चला कि कालाचंद राय एक मुस्लिम राजकुमारी से शादी कर उसे हिंदू बनाना चाहता है तो ब्राहमण समाज ने इसका विरोध किया। उसने युवती के हिंदू धर्म में आने का न केवल विरोध किया, बल्कि कालाचंद राय को भी जाति बहिष्‍कार की धमकी दी।
कालाचंद राय गुस्‍से से आग बबुला हो गया और उसने इस्‍लाम स्‍वीकारते हुए उस युवती से निकाह कर उसके पिता के सिंहासन का उत्‍तराधिकारी हो गया। राजा बनने से पूर्व ही उसने तलवार के बल पर ब्राहमणाों को मुसलमान बनाना शुरू किया। पूरे पूर्वी बंगाल में उसने इतना कत्‍लेआम मचाया कि लोग तलवार के डर से मुसलमान होते चले गए। इतिहास में इसका जिक्र है कि पूरे पूर्वी बंगाल को इस अकेले व्‍यक्ति ने तलवार के बल पर इस्‍लाम में धर्मांतरित कर दिया और यह केवल उन मूर्ख, जातिवादी, अहंकारी व हठधर्मी ब्राहमणों को सबक सिखाने के उददेश्‍य से किया गया था। उसकी निर्दयता के कारण इतिहास उसे काला पहाड़ के नाम से जानती है। पूर्वी बंगाल किसी सूफीवाद या अपने स्‍वेच्‍छा से मुसलमान नहीं बना था, बल्कि बदले में जलते एक युवक ने तलवार के जोर पर पूरी कौम को ही मुसलमान बना दिया था। स्‍वेच्‍छा से केवल काला पहाड ने इस्‍लाम अपनाया था। भारत विभाजन से पूर्व 1946 में पूर्वी बंगाल में डेढ करोड हिंदू थे, आज वो हिंदू कहां गए ? 1946 में कौन से सूफीवाद की लहर चली थी कि डेढ करोड हिंदू पूर्वी बंगाल से गायब हो गए। जघन्‍य हत्‍या से या तो उनका नामोनिशान मिट गया, या तो मुसलमान हो गया, या कुछ भाग कर भारत में आ गए। [(1). संस्‍कृति के चार अध्‍याय: रामधारी सिंह दिनकर; (2). पाकिस्‍तान का आदि और अंत: बलराज मधोक]
One who is enlightened-God fearing-brave will never leave his house & won't need home coming in this style.
(4.3). Its a well known fact that christian missionaries in India are being funded by those who want to create another India within India like Pakistan and Bangla Desh. These people offer various facilities like education, higher social status, jobs, money and WWW-wine, women & wealth etc. Its the same story almost every where in India. The case of Naga Land & Keral is open to each one of us. What they did in Chattis Garh, Chotta Nagpur, Jhar Khand or else was through dubious means right under the nose of the previous-successive governments, under the grouse of secularism, since these governments were headed by Christians. Ghar Wapsi is alright but with restraint-caution-logic. Those who are making hue and cry in parliament are the ones who had been voted to power by the minority voters, earlier.[[22.12.2014]
(4.4). Almost every day the misdeeds of Christian missionaries are coming to light. This is dangerous for the whole Nation. Its certain that so called secular-especially those with congress will not take it seriously but it need the attention of the intelligentsia.
(4.5). What is worst: Those who have converted to Christianity keep claiming the benefits of reservation as a Hindu. There are thousands of government officials who converted themselves for respectability-recognition and got plum government jobs, through reservation and reservation in promotions. Take the case of those who convert themselves to Buddhism and Sikhism, are legally benefited through the loop holes in the constitution-law. This is against the basis tenets-spirit of the constitution: Equality before the law. The law is repeatedly misused. Such people do not mind filing false cases against those who raise this question.[28.12.2014]
(4.6). Disgruntled men like Togadia are bent upon loosing hell over Modi government. These people are motivated and one time opponents of Modi. They were shown their right place earlier at a number of occasions in Gujrat. Now, they need taming and putting them back in to cold store-deep freezers, for ever. [03.01.2015]
(4.7). हिन्दुओं में भी गुंडा तत्व सक्रिय है, जो हिन्दुओं पर अपना वर्चस्व कायम करने की फ़िराक में है। इस बहाने ये पूरे हिन्दु समाज को प्रताड़ित करने लगेंगे। इनका साथ देना मूर्खता है और अपने लिए परेशानी मोल लेना है। अच्छी बात यह है कि अधिसंख्यक हिन्दु युवा है और इनकी चालबाजियों में आने वाला नहीं है। [17.01.2105] 

(5). CONVERSION OF HINDUS TO ISLAM ::
(5.1). इस्लाम में धर्मान्‍तरण के मुख्य कारण थे :: मृत्यु का भय, परिवार को गुलाम बनाये जाने का भय, आर्थिक लोभ यथा पारितोषिक, पेन्शन, लूट का माल तथा  धर्मान्‍तरित होने वालों के पैतृक धर्म में प्रचलित अन्धविश्वास, बौद्ध मताम्बलियों द्वारा घोर उपेक्षा और इस्लाम के प्रचारकों द्वारा किया गया झूँठा-खोखला प्रचार। (जाफर मक्की द्वारा 19 दिसम्बर, 1421 को लिखे गये एक पत्र से) 
भारत में 95% से ज्यादा और पूरा ही सुन्नी समाज हिन्दु था। हिन्दु स्वेच्छा से मुसलमान नहीं बना उसे तलवार की नोक पर मुसलमान बनाया गया। दुनियाँ के किसी भी कोने में परिवर्तित मुसलमान यथा सुन्नी, मुजाहिर, यजीदी, कुद्र अपमान सहते हैं और हीन नजर-उपेक्षा-हिकारत-नफ़रत से देखे जाते हैं। उन्हें मुसलमान बनकर क्या मिला?!
इस्लाम का मूल सिद्धान्त है किसी भी तरह साम, दाम, दण्ड या भेद के द्वारा पूरी धरती पर आबादी को गुमराह करके मुसलमान बनाया जाये। कुरान, हदीस, हिदाया और सिरातुन्नबी, जो इस्लाम के चार बुनियादी ग्रंथ हैं, मुसलमानों को इसके आदेश देते हैं। इसलिए मुसलमानों के मन में पृथ्वी पर कब्जा करने में कोई संशय नहीं रहा। हिदाया स्पष्ट रूप से काफिरों पर आक्रमण करने की अनुमति देता है, भले ही उनकी ओर से कोई उत्तेजनात्मक कार्यवाही न भी की गई हो। इस्लाम के प्रचार-प्रसार के धार्मिक कर्तव्य को लेकर तुर्की ने भारत पर आक्रमण में कोई अनैतिका नहीं देखी। उनकी दृष्टि में भारत में बिना हिंदुओं को पराजित और सम्पत्ति से वंचित किये, इस्लाम का प्रसार संभव नहीं था। 
मोपला विद्रोह के समय मुसलमान मोपलाओं द्वारा मालाबार में 20,000 हिन्दुओं के बलात्‌ धर्मान्तरण पर मौलाना हसरत मोहानी द्वारा कांग्रेस की विषय समिति में कुख़्यात टिप्पणी की थी, जिसका गाँधी इत्यादि कांग्रेस के शीर्षस्थ नेता लोगों  विरोध नहीं किया।
कुरान में धर्म प्रचार के लिये बल प्रयोग के विरुद्ध कुछ आयते हैं। किन्तु काफिरों को कत्ल करने के आदेश देने वाली आयत (9.5) के कारण  कुफ्र और काफिरों के प्रति किसी प्रकार की नम्रता अथवा सहनशीलता का उपदेश करने वाली तमाम आयतें रद्‌द कर दी गयी हैं। इस्लाम बल प्रयोग, मार-काट, लूट-खसोट, हिंसा का हिमायती है। यह एक पुरातन दस्यु समाज है जिसको इस्लाम का जामा पहना दिया गया। इनकी हरकतें पहले की तरह आज भी कायम हैं।  
सनातन काल से  ही, अरब देशों का दक्षिणी-पूर्वी देशों से समुद्री मार्ग द्वारा भारत के मालाबार तट पर होते हुए बड़ा भारी व्यापार था। अरब नाविकों का समुद्र पर लगभग एकाधिकार था। मालाबार तट पर अरबों का भारत से कितना व्यापार होता था, यह केवल इस तथ्य से समझा जा सकता है कि अरब देशों से 10,000 घोड़े प्रति वर्ष भारत में आयत होते थे और इससे कहीं अधिक मूल्य का सामान लकड़ी, मसाले, रेशम इत्यादि निर्यात होते थे। दक्षिण भारत के शासकों की आर्थिक सम्पन्नता इसी व्यापार पर निर्भर थी। फलस्वरूप् भारतीय शासक इन अरब व्यापारियों और नाविकों को अनेक प्रकार से संतुष्ट रखने का प्रयास करते थे। मौहम्मद के समय में ही पूरा अरब प्रदेश मुसलमान हो गया, तो वहाँ से अरब व्यापारी मालाबार तट पर अपने नये मत का उत्साह और पैगम्बर द्वारा चाँद के दो टुकड़े कर देने जैसी झूँठी-मन घड़ंत कहानियाँ लेकर आये। बौद्ध धर्म के कारण भारत में सनातन धर्म का ह्रास हो गया था। वह भारत का अत्यन्त अवनति का काल था। न कोई केन्द्रीय शासन रह गया था और न कोई राष्ट्रीय धर्म। अनेक मत-मतान्तर उत्पन्न हो गये थे। प्रत्येक मुसलमान इस्लाम का मिशनरी भी होता था और योद्धा भी। इसलिए जो अरब व्यापारी और नाविक दक्षिण भारत में आये उन्होंने इस्लाम का प्रचार प्रारंभ कर दिया। 
तथा कथित विद्वान्, पण्डित, ब्राह्मण किसी भी व्यक्ति को धर्म-जाति से बाहर कर देते थे। जिन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, उन्होंने बढ़-चढ़ कर हिन्दु धर्म और समाज को हानि पहुँचाई। इस्लाम के प्रचार के फलस्वरूप हिन्दुओं के धर्मान्तरण के विरुद्ध कुछ प्रतिक्रिया भी हुई और अनेक स्थानों पर हिन्दु-मुस्लिम टकराव भी हुआ। क्योंकि शासकों की समृद्धि और ऐश्वर्य मुसलमान व्यापारियों पर निर्भर करता था, इसलिए इस प्रकार के टकराव में शासक उन्हीं का पक्ष लेते थे और अनेक प्रकार से उनका तुष्टीकरण करते थे। फलस्वरूप् हिन्दुओं के धर्मान्तरण करने में बाधा उपस्थित करने वालों को शासन बर्दाश्त नहीं करता था। हिन्दु  शासक अरब व्यापारियों का बहुत ध्यान रखते थे क्योंकि उनके द्वारा उनको आर्थिक लाभ होता था और इस कारण हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन में कोई बाधा नहीं डाली जा सकती थी। अत्यन्त निम्न जातियों से और बौद्ध मत से धर्मान्तरित हुए भारतीय मुसलमानों को भी शासन द्वारा वही सम्मान और सुविधाएँ दी जाती थीं, जो अरब (मुसलमान) व्यापारियों को दी जाती थीं। 
ग्यारहवीं शताब्दी के इतिहासकार हदरीसों द्वारा बताया गया है कि अनिलवाड़ा में अरब व्यापारी बड़ी सँख्या में आते थे और वहाँ के शासक और मंत्रियों द्वारा उनकी सम्मान पूर्वक आवभगत की जाती थी और उन्हें सब प्रकार की सुविधा और सुरक्षा प्रदान की जाती थीं। कैम्बे के मुसलमानों पर जब हिंदुओं ने हमला किया तो वहाँ के शासक सिद्धराज (1094-1143) ने, न केवल अपनी प्रजा के हिंदुओं को दंड दिया अपितु मुसलमानों को एक मस्जिद बनाकर भेंट की।
नाइन से उत्पन्न ब्राह्मण पुत्र महानन्द ने पहले ही देश से दुष्ट क्षत्रिय राजाओं का सफ़ाया कर दिया था।आचार्य चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को मोल देकर प्राप्त किया, पढ़ाया-लिखाया, मगर वह भी जैन हो गया। बिन्दुसार और अशोक ने बौद्ध मत अपना लिया और इस प्रकार आचार्य चाणक्य का प्रयास विफल हो गया। बुंदेला, छत्रसाल, बाजीराव जैसे महान यौद्धा  भी अविवेकी ब्राह्मणों के कुकृत्य  के शिकार हो गए।
एक शासक तो अपने मंत्रियों समेत अरब देश जाकर मुसलमान ही हो गया। अगर किसी हिन्दु शासक-राजा ने किसी मुस्लिम लड़की से विवाह कर लिया, तो उसे धर्म के विरुद्ध बताया गया और उसको धर्म से निष्कासित किया गया। ऐसे राजाओं ने जमकर हिन्दुओं पर घोर अत्याचार किये और उन्हें भी मुसलमान बनने को मजबूर किया गया। बौद्ध धर्म के अनुयायी राजाओं ने हिन्दुओं को समस्त सुविधाएँ, नौकरियाँ, विद्यालयों-आश्रमों को अनुदान बन्द कर दिये। जिससे शिक्षण व्यवस्था लड़खड़ा गई। पण्डितों-ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा मिलनी बन्द हो गई। विद्वानों को राज्य का प्रश्रय समाप्त हो गया। बौद्ध मताम्बलियों ने हिन्दुओं खासकर ब्राह्मणों का अपमान-तिरस्कार करना शुरू कर दिया, जिससे ब्राह्मणों ने उनके नाश के लिये मुसलमानों को भारत रास्ता दिखा दिया और बौद्धों के साथ-साथ अपनी मुसीबत को भी न्यौता दे डाला। देखा जाये तो मूर्ख, अविवेकी, दान खाने वाले ब्राह्मणों ने  अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये उलटी-सीधी मर्यादाएँ बना डालीं, जो शास्त्र के सर्वथा विपरीत थीं। विद्वान्-विवेकी-तपस्वी ब्राह्मण तो पहले ही इस व्यवस्था से अलग हो गये थे।
जहाँ दक्षिण भारत में इस्लाम, शासकों के आर्थिक लोभ के कारण एवं मुस्लिम व्यापारियों के शांतिपूर्ण प्रयासों द्वारा पैर पसार रहा था, वहीं उत्तर भारत में वह अरब, अफगानी, तूरानी, ईरानी, मंगोल और मुगल इत्यादि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा कुरान और तलवार का विकल्प लेकर प्रविष्ट हुआ। इन आक्रान्ताओं ने अनगिनत मंदिर तोड़े, उनके स्थान पर मस्जिद, मकबरे और खानकाह बनाए। उन मस्जिदों की सीढ़ियों पर उन उपसाय मूर्तियों के खंडित टुकड़ों को बिछाया जिससे वह हिन्दुओं की आँखों के सामने सदैव मुसलमानों के जूतों से रगड़ी जाकर अपमानित हों और हिन्दु  प्रत्यक्ष देखें कि उन बेजान मूर्तियों में मुसलमानों का प्रतिकार करने की कोई शक्ति नहीं है। मूर्ति मात्र प्रतीक है भगवान् नहीं। उन्होंने मंदिरों और हिन्दु प्रजा से, जो स्वर्ण और रत्न, लूटे उनकी मात्रा मुस्लिम इतिहासकार सैकड़ों और सहस्त्रों मनों में देते हैं। जिन हिन्दुओं का इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर वध किया गया, उनकी सँख्या कभी-कभी लाखों में दी गई है और उनमें से जो अवयस्क बच्चे और स्त्रियाँ गुलाम बनाकर विषय-वासना के शिकार बने, उनकी सँख्या सहस्त्रों में दी गई है। इस्लाम के अनुसार, उनमें से 4/5 भाग को भारत में ही आक्रमणकारियों और उसके सैनिकों में बाँट दिया जाता था और शेष 1/5 को, शासकों अथवा खलीफा इत्यादि को भेंट दिया जाता था और सहस्त्रों की सँख्या में उन्हें विदेशों में भेड़ बकरियों की तरह गुलामों की मंडियों में बेचा जाता था। बलूच, मुजाहिरों, सीरियाईयों, यजीदियों, कुर्दों के साथ आज भी यही हो रहा है। दिल्ली में भी इस प्रकार की मंडियाँ लगती थीं। भारत की उस समय की आबादी केवल दस-बारह करोड़ रही होगी। ऐसी दशा में लाखों हिन्दुओं के कत्ल और हजारों के गुलाम बनाये जाने से समस्त भारत के हिन्दुओं पर कैसा आतंक छाया होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
अल-इदरीसी नामक मुस्लिम इतिहासकार के अनुसार न्याय करना  हिन्दु का स्वभाव है। वह न्याय से कभी परामुख नहीं होते। इनकी विश्वसनीयता, ईमानदारी और अपनी वचन बद्धता को हर सूरत में निभाने की प्रवृति विश्व विख्यात है। उनके इन गुणों की खयाति के कारण सम्पूर्ण विश्व के व्यापारी उनसे व्यापार करने आते हैं।
अलबेरुनी के अनुसार, जो महमूद गजनवी के साथ भारत आया था, अरब विद्वान, बौद्ध भिक्षुओं और हिन्दु  पंडितों के चरणों मे बैठकर दर्शन्, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, रसायन और दूसरे विषयों की शिक्षा लेते थे। खलीफा मंसूर (745-76) के उत्साह के कारण अनेक हिन्दू विद्वान उसके दरबार में पहुँच गये थे। 771 में सिन्धी हिन्दुओं के एक शिष्ट मंडल ने उसको अनेक ग्रंथ भेंट किये थे। ब्रह्म सिद्धांत और ज्योतिष संबंधी दूसरे ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद भारतीय विद्वानों की सहायता से इब्राहीम-अल-फाजरी द्वारा बगदाद में किया गया था। बगदाद के खलीफा हारु-अल-रशीद के बरमक मंत्रियों (मूल संस्कृत पर प्रमुख) के परिवार जो बौद्ध धर्म त्यागकर, मुसलमान हो गये थे, निरन्तर अरबी विद्वानों को भारत में दीक्षा प्राप्त करने के लिये भेजते थे और हिन्दु विद्वानों को बगदाद आने को आमंत्रित करते थे। एक बार जब खलीफा हारु-अल-रशीद एक ऐसे रोग से ग्रस्त हो गये, जो स्थानीय हकीमों की समझ में नहीं आया, तो उन्होंने हिन्दु  वैद्यों को भारत से बुलवाया। मनका नामक हिन्दु वैद्य ने उनको ठीक कर दिया। मनका बगदाद में ही बस गया। वह बरमकों के अस्पताल से संबंद्ध हो गया और उसने अनेक हिन्दु ग्रंथों का फारसी और अरबी में अनुवाद किया। इब्न धन और सलीह, जो धनपति और भोला नामक हिन्दुओं के वंशज थे, बगदाद के अस्पतालों में अधीक्षक नियुक्त किये गये थे। चरक, सुश्रुत के अष्टांग हदय निदान और सिद्ध योग का तथा स्त्री रोगों, विष, उनके उतार की दवाइयों, दवाइयों के गुण दोष, नशे की वस्तुओं, स्नायु रोगों संबंधी अनेक रोगों से संबंधित हिन्दु  ग्रंथों का वहाँ खलीफा द्वारा पहलवी और अरबी भाषा में अनुवाद कराया गया, जिससे गणित और चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान मुसलमानों में फैला। ज़ाहिल, अनपढ़ मुसलमान इस विज्ञान युक्त संस्कृति को जहालिया अर्थात्‌ मूर्खता पूर्ण संस्कृति बताते हैं। इस्लाम के मानने वाले लुटेरों के लिए प्रताड़ित करने, वध करने, लूटने और गुलाम बनाने के लिये यही काफी था।
मुस्लिम इतिहासकारों ने इन कत्लों और बधिक आक्रमण कारियों द्वारा वध किये गये लोगों के सिरों की मीनार बनाकर देखने पर आनंदित होने के दृश्यों के अनेक प्रशंसात्मक वर्णन किये हैं। बाबर ने मानव खोपड़ियों का चिट्टा चिन रक्खा था और उनके सामने बैठकर खाना-कहते वक्त उन पर हँसता भी था।  आक्रमणकारियों और सुल्तानों ने अपनी जीवनियों में अपनी इन बर्बरताओं पर अत्यंत हर्ष और आत्मिक संतोष प्रकट किया है और घोर नरक भोग रहे हैं
इन बर्बरताओं के ये प्रशंसात्मक वर्णन, जिनके कुछ मूल हस्तलेख आज भी उपलब्ध हैं, उन तथाकथित धर्म निरपेक्ष आधुनिक, इतिहासकारों के गले की हड्‌डी बन गये हैं, जो इन ऐतिहासिक तथ्यों को हिन्दु-मुस्लिम एकता की मृग मरीचिका को वास्तविक सिद्ध करने के उनके प्रयासों में बाधा समझते हैं। इस उद्‌देश्य से वह इस क्रूरता को हिन्दुओं से छिपाने के लिये झूँठी कहानियों के तानों-बानों की चादरें बुनते हैं। परन्तु ये क्रूरता के ढ़ेर इतने विशाल हैं कि जो छिपाये नहीं छिपते हैं।
दुर्भाग्यवश भारतीय शासकों का चिंतन आज भी वहीं है जो 7 वीं शताब्दी में दक्षिण में इस्लाम के प्रवेश के समय वहाँ के हिन्दु शासकों का था। वोट की राजनीति में वे अधर्म को बढ़ावा और मुसलमानों को नाजायज सुविधाएँ-तरजीह दे रहे हैं। यदि उन दिनों खाड़ी देशों से व्यापार द्वारा आर्थिक लाभ का लोभ था तो अब मुस्लिम वोटों की सहायता से प्रांतों और केंद्र में सत्ता प्राप्त करने और सत्ता में बने रहने का लोभ है। यह लोभ साधारण नहीं है। जिस प्रकार करोड़ों और अरबों रुपये के घोटाले प्रतिदिन उजागर हो रहे हैं, जिस प्रकार के मुगलिया ठाठ से समाज वादी धर्म निरपेक्ष नेता रहते हैं, वह तो अच्छे-अच्छे ऋषि मुनियों के मन को भी डिगा सकते हैं। नेहरू खानदान का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि इन लोगों ने अंग्रेजों से बचने के लिए हिन्दु नाम रख लिये थे मगर तौर -तरीके वही मुसलमानों वाले रहे। काँग्रेस के शासनकाल में इसलिये भारतीय बच्चों को दूषित इतिहास पढ़ाने पर शासन बल दिया गया। एन.सी.ई.आर.टी. ने, जो सरकारी और सरकार द्वारा सहायता प्राप्त सभी स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों के लेखन और प्रकाशन पर नियंत्रण रखने वाला केंद्रीय शासन का संस्थान है, लेखकों और प्रकाशकों के ‘पथ प्रदर्शन’ के लिये सुझाव दिये हैं। इन सुझावों का संक्षिप्त विवरण नई दिल्ली जनवरी 17, 1972 के इंडियन एक्सप्रेस में दिया गया है। कहा गया है कि ‘उद्‌देश्य यह है कि अवांछित इतिहास और भाषा की ऐसी पुस्तकों को पाठ्‌य पुस्तकों में से हटा दिया जाये जिनसे राष्ट्रीय एकता निर्माण में और सामाजिक संगठन के विकसित होने में बाधा पड़ती है। 20 राज्यों और तीन केन्द्र शासित प्रदेशों ने एन.सी.ई.आर.टी. के सुझावों के तहत कार्य प्रारंभ भी कर दिया है। पश्चिमी बंगाल के बोर्ड ऑफ सेकेन्ड्री एजुकेद्गान द्वारा 29  अप्रैल 1972 को जो अधिसूचना स्कूलों और प्रकाशकों के लिए जारी की गई उसमें भारत में मुस्लिम राज्य के विषय में कुछ ‘शुद्धियाँ’ दूर करने को कहा गया है जैसे कि महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण करने का वास्तविक उद्‌देश्य, औरंगजेब की हिन्दुओं के प्रति नीति इत्यादि। सुझावों में विशेष रूप से कहा गया है कि ‘मुस्लिम शासन की आलोचना न की जाये। मुस्लिम आक्रमण कारियों और शासकों द्वारा मंदिरों के विध्वंस का नाम न लिया जाये। ‘इस्लाम में बलात्‌ धर्मान्तरण के वर्णन पाठ्‌य पुस्तकों से निकाल दिये जायें।
तथाकथित ‘धर्म निरपेक्ष’ हिन्दू शासकों और इतिहासकारों द्वारा इतिहास को झुठलाने के इन प्रभावी प्यासों के फलस्वरूप सरकारी और सभी हिन्दु स्कूलों में शिक्षा प्राप्त हिन्दुओं की नई पीढ़ियाँ एक नितांत झूठ ऐतिहासिक दृष्टिकोण को सत्य मान बैठी हैं कि ‘इस्लाम गैर-मुसलमानों के प्रति प्रेम और सहिष्णुता के आदेश देता  है। भारत पर आक्रमण करने वाले मौहम्मद बिन कासिम, महमूद गज़नवी, मौहम्मद गौरी, तैमूर, बाबर, अब्दाली इत्यादि मुसलमानों का ध्येय लूटपाट करना था, इस्लाम का प्रचार-प्रसार नहीं था। उनके कृत्यों से इस्लाम का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिये। ये लोग अपनी हिन्दु  प्रजा के प्रति दयालु और प्रजावत्सल थे। कभी-कभी उनके मंदिरों को दान देते थे। उन्हें देखकर प्रसन्न होते थे।’ जबकि वास्तविकता यह है कि हिन्दुओं के प्रति उनके उस प्रकार के क्रूर आचरण का कारण उन सबके मन में अपने धर्म-इस्लाम के प्रति अपूर्व सम्मान और धर्मनिष्ठा थी और  इस्लाम के प्रति धर्मनिष्ठता का अर्थ केवल इस्लाम के प्रति प्रेम ही नहीं है, सभी गैर-इस्लामी धर्मों, दर्शनों और विश्वासों के प्रति घृणा करना भी है।
मुस्लिम धर्म प्रचारक उनको इसी कारण परम आदर की दृष्टि से इस्लाम के ध्वजारोहक के रूप में देखते हैं और अपने बच्चों को भी ऐसा ही करने की शिक्षा देते हैं कि एक झूँठ का पुलिंदा मात्र है। 
जहाँ एक ओर, हिन्दुओं की भावी पीढ़ियों को वास्तविकता से दूर रखकर भ्रमित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत में स्वतंत्रता के पश्चात्‌ खड़े किये गये, लगभग 40,000  मदरसों और 8,00,000 मकतवों में मुस्लिम बच्चों को गैर-इस्लाम से घृणा करना और इन लुटेरों को इस्लाम के महापुरुष और उनके शासन को, अकबर के कुफ्र को प्रोत्साहन देने वाले शासन से बेहतर बताया जा रहा है। फिर इसमें आश्चर्य की क्या बात है कि भारत सरकार के एक मंत्री (गुलाम नबी आजाद) को कहना पड़ा कि कश्मीर में जमाते इस्लामी द्वारा चलाये जाने वाले मदरसों ने देश के धर्म निरपेक्ष ढाँचे को बहुत हानि पहुँचाई है। घाटी के नौजवानों का बन्दूक की संस्कृति से परिचय करा दिया है। मंत्री जी के वक्तव्य से यह भ्रम हो सकता है कि उनका आरोप केवल जमाते इस्लामी द्वारा चलाये जाने वाले मदरसों के लिये ही सत्य है, दूसरों के लिये नहीं। किन्तु डॉ. मुशीरुल हक, जो न केवल स्वयं मदरसा शिक्षा प्राप्त हैं, अपितु विदेशी विश्व-विद्यालयों के भी विद्वान हैं के अनुसार सभी मदरसों में पाठ्‌यचर्या, पाठ्‌य-पुस्तकें, पाठ्‌यनीति अकादमिक तथा धार्मिक शिक्षण एक जैसा ही है। यह भिन्न हो भी नहीं सकता क्योंकि बुनियादी पुस्तकें कुरान, हदीस इत्यादि एक ही हैं।
अफगानिस्तान में मदरसों में शिक्षा पा रहे सशस्त्र विद्यार्थियों (तालिबान-आतंकवादी संगठन) द्वारा गृह युद्ध में कूदकर जिस प्रकार अपेक्षाकृत उदारवादी मुस्लिम शासकों के दाँत खट्‌टे कर दिये गये, उससे उड्‌डयन मंत्री के उपरोक्त उद्धत वक्तव्य को बल मिलता है। यह तालिबान कट्‌टरवादी (शुद्ध) इस्लाम की स्थापना के लिये समर्पित अनुशासन बद्ध जिहादी सेनाओं के समर्पित योद्धा हैं। उनका उपयोग किसी समय भी इस रूप् में किया जा सकता है। चाहे अफगानिस्तान हो या काश्मीर अथवा कोई दूसरा देश। The IS, ISI, ISIS are the terrorist organisations which have become a root cause of tension (गले की हड्ड़ी-फाँस) all over the world. 
(6). मुसलमानों के काले कारनामे :: 
(6.1). मौहम्मद बिन कासिम (712) :: इस्लामी सेनाओं का पहला प्रवेश सिन्ध में, 17 वर्षीय मौहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में 711-12 में हुआ। प्रारंभिक विजय के पश्चात उसने ईराक के गवर्नर हज्जाज को अपने पत्र में लिखा :-"दाहिर का भतीजा, उसके योद्धा और मुखय-मुखय अधिकारी कत्ल कर दिये गये हैं। हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित कर लिया गया है, अन्यथा कत्ल कर दिया गया है। मूर्ति-मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें खड़ी कर दी गई हैं। अजान दी जाती है।" 
(6.2). मुस्लिम इतिहासकार आगे लिखता है :- "मौहम्मद बिन कासिम ने रिवाड़ी का दुर्ग विजय कर लिया। वह वहाँ दो-तीन दिन ठहरा। दुर्ग में मौजूद 6,000 हिन्दू योद्धा वध कर दिये गये, उनकी पत्नियाँ, बच्चे, नौकर-चाकर सब कैद कर लिये (दास बना लिये गये)। यह सँख्या लगभग 30 हजार थी। इनमें दाहिर की भानजी समेत 30 अधिकारियों की पुत्रियाँ भी थीं।
(6.3). विश्वासघात :: बहमनाबाद के पतन के विषय में ‘चचनामे’ का मुस्लिम इतिहासकार लिखता है कि बहमनाबाद से मौका बिसाया (बौद्ध) के साथ कुछ लोग आकर मौहम्मद-बिन-कासिम से मिले। मौका ने उससे कहा, ‘यह (बहमनाबाद) दुर्ग देश का सर्वश्रेष्ठ दुर्ग है। यदि तुम्हारा इस पर अधिकार हो जाये तो तुम पूर्ण सिन्ध के शासक बन जाओगे। तुम्हारा भय सब ओर व्याप्त हो जायेगा और लोग दाहिर के वंशजों का साथ छोड़ देंगे। बदले में उन्होंने अपने जीवन और (बौद्ध) मत की सुरक्षा की माँग की। दाहिर ने उनकी शर्तें मान ली। इकरार नामे के अनुसार जब मुस्लिम सेना ने दुर्ग पर आक्रमण किया तो ये लोग कुछ समय के लिये दिखाने मात्र के वास्ते लड़े और फिर शीघ्र ही दुर्ग का द्वार खुला छोड़कर भाग गये। विश्वासघात द्वारा बहमना बाद के दुर्ग पर बिना युद्ध किये ही मुस्लिम सेना का कब्जा हो गया।
(6.4). बहमनाबाद में सभी हिन्दू सैनिकों का वध कर दिया गया। उनके 30 वर्ष की आयु से कम के सभी परिवारी जनों को गुलाम बनाकर बेच दिया गया। दाहिर की दो पुत्रियों को गुलामों के साथ खलीफा को भेंट स्वरूप भेज दिया गया। अलविलादरी के अनुसार 26,000 लोगों का वध किया गया।
(6.5). मुल्तान में भी 6,000 व्यक्ति कत्ल किये गये। उनके सभी रिश्तेदार गुलाम बना लिये गये। अन्ततः सिन्ध में मुसलमानों ने न बौद्धों को बखशा, न हिन्दुओं को।
(6.6). सुबुक्तगीन (977-997) :: अल उतबी नामक मुस्लिम इतिहासकार द्वारा लिखित ‘तारिखे यामिनी’ के अनुसार-‘सुल्तान ने उस (जयपाल) के राज्य पर धावा बोलने के अपने इरादे रूपी तलवार की धार को तेज किया जिससे कि वह उसको इस्लाम अस्वीकारने की गंदगी से मुक्त कर सके। अमीर लत्रगान की ओर बढ़ा जो कि एक शक्तिशाली और सम्पदा से भरपूर विखयात नगर है। उसे विजयकर, उसके आस-पास के सभी क्षेत्रों में, जहाँ हिन्दु निवास करते थे, आग लगा दी गई। वहाँ के सभी मूर्ति-मंदिर तोड़कर वहाँ मस्जिदें बना दी गईं। उसकी विजय यात्रा चलती रही और सुल्तान उन (मूर्ति-पूजा से) प्रदूषित भाग्यहीन लोगों का कत्ल कर मुसलमानों को संतुष्ट करता रहा। इस भयानक कत्ल करने के पश्चात्‌ सुल्तान और उसके मित्रों के हाथ लूट के माल को गिनते-गिनते सुन्न हो गये। विजय यात्रा समाप्त होने पर सुल्तान ने लौट कर जब  द्वारा मुसलमानों के द्वारा किये गए कुकृत्यों  का वर्णन किया गया तो छोटे बड़े सभी सुन-सुन कर आत्म विभोर हो गये और अल्लाह को धन्यवाद देने लगे। 
(6.7). महमूद गजनवी (997-1030)  :: भारत पर आक्रमण प्रारंभ करने से पहले, इस 20 वर्षीय सुल्तान ने यह धार्मिक शपथ ली कि वह प्रति वर्ष भारत पर आक्रमण करता रहेगा, जब तक कि वह देश मूर्ति और बहुदेवता पूजा से मुक्त होकर इस्लाम स्वीकार न कर ले। अल उतबी इस सुल्तान की भारत विजय के विषय में लिखता है-‘अपने सैनिकों को शस्त्रास्त्र बाँट कर अल्लाह से मार्ग दर्शन और शक्ति की आस लगाये सुल्तान ने भारत की ओर प्रस्थान किया। पुरुष पुर (पेशावर) पहुँचकर उसने उस नगर के बाहर अपने डेरे गाड़ दिये।
(6.8). मुसलमानों को अल्लाह के शत्रु काफिरों से बदला लेते दोपहर हो गयी। इसमें 15,000 काफिर मारे गये और पृथ्वी पर दरी की भाँति बिछ गये जहाँ वह जंगली पशुओं और पक्षियों का भोजन बन गये। जयपाल के गले से जो हार मिला उसका मूल्य 2 लाख दीनार था। उसके दूसरे रिश्तेदार और युद्ध में मारे गये लोगों की जामा-तलाशी से 4 लाख दीनार का धन मिला। इन लुटेरों-हमलावरों ने 5 लाख सुन्दर स्त्रियों के साथ लगभग उतने ही पुरुषों को भी गुलाम बनाया।  
(6.9). पेशावर के पास वाये-हिन्द पर आक्रमण के समय (1001-1003) महमूद ने महाराज जयपाल और उसके 15 प्रमुख सरदारों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया था। सुखपाल की भाँति इनमें से कुछ मृत्यु के भय से मुसलमान हो गये। भेरा में, सिवाय उनके, जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, सभी निवासी कत्ल कर दिये गये। स्पष्ट है कि इस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वालों की सँख्या काफी थी। 
(6.10). मुल्तान में बड़ी सँख्या में लोग मुसलमान हो गये। जब महमूद ने नवासा शाह पर (सुखपाल का धर्मान्तरण के बाद का नाम) आक्रमण किया तो उतवी के अनुसार महमूद द्वारा धर्मान्तरण के योद्धा का अभूतपूर्व स्वागत हुआ। काश्मीर घाटी में भी बहुत से काफिरों को मुसलमान बनाया गया और उस देश में इस्लाम फैलाकर वह गजनी लौट गया।
(6.11). उतबी के अनुसार जहाँ भी महमूद जाता था, वहीं वह निवासियों को इस्लाम स्वीकार करने पर मजबूर करता था। इस बलात्‌ धर्म परिवर्तन अथवा मृत्यु का चारों ओर इतना आतंक व्याप्त हो गया था कि अनेक शासक बिना युद्ध किये ही उसके आने का समाचार सुनकर भाग खड़े होते थे। भीमपाल द्वारा चाँद राय को भागने की सलाह देने का यही कारण था कि कहीं राय महमूद के हाथ पड़कर बलात्‌ मुसलमान न बना लिया जाये जैसा कि भीमपाल के चाचा और दूसरे रिश्तेदारों के साथ हुआ था।
(6.12). 1023 में किरात, नूर, लौहकोट और लाहौर पर हुए चौदहवें आक्रमण के समय किरात के शासक ने इस्लाम स्वीकार कर लिया और उसकी देखा-देखी दूसरे बहुत से लोग मुसलमान हो गये। निजामुद्‌दीन के अनुसार देश के इस भाग में इस्लाम शांतिपूर्वक भी फैल रहा था, और बलपूर्वक भी।
(6.13). सुल्तान महमूद ने अपने सभी काले कारनामों को इस्लाम के अनुरुप बताया। 
(6.14). हिन्दुओं ने इस पराजय को राष्ट्रीय चुनौती के रूप में लिया। अगले आक्रमण के समय जयपाल के पुत्र आनंद पाल ने उज्जैन, ग्वालियर, कन्नौज, दिल्ली और अजमेर के राजाओं की सहायता से एक बड़ी सेना लेकर महमूद का सामना किया। फरिश्ता लिखता है कि 30,000 खोकर राजपूतों ने जो नंगे पैरों और नंगे सिर लड़ते थे, सुल्तान की सेना में घुस कर थोड़े से समय में ही तीन-चार हजार मुसलमानों को काट कर रख दिया। सुल्तान युद्ध बंद कर वापिस जाने की सोच ही रहा था कि आनंद पाल का हाथी अपने ऊपर नेपथा के अग्नि गोले के गिरने से भाग खड़ा हुआ। हिन्दु सेना भी उसके पीछे भाग खड़ी हुई।
(6.15). सराय (नारदीन) का विध्वंस :: सुल्तान ने (कुछ समय ठहरकर) फिर हिन्द पर आक्रमण करने का इरादा किया। अपनी घुड़सवार सेना को लेकर वह हिन्द के मध्य तक पहुँच गया। वहाँ उसने ऐसे-ऐसे शासकों को पराजित किया जिन्होंने आज तक किसी अन्य व्यक्ति के आदेशों का पालन करना नहीं सीखा था। सुल्तान ने उनकी मूर्तियाँ तोड़ डाली और उन दुष्टों को तलवार के घाट उतार दिया। उसने इन शासकों के नेता से युद्ध कर उन्हें पराजित किया। अल्लाह के मित्रों ने प्रत्येक पहाड़ी और वादी को हिन्दुओं के खून से रंग दिया और घोड़े, हाथियों और बड़ी भारी संपत्ति लूटी। 
(6.16). नंदना की लूट ::  सुल्तान ने हिंद की मूर्ति पूजा  पर रोक लगा दी और मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें बना दीं। उसने हिन्द की राजधानी पर आक्रमण की ठानी जिससे वहाँ के मूर्ति पूजक निवासियों को अल्लाह की एकता में विश्वास न करने के कारण दंडित करे। 1013 में एक अंधेरी रात्रि को उसने एक बड़ी सेना के साथ प्रस्थान किया।
(6.17). (विजय के पश्चात्‌) सुल्तान लूट का भारी सामान ढ़ोती अपनी सेना के पीछे-पीछे चलता हुआ, वापिस लौटा। गुलाम तो इतने थे कि गजनी की गुलाम-मंडी में उनके भाव बहुत गिर गये। अपने (भारत) देश में अति प्रतिष्ठा प्राप्त लोग साधारण दुकानदारों के गुलाम होकर पतित हो गये। 
(6.18). थानेसर में कत्ले आम :: थानेसर का शासक मूर्ति-पूजा में घोर विश्वास करता था और अल्लाह (इस्लाम) को स्वीकार करने को किसी प्रकार भी तैयार नहीं था। सुल्तान ने (उसके राज्य से) मूर्ति पूजा को समाप्त करने के लिये अपने बहादुर सैनिकों के साथ कूच किया। काफिरों के खून से, नदी लाल हो गई और उसका पानी पीने योग्य नहीं रहा। यदि सूर्य न डूब गया होता तो और अधिक शत्रु मारे जाते। सुल्तान, इतना लूट का माल लेकर लौटा जिसका कि हिसाब लगाना असंभव है। 
(6.19). अस्नी पर आक्रमण :: जब चन्देल को सुल्तान के आक्रमण का समाचार मिला तो डर के मारे उसके प्राण सूख गये। उसके सामने साक्षात मृत्यु मुँह बाये खड़ी थी। सिवाय भागने के उसके पास दूसरा विकल्प नहीं था। सुल्तान ने आदेश दिया कि उसके पाँच दुर्गों की बुनियाद तक खोद डाली जाये। वहाँ के निवासियों को उनके मल्बे में दबा दिया अथवा गुलाम बना लिया गया। चन्देल के भाग जाने के कारण सुल्तान ने निराश होकर अपनी सेना को चान्द राय पर आक्रमण करने का आदेश दिया जो हिन्द के महान शासकों में से एक है और सरसावा दुर्ग में निवास करता था।
(6.20). सरसावा (सहारनपुर) में भयानक रक्तपात :: सुल्तान ने अपने अत्यंत धार्मिक सैनिकों को इकट्‌ठा किया और शत्रु पर तुरन्त आक्रमण करने के आदेश दिये। फलस्वरूप बड़ी सँख्या में हिन्दु मारे गये अथवा बंदी बना लिये गये। मुसलमानों ने लूट की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जब तक कि कत्ल करते-करते उनका मन नहीं भर गया। उसके बाद ही उन्होंने मुर्दों की तलाशी लेनी प्रारंभ की जो तीन दिन तक चली। लूट में सोना, चाँदी, माणिक, सच्चे मोती, जो हाथ आये जिनका मूल्य लगभग 30,00,000 (तीस लाख) दिरहम रहा होगा। गुलामों की सँख्या का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक को 2 से लेकर 10 दिरहम तक में बेचा गया। गुलामों  को गजनी ले जाया गया। दूर-दूर के देशों से व्यापारी उनको खरीदने आये। मवाराउन-नहर ईराक, खुरासान आदि मुस्लिम देश इन गुलामों से पट गये। गोरे, काले, अमीर, गरीब दासता की समान जंजीरों में बँधकर एक हो गये।
(6.21). सोमनाथ मन्दिर की लूट-खसोट (1025) :: जब महमूद सोमनाथ के विध्वंस के इरादे से भारत गया तो उसका विचार यही था कि इतने बड़े मन्दिर के टूटने पर हिन्दु, मूर्ति पूजा के विश्वास को त्यागकर मुसलमान हो जायेंगे। दिसम्बर 1025 में सोमनाथ मन्दिर का विध्वंश और लूट-खसोट हुई। हिन्दुओं ने महमूद से कहा कि वह जितना धन लेना चाहे ले ले, परन्तु मूर्ति को न तोड़े। महमूद ने कहा कि वह इतिहास में मूर्ति-भंजक के नाम से विख्यात-कुख़्यात  होना चाहता है, मूर्ति व्यापारी के नाम से नहीं। महमूद का यह ऐतिहासिक उत्तर ही यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि सोमनाथ के मंदिर को विध्वंस करने का उद्‌देश्य धार्मिक था, लोभ नहीं। मूर्ति तोड़ दी गई। दो करोड़ (2,00,00,000) दिरहम की लूट हाथ लगी, पचास हजार (50,000) हिन्दु कत्ल कर दिये गये।लूट में मिले हीरे, जवाहरातों, सच्चे मोतियों की, जिनमें कुछ अनार के बराबर थे, गजनी में प्रदर्शनी लगाई गई जिसको देखकर वहाँ के नागरिकों और दूसरे देशों के राजदूतों की आँखें फैल गई। लूट का माल 20 मील लम्बे काफिले में था जिसमें ऊँटों के ऊपर दोनों तरफ हीरे-जवाहरात भरे थे। बैलगाड़ियों में सोने-चाँदी के जेवर, बर्तन, पूजा का सामान भरा था। 
(6.22). मौहम्मद गौरी (1173-1206) :: हसन निजामी के ‘ताजुल मआसिर’ के अनुसार इस्लाम की सेना को पूरी तरह सुसज्जित कर विजय और शक्ति की पताकाओं को उड़ाता अल्लाह की सहायता पर भरोसा कर उस (मौहम्मद गौरी) ने हिन्दुस्तान की ओर प्रस्थान किया। मुस्लिम सेना ने पूर्ण विजय प्राप्त की। एक लाख हिन्दु कत्ल कर दिये गये। इस विजय के पश्चात्‌ इस्लामी सेना अजमेर की ओर बढ़ी-वहाँ इतना लूट का माल मिला कि लगता था कि पहाड़ों और समुद्रों ने अपने गुप्त खजानें खोल दिये हों। सुल्तान जब अजमेर में ठहरा तो उसने वहाँ के मूर्ति-मंदिरों की बुनियादों तक को खुदावा डाला और उनके स्थान पर मस्जिदें और मदरसें बना दिये, जहाँ इस्लाम और शरियत की शिक्षा दी जा सके।
फरिश्ता के अनुसार मौहम्मद गौरी द्वारा 4 लाख खोकर और तिराहिया हिन्दुओं को इस्लाम ग्रहण कराया गया।इब्ल-अल-असीर के द्वारा बनारस के हिन्दुओं का भयानक कत्ले आम हुआ। बच्चों और स्त्रियों को छोड़कर और कोई नहीं बक्शा गया। सब स्त्री और बच्चे गुलाम और मुसलमान बना लिये गये।
(6.23). कुतुबुद्‌दीन ऐबक (1206-1210) :: उसने 20,000 गुलाम राजा भीम से लिए थे और 50,000 गुलाम कालिंजर के राजा से लिए थे। जो नहीं माना उनकी बस्तियों की बस्तियां उजाड़ दीं। गुलामों की उस समय यह हालत हो गयी कि गरीब से गरीब मुसलमान के पास भी सैंकड़ों हिन्दु गुलाम हुआ करते थे।
सुल्तान ने कोहरान दुर्ग और समाना का शासन, कुतुबद्‌दीन को सौंप दिया, जिसने निर्दयता पूर्वक असँख्य निहत्थे हिन्दुओं को कत्ल किया और सभी मंदिर ध्वस्त कर दिए।कतुबुद्‌दीन ने दिल्ली में प्रवेश किया। नगर और उसके आस-पास के क्षेत्रों से मूर्तियाँ और मूर्ति पूजा तिरोहित हो गई और मूर्तियों के गर्भगृहों पर मुसलमानों के लिये मस्जिदें बना दी गई। 1194  में कोल (अलीगढ़) विजय के पश्चात दुर्ग के हिन्दुओं में उन कायर-नीच-डरपोक लोगों को छोड़कर जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया, शेष को कत्ल कर दिया गया। 1195 में जब गुजरात के राजा भीम पर आक्रमण हुआ तो बीस हजार (20,000) हिन्दु कैदी, मुसलमान बनाये गये। इब्न अल-असीर का कहना है कि कुतुबद्‌दीन ऐबक ने हिन्द के अनेक सूबों पर आक्रमण किये। वह हर बार कत्ले-आम करके और लूट का बहुत-सा सामान और कैदी लेकर लौटा।
(6.24). बनारस का विध्वंस :: वहाँ से शाही सेना बनारस की ओर चल पड़ी जो हिन्द देश का हदय स्थान है। बनारस में लगभग 1,000 मंदिरों को तोड़ कर उनके स्थान पर मस्जिदें खड़ी की गईं। इस्लाम और शरियत स्थापित किये गये और उनकी शिक्षा का प्रबंध किया गया।
(6.25). गुजरात में प्रवेश :: 1197 में विश्व विजयी खुसरु अजमेर से नहर वाले के राय को नष्ट करने के इरादे से पूर्ण सैन्य बल के साथ चल पड़ा। प्रातःकाल से दोपहर तक भयंकर युद्ध हुआ। हिन्दुओं  की सेना युद्ध क्षेत्र से भाग खड़ी हुई। उनके अधिकांश नेता युद्ध में काम आये। लगभग पचास हजार (50,000) हिन्दुओं को कत्ल कर दिया गया। बीस हजार 20,000) से अधिक गुलाम बना लिये गये। 20 हाथी और अनगिनत हथियार विजेताओं के हाथ लगे। ऐसा लगता था कि सम्पूर्ण विश्व के शासकों के कोषागार उनको प्राप्त हो गये हैं।
(6.26). कालिंजर का पतन :: कालिंजर का विख्यात दुर्ग जो अपनी मजबूती के लिये सिकन्दर की दीवार की भाँति विख्यात था, जीत लिया गया। मंदिरों को मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया। मूर्ति पूजा का नामोनिशान मिटा दिया गया। 50,000 हिन्दुओं के गले में गुलामी के पट्‌टे डाल दिये गये। हिन्दुओं की मृत देहों से मैदान काला दिखाई देने लगा। हाथी, पशु और बेशुमार हथियार लूट में हाथ आये। फखरुद्‌दीन मुबारक शाह के अनुसार 1202 में कालिंजर में पचास हजार (50,000) कैदी पकड़े गये। निश्चय ही जैसे-सिंध की अरब विजय के पश्चात हुआ, इन सब को, जो पकड़कर गुलाम बनाये गये, इस्लाम स्वीकार करना पड़ा। फरिश्ता तो साफ़-साफ़ लिखता है कि कालिंजर पर कब्जा हो जाने पर पचास हजार (50,000) गुलामों को इस्लाम में दीक्षित किया गया।) फलस्वरूप साधारण सिपाही अथवा गृहस्थ के पास भी कई-कई गुलाम हो गये।
(6.27). दिल्ली का शुद्धिकरण :: सुल्तान दिल्ली लौट आया। तब उसने उन मूर्ति-मंदिरों का नामोनिशान मिटा दिया, जिनके मस्तक आकाश को छूते थे। इस्लाम के सूर्य का प्रकाश दूर-दूर के मूर्ति-पूजक क्षेत्रों पर पहुँचने लगा। इसी समय कुतुबद्‌दीन ऐबक के सिपहसालार मौहम्मद बख़्तियार खिलजी इस्लाम का प्रभुत्व स्थापित करने पूर्वी भारत में घूम रहे थे। 1200 में इन्होंने बिहार के नितांत असुरक्षित विश्वविद्यालय उदन्तरी पर आक्रमण कर वहाँ के बौद्ध बिहार में रहने वाले भिक्षुओं को कत्ल कर दिया। 1202 में उन्होंने सहसा ही नदिया पर आक्रमण कर दिया। बदायुनीं की ‘मुतखबत-तवारीख’ के अनुसार अतुल संपत्ति और धन मुसलमानों के हाथ लगा। बखितयार ने पूजा स्थल और मूर्ति-मंदिरों को तोड़कर, उनके स्थान पर मस्जिदें और खानकाहें स्थापित कर दिये। ऐबक के  पश्चात  शम्शुद्दीन्  इल्तुतमिश का काल आया।
(6.28). सुल्तान इल्तुतमिश (1210-1236) :: 1231  में इल्तुतमिश ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और बड़ी सँख्या में लोगों को गुलाम बनाया। उसे जो भी मिलता उसे गुलाम बना कर, उस पर इस्लाम थोप देता था। उसके द्वारा पकड़े और गुलाम बनाये गये महाराजाओं के परिवार जनों की गिनती देना संभव नहीं है। अवध में चंदेल वंश के त्रैलोक्य वर्मन के विरुद्ध युद्ध में विजयी होने पर ‘काफिरों के सभी बच्चे, पत्नियाँ और परिवारीजन विजयी सुल्तान के हाथ पड़े। 1253 . में रणथम्भौर में और 1259  में हरियाणा और शिवालिक पहाड़ों में कम्पिल, पटियाली और भोजपुर में यही कहानी दोहराई गई। 
हिन्दु आसानी से इस्लाम ग्रहण नहीं करते थे क्योंकि अल-बेरुनी के अनुसार हिन्दु यह समझते थे कि उनके धर्म से बेहतर दूसरा धर्म नहीं है और उनकी संस्कृति और विज्ञान से बढ़कर कोई दूसरी संस्कृति और विज्ञान नहीं है।दूसरा कारण यह था जैसा कि इल्तुतमिश को उसके वजीर निजामुल मुल्क जुनैदी ने बताया था ‘इस समय हिन्दुस्तान में मुसलमान दाल में नमक के बराबर हैं। अगर जोर जबरदस्ती की गयी तो वे सब संगठित हो सकते हैं और मुसलमानों को उनको दबाना संभव नहीं होगा। जब कुछ वर्षों के बाद राजधानी में और नगरों में मुस्लिम सँख्या बढ़ जाये और मुस्लिम सेना भी अधिक हो जाये, उस समय हिन्दुओं को इस्लाम और तलवार में से एक का विकल्प देना संभव होगा। यह स्थिति तेरहवीं शताब्दी के बाद हो गयी थी और इसलिये बलात्‌ धर्मान्तरण का कार्य तेहरवीं शताब्दी के पश्चात्‌ शीघ्र गति से चला।
इल्तुतमिश ने भी भारत के इस्लामीकरण में पूरा योगदान दिया। 1234 में मालवा पर आक्रमण हुआ। वहाँ पर विदिशा का प्राचीन मंदिर नष्ट कर दिया गया। बदायुनी लिखता है  600 वर्ष पुराने इस महाकाल के मंदिर को नष्ट कर दिया गया। उसकी बुनियाद तक खुदवा कर राय विक्रमाजीत की प्रतिमा तोड़ डाली गयी। वह वहाँ से पीतल की कुछ प्रतिमाएँ उठा लाया। उनको पुरानी दिल्ली की मस्जिद के दरवाजों और सीढ़ियों पर डालकर लोगों को उन पर चलने का आदेश दिया।
500 वर्षों के मुस्लिम आक्रमणों ने हिन्दुओं को इतना दरिद्र बना दिया था कि मंदिरों में सोने की मूर्तियों के स्थान पर पीतल की मूर्तियाँ रखी जाने लगी थीं। किन्तु अभी तो अत्याचार और भी बढ़ने थे।
इल्तुतमिश के पश्चात्‌ बलबन (1265-1287) का राज्य आया। रुहेलखण्ड के कटिहार क्षेत्र केराजपूतों के प्रदेश ने कभी मुसलमानों की सत्ता स्वीकार नहीं की थी। 1287 में बलबन ने गंगा पार कर इस क्षेत्र पर आक्रमण किया। बदायुनी के अनुसार ‘दिल्ली छोड़ने के दो दिन बाद वह कटिहार पहुँचा। 7 वर्ष के ऊपर के सभी पुरुषों को कत्ल कर दिया गया। शेष स्त्री-पुरुष सभी गुलाम बना लिये गये।’
(6.29). खिलजी सुल्तान (1290-1316) :: अपने सोमनाथ की लूट के दौरान उसने काम उम्र की 20,000 लड़कियों को दासी बनाया और अपने शासन में इतने लड़के और लड़कियों को गुलाम बनाया कि उनकी गिनती कलम से लिखी नहीं जा सकती। उसने हज़ारों क़त्ल करे थे और उसके गुलमखाने में 50,000 लड़के थे और 70,000 गुलाम लगातार उसके लिए इमारतें बनाने का काम करते थे। इस समय का ज़िक्र आमिर खुसरो के लफ़्ज़ों में इस प्रकार है, "तुर्क जहाँ चाहे से उठा लेते थे और जहाँ चाहे बेच देते थे।
जब जलालुद्‌दीन खिलजी ने (1290-1296) रणथम्भौर पर चढ़ाई की तो रास्ते में झौन नामक स्थान पर उसने वहाँ के हिन्दु मंदिरों को नष्ट कर दिया। उनकी खंडित मूर्तियों को जामा मस्जिद, दिल्ली, की सीढ़ियों पर डालने के लिए भेज दिया गया जिससे वह मुसलमानों द्वारा सदैव पददलित होती रहें। किन्तु इसी जलालुद्‌दीन ने, मलिक छज्जू मुस्लिम विद्रोही को कत्ल करने से, यह कहकर इंकार कर दिया कि ‘वह एक मुसलमान का वध करने से अपनी सिहांसन छोड़ना बेहतर समझता है। दया और भातृभाव केवल मुसलमानों के लिये है। काफिर के लिये नहीं।
अलाउद्‌दीन खिलजी (1296-1316) जो जलालुद्‌दीन का भतीजा और दामाद भी था और जिसका पालन पोषण भी जलालुद्‌दीन ने पुत्रवत किया था, धोखे से, वृद्ध सुल्तान का वध कर दिल्ली की गद्‌दी पर बैठा। हिन्दुओं से लूटे हुए धन को दोनों हाथों से लुटा कर उसने जलालुद्‌दीन के विश्वस्त सरदारों को खरीद लिया अथवा कत्ल कर, दिया। जब उसकी गद्‌दी सुरक्षित हो गई तो उसका काफिरों (हिन्दुओं) के दमन और मूर्तियों को खंडित करने का धार्मिक उन्माद जोर मारने लगा। 1297 में उसने अपने भ्राता मलिक मुइजुद्‌दीन और राज्य के मुख्य आधार नसरत खाँ को, जो एक उदार और बुद्धिमान योद्धा था, गुजरात में कैम्बे (खम्भात) पर, जो आबादी और संपत्ति में भारत का विखयात नगर था, आक्रमण के लिये भेजा। चौदह हजार (14,000) घुड़सवार और बीस हजार (20,000) पैदल सैनिक उनके साथ थे।
मंजिल पर मंजिल पार करते उन्होंने खम्भात पहुँच कर प्रातःकाल ही उसे घेर लिया, जब वहाँ के काफिर निवासी सोये हुए थे। उनींदे नागरिकों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। भगदड़ में माताओं की गोद से बच्चे गिर पड़े। मुसलमान सैनिकों ने इस्लाम की खातिर उस अपवित्र भूमि में क्रूरतापूर्वक चारों ओर मारना काटना प्रारंभ कर दिया। रक्त की नदियाँ बह गई। उन्होंने इतना सोना और चाँदी लूटा जो कल्पना के बाहर है और अनगिनत हीरे, जवाहरात, सच्चे मोती, लाल और पन्ने इत्यादि। अनेक प्रकार के छपे, रंगीन, जरीदार रेशमी और सूती कपड़े।
उन्होंने बीस हजार (20,000) सुंदर युवतियों को और अनगिनत अल्पायु लड़के-लड़कियों को पकड़ लिया। संक्षेप में कहें तो उन्होंने उस प्रदेश में भीषण तबाही मचा दी। वहाँ के निवासियों का वध कर दिया उनके बच्चों को पकड़ ले गये। मंदिर वीरान हो गये। सहस्त्रों मूर्तियाँ तोड़ डाली गयीं। इनमें सबसे बड़ी और महत्त्वपूर्ण सोमनाथ की मूर्ति थी। उसके टुकड़े दिल्ली लाकर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बिछा दिये गये जिससे प्रजा इस शानदार विजय के परिणामों को देखे और याद करे। 
रणथम्भौर पर आक्रमण के लिये अलाउद्‌दीन ने स्वयं प्रस्थान किया। जुलाई 1301 में विजय प्राप्त हुई। किले के अंदर तमाम स्त्रियाँ जौहर कर चिता में प्रवेश कर गईं। उसके बाद पुरुष तलवार लेकर मुस्लिम सेना पर टूट पड़े और कत्ल कर दिये गये। सभी देवी देवताओं के मंदिर ध्वस्त कर दिये गये। 
अलाउद्‌दीन खिलजी ने दिल्ली में कुतुबमीनार से भी बड़ी मीनार बनाने का इरादा किया तो पत्थरों के लिए हिन्दुओं के मंदिरों को तुड़वा दिया गया। उस स्थान पर उन मंदिरों के पत्थरों से ही’कव्बतुल इस्लाम मस्जिद’ का निर्माण भी किया जो आज भी शासन द्वारा सुरक्षित राष्ट्रीय स्मारकों के रूप में मौजूद है।
उज्जैन में भी सभी मंदिर और मूर्तियों का यही हाल हुआ। मालवा की विजय पर हर्ष प्रकट करते हुए खुसरो लिखता है कि ‘वहाँ की भूमि हिन्दुओं के खून से तर हो गई।
चित्तौड़ के आक्रमण में अमीर खुसरो के अनुसार इस सुल्तान ने 3,000 (तीन हजार) हिन्दुओं को कत्ल करवाया। 
जो वयस्क पुरुष इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करते थे, उनको कत्ल कर देना और उन सबको, स्त्रियों और बच्चों समेत, गुलाम बना लेना साधारण नियम था। अलाउद्‌दीन खिलजी के 50,000 (पचास हजार) गुलाम थे जिनमें अधिकाँश बच्चे थे। फीरोज तुगलक के एक लाख अस्सी हजार (1,80,000) गुलाम थे।
अलाउद्‌दीन खिलजी के समय, जियाउद्‌दीन बर्नी की दिल्ली का गुलाम मंडली के विषय में की गई टिप्पणी है कि आये दिन मंडी में नये-नये गुलामों की टोलियाँ बिकने आती थीं।  
दिल्ली अकेली ऐसी मंडी नहीं थी। भारत और विदेशों में ऐसी गुलाम मंडियों की भरमार थी, जहाँ गुलाम स्त्री, पुरुष और बच्चे भेड़ बकरियों की भाँति बेचे और खरीदे जाते थे।
अलाउद्‌दीन खिलजी ही क्यों, अकबर को छोड़कर, सम्पूर्ण मुस्लिम काल में, जो हिन्दु कैदी पकड़ लिये जाते थे, उनमें से जो मुसलमान बनने से इन्कार करते थे, उन्हें बध कर दिया जाता था अथवा गुलाम बनाकर निम्न कोटि के कामों (पाखाना साफ करना इत्यादि) पर लगा दिया जाता था। शेष गुलामों को सेना ओर शासकों के बीच बाँट दिया जाता था। फालतू गुलाम मंडियों में बेंच दिये जाते थे।
जिन लोगों ने अमेरिका में गुलामों की दुर्दशा पर लिखा, विश्व विखयात उपन्यास ‘टाम काका की कुटिया’ पढ़ा होगा, उन्हें स्वप्न में भी यह विचार नहीं आया होगा कि भारत में उनके पूर्वजों के साथ भी वही पशुवत व्यवहार हुआ है। गुलामों की मंडियों में बिकने वाले परिवारी जनों के एक-दूसरे से बिछड़ने के सहस्त्रों हदय विदारक दृश्य प्रतिदिन ही देखने को मिलते रहे होंगे। पिता कहीं जा रहा है, तो पुत्र कहीं; माता कहीं और युवा पुत्री कहीं किसी के विषय भोग की जीवित लाश बनकर, जो मन भर जाने पर, उसे कहीं और बेच देगा।
(6.30). मुस्लिमों का हिन्दु राजा से विश्वासघात :: जब मलिक काफूर ने मालाबार पर आक्रमण किया तो वहाँ के यहाँ राजा के लगभग बीस हजार (20,000) मुस्लिम सैनिक थे जो लम्बे समय से दक्षिण भारत में रह रहे थे, अपने राजा से विश्वासघात कर मुस्लिम सेना में जा मिले।
विश्व इतिहास मुस्लिम सेनाओं द्वारा अपने गैर-मुस्लिम शासकों का साथ छोड़कर मुस्लिम आक्रांताओं से जा मिलने की अनेक घटनाओं से भरा पड़ा है। दाहिर की मुस्लिम सेना हो या विजयनगर की अथवा 1948 में काश्मीर की या काबुल में रूस की, उनका वह व्यवहार सामान्य है और इसके विपरीत केवल अपवाद हैं। कारण यह है कि इस्लाम एक मुसलमान को दूसरे मुसलमान का रक्त बहाने से अति कठोरतापूर्वक मना करता है।
आज के समय में देखा जाये तो आतंकवादी मुसलमानों ने सीरिया, ईरान, ईराक और पाकिस्तान में कहर वरपा रक्खा है। लाखों लोग मारे जा चुके हैं या अपने देशों को छोड़ क्र यूरोप, अमरीका आदि में शरणार्थी बन गये हैं। इनमें शामिल होकर आतंकवादी भी यूरोप में घमासान मचा रहे हैं। रूस में जब आतंकवादियों के माँ-बाप तक को मार डाला गया तभी वहाँ यह सिलसिला ठहरा। 
गुजरात में 1316 में, मुस्लिम राज्य हो गया। उसका शासक वजीहउल मुल्क धर्मान्तरित राजपूत मुस्लिम था। इस वंश ने वहाँ इस्लाम फैलाने का भयंकर प्रयास किया। अहमदशाह (1411-1442) ने बहुत लोगों का धर्मान्तरण किया। 1414 में इसने हिन्दुओं पर जिजिया कर लगाया और इतनी सख़्ती से उसकी वसूली की कि बहुत से लोग मुसलमान हो गये। यह जिजिया अकबर के काल (1573) तक जारी रहा। अहमदशाह की प्रत्येक विजय के बाद धर्मान्तरण का बोलबाला होता था। 1469 में सोरठ पर हमला किया गया और राजा के यह कहने पर कि वह राज्य कर लगातार समय से देता रहा है, महमूद बेगरा ने (1458-1511) उत्तर दिया कि ‘वह राज्य करने के लिये आया है और न लूट के लिये। वह तो सोरठ में इस्लाम स्थापित करने आया है। राजा एक वर्ष तक मुकाबला करता रहा, किन्तु अन्त में उसे इस्लाम स्वीकार करना पड़ा और उसे ‘खानेजहाँ’ का खिताब मिला। उसके साथ अवश्य ही अनगिनत लोगों को इस्लाम स्वीकार करना पड़ा होगा। 1473 में द्वारिका पर आक्रमण के समय इसी प्रकार के धर्मान्तरण हुए। चम्पानेर पर आक्रमण के समय उसके राजपूत राजा पतई ने वीरतापूर्वक युद्ध किया, किन्तु पराजित हो गये। उसने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया और बर्बरतापूर्वक उसकी हत्या कर दी गयी।1486 में उसके पुत्र को मुसलमान बनना पड़ा और उसे ‘निजामुल मुल्क’ का खिताब दिया गया। जिन्होंने कि गुजरात के इतिहास का गहन अध्ययन किया है, मुस्लिम आक्रमणकारियों की दो ही माँगे होती थीं: भूमि और स्त्रियाँ और अधिकतर वे इन दोनों को ही बलात छीन लेते थे।
(6.31). तुगलक सुल्तान :: खिलजी वंश के पतन के पश्चात्‌ तुगलकों :- ग्यासुद्‌दीन तुगलक (1320-1325), मौहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) :- इसके समय पर इतने कैदी हो गए थे कि हज़ारों की संख्या में रोज़ कौड़ियों के दाम पर बेचे जाते थे।
फ़िरोज शाह तुगलक (1351-1388) :- उसके पास 1,80,000 गुलाम थे जिसमे से 40,000 इसके महल की सुरक्षा में लगे हुए थे। इसी समय "इब्न बतूता " लिखते हैं की क़त्ल करने और गुलाम बनाने की वज़ह से गांव के गांव खाली हो गए थे। गुलाम खरीदने और बेचने के लिए खुरासान, गज़नी, कंधार, काबुल और समरकंद मुख्य मंडियां हुआ करती थीं। वहां पर इस्तांबुल, इराक और चीन से से भी गुलाम ल कर बेचे जाते थे।
उसने जब जाजनगर (उड़ीसा) पर हमला किया तो वह राज शेखर के पुत्र को पकड़ने में सफल हो गया। उसने उसको मुसलमान बनाकर उसका नाम शकर रखा।
सुल्तान फ़िरोज तुगलक अपनी जीवनी ‘फतुहाल-ए-फिरोजशाही’ में लिखता है :-"मैं प्रजा को इस्लाम स्वीकारने के लिये उत्साहित करता था। मैंने घोषणा कर दी थी कि इस्लाम स्वीकार करने वाले पर लगा जिजिया माफ़ कर दिया जायेगा।"
यह सूचना जब लोगों तक पहुँची तो लोग बड़ी सँख्या में मुसलमान बनने लगे। इस प्रकार आज के दिन तक वह चहुँ ओर से चले आ रहे हैं। इस्लाम ग्रहण करने पर उनका जिजिया माफ कर दिया जाता है और उन्हें खिलअत तथा दूसरी वस्तुएँ भेंट दी जाती है।
1360 में फिरोज़शाह तुगलक ने जगन्नाथपुरी के मंदिर को ध्वस्त किया। अपनी आत्मकथा में यह सुल्तान हिन्दु प्रजा के विरुद्ध अपने अत्याचारों का वर्णन करते हुए लिखता है :-"जगन्नाथ की मूर्ति तोड़ दी गयी और पृथ्वी पर फेंक कर अपमानित की गई। दूसरी मूर्ति खोद डाली गई और जगन्नाथ की मूर्ति के साथ मस्जिदों के सामने सुन्नियों के मार्ग में डाल दी गई जिससे वह मुस्लिमों के जूतों के नीचे रगड़ी जाती रहें।"
इस सुल्तान के आदेश थे कि जिस स्थान को भी विजय किया जाये, वहाँ जो भी कैदी पकड़े जाये; उनमें से छाँटकर सर्वोत्तम सुल्तान की सेवा के लिये भेज दिये जायें। शीघ्र ही उसके पास 18,00,000  (एक लाख अस्सी हजार) गुलाम हो गये।
उड़ीसा के मंदिरों को तोड़कर फिरोजशाह ने समुद्र में एक टापू पर आक्रमण किया। वहाँ जाजनगर से भागकर एक लाख शरणार्थी स्त्री-बच्चे इकट्‌ठे हो गये थे। इस्लाम के तलवारबाजों ने टापू को काफिरों के रक्त का प्याला बना दिया। गर्भवती स्त्रियों, बच्चों को पकड़-पकड़कर सिपाहियों का गुलाम बना दिया गया।
नगर कोट कांगड़ा में ज्वालामुखी मंदिर का यही हाल हुआ। फरिश्ता के अनुसार मूर्ति के टुकड़ों को गाय के गोश्त के साथ तोबड़ों में भरकर ब्राहमणों की गर्दनों से लटका दिया गया। मुख्य मूर्ति बतौर विजय चिन्ह के मदीना भेज दी गई। 
मौहम्मद-बिन-हामिद खानी की पुस्तक ‘तारीखे मौहमदी’ के अनुसार फीरोज तुगलक के पुत्र नसीरुद्‌दीन महमूद ने राम सुमेर पर आक्रमण करते समय सोचा कि यदि मैं सेना को सीधे-सीधे आक्रमण के आदेश दे दूँगा तो सैनिक क्षेत्र में एक भी हिन्दु को जीवित नहीं छोड़ेंगे। यदि मैं धीरे-धीरे आगे बढूँगा तो कदाचित वे इस्लाम स्वीकार करने को राजी हो जायेंगे। 
मालवा में 1454 में सुल्तान महमूद ने हाड़ा राजपूतों पर आक्रमण किया तो उसने अनेकों का वध कर दिया और उनके परिवारों को गुलाम बनाकर माँडू भेज दिया। 
ग्सासुद्‌दीन (1469-1500) का हरम हिन्दु जमींदारों और राजाओं की सुंदर गुलाम पुत्रियों से भरा हुआ था। इनकी सँख्या निजामुद्‌दीन के अनुसार 16,000 (सोलह हजार) और फ़रिश्ता के अनुसार 10,000 (दस हजार) थी। इनकी देखभाल के लिये सहस्त्रों गुलाम रहे होंगे। 
दक्खन :: प्रथम बहमनी सुल्तान अलाउद्‌दीन बहमन शाह (1347-1358) ने उत्तरी कर्नाटक के हिन्दू राजाओं पर आक्रमण किया। लूट में मंदिरों में नाचने वाली 1,000 (एक हजार) हिन्दु स्त्रियाँ हाथ आई। 
1406 में सुल्तान ताजुद्‌दीन फ़िरोज़ (1397-1422) ने विजयनगर के विरुद्ध युद्ध में वहाँ से 60,000 (साठ हजार) किद्गाोरों और बच्चों को पकड़ कर गुलाम बनाया। द्गाांति स्थापित होने पर बुक्का राजा ने दूसरी भेंटों के अतिरिक्त गाने नाचने में निपुण 2,000 (दो हजार) लड़के-लड़कियाँ भेंट में दिये 
उसका उत्तराधिकारी अहमद वली (1422-1426) विजयनगर को एक ओर से दूसरी ओर तक लोगों का कत्ले-आम करता, स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बनाता, रौंद रहा था। सभी गुलाम मुसलमान बना लिये जाते थे। सुल्तान अलाउद्‌दीन (1436-1448) ने अपने हरम में 1,000 (एक हजार) स्त्रियाँ इकट्‌ठी कर ली थीं।
बहमनी सुल्तानों और विजयनगर में लगभग 150 वर्ष तक युद्ध होता रहा तो कितने कत्ल हुये, कितनी स्त्रियाँ और बच्चे गुलाम बनाये गये और कितनों का बलात्‌ धर्मान्तरण किया, गया उसका हिसाब लगाना कठिन हो जाता है। 
बंगाल :: बंगाल के डरपोक लोगों को तलवार के बल पर 13 वीं-14 वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर मुसलमान बनाने का श्रेय (इस्लाम के) जोशीले सिपाहियों को जाता है जिन्होंने पूर्वी सीमाओं तक घने जंगलों में पैठ कर वहाँ इस्लाम के झंडे गाड़ दिये। लोकोक्ति के अनुसार, इनमें सबसे अधिक सफल थे; आदम शहीद, शाह जलाल मौहम्मद और कर्मफरमा साहब। सिलहट के शाह जलाल द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को मुसलमान बनाया गया। इस्माइल गाजी ने हिन्दु राजा को पराजित कर बड़ी सँख्या में हिन्दुओं का धर्मान्तरण किया  इन नामों के साथ जुड़े ‘गाजी’ (हिन्दुओं को कत्ल करने वाला) और ‘शहीद’ (धर्म युद्ध में हिन्दुओं द्वारा मारे जाने वाला) शब्द से ही उनके उत्साह का अनुमान किया जा सकता है। लोकगाथाओं के अनुसार मौहम्मद इस्माइल शाह ‘गाजी’ ने हुगली के हिन्दु राजा को पराजित कर दिया और लोगों का बलात्‌ धर्मान्तरण किया। मुर्शिद कुली खाँ का नियम था कि जो भी किसान अथवा जमींदार लगान न दे सके उसको परिवार सहित मुसलमान होना पड़ता था। 
(6.32).  तैमूर लंग-शैतान (1398-99) ::  उसने दिल्ली पर हमले के दौरान 1,00,000 गुलामों को मौत के घाट उतरने के पश्चात, 2 से ढ़ाई लाख कारीगर गुलाम बना कर समरकंद और मध्य एशिया ले गया।
1399 में तैमूर का भारत पर भयानक आक्रमण हुआ। अपनी जीवनी ‘तुजुके तैमुरी’ में वह कुरान की इस आयत से ही प्रारंभ करता है ‘ऐ पैगम्बर काफिरों और विश्वास न लाने वालों से युद्ध करो और उन पर सख़्ती बरतो।’ वह आगे भारत पर अपने आक्रमण का कारण बताते हुए लिखता है।
‘हिन्दुस्तान पर आक्रमण करने का मेरा ध्येय काफिर हिन्दुओं के विरुद्ध धार्मिक युद्ध करना है (जिससे) इस्लाम की सेना को भी हिन्दुओं की दौलत और मूल्यवान वस्तुएँ मिल जायें। 
कश्मीर की सीमा पर कटोर नामी दुर्ग पर आक्रमण हुआ। उसने तमाम पुरुषों को कत्ल और स्त्रियों और बच्चों को कैद करने का आदेश दिया। फिर उन हठी काफिरों के सिरों के मीनार खड़े करने के आदेश दिये। फिर भटनेर के दुर्ग पर घेरा डाला गया। वहाँ के राजपूतों ने कुछ युद्ध के बाद हार मान ली और उन्हें क्षमादान दे दिया गया। किन्तु उनके असवाधान होते ही उन पर आक्रमण कर दिया गया। तैमूर अपनी जीवनी में लिखता है कि ‘थोड़े ही समय में दुर्ग के तमाम लोग तलवार के घाट उतार दिये गये। घंटे भर में 10,000 (दस हजार) लोगों के सिर काटे गये। इस्लाम की तलवार ने काफिरों के रक्त में स्नान किया। उनके साज़ो-सामान, खजाने और अनाज को भी, जो वर्षों से दुर्ग में इकट्‌ठा किया गया था, मेरे सिपाहियों ने लूट लिया। मकानों में आग लगा कर राख कर दिया। इमारतों और दुर्ग को भूमिसात कर दिया गया। 
दूसरा नगर सरसुती था जिस पर आक्रमण हुआ। ‘सभी हिन्दु कत्ल कर दिये गये। उनके स्त्री और बच्चे और संपत्ति लूट ली गई। तैमूर ने जब जाटों के प्रदेश में प्रवेश किया। उसने अपनी सेना को आदेश दिया कि ‘जो भी मिल जाये, कत्ल कर दिया जाये।’ और फिर सेना के सामने जो भी ग्राम या नगर आया, उसे लूटा गया।पुरुषों को कत्ल कर दिया गया और कुछ लोगों, स्त्रियों और बच्चों को बंदी बना लिया गया।
दिल्ली के पास लोनी  हिन्दु नगर था। किन्तु कुछ मुसलमान भी बंदियों में थे। तैमूर ने आदेश दिया कि मुसलमानों को छोड़कर शेष सभी हिन्दु बंदी इस्लाम की तलवार के घाट उतार दिये जायें। इस समय तक उसके पास हिन्दु बंदियों की सँख्या एक लाख हो गयी थी। जब यमुना पार कर दिल्ली पर आक्रमण की तैयारी हो रही थी उसके साथ के अमीरों ने उससे कहा कि इन बंदियों को कैम्प में नहीं छोड़ा जा सकता और इन इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र कर देना भी युद्ध के नियमों के विरुद्ध होगा। तैमूर लिखता है :-
‘इसलिये उन लोगों को सिवाय तलवार का भोजन बनाने के कोई मार्ग नहीं था। मैंने कैम्प में घोषणा करवा दी कि तमाम बंदी कत्ल कर दिये जायें और इस आदेश के पालन में जो भी लापरवाही करे उसे भी कत्ल कर दिया जाये और उसकी सम्पत्ति सूचना देने वाले को दे दी जाये। जब इस्लाम के गाजियों (काफिरों का कत्ल करने वालों को आदर सूचक नाम) को यह आदेश मिला तो उन्होंने तलवारें सूत लीं और अपने बंदियों को कत्ल कर दिया। उस दिन एक लाख अपवित्र मूर्ति-पूजक काफिर कत्ल कर दिये गये। 
तुगलक बादशाह को हराकर तैमूर ने दिल्ली में प्रवेश किया। उसे पता लगा कि आस-पास के देहातों से भागकर हिन्दुओं ने बड़ी सँख्या में अपने स्त्री-बच्चों तथा मूल्यवान वस्तुओं के साथ दिल्ली में शरण ली हुई हैं। उसने अपने सिपाहियों को इन हिन्दुओं को उनकी संपत्ति समेत पकड़ लेने के आदेश दिये।
‘तुजुके तैमुरी’ बताती है कि ‘उनमें से बहुत से हिन्दुओं ने तलवारें निकाल लीं और विरोध किया। जहाँपनाह और सीरी से पुरानी देहली तक विद्रोहाग्नि की लपटें फैल गई। हिन्दुओं ने अपने घरों में लगा दी और अपनी स्त्रियों और बच्चों को उसमें भस्म कर युद्ध करने के लिए निकल पड़े और मारे गये। उस पूरे दिन वृहस्पतिवार को और अगले दिन शुक्रवार की सुबह मेरी तमाम सेना शहर में घुस गई और सिवाय कत्ल करने, लूटने और बंदी बनाने के उसे कुछ और नहीं सूझा। द्गानिवार 17 तारीख भी इसी प्रकार व्यतीत हुई और लूट इतनी हुई कि हर सिपाही के भाग में 80 से 100 बंदी आये जिनमें आदमी और बच्चे सभी थे। फौज में ऐसा कोई व्यक्ति न था जिसको 20 से कम गुलाम मिले हों। लूट का दूसरा सामान भी अतुलित था-लाल, हीरे,मोती, दूसरे जवाहरात, अद्गारफियाँ, सोने, चाँदी के सिक्के, सोने, चाँदी के बर्तन, रेशम और जरीदार कपड़े। स्त्रियों के सोने चाँदी के गहनों की कोई गिनती संभव नहीं थी। सैयदों, उलेमाओं और दूसरे मुसलमानों के घरों को छोड़कर शेष सभी नगर ध्वस्त कर दिया गया।’ दया और भ्रातृत्व केवल मुसलमानों के लिये है। 
(6.33). दूसरे सुल्तान :: दिल्ली के सुल्तानों की हिन्दू प्रजा पर अत्याचारों में यदि कोई कमी रह गई थी तो सूबों के मुस्लिम गवर्नर उसे पूरी कर देते थे।
(6.34). 1392 में गुजरात के सूबेदार मुजफ्फरशाह ने नवनिर्मित सोमनाथ के मंदिर को तुड़वा दिया और उसके स्थान पर मस्जिद बनवाई। बहुत से हिन्दू मारे गये। हिन्दुओं ने फिर नया मंदिर बनाया। 1401 में मुजफ्फर फिर आया। मंदिर तोड़कर दूसरी मस्जिद बनाई गई। 1401 में उसके पोते अहमद ने, जो उसके बाद गद्‌दी पर बैठा था, एक दरोगा इसी काम के लिए नियुक्त किया कि वह गुजरात के सभी मंदिरों को ध्वस्त कर डाले। हिन्दु मंदिर बनाते रहते थे और मुसलमान तोड़ते रहते थे।
(6.35). 1415 में अहमद ने सिद्धपुर पर आक्रमण किया। रुद्र महालय की मूर्ति तोड़कर उस मंदिर के स्थान पर मस्जिद खड़ी की। 1415 में गुजरात के सुल्तान महमूद बघरा ने इन सभी से बाजी मार ली। उसके अधीन जूनागढ़ का राजा मंदालिका था जिसने कभी भी सुल्तान को निश्चित कर देने में ढील नहीं की थी। फिर 1469 भी  में बघरा ने जूनागढ़ पर आक्रमण कर दिया। जब मंदालिका ने उससे कहा कि वह अपना निश्चित कर नियमित रूप से देता रहा है तो उसने उत्तर दिया कि उसे धन प्राप्ति में इतनी रुचि नहीं है जितनी कि इस्लाम के प्रसार में है। मंदालिका को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया। 1472 में महमूद ने द्वारिका पर आक्रमण किया। मंदिर तोड़ा और शहर लूटा। चंपानेर का शासक जयसिंह और उसका मंत्री इस्लाम कुबूल न करने पर कत्ल कर दिये गये।
बंगाल के इलियास शाह ने  नेपाल पर आक्रमण (1331-1379) कर स्वयम्भूनाथ का मंदिर ध्वस्त किया। उड़ीसा में बहुत से मंदिर तुड़वाये और लूटपाट की।
(6.36). गुलबर्ग और बीदर के बहमनी सुल्तान प्रति वर्ष एक लाख हिन्दु पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों का वध करना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते थे। दक्षिण भारत क अनेक मंदिर उनके द्वारा ध्वस्त कर दिये गये। इस प्रकार के खुले अत्याचारों से उत्पन्न भयानक आतंक से कितने हिन्दु शीघ्रतिशीघ्र मुसलमान हो गये होंगे, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
(6.37). काश्मीर का इस्लामीकरण :: कश्मीर का प्रभावी इस्लामीकरण सुहादेव (1301-1320)  के राज्य काल से प्रारंभ हुआ। भारतवर्ष ने सदैव उत्पीड़ित शरणार्थियों को शरण दी है। धर्म के नाम पर कभी आगन्तुकों से भेद-भाव नहीं किया। पारसियों और यहूदियों ने हिन्दु भारत के इस आतिथ्य का दुरूपयोग नहीं किया। परन्तु मुसलमानों ने समय पड़ने पर इस्लाम की काफिर और कुफ्र विरोधी नीति के कारण एक दो अपवादों को छोड़ कर सदैव ऐसी नीति अपनाई जिससे भारत में इस्लाम की विजय हो और कुफ्र का नाश। काश्मीर भी इस नीति का शिकार बना।
1313 में शाहमीर नामक एक मुसलमान सपरिवार कश्मीर में आकर बसा। शाहमीर को हिन्दु राजा ने अपनी सेवा में नियुक्त कर उसे अंदर कोट का चार्ज सौंप दिया। लगता है कि यह परिवार पहले हिन्दु था।
इसी समय में जब काद्गमीर पर दुलाचा नामक मंगोल का भयानक आक्रमण हो चुका था, लद्‌दाख के एक बौद्ध राजकुमार रिनछाना ने लद्‌दाख से आकर अस्त-व्यस्त काद्गमीर पर कब्जा कर लिया। राजासुहादेव भय के मारे किश्तवार भाग गया। रिनछाना ने कश्मीर में शांति स्थापित कर दी।
बौद्ध रिनछाना हिन्दु बहुत काश्मीर के हिन्दु प्रजाजनों से अच्छे संबंध बनाने के लिये हिन्दु मत स्वीकार करना चाहता था, परन्तु देव स्वामी नामक मुख्य पुरोहित के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका। हिन्दुओं से निराश होकर मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिये उसने शाहमीर के समझाने-बुझाने से इस्लाम ग्रहण कर लिया।
रिनछाना की मृत्यु के पश्चात  अनेक षडयंत्र रच कर शाहमीर ने गद्‌दी हथिया ली और सुल्तान शम्सुद्‌दीन के नाम से 1331 में सिंहासन पर बैठा। सिंहासन पर बैठते ही उसने कश्मीर में सुन्नी मुस्लिम सिद्धांतों का प्रचार प्रारंभ कर दिया। 1342 में शम्सुद्‌दीन की मृत्यु हो गई और उसके दोनों पुत्रों में झगड़े प्रारंभ हो गये। बड़े पुत्र जमशेद ने 1342-1344 तक राज्य किया और 1344 में उसका छोटा भाई अलीशेर सुल्तान अलाउद्‌दीन के नाम से राज्य सिंहासन पर बैठा। उसने काश्मीर में गिरते नैतिक चरित्र की रोकथाम की, अनेक नये क्षेत्र वियज किये। 1355 में सुल्तान अलाउद्‌दीन की मृत्यु के पश्चात्‌, उसका पुत्र सुल्तान शिहाबुद्‌दीन (1355-1373) गद्‌दी पर बैठा। उसने दंगा फसाद करने वालों को सख्ती से कुचल दिया।
सुल्तान शिहाबुद्‌दीन की मृत्यु के पश्चात्‌ उसका भाई हिन्दाल सुल्तान कुतुबुद्‌दीन के नाम से गद्‌दी पर बैठा।अब तक अनेक विदेशों से भाग कर आये सैयदों ने काश्मीर में शरण ले ली थी। उन्होंने मुगलों तथा तैमूर के आतंक एवं उत्पीड़न के कारण कश्मीर में प्रवेश किया था। उस समय फारस, ईराक, तुर्किस्तान, अफ़गानिस्तान और भारत में अराजकता थी। काश्मीर में शांति थी। हिन्दु राज्यकाल में धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों में निरपेक्ष नीति के कारण वे काश्मीर में आबाद हो गये। उन्होंने अपने और साथियों को बुलाया। सैयदों की सँख्या बढ़ती गयी।
सैयद राजनीति में सक्रिय भाग लेते थे। वे सुल्तानों से विवाह संबंधी बनाकर, काश्मीर के कुलीन समाज में उच्चे स्थान प्राप्त करते गये। उनका प्रभाव बढ़ता गया। उन्होंने सुल्तानों पर नियंत्रण प्रारंभ किया। विदेशी सैयदों के प्रभाव एवं प्रोत्साहन पर हिन्दुओं पर अत्याचार हुए। उन्हें मुसलमान बनाने की सुनिद्गिचत योजना बनायी गई। सैयदों ने इसमें सक्रिय भाग लिया। सभी साधनों का प्रयोग काश्मीर के इस्लामीकरण में किया गया।
फलस्वरूप सुल्तान कुत्बुद्‌दीन (1373-1389) के राज्य काल में इस्लाम का बहुत प्रसार हुआ। इसके समय में ही सैयद अली हमदानी नामी सूफी ईरान से वहाँ आया। इसके प्रभाव में आकर सुल्तान ने हिन्दुओं के धर्मान्तरण में बड़ी रुचि ली। सादात लिखित ‘बुलबुलशाह’ के अनुसार इस सूफी के प्रभाव से 37,000 (सैंतीस हजार) मुसलमान बने।
कुत्बुद्‌दीन के पुत्र सिकन्दर बुतशिकन ने (1389-1413) विदेशी सूफी मीर अली हमदानी, सहभट्‌ट सैयदों तथा मूसा रैना ने इराक देशीय मीर शमशुद्‌दीन की प्रेरणा पर हिन्दुओं पर अत्याचार एवं उत्पीड़न किया। सिकन्दर बुतशिकन के समय समस्त प्रतिमाएँ भंग कर दी गयी थी। हिन्दु जबर्दस्ती मुसलमान बना लिये गये थे। इस सुल्तान के विषय में कल्हण ‘राज तरंगिणी’ में लिखता है :- ‘सुल्तान अपने तमाम राजसी कर्तव्यों को भुलाकर दिन रात मूर्तियों तोड़ने का आनंद उठाता रहता था। उसने मार्तण्ड, विद्गणु, ईशन, चक्रवर्ती और त्रिपुरेश्वर की मूर्तियाँ तोड़ डाली। कोई भी बन, ग्राम, नगर तथा महानगर ऐसा न था जहाँ तुरुश्क और उसके मंत्री सुहा ने देव मंदिर तोड़ने से छोड़ दिये हों।’ सुहा हिन्दु था जो मुसलमान हो गया था।
सिकन्दर के पश्चात्‌ उसका पुत्र मीरखां अली शाह के नाम से गद्‌दी पर बैठा।
(6.38). अलीशाह (1413-1420) :: सिकन्दर के प्रधानमंत्री सुहा ने इस सुल्तान के समय ब्राहमणों पर फिर अत्याचार प्रारंभ कर दिये। उनके धार्मिक अनुष्ठान और शोभा यात्राओं पर पाबंदी लगा दी। ब्राह्मण इतने दरिद्र हो गये कि उनको कुत्तों की तरह भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ने लगा। अपने धर्म की रक्षा और अत्याचार से बचने के लिए बहुतों ने कश्मीर से भागने के प्रयास किये।
कहा गया है कि कश्मीर में केवल 11 (ग्यारह) ब्राह्मण परिवार ही बच पाये जो राज्य सहमति के अभाव में भाग नहीं सके। उनमें से बहुतों ने आग में कूदकर, विष द्वारा व फांसी लगाकर अथवा पहाड़ से कूदकर आत्महत्या कर ली। सुहा का कहना था कि वह तो केवल इस्लाम के प्रति अपनी कर्तव्य निभा रहा था।
(6.39). शेरशाह सूरी (1540-1545) :: यह सत्य है कि यह बादशाह विशेष रूप से हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिए नहीं निकलता था किन्तु अवसर पड़ने पर उसका व्यवहार इस विषय में दूसरे मुस्लिम सुल्तानों से भिन्न नहीं था। अवसर आने पर उसने इस्लाम को शिकायत का मौका नहीं दिया।
द्गोख नुरुल हक ‘जुवादुतुल-तवारीख’ में कहता है कि 950 हिजरी में पूरनमल रायसेन दुर्ग का स्वामी था। उसके हरम में 1,000 स्त्रियाँ थीं। उनमें कुछ मुसलमान भी थीं। शेर खाँ ने इस पर मुसलमानी क्षोभ के कारण दुर्ग को विजय करने का निश्चय किया। किन्तु जब कुछ समय तक यह संभव न हो सका तो पूरनमल के साथ संधि कर ली। उसके पश्चात्‌ उसके पूरे कैम्प को (जो संधि के कारण बेखबर था) हाथियों द्वारा घेर लिया गया। राजपूतों ने अपनी स्त्रियों और बच्चों को आग में झोंक दिया और प्रत्येक पुरुष युद्ध करते मारा गया। 
बलबन (1250-60) ::  उसने एक राजाज्ञा निकल दी थी अनुसार 8 वर्ष से ऊपर का कोई भी आदमी मिले उसे मौत के घाट उत्तर दो। महिलाओं और वो गुलाम बना लिया करता था। उसने भी शहर के शहर खाली कर दिए।
सैय्यद वंश (1400-1451) ::  हिन्दुओं के लिए कुछ नहीं बदला, इसने कटिहार ,मालवा और अलवर को लूटा और जो पकड़ में आया उसे या तो मार दिया या गुलाम बना लिया।
लोधी वंश (1451-1525) :: उसके सुल्तान बहलूल ने नीम सार से हिन्दुओं का पूरी तरह से वंशनाश कर दिया और उसके बेटे सिकंदर लोधी ने यही हाल रीवां और ग्वालियर का किया।
फर्रुख्सियार (1713-1719) ::  उसने गुरदास पुर मेंहज़ारूं सिखों को मारा और गुलाम बनाया था।
नादिर शाह 1738 भारत आया और 2,00,000 लोगों को मौत के घाट उतार कर हज़ारों सुन्दर लड़कियों को और बेशुमार दौलत लेकर चला गया।
अहमद शाह अब्दाली (1757-1761) :: पानीपत की लड़ाई में मराठों युद्ध के दौरान हज़ारों लोग मरे और एक बार में यह 22,000 लोगों को गुलाम बना कर ले गया था।
टीपू सुल्तान (1750-1799 ) :: उसने त्रावणकोर के युद्ध में 10,000 हिन्दु और ईसाईयों को मारा था। कुर्ग में रहने वाले 70,000 हिन्दुओं को इसने मुसलमान बनाया था। उसके शासनकाल में गुलाम हिन्दु चाहे मूसलमान बने या नहीं,उन्हें नीचा दिखने के लिए उनसे अस्तबलों का, हाथियों को रखने का, सिपाहियों के सेवक होने का और बेइज़्ज़त करने के लिए साफ सफाई करने के काम दिए जाते थे। जो गुलाम नहीं भी बने उच्च वर्ण के लोग वैसे ही सब कुछ लूटा कर, अपना धर्म न छोड़ने के फेर में जजिया और तमाम तरीके के कर चुकाते-चुकाते समाज में वैसे ही नीचे की पायदान पर पहुँच गए। जो आतताइयों से जान बचा कर जंगलों में भाग गए जिन्दा रहने के उन्होंने मांसाहार खाना शुरू कर दिया और जैसी की प्रथा थी,अछूत घोषित हो गए।
(6.40). अरब के एक प्रमुख कुरेश कबीले के मुखिया अबूसुफियान इब्न हरब को जबरदस्ती मुसलमान बनाना :: मुहम्मद ने मक्का पर युद्ध करने के लिए मुसलमान जिहादियों-लुटेरों की एक बड़ी फौज तैयार की थी। मोहम्मद और उसके मुसलमान जिहादियों द्वारा मक्का के व्यापारियों के ऊँटों के कारवाँ की लूटने की कार्यवाही की वजह से शहर की अर्थव्यवस्था चरमरा गई थी। इस वजह से लड़ने की इच्छा न होने कारण मक्का का कबीलायी मुखिया अबूसुफियान युद्ध को रोकने के लिए मोहम्मद के चाचा अल-अब्बास इब्न अबद अल-मुत्तालीब से मदद माँगने गया। अल-अब्बास इब्न ने अबूसुफियान से कहा कि मोहम्मद उसे मार डालेगा। अबूसुफियान ने मरने से बचने का उपाय पूछा। अल-अब्बास इब्न, अबूसुफियान को संधी करवाने के लिए मोहम्मद के पास ले गया जहाँ पर उसे पहुँचते ही बंदी बना लिया गया। मोहम्मद का जिहादी साथी उमर इब्न अल-खताब, अबूसुफियान को मारने के लिए दौड़ा चला आया तो अल-अब्बास इब्न ने उसको रोका। रात में अबूसुफियान को काल कोठरी में रखा गया अौर उसे अनेक यातनायें दी गईं तथा अगले दिन सुबह उसे मोहम्मद के सामने पेश किया गया।
मुहम्मद ने अबूसुफियान से कहा कि अगर उसने अल्लाह को ख़ुदा और उसे अल्लाह का सच्चा पैगम्बर नहीं माना तो उसका सर कलम कर के मक्का किले के दरवाजे पर लटका दिया जायेगा। अबूसुफियान ने अल्लाह को तो माना परन्तु पैगम्बर की सत्यता पर मौन धारण कर लिया। मोहम्मद और अल-अब्बास इब्न ने मिलके अबूसुफियान को धमका कर उससे यह बात मनवायी। आखिरकार अबूसुफ़ियान ने मजबूर होकर मोहम्मद को पैगम्बर माना लिया और मजबूरी में ही इस्लाम ग्रहण किया। अल-अब्बास इब्न ने मोहम्मद से कहा कि अबूसुफ़ियान को मुसलिम जिहादी सेना में कोई पदाधिकार दिया जाये ताकि उसका मुसलमानों में सम्मान हो। मुहम्मद ने उसको इस इच्छा को सम्मान दिया कि जो कोई भी अबूसुफ़ियान के घर में दाखिल हो उसकी जान बख्शी जाए, उसे मारा न जाय; यानी कि जो कोई इसलाम कुबूल करे उसे बख़्श दिया जाये। अल-अब्बास इब्न ने अबूसुफियान को रास्ते के किनारे पर खड़ा किया ताकि सब मुसलमान जिहादियों को इस्लाम की ताकत को दिखा सके और वे फिर कभी इस्लाम से मुँह ना मोड़ें। मोहम्मद ने अबूसुफ़ियान के हाथ बाकी कुरेशियों को भी यह चेतावनी दी कि अगर उन्होंने इस्लाम को कुबूल नहीं किया तो उन्हें मार दिया जायेगा और उनकी औरतों व बच्चों को गुलाम बना लिया जायेगा।यह वाकिया तवारीख़ अम्बिया सफा 354-355 सन् 1281 हिजरी और ऐसा ही  हुसैनी जिल्द एक सूरे तोबा सफा 360 में दर्ज़ है। यह विश्वासघात, लूटमार, कत्लेआम, जुल्मों-सितम, अत्याचार, बलात्कार की कहानी है। 
(6.41). बंगाल :: पंद्रहवीं शताब्दी में सुबुद्धि राय गौड़ नवद्वीप (नादिया ज़िला), पश्चिम बंगाल के शासक थे। उनके यहाँ अलाउद्दीन हुसैनशाह नामक एक पठान नौकर था। राजा सुबुद्धिराय ने किसी राजकाज को सम्पादित करने के लिए उसे रुपया दिया। हुसैनख़ाँ ने वह रकम खा पीकर बराबर कर दी। राजा सुबुद्धिराय को जब यह पता चला तो उन्होंने दंड स्वरूप हुसैन ख़ाँ की पीठ पर कोड़े लगवाये। हुसैन ख़ाँ चिढ़ गया। उसने षड्यन्त्र रच कर राजा सुबुद्धिराय को हटा दिया। अब हुसैन ख़ाँ पठान गौड़ का राजा था और सुबुद्धि राय उसका कैदी। हुसैन ख़ाँ की पत्नी ने अपने पति से कहा कि पुराने अपमान का बदला लेने के लिए राजा को मार डालो। परन्तु हुसैन ख़ाँ ने ऐसा न किया। वह बहुत ही धूर्त था, उसने राजा को जबरदस्ती मुसलमान के हाथ से पकाया और लाया हुआ भोजन करने पर बाध्य किया। वह जानता था कि इसके बाद कोई भी नासमझ हिन्दु सुबुद्धि राय को अपने समाज में शामिल नहीं करेगा। इस प्रकार सुबुद्धि राय को जीवन्मृत ढंग से अपमान भरे दिन बिताने के लिए एकदम मुक्त छोड़कर हुसैन ख़ाँ, हुसैन शाह बन गया। 
इसके बाद तो फिर किसी हिन्दु राज-रजवाड़े में चूँ तक करने का साहस नहीं रह गया था। वे साधारण से साधारण मुसलमान से भी घबराने लगे। फिर भी हारे हुए लोगों के मन में दिन-रात साँप लोटते ही रहा करते थे। निरन्तर यत्र-तत्र विस्फोट हुआ ही करते थे। इसीलिए राजा और प्रजा में प्रबल रूप से एक सन्देहों भरा नाता पनप गया। सन 1480 के लगभग नदिया (नवद्वीप) के दुर्भाग्य से हुसैन शाह के कानों में बार-बार यह भनक पड़ी कि नदिया के ब्राह्मण अपने जन्तर-मन्तर से हुसैन शाह का तख्ता पलटने के लिए कोई बड़ा भारी अनुष्ठान कर रहे हैं। सुनते-सुनते एक दिन हुसैन शाह चिढ़ गया। उसने एक प्रबल मुसलमान सेना नदिया का धर्म तेज नष्ट करने के लिए भेज दी। नदिया और उसके आस-पास ब्राह्मण के गाँव के गाँव घेर लिये गये। उन्होंने उन पर अवर्णनीय अत्याचार किये। उसके मन्दिर, पुस्तकालय और सारे धार्मिक एवं ज्ञान-मूलक संस्कारों के चिह्न मिटाने आरम्भ किये। स्त्रियों का सतीत्व भंग किया। परम पूज्य एवं प्रतिष्ठित ब्राह्मणों की शिखाएँ पकड़-पकड़ कर उन पर लातें जमाईं, थूका; तरह-तरह से अपमानित किया। हुसैन शाह की सेना ने झुण्ड के झुण्ड ब्राह्मण परिवारों को एक साथ कलमा पढ़ने पर मजबूर किया। बच्चे से लेकर बूढ़े तक नर-नारी को होठों से निषिद्ध मांस का स्पर्श कराकर उन्हें पुनः हिन्दु धर्म में पुनः प्रवेश करने लायक़ न रखा। नदिया के अनेक महा पंडित, बड़े-बड़े विद्वान समय रहते हुए सौभाग्य वश इधर-उधर भाग गये। परिवार बँट गये, कोई कहीं, कोई कहीं। 


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