Friday, May 22, 2015

SCIENCE IN THE SCRIPTURES हिन्दू धर्म शास्त्र में विज्ञान

SCIENCE IN THE SCRIPTURES  हिन्दू धर्म शास्त्र में विज्ञान
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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ELECTRICITY ::
ऋषि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता नामक ग्रंथ की रचना की। इस ग्रंथ में धारा विद्-युत ऊर्जा संबंधित सूत्र निम्न है :: 
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌। छादयेच्छिखिग्रीवेन चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:। संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥[अगस्त्य संहिता]
Photoएक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury‌) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे या सोने या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।
TYPES OF MOTION :: वैशेषिक दर्शन में गति के लिए कर्म शब्द प्रयुक्त किया है। इसके 5 प्रकार हैं :-
(1). उत्क्षेपण (upward motion),
(2). अवक्षेपण (downward motion),
(3). आकुञ्चन (Motion due to the release of tensile stress),
(4). प्रसारण (Shearing motion),
(5). गमन (General Type of motion),
विभिन्न कर्म या motion को उसके कारण के आधार पर जानने का विश्लेषण वैशेषिक में किया है।
(1). नोदन के कारण-लगातार दबाव,
(2). प्रयत्न के कारण- जैसे हाथ हिलाना,
(3). गुरुत्व के कारण-कोई वस्तु नीचे गिरती है,
(4). द्रवत्व के कारण-सूक्ष्म कणों के प्रवाह से। 
LAWS OF MOTION :: महर्षि प्रशस्तपाद "वेगो पञ्चसु द्रव्येषु निमित्त-विशेषापेक्षात्‌ कर्मणो जायते नियतदिक्‌ क्रिया प्रबंध हेतु: स्पर्शवद्‌ द्रव्यसंयोग विशेष विरोधी क्वचित्‌ कारण गुण पूर्ण क्रमेणोत्पद्यते।"
वेग पांचों द्रव्यों (ठोस, द्रव्य-तरल, गैसीय तथा इनके अलावा दो अन्य अवस्थाएं हैं, जिनका वर्तमान विज्ञान वर्णन नहीं करता। Fire and Plasma have been identified as two states of matter after solid, liquid and gases.) पर निमित्त व विशेष कर्म के कारण उत्पन्न होता है तथा नियमित दिशा में क्रिया होने के कारण संयोग विशेष से नष्ट होता है या उत्पन्न होता है।
प्रशस्तिपाद द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त नियम को तीन भागों में विभाजित करें तो न्यूटन के गति  नियम बनते हैं। 
(1). वेग: निमित्तविशेषात्‌ कर्मणो जायते। (The change of motion is due to impressed force.)  
(2). वेग निमित्तापेक्षात्‌ कर्मणो जायते नियत्दिक्‌ क्रिया प्रबंध हेतु। (The change of motion is proportional to the motive force impressed and is made in the direction of the right line in which the force is impressed)
(3). वेग: संयोगविशेषाविरोधी। (To every action there is always an equal and opposite reaction.)
PLANETARY MOTION :: 
Savita Yantraih Prithiveem Aramnaat Dyaam Andahat Atoorte Baddham Ashwam Iv Adhukshat (Rig Ved 10.149.1) :: The sun has tied Earth and other planets through attraction and moves them around itself as if a trainer moves newly trained horses around itself holding their reins.
Savita-Sun, Yantraih-through reins, Prithiveem-Earth, Aramnaat-Ties, Dyaam Andahat-Other planets in sky as well, Atoorte-Unbreakable, Baddham-Holds, Ashwam Iv Adhukshat-Like horses.
The Sun is center of the solar system and planets (including earth) move in a closed loop-elliptical path around it.
Yada Te Haryataa Hari Vaavridhate Divedive Vishwa Bhuvani Aditte Yemire. (Rig Ved 8.12.28)
All planets remain stable because as they come closer to Sun due to attraction, their speed on coming closer increases proportionately.
Yada Te-When they, Haryataa-Come closer through attraction, Hari-Closeness, Vavridhate-Increases proportionately, Divedive-continuously, Vishw Bhuvani-planets of the world, Aditte-eventually, Yemire-remain stable.
(1).  Motion of planets around the Sun is not circular, even though Sun is the central force (lying at the focus) causing planets to move.
(2). The motion of planets is such that  Velocity of planets is in inverse relation with the distance between planet and Sun.
O God, You have created this Sun. You possess infinite power. You are upholding the Sun and other spheres and render them steadfast by your power of attraction. (Rig Ved 1.6.5, Rig Ved 8.12.30)
The Sun moves in its own orbit but holding earth and other heavenly bodies in a manner that they do not collide with each other through force of attraction. (Rig Ved 1.35.9)
Sun is heavier of all planets and so, holds all other planets in his orbit.
(Rig Ved 1.164.13)
Sun moves in its orbit which itself is moving. Earth and other bodies move around Sun due to force of attraction, because Sun is heavier than them.
The Sun has held the earth and other planets. (Atharv Ved 4.11.1)
Sun is heavier of all planets.
Moon does not have light of his own and Moon light is gift of Sun to Moon. (Rig Ved 1.84.15)
The moving Moon always receives a ray of light from Sun.
Moon decided to marry. Day and Night attended its wedding and Sun gifted his daughter Sun ray to Moon. (Rig Ved 10.85.9)
O Sun! When you are blocked by the one whom you gifted your own light (Moon) and then earth gets scared by sudden darkness. (Rig Ved 5.40.5)
Velocity of planets is inversely related to distance from Sun. (Rig Ved verse 8.12.28)
Kepler's Laws are merely interpretation based on the text given in the Veds, Purans, scriptures.
(1). The Law of Orbits: All planets move in elliptical orbits, with the Sun at one of their foci.
(2). The Law of Areas: A line that connects a planet to the Sun sweeps out equal areas in equal intervals of time.
(3). The Law of Periods: The square of the period of any planet is proportional to the cube of the semi major axis of its orbit.
Kepler's laws were derived for orbits around the Sun, but they apply to satellite orbits as well.
Those who are aware of Astrology know it very very clearly that the description of constellations, galaxies, planets, satellites is very precise and accurate. The length of the day, time, seasons is very accurate, true and precise. Discoveries made recently clearly indicate that Hinduism-Sanatan Dharm formed the core of all life through out the world.
PIE π  :: आर्य भट्ट द्वारा प्रतिपादित 
(1). π (pi) = Circumference/Diameter
(2). इससे भी पहले भारतीय स्रोत  को वर्गमूल 10 = 3.1622 लिखते थे।
(3). शंकर वर्मन ने सद्रत्नमाला में पाई का मान निम्नलिखित श्लोक में दिया है, जो कटपयादि प्रणाली का उपयोग करके लिखा गया है, "भद्राम्बुद्धिसिद्धजन्मगणितश्रद्धा स्म यद् भूपगी:"
= 31415926535897932384626433832795 (इकतीस दशमलव स्थानों तक, 3 के बाद दशमलव मानिए।)
(4). आर्यभट ने निम्नलिखित श्लोक में पाई का मान दिया है, 
चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्त्राणाम्। अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्य आसन्नौ वृत्तपरिणाहः॥
100 में 4 जोड़ें, 8 से गुणा करें और फिर 62,000 जोड़ें। इस नियम से 20,000 परिधि के एक वृत्त का व्यास ज्ञात किया जा सकता है। अर्थात [(100+4) X 8 + 62,000]/20000 = 3,1416. 
इसके अनुसार व्यास और परिधि का अनुपात [(100+4) X 8 + 62,000]/20000 = 3,1416 है, जो दशमलव के पाँच अंकों तक बिलकुल सटीक-ठीक  है।
चतुरधिकं शतम = 104, अष्टगुणं = 8 X 104 = 832, द्वाषष्टि = 62, तथा सहस्राणाम् = 62,000, कुल = 62832, 
अयुतद्वय = 10,000 x 2 = 20,000, विष्कम्भस्य = व्यास की, आसन्नो = लगभग, वृत्तपरिणाह = परिधि के।
62832/20,000 = 3.1416 (Approximately).
GRAVITATION गुरुत्वाकर्षण :: आर्यभट्ट ने तो आपने ग्रन्थ में गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त का वर्णन का वर्णन किया ही है। इसके साथ ही गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का उल्लेख ऋग्वेद, बृहत् जाबाल उपनिषद्, प्रश्नोपनिषद, महाभारत, पतञ्जली कृत व्याकरण महाभाष्य, वराहमिहिर कृत ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका, भास्कराचार्य द्वितीय पूर्व की सिद्धान्तशिरोमणि आदि अनेक वैदिक और पुरातन ग्रन्थों में अंकित मिलता है।
भूत पदार्थों के गुणों का वर्णन करते हुए भीष्म पितामह ने युद्धिष्ठिर से कहा था -
भूमै: स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्र्सवात्मना, गन्धो भारश्च शक्तिश्च संघातः स्थापना धृति।
[महाभारत-शान्ति पर्व . 261]
स्थिरता, गुरुत्वाकर्षण, कठोरता, उत्पादकता, गंध, भार, शक्ति, संघात, स्थापना, आदि भूमि के गुण है। न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण (बल) कोई शक्ति नहीं है बल्कि पार्थिव आकर्षण मात्र है । यह गुण भूमि में ही नहीं वरण संसार के सभी पदार्थो में है कि वे अपनी तरह के सभी पदार्थो को आकर्षित करते है एवं प्रभावित करते है।
इसका सर्वाधिक उत्तम व अच्छा विश्लेषण हजारों वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने सादृश्य एवं आन्तर्य के सिद्धान्त से कर दिया था। गुरुत्वाकर्षण सादृश्य का ही उपखण्ड है। समान गुण वाली वस्तुएँ परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करती है। उससे आन्तर्य पैदा होता है । पतंजलि ने कहा है -
अचेतनेश्वपी, तद-यथा-लोष्ठ क्षिप्तो बाहुवेगम गत्वा नैव तिर्यग गच्छति नोर्ध्वमारोहती प्रिथिविविकारः प्रिथिविमेव गच्छति – आन्तर्यतः। तथा या एता आन्तरिक्ष्यः सूक्ष्मा आपस्तासां विकारो धूमः। स आकाश देवे निवाते नैव तिर्यग नवागवारोहती। अब्विकारोपि एव गच्छति आनार्यतः। तथा ज्योतिषो विकारो अर्चिराकाशदेशो निवाते सुप्रज्वलितो नैव तिर्यग गच्छति नावगवरोहति। ज्योतिषो विकारो ज्योतिरेव गच्छति आन्तर्यतः।
[पतंजलि महाभाष्य, सादृश्य एवं आन्तर्य 1.1.50] 
चेतन अचेतन सबमें आन्तर्य सिद्धांत कार्य करता है। मिट्टी का ढेला आकाश में जितनी बाहुबल से फेका जाता है, वह उतना ऊपर चला जाता है, फिर ना वह तिरछे जाता है और ना ही ऊपर जाता है, वह पृथ्वी का विकार होने के कारण पृथ्वी में ही आ गिरता है। इसी का नाम आन्तर्य है ।
इसी प्रकार अंतरिक्ष में सूक्ष्म आपः (hydrogen) की तरह का सुक्ष्म जल तत्व का ही उसका विकार धूम है। यदि पृथ्वी में धूम होता तो वह पृथ्वी में क्यों नहीं आता? वह आकाश में जहाँ हवा का प्रभाव नहीं, वहाँ चला जाता है-ना तिरछे जाता है ना नीचे ही आता है। इसी प्रकार ज्योति का विकार अर्चि है। वह भी ना नीचे आता है ना तिरछे जाता है। फिर वह कहा जाता है ? ज्योति का विकार ज्योति को ही जाता है।
इसके पूर्व के मन्त्र व्याकरण महाभाष्य स्थानेन्तरतमः 1.1.49  में महर्षि पतंजलि ने गुरूत्वाकर्षण के सिद्धान्त का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा है -
लोष्ठः क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यक् गच्छति नोर्ध्वमारोहति। पृथिवीविकारः पृथिवीमेव गच्छति आन्तर्यतः॥ 
[महाभाष्य स्थानेन्तरतमः, 1.1.49]
पृथिवी की आकर्षण शक्ति इस प्रकार की है कि यदि मिट्टी का ढेला ऊपर फेंका जाता है तो वह बहुवेग को पूरा करने पर, न टेढ़ा जाता है और न ऊपर चढ़ता है । वह पृथिवी का विकार है, इसलिये पृथिवी पर ही आ जाता है ।
उपनिषद ग्रन्थों में प्रमुख बृहत् जाबाल उपनिषद् में गुरूत्वाकर्षण सिद्धान्त का वर्णन है और वहाँ गुरुत्वाकर्षण को आधारशक्ति नाम से अंकित किया गया है। इस उपनिषद में इसके दो भाग किये गये हैं -पहला, ऊर्ध्वशक्ति या ऊर्ध्वग अर्थात ऊपर की ओर खिंचकर जाना।
जैसे कि अग्नि का ऊपर की ओर जाना और दूसरा अधःशक्ति या निम्नग अर्थात नीचे की ओर खिंचकर जाना। जैसे जल का नीचे की ओर जाना या पत्थर आदि का नीचे आना।
बृहत् उपनिषद् में भी गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के सूत्रांकित हैं -
अग्नीषोमात्मकं जगत्। [बृहत् उपनिषद् 2.4]
आधारशक्त्यावधृतः कालाग्निरयम् ऊर्ध्वगः। तथैव निम्नगः सोमः॥  [बृहत् उपनिषद् 2.8]
सारा संसार अग्नि और सोम का समन्वय है । अग्नि की ऊर्ध्वगति है और सोम की अधोःशक्ति। इन दोनो शक्तियों के आकर्षण से ही संसार रुका हुआ है ।
प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी भास्कराचार्य, जिन्हें भाष्कर द्वितीय (1114 –1185) भी कहा जाता है, के द्वारा रचित एक मुख्य ग्रन्थ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसमें लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित तथा गोलाध्याय नामक चार भाग हैं। भास्कराचार्य द्वितीय पूर्व ने अपने सिद्धान्तशिरोमणि में यह कहा है-
आकृष्टिशक्तिश्चमहि तया यत् खस्थं गुरूं स्वाभिमुखं स्वशक्त्या।
आकृष्यते तत् पततीव भाति समे समन्तात् क्व पतत्वियं खे॥  [सिद्धान्त० भुवन० 16]
पृथिवी में आकर्षण शक्ति है जिसके कारण वह ऊपर की भारी वस्तु को अपनी ओर खींच लेती है। वह वस्तु पृथिवी पर गिरती हुई सी लगती है । पृथिवी स्वयं सूर्य आदि के आकर्षण से रुकी हुई है, अतः वह निराधार आकाश में स्थित है तथा अपने स्थान से हटती नहीं है और न गिरती है । वह अपनी कील पर घूमती है।
वराहमिहिर ने अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका में कहा है-
पंचभमहाभूतमयस्तारा गण पंजरे महीगोलः। खेयस्कान्तान्तःस्थो लोह इवावस्थितो वृत्तः॥ [पञ्चसिद्धान्तिका पृ० 31]
तारासमूहरूपी पंजर में गोल पृथिवी इसी प्रकार रुकी हुई है जैसे दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहा।
अपने ग्रन्थ सिद्धान्तशेखर में आचार्य श्रीपति ने कहा है -
उष्णत्वमर्कशिखिनोः शिशिरत्वमिन्दौ,.. निर्हतुरेवमवनेःस्थितिरन्तरिक्षे॥  [सिद्धान्तशेखर 15.21]
नभस्ययस्कान्तमहामणीनां मध्ये स्थितो लोहगुणो यथास्ते। आधारशून्यो पि तथैव सर्वधारो धरित्र्या ध्रुवमेव गोलः॥ [सिद्धान्तशेखर 15.22]
पृथिवी की अन्तरिक्ष में स्थिति उसी प्रकार स्वाभाविक है, जैसे सूर्य्य में गर्मी, चन्द्र में शीतलता और वायु में गतिशीलता । दो बड़े चुम्बकों के बीच में लोहे का गोला स्थिर रहता है, उसी प्रकार पृथिवी भी अपनी धुरी पर रुकी हुई है।
ऋषि पिप्पलाद ने कहा है-
पायूपस्थे - अपानम्। [प्रश्न उपनिषद् 3.4]
पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्य०। [प्रश्न उपनिषद 3.8]
तथा पृथिव्याम् अभिमानिनी या देवता ... सैषा पुरुषस्य अपानवृत्तिम् आकृष्य.... अपकर्षेन अनुग्रहं कुर्वती वर्तते। अन्यथा हि शरीरं गुरुत्वात् पतेत् सावकाशे वा उद्गच्छेत्॥  [शांकर भाष्य, प्रश्न० 3.8]
अपान वायु के द्वारा ही मल मूत्र नीचे आता है। पृथिवी अपने आकर्षण शक्ति के द्वारा ही मनुष्य को रोके हुए है, अन्यथा वह आकाश में उड़ जाता ।
गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के लिए ऋग्वेद के यह मन्त्र प्रसिद्ध है -
यदा ते हर्य्यता हरी वावृधाते दिवेदिवे। आदित्ते विश्वा भुवनानि येमिरे॥ 
[ऋग्वेद अ० 6/अ० 1 / व० 6 / म० 3]
सब लोकों का सूर्य के साथ आकर्षण और सूर्य आदि लोकों का परमेश्वर के साथ आकर्षण है। इन्द्र जो वायु, इसमें ईश्वर के रचे आकर्षण, प्रकाश और बल आदि बड़े गुण हैं। उनसे सब लोकों का दिन दिन और क्षण क्षण के प्रति धारण, आकर्षण और प्रकाश होता है। इस हेतु से सब लोक अपनी अपनी कक्षा में चलते रहते हैं, इधर उधर विचल भी नहीं सकते।
ऋग्वेद के अन्य मन्त्र में कहा है-
यदा सूर्य्यममुं दिवि शुक्रं ज्योतिरधारयः। आदित्ते विश्वा भुवनानी येमिरे॥ 
[ऋग्वेद अ० 6/ अ० 1 / व० 6 / म० 5]
हे परमेश्वर ! जब उन सूर्यादि लोकों को आपने रचा और आपके ही प्रकाश से प्रकाशित हो रहे हैं और आप अपने सामर्थ्य से उनका धारण कर रहे हैं , इसी कारण सू्र्य और पृथिवी आदि लोकों और अपने स्वरूप को धारण कर रहे हैं। इन सूर्य आदि लोकों का सब लोकों के साथ आकर्षण से धारण होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमेश्वर सब लोकों का आकर्षण और धारण कर रहा है।
वैदिक ग्रन्थों में वर्णित गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त न्यूटन के तथाकथित सिद्धान्त से आगे की बात भी बतलाते हैं । पतंजलि महाभाष्य, सादृश्य एवं आन्तर्य [1.1.50] में वर्णित आन्तर्य के सिद्धांत से शरीर के स्थूल और सूक्ष्म सभी तत्वों का विश्लेषण किया जा सकता है।
290 million year old footprint Ancient Code290 MILLION YEAR OLD HUMAN FOOT PRINT :: The Hindu believes that the life existed over the earth for trillions & trillions of years. 
Goliath1




Gigantic footprint millions
 of years old,located in Africa.
Here is just one case to prove that.This is no ordinary footprint. It resembles a modern-day human foot, but this is fossilised and embedded into a stone that researchers believe is at around 290 million years old. The discovery was made in New Mexico by palaeontologist Jerry MacDonald in 1987. In the vicinity of this mysterious footprint there are fossilised impressions of birds and other animals. The discovery of the human impression has left MacDonald particularly puzzled and not he or anyone who has seen and studied the impression has not been able to explain how this modern footprint could have been located in the Permian strata, which according to scholars dates from 290 to 248 million years, a time period which occurred long before man or even birds and dinosaurs existed on this planet, of course, that is according to modern science and scientific thinking.  

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