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Showing posts from December, 2015

HINDU PHILOSOPHY (3) हिन्दु दर्शन शास्त्र :: षड्दर्शन SIX ORGANS

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षड्दर्शन SIX ORGANS HINDU PHILOSOPHY (3) हिन्दु दर्शन शास्त्र CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh Bhardwaj dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com    santoshhindukosh.blogspot.com 
पुरूष और प्रकृति दोनों की स्वतंत्र सत्ता है, परन्तु तात्विक रूप में पुरूष की सत्ता ही सर्वोच्च है। पुरूष चैतन्य एवं अपरिणामी है, किन्तु अविद्या के कारण पुरूष जड़ एवं परिणाम चित्त में स्वयं को आरोपित कर लेता है। पुरूष और चित्त के संयुक्त हो जाने पर विवेक जाता रहता है और पुरूष स्वयं को चित्त रूप में अनुभव करने लगता है। यह अज्ञान ही मनुष्य के समस्त दुःखों, क्लेशों का कारण हैं। दर्शन का उद्देश्य मनुष्य को दुःख से, अज्ञान से, मुक्त कराना है। सैद्धान्तिक रूप से दर्शन में मनुष्य को हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन चार क्रमों में मनु…

HINDU PHILOSOPHY (2) हिन्दु दर्शन शास्त्र :: NEO HINDUISM

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NEO HINDUISM HINDU PHILOSOPHY (2)  हिन्दु दर्शन शास्त्र
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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Its understood that if a Sawarn, higher-upper caste or Brahmn becomes a Brahmn only after under going through various Sanskars (practices, rituals), any one can become a Hindu, any where any time in the world, just by subjecting himself to the life style-order of a Hindu. The assertion-thought (idea) that a Hindu is born, is absurd-meaningless.
The human child is helpless unlike the animal. He is taught to walk on his feet, if not he will walk-run like four limbed animals. He is taught how to speak, if not he will growl like cannibals-beasts. He is taught to became a ci…

HINDU PHILOSOPHY (1) हिंदु दर्शन

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HINDU PHILOSOPHY (1) हिंदु दर्शन CONCEPTS AND EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.comsantoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com  santoshhindukosh.blogspot.com

ब्रह्मा जी के प्राकट्य के साथ उन्हें भगवान् श्री हरी विष्णु ने वेदों का 
उपदेश दिया। यह ज्ञान गँगा नारद आदि ऋषियों के माध्यम से एक कल्प से दूसरे कल्प, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरंतर अनवरत चलती चली आ रही है। समय काल के अनुरूप मनीषियों ने पुराण, उपनिषद आदि की रचना जन कल्याण के लिए की। हर ग्रन्थ के भाष्य, विवेचनाएँ लिखी गईं। मनीषियों विद्वानों के द्वारा तत्त्वों के अन्वेषण की प्रवृत्ति तभी से चली आ रही है और विचारों में द्विविध प्रवृत्ति और द्विविध लक्ष्य के दर्शन होते हैं। प्रथम प्रवृत्ति प्रतिभा या प्रज्ञा मूलक है तथा द्वितीय प्रवृत्ति तर्क मूलक है। प्रज्ञा के बल से ही पहली प्रवृत्ति तत्त्वों के वि…