Wednesday, December 30, 2015

GEETA SAAR गीता-सार (EXTRACT-NECTAR-SUMMARY-THEME-CENTRAL IDEA)

GEETA SAAR गीता-सार
 (EXTRACT-NECTAR-SUMMARY-THEME-CENTRAL IDEA)
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM :: By Pt. Santosh Bhardwaj
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5151 YEARS OF GEETA-गीता के संदेश के 5151 वर्ष :: गीता जयंती के पावन अवसर पर शुभकामनाएँ। गीता का सार यही है कि जो हुअा, वह अच्छा हुअा, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर अाए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।

परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
The Almighty Bhagwan Shri Krashn delivered the message through Arjun his friend, associate, disciple and incarnation of Nar. He himself is Narayan and Arjun is Nar. The feat was performed by Mahrishi Ved Vyas-Krashn Dvae Payan (श्री कृष्ण द्वै पायन), yet another incarnation of God, on the direction of the Almighty himself. Shri Ganesh wrote and he narrated sequences one after another. Those who wish to be successful in this cosmic era-called Kali Yug must read, understand and grasp it thoroughly. This is divine knowledge revealed for the benefit of the humans. In fact it constitutes a segment of Maha Bharat narrated by Ved Vyas, which is a wonderful treatise on the mode of living in this age. Shri Mad Bhagwat is yet another treatise written for the welfare of mankind, containing the detailed description of sailing through the most difficult of all the times-the Kali Yug.
One should  not suffer from grief-sorrow-pain for a demised-dead person, since it's only the body which perish not the soul, which is imperishable-infinite-indestructible-free from aging. Those who think of worldly-sensual enjoyments-sensuality, which create-generate attachment towards them, gets involved in them. Attachments produce desire for sex/work, failure to achieve them leads to anger  and anger  generates extreme delusion-allurements-ignorance-lust for such things causes loss of prudence-ability to think-analyse. Ignorance-delusion-allurements, attack memory and  intelligence is destroyed. Loss of intelligence destroys everything. Company of the pious-virtuous-righteous people destroys evil-wickedness-ignorance. Once this stage is reached one starts thinking of rejecting desires and seeks  the eternity. Rejection of desires stabilizes a person in himself-inner self, the soul.

किसी भी जीवित या मरे हुए प्राणी की लिए शोक करना उचित नहीं है, क्योंकि आत्मा अजन्मा, अजर, अमर तथा अभेद्य है। विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है।आसक्ति से काम, काम से क्रोध, क्रोध से अत्यधिक  मोह (-विवेक का अभाव) हो जाता है। मोह से स्मरण शक्ति का ह्रास और उससे बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि के नाश से सर्वनाश हो जाता है।  सत्पुरुषों का संग करने से बुराई का नाश-आसक्तियों का नाश हो जाता है।  इस अवस्था में मनुष्य, अन्य  कामनाओं का त्याग करके, मोक्ष की कामना करने लगता है। कामनाओं के त्याग से मनुष्य की अपने आत्म स्वरूप में स्थति हो जाती है। 
What is deemed-considered to be night for all living beings, about whom  the people are sleeping unconcerned, the Yogi-ascetic-devout-cherished, keeps awake with all of his faculties-energies-directed-channelized-penetrating into him-the Almighty. This world in which all the organism-creatures remain awake is like night for the enlightened-prudent-philosopher-Pundit. One  who ,  is satisfied-contained-content with himself, nothing is left to be done ,no work-function-duty-endeavor-activity. He is neutral-inert to this world. He is not bothered  about actions or in actions. 
सम्पूर्ण प्रणियों के लिए जो रात्रि है अर्थात समस्त जीव जिसकी और से बेखबर सो रहे हैं, उस परमात्मा के स्वरुप में भगवत्प्राप्त संयमी (योगी) पुरुष जागता रहता है। जिस क्षण भंगुर सांसारिक सुख में सब भूत-प्राणी जागते हैं, वह ज्ञानी पुरुष के लिये रात्रि के समान है। जो अपने आप में संतुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। उस आत्माराम पुरुष को इस संसार में न तो कुछ करने से प्रयोजन है और न, कुछ न करने से।
One who is aware of the fact that the characters-functions-factors-traits-properties-deeds are interacting-intermingling-mixing, with one another, remains aloof-neural. He is not attracted towards anyone-anything-any event-activity. One will definitely, swim over-tide over the ocean of sins, with the help of enlightenment-prudence-knowledge. Fire of enlightenment engulfs-vanishes-destroys, all misdeeds-sins-wickedness-vices. One who perform his duties by offering them to the Almighty, remains un smeared-untainted-unnerved-unperturbed, free from sins. 
जो गुण विभाग और  कर्म विभाग के तत्व को जानता है, वह यह समझ कर की सम्पूर्ण गुणों में गुण ही बरत रहे हैं, कहीं असक्त नहीं होता। ज्ञान रूपी नौका का सहारा पाकर प्राणी निश्चय ही सम्पूर्ण  पापों पर विजय प्राप्त कर लेता है। ज्ञान रुपी अग्नि, सभी पापों को जलाकर भस्म कर डालती है। जो व्यक्ति सब कर्मों को परमात्मा को अर्पित कर आसक्ति रहित कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता। 
One whose inner self is associated with Yog, one who value each and every object equally, visualizes all the events of past in his soul and the soul in what has become past. The person distracted from path takes birth in wealthy families.One performs virtuous-pious-righteous deeds never meet devolution.
जिसका अन्त:करण योग युक्त है, जो सर्वत्र समान द्रष्टि रखता है,  वह योगी आत्मा को भूतों में तथा सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता  है। योग भ्रष्ट पुरुष शुद्ध आचार-विचार वाले श्रीमानों (धनवानों)-के घर में जन्म लेता है। कल्याण  मय शुद्ध  कर्मों को करने वाला पुरुष कभी दुर्गति  को प्राप्त नहीं होता।   
GEETA SAAR गीता-सार (EXTRACT-NECTAR-THEME-SUMMARY): आत्मा अजर अमर तथा अभेध्य है। किसी भी मरे हुए अथवा जीवित प्राणी के लिए शोक करना उचित नहीं है। विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से काम, काम से क्रोध, क्रोध से मोह (विवेक का अभाव) हो जाता है। मोह स्मरण शक्ति को कमजोर करता है व बुद्धि का नाश करता है। बुद्धि का नाश सर्वनाश करता है।
Soul is immortal-indestructible-eternal-free from distinction-unitary-undivided-unbreakable-impenetrable. One should not grieve-mourn-sorrow for the dead or the alive. One who think of the worldly objects-possessions-comforts-sensual enjoyments-passions-sensuality  gets attached with them. Allurement-attachment-delusion generates-creates-develops anger, anger creates-grows imprudence. Allurement weakens memory and destroys intelligence-brain-mind. Loss of intelligence (-rational thinking) leads to the destruction of everything-possessions.
सत्पुरुषों के संग से बुराई  दूर हो जाती है-आसक्तियों का नाश हो जाता है। मनुष्य कामनाओं का त्याग कर केवल मोक्ष की कामना करने लगता है। कामनाओं के त्याग से मनुष्य की आत्मा, अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है, जिससे वह स्थिरप्रज्ञ कहलाता है।
Company of the pious-virtuous-righteous people absolves-removes-erase-kills-vanish, all attachments-allurements. The devotee begins-starts craving for Salvation-Liberation-Assimilation in the Almighty. Detachment of a person from desires leads him to the recognition of the soul's true self and establishing-stabilizing in it.
जिस वक्त सम्पूर्ण प्राणी-जीव, परमात्मा से बेरुखे-बेखबर होकर सो रहे होते हैं, उस समय, भगवत्प्राप्त संयमी योगी पुरुष परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है-जागता रहता है।  क्षण भंगुर संसार-सुख-विषय भोग, सब भूत (जो व्यतीत हो चुका है)-वर्तमान (-जीवित प्राणी),  दिन के समान है; परन्तु ज्ञानी के लिए यह सब रात्रि के समान है, वह निर्लिप्त है। उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं है। उसे न तो इस संसार से कोई प्रयोजन है और न किसी कार्य-कर्तव्य-दायित्व-कर्म से-और न कोई जिम्मेवारी है, क्योंकि वह आत्माराम है। उसे न तो कुछ करने से मतलब-प्रयोजन है और न, कुछ न करने से। 
When the entire creations-creatures, neutral-unconcerned, sleeps at that time-hour, the Yogi-one who has attained-immersed himself in the Almighty keep awakened. The enlightened considers all comforts-sensuality-passions as non existent,  since he is un smeared-unattached-untainted. For the learned-enlightened-Yogi this universe is destructible. Nothing has been left for him to do. There is no function-duty-industry-endeavor-responsibility-desire for him-nothing is left to be done. He is contained in himself. He is unconcerned with what is to be done, what is not to be done.
जो व्यक्ति गुणों व कर्मों के तत्व को जानता है, वह यह समझ कर कि  सभी गुण गुणों में ही बरत रहे हैं, कहीं आसक्त नहीं होता। ज्ञान के सहारे मनुष्य सभी पापों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है। ज्ञान एक ऐसा साधन-माध्यम है, जिससे सभी कर्मों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जो व्यक्ति सभी कर्म-यज्ञ, आसक्ति छोड़कर-परमात्मा को अर्पण करके करता है, वह पाप से निर्लिप्त रहता है। जिसका अन्त:करण  योगयुक्त है-परमानन्द मय परमात्मा में स्थित है-जो सर्वत्र समान द्रष्टि वाला है, वह योगी, आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में व सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है। कल्याणमय शुभकर्मों का अनुष्ठान करने वाला पुरुष कभी भी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।
ENLIGHTENMENT-GYAN-LEARNING-KNOWLEDGE-PRUDENCE: One who knows-understands the gist-basics-nectar-elixir of characteristics and the Karm (deeds-work-act-actions-occupation-function), having grasped-understood  that the characteristics-traits-properties-factors,  interact-inter mingle-mix amongest characterizes (-them selves), do not get attached-attracted-inclined-tied-bound to anything. Enlightenment helps in freedom-relief from all sins. Gyan-enlightenment-prudence is a means, which helps in liberty from all deeds-industry. One who detaches himself with the Karm-attachments, Yagy and offers all these to the Almighty, relieves  himself from the sins. One whose  inner self is connected-joined-concentrated in the Almighty-one who has attained equanimity, that yogi-devotee perceives the soul in past and whole of the past in his soul (-becomes trikal darshi). One who is pious-virtuous-righteous, never faces turmoil-destruction-setbacks.
ज्ञानी: परमात्मा की त्रिगुणमयी माया अलौकिक है; इसको पार पाना बहुत ही कठिन है। जो परमात्मा की शरण ग्रहण करता है, वही इस माया को पार कर सकता है। आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी परमात्मा का भजन-स्मरण-कीर्तन करते हैं। इनमें ज्ञानी परमात्मा से एकीभूत होकर स्थित रहता है। अविनाशी परम-तत्व (सच्चिदानंद परमात्मा) ब्रह्म है। स्वभाव अर्थात जीवात्मा को अध्यात्म कहते हैं। भूतों की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाले विसर्ग (-यज्ञ-दान आदि के निमित्त किये जाने द्रव्यादी के त्याग का)  का नाम कर्म है। विनाश शील पदार्थ अधिभूत है तथा पुरुष (-हिरण्यगर्भ) अधिदैवत है। देह धरियों में श्रेष्ठ-देह के भीतर भगवान वासुदेव ही अधियज्ञ हैं। अन्तकाल में उनका स्मरण करनेवाला पुरुष उनके स्वरूप को प्राप्त होता है। मनुष्य अंत काल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए, अपनी देह का परित्याग करता है, उसी को वह प्राप्त होता है । मृत्यु  के समय जो प्राणों को भौंहों के मध्य में स्थापित करके ॐ-ओम्, इस एकाक्षर ब्रह्म  का उच्चारण करके देह त्याग करता है, वह परमात्मा को प्राप्त होता है। ब्रह्मा जी से लेकर तुच्छ कीट-जीव  तक जो कुछ दिखाई देता है, वह सब परमात्मा की ही विभूतियाँ हैं-स्वरुप हैं। जितने भी श्री संपन्न और शक्तिशाली प्राणी हैं, वे सब परमात्मा के ही अंश हैं| स्वयं परमात्मा ही सम्पूर्ण विश्व में अविभूत है ऐसा  जानकर-समझकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। 
Divine creations constituting of three basic components are illusionary. It's very-very difficult to come out of them. To overcome-overpower them, is extremely difficult. Only he, who takes refuge-shelter-protection under the Almighty, can tied over-swim across, this illusionary vast ocean. Depressed-tortured-curious-desirous and the enlightened too, keep on reciting-remembering the God, through recitation-prayers-virtuous company. Out of these the Gyani-enlightened-prudent, unites-stabilizes-establishes with the Ultimate. One who is indestructible-ultimate-gist-elixir-nectar-for ever  is Brahm. Nature-the soul, is eternal. Everything is created out of it and ultimately vanishes (-becomes Bhoot भूत-past-passed away) assimilate-dissolves in it. Creation of past and their elimination; and its extensions are caused by Yagy (-Hawan-sacrifices in holy fire-Agnihotr-rituals)-charity (-donations-dolls) in the form of money and material are termed as Karm-deeds. Every material object is perishable and the Ultimate-Eternal-Permanand-Almighty-God is divine and is for ever-beyond the limits of  time-destruction. One who is the best-excellent-beyond comparison is Bhawan Vasudev himself. One who remember the God at the time of his death, obtains an incarnation alike the God in his abode. Man attains incarnation-shape-embodiment, which protrudes his mind at the time of death. One who fixes his soul between the two eyebrows over the nose and recite om while leaving this perishable body attains assimilation in the Almighty-Salvation-Liberation. All living beings-creatures-organisms starting from the smallest possible single celled protozoans to the Brahma Ji are various incarnations of the God. All the mighty-wealthy-enlightened-emperors-saints-ascetics are his functional units. Man can attain Salvation-Liberation by recognizing understanding  that the entire universe is pervaded by the Almighty, sets himself free from the clutches of death-rebirth. 
मानव रचना का ज्ञान : यह शरीर क्षेत्र है व जो इसको जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं। इन दोनों को सही रूप से जानना ज्ञान है। पांच महाभूत (आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी); अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (-मूल प्रकृति), दस इन्द्रियां, एक मन, पांच इन्द्रियों के विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और घ्रती-यह विकारों सहित क्षेत्र है। 
ज्ञान : अभिमान शून्यता, दंभ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता, मन, इन्द्रिय एवं शरीर का निग्रह, विषय भोगों में आस्तिकता का अभाव, अहंकार का न होना, जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग आदि में दुःख रूप दोष का बारम्बार विचार करना,  पुत्र, स्त्री और गृह आदि में अनासक्ति और ममता का अभाव, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही समान चित्त रहना (-हर्ष-शोक के वशीभूत न होना) परमेश्वर की अनन्य भाव से अविचलित भक्ति का होना, पवित्र एवं एकांत स्थान में रहने का स्वभाव, विषयी मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का अभाव, अध्यात्म-ज्ञान में स्थित तथा तत्व-ज्ञान स्वरुप परमेश्वर का निरंतर चिंतन-दर्शन; यह सब ज्ञान है व इसके विपरीत अज्ञान।
HUMAN BODY:: Human body is the KSHETR (-physical-material entity) and the one who knows-understands-realizes this is KSHETRGY-POSSESSOR (-divine-eternal). Identifying-understanding-realizing of this fact is enlightenment-knowledge. 
BASIC CONSTITUENTS: (I) 5 Mahabhoot) are: (i) Akash-sky-space, (ii) VAYU-Air (iii) TEJ-Agni-fire-energy-power, (iv) Jal-water, (v) Prathvi-earth, (II) Pride-ego-glory, (III) Intelligence-mind-brain-memory-retention, (IV) Mother nature (-undefined). (V) This is blessed with SENSES-10 sense organs: (i) mun (-mind-mood-heart), (ii) 5 subjects of senses, (iii) desires, (iv) envy-enmity-jealousy, (v) pleasure-comfort-enjoyment, (vi) pain-sorrow-grief, (vii) material body, (viii) consciousness-recollection and (ix) Ghrati (-perseverance-tendency to maintain cool in difficult/adverse situation-steadfastness-patience).
GYAN-UNDERSTANDING: Lack of vanity-pride-arrogance, absence of pretense hypocrisy-deceit-boastfulness-ostentation, non violence, forgiveness, simplicity, service of the Guru-elders-parents, internal-external purity-piousness, stability of the inner self  absence of pride-too high opinion about oneself,  not to think of-recollect-remember: birth, death, aging-fragility, diseases continuously-again and again, absence of attachment-affection for: son, wife and house-home, to maintain-strike a balance between like and dislikes (-not to be over come -over whelmed by), undisturbed-firm faith in the God, practice-nature of living in isolated-pious places, absence of eagerness-attachment to the company of wicked people-sinners having worldly attachments, stability-faith in philosophy-scriptures-epics-shashtr and continuous thinking-meditation-realization of the Almighty is considered to be Gyan-enlightenemnt-knowledge and rest is not knowledge.
परब्रह्म: ज्ञेय तत्व अनादी है और परब्रह्म के नाम से जाना जाता है। इसे प्राप्त कर मनुष्य अमृत स्वरुप परमात्मा को प्राप्त होता है। उसे न सत् कहा जाता न असत्, (वह इन दोनों से विलक्षण-अलग है)।उसके सब ओर हाथ-पैर, सब ओर नेत्र, सिर और मुँख हैं तथा सब ओर कान  हैं। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। सब इन्द्रियों से रहित होकर भी वह सब इन्द्रियों को जानने वाला है। सबका धारण-भरण-पोषण करके भी आसक्ति रहित है। गुणों का भोक्ता होकर भी निर्गुण है। वह परमात्मा सब प्राणियों के बाहर और भीतर विद्यमान है। चर-अचर सब उसी के स्वरूप  हैं।  सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है। वही निकट है-वही दूर।  यद्यपि वह विभाग रहित है (-आकाश की भांति अखंड रूप से सर्वत्र परिपूर्ण-व्याप्त है ), तथापि भूतों में विभक्त प्रथक्-प्रथक् स्थित हुआ सा प्रतीत होता है। उसे विष्णु रूप से सब प्राणियों का पोषक, रूद्र रूप से सबका संहारक और ब्रह्मा  रूप से सबको उत्पन्न करने वाला जानना चाहिये। वह सूर्य आदि ज्योतियों की भी ज्योति (-प्रकाशक) है। उसकी स्थिति अज्ञानमय अंधकार से भी परे बतलाई जाती है। वह परमात्मा ज्ञान स्वरुप जानने के योग्य व  तत्व ज्ञान से प्राप्त होने वाला और सबके ह्रदय में स्थित है।
BRAHM: The basic element-component  exists since  the very beginning and is known as Brahm. One who attains him, merges in HIM-the Almighty-Ultimate Par Brahm Parmeshwar. He is neither Sat or Asat (-He is different-distinguished from these two). He has mouth, head, eyes, ears, hands, legs pervading all over-in all directions. Every thing is contained in him. He is stable with all these. He does not possess sense organs, still he recognizes them all. He is unattached even though, he him self takes care of each and every organism-creature-living being. He is the creator of all characteristics-traits-factors-properties-qualities and still free from specific characters. He is present in the creature both internally as well as externally. Variables or fixed are all his incarnations-Avtars. Being microscopic he is undistinguished. He is close to us, yet maintains distance, as well. He is complete pervaded like the sky every where. He appears to be different, due to different incarnations, during the past. In the form of Vishnu he cares-maintains-nurtures us all, in the form of Rudr-Shiv he is the destroyer and as Brahma he is the one who created us all.  He lights the stars like the Sun. He exists away from the darkness of imprudence-ignorance. He is achieved through enlightenment-philosophy-learning.
परमात्मा को कुछ लोग सूक्ष्म बुद्धि द्वारा-ध्यान के द्वारा अपने अन्त:करण में देखते हैं। अन्य लोग सांख्य योग द्वारा व कुछ लोग कर्म योग द्वारा देखते हैं। साधारण मनुष्य स्वयं कुछ न जानते हुए भी दूसरे ज्ञानी पुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं। ये सत्संग करने वाले लोग भी उपासना माध्यम से संसार सागर को निश्चित ही पार कर जाते हैं।
सत्व गुण से ज्ञान, रजो गुण से लोभ तथा तमो गुण से प्रमाद, मोह, और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। गुणों में गुण ही बरतते  हैं-ऐसा समझ कर जो स्थिर रहता है, वह अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता। जो मान-अपमान,  मित्र-शत्रु पक्ष में भी समान भाव रखता है, जिसने कर्तव्य के अभिमान को त्याग दिया है; वह निर्गुण-गुणातीत कहलाता है।
जिसकी जड़ उपर की ओर (-परमात्मा) हैं  व शाखा  नीचे  की ओर (-ब्रह्मा जी) है, उस संसार रूपी अश्र्वत्थ वृक्ष को अनादी प्रवाह रूप से अविनाशी कहते हैं। वेद उसके पत्ते हैं, जो उस वृक्ष को मूल सहित यतार्थ रूप से जानता है, वही वेद  के तात्पर्य को जानने वाला है।
The tree of enlightenment, whose roots are in an upward direction (-The Almighty), and the branches are in the down ward direction (-the Brahm), in imperishable. Ved constitute its leaves-spread. One who knows-identifies this tree, in its real form, is the one who has understood the gist-nectar-elixir-theme of Ved.
दो प्रकार की श्रष्टियाँ:  दैवी (-देवताओं के स्वभाव वाली)। मनुष्यों के अहिंसा, सद्गुण और क्षमा आदि गुण दैवी संपत्ति हैं।  आसुरी (-असुरों के स्वभाव वाली)। आसुरी संपत्ति से उत्पन्न शौच-सदाचार रहित; क्रोध, लोभ, काम-ये नरक देने वाले हैं। अत: इन तीनों को त्याग देना चाहिये। 
अन्न : सात्विक अन्न आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य और सुख की वृद्धी करने वाला है। तीखा व रुखा अन्न राजस है। वह दुःख ,शोक, रोग उत्पन्न करने वाला है। अपवित्र, जूठा, दुर्गन्ध युक्त व नीरस आदि अन्न तामस माना गया है।
सत्व : सत्व आदि गुणों के भेद से यज्ञ, तप और दान तीन प्रकार के माने गए हैं (सात्विक, राजसिक और तामसिक)।
यज्ञ : यज्ञ करना कर्म है-यह समझ कर निष्काम भाव से विधि पूर्वक किया जाने वाला यज्ञ सात्विक है। फल की इच्छा से किया गया यज्ञ राजस और दंभ के लिये किया जाने वाला यज्ञ तामस है।
तप : श्रद्धा और मन्त्र आदि से युक्त एवं प्रतिपादित, जो देवता आदि की पूजा तथा अहिंसा आदि तप हैं, उन्हें शारीरिक तप कहते हैं। वाणी से ऐसा सत्य, वचन, स्वाध्याय और जप-वांग्यमय तप है। चित्त शुद्धि, मौन और मनोग्रह, मानस तप हैं।कामना रहित किया जाने वाला तप सात्विक, फल की इच्छा से किया जाने वाला तप राजस और दूसरों को पीड़ा हेतु किया गया तप तामस है। 
दान : उत्तम देश व कल और पात्र में दिया गया दान सात्विक है। प्रत्युपकार के लिए दिया जाने वाला दान राजस है। अयोग्य देश, काल  आदि में अनादर पूर्वक दिया हुआ दान तामस है। 
परब्रह्म परमात्मा के तीन प्रकार के नाम: ॐ, तत् और सत्
कर्म फल : यज्ञ-दान और कर्म मनुष्यों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। जिन्होंने कामनाओं का त्याग नहीं किया है, उन सकामी पुरुषों के कर्म का बुरा-भला और मिला हुआ कर्म-तीन प्रकार का फल देता है। यह फल मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होता है। सन्यासी-त्यागी के कर्मों का कोई फल नहीं होता।त्याग: कामना के त्याग से संपन्न होने वाला त्याग सात्विक है। शरीर को कष्ट पहुँचने के भय से किया गया त्याग राजस है।मोहवश, जो कर्मों का त्याग किया जाता है, वह  तामस है। 
कर्म के 5  कारण हैं : अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न करण, नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ तथा दैव।
ज्ञान : सब भूतों में एक परमात्मा का ज्ञान सात्विक, भेद ज्ञान राजस और अतात्विक ज्ञान तामस है।
कर्म : निष्काम भाव से किया कर्म सात्विक, कामना के लिए किया कर्म राजसिक तथा मोहवश किया गया कर्म तामस है। कार्य की सिद्धि-असिद्धि  में सम (-निर्विकार) रहने वाला सात्विक, हर्ष-शोक करने वाला राजस तथा शठ और आलसी कर्ता तामस कहलाता है।
बुद्धि : कार्य-अकार्य के तत्व को समझने वाली बुद्धि सात्विक, उसे ठीक-ठीक न जानने वाली बुद्धि राजसिक तथा विपरीत धारणा रखने वाली बुद्धि तामसिक मानी  गयी है।
घृति : मन को धारण करने वाली घृति सात्विकी, प्रीति की कामना वाली घृति राजसी तथा शोक आदि को धारण करने वाली घृति तामसी है।
सुख : जिसका परिणाम सुखद हो वह सत्व से उत्पन्न होने वाला सात्विक सुख, जो प्रारंभ में सुखद हो प्रतीत होने पर परिणाम में दुखद हो वह राजस तथा जो आदि और अंत में भी दुःख ही दुःख दे, वह आपातत: प्रतीत होने वाला सुख तामस कहा गया है। 
जिससे सब भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस विष्णु को अपने-अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूज कर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है जो समस्त अवस्थाओं में और सर्वदा मन, वाणी एवं कर्म द्वारा ब्रह्मा से लेकर तुच्छ कीट पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् को भगवान का स्वरुप समझता है, वह भगवान में भक्ति रखने वाला भागवत पुरुष सिद्धि को प्राप्त होता है ।
YAM GEETA यम गीता
यम गीता यमराज (-धर्मराज) द्वारा नचिकेता से कही गई थी। यह पढने वालों व् सुनने वालों को भोग प्रदान करती है। मोक्ष की इच्छा रखने वाले सत्पुरुषों को यह मोक्ष प्रदान करती है। 
यम राज कहते हैं कि: यह आश्चर्य की बात है कि मनुष्य अत्यंत मोह के कारण, स्वयं अस्थिर चित्त होकर भी आसन, शय्या, वाहन, परिधान तथा गृह आदि भोगों को सुस्थिर मानकर उन्हें प्राप्त करना चाहता है।
कपिल जी ने कहा है कि : भोगों में आसक्ति का अभाव तथा सदा ही आत्मचिंतन, मनुष्यों के लिए परम कल्याण उपाय है।
आचार्य पञ्च शिख का कहना है कि : सर्वत्र समता पूर्ण द्रष्टि तथा ममता और आसक्ति न होना  मनुष्यों के लिए परम कल्याण के साधन हैं।
गंगा-विष्णु का कथन है कि : गर्भ से लेकर जन्म और बाल्य आदि वय व अवस्थाओं के स्वरुप को ठीक ठीक समझना ही, मनुष्यों के लिए परम कल्याण का हेतु है। 
महाराज जनक का कथन है कि: अध्यात्मिक, आधि दैविक और आधि भौतिक दुःख आदि-अंत वाले हैं। ये उत्पन्न होकर नष्ट भी हो जाते हैं, इन्हें क्षणिक समझ कर धैर्य पूर्वक सहन करना चाहिये, विचलित नहीं होना चाहिये। इस प्रकार दुखो का प्रतिकार ही मनुष्यों के लिए परम कल्याण का साधन है।  
ब्रह्मा जी का सिद्धान्त  है कि : जीवात्मा और परमात्मा वस्तुत: अभिन्न (एक) हैं। इनमें जो भेद प्रतीत होता है, उसका निवारण ही परम कल्याण का हेतु है।
जैगीषव्य  का कहना है कि : ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में जो कर्म प्रतिपादित हैं, उन्हें कर्तव्य समझ कर अनासक्त भाव से  करना श्रेय का साधन है । 
देवल का कहना है कि : सब प्रकार की विदित्सा (कर्मारंभ की आकांक्षा ) का परित्याग आत्मा के सुख का साधन है । 
सनकादी ऋषियों का कथन है कि: कामनाओं के त्याग से विज्ञान, सुख, ब्रह्म एवं परम पद की प्राप्ति होती है। कामना रखने वालों को ज्ञान नहीं होता। 
अन्य लोगों के अनुसार प्रवृत्ति व निवृत्ति दोनों प्रकार के कर्म करने चाहिये। परन्तु वास्तव में नैष्कमर्य ही ब्रह्म है। वही भगवान विष्णु का स्वरुप व श्रेय का भी श्रेय है। ज्ञान प्राप्ति से  पुरुष सन्तों में श्रेष्ठ हो जाता है। उसका परब्रह्म भगवान विष्णु से कभी भेद नहीं होता। ज्ञान,विज्ञान, आस्तिकता, सौभाग्य तथा उत्तम रूप तपस्या से उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं मनुष्य अपने मन से जो कुछ भी पाना चाहता है वह सब तपस्या से प्राप्त हो जाता है। 
विष्णु के समान कोई ध्येय नहीं है,
निराहार के समान कोई तपस्या नहीं है,
आरोग्य के समान कोई बहुमूल्य वास्तु नहीं है,
गंगा जी के समान कोई दूसरी नदी नहीं है, 
जगद्गुरु भगवान विष्णु को छोड़कर, दूसरा कोई बांधव नहीं है।
ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, देह, मन, इन्द्रिय, मुख आदि-सब में और सर्वत्र भगवान श्री हरी विद्यमान हैं-इस प्रकार का चिंतन करते हुए जो प्राण त्यागता है, वह साक्षात् श्री हरी के स्वरूप में मिल जाता है। 
वह जो सर्वत्र व्यापक ब्रह्म है, जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है तथा यह सब कुछ जिसका संस्थान (आकार-विशेष) है, जो इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है, जिसका नाम आदि के द्वारा निर्देश नहीं किया जा सकता, जो सुप्रितिष्ठ एवं सबसे परे है, उस परापर रूप में साक्षात् भगवान विष्णु ही सबके ह्रदय में विराजमान हैं।  वे यज्ञ  के स्वामी हैं यज्ञ स्वरूप-पुरुष  हैं ; उन्हें कोई तो परब्रह्म रूप से, कोई विष्णु रूप से, कोई शिव रूप से, कोई ब्रह्मा रूप से और ईश्वर रूप से, कोई इन्द्रादि नामों से तथा कोई सूर्य, चन्र्द्रमा और कालरूप से पाना चाहता है। ब्रहमा से लेकर कीट तक सारी श्रष्टि को विष्णु का स्वरूप ही मानते हैं। भगवान विष्णु स्वयं परब्रह्म परमेश्वर हैं, जहाँ पहुँच कर-जान लेने पर-पा लेने पर, फिर वापस इस संसार में नहीं आना पड़ता। 
स्वर्ण दान-जैसे बड़े बड़े दान, पुन्य स्थल-तीर्थों में स्नान करने पर, ध्यान लगाने पर, व्रत करने पर, पूजा करने पर, धर्म की बातें करने सुनने पर एवं उनका पालन करने पर, अनन्य भाव से भक्ति करने पर उनकी प्राप्ति होती है। 
आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथि, मन को लगाम, इंद्रियों को घोड़े, विषयों को मार्ग की उपमा-के समान, मानना चाहिये। शरीर, इन्द्रिय और मन सहित आत्मा को भोक्ता समझना चाहिये। बुद्धि रुपी सारथि अविवेकी होता है। जो मन रूपी लगाम को कस कर नहीं पकड़ता, वह परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता अपितु संसार रूपी गर्त में गिरता है। जो व्यक्ति विवेकी होता है, मन को काबू में रखता है वही परम पद को प्राप्त करता है और फिर जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य विवेक युक्त बुद्धि रूप सारथि से संपन्न और मन रूपी लगाम को काबू में रखता है वही संसार रूपी मार्ग को प्राप्त कर भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है। 
परम गति : इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय प्रमुख हैं, विषयों से प्रमुख मन है, मन से प्रमुख बुद्धि है, बुद्धि से प्रमुख आत्मा (-महतत्व) है, आत्मा से ऊपर अव्यक्त-मूल पृक्रति है और मूल प्रक्रति से ऊपर परमात्मा है। परमात्मा से ऊपर कुछ भी नहीं है, वही सीमा है, वही परम गति है। सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह परमात्मा, प्रकाश में नहीं आता, दिखाई नहीं देता-परन्तु अनुभव अवश्य होता है; ध्यान करने पर शुद्धबुद्धि आत्माओं को दर्शन भी देता है। सूक्ष्मदर्शी पुरुष अपनी तीव्र बुद्धि से ही उसे देख पाते हैं। विद्वान पुरुष वाणी को मन में, मन को विज्ञानमयी बुद्धि में, बुद्धि को महतत्व (-आत्मा) में और महतत्व को परमात्मा में लीन करे।   
यमादि नियमों-साधनों से ब्रह्म व आत्मा की एकता को जानकर मनुष्य सत्स्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है।
पांच यम : अहिंसा, सत्य, अस्तेय (-चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (-संग्रह न करना)। 
पांच नियम:शौच (आन्तरिक व बाहरी शुद्धि-पवित्रता), संतोष, उत्तम तप, स्वाध्याय और ईश्वर पूजा-आसन बैठने की प्रक्रिया  है, जिसके पद्मासन जैसे कई भेद हैं।
प्राणायाम : प्राण वायु को जीतना। 
प्रत्याहार : इन्द्रियों का निग्रह। 
धारणा : शुभ विषयों में चित्त को स्थिरतापूर्वक स्थापित करना।  
ध्यान: एक ही विषय में बार-बार धारणा, व 
समाधि : स्वयं को ब्रह्म रूप में अनुभव करना जीव मुक्ति के पश्चात् ब्रह्म के साथ एकीकरण को प्राप्त होता है। ज्ञान-बोध से ही जीव स्वयं को ब्रह्म मान सकता है, अन्यथा नहीं। अज्ञान और उसके कार्यों से मुक्ति प्राप्त कर जीव अजर अमर हो जाता है।   

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