CREATION OF LIFE सृष्टि रचना

CREATION OF LIFE 
सृष्टि रचना 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh  Bhardwaj  
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वे परमात्मा जो निराकार हैं उन्होंने लीलार्थ 24 तत्वों के अण्ड का निर्माण किया। उस अण्ड से ही वे परमात्मा साकार रूप में बाहर निकले। उन्होंने जल की रचना की तथा हजारों दिव्य वर्षों तक उसी जल में शयन किया अतः उनका नाम नारायण हुआ।
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ 
Photo: परमात्मा की जब बहुत होने की इच्छा हुई तब वे उठे तथा अण्ड के अधिभूत, अध्यात्म तथा अधिदैव ये तीन खण्ड किये। उन परमात्मा के आंतरिक आकाश से इन्द्रिय, मनः तथा देह शक्ति उत्पन्न हुई। साथ ही सूत्र, महान् तथा असु नामक तीन प्राण भी उत्पन्न हुए। उनके खाने की इच्छा के कारण अण्ड से मुख निकला, जिसके अधिदैव वरुण तथा विषय रसास्वादन हुआ। इसी प्रकार बोलने की इच्छा के कारण वाक् इन्द्रियँ प्रकट हुईं, जिसके देव अग्नि तथा भाषण विषय हुआ। उसी तरह नासिका, नेत्र, कर्ण, चर्म, कर, पाद आदि निकला। यह परमात्मा का साकार स्थूल रूप है, जिनका नमन वेद पुरुष सूक्त से किये हैं। 
प्रलय काल में भगवान् शेष पर शयन कर रहे थे। वे आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्मने हैं। अतः शेष जो सबके बाद भी रहते हैं, वही उनकी शैया हैं। सृष्टि की इच्छा से जब उन्होंने आँखें खोलीं तो देखा कि सम्पूर्ण लोक उनमें लीन है। तभी रजोगुण से प्रेरित परमात्मा की नाभि से कमल अंकुरित हो गया, जिससे सम्पूर्ण जल प्रकाशमय हो गया। नाभिपद्म से उत्पन्न ब्रह्मा जी पंकज कर्णिका पर आसीन थे। कल्प के आदि में, ब्रह्मा जी भगवान्  विष्णु के नाभि से उत्पन्न हुए पद्म पर विराजमान थे, उन्होंने उस समय सम्पूर्ण जगत को जल मग्न देखा। वे सोचने लगे कि, वे कौन हैं, किसने उन्हें जन्म दिया हैं तथा उनके जन्म का क्या उद्देश्य हैं। वे कमलनाल के सहारे जल में प्रविष्ट हुए तथा सौ दिव्य वर्ष तक निरंतर खोज करने पर भी कोई प्राप्त नहीं हुआ। अंत में वे पुनः यथास्थान बैठ गए। वहाँ हजारों दिव्य वर्षों तक समाधिस्थ रहे और घोर  तपस्या की। तदनंतर पुरुषोत्तम भगवान् श्री हरी विष्णु ने उन्हें दर्शन दिये। ब्रह्मा जी ने भगवान् श्री हरी विष्णु की स्तुति की :: 
ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां, न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्।
नान्यत्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं, मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासी॥[श्रीमद्भागवत]
चिरकाल से मैं आपसे अंजान था, आज आपके दर्शन हो गए। मैने आपको जानने का प्रयास नहीं किया, यही हम सब का सबसे बड़ा दोष है, क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में आप ही जानने योग्य हैं। अपने समीपस्थ जीवों के कल्याणार्थ आपने सगुण रूप धारण किया जिससे मेरी उत्पत्ति हुई। निर्गुण भी इससे भिन्न नहीं।
उनके अंदर ब्रह्मा जी ने अथाह सागर तथा कमल पर आसीन स्वयं को भी देखा। भगवान् शेषनाग में शयन कर रहे प्रभु का नीलमणि के समान देह अनेक आभूषणों से आच्छादित था तथा वन माला और कौस्तुभ मणि स्वयं को भाग्यवान मान रहे थे। श्री भगवान्  ने कहा "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जाओ सृष्टि करो। प्रलय से जो प्रजा मुझमें लीन हो गई उसकी पुनः उत्पत्ति करो।" भगवान् श्री विष्णु ने जल प्रलय के परिणामस्वरूप नष्ट हुए सम्पूर्ण जगत, उन समस्त प्रजा तथा तत्वों को पुनः उत्पन्न करने का ब्रह्मा जी को निर्देश दिया तथा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गए।  ब्रह्मा जी ने सौ दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या की जिसके परिणाम स्वरूप प्रलयकालीन वायु के द्वारा जल तथा कमल दोनो आंदोलित हो उठे। ब्रह्मा जी ने तप की शक्ति से उस वायु को जल सहित पी लिया। तब आकाशव्यापी कमल से ही चौदह लोकों की रचना हुई। ईश्वर काल के द्वारा ही सृष्टि किया करते हैं।  
इन सृष्टियों से ब्रह्मा जी को संतुष्टि न मिली तब उन्होंने मन में भगवान् नारायण श्री हरी विष्णु,का ध्यान कर मन से दशम सृष्टि सनकादि मुनियों की थी, जो साक्षात् भगवान ही थे। कौमार सर्ग में चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण करने वाले, चारों कुमार सनक (-पुरातन), सनन्दन (-हर्षित), सनातन (-जीवंत) तथा सनत् (-चिर तरुण) के नाम में ‘सन’ शब्द हैं, इसके अलावा चार भिन्न प्रत्ययों हैं। पूर्व चाक्षुष मन्वंतर के प्रलय के समय जो वेद-शास्त्र प्रलय के साथ लीन हो गए थे, इन चार कुमारों के उन वेद-शास्त्र, ब्रह्म ज्ञान, गूढ़ विद्या को भगवान् के हंस अवतार से प्राप्त किया। इन चारों ने बहुत कठिन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया।  ये महर्षि,मुनि या ऋषि के नाम से भी जाने जाते हैं। इनकी आयु सदैव पाँच वर्ष की रहती है। ये चारों ही ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। ब्रह्मा जी नें उन बालकों से कहा कि पुत्र जाओ सृष्टि करो। सनकादि मुनियों नें ब्रह्मा जी से कहा "पिताश्री! क्षमा करें। हमारे हेतु यह माया तो अप्रत्यक्ष है, हम भगवान्  की उपासना से बड़ा किसी वस्तु को नहीं मानते। उनके अनुसार भगवान्  श्री हरि विष्णु की भक्ति-आराधना से अधिक और कोई कार्य उनके लिए उपयुक्त नहीं था। नारद जी को इन्होंने भागवत सुनाया था तथा उन्होंने स्वयं भगवान् शेष से भागवत श्रवण किया था। ये जितने छोटे दिखते हैं, उतनी ही विद्याकंज हैं। ये चारो वेदों के ही रूप कहे जा सकते हैं। वे चारों जहाँ पर भी जाते थे, सर्वदा ही भगवान्  विष्णु का भजन करते थे, सर्वदा ही भगवान् नारायण के भजन कीर्तन में निरत-निमग्न रहते थे। ये सर्वदा उदासीन भाव से युक्त हो, भजन-साधन में मग्न रहते थे। इन्हीं चारों कुमारों ने उदासीन भक्ति, ज्ञान तथा विवेक का मार्ग शुरू किया, जो आज तक उदासीन अखाड़ा के नाम से चल रहे हैं।  उसका प्रथमोपदेश अपने शिष्य देवर्षि नारद को किया था। नारद मुनि को इन्होंने ही समस्त वेद-शास्त्रों से अवगत करवाया, तदनंतर नारद जी से अन्य ऋषियों ने यह ज्ञान प्राप्त किया। इन्हें आत्मा तत्व का पूर्ण ज्ञान था, वैवस्वत मन्वंतर में इन्हीं बालकों ने, सनातन धर्म ज्ञान प्रदान किया और निवृति-धर्म के प्रवर्तक आचार्य हुए। ये सर्वदा ही दिगंबर भेष धारण किये रहते थे। संसार में रहते हुए भी, ये कभी किसी भी बंधन में नहीं बंधे। केवल मात्र हरि भजन ही इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था। ये चारों कुमार परम सिद्ध योगी हैं, अपने परम ज्ञान तथा सिद्धियों के परिणाम स्वरूप ये सर्वदा ही सिद्ध बाल योगी से जान पड़ते हैं। ज्ञान प्रदान तथा वेद-शास्त्रों के उपदेश, भगवान् विष्णु की भक्ति और सनातन धर्म हेतु इन कुमारों ने तीनों लोकों में भ्रमण किया। इन्होंने भगवान्  विष्णु को समर्पित कई स्त्रोत लिखे।
बुद्धि को अहंकार से मुक्ति का उपाय सनकादि से अभिहित हैं, केवल चैतन्य ही शाश्वत हैं। चैतन्य मनुष्य के शरीर में चार अवस्थाएँ :- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय या प्राज्ञ विद्यमान रहती हैं। इस कारण मनुष्य देह चैतन्य रहता हैं। इन्हीं चारों अवस्थाओं में विद्यमान रहते के कारण चैतन्य मनुष्य को सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत् से संकेतित किया गया हैं। ये चारों कुमार किसी भी प्रकार की अशुद्धि के आवरण से रहित हैं, परिणाम स्वरूप इन्हें दिगंबर वृत्ति वाले जो नित्य नूतन और एक समान रहते हैं “कुमार” कहा जाता हैं। तत्त्वज्ञ (तत्व ज्ञान से युक्त), योगनिष्ठ (योग में निपुण), सम-द्रष्टा (सभी को एक समान देखना तथा समझना अर्थात सभी प्राणियों में समता), ब्रह्मचर्य से युक्त होने के कारण इन्हें ब्राह्मण (ब्रह्मानन्द में निमग्न) कहा जाता हैं। 
For more details please refer to :: EVOLUTION सृष्टि रचना   santoshkipathshala.blogspot.com & jagatgurusantosh.wordpress.com (Chapter 1-16)
जय विजय को श्राप :: एक समय चारों सनकादि कुमार भगवान् विष्णु के दर्शनार्थ वैकुण्ठ जा पहुंचे। वे वहाँ के सौंदर्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए। वहाँ स्फटिक मणि के स्तंभ थे, भूमि पर भी अनेकों मणियाँ जड़ित थीं। भगवान्  के सभी पार्षद नन्द, सुगन्ध सहित वैकुण्ठ के पति का सदैव गुणगान किया करते हैं। चारों मुनि छः ड्योढ़ियाँ लाँघकर जैसे ही सातवीं ड्योढ़ी पर चढ़े उनका दृष्टिपात दो महाबलशाली द्वारपाल जय तथा विजय पर हुआ। कुमार जैसे ही आगे बढ़े दोनों द्वारपालों ने मुनियों को धृष्टतापूर्वक रोक दिया। यद्यपि वे रोकने योग्य न थे, इस पर सदा शाँत रहने वाले सनकादि मुनियों को भगवत् इच्छा से क्रोध आ गया। वे द्वारपालों से बोले "अरे! बड़ा आश्चर्य है। वैकुण्ठ के निवासी होकर भी तुम्हारा विषम स्वभाव नहीं समाप्त हुआ? तुम लोग तो सर्पों के समान हो। तुम यहाँ रहने योग्य नहीं हो, अतः तुम नीचे लोक में जाओ। तुम्हारा पतन हो जाये।" इस पर दोनो द्वारपाल मुनियों के चरणों पर गिर पड़े। तभी भगवान्  का आगमन हुआ। मुनियों नें भगवान्  को प्रणाम किया। श्री भगवान्  कहते हैं "हे ब्रह्मन्! ब्राह्मण सदैव मेरे आराध्य हैं। मैं आपसे मेरे द्वारपालों द्वारा अनुचित व्यवहार हेतु क्षमा प्रार्थी हूँ।" उन्होंने द्वारपालों से कहा "यद्यपि मैं इस श्राप को समाप्त कर सकता हूँ; परंतु मैं ऐसा नहीं करुँगा क्योंकि तुम लोगों को ये श्राप मेरी इच्छा से ही प्राप्त हुआ है। तुम लोग इसके ताप से तपकर ही चमकोगे, यह परीक्षा है, इसे ग्रहण करो। एक बात और, तुम मेरे बड़े प्रिय हो।" द्वारपालों ने श्राप को ग्रहण किया। मुनियों ने कहा "प्रभु! आप तो हमारे भी स्वामी हैं और सब ब्राह्मणों का आदर करते हुए सभी लोग मुक्ति को प्राप्त करें यह सोचकर हमें आदर प्रदान करते हैं। प्रभु आप धन्य हैं। सदैव हमारे हृदय में वास करें और द्वारपालों की मुक्ति आपके कर कमलों से ही होगी" भगवान्  ने द्वारपालों को कहा "द्वारपालों तुम तीन जन्म तक राक्षस योनि में जाओगे तथा मैं तुम्हारा उद्धार करुँगा।" इसी श्राप के कारण ये दोनों द्वारपाल तीन जन्मों तक राक्षस बने। प्रथम जन्म में ये दोनों ही हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु बनें, द्वितीय में रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में ये ही शिशुपाल तथा दन्तवक्र बने।
सृष्टि कर्ता भगवान् ब्रह्मा जी :: अव्यक्त-निराकार परम पिता परम ब्रह्म परमेश्वर ने स्वयं को व्यक्त-साकार रूप से प्रकट करने का निश्चय किया और गौलोक की रचना करके भगवान् श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुए। उनसे ही भगवती माँ दुर्गा और भगवान् सदाशिव उत्पन्न हुए। कालरूपी ब्रह्म सदाशिव ने ही शक्ति के साथ शिवलोक नामक क्षेत्र का निर्माण किया। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले भगवान् सदाशिव ने अपने विग्रह (-शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्री अंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। भगवान् सदाशिव की पराशक्ति प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकार रहित हैं। माँ शक्ति, अम्बिका (-पार्वती या सती नहीं), प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिभुवन जननी,  नित्या और मूल कारण भी हैं। उनकी 8 भुजाएँ हैं। पराशक्ति जगत जननी माँ भगवती नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती हैं। एकाकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है। शक्ति की देवी ने ही लक्ष्मी, सावित्री और पार्वती के रूप में अवतार ग्रहण किया तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश की अर्धांगनी हुईं। माँ भगवती तीन रूप होकर भी वह अकेली रह गई थी। 
कालरूप सदाशिव की अर्धांगिनी हैं माँ दुर्गा।उनका उत्तम लोक-क्षेत्र काशी है। वह मोक्ष का स्थान है। यहाँ शक्ति और शिव अर्थात कालरूपी ब्रह्म सदाशिव और दुर्गा यहाँ पति और पत्नी के रूप में निवास करते हैं। इस मनोरम स्थान काशी पुरी को प्रलयकाल में भी शिव और शिवा ने अपने सान्निध्य से कभी मुक्त नहीं किया था। इस आनंद रूप वन में रमण करते हुए एक समय शिव और शिवा को यह इच्‍छा उत्पन्न हुई ‍कि किसी दूसरे पुरुष की सृष्टि करनी चाहिए, जिस पर सृष्टि निर्माण (वंशवृद्धि आदि) का कार्यभार रखकर हम निर्वाण धारण करें। ऐसा निश्‍चय करके शक्ति सहित परमेश्वर रूपी सदाशिव ने अपने वामांग पर अमृत मल दिया। वहाँ से एक पुरुष प्रकट हुआ। शिव ने उस पुरुष से संबोधित होकर कहा, ‘वत्स! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम विष्णु विख्यात होगा।’ इस प्रकार भगवान् विष्णु के माता और पिता कालरूपी सदाशिव और पराशक्ति दुर्गा हैं।
भगवान् श्री हरी विष्णु को उत्पन्न करने के बाद सदाशिव और शक्ति ने पूर्ववत प्रयत्न करके ब्रह्मा जी को अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया और तुरंत ही भगवान् विष्णु के नाभि कमल में डाल दिया। इस प्रकार उस कमल से पुत्र के रूप में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने उस कमल के सिवाय दूसरे किसी को अपने शरीर का जनक या पिता नहीं जाना। मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा क्या कार्य है, मैं किसका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ हूँ और किसने इस समय मेरा निर्माण किया है ? इस प्रकार के संशय ब्रह्मा जी के मस्तिष्क में उत्पन्न हुए। उन्होंने अपने नेत्रों को चारों ओर घुमाकर शून्य में देखा। इस चेष्टा से चारों दिशाओं में उनके चार मुख प्रकट हो गये। दीर्घ काल तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी को शेष शय्या पर सोये हुए भगवान्  विष्णु के दर्शन हुए। वो स्वयं को उनका पिता-जनक समझने लगे। ब्रह्मा और विष्‍णु में इसको लेकर विवाद हुआ कि कौन पिता है? तभी बीच में कालरूपी एक प्रकाश स्तंभ आकर खड़ा हो गया। उन दोनों ने उसका ओर-छोर ढूँढना चाहा तो वह उनको नहीं मिला तो वे निराश होकर वापस आये। तभी आकाशवाणी ने उन्हें तपस्या करने को कहा। तपस्या से निवृति के तदोपरांत दोनों ने भगवान् सदाशिव से पूछा-‘प्रभो, सृष्टि आदि 5 कर्तव्यों के लक्षण क्या हैं ? यह हम दोनों को बताइए।’ तब ज्योतिर्लिंग रूप काल ने कहा-‘पुत्रो, तुम दोनों ने तपस्या करके सृष्टि (जन्म) और स्थिति (पालन) नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं।
इसी प्रकार मेरे विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार (विनाश) और तिरोभाव (अकृत्य) मुझ से प्राप्त किए हैं, परंतु अनुग्रह (कृपा करना) नामक दूसरा कोई कृत्य पा नहीं सकता। रुद्र और महेश्वर दोनों ही अपने कृत्य को भूले नहीं हैं। इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है।’
भगवान् सदाशिव कहते हैं :- ‘ये (रुद्र और महेश) मेरे जैसे ही वाहन रखते हैं, मेरे जैसा ही वेश धरते हैं और मेरे जैसे ही इनके पास हथियार हैं। वे रूप, वेश, वाहन, आसन और कृत्य में मेरे ही समान हैं।’
कालरूपी सदाशिव कहते हैं कि मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ओंकार के रूप में प्रसिद्ध है, क्योंकि सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार अर्थात ‘ॐ’ प्रकट हुआ। ओंकार वाचक है, मैं वाच्य हूं और यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है और यह मैं ही हूं। प्रतिदिन ओंकार का स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है। मेरे पश्चिमी मुख से अकार का, उत्तरवर्ती मुख से उकार का, दक्षिणवर्ती मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से बिन्दु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। यह 5 अवयवों से युक्त (पंचभूत) ओंकार का विस्तार हुआ।
अपने एवं विश्व के कारण परम पुरुष का दर्शन करके ब्रह्मा जी को विशेष प्रसन्नता हुई और उन्होंने भगवान्  विष्णु की स्तुति की। भगवान् विष्णु ने ब्रह्माजी से कहा कि अब आप तप:शक्ति से सम्पन्न हो गये हैं और आपको मेरा अनुग्रह भी प्राप्त हो गया है। अत: अब आप सृष्टि करने का प्रयत्न कीजिये।
भगवान् विष्णु की प्रेरणा से माँ भगवती सरस्वती ने ब्रह्मा जी को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान कराया।
ब्रह्मा जी मानसिक संकल्प से प्रजापतियों को उत्पन्न कर उनके द्वारा सम्पूर्ण प्रजा की सृष्टि करते हैं। इसलिये वे प्रजापतियों के भी पति कहे जाते हैं। मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा कर्दम, ये दस मुख्य प्रजापति हैं। भगवान्  रुद्र भी ब्रह्मा जी के ललाट से उत्पन्न हुए। मानव-सृष्टि के मूल महाराज मनु उनके दक्षिण भाग से उत्पन्न हुए और वाम भाग से शतरूपा की उत्पत्ति हुई। स्वायम्भुव मनु और महारानी शतरूपा से मैथुरी-सृष्टि प्रारम्भ हुई। सभी देवता ब्रह्मा जी के पौत्र माने गये हैं, अत: वे पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं। 
ब्रह्मा जी देवता, दानव तथा सभी जीवों के पितामह हैं, फिर भी वे विशेष रूप से धर्म के पक्षपाती हैं। देवासुरादि संग्रामों में पराजित होकर देव गण ब्रह्मा के पास जाते हैं तो ब्रह्मा जी धर्म की स्थापना के लिये भगवान् विष्णु को अवतार लेने के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान्  विष्णु के प्राय: चौबीस अवतारों में ये ही निमित्त बनते हैं। 
शैव और शाक्त आगमों की भाँति ब्रह्मा जी की उपासना का भी एक विशिष्ट सम्प्रदाय है, जो वैखानस सम्प्रदाय के नाम से प्रसिद्ध है। इस वैखानस सम्प्रदाय की सभी सम्प्रदायों में मान्यता है। पुराणादि सभी शास्त्रों के ये ही आदि वक्ता माने गये हैं। ब्रह्मा जी की प्राय: अमूर्त अपासना ही होती है। सर्वतोभद्र, लिंगतोभद्र आदि चक्रों में उनकी पूजा मुख्य रूप से होती है, किन्तु मूर्तरूप में मन्दिरों में इनकी पूजा पुष्कर-क्षेत्र तथा ब्रह्मार्वत-क्षेत्र (विठुर) में देखी जाती है। माध्व सम्प्रदाय के आदि आचार्य भगवान् ब्रह्मा ही माने जाते हैं। उडुपी आदि मुख्य मध्वपीठों में इनकी पूजा-आराधना की विशेष परम्परा है। देवताओं तथा असुरों की तपस्या में प्राय: सबसे अधिक आराधना इन्हीं की होती है। विप्रचित्ति, तारक, हिरण्यकशिपु, रावण, गजासुर तथा त्रिपुर आदि असुरों को इन्होंने ही वरदान देकर अवध्य कर डाला था। देवता, ऋषि-मुनि, गन्धर्व, किन्नर तथा विद्याधर गण, इनकी आराधना में निरंतर तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा जी के चार मुख हैं। वे अपने चार हाथों में क्रमश: वरमुद्रा, अक्षरसूत्र, वेद तथा कमण्डलु धारण किये हैं। उनका वाहन हंस है। उनका पाँचवाँ सिर भगवान् शिव ने काट दिया और कापालिक कहलाये।
भगवान् ऋषभदेव :: जब सब कुछ प्रलय के कारण नष्ट हो गया तो धरती लाखों वर्ष तक अंधकार में रही। फिर सूखी धरती पर जलावृष्टि हुई और यह धरती पूर्ण रूप से जल से भर गई। संपूर्ण धरती जलमग्न हो गई। जल में भगवान् विष्णु की उत्पत्ति हुई। जब उन्होंने आंखें खोलीं तो नेत्रों से सूर्य की और हृदय से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई।
जल से भगवान् विष्णु की उत्पत्ति होने के कारण उन्हें हिरण्याभ भी कहते हैं। हिरण्य अर्थात जल और नाभ अर्थात नाभि यानी जल की नाभि। इस नाभि से कमल की उत्पत्ति हुई और कमल जब जल के ऊपर खिला तो उसमें से भगवान् ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई।
उनके मस्तिष्क से भगवान् महेश-शिव-रूद्र प्रकट हुए। भगवान् विष्णु ने उनको सृष्टि के विस्तार का आदेश दिया। जल में एक इंद्रिय और एक रंगी जीवों की उत्पत्ति हुई और साथ-साथ असंख्य पौधों और लताओं की उत्पत्ति हुई। मेरू पर्वत से जब कुछ जल हटा तो यही एक इंद्रिय जीव जहाँ-तहाँ फैलकर तरह-तरह के रूप धरने लगे और जीवन क्रम विकास के क्रम में शामिल हो गए। यह सब ब्रह्मा जी की घोर तपस्या और अथक प्रयास से संभव हुआ। ब्रह्मा जी ने एक ऐसे जीव की उत्पत्ति करने की सोची, जो अन्य जलचर, थलचर और नभचर जीवों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान हो अर्थात खुद ब्रह्मा जी की तरह हो। यह सोचकर उन्होंने पहले 4 सनतकुमारों को उत्पन्न किया।  परन्तु वे चारों तपस्या में लीन हो गए। तत्पश्चात प्रजापति ब्रह्मा जी ने 10 मानस पुत्रों को उत्पन्न किया (वशिष्ठ, कृ‍तु, पुलह, पुलस्य, अंगिरा, अत्रि और मरीचि आदि) और उनसे कहा कि आप मानव जीवन की उत्पत्ति करें, उनको शिक्षा दें और परमेश्वर का मार्ग बताएं।
बहुत काल तक जब ये ऋषि तपस्या में ही लीन रहे तो स्वयं ब्रह्मा जी अपने शरीर से स्वयम्भुव मनु (पुरुष, नर) और शतरूपा (स्त्री, मादा) को जन्म दिया। उन्होंने इन दोनों को मैथुनी सृष्टि की उत्पत्ति और उसके विस्तार का आदेश दिया और कहा कि आप सभी धर्मसम्मत वेदवाणी का ज्ञान दें।
वेद ईश्वर की वाणी है। इस वाणी को सर्वप्रथम 4 क्रमश: ऋषियों ने सुना- (1). अग्नि, (2). वायु, (3). अंगिरा और (4). आदित्य। परंपरागत रूप से इस ज्ञान को स्वयम्भुव मनु ने अपने कुल के लोगों को सुनाया, फिर स्वरोचिष, फिर औत्तमी, फिर तामस मनु, फिर रैवत और फिर चाक्षुष मनु ने इस ज्ञान को अपने कुल और समाज के लोगों को सुनाया। बाद में इस ज्ञान को वैवश्वत मनु ने अपने पुत्रों को दिया। इस तरह परंपरा से प्राप्त यह ज्ञान भगवान् श्री कृष्ण तक पहुँचा। भगवान् शिव-महेश ने ब्रह्मा के पुत्र दक्ष की बेटी सती से विवाह किया और भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा जी  के पुत्र भृगु की बेटी माता लक्ष्मी से विवाह किया। तदोपरांत ब्रह्मा जी ने  देव, दैत्य, दानव, राक्षस, मानव, किन्नर, वानर, नाग, मल्ल आदि हजारों तरह के जीवों की रचना की। उसके पूर्व की यही सृष्टि दैविक सृष्टि थी। 
स्वयम्भुव मनु के कुल में भगवान् विष्णु के अवतार भगवान् ऋषभदेव हुए। भगवान् ऋषभदेव स्वयम्भुव मनु से 5वीं पीढ़ी में :- स्वयम्भुव मनु, प्रियव्रत, अग्नीघ्र, नाभि और फिर ऋषभ। ऋषभदेव ने प्रजा को जीवन के निर्वाह हेतु असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, विद्या, शिल्प आदि की शिक्षा दी। इनका नंदा व सुनंदा से विवाह हुआ। इनके भरत व बाहुबली आदि 100 पुत्र हुए। राजा भरत के नाम पर आर्यवर्त भारत कहलाया। शेष 99 पुत्र भगवान् ऋषभदेव के आदेशानुसार ऋषि हो गए। 
ऋषि कश्यप, हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष :: संपूर्ण धरती पर जल-जल ही था। जल जब हटा तो धरती का सर्वप्रथम हिस्सा जो प्रकट हुआ, वह मेरू पर्वत के आसपास का क्षेत्र था। यह पर्वत हिमालय के बीचों बीच का हिस्सा है। यहीं पर कैलाश पर्वत है। मरीचि के पुत्र और ब्रह्मा जी के पौत्र महृषि कश्यप की तपोभूमि है कश्मीर। सुर-असुरों के मूल पुरुष ऋषि कश्यप का आश्रम मेरू पर्वत के शिखर पर था, जहाँ पर वे परब्रह्म परमात्मा के ध्यान में लीन रहते थे। समस्त देव, दानव एवं मानव ऋषि कश्यप की आज्ञा का पालन करते थे। 
सृष्टि की रचना और विकास के क्रम में प्रजापति ब्रह्मा जी से ही दक्ष प्रजापति  उत्पन्न हुए। उन्होंने अपनी पत्नी असिक्नी के गर्भ से 66 कन्याएं पैदा कीं। इन कन्याओं में से 13 कन्याएं ऋषि कश्यप की पत्नियां बनीं। इन्हीं कन्याओं से मैथुनी सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए। कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से भगवान् विष्णु के श्रापग्रस्त द्वारपाल जय और विजय  को असुर हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रों के रूप में जन्म प्रदान किया। इनके सिंहिका नामक एक बहन भी थी। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे :- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। अदिति के पुत्र सुर-देवगणों और दिति के पुत्र असुरों में त्रिलोकी के अधिपत्य को लेकर देवासुर संग्राम हुआ।
हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से युद्ध में अजेय रहने का वरदान प्राप्त किया और निरंकुश हो गया। उसने वेदों को चुरा लिया और पृथ्वी को भी जल में छुपा दिया।  भगवान् विष्णु ने वराह रूप धारण करके पृथ्वी को अपने थूथन पर धारण करके जल से बाहर निकाला और हिरण्याक्ष का वध करके वेदों को मुक्त किया।  भगवान् विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया।
हिरण्यकश्यप ने अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए कठोर तपस्या की और ब्रह्मा जी से वरदान किया। उसका पुत्र प्रह्लाद  भगवान्  विष्णु का परम भक्त  था। हिरण्य कश्यप को यह अच्छा नहीं लगता था। हिरण्याक्ष की तरह वह चाहता था कि संपूर्ण धरती के देव, दानव और मानव उसे ईश्‍वर मानें। भगवान्  विष्णु ने नृसिंह का अवतार लेकर उसका वध किया। ब्रह्मा जी सहित सभी देवताओं ने उनकी आराधना की तो भी वे शान्त नहीं हुए तब ब्रह्मा जी के आदेश पर प्रह्लाद ने उनकी स्तुति की और वे शाँत हो गए। भक्त प्रह्लाद के विरोचन जैसे दानवीर पुत्र हुए और उनके ही पुत्र राजा बाहु बली हुए।सहस्त्रबाहु जो कि भगवान् शिव के परम भक्त थे उन्हीं की पुत्र थे। भगवान् श्री कृष्ण ने सहस्त्रबाहु की भुजाओं को काटा। भगवान् शिव ने उसे बताया कि उनमें और भगवान् कृष्ण में अंतर नहीं है। 
ब्रह्मा जी के पहले पुत्र मरीचि :: महर्षि मरीचि ब्रह्मा के अन्यतम मानसपुत्र और एक प्रधान प्रजापति हैं। इन्हें द्वितीय ब्रह्मा ही कहा गया है। ऋषि मरीचि पहले मन्वंतर के पहले सप्तऋषियों की सूची के पहले ऋषि है। यह दक्ष के दामाद और भगवान् शंकर के साढू थे।
इनकी पत्नि दक्ष कन्या संभूति थी। इनकी दो और पत्नियां थीं :- कला और उर्णा। उर्णा को ही धर्मव्रता भी कहा जाता है जो कि एक ब्राह्मण कन्या थी। दक्ष के यज्ञ में मरीचि ने भी भगवान् शंकर का अपमान किया था। इस पर भगवान् शंकर ने इन्हें भस्म कर डाला था।
इन्होंने ही भृगु को दण्ड नीति की शिक्षा दी है। ये सुमेरु के एक शिखर पर निवास करते हैं और महाभारत में इन्हें चित्र शिखण्डी भी कहा गया है। ब्रह्मा जी ने पुष्कर क्षेत्र में जो यज्ञ किया था उसमें ये अच्छावाक् पद पर नियुक्त हुए थे। दस हजार श्लोकों से युक्त ब्रह्म पुराण का दान पहले-पहल ब्रह्मा जी ने इन्हीं को किया था। वेद और पुराणों में इनके चरित्र का चर्चा मिलती है।
मरीचि ने कला नाम की स्त्री से विवाह किया और उनसे उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। कश्यप की माता ‘कला’ कर्दम ऋषि की पुत्री और ऋषि कपिल देव की बहन थी। ब्रह्मा के पोते और मरीचि के पुत्र कश्यप ने ब्रह्मा के दूसरे पुत्र दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया। मुख्यत इन्हीं कन्याओं से मैथुनी सृष्टि का विकास हुआ और कश्यप सृष्टिकर्ता कहलाए।
कश्यय पत्नी :- अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्ठा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। महर्षि कश्यप को विवाहित 13 कन्याओं से ही जगत के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वे लोकमाताएं कही जाती हैं। इन माताओं को ही जगत जननी कहा जाता है।
कश्यप की पत्नी अदिति से आदित्य (-देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अरिष्ठा से गंधर्व, सुरसा से राक्षस, इला से वृक्ष, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (-हिंस्त्र पशु) और तिमि से यादोगण (जलजंतु) की उत्पत्ति हुई।
कश्यप के अदिति से 12 आदित्य पुत्रों का जन्म हुए जिनमें विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। राजा इक्ष्वाकु के कुल में जैन और हिन्दु धर्म के महान तीर्थंकर, भगवान, राजा, साधु महात्मा और सृजनकारों का जन्म हुआ है।
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे :- (1). इल, (2).इक्ष्वाकु, (3). कुशनाम, (4).अरिष्ट, (5). धृष्ट, (6). नरिष्यन्त, (7). करुष, (8). महाबली, (9). शर्याति और (10).पृषध।
तार्क्ष्य कश्यप ने विनीता कद्रू, पतंगी और यामिनी से विवाह किया था। कश्यप ऋषि ने दक्ष की सिर्फ 13 कन्याओं से ही विवाह किया था।
इक्ष्वाकु के पुत्र और उनका वंश :- मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु के तीन पुत्र हुए:- (1). कुक्षि, (2). निमि और (3). दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। भगवान राम इक्षवाकु कुल में ही जन्में।
ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु :: वेद-पुराणों में भगवान् ब्रह्मा के मानस पुत्रों का वर्णन है। वे दिव्य सृष्टि के अंग थे। महाप्रलय, भगवान् ब्रह्मा जी के दिन-कल्प की शुरुआत में उनका उदय होता है। वेदों, पुराणों इतिहास को वे ही पुनः प्रकट करते हैं। ब्रह्मा जी के पुत्र भृगु का श्रुतियों में विशेष स्थान है। उनके  बड़े भाई का नाम अंगिरा था। अत्रि, मरीचि, दक्ष, वशिष्ठ, पुलस्त्य, नारद, कर्दम, स्वायंभुव मनु, कृतु, पुलह, सनकादि ऋषि इनके भाई हैं। उन्हें भगवान् विष्णु के श्वसुर और भगवान् शिव के साढू के रूप में भी जाना जाता है। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षि मंडल में स्थान प्राप्त है।
भृगु की  तीन पत्नियाँ :- ख्या‍ति, दिव्या और पौलमी। पहली पत्नी का नाम ख्याति था, जो दक्ष कन्या थी। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता (काव्य शुक्र और त्वष्टा-विश्वकर्मा) तथा एक पुत्री श्री लक्ष्मी का जन्म हुआ। घटनाक्रम एवं नामों में कल्प-मन्वन्तरों के कारण अंतर आता है। [देवी भागवत के चतुर्थ स्कंध, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, श्रीमद् भागवत] लक्ष्मी का विवाह उन्होंने भगवान् विष्णु से कर दिया था।
आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। 
दैत्यों के साथ हो रहे देवासुर संग्राम में महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति, जो योगशक्ति संपन्न तेजस्वी महिला थीं, दैत्यों की सेना के मृतक सैनिकों को जीवित कर देती थीं जिससे नाराज होकर श्री हरि विष्णु ने शुक्राचार्य की माता व भृगुजी की पत्नी ख्याति का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया।
दूसरी पत्नी पौलमी :- उनके ऋचीक व च्यवन नामक दो पुत्र और रेणुका नामक पुत्री उत्पन्न हुई। भगवान् परशुराम महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ऋषि ऋचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे। रेणुका का विवाह विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) से किया।
जब महर्षि च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। इस घटना से दंस पौलमी को छोड़कर चला गया, तत्पश्चात पौलमी दुख से रोती हुई शिशु (च्यवन) को गोद में उठाकर पुन: आश्रम को लौटी। पौलमी के गर्भ से 5 और पुत्र बताए गए हैं।
भृगु पुत्र धाता के आयती नाम की स्त्री से प्राण, प्राण के धोतिमान और धोतिमान के वर्तमान नामक पुत्र हुए। विधाता के नीति नाम की स्त्री से मृकंड, मृकंड के मार्कण्डेय और उनसे वेद श्री नाम के पुत्र हुए। 
भृगु के और भी पुत्र थे जैसे :- उशना, च्यवन आदि। ऋग्वेद में भृगुवंशी ऋषियों द्वारा रचित अनेक मंत्रों का वर्णन मिलता है जिसमें वेन, सोमाहुति, स्यूमरश्मि, भार्गव, आर्वि आदि का नाम आता है। भार्गवों को अग्निपूजक माना गया है। दाशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे।
शुक्राचार्य :- शुक्र के दो विवाह हुए थे। इनकी पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयंती थी, जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था और उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। दूसरी स्त्री का नाम गोधा (-शर्मिष्ठा) था जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे।
च्यवन ऋषि :- मुनिवर ने गुजरात के भड़ौंच (-खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा।
सुकन्या से च्यवन को अप्नुवान नाम का पुत्र मिला। द‍धीच इन्हीं के भाई थे। इनका दूसरा नाम आत्मवान भी था। इनकी पत्नी नाहुषी से और्व का जन्म हुआ। [और्व कुल का वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में, ऋग्वेद में 8. 10.2.4 पर, तैत्तरेय संहिता 7.1.8.1, पंच ब्राह्मण 21.10.6, विष्णुधर्म 1.32 तथा महाभारत अनु. 56 आदि में प्राप्त है]
ऋचीक :- पुराणों के अनुसार महर्षि ऋचीक, जिनका विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ हुआ था, के पुत्र जमदग्नि ऋषि हुए। जमदग्नि का विवाह अयोध्या की राजकुमारी रेणुका से हुआ जिनसे परशुराम का जन्म हुआ।
विश्वामित्र :- गाधि के एक विश्वविख्‍यात पुत्र हुए जिनका नाम विश्वामित्र था जिनकी गुरु वशिष्ठ से प्रतिद्वंद्विता थी। परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋचीक, पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वामित्र और भगवान् शंकर से प्राप्त हुई। च्यवन ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया।
मरीचि के पुत्र कश्यप की पत्नी अदिति से भी एक अन्य भृगु उत्त्पन्न हुए जो उनके ज्येष्ठ पुत्र थे। ये अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। इनके पुत्र बृहस्पतिजी हुए, जो देवगणों के पुरोहित-देव गुरु के रूप में जाने जाते हैं।
भृगु ने ही भृगु संहिता, भृगु स्मृति,  भृगु संहिता-ज्योतिष, भृगु संहिता-शिल्प, भृगु सूत्र, भृगु उपनिषद, भृगु गीता आदि की रचना की। 
दक्ष प्रजापति :: प्रजापति दक्ष भगवान् ब्रह्मा के दक्षिणा अंगुष्ठ से उत्पन्न हुए। सृष्टा की आज्ञा से वे प्रजा की सृष्टि करने में लगे।
सर्वप्रथम इन्होंने दस सहस्त्र हर्यश्व नामक पुत्र उत्पन्न किये। ये सब समान स्वभाव के थे। पिता की आज्ञा से ये सृष्टि के निमित्त तप में प्रवृत्त हुए, परंतु देवर्षि नारद ने उपदेश देकर उन्हें विरक्त बना दिया।
दूसरी बार एक सहस्त्र शबलाश्व (-सरलाश्व) नामक पुत्र उत्पन्न किये। ये भी देवर्षि के उपदेश से यति हो गये। दक्ष को रोष आया। उन्होंने देवर्षि को शाप दे दिया कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं स्थिर न रह सकोगे। भगवान्  ब्रह्मा ने प्रजापति को शान्त किया। अब मानसिक सृष्टि से वे उपरत हुए।
प्रजापति दक्ष की पत्नियां :- उनका पहला विवाह स्वायंभुव मनु की तृतीय पुत्री प्रसूति से हुआ। उन्होंने प्रजापति वीरण की कन्या असिकी-वीरणी दूसरी पत्नी बनाया। प्रसूति से दक्ष की 24 कन्याएं थीं और वीरणी से 60 कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां थीं। इनमें 10 धर्म को, 13 महर्षि कश्यप को, 27 चंद्रमा को, एक पितरों को, एक अग्नि को और एक भगवान् शंकर को ब्याही गयीं। महर्षि कश्यप को विवाहित 13 कन्याओं से ही जगत के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। वे लोकमाताएँ कही जाती हैं। समस्त दैत्य, गंधर्व, अप्सराएं, पक्षी, पशु सब सृष्टि इन्हीं कन्याओं से उत्पन्न हुई। दक्ष की ये सभी कन्याएं, देवी, यक्षिणी, पिशाचिनी आदि कहलाईं। उक्त कन्याओं और इनकी पुत्रियों को ही किसी न किसी रूप में पूजा जाता है। 
अदिति से आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अरिष्ठा से गंधर्व, सुरसा से राक्षस, इला से वृक्ष, मुनि से अप्सरागण, क्रोधवशा से सर्प, ताम्रा से श्येन-गृध्र आदि, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु) और तिमि से यादोगण (जलजंतु) आदि उत्पन्न हुए। 
प्रसूति से दक्ष की 24 पुत्रियां :- श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शांति, सिद्धि, कीर्ति, ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनुसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा।
पुत्रियों के पति के नाम :- पर्वत राजा दक्ष ने अपनी 13 पुत्रियों का विवाह धर्म से किया। ये 13 पुत्रियां हैं- श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शांति, सिद्धि और कीर्ति। धर्म से वीरणी की 10 कन्याओं का विवाह हुआ। मरुवती, वसु, जामी, लंबा, भानु, अरुंधती, संकल्प, महूर्त, संध्या और विश्वा।
इसके बाद ख्याति का विवाह महर्षि भृगु से, सती का विवाह रुद्र (भगवान् शिव) से, सम्भूति का विवाह महर्षि मरीचि से, स्मृति का विवाह महर्षि अंगीरस से, प्रीति का विवाह महर्षि पुलत्स्य से, सन्नति का कृत से, अनुसूया का महर्षि अत्रि से, ऊर्जा का महर्षि वशिष्ठ से, स्वाहा का अग्नि से और स्वधा का पितृस से हुआ।
इसमें सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध रुद्र-भगवान् शिव से विवाह किया। माँ पार्वती और भगवान् शंकर के दो पुत्र और एक पुत्री हैं। पुत्र-गणेश, कार्तिकेय और पुत्री वनलता।
वीरणी से दक्ष की साठ पुत्रियां :- मरुवती, वसु, जामी, लंबा, भानु, अरुंधती, संकल्प, महूर्त, संध्या, विश्वा, अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवषा, तामरा, सुरभि, सरमा, तिमि, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, सुन्रिता, पुष्य, अश्लेषा, मेघा, स्वाति, चित्रा, फाल्गुनी, हस्ता, राधा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मुला, अषाढ़, अभिजीत, श्रावण, सर्विष्ठ, सताभिषक, प्रोष्ठपदस, रेवती, अश्वयुज, भरणी, रति, स्वरूपा, भूता, स्वधा, अर्चि, दिशाना, विनीता, कद्रू, पतंगी और यामिनी।
चंद्रमा से 27 कन्याओं का विवाह :- कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, सुन्रिता, पुष्य, अश्लेषा, मेघा, स्वाति, चित्रा, फाल्गुनी, हस्ता, राधा, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मुला, अषाढ़, अभिजीत, श्रावण, सर्विष्ठ, सताभिषक, प्रोष्ठपदस, रेवती, अश्वयुज, भरणी। इन्हें नक्षत्र कन्या भी कहा जाता है। हालांकि अभिजीत को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र माने गए हैं। उक्त नक्षत्रों के नाम इन कन्याओं के नाम पर ही रखे गए हैं।
9 कन्याओं का विवाह :- रति का कामदेव से, स्वरूपा का भूत से, स्वधा का अंगिरा प्रजापति से, अर्चि और दिशाना का कृशश्वा से, विनीता, कद्रू, पतंगी और यामिनी का तार्क्ष्य कश्यप से। 
इनमें से विनीता से गरूड़ और अरुण, कद्रू से नाग, पतंगी से पतंग और यामिनी से शलभ उत्पन्न हुए।
भगवान् शंकर से विवाद करके दक्ष ने उन्हें यज्ञ में भाग नहीं दिया। पिता के यज्ञ में रुद्र के भाग न देखकर माता सती ने योगाग्नि से शरीर छोड़ दिया। भगवान् शंकर पत्नी के देहत्याग से रुष्ट हुए। उन्होंने वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने दक्ष का मस्तक दक्षिणाग्नि में हवन कर दिया। देवताओं की प्रार्थना पर तुष्ट होकर भगवान् शंकर ने सद्योजात प्राणी के सिर से दक्ष को जीवन का वरदान दिया। बकरे का मस्तक तत्काल मिल सका। तबसे प्रजापति दक्ष ‘अजमुख’ हो गए।
वीरभद्र के रोम-कूपों से अनेक रौम्य नामक गणेश्वर प्रकट हुए थे। वे विध्वंस कार्य में लगे हुए थे। दक्ष की आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने अग्नि के समान ओजस्वी रूप में दर्शन दिये और उसकी मनोकामना जानकर यज्ञ के नष्ट-भ्रष्ट तत्त्वों को पुन: ठीक कर दिया।


दक्ष ने एक हज़ार आठ नामों (शिव सहस्त्र नाम स्तोत्र) से भगवान् शिव की आराधना की और उनकी शरण ग्रहण की। भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर उसे एक हज़ार अश्वमेध यज्ञों, एक सौ वाजपेय यज्ञों तथा पाशुपत् व्रत का फल प्रदान किया।

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