Wednesday, December 30, 2015

AEROPLANES IN ANCIENT INDIA पौराणिक काल में भारतीय वैमानिकी

पौराणिक काल में भारतीय वैमानिकी 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj 
PhotoraycenterIncarnation of Bhagwan Vishnu as Bhagwan Ram took place in Treta Yug slightly more than 17,50,000 years ago. Sufficient evidence is available to prove that air ports existed all over the world, prior to that period as well. Some spots have been identified which clearly show relevance with the Temples all over the world, and air ports, the abode of Sanatan Dharm-now called Hinduism. Nazca lines do have specific relevance in the light of evidences evolving one after another. 
Image result for Images of ancient -alien aeroplanesMost common name in aeroplanes is Pushpak which belonged to Kuber-the treasures of demigods and forcibly snatched by Ravan-his younger brother from him. Kuber was a Yaksh and Ravan was a Rakshas.
Image result for Images of ancient -alien aeroplanesThe word Viman is a combination of वि-Vi-meaning sky and मान-Man-meaning major measurement. Pushpak Viman was an advanced version air crafts which could navigate with the brain power-waves and could move with the speeds much higher than the speed of light, in outer space as well. The technological marvel was created by a low potency incarnation of Bhagwan Vishnu-Vishwkarma who's sons Nal & Neel, devised the mythological Setu Samudrum-the bridge connecting Shri Lanka with Rameshwaram in Southern India called Adam's bridge by the British invaders.
An ancient aeroplane has been found in a cave in Afghanistan. The plane is struck in time wrap constituting of electromagnetic waves, similar to the ones found in Bermuda triangle. How ever it has been established without doubt that electromagnetic waves are capable of engulfing any thing. Repeated efforts made to recover it have failed and many people have vanished simultaneously. 
Image result for Images of ancient -alien aeroplanesIt matches the description of air crafts discussed in ancient scriptures belonging to Hinduism. Mahrishi Bhardwaj had cited numerous scriptures which had the designs of air crafts. He him self was capable of devising air crafts. Some books having sketches of various models of air crafts are still available.
A lot of light is emitted out when the engine of this plane starts. This is loaded with lethal weapons. It has 4 wheels. A number of personnel disappeared when they tried to rescue it. 
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Time well-rape is identical to coiled snake present in galaxy formation. The plane got activated to engulf soldiers and dogs present nearby. A number of spots-places have been identified in Shri Lanka-Ceylon which are discussed in Ramayan, meeting the geographical description. The mysterious medicinal herb Sanjeevni too has been located-identified over the mountain brought by Hanuman Ji to Lanka & left over there. This mountain has hundreds of herbs and plantation which are not seen any where in Lanka except this place.
Image result for Images of ancient -alien aeroplanesभरद्वाज ऋषि का वैमानिक शास्त्र :: महर्षि भरद्वाज द्वारा लिखित वैमानिक शास्त्र जिसमें एक उड़ने वाले यंत्र विमान के कई प्रकारों का वर्णन किया गया था तथा हवाई युद्ध के कई नियम व प्रकार बताए गए।
वैमानिक शास्त्र में भरद्वाज मुनि ने विमान की परिभाषा, विमान का चालक जिसे रहस्यज्ञ अधिकारी कहा गया, आकाश मार्ग, वैमानिक के कपड़े, विमान के पुर्जे, ऊर्जा, यंत्र तथा उन्हें बनाने हेतु विभिन्न धातुओं का जैसा वर्णन किया गया है जो कि आधुनिक युग में विमान निर्माण प्रकिया से काफी अधिक विकसित है।
भरद्वाज ऋषि द्वारा उनसे पूर्व के विमानशास्त्री आचार्य और उनके ग्रंथों का वर्णन :: (1). नारायण द्वारा रचित विमान चन्द्रिका, (2). शौनक द्वारा रचित व्योमयान तंत्र, (3). गर्ग द्वारा रचित यन्त्रकल्प, (4).  वायस्पति द्वारा रचित यान बिन्दु, (5). चाक्रायणी द्वारा रचित खेटयान प्रदीपिका और (6). धुण्डीनाथ द्वारा रचित व्योमयानार्क प्रकाश।भरद्वाज ऋषि का वैमानिक शास्त्र : महर्षि भरद्वाज द्वारा लिखित वैमानिक शास्त्र जिसमें एक उड़ने वाले यंत्र विमान के कई प्रकारों का वर्णन किया गया था तथा हवाई युद्ध के कई नियम व प्रकार बताए गए।
वैमानिक शास्त्र में भरद्वाज मुनि ने विमान की परिभाषा, विमान का चालक जिसे रहस्यज्ञ अधिकारी कहा गया, आकाश मार्ग, वैमानिक के कपड़े, विमान के पुर्जे, ऊर्जा, यंत्र तथा उन्हें बनाने हेतु विभिन्न धातुओं का जैसा वर्णन किया गया है जो कि आधुनिक युग में विमान निर्माण प्रकिया से काफी अधिक विकसित है।
भरद्वाज ऋषि द्वारा उनसे पूर्व के विमानशास्त्री आचार्य और उनके ग्रंथों का वर्णन :: (1). नारायण द्वारा रचित विमान चन्द्रिका, (2). शौनक द्वारा रचित व्योमयान तंत्र, (3). गर्ग द्वारा रचित यन्त्रकल्प, (4).  वायस्पति द्वारा रचित यान बिन्दु, (5). चाक्रायणी द्वारा रचित खेटयान प्रदीपिका और (6). धुण्डीनाथ द्वारा रचित व्योमयानार्क प्रकाश।
वैमानिक शास्त्र में उल्लेखित प्रमुख पौराणिक विमान :: (1). गोधा ऐसा विमान था जो अदृश्य हो सकता था। इसके जरिए दुश्मन को पता चले बिना ही उसके क्षेत्र में जाया जा सकता था, (2). परोक्ष दुश्मन के विमान को पंगु कर सकता था। इसकी कल्पना एक मुख्य युद्धक विमान के रूप में की जा सकती है। इसमें प्रलय नामक एक शस्त्र भी था जो एक प्रकार की विद्युत ऊर्जा का शस्त्र था, जिससे विमान चालक भयंकर तबाही मचा सकता था और (3). जलद रूप एक ऐसा विमान था जो देखने में बादल की भाँति दिखता था। यह विमान छ्द्मावरण में माहिर होता था।
अफगानिस्तान में एक अति प्राचीन पुराना विमान मिला है। यह विमान एक गुफा में पाया गया है। माना जा रहा है कि एक टाइम वेल में फंसा हुआ है जो कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है। इसका आकार-प्रकार प्राचीन ग्रंथों में‍ वर्णित विमानों जैसा है। इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। यह विमान घातक हथियारों से लैस है।  इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हो गए। टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाश गंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों। यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप 40 सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। 
रामायण में भी पुष्पक विमान का उल्लेख मिलता है जिसमें हरण करके रावण सीता जी को ले गया था। रावण के पास पुष्पक विमान था, जिसे उसने अपने भाई कुबेर से हथिया लिया था। राम-रावण युद्ध के बाद भगवान् श्री राम ने सीता, लक्ष्मण तथा अन्य लोगों के साथ सुदूर दक्षिण में स्थित लंका से कई हजार किमी दूर उत्तर भारत में अयोध्या तक की दूरी हवाई मार्ग से पुष्पक विमान द्वारा ही तय की थी।  
रामायण से जुड़े ऐसे 50 स्थल ढूंढ लिए हैं जिनका पौराणिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व है और जिनका रामायण में भी उल्लेख मिलता है। रावण के पुष्पक विमान के उतरने के स्थान और रामायण काल के कुछ हवाई अड्डे भी ढूंढ लिए गए हैं। वेरांगटोक (जो महियांगना से 10 किलोमीटर दूर है) में हैं ये हवाई अड्डे। यहीं पर रावण ने माता सीता का हरण कर पुष्पक विमान को उतारा था। महियांगना मध्य, श्रीलंका स्थित नुवारा एलिया का एक पर्वतीय क्षेत्र है। इसके बाद सीता माता को जहाँ ले जाया गया था उस स्थान का नाम गुरुलपोटा है। इसे अब सीतोकोटुवा नाम से जाना जाता है। यह स्थान भी महियांगना के पास है।
रावणैला गुफा : वैलाव्या और ऐला के बीच सत्रह मील लम्बे मार्ग पर एक बहुत सुन्दर स्थान, जिसे रावणैला गुफा कहा जाता है। रावण ने सीता से भेंट करने के लिए उस गुफा में प्रवेश करने का प्रयत्न किया था, परन्तु वह न तो गुफा के अन्दर जा सका और न ही माता सीता दर्शन कर सका।
उसानगोड़ा, गुरुलोपोथा, तोतूपोलाकंदा और वारियापोला वे स्थान हैं जहाँ पर रावण के समय में हवाई जहाज उतारे और उड़ाए जाते थे। इन चार में से एक उसानगोड़ा हवाई अड्डा नष्ट हो गया था। जब माँ सीता की तलाश में हनुमान जी लंका पहुँचे तो लंका दहन में रावण का उसानगोड़ा हवाई अड्डा नष्ट हो गया था।उसानगोड़ा हवाई अड्डे को स्वयं रावण निजी तौर पर इस्तेमाल करता था। यहाँ रनवे लाल रंग का है। इसके आसपास की जमीन कहीं काली तो कहीं हरी घास वाली है।
Image result for Images of ancient -alien aeroplanesपुष्पक विमान की यह विशेषता थी कि वह छोटा या बड़ा किया जा सकता था। पुष्पक विमान में इच्छानुसार गति होती थी और बहुत से लोगों को यात्रा करवाने की क्षमता थी। यह विमान आकाश में स्वामी की इच्छानुसार भ्रमण करता था अर्थात उसमें मन की गति से चलने की क्षमता थी।
स्कंद पुराण के खंड तीन अध्याय 23 में उल्लेख मिलता है कि ऋषि कर्दम ने अपनी पत्नी के लिए एक विमान की रचना की थी जिसके द्वारा कहीं भी आया जाया सकता था। उक्त पुराण में विमान की रचना और विमान की सुविधा का वर्णन भी मिलता है। ऋग्वेद के छत्तीसवें सूक्त के प्रथम मंत्र का अर्थ लिखा है कि ऋभुओं ने तीन पहियों वाला ऐसा रथ (-यान) बनाया था जो अंतरिक्ष में उड़ सकता था।
मिस्र के सक्कारा में एक मकबरे से 6 इंच लम्बा लकड़ी का बना ग्लाइडर जैसा दिखने वाला एक मॉडल मिला था। मिस्र के एक वैमानिक विशेषज्ञ ने इसका अध्ययन कर बताया कि इसकी बनावट पूरी तरह आजकल के विमानों की तरह है। यहाँ तक कि इसकी टेल भी उतने ही कोण पर बनी है जिस पर वर्तमान ग्लाइडर बहुत कम ऊर्जा में भी उड़ सकता है।अभी तक मिस्र के किसी भी मकबरे या पिरामिड से किसी विमान के कोई अवशेष या ढाँचा नहीं मिला है, पर एबीडोस के मंदिर पर उत्कीर्ण चित्रों में आजकल के विमानों से मिलती-जुलती आकृतियाँ उकेरी हुई मिली हैं।
मिस्र के एक मंदिर में ऐसी कई आकृतियाँ देखने को मिलती हैं जिसमें विमानों तथा हवा में उड़ने वाले उपकरणों को प्रदर्शित किया गया है। इनमें से कुछ तो आधुनिक हेलिकॉप्टर तथा जेट से मिलते-जुलते हैं। वहाँ की कई लोक कथाओं तथा अरब देश की मशहूर कहानी अलिफ-लैला (-अरेबियन नाइट्स) में भी उड़ने वाले कालीन का जिक्र मिलता है।
पेरू के धुंधभरे पहाड़ों में छिपी इंका सभ्यता की नाज़्का रेखाएँ तथा आकृतियाँ आज भी अंतरिक्ष से देखी जा सकती हैं। लेटिन अमेरिकी भूमि के समतल और रेतीले पठार पर बनी मीलों लंबी यह रेखाएँ ज्यामिति का एक अनुपम उदाहरण हैं। यहाँ बनी जीव-जंतुओं की 18 विशाल आकृतियाँ भी इतनी कुशलता से बनाई गई हैं कि लगता है मानो किसी विशाल से ब्रश के जरिये अंतरिक्ष से उकेरी गई हों। इंका सभ्यता के खंडहरों और पिरामिडों (-मिस्र के बाद पिरामिड यहाँ भी मिले हैं) के भित्तिचित्रों में मनुष्यों के पंख दर्शाए गए हैं तथा उड़न तश्तरी और अंतरिक्ष यात्रियों सरीखी पोशाक में लोगों के चित्र बने हैं।
मध्य अमेरिका से मिले पुरातात्विक अवशेषों में धातु की बनी आकृतियाँ बिलकुल आधुनिक विमानों से मिलती हैं। माचू-पिच्चू की धुन्ध भरी पहाड़ियों में रहने वाले कुछ समुदाय वहाँ पाए जाने वाले विशालकाय पक्षी कांडोर को पूजते हैं और इस क्षेत्र में मिले प्राचीन भित्ति चित्रों में लोगों को इसकी पीठ पर बैठ कर उड़ते हुए भी दिखाया गया है।

Bhagwan Shiv is known as Tri Purari since has destroyed the three planes made of Iron, Gold and silver made by Vishw Karma the hub-abode of billions of demons moving in specific orbits round the earth, when they came in one straight line with a single arrow.
पौराणिक काल में वैमानिकी ::
(1). ऋगवेद :: इस आदि ग्रन्थ में कम से कम 200 बार विमानों के बारे में उल्लेख है। उन में तिमंजिला, त्रिभुज आकार के, तथा तिपहिये विमानों का उल्लेख है जिन्हे अश्विनों (वैज्ञिानिकों) ने बनाया था। उन में साधारणत्या तीन यात्री जा सकते थे। विमानों के निर्माण के लिये स्वर्ण, रजत तथा लोह धातु का प्रयोग किया गया था तथा उनके दोनो ओर पंख होते थे।
वेदों में विमानों के कई आकार-प्रकार उल्लेखित किये गये हैं। अहनिहोत्र विमान के दो ईंजन तथा हस्तः विमान (हाथी की शक्ल का विमान) में दो से अधिक ईंजन होते थे। एक अन्य विमान का रुप किंग-फिशर पक्षी के अनुरूप था।
याता-यात के लिये ऋग वेद में जिन विमानों का उल्लेख है वह इस प्रकार है-
जल-यान :- यह वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 6.58.3)
कारा :- यह भी वायु तथा जल दोनो तलों में चल सकता था। (ऋग वेद 9.14.1)
त्रिताला :- इस विमान का आकार तिमंजिला था। (ऋग वेद 3.14.1)
त्रिचक्र रथ :- यह तिपहिया विमान आकाश में उड सकता था। (ऋग वेद 4.36.1)
वायु रथ :- रथ की शकल का यह विमान गैस अथवा वायु की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 5.41.6)
विद्युत रथ :- इस प्रकार का रथ विमान विद्युत की शक्ति से चलता था। (ऋग वेद 3.14.1).
(2). यजुर्वेद में भी एक अन्य विमान का तथा उन की संचलन प्रणाली उल्लेख है जिस का निर्माण जुडवा अशविन कुमारों ने किया था। इस विमान के प्रयोग से उन्हो मे राजा भुज्यु को समुद्र में डूबने से बचाया था।
(3). विमानिका शास्त्र :- 1875 ईसवी में भारत के ऐक मन्दिर में विमानिका शास्त्र ग्रंथ की एक प्रति मिली थी। जिसे ऋषि भरद्वाज रचित माना जाता है। 
इसी ग्रंथ में पूर्व के 97 अन्य विमानाचार्यों का वर्णन है तथा 20 ऐसी कृतियों का वर्णन है जो विमानों के आकार प्रकार के बारे में विस्तरित जानकारी देते हैं। खेद का विषय है कि इन में से कई अमूल्य कृतियाँ अब लुप्त हो चुकी हैं। इन ग्रन्थों के विषय इस प्रकार थेः-
विमान के संचलन के बारे में जानकारी, उडान के समय सुरक्षा सम्बन्धी जानकारी, तूफान तथा बिजली के आघात से विमान की सुरक्षा के उपाय, आवश्यक्ता पडने पर साधारण ईंधन के बदले सौर ऊर्जा पर विमान को चलाना आदि। इस से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इस विमान में ‘एन्टी ग्रेविटी’ क्षेत्र की यात्रा की क्षमता भी थी।
विमानिका शास्त्र में सौर ऊर्जा के माध्यम से विमान को उडाने के अतिरिक्त ऊर्जा को संचित रखने का विधान भी बताया गया है। ऐक विशेष प्रकार के शीशे की आठ नलियों में सौर ऊर्जा को एकत्रित किया जाता था जिस के विधान की पूरी जानकारी लिखित है किन्तु इस में से कई भाग अभी ठीक तरह से समझे नहीं गये हैं।
इस ग्रन्थ के आठ भाग हैं जिन में विस्तरित मानचित्रों से विमानों की बनावट के अतिरिक्त विमानों को अग्नि तथा टूटने से बचाव के तरीके भी लिखित हैं। ग्रन्थ में 31 उपकरणों का वर्तान्त है तथा 16 धातुओं का उल्लेख है जो विमान निर्माण में प्रयोग की जाती हैं जो विमानों के निर्माण के लिये उपयुक्त मानी गयीं हैं क्यों कि वह सभी धातुयें गर्मी सहन करने की क्षमता रखती हैं और भार में हल्की हैं।

ऋषि देवताओं द्वारा निर्मित तीन पहियों के ऐसे रथ का उल्लेख ऋग्वेद (मण्डल 4, सूत्र 25, 26) में मिलता है, जो अंतरिक्ष में भ्रमण करता है। ऋषिओं ने मनुष्य-योनि से देवभाव पाया था। देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों द्वारा निर्मित पक्षी की तरह उडऩे वाले त्रितल रथ, विद्युत-रथ और त्रिचक्र रथ का उल्लेख भी पाया जाता है।
महाभारत में भगवान् श्री कृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है। वाल्मीकि रामायण में कुबेर के पुष्पक विमान, जो लंकापति रावण के पास था का वर्णन मिलता है।  
महर्षि भारद्वाज रचित  वैमानिक शास्त्र
वैमानिक शास्त्र महर्षि भारद्वाज द्वारा संस्कृत भाषा में लगभग 18,00,000 साल पहले लिखा गया वः ग्रन्थ है जिसमें विभिन्न प्रकार के यान, वायुयान आदि की रचना, ईंधन, तकनीकि प्रेक्षण आदि सम्बन्धी जानकारी दी गई है। इसमें कुल 8 अध्याय और 3,000 श्लोक हैं। 
इस ग्रंथ के पहले प्रकरण में प्राचीन विज्ञान विषय के पच्चीस ग्रंथों की एक सूची है, जिनमें प्रमुख है अगस्त्यकृत-शक्तिसूत्र, ईश्वरकृत-सौदामिनी कला, भरद्वाजकृत-अशुबोधिनी, यंत्रसर्वसव तथा आकाश शास्त्र, शाकटायन कृत-वायुतत्त्व प्रकरण, नारदकृत-वैश्वानरतंत्र, धूम प्रकरण आदि।
विमान शास्त्र की टीका लिखने वाले बोधानन्द लिखते है –
निर्मथ्य तद्वेदाम्बुधिं भरद्वाजो महामुनिः; नवनीतं समुद्घृत्य यन्त्रसर्वस्वरूपकम्‌।
प्रायच्छत्‌ सर्वलोकानामीप्सिताज्ञर्थ लप्रदम्‌; तस्मिन चत्वरिंशतिकाधिकारे सम्प्रदर्शितम्‌॥
नाविमानर्वैचित्र्‌यरचनाक्रमबोधकम्‌; अष्टाध्यायैर्विभजितं शताधिकरणैर्युतम।
सूत्रैः पञ्‌चशतैर्युक्तं व्योमयानप्रधानकम्‌; वैमानिकाधिकरणमुक्तं भगवतास्वयम्‌॥
भरद्वाज महामुनि ने वेदरूपी समुद्र का मन्थन करके यन्त्र सर्वस्व नाम का ऐसा मक्खन निकाला है , जो मनुष्य मात्र के लिए इच्छित फल देने वाला है । उसके चालीसवें अधिकरण में वैमानिक प्रकरण जिसमें विमान विषयक रचना के क्रम कहे गए हैं । यह ग्रंथ आठ अध्याय में विभाजित है तथ्ज्ञा उसमें एक सौ अधिकरण तथा पाँच सौ सूत्र हैं तथा उसमें विमान का विषय ही प्रधान है।
प्रथम अध्याय  :: (1.1). मङ्गलाचरणम्, (1.2). विमानशब्दार्थाधिकरणम्, (1.3). यन्तृत्वाधिकरणम्, (1.4). मार्गाधिकरणम्, (1.5). आवर्ताकरणम्, (1.6). अङ्काकरणम्, (1.7). वस्त्राकरणम्, (1.8). आहाराकरणम्, (1.9). कर्माधिकाराधिकरणम्, (1.10). विमानाधिकरणम्, (1.11). जात्याधिकरणम्, (1.12). वर्णाधिकरणम्। 
द्वितीय अध्याय :: (2.1). संज्ञाधिकरणम्, (2.2). लोहाधिकरणम्, (2.3). संस्काराधिकरणम्, (2.4). दर्पणाधिकरणम्, (2.5). शक्त्यधिकरणम्, (2.6).यन्त्राधिकरणम्, (2.7). तैलाधिकरणम्, (2.8). ओषध्यधिकरणम्, (2.9). घाताधिकरणम्, (2.10).भाराधिकरणम्। 
तृतीय अध्याय :: (3.1). भ्रामण्यधिकरणम्, (3.2). कालाधिकरणम्, (3.3). विकल्पाधिकरणम्, (3.4). संस्काराधिकरणम्, (3.5). प्रकाशाधिकरणम्, (3.6). उष्णाधिकरणम्, (3.7). शैत्याधिकरणम्, (3.8). आन्दोलनाधिकरणम्, (3.9). तिर्यन्धाधिकरणम्, (3.10). विश्वतोमुखाधिकरणम्, (3.11). धूमाधिकरणम्, (3.12). प्राणाधिकरणम्, (3.13). सन्ध्यधिकरणम्। 
चतुर्थ अध्याय :: (4.1). आहाराधिकरणम्, (4.2). लगाधिकरणम्, (4.3). वगाधिकरणम्, (4.4). हगाधिकरणम्, (4.5). लहगाधिकरणम्, (4.6). लवगाधिकरणम्, (4.7). लवहगाधिकरणम्, (4.8). वान्तर्गमनाधिकरणम्, (4.9). अन्तर्लक्ष्याधिकरणम्, (4.10). बहिर्लक्ष्याधिकरणम्, (4.11). बाह्याभ्यन्तर्लक्ष्याधिकरणम्। 
पञ्चम अध्याय :: (5.1). तन्त्राधिकरणम्, (5.2). विद्युत्प्रसारणाधिकरणम्, (5.3). व्याप्त्यधिकरणम्, (5.4). स्तम्भनाधिकरणम्, (5.5). मोहनाधिकरणम्, (5.6). विकाराधिकरणम्, (5.7). दिङ्निदर्शनाधिकरणम्, (5.8). अदृष्याधिकरणम्, (5.9). तिर्यञ्चाधिकरणम्, (5.10). भारवहनाधिकरणम्, (5.11). घण्टारवाधिकरणम्, (5.12). शुक्रभ्रमणाधिकरणम्, (5.13). चक्रगत्यधिकरणम्। 
सष्ठम अध्याय :: (6.1). वर्गविभाजनाधिकरणम्, (6.2). वामनिर्णयाधिकरणम्, (6.3). शक्त्युद्गमाधिकरणम्, (6.4). सूतवाहाधिकरणम्, (6.5). धूमयानाधिकरणम्, (6.6). शिखोद्गमाधिकरणम्, (6.7). अंशुवाहाधिकरणम्, (6.8). तारमुखाधिकरणम्, (6.9). मणिवाहाधिकरणम्, (6.10). मतुत्सखाधिकरणम्, (6.11). शक्तिगर्भाधिकरणम्, (6.12). गारुडाधिकरणम्। 
सप्तम अध्याय  :: (7.1). सिंहिकाधिकरणम्, (7.2). त्रिपुराधिकरणम्, (7.3). गूढचाराधिकरणम्, (7.4). कूर्माधिकरणम्, (7.5). ज्वालिन्यधिकरणम्, (7.6). माण्डलिकाधिकरणम्, (7.7). आन्दोलिकाधिकरणम्, (7.8). ध्वजाङ्गाधिकरणम्, (7.9). वृन्दावनाधिकरणम्, (7.10). वैरिञ्चिकाधिकरणम्, (7.11). जलदाधिकरणम्। 
अष्टम अध्याय :: (8.1). दिङ्निर्णयाधिकरणम्, (8.2). ध्वजाधिकरणम्, (8.3). कालाधिकरणम्, (8.4). विस्तृतक्रियाधिकरणम्, (8.5). अङ्गोपसहाराधिकरणम्, (8.6). तमप्रसारणाधिकरणम्, (8.7). प्राणकुण्डल्यधिकरणम्, (8.8). रूपाकर्षणाधिकरणम्, (8.9). प्रतिबिम्बाकर्षणाधिकरणम्, (8.10). गमागमाधिकरणम्, (8.11). आवासस्थानाधिकरणम्, (8.12). शोधनाधिकरणम्, (8.13). परिच्छेदाधिकरणम्, (8.14). रक्षणाधिकरणम्। 
विमान के 32 रहस्य :: इस ग्रन्थ में विमान चालक (पाइलॉट) के लिये  निम्न 32 रहस्यों (systems) की जानकारी आवश्यक बतायी गयी है। इन रहस्यों को जान लेने के बाद ही पाइलॉट विमान चलाने का अधिकारी हो सकता है। मांत्रिक, तान्त्रिक, कृतक, अन्तराल, गूढ, दृश्य, अदृश्य, परोक्ष, संकोच, विस्तृति, विरूप परण, रूपान्तर, सुरूप, ज्योतिर्भाव, तमोनय, प्रलय, विमुख, तारा, महाशब्द विमोहन, लाङ्घन, सर्पगमन, चपल, सर्वतोमुख, परशब्दग्राहक, रूपाकर्षण, क्रियाग्रहण, दिक्प्रदर्शन, आकाशाकार, जलद रूप, स्तब्धक, कर्षण।
भारद्वाज ऋषि के विमान शास्त्र के उनसे पूर्व हुए आचार्य तथा उनके ग्रंथ निम्नानुसार हैं :- 
(1).  नारायण कृत–विमान चन्द्रिका, (2). शौनक कृत-न् व्योमयान तंत्र, (3). गर्ग-यन्त्रकल्प, (4). वायस्पतिकृत-यान बिन्दु, (5) चाक्रायणीकृत-खेटयान प्रदीपिका (6) धुण्डीनाथ-व्योमयानार्क प्रकाश। 
इस ग्रन्थ में भरद्वाज मुनि ने विमान की परिभाषा, विमान का पायलट जिसे रहस्यज्ञ अधिकारी कहा गया, आकाश मार्ग, वैमानिक के कपड़े, विमान के पुर्जे, ऊर्जा, यंत्र तथा उन्हें बनाने हेतु विभिन्न धातुओं का वर्णन किया गया है ।
विमान शास्त्र में 31 प्रकार के यंत्र तथा उनका विमान में निश्चित स्थान का वर्णन मिलता है। इन यंत्रों का कार्य क्या है इसका भी वर्णन किया गया है। कुछ यंत्रों की जानकारी निम्नानुसार है :–
(1). विश्व क्रिया दर्पण :– इस यंत्र के द्वारा विमान के आसपास चलने वाली गति- विधियों का दर्शन वैमानिक को विमान के अंदर होता था, इसे बनाने में अभ्रक तथा पारा आदि का प्रयोग होता था।
(2). परिवेष क्रिया यंत्र :– इसमें स्वाचालित यंत्र वैमानिक यंत्र वैमानिक का वर्णन है।
(3). शब्दाकर्षण यंत्र :– इस यंत्र के द्वारा 26 किमी. क्षेत्र की आवाज सुनी जा सकती थी तथा पक्षियों की आवाज आदि सुनने से विमान को दुर्घटना से बचाया जा सकता था।
(4). गुह गर्भ यंत्र :- इस यंत्र के द्वारा जमीन के अन्दर विस्फोटक खोजने में सफलता मिलती है।
(5). शक्त्याकर्षण यंत्र :– विषैली किरणों को आकर्षित कर उन्हें उष्णता में परिवर्तित करना और उष्णता के वातावरण में छोड़ना।
(6). दिशा दर्शी यंत्र :– दिशा दिखाने वाला यंत्र। 
(7). वक्र प्रसारण यंत्र :– इस यंत्र के द्वारा शत्रु विमान अचानक सामने आ गया, तो उसी समय पीछे मुड़ना संभव होता था।
(8). अपस्मार यंत्र :– युद्ध के समय इस यंत्र से विषैली गैस छोड़ी जाती थी।
(9). तमोगर्भ यंत्र :– इस यंत्र के द्वारा शत्रु युद्ध के समय विमान को छिपाना संभव था। तथा इसके निर्माण में तमोगर्भ लौह प्रमुख घटक रहता था।
ऊर्जा स्रोत :- विमान को चलाने के लिए चार प्रकार के ऊर्जा स्रोतों का महर्षि भरद्वाज उल्लेख करते हैं,
(1). वनस्पति तेल जो पेट्रोल की भाँति काम करता था।
(2). पारे की भाप-प्राचीन शास्त्रों में इसका शक्ति के रूप में उपयोग किए जाने का वर्णन है। 
(3). सौर ऊर्जा-इसके द्वारा भी विमान चलता था। ग्रहण कर विमान उड़ना जैसे समुद्र में पाल खोलने पर नाव हवा के सहारे तैरता है। इसी प्रकार अंतरिक्ष में विमान वातावरण से शक्ति ग्रहण कर चलता रहेगा। 
विमान के प्रकार :– विमान विद्या के पूर्व आचार्य युग के अनुसार विमानों का वर्णन करते हैं । मंत्रिका प्रकार के विमान जिसमें भौतिक एवं मानसिक शक्तियों के सम्मिश्रण की प्रक्रिया रहती थी वह सतयुग और त्रेता युग में सम्भव था । इनके 56 प्रकार बताए गए हैं तथा कलियुग में कृतिका प्रकार के यंत्र चालित विमान थे। इनके 25 प्रकार बताए हैं। इनमें शकुन, रुक्म, हंस, पुष्कर, त्रिपुर आदि प्रमुख थे।
प्रथम धातु है तमोगर्भ लौह। विमान शास्त्र में वर्णन है कि यह विमान अदृश्य करने के काम आता है। इस पर प्रकाश छोड़ने से 75 से 80 प्रतिशत प्रकाश को सोख लेतो है। यह धातु रंग में काली तथा शीशे से कठोर तथा कान्सन्ट्रेटेड सल्फ्‌यूरिक एसिड में भी नहीं गलती।
दूसरी धातु जो बनाई है, उसका नाम है पंच लौह। यह रंग में स्वर्ण जैसा है तथा कठोर व भारी है । ताँबा आधारित इस मिश्र धातु की विशेषता यह है कि इसमें सीसे का प्रमाण 7.95 प्रतिशत है।
तीसरी धातु है, आरर। यह ताँबा आधारित मिश्र धातु है, जो रंग में पीली और कठोर तथा हल्की है। इस धातु में तमेपेजंदबम जव उवपेजनतम का गुण है। 
प्रकाश स्तंभन भिद् लौह :: इसका निर्माण कचर लौह (Silica), भूचक्र सुरमित्रादिक्षर (Lime), अयस्कान्त (Lodestone) अंशुबोधिनी में वर्णित विधि से किया गया है। प्रकाश स्तंभन भिद् लौह की यह विशेषता है कि यह पूरी तरह से नॉन हाईग्रोस्कोपिक है, हाईग्रोस्कोपिक इन्फ्रारेड वाले काँचों में पानी की भाप या वातावरण की नमी से उनका पॉलिश हट जाता है और वे बेकार हो जाते हैं। इन्फ्रारैड सिग्नल्स में यह आदर्श काम करता है तथा इसका प्रयोग वातावरण में मौजूद नमी के खतरे के बिना किया जा सकता है।
विमान, Definition of Plane :: (1). अष् नारायण ऋषि कहते हैं जो पृथ्वी, जल तथा आकाश में पक्षियों के समान वेग पूर्वक चल सके, उसका नाम विमान है। (2). शौनक के अनुसार, एक स्थान से दूसरे स्थान को आकाश मार्ग से जा सके, विश्वम्भर के अनुसार, एक देश से दूसरे देश या एक ग्रह से दूसरे ग्रह जा सके, उसे विमान कहते हैं। (3). "वेग-संयत् विमानो अण्डजानाम्" अर्थात पक्षियों के समान वेग होने के कारण इसे विमान कहते हैं। 
यंत्र सर्वस्व :: इस ग्रंथ में इंजीनियरी आदि से संबंधित, चालीस प्रकरण हैं। ‘यंत्र सर्वस्व’ के इस वैमानिक प्रकरण के अतिरिक्त विमान शास्त्र से संबंधित अनेक ग्रंथ हैं, जिनमें छः ऋषियों के ग्रंथ प्रसिद्ध हैं:
नारायण कृत ‘विमान चंद्रिका’, शौनक कृत ‘व्योमयान’, गर्ग कृत ‘यंत्रकल्प’, वाचस्पति कृत ‘यानविंदु’, चाक्रायणि कृत ‘खेटयान प्रदीपिका’, तथा घुंडिनाथ कृत ‘व्योमयानार्क प्रकाश’।
महर्षि भारद्वाज ने न केवल वेदों तथा इन छः ग्रंथों का भी मंथन किया वरन् अन्य अनेक ऋषियों द्वारा इन विषयों पर रचित ग्रंथों का भी मंथन किया था। इसमें आचार्य लल्ल (‘रहस्य लहरी’), सिद्धनाथ, विश्वकर्मा (पुष्पक विमान का आविष्कर्ता), छायापुरुष, मनु, मय आदि के ग्रंथों की चर्चा है।
बृहद विमान शास्त्र में कुल 97 विमान से संबद्ध ग्रंथों का संदर्भ है। और भी अनेकों से जानकारी ली गई है। महर्षि भारद्वाज के ‘बृहद विमान शास्त्र’ (बृ0वि0शा0) में  विमानों के इंजीनियरी निर्माण की विधियों का विस्तृत वर्णन है। 
वैमानिक का खाद्य :- इसमें किस ऋतु में किस प्रकार का अन्न हो इसका वर्णन है । उस समय के विमान आज से कुछ भिन्न थे । आज ते विमान उतरने की जगह निश्चित है पर उस समय विमान कहीं भी उतर सकते थे। अतः युद्ध के दौरान जंगल में उतरना पड़ा तो जीवन निर्वाह कैसे करना, इसीलिए 100 वनस्पतियों का वर्णन दिया है, जिनके सहारे दो तीन माह जीवन चलाया जा सकता है। वैमानिक को दिन में 5 बार भोजन करना चाहिए। उसे कभी विमान खाली पेट नहीं उड़ाना चाहिए। 
मेघोत्पत्तिप्रकरणोक्तशरन्मेधावरणषट्केषु द्वितीया वरणपथे विमानमन्तर्धाय विमानस्थ शक्त्याकर्षणदर्पणमुखात्तन्मेधशक्तिमाहत्य पच्श्राद्विमानपरिवेषचक्रमुखे नियोजयेत्।
तेनस्तंभनशक्तिप्रसारणम् भवति, पच्श्रात्तद्दवा रा लोकस्तम्भनक्रियारहस्यम्॥
मेघोत्पत्ति प्रकरण में कहे शरद ऋतु संबंधी छ: मेघावरणों के द्वितीय आवरण मार्ग में विमान छिपकर विमानस्थ शक्ति का आकर्षण करने वाले दर्पण के मुख से उस मेघशक्ति को लेकर पश्चात् विमान के घेरे वाले चक्रमुख में नियुक्त करे, उससे स्तम्भन शक्ति का विस्तार अर्थात प्रसार हो जाता है, एवं स्तम्भन क्रिया रहस्य हो जाता है ....
इस मंत्र में जो दर्पण आया है, उसे शक्ति आकर्षण दर्पण कहा जाता है, यह पूर्व के विमानों में लगा होता था, यह दर्पण मेघों की शक्ति को ग्रहण करता है।
विमान में स्थित चक्र मुख यंत्र आकाश में शक्ति आकर्षण दर्पण मेघों की शक्ति को ग्रहण करके, स्थित चक्र के माध्यम से मुख यंत्र तक पहुचा देता है... तत्पश्चात चन्द्र मुख यंत्र स्तंभन क्रिया का प्रारम्भ कर देता है......
विमान को अदृश्य करने का रहस्य :- उसमें शक्ति यंत्र सूर्य किरणों के उषादण्ड के सामने पृष्ठ केंद्र में रहने वाले वेणरथ्य किरण आदि शक्तियों से आकाश तरंग के शक्ति प्रवाह को खीचता है और वायुमंडल में स्थित बलाहा विकरण आदि पाँच शक्तियों को नियुक्त करके उनके द्वारा सफ़ेद अभ्रमंडलाकार करके उस आवरण से विमान के अदृश्य करने का रहस्य है। 
विश्वक्रिया  दर्पण (रडार सिस्टम) :- इसके अंतर्गत आकाश में विद्युत किरण और वात किरण मतलब रेडियो वेव्स, के परस्पर सम्मेलन से उत्पन्न होने वाली बिंबकारक शक्ति अर्थात इमेज मेकिंग पावर वेव्स का प्रयोग करके, रडार के पर्दो पर छाया चित्र बनाकर आकाश मे उड़ने वाले अदृश्य विमानों का पता लगाया जा सकता है।
रहस्यज्ञ अधिकारी (पायलट) :- विमान के रहस्यों को जानने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है। शास्त्रों में विमान चलाने के बत्तीस रहस्य बताए गए हैं। उनका भलीभाँति ज्ञान रखने वाला ही उसे चलाने का अधिकारी है।क्योंकि विमान बनाना, उसे जमीन से आकाश में ले जाना, खड़ा करना, आगे बढ़ाना टेढ़ी-मेढ़ी गति से चलाना या चक्कर लगाना और विमान के वेग को कम अथवा अधिक करना उसे जाने बिना यान चलाना असम्भव है। अतः जो इन रहस्यों को जानता है, वह रहस्यज्ञ अधिकारी है तथा उसे विमान चलाने का अधिकारी है तथा उसे विमान चलाने का अधिकार है।
कृतक रहस्य :- विश्वकर्मा, छायापुरुष, मनु तथा मय दानव आदि के विमान शास्त्र के आधार पर आवश्यक धातुओं द्वारा इच्छित विमान बनाना। यह हार्डवेयर का वर्णन है।
गूढ़ रहस्य :– यह विमान को छिपाने की विधि है। इसके अनुसार वायु तत्त्व प्रकरण में कही गयी रीति के अनुसार वातस्तम्भ की जो आठवीं परिधि रेखा है उस मार्ग की यासा, वियासा तथा प्रयासा इत्यादि वायु शक्तियों के द्वारा सूर्य किरण रहने वाली जो अन्धकार शक्ति है, उसका आकर्षण करके विमान के साथ उसका सम्बन्ध बनाने पर विमान छिप जाता है।
अपरोक्ष रहस्य :– शक्ति तंत्र में कही गयी रोहिणी विद्युत्‌ के फैलाने से विमान के सामने आने वाली वस्तुओं को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
संकोचा :– आसमान में उड़ने समय आवश्यकता पड़ने पर विमान को छोटा करना।
विस्तृता :– आवश्यकता पड़ने पर विमान को बड़ा करना। 
सर्पागमन रहस्य :– विमान को सर्प के समान टेढ़ी-मेढ़ी गति से उड़ाना संभव है। इसमें काह गया है दण्ड, वक्रआदि सात प्रकार के वायु और सूर्य किरणों की शक्तियों का आकर्षण करके यान के मुख में जो तिरछें फेंकने वाला केन्द्र है, उसके मुख में उन्हें नियुक्त करके बाद में उसे खींचकर शक्ति पैदा करने वाले नाल में प्रवेश कराना चाहिए। इसके बाद बटन दबाने से विमान की गति साँप के समान टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है। 
पर शब्द ग्राहक रहस्य :–  शब्द ग्राहक यंत्र विमान पर लगाने से उसके द्वारा दूसरे विमान पर लोगों की बात-चीत सुनी जा सकती है।
रूपाकर्षण रहस्य :– इसके द्वारा दूसरे विमानों के अंदर का सब कुछ देखा जा सकता था।
दिक्प्रदर्शन रह्रस्य :– दिशा सम्पत्ति नामक यंत्र द्वारा दूसरे विमान की दिशा ध्यान में आती है।
स्तब्धक रहस्य :– एक विशेष प्रकार का अपस्मार नामक गैस स्तम्भन यंत्र द्वारा दूसरे विमान पर छोड़ने से अंदर के सब लोग बेहोश हो जाते हैं।
कर्षण रहस्य :– अपने विमान का नाश करने आने वाले शत्रु के विमान पर अपने विमान के मुख में रहने वाली वैश्र्‌वानर नाम की नली में ज्वालिनी को जलाकर सत्तासी लिंक ( डिग्री जैसा कोई नाप है) प्रमाण हो, तब तक गर्म कर फिर दोनों चक्कल की कीलि (बटन) चलाकर शत्रु विमानों पर गोलाकार से उस शक्ति की फैलाने से शत्रु का विमान नष्ट हो जाता है।
आकाश मार्श :- महर्षि शौनक आकाश मार्ग का पाँच प्रकार का विभाजन करते हैं तथा धुण्डीनाथ विभिन्न मार्गों की ऊँचाई विभिन्न मार्गों की ऊँचाई पर विभिन्न आवर्त्त या (whirlpools) का उल्लेख करते हैं और उस ऊँचाई पर सैकड़ों यात्रा पथों का संकेत देते हैं। इसमें पृथ्वी से 100 किलोमीटर ऊपर तक विभिन्न ऊँचाईयों पर निर्धारित पथ तथा वहाँ कार्यरत शक्तियों का विस्तार से वर्णन करते हैं।आकाश मार्ग तथा उनके आवर्तों का वर्णन निम्नानुसार है :–
 (1). रेखा पथ, शक्त्यावृत्त, (whirlpool of energy) :- 0-10 किलोमीटर,  
(2). वातावृत्त, (wind) :- 10-50 किलोमीटर,  
(3). कक्ष पथ, किरणावृत्त, (solar rays) :- 50-60 किलोमीटर,  
(4). शक्तिपथ, सत्यावृत्त, (cold current) :- 60-80 किलोमीटर।

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