HINDU PHILOSOPHY (9) हिन्दु दर्शन शास्त्र :: RITES-SANSKAR IN HINDUISM सनातन धर्म में संस्कार

RITES-SANSKAR IN HINDUISM
 सनातन धर्म में संस्कार
   CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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संस्कार  :-  शुद्धिकरण अर्थात् मन, वाणी और शरीर का सुधार। मनुष्य की सारी प्रवृतियों का संप्रेरक मन में पलने वाला संस्कार होता है।व्यक्ति के चरित्र निर्माण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।ये  सामाजिक-धार्मिक कृत्य किसी व्यक्ति को अपने समुदाय का पूर्ण रुप से योग्य सदस्य बनाने के उद्देश्य से उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्र करने के साथ-साथ व्यक्ति में अभीष्ट गुणों को जन्म देना है।मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है। कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से समाज के योग्य-उपयुक्त बनता है: (1). पूर्व जन्म के कर्म के दोषों को दूर करने से और (2).  इस जन्म में नए सत्  गुणों के विकास से। 
प्रत्येक संस्कार से पूर्व होम किया जाता है। जिस गृह्यसूत्र का अनुकरण किया जाता है उसी के अनुसार आहुतियों की संख्या, हव्यपदार्थों और मंत्रों के प्रयोग में अलग-अलग परिवारों में भिन्नता होती है।संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों का कल्याण होता है। संस्कार केवल वर्तमान ही नहीं अपितु अगले जन्मों-पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते हैं।
ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में विवाह, गर्भाधान और अंत्येष्टि से संबंधित कुछ धार्मिक कृत्यों का वर्णन मिलता है।यजुर्वेद में केवल श्रौत यज्ञों का उल्लेख है।  अथर्ववेद में विवाह, अंत्येष्टि और गर्भाधान संस्कारों का विस्तृत वर्णन है। गोपथ और शतपथ ब्राह्मणों में उपनयन गोदान संस्कारों के धार्मिक कृत्यों का उल्लेख है। तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा समाप्ति पर आचार्य की दीक्षांत शिक्षा का वर्णन है।गृहसूत्रों में संस्कारों की पूरी पद्धति का वर्णन मिलता है। गृह्यसूत्रों में संस्कारों के वर्णन में सबसे पहले विवाह संस्कार सहित गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जात-कर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्न-प्राशन, चूड़ा-कर्म, उपनयन और समावर्तन संस्कारों का वर्णन किया गया है। अंत्येष्टि संस्कार का वर्णन अशुभ होने के कारण नहीं है। स्मृतियों के आचार प्रकरणों में संस्कारों का उल्लेख है और तत्संबंधी नियम दिए गए हैं। इनमें उपनयन और विवाह संस्कारों का वर्णन विस्तार के साथ दिया गया है, क्योंकि उपनयन संस्कार के द्वारा व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम में और विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था। वैखानस स्मृति सूत्र में शरीर संबंधी संस्कारों और यज्ञों का उल्लेख है। मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है। कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से योग्य बनता है :- पूर्व कर्म के दोषों को दूर करने से और नए गुणों के सृजन से। संस्कार ये दोनों ही काम करते हैं।
गौतम धर्मसूत्र में संस्कारों की संख्या चालीस है ::
(1). गर्भाधान, (2). पुंसवन, (3). सीमंतोन्नयन, (4). जातकर्म, (5). नामकरण, (6). अन्न प्राशन, (7). चौल, (8). उपनयन, (9-12). वेदों के चार व्रत, (13). स्नान, (14). विवाह, (15-19). पंच दैनिक महायज्ञ, (20-26). सात पाकयज्ञ, (27-33). सात हविर्यज्ञ, (34-40). सात सोमयज्ञ। अधिकतर धर्मशास्रों ने वेदों के चार व्रतों, पंच दैनिक महायज्ञों, सात पाकयज्ञों, सात हविर्यज्ञों और सात सोमयज्ञों का वर्णन संस्कारों में नहीं किया है।
मनु के अनुसार :: गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, केशांत, समावर्तन, विवाह और श्मशान, इन तेरह संस्कारों का उल्लेख किया है।
याज्ञवल्क्य ने भी इन्हीं संस्कारों का वर्णन किया है। केवल केशांत का वर्णन उसमें नहीं मिलता है, क्योंकि इस काल तक वैदिक ग्रंथों के अध्ययन का प्रचलन बंद हो गया था।
सोलह संस्कार :: गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है। महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया। व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है। धर्म शास्त्रों में भी मुख्य रूप से सोलह संस्कारों की व्याख्या की गई है।
(1). गर्भाधान :: प्रथम कर्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है। जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है। उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए।  
निषेकाद बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते। क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्॥
विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।
गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका प्रभाव उनके रज-वीर्य में भी पड़ता है। अतः उस रज-वीर्यजन्य संतान में माता-पिता के वे भाव स्वतः ही प्रकट हो जाते है। 
आहाराचारचेष्टाभिर्यादृशोभि: समन्वितौ। स्त्रीपुंसौ समुपेयातां तयोः पुतोडपि तादृशः॥
स्त्री और पुरुष जैसे आहार-व्यवहार तथा चेष्टा से संयुक्त होकर परस्पर समागम करते हैं, उनका पुत्र भी वैसे ही स्वभाव का होता है।
सन्तानार्थी पुरुष ऋतुकाल में ही स्त्री का समागम करे, पर-स्त्री का सदा त्याग रखे। स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल रजो-दर्शन से 16 रात्रि पर्यन्त है। इसमे प्रथम चार रात्रियों में तो स्त्री-पुरुष सम्बन्ध होना ही नहीं चाहिए, ऐसा समागम व्यर्थ ही नहीं होता अपितु महा रोग कारक भी है।
इसी प्रकार 11 वीं और तेरहवी रात्रि भी गर्भाधान के लिए वर्जित है। शेष दस रात्रियां ठीक है। इनमें भी जो पूर्णमासी, अमावस्या, चदुर्दशी व अष्टमी (पर्व) रात्रि हो उसमें भी स्त्री-समागम से बचा रहे। छ्ठी, आठवी दशवी, बारहवी, चौदहवी और सोलहवी ये छः रात्रि पुत्र चाहने वाले के लिए तथा पाचंवी, सातवीं, नवीं और पन्द्रहवीं-ये चार रात्रियां कन्या की इच्छा से किये गये गर्भाधान के लिए उत्तम मानी गई है।
ऋतुस्नान के बाद स्त्री जिस प्रकार के पुरुष का दर्शन करती है, वैसा ही पुत्र उत्पन्न होता है। अतः जो स्त्री चाहती है कि मेरे पति के समान गुण वाला या अभिमन्यु जैसा वीर, ध्रुव जैसा भक्त, जनक जैसा आत्मज्ञानी, कर्ण जैसा दानी पुत्र हो, तो उसे चाहिए की ऋतुकाल के चौथे दिन स्नान आदि से पवित्र होकर अपने आदर्श रुप इन महापुरुषों के चित्रों का दर्शन तथा सात्त्विक भावों से उनका चिंतन करें और इसी सात्त्विकभावों में योग्य रात्रि को गर्भाधान करावे। रात्रि के तृतीय प्रहर (12  से 3 बजे) की संतान हरिभक्त और धर्मपरायण होती है।
संतानप्राप्ति के उद्देश्य से किए जाने वाले समागम के लिए अनेक वर्जनाएं भी निर्धारित की गई है, जैसे गंदी या मलिन-अवस्था में, मासिक धर्म के समय, प्रातः या सायं की संधिवेला में अथवा चिंता, भय, क्रोध आदि मनोविकारों के पैदा होने पर गर्भाधान नहीं करना चाहिए।
दिन में गर्भाधान करने से उत्पन्न संतान दुराचारी और अधम होती है। दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु जैसा महादानव इसलिए उत्पन्न हुआ था कि उसने आग्रहपूर्वक अपने स्वामी कश्यप के द्धारा संध्याकाल में गर्भाधान करवाया था। श्राद्ध के दिनों, पर्वों व प्रदोष-काल में भी समागम करना शास्त्रों में वर्जित है।
(2). पुंसवन :: गर्भस्थ शिशु के मानसिक विकास की दृष्टि से यह संस्कार उपयोगी समझा जाता है। गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में इस संस्कार को करने का विधान है। गर्भस्थ शिशु से सम्बन्धित इस संस्कार को शुभ नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता है।  विशेष तिथि एवं ग्रहों की गणना के आधार पर ही गर्भधान करना उचित माना गया है। पुंसवन संस्कार का प्रयोजन स्वस्थ एवं उत्तम संतति को जन्म देना है। मनीषियों ने सन्तानोत्कर्ष के उद्देश्य से किये जाने वाले इस संस्कार को अनिवार्य माना है। गर्भधारण के पश्चात संभोग निषिद्ध है। 
पुंसवन संस्कार के दो प्रमुख लाभ :: पुत्र प्राप्ति और स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान है। गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय। शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें। उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए।
क्रिया और भावना ::  गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ। निम्न मंत्रोचारण किया जाये :- 
ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ। 
स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यङ्गानि यजूषि नाम।
 साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान दिवं गच्छ स्वःपत॥
मंत्र समाप्ति पर अक्षत, पुष्प एक तश्तरी में एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए। वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे। भावना की जाए, गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ को वह लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है।
(3). सीमन्तोन्नयन :: सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की माँग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है।
(4). JATKARM-POST DELIVERY प्रसव उपरान्त क्रियाएँ- जातकर्म :: नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने वाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता यज्ञ करता है , बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घ जीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।यह संस्कार विशेष मन्त्रों एवं विधि से किया जाता है।
शिशु के विश्व प्रवेश पर उसके ओजमय अभिनन्दन का यह संस्कार है। इसमें सन्तान की अबोध अवस्था में भी उस पर संस्कार डालने की चेष्टा की जाती है। माता से शारीरिक सम्बन्ध टूटने पर उसके मुख नाकादि को स्वच्छ करना ताकि वह श्वास ले सके तथा दूध पी सके।
यह सफाई सधी हुई दाई या नर्स द्वारा किया जाता है। सैंधव नमक घी में मिलाकर देने से नाक और गला साफ हो जाते हैं। बच्चे की त्वचा को साफ करने के लिए साबुन या बेसन और दही को मिलाकर उबटन की तरह प्रयोग किया जाता है।
स्नान के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग होता है। चरक के अनुसार कान को साफ करके वे शब्द सुन सकें इसलिए कान के पास पत्थरों को बजाना चाहिए।
बच्चे के सिर पर घी में डूबोया हुआ फाया रखते हैं क्योंकि तालु जहां पर सिर की तीन अस्थियां दो पासे की ओर एक माथे से मिलती है वहां पर जन्मजात बच्चे में एक पतली झिल्ली होती है।
इस तालु को दृढ़ बनाने इसकी रक्षा करने इसे पोषण दिलाने के लिए ये आवश्यक होता है। इस प्रयोग से बच्चे को सर्दी जुकाम आदि नहीं सताते। जन्म पश्चात सम शीतोष्ण वातावरण में शिशु प्रथम श्वास ले।
शिशु का प्रथम श्वास लेना अति महत्वपूर्ण घटना है। गर्भ में जन्म पूर्व शिशु के फफ्फुस जल से भारी होते हैं। प्रथम श्वास लेते समय ही वे फैलते हैं और जल से हलके होते हैं। इस समय का श्वसन-प्रश्वसन शुद्ध समशीतोष्ण वातायन में हो।
शिशु के तन को कोमल वस्त्र या रुई से सावधानीपूर्वक साफ-सुथरा कर गोद में लेकर देवयज्ञ करके स्वर्ण शलाका को सममात्रा मिश्रित घी-षहद में डुबोकर उसकी जिह्वा पर ब्रह्म नाम लिखकर उसके वाक देवता जागृत करे।
इसके साथ उसके दाहिने तथा बाएं कान में "वेदोऽसि" कहा जाता है। अर्थात तू ज्ञानवाला प्राणी है, अज्ञानी नहीं है। तेरा नाम ब्रह्मज्ञान है। इसके पष्चात सोने की शलाका से उसे मधु-घृत चटाया जाता है और उसके अन्य बीज देवताओं में शब्द उच्चारण द्वारा शतवर्ष स्वस्थ अदीन ब्रह्म निकटतम जीने की भावना भरें, यह कामना की जाती है।
शिशु के दाएं तथा बाएं कान में क्रमषः शब्दोच्चार करते सविता, सरस्वती, इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा, मेधा, अग्नि, वनस्पति, सोम, देव, ऋषि, पितर, यज्ञ, समुद्र, समग्र व्यवस्था द्वारा आयुवृद्धि, स्वस्थता प्राप्ति भावना भरें, यह कामना की जाती है। 
तत्पश्चात शिशु के कन्धों को अपनत्व भाव स्पर्श करके उसके लिए उत्तम दिवसों, ऐश्वर्य, दक्षता, वाक का भाव रखते उसके ब्रह्मचर्य-गृहस्थ-वानप्रस्थ (संन्यास सहित) तथा बल-पराक्रमयुक्त इन्द्रियों सहित और विद्या-शिक्षा-परोपकार सहित (त्र्यायुष-त्रि) होने की भावना का शब्दोच्चार करें।
इसी के साथ प्रसूता पत्नी के अंगों का सुवासित जल से मार्जन करता परिशुद्धता ऋत-शृत भाव उच्चारे।
इसके पश्चात शिशु को कः, कतरः, कतमः याने आनन्द, आनन्दतर, आनन्दतम भाव से सशब्द आशीर्वाद देकर, अपनत्व भावना भरा उसके अंग-हृदय सम-भाव अभिव्यक्त करते हुए उसके ज्ञानमय शतवर्ष जीने की कामना करता उसके शीष को सूंघे।
इतना करने के पश्चात पत्नी के दोनों स्तनों को पुष्पों द्वारा सुगन्धित जल से मार्जन कराकर दक्षिण, वाम स्तनों से शिशु को ऊर्जित, सरस, मधुमय प्रविष्ट कराने दुग्धपान कराए। इसके पष्चात वैदिक विद्वान पिता-माता सहित शिशु को दिव्य इन्द्रिय, दिव्य जीवन, स्वस्थ तन, व्यापक-अभय-उत्तम जीवन शतवर्षाधिक जीने का आषीर्वाद दें।
जातकर्म की अन्तिम प्रक्रिया जो शिशु के माता-पिता को करनी है वह है :- दस दिनों तक भात तथा सरसौं मिलाकर आहुतियां देना।
(5). NAMING नामकरण :: इस संस्कार का सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व है।जन्म के दस दिन तक अशौच (-सूतक) माना जाता है। इसलिये यह संस्कार ग्यारहवें दिन करने का विधान है। लेकिन अनेक कर्मकाण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।यह व्यक्तित्व के विकास में सहायक होता है। महर्षि याज्ञवल्क्य का भी यही मत है, लेकिन अनेक कर्म काण्डी विद्वान इस संस्कार को शुभ नक्षत्र अथवा शुभ दिन में करना उचित मानते हैं।मनीषियों ने नाम का प्रभाव इसलिये भी अधिक बताया है, क्योंकि यह व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक है।कहा गया है राम से बड़ा राम का नाम। धर्म में ज्योतिष मनुष्य के भविष्य की रूपरेखा  का ज्ञान-भान करा देता है। इस संस्कार का उदेश्य केवल शिशु को नाम देना भर नहीं है, अपितु उसे श्रेष्ठ तम सस्कारों सहित उच्च कोटि के मानव के रूप में विकसित करना है। नाम केवल सम्बोधन के लिए अपितु साभिप्राय होना चाहिये।  सन्तान के जन्म के दिन से ग्यारहवें दिन, एक सौ एकवें दिन या दूसरे वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो यह संस्कार करना चाहिए। नाम ऐसा रक्खे कि श्रवण मात्र से मन में उदात्त भाव उत्पन्न करनेवाला हो।यह उच्चारण में सरल होना चाहिए। स्व-नाम श्रवण व्यक्ति अपने जीवन में अधिकतम बार करता है। अपना नाम उसकी सबसे बड़ी पहचान है। अपना नाम पढ़ना, सुनना हमेशा भला और उत्तम लगता है। नाम रखने में देवश्रव, दिवस ऋत या श्रेष्ठ श्रव भाव आना चाहिए। नाम हमेशा शुभ ही रखना चाहिए। शुभ तथा अर्थमय नाम ही सार्थक नाम है। कः कतमः सिद्धान्त नामकरण का आधार सिद्धान्त है। कौन हो ? सुख हो, ब्रह्मवत हो। कौन-तर हो ? ब्रह्मतर हो। कौन-तम हो ? ब्रह्मतम हो। ब्रह्म व्यापकता का नाम है। मानव का व्यापक रूप प्रजा है। अतिव्यापक रूप सु-प्रजा है। भौतिक व्यापकता क्रमश: पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक है। इन लोकों के आरोहण के भाव वेद मन्त्रों में हैं। वीर शरीर-आत्म-समाज बल से युक्त युद्ध कुशल व्यक्ति का नाम है। सुवीर प्रशस्त वीर का नाम है, जो परमात्म बल शरीर, आत्म, समाज में उतारने में कुशल होता है। सामाजिक आत्मिक निष्ठाओं (यमों) का पालन ही व्यक्ति को श्रेष्ठ ऐश्वर्य देता उसको सु-ऐश्वर्य दे परिपुष्ट करता है। 
यदि सन्तान बालक है तो समाक्षरी अर्थात दो अथवा चार अक्षरोंयुक्त नाम रखा जाता है। और इनमें ग घ ङ ज झ ड ढ ण द ध न ब भ म य र ल व इन अक्षरों का प्रयोग किया जाए। बालिका का नाम विषमाक्षर अथात एक, तीन या पांच अक्षरयुक्त होना चाहिए।
(6). CONNECTING WITH THE ENVIRONMENT निष्क्रमण :: निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। यह घर की अपेक्षा अधिक शुद्ध वातावरण में शिशु के भ्रमण की योजना है। बच्चे के शरीर तथा मन के विकास के लिए उसे घर के चार दीवारी से बाहर ताजी शुद्ध हवा एवं सूर्यप्रकाश का सेवन कराना इस संस्कार का उद्देश्य है। 
गृह्यसूत्रों के अनुसार जन्म के बाद तीसरे शुक्ल पक्ष की तृतीया अर्थात चान्द्रमास की दृष्टि से जन्म के दो माह तीन दिन बाद अथवा जन्म के चौथे माह में यह संस्कार करे। दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घ काल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो। हमारा शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जिन्हें पंचभूत कहा जाता है, से बना है। इसलिए पिता इन देवताओं से बच्चे के कल्याण की प्रार्थना करते हैं।
इसमें शिशु को ब्रह्म द्वारा समाज में अनघ अर्थात पाप रहित करने की भावना तथा वेद द्वारा ज्ञान पूर्ण करने की भावना अभिव्यक्त करते माता-पिता यज्ञ करें। पति-पत्नी प्रेमपूर्वक शिशु के शत तथा शताधिक वर्ष तक समृद्ध, स्वस्थ, सामाजिक, आध्यात्मिक जीने की भावनामय होकर शिशु को सूर्य का दर्शन कराए।इसी प्रकार रात्रि में चन्द्रमा का दर्षन उपरोक्त भावना सहित कराए। यह संस्कार शिशु को आकाष, चन्द्र, सूर्य, तारे, वनस्पति आदि से परिचित कराने के लिए है।
आयुर्वेद के ग्रन्थों में कुमारागार, बालकों के वस्त्र, उसके खिलौने, उसकी रक्षा एवं पालनादि विषयों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। कुमारागार ऐसा हो जिसमें अधिक हवा न आती हो किन्तु एक ही मार्ग से वायु प्रवेश हो। कुत्ते, हिंसक जन्तु, चूहे, मच्छर, आदि न आ सकें ऐसा पक्का मकान हो।जिसमें यथा स्थान जल, कूटने-पीसने का स्थान, मल-मूत्र त्याग के स्थान, स्नानगृह, रसोई अलग-अलग हों। इस कुमारागार में रक्षा के समस्त साधन, मंगलकार्य, होमादि की सामग्री उपस्थित हों।
बच्चों के बिस्तर, आसन, बिछाने के वस्त्र कोमल, हल्के पवित्र, सुगन्धित होनें चाहिए। पसीना, मलमूत्र एवं जूं आदि से दूषित कपड़े हटा देवें। बरतन नए हों अन्यथा अच्छी प्रकार धोकर गुग्गुल, सरसो, हींग, वच, चोरक आदि का धुंआ देकर साफ करके सुखाकर काम में ले सकते हैं। बच्चों के खिलौने विचित्र प्रकार के बजनेवाले, देखने में सुन्दर एवं हल्के हों। वे नुकीले न हों, मुख में न आ सकनेवाले तथा प्राणहरण न करनेवाले होनें चाहिए।
(7). FEEDING SOLID FOOD अन्नप्राशन :: शिशु जो अब तक पेय पदार्थो विशेषकर दूध पर आधारित था, अब अन्न जिसे शास्त्रों में प्राण कहा गया है उसको ग्रहण कर शारीरिक व मानसिक रूप से अपने को बलवान व प्रबुद्ध बनाए। तन और मन को सुदृढ़ बनाने में अन्न का सर्वाधिक योगदान है। शुद्ध, सात्विक एवं पौष्टिक आहार से ही तन स्वस्थ रहता है और स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। आहार शुद्ध होने पर ही अन्त:करण शुद्ध होता है तथा मन, बुद्धि, आत्मा सबका पोषण होता है। अन्नप्राशन के लिये जन्म से छठे महीने को उपयुक्त माना है। छठे मास में शुभ नक्षत्र एवं शुभ दिन देखकर यह संस्कार करना चाहिए। खीर और मिठाई से शिशु के अन्नग्रहण को शुभ माना गया है। हमारे शास्त्रों में खीर को अमृत के समान माना गया है।
जब बालक के प्रायः दाँत निकल आते हैं, तब उसे उबला हुआ अन्न खिलाया जाता है। इसमें वह दही, मधु, घी, चावल आदि खिला सकते हैं। इस संस्कार के पूर्व शिशु अपने भोजन के लिए माता के दूध या गाय के दूध पर निर्भर रहता था।  जब उसकी पाचन शक्ति बढ़ जाती है और उसके शरीर के विकास के लिए पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है, तब बालक को प्रथम बार अन्न अथवा ठोस भोजन दिया जाता है।
मानव एवं शंख के अनुसार यह संस्कार जन्म से पाँचवें या छठे महीने में किया जाना चाहिए, किंतु मनु तथा याज्ञवलक्य दोनों ही इसके लिए 6-12 मास के बीच का समय उपयुक्त मानते हैं तथा साथ ही यह मत भी कि पुत्र शिशु का अन्नप्राशन सम मासों ( 6, 8, 10, 12) तथा कन्या शिशु का विषम मासों (5, 7, 9, 11) में किया जाना अधिक उपयुक्त होता है। जीवन में पहले पहल बालक को अन्न खिलाना इस संस्कार का उद्देश्य है। पारस्कर गृह्यसूत्र के अनुसार छठे माह में अन्नप्राशन संस्कार होना चाहिए। कमजोर पाचन शिशु का सातवे माह जन्म दिवस पर कराए।
इसमें ईश्वर प्रार्थना उपासना पश्चात शिशु के प्राण-अपानादि श्वसन व्यवस्था तथा पंचेन्द्रिय परिशुद्धि भावना का उच्चारण करता घृतमय भात पकाना तथा इसी भात से यज्ञ करने का विधान है।
इस यजन में माता-पिता तथा यजमान विश्व देवी प्रारूप की अवधारणा के साथ शिशु में वाज स्थापना (षक्तिकरण-ऊर्जाकरण) की भावना अभिव्यक्त करे। इसके पश्चात पुनः पंच श्वसन व्यवस्था तथा इन्द्रिय व्यवस्था की शुद्धि भावना पूर्वक भात से हवन करे। फिर शिशु को घृत, मधु, दही, सुगन्धि (अति बारीक पिसी इलायची आदि) मय भात रुचि अनुकूल सहजतापूर्वक खिलाए। इस संस्कार में अन्न के प्रति पकाने की सौम्य महक तथा हवन के एन्झाइम ग्रहण से क्रमषः संस्कारित अन्नभक्षण का अनुकूलन है। माता के दूध से पहले पहल शिशु को अन्न पर लाना हो तो मां के दूध की जगह गाय का दूध देना चाहिए। इस दूध को देने के लिए 150 मि.ग्रा. गाय के दूध में 60 मि.ग्रा. उबला पानी व एक चम्मच मीठा ड़ालकर शिशु को पिला दें। यह क्रम एक सप्ताह तक चलाकर दूसरे सप्ताह एक बार की जगह दो बार बाहर का दूध दें। तीसरे सप्ताह दो बार की जगह तीन बार बाहर का दूध दें, चौथे सप्ताह दोपहर दूध के स्थान पर सब्जी का रसा, थोड़ा दही, थोड़ा शहद, थोड़ा चावल दें। पांचवें सप्ताह दो समय के दूध के स्थान पर रसा, सब्जी, दही, शहद आदि बढ़ा दें। इस प्रकार बालक को धीरे-धीरे माता का दूध छुड़ाकर अन्न पर ले आने से बच्चे के पेट में कोई रोग होने की सम्भावना नहीं रहती। इस संस्कार पश्चात कालान्तर में दिवस-दिवस क्रमश: मूंगदाल, आलू, विभिन्न मौसमी सब्जियां, शकरकंद, गाजर, पालक, लौकी आदि (सभी भातवत अर्थात अति पकी- गलने की सीमा तक पकी) द्वारा भी शिशु का आहार अनुकूलन करना चाहिए। इस प्रकार व्यापक अनुकूलित अन्न खिलाने से शिशु अपने जीवन में सुभक्षण का आदि होता है तथा स्वस्थता प्राप्त करता है। इस संस्कार के बाद शिशु मितभुक्, हितभुक्, ऋतभुक्, शृतभुक होता है।
(8). CHUDA KARM-FIRST HAIR DRESSING चूड़ा कर्म-मुण्डन संस्कार :: बालक के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में इस संस्कार को करने का विधान है। इस संस्कार के पीछे शुाचिता और बौद्धिक विकास की भावना है। मुंडन संस्कार का अभिप्राय है कि जन्म के समय उत्पन्न अपवित्र बालों को हटाकर बालक को प्रखर बनाना है। नौ माह तक गर्भ में रहने के कारण शरीर के साथ-साथ उसके बालों भी अपवित्र-अशुद्ध हो जाते हैं। मुंडन संस्कार से इन दोषों का निवारण होता है।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस संस्कार को शुभ मुहूर्त में करने का विधान है।
संस्कारों की प्रतिष्ठापना बालकपन में ही करके उन्हें सुसंस्कारी बनाया जाता है ताकि वेदारम्भ तथा क्रिया-कर्मों के लिए अधिकारी बन सके अर्थात वेद-वेदान्तों के पढ़ने तथा यज्ञादिक कार्यों में भाग ले सके। उसका मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए, ऐसा विचार किया जाता है।चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहने के कारण आत्मा कितने ही ऐसे पाशविक संस्कार, विचार, मनोभाव अपने भीतर धारण किये रहती है, जो मानव जीवन में अनुपयुक्त एवं अवांछनीय होते हैं।मूल केशों को हटाकर मानवता वादी आदर्शो को प्रतिष्ठापित किये जाने हेतु यह कर्म आवश्यक है। ऐसा न होने पर यह मानना होगा कि आकृति मात्र मनुष्य की हुई-प्रवृत्ति पशु की।
रोग रहित उत्तम समृद्ध ब्रह्म गुणमय आयु तथा समृद्धि-भावना के कथन के साथ शिशु के प्रथम केशों के छेदन का विधान चूडाकर्म अर्थात मुण्डन संस्कार है। बच्चे के दांत छः सात मास की आयु से निकलना प्रारम्भ होकर ढाई-तीन वर्ष तक की आयु तक निकलते रहते हैं।
दांत निकलते समय सिर भारी हो जाता है, गर्म रहता है, सिर में दर्द होता है, मसूड़े सूझ जाते हैं, लार बहा करती है, दस्त लग जाते हैं, आंखे आ जाती हैं, बच्चा चिड़चिड़ा हो जाता है।दांतों के निकलने का भारी प्रभाव सिर पर पड़ता है। इसलिए सिर को हल्का और ठंडा रखने के लिए सिर पर बालों का बोझ उतार ड़ालना ही इस संस्कार का उदेश्य है।
शिशु गर्भ में होता है तभी उसके बाल आ जाते हैं, उन मलिन बालों को निकाल देने से, सिर की खुजली दाद आदि से रक्षा होती है। उसके उपरांत उगने वाले बाल मजबूत-घने होते हैं। 
इस संस्कार द्वारा बालक में त्र्यायुष भरने की भावना भरी जाती है। त्र्यायुष एक व्यापक विज्ञान है।
(8.1) ज्ञान-कर्म-उपासना त्रिमय चार आश्रम त्र्यायुष हैं। (8.2) शुद्धि, बल और पराक्रम त्र्यायुष हैं। (8.3) शरीर, आत्मा और समाज त्र्यायुष हैं। (8.4) विद्या, धर्म, परोपकार त्र्यायुष हैं। (8.5) शरीर-मन-बुद्धि, धी-चित्त-अहंकार आदि अर्थात आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक इन त्रिताप से रहित करके त्रिसमृद्धमय जीवन जीना त्र्यायुष है।
(9). विद्यारम्भ :: विद्यारम्भ संस्कार के क्रम के बारे में मतभिन्नता है। कुछ का मत है कि अन्नप्राशन के बाद विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिये तो कुछ चूड़ाकर्म के बाद इस संस्कार को उपयुक्त मानते हैं चूड़ाकर्म के बाद ही विद्यारम्भ संस्कार उपयुक्त लगता है। विद्यारम्भ का अभिप्राय बालक को शिक्षा के प्रारम्भिक स्तर से परिचित कराना है। प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी तो बालक को वेदाध्ययन के लिये भेजने से पहले घर में अक्षर बोध कराया जाता था। शुभ मुहूर्त में ही विद्यारम्भ संस्कार करना चाहिये। विद्यारंभ संस्कार का संबध उपनयन संस्कार की भांति गुरुकुल प्रथा से था, जब गुरुकुल का आचार्य बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर, वेदाध्ययन करता था। गुरुजनों से वेदों और उपनिषदों का अध्ययन कर तत्त्वज्ञान की प्राप्ति करना ही इस संस्कार का परम प्रयोजन है। जब बालक-बालिका का मस्तिष्क शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है, तब यह संस्कार किया जाता है। आमतौर या 5 वर्ष का बच्चा इसके लिए उपयुक्त होता है। मंगल के देवता गणेश और कला की देवी सरस्वती को दमन करके उनसे प्रेरणा ग्रहण करने की मूल भावना इस संस्कार में निहित होती है। बालक विद्या देने वाले गुरु का पूर्ण श्रद्धा से अभिवादन व प्रणाम इसलिए करता है कि गुरु उसे एक श्रेष्ठ मानव बनाए। ज्ञानस्वरुप वेदों का विस्तृत अध्ययन करने के पूर्व मेधाजनन नामक एक उपांग-संस्कार करने का विधान भी शास्त्रों में वर्णित है। इसके करने से बालक में मेधा, प्रज्ञा, विद्या तथा श्रद्धा की अभिवृद्धि होती है। इससे वेदाध्ययन आदि में ना केवल सुविधा होती है, बल्कि विद्याध्ययन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती।
विद्यया लुप्यते पापं विद्ययाडयुः प्रवर्धते। विद्यया सर्वसिद्धिः स्याद्धिद्ययामृतश्नुते॥ 
वेदविद्या के अध्ययन से सारे पापों का लोप होता है, आयु की वृद्धि होती है, सारी सिद्धियां प्राप्त होती है, यहां तक कि विद्यार्थी के समक्ष साक्षात् अमृतरस अशन-पान के रुप में उपलब्ध हो जाता है। शास्त्रवचन है की जिसे विद्या नहीं आती, उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फलों से वंचित रहना पडता है। इसलिए विद्या की आवश्यकता अनिवार्य है।
(10). PIERCING THE EARS कर्ण वेध-कन्छेदन :: हिन्दु धर्म में कर्णवेध संस्कार नवम संस्कार है।यह बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं। कान हमारे श्रवण द्वार हैं। कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है। इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है।यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है। यह पैरों का सन्तुलन बनाये रखने हेतु भी किया जाता है।मूल नक्षत्र में पैदा हुए बालक का कर्ण भेदन अवश्य कराना चाहिये।कन्याओं के लिये तो कर्णवेध नितान्त आवश्यक माना गया है। इसमें दोनों कानों को वेध करके उसकी नस को ठीक रखने के लिए उसमें सुवर्ण कुण्डल धारण कराया जाता है। इससे शारीरिक लाभ होता है।इसे उपनयन के पूर्व ही कर दिया जाना चाहिए। इस संस्कार को 6 माह से लेकर 16 वें माह तक अथवा 3,5 आदि विषम वर्षों में या कुल की पंरपरा के अनुसार उचित आयु में किया जाता है।
इसे स्त्री-पुरुषों में पूर्ण स्त्रीत्व एवं पुरुषत्व की प्राप्ति के उद्देश्य से कराया जाता है। मान्यता यह भी है की सूर्य की किरणें कानों के छिद्र से प्रवेश पाकर बालक-बालिका को तेज़ संपन्न बनाती है। बालिकाओं के आभुषण धारण हेतु तथा रोगों से बचाव हेतु यह संस्कार आधुनिक एक्युपंचर पद्धति के अनुरुप एक सशक्त माध्यम भी है। हमारे शास्त्रों में कर्णवेध रहित पुरुष को श्राद्ध का अधिकारी नहीं माना गया है। ब्राह्मण और वैश्य का कर्णवेध चांदी की सुई से, शुद्र का लोहे की सुई से तथा क्षत्रिय और संपन्न पुरुषों का सोने की सुई से करने का विधान है। कर्णवेध-संस्कार द्धिजों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) का साही के कांटे से भी करने का विधान है। शुभ समय में, पवित्र स्थान पर बैठकर देवताओं का पूजन करने के पश्चात सूर्य के सम्मुख बालक या बालिका के कानों को  मंत्र द्धारा अभिंमत्रित करना चाहिए। 
भद्रं कर्णेभिः क्षृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।स्थिरैरंगैस्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः॥
इसके बाद बालक के दाहिने कान में पहले और बाएं कान में बाद में सुई से छेद करें। उनमें कुडंल आदि पहनाएं। बालिका के पहले बाएं कान में, फिर दाहिने कान में छेद करके तथा बाएं नाक में भी छेद करके आभुषण पहनाने का विधान है। मस्तिष्क के दोनों भागों को विद्युत के प्रभावों से प्रभावशील बनाने के लिए नाक और कान में छिद्र करके सोना पहनना लाभकारी माना गया है। नाक में नथुनी पहनने से नासिका-संबधी रोग नहीं होते और सर्दी-खांसी में राहत मिलती है। कानों में सोने की बालियं या झुमकें आदि पहनने से स्त्रियों में मासिक धर्म नियमित रहता है, इससे हिस्टीरिया रोग में भी लाभ मिलता है।
(11). SACRED THREAD यज्ञोपवीत-जनेऊ :: यज्ञोपवीत बौद्धिक विकास के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। धार्मिक उन्नति का इस संस्कार में पूर्णरूपेण समावेश है। इस संस्कार के माध्यम से वेदमाता गायत्री को आत्मसात करने का प्रावधान दिया है। आधुनिक युग में भी गायत्री मंत्र पर विशेष शोध हो चुका है। गायत्री एक शक्तिशाली मंत्र है। यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं अर्थात् यज्ञोपवीत जिसे जनेऊ भी कहा जाता है अत्यन्त पवित्र है। प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से इसका निर्माण किया है। यह आयु को बढ़ानेवाला, बल और तेज प्रदान करनेवाला है। गुरुकुल परम्परा में प्राय: आठ वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न किया जाता था।
यज्ञोपवीत से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का उद्देश्य संयमित जीवन के साथ आत्मिक विकास में रत रहने के लिये बालक को प्रेरित करना है।
(12). INITIATION IN STUDYING VEDS वेदारम्भ :: यह संस्कारज्ञानार्जन से सम्बन्धित है।  इस संस्कार का अभिप्राय है कि बालक वेदाध्ययन से  ज्ञान को समाविष्ट करना शुरू करे। शास्त्रों में ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई प्रकाश नहीं समझा गया है।यज्ञोपवीत के बाद बालकों को वेदों का अध्ययन एवं विशिष्ट ज्ञान से परिचित होने के लिये गुरुकुल में भेजा जाता था। असंयमित जीवन जीने वाले वेदाध्ययन के अधिकारी नहीं माने जाते थे। चारों वेद ज्ञान के अक्षुण्ण भंडार हैं। वेदारम्भ से पहले आचार्य अपने शिष्यों को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने एवं संयमित जीवन जीने की प्रतिज्ञा कराते थे तथा उसकी परीक्षा लेने के बाद ही वेदाध्ययन कराते थे। जीवन को सकारात्मक बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है। शिक्षा का शुरू होना ही विद्यारंभ संस्कार है। गुरु के आश्रम में भेजने के पहले अभिभावक अपने पुत्र को अनुशासन के साथ आश्रम में रहने की सीख देते हुए भेजते थे। ये संस्कार भी उपनयन संस्कार जैसा ही है, इस संस्कार के बाद बच्चों को वेदों की शिक्षा मिलना आरम्भ किया जाता है 
(13). KESHANT-PRUNING OF HAIR-HAIR DRESSING-HAIR CUTTING केशान्त-मुण्डन :: वेदाध्ययन पूर्ण कर लेने पर आचार्य के समक्ष यह संस्कार सम्पन्न किया जाता था। वस्तुत: यह संस्कार गुरुकुल से विदाई लेने तथा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का उपक्रम है। वेद-पुराणों एवं विभिन्न विषयों में पारंगत होने के बाद ब्रह्मचारी के समावर्तन संस्कार के पूर्व बालों की सफाई की जाती थी तथा उसे स्नान कराकर स्नातक की उपाधि दी जाती थी। केशान्त संस्कार शुभ मुहूर्त में किया जाता था। इस संस्कार के बाद ही ब्रह्मचारी युवक को गृहस्थ जीवन के योग्य शारीरिक और व्यावहारिक योग्यता की दीक्षा दी जाती थी।[आगोदानकर्मणः-ब्रह्मचर्यम्‌-भा.यू.सू.] उसके बाद इस केशान्त संस्कार में भी मुंण्डन करना होता है। इसलिए कहा भी है कि शास्त्रोक्त विधि से भली-भाँति व्रत का आचरण करने वाला ब्रह्मचारी इस केशान्त-संस्कार में सिर के केशों को तथा श्मश्रु के बालों को कटवाता है।
केशान्तकर्मणा तत्र यथोक्त-चरितव्रतः। [व्यासस्मृति 1.41]  
इस संस्कार में दाढ़ी बनाने के पश्चात उन बालों को या तो गाय के गोबर में मिला दिया जाता था या गौशाला में गढ्ठा खोदकर दबा दिया जाता था अथवा किसी नदी में प्रवाहित कर दिया जाता था।इस प्रकार की क्रिया इसलिए की जाती थी ताकि कोई तांत्रिक उन बालों पर अपनी तान्त्रिक क्रिया के द्वारा नुकसान न पहुंचा सके।इस संस्कार के बाद गुरू को गाय दान दिया जाता था। यह संस्कार शुभ मुहुर्त देखकर आयोजित किया जाता था।
(14). समावर्तन :: गुरुकुल से विदाई लेने से पूर्व शिष्य का समावर्तन संस्कार होता था। इस संस्कार से पूर्व ब्रह्मचारी का केशान्त संस्कार होता था और फिर उसे स्नान कराया जाता था। यह स्नान समावर्तन संस्कार के तहत होता था। इसमें सुगन्धित पदार्थो एवं औषधादि युक्त जल से भरे हुए वेदी के उत्तर भाग में आठ घड़ों के जल से स्नान करने का विधान है। यह स्नान विशेष मन्त्रोच्चारण के साथ होता था। इसके बाद ब्रह्मचारी मेखला व दण्ड को छोड़ देता था जिसे यज्ञोपवीत के समय धारण कराया जाता था। इस उपाधि से वह सगर्व गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने का अधिकारी समझा जाता था। सुन्दर वस्त्र व आभूषण धारण करता था तथा गुरुजनों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपने घर के लिये विदा होता था।
(15). MARRIAGE विवाह :: स्त्री और पुरुष दोनों के लिये यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार है। यज्ञोपवीत से समावर्तन संस्कार तक ब्रह्मचर्य व्रत के पालन का शास्त्रों में विधान है। वेदाध्ययन के बाद जब युवक में सामाजिक परम्परा निर्वाह करने की क्षमता व परिपक्वता आ जाती थी तो उसे गृर्हस्थ्य धर्म में प्रवेश कराया जाता था। लगभग पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का व्रत का पालन करने के बाद युवक परिणय सूत्र में बंधता था।शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, आसुर, गन्धर्व, राक्षस एवं पैशाच। वैदिक काल में ये सभी प्रथाएं प्रचलित थीं। विवाह शब्द का तात्पर्य  मात्र स्त्री-पुरुष के समागम सम्बन्ध तक ही सीमित नहीं है अपितु सन्तानोत्पादन के साथ-साथ सन्तान को सक्षम आत्मनिर्भर होने तक के दायित्व का निर्वाह और सन्तति परम्परा को योग्य लोक शिक्षण देना भी इसी संस्कार का अंग है। शास्त्रों में अविवाहित व्यक्ति को अयज्ञीय कहा गया है और उसे सभी प्रकार के अधिकारों के अयोग्य माना गया है-
अयज्ञियो वा एष योऽपत्नीकः
मनुष्य जन्म ग्रहण करते ही तीन ऋणों से युक्त हो जाता है, ऋषि ऋण, देव ऋण, पितृऋण और तीनों ऋणों से क्रमशः ब्रह्मचर्य, यज्ञ, सन्तानोत्पादन करके मुक्त हो पाता है। 
जायमानो ह वै ब्राहणस्त्रिार्ऋणवान्‌ जायते-ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो, यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः। 
गृहस्थाश्रम सभी आश्रमों का आश्रम है। जैसे वायु प्राणिमात्रा के जीवन का आश्रय है, उसी प्रकार गार्हस्थ्य सभी आश्रमों का आश्रम है। 
यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः।
यस्मात्‌ त्रायोऽप्याश्रमिणो ज्ञानेनान्नेन चान्वहम्‌ गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्मा ज्येष्ठाश्रमो गृही।
विवाह अनुलोम रीति से ही करना चाहिए-प्रातिलोम्य विवाह सुखद नहीं होता अपितु परिणाम में कष्टकारी होता है। 
त्रायाण्यमानुलोम्यं स्यात्‌ प्रातिलोम्यं न विद्यते प्रातिलौम्येन यो याति न तस्मात्‌ पापकृत्तरः।
अपत्नीको नरो भूप कर्मयोग्यो न जायते। ब्राह्मणः क्षत्रिायो वापि वैश्यः शूद्रोऽपि वा नरः।
विवाह के प्रकार :: स्मृतियों ने इस प्रकार के विवाहों को आठ भागों में विभक्त कियाᅠहै।
(1).  ब्राह्म, (2). दैव,  (3). आर्ष,  (4). प्राजापत्य,  (5). आसुर,  (6). गान्धर्व,  (7). राक्षस,  व  (8). पैचाश।
इनमें प्रथम चार प्रशस्त और चार अप्रशस्त की श्रेणी में रखे गये हैं। प्रथम चार में भी ब्राह्म विवाह सर्वोत्तम और समाज में प्रशंसनीय था शेष तारतम्य भाव से ग्राह्य थे। किन्तु दो सर्वथा अग्राह्य थे।
(15.1). पैशाच :: सोती रोती कन्या का बलात्‌ अपहरण।
(15.2).  राक्षस ::अभिभावकों को मारपीट कर बलात्‌ छीनकर रोती बिलखती कन्या का अपहरण इस कोटि का निन्दनीय विवाह था।
(15.3). गान्धर्व :: जब कन्या और वर कामवश होकर स्वेच्छापूर्वक परस्पर संयोग करते हैं तो ऐसा विवाह गान्धर्व विवाह होता है। 
(15.4). आसुर :: जिस विवाह में कन्या के पक्ष को यथेष्ट धन-सम्पत्ति देकर स्वच्छन्दतापूर्वक कन्या से विवाह किया जाता है ऐसा विवाह आसुर संज्ञक है।
(15.5). प्राजापत्य :: वर स्वयं प्र्रस्ताव करके कन्या के पिता से विवाह का निवेदन करता और सन्तानोत्पादन के लिए विवाह स्वीकार किया जाता। ऐसा विवाह प्राजापत्य कोटि का था।
(15.6). आर्ष :: इसमें विवाह में कन्या का पिता वर से यज्ञादि कर्म के लिए दो गो मिथुन प्राप्त करके धर्म कार्य सम्पन्न कर लेता था और उसके बदले में कन्यादान करता था।
(15.7). दैव :: वेदमंत्रों के उच्चारण सहित पाणिग्रहण। 
(15.8). ब्राह्म विवाह :: यह सबसे श्रेष्ठ प्रशंसनीय विधि मानी जाती है जिसमें कन्या का पिता योग्य वर को सब प्रकार सुसज्जित यथाशक्ति अलंकृत कन्या को गार्हस्थ्य जीवन की समस्त उपयोगी वस्तुओं के साथ समर्पित करता था।
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्‌ आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः। 
सक्षेप में विवाह संस्था के उद्देश्य और उसके प्रकार का विवरण दिया गया है। विवाह के विविध-विधान के लिए देश-काल-प्रान्तभेद से पद्धतियां उपलब्ध हैं तदनुसार वैवाहिक संस्कार सम्पन्न किया जाना चाहिए।
अधिक जानकारी हेतु संदर्भ :: HINDU MARRIAGE हिन्दु विवाह पद्धति bhartiyshiksha.blogspot.com 
(16). FUNERAL CREMATION अन्त्येष्टि ::  अन्त्येष्टि को अग्नि परिग्रह संस्कार भी कहा जाता है। आत्मा में अग्नि का आधान करना ही अग्नि परिग्रह है। धर्म शास्त्रों की मान्यता है कि मृत शरीर की विधिवत् क्रिया करने से जीव की अतृप्त वासनायें शान्त हो जाती हैं। शास्त्रों में बहुत ही सहज ढंग से इहलोक और परलोक की परिकल्पना की गयी है। जब तक जीव शरीर धारण कर इहलोक में निवास करता है तो वह विभिन्न कर्मो से बंधा रहता है। प्राण छूटने पर वह इस लोक को छोड़ देता है। उसके बाद की परिकल्पना में विभिन्न लोकों के अलावा मोक्ष या निर्वाण है।अन्त्येष्टि ऐहिक जीवन का अन्तिम अध्याय है। आत्मा की अमरता एवं लोक परलोक का विश्वासी जीवन इस लोक की अपेक्षा पारलौकिक कल्याण की सतत कामना करता है। मरणोत्तर संस्कार से ही पारलौकिक विजय प्राप्त होती है -
जात संस्कारेणेमं लोकमभिजयति मृतसंस्कारेणामुं लोकम्‌॥ 
विधि-विधान, आतुरकालिक दान, वैतरणीदान, मृत्युकाल में भू शयन व्यवस्था मृत्युकालिक स्नान, मरणोत्तर स्नान, पिण्डदान, (मलिन षोडशी) के 6 पिण्ड दशगात्रायावत्‌ तिलाञ्जलि, घटस्थापन दीपदान, दशाह के दिन मलिन षोडशी के शेष पिण्डदान एकादशाह के षोडश श्राद्ध, विष्णुपूजन शैय़्यादान आदि। सपिण्डीकरण, शय्यादान एवं लोक व्यवस्था के अनुसार उत्तर कर्म आयोजित कराने चाहिए। इन सभी कर्मों के लिए प्रान्त देशकाल के अनुसार पद्धतियां उपलब्ध हैं तदनुसार उन कर्मों का आयोजन किया जाना चाहिए।
श्राद्ध-पितृ तर्पण 
(16.1). पितृ पक्ष का (महालय पक्ष) का महत्त्व :: वृश्चिक राशिमें प्रवेश करनेसे पूर्व, जब सूर्य कन्या एवं तुला राशि में होता है, वह काल महालय कहलाता है।
इस कालावधि में पितर यम लोक से आकर अपने परिवार के सदस्यों के घर में वास करते हैं। इसीलिए शक संवत अनुसार भाद्र पद कृष्ण प्रतिपदासे भाद्रपद अमावास्या तक के एवं विक्रम संवत अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन अमावस्या तक के पंद्रह दिनकी कालावधि में पितृ तर्पण एवं तिथि के दिन पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।
ऐसा करनेसे पितृव्रत यथा सांग पूरा होता है। इसीलिए यह पक्ष पितरोंको प्रिय है। इस पक्षमें पितरोंका श्राद्ध करनेसे वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जो लोग पितृ पक्ष में कुछ कारण वश महालय श्राद्ध नहीं कर पाते, उन्हें पितृ पक्ष के उपरांत सूर्य के वृश्चिक राशिमें प्रवेश करने से पहले तो महालय श्राद्ध करना ही चाहिए।
श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्याद् गृहाश्रमी। धनं पुत्राः कुततस्य पितृकोपाग्निपीडनात्॥ 
यावच्च कन्यातुलयोः क्रमादास्ते दिवाकरः। शून्यं प्रेतपुरं तावद् यावद् वृश्चिकदर्शनम्॥ [महाभारत]
कन्या राशिमें सूर्यके रहते, जो गृहस्थाश्रमी श्राद्ध नहीं करता, उसे पितरों की कोपाग्निके कारण धन, पुत्र इत्यादिकी प्राप्ति कैसे होगी ? उसी प्रकार सूर्य जब तक कन्या एवं तुला राशियोंसे वृश्चिक राशिमें प्रवेश नहीं करता, तब तक पितृलोक रिक्त रहता है।
पितृलोकके रिक्त रहनेका अर्थ है, उस कालमें कुल के सर्व पितर आशीर्वाद देनेके लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं । वंशजों द्वारा श्राद्ध न किए जानेपर शाप देकर चले जाते हैं। अतः इस कालमें श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण है। 
(16.2). पितृ पक्ष अर्थात महालय में श्राद्ध के लिए आने वाले पितर गण :: (16.2.1). पितृ त्रय :- पिता, दादा, पर दादा, (16.2.2). मातृ त्रय :- माता, दादी, पर  दादी,  (16.2.3). सापत्न माता अर्थात सौतेली मां, (16.2.4). माता मह त्रय :- मां के पिता, नाना एवं परनाना,  (16.2.5). माता मही त्रय :- मां की माताजी, नानी एवं पर नानी, (16.2.6). भार्या, पुत्र, पुत्रियां, चाचा, मामा, भाई, बुआ, मौसियां बहनें, ससुर, अन्य आप्तजन, (16.2.7). श्राद्ध कर्ता किसी के शिष्य हों, तो गुरु, (16.2.8). श्राद्धकर्ता किसीके गुरु हों, तो शिष्य। 
यह स्पष्ट है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म लेकर पुनः-पुनः उसी परिवार में तब तक आता है जब तक कि उसके उस परिवार सम्बन्धी संस्कार उपस्थित हैं। मृत्यु के उपरांत भी जीव के सुख एवं उन्नति से संबंधित इतना गहन अभ्यास केवल हिंंदू धर्म ने ही किया है। 
(16.3). भरणी श्राद्ध :: गया जाकर श्राद्ध करनेपर जो फल मिलता है, वही फल पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र पर करने से मिलता है। शास्त्रानुसार भरणी श्राद्ध वर्ष श्राद्ध के पश्चात् करना चाहिए । वर्ष श्राद्ध से पूर्व सपिंडीकरण (-सपिंडी) श्राद्ध किया जाता है । तत्पश्चात् भरणी श्राद्ध करने से मृतात्मा को प्रेत योनि से छुडाने में सहायता मिलती है। यह श्राद्ध प्रत्येक पितृ पक्ष में करना चाहिए।पूर्वजों का बहुत-प्रेत-पिशाच योनि में होना अहितकर है। 
कालानुरूप प्रचलित पद्धतिनुसार व्यक्ति की मृत्यु होनेके पश्चात् 12 वें दिन ही सपिंडीकरण श्राद्ध किया जाता है। इसलिए, कुछ शास्त्रज्ञों के मतानुसार व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उस वर्ष पडने वाले पितृ पक्ष में ही भरणी श्राद्ध कर सकते हैं ।
(16.4). सर्व पित्री अमावस्या :: यह पितृ पक्ष की अमावस्या का  नाम है। इस तिथि पर कुल के सर्व पितरों को उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं। वर्ष भर में सदैव एवं पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथि पर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृ पक्ष की यह अंतिम तिथि है।
शास्त्र में बताया गया है कि, श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि अधिक उचित है, जबकि पितृ पक्ष की अमावस्या सर्वाधिक उचित तिथि है।
इस दिन प्रायः सभी घरों में कम से कम एक ब्राह्मण को तो भोजन का निमंत्रण दिया ही जाता है। उस दिन मछुआरे, ठाकुर, बुनकर, कुनबी इत्यादि जातियों में पितरोंके नामसे भात का अथवा आटे का पिंड दान दिया जाता है और अपनी ही जाति के कुछ लोगों को भोजन कराया जाता है । इन में इस दिन ब्राह्मणों को सीधा (-अन्न सामग्री) देने की भी परंपरा प्रचलित है।
(16.5). पितृ पक्ष में भगवान् दत्तात्रेय का नाम जपने का महत्त्व :: पितृ पक्ष में श्री गुरु देव दत्त का नाम जप अधिकाधिक करने से पितरों को गति प्राप्त होने में सहायता मिलती है।
(16.6). परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उस वर्ष महालय श्राद्ध न करना :: परिवारमें जिस व्यक्तिके पिता अथवा माता  की मृत्यु हो गई हो, उस श्राद्धकर्ता को उनके लिए उनके देहांत के दिन से आगे एक वर्ष तक महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि, उनके लिए वर्ष भरमें श्राद्धकर्म किया ही जाता है।
श्राद्ध कर्ता पुत्र के अतिरिक्त अन्यों को, उदा. श्राद्ध कर्ता के चचेरे भाई एवं जिन्हें सूतक लगता है, ऐसे लोगोंको अपने पिता इत्यादि के लिए प्रति वर्ष की भांति महालय श्राद्ध करना चाहिए। किंतु, सूतक के दिनों में महालय पक्ष पडने पर श्राद्ध न करें। सूतक समाप्त होनेपर आने वाली अमावस्या पर श्राद्ध अवश्य करें।
(16.7). महालय श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण :: महालय श्राद्ध के समय प्रत्येक पितर के लिए एक ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण को पितृ स्थान पर बिठाकर देवस्थान पर शालिग्राम अथवा बाल कृष्ण की मूर्ति-प्रतिमा-तस्वीर रखें। देवस्थान पर बाल कृष्ण एवं पितृ स्थान पर दर्भ रखें अथवा दोनों ही स्थानों पर दर्भ रखें । इसे चट अथवा दर्भबटु (-कुश से बनी कूंची) कहते हैं । चट रखकर किए गए श्राद्ध को चट श्राद्ध कहते हैं । इस श्राद्धमें दक्षिणा भी देते हैं।
श्राद्ध विधि-पितृ ऋण से मुक्त कराने की विधि ::
(16.7.1).अप  सव्य करना :- देश काल का उच्चारण कर अप सव्य करें, अर्थात् जनेऊ बाएं कंधे से दाएं कंधे पर लें।
(16.7.2). श्राद्ध संकल्प करना :- श्राद्ध के लिए उचित पितरों की षष्ठी विभक्ति का विचार कर (-उनका उल्लेख करते समय, षष्ठी-विभक्ति का प्रयोग करना, प्रत्यय लगाना, उदा. रमेशस्य), श्राद्ध कर्ता निम्न संकल्प करे :–
अमुक श्राद्धं सदैवं सपिण्डं पार्वणविधीना एकोद्दिष्टेन वा अन्नेन वा आमेन वा हिरण्येन सद्यः करिष्ये।
(16.7.3). यवोदक (-जौ) एवं तिलोदक बनाएं।
(16.7.4). प्रायश्चित के लिए पुरुष सूक्त, वैश्व देव सूक्त इत्यादि सूक्त बोलें।
(16.7.5). ब्राह्मणों की परिक्रमा करें एवं उन्हें नमस्कार करें। तदुपरांत श्राद्धकर्ता ब्राह्मणोंसे प्रार्थना करें कि -‘हम सब यह कर्म सावधानी से, शांत चित्त, दक्ष एवं ब्रह्मचारी रहकर करेंगे।’
(16.7.6). 21 क्षण देना (-आमंत्रण देना) :- श्राद्धकर्मके समय देवता एवं पितरोंके लिए एक-एक दर्भ (-कुश) अर्पित कर आमंत्रित करें।
(16.7.7). देव स्थान पर पूर्व की ओर एवं पितृ स्थान पर उत्तर की ओर मुख कर ब्राह्मणों को बैठाएं। ब्राह्मणों को आसन के लिए दर्भ दें, देवताओं को सीधे दर्भ अर्पित करें एवं पितरों को अग्र से मोड़ कर दें।
(16.7.8). आवाहन, अर्घ्य, संकल्प, पिंडदान, पिंडाभ्यंजन (-पिंडों को दर्भ से घी लगाना), अन्न दान, अक्षयोदक, आसन तथा पाद्यके उपचारों में पितरों के नाम-गोत्र का उच्चारण करें।
गोत्र ज्ञात न हो तो कश्यप गोत्र का उच्चारण करें; क्योंकि श्रुति बताती है कि ‘समस्त प्रजा कश्यप से ही उत्पन्न हुई हैं’। पितरों के नाम के अंत में ‘शर्मन्’ उच्चारण करें। स्त्रियों के नाम के अंत में ‘दां’ उपपद लगाएं।
(16.7.9). ‘उदीरतामवर’ मंत्र से सर्वत्र तिल बिखेरें तथा गायत्री मंत्र से अन्न प्रोक्षण करें (-अन्न पर पानी छिडकें)।
(16.7.10). देवता पूजन में भूमि पर नित्य दाहिना घुटना टिकाएं। पितरों की पूजा में भूमि पर बायां घुटना टिकाएं।
(16.7.11). देव कर्म प्रदक्षिण एवं पितृ कर्म अप्रदक्षिण करें। देवताओं को उपचार समर्पित करते समय ‘स्वाहा नमः’ एवं पितरों को उपचार समर्पित करते समय ‘स्वधा नमः’ कहें।
(16.7.12). देव-ब्राह्मणके सामने यवोदकसे दक्षिणावर्त अर्थात् घडीकी दिशामें चौकोर मंडल व पितर-ब्राह्मणके सामने तिलोदकसे घडीकी विपरीत दिशामें गोलाकार मंडल बनाकर, उनपर भोजनपात्र रखें। उसी प्रकार कुलदेवता एवं गोग्रास के ( -गायके लिए नैवेद्य) लिए पूजा घर के सामने पानी का घडी की दिशा में मंडल बनाकर उन पर भोजन पात्र रखें। पितृ स्थान पर बैठे ब्राह्मणों के भोजन पात्र के चारों ओर भस्म का उलटा (-घडी की विपरीत दिशा में) वर्तुल बनाएं। देवस्थान पर बैठे ब्राह्मणों के भोजन पात्रों के चारों ओर नित्य पद्धति से (-घडी की दिशामें) भस्मकी रंगोली बनाएं।
(16.7.13). पितर एवं देवताओंको विधिवत् संबोधित कर अन्न-निवेदन करें।
(16.7.14). पितरों को संबोधित कर भूमि पर अग्रयुक्त एक बित्ता लंबे 100 दर्भ फैला कर उस पर पिंड दान, तदनंतर पिंडों की पूजा करें। तत्पश्चात् देव ब्राह्मण के लिए परोसी थाली के सामने दर्भ पर थोडे चावल (-विकिर), पितर ब्राह्मण के लिए परोसी थाली के सामने दर्भ पर थोडे चावल (-प्रकिर) रखकर उन पर क्रमानुसार यवोदक, तिलोदक दें। इसके पास में भिन्न दर्भप र एक पिंड रख कर उस पर तिलोदक दें। उसे ‘उच्छिष्ट पिंड’ कहते हैं। इन सर्व पिंडों को जलाशयमें विसर्जित करें अथवा गाय को दें।
(16.7.15). महालय श्राद्ध के समय सबको संबोधित कर पिंडदान होने के पश्चात् चार दिशाओं को धर्म पिंड दें। सृष्टि की निर्मिति करने वाले ब्रह्म देव से लेकर जिन्होंने हमारे माता-पिताके कुलमें जन्म लिया है; साथ ही गुरु, आप्त, हमारे इस जन्म में सेवक, दास, दासी, मित्र, घर के पालतू प्राणी, लगाए गए वृक्ष, हम पर उप कृत (-हमारे प्रति कृतज्ञ) व्यक्ति, जिनका पिंड दान करने के लिए कोई न हो तथा अन्य ज्ञात एवं अज्ञात व्यक्ति को पिंड दान करें।
(16.7.16). पिंड दान के उपरांत ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद के अक्षत लें। स्वधा वाचन कर सर्व कर्म ईश्वरार्पण करें ।
यदि घर में मंगलकार्य हुआ हो, तो एक वर्ष तक श्राद्ध में पिंड दान निषिद्ध है। कर्ता (-पुत्र का विवाह, यज्ञोपवीत, चौल संस्कार करने वाला) विवाहोपरांत एक वर्ष, व्रत बंध के उपरांत छः मास, चौल संस्कार के उपरांत तीन मास क पिंड दान, मृत्तिका स्नान एवं तिल तर्पण न करे।इसके लिए ये अपवाद है-विवाह होनेके पश्चात् भी, तीर्थ स्थलमें, माता के पितरों के सांवत्सरिक श्राद्धमें, प्रेत श्राद्ध में, पिता के और्ध्वदेहिक कर्मों में एवं महालय श्राद्धमें सर्वदा पिंडदान किया जा सकता है।
भातमें अर्थात पके हुए चावलमें अग्नौ करण अर्थात अग्निमें आहुति देने हेतु लिए गए भात का शेष भाग, तिलोदक, काले तिल, दही, मधु एवं घी, ये मुख्य घटक मिलाएं।शास्त्र में सर्व प्रकार के श्राद्धीय अन्न पदार्थों के अल्प भाग से पिंड बनाने का विधान है। इसलिए पिंड बनाने के मिश्रण में मुख्य घटकों के साथ ही बडे एवं खीर इत्यादि श्राद्धीय भोजनके पदार्थ भी डालने चाहिए।
पिंड बनाने के इस मिश्रण को मसलकर साधारणतः चार बडे पिंड एवं अन्य आवश्यक छोटे पक्के (firm) पिंड बनायें । पितृ त्रय के लिए थोडे बड़े आकार के पिंड बनाने की पद्धति निम्न है-
(16.8.1).  श्राद्ध में भात अर्थात पके हुए चावल के पिंड बनाना :- चावल सर्व समा वेशक है। चावल पकाने से उसमें रजो गुण बढता है। इस प्रक्रिया में चावल में पृथ्वी तत्त्व का प्रमाण घटकर आप तत्त्वका प्रमाण बढता है। आप तत्त्वके कारण भातसे प्रक्षेपित सूक्ष्म-वायुमें आर्द्रता अधिक होती है। जब श्राद्ध में भात का गोला बनाकर उस पर संस्कार किए जाते हैं, तब उसका रूपांतर पिंड में होता है। संक्षेप में, भात  के सर्व ओर उत्पन्न होनेवाले आर्द्रता दर्शक प्रभावलय में पितरों की लिंग देहों की रज-तमात्मक तरंगों का संस्करण होता है। इस रजो गुणी पिंड की वातावरण कक्षा में पितरों की लिंग देहोंके लिए प्रवेश करना सरल होता है। अतः मंत्रोच्चारण से संचारित वायुमंडल द्वारा लिंग देह को सूक्ष्म बल प्राप्त होता है तथा उनके लिए आगे का मार्ग प्रशस्त एवं सुगम होता है।
(16.8.2). पिंड के लिए सर्व प्रकारके अन्न पदार्थों का अल्प भाग लेना :- भातसे बनाया पिंड लिंगदेहका प्रतिनिधित्व करता है। जब लिंग देह प्रत्यक्षतः व्यक्ति की स्थूल देह से विलग होती है, तब वह मन के विविध संस्कारों का आवरण लेकर निकलती है। आसक्ति दर्शक संस्कारों में अन्न संबंधी संस्कार सर्वाधिक होते हैं। प्रत्येक जीव की अन्न विषयक रुचि-अरुचि भिन्न होती है। इन सभी रुचियों के सूचक जैसे मीठा, चटपटा, नमकीन इत्यादि स्वादिष्ट पदार्थों से युक्त अन्न का अल्प अंश लेकर उससे पिंड बनाकर श्राद्ध स्थल पर रखा जाता है। श्राद्ध में इन विशिष्ट अन्न पदार्थों की सूक्ष्म-वायु कार्यरत होती है एवं श्राद्ध स्थल पर आई लिंग देह को इस सूक्ष्म-वायु के माध्यम से विशिष्ट अन्न के हविर्भाग अर्थात पितरों को अर्पित अन्न के अंश की प्राप्ति होती है। इससे लिंग देह संतुष्ट होती हैं।विशिष्ट पदार्थोें का अंश प्राप्त होने से विशिष्ट पदार्थोें की लिंग देह की आसक्ति अंशतः क्षीण होती है। जिससे लिंग देह के भूलोक में अटकने की आशंका घटती है।
(16.8.3). मधु युक्त पिंड देना :-  मधु में पृथ्वी एवं आप तत्त्वोंसे संबंधित पितर तरंगों को अपनी मिठास से प्रसन्न करने एवं उन्हें पिंड में ही बद्ध करने की क्षमता होती है। अतः मधु युक्त पिंड देने से वह दीर्घ काल तक पितर-तरंगों से संचारित रहता है। दर्भ का शुद्धिकरण किया जाता है। प्रत्येक पिंड रखते हुए कर्ता कहता है अमुक गोत्रके वसु स्वरूप अथया रुद्र स्वरूप अथवा आदित्य स्वरूप के अपने अमुक नाम के परिजन के लिए मैं पिंड रखता हूं। उसके उपरांत पिंड पूजन किया जाता है।
(16.8.3.1).  पिंड स्वरूपी पितरों के लिए काजल, ऊन का धागा, पुष्प, तुलसी, भृंगराज, धूप, दीप द्वारा उपचार किए जाते हैं।
(16.8.3.2). पिंडरूपी पितरों को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। 
(16.8.3.3).  पीनेके लिए तथा हाथ-मुंह धोनेके लिए जल अर्पित किया जाता है । मुखशुद्धि हेतु पान अर्पित किया जाता है।
(16.8.3.4). उसके पश्चात पितर-ब्राह्मणों को तिलोदक एवं देव-ब्राह्मणों को यवोदक अर्थात जौ युक्त जल देकर पिंड पर जल छोडा जाता है। जिन पितरों की मृत्यु अग्निमें जलने से अथवा कोख में जन्म से पहले ही हो गई है उनके लिए बनाए गए विशेष पिंडोंपर तिलोदक चढाया जाता है।
(16.8.3.5). उसके पश्चात परिवारके अन्य सदस्य पिंडों को नमस्कार करते हैं।
(16.8.4).  श्राद्धकर्ता द्वारा दर्भपर पिंड रखने तथा उसका पूजन करना :- श्राद्धविधिमें मंत्रो का उच्चारण करते समय पुरोहित में शक्ति के वलय की जागृति होती है। पुरोहित के मुख से वातावरण में शक्ति की तरंगों का प्रक्षेपण होता है। श्राद्ध विधि भाव पूर्ण करने वाले पूजक के अनाहत चक्र के स्थान पर भाव के वलय जागृत होते हैं। ईश्वर से प्रक्षेपित शक्ति का प्रवाह पिंडदान हेतु रखे दर्भ में आकृष्ट होता है। दर्भ एवं उसपर रखे जाने वाले पिंड में शक्ति के वलय जागृत होते हैं।  इस वलय से वातावरणमें शक्ति के प्रवाहों का प्रक्षेपण होता है। शक्ति का प्रवाह पूजक की ओर प्रक्षेपित होता है।
(16.8.5).  पिंड पूजन की सूक्ष्म गति :- पुरोहित द्वारा श्राद्धसे संबंधित मंत्र पठन के कारण भुव लोक से एक काला-सा प्रवाह पिंड की ओर आकृष्ट होता है। लिंग देह के रूप में पितर आकृष्ट होते है। आकृष्ट हुए पितरों के कारण दर्भ पर रखे पिंड के सर्व ओर काला तमोगुणी वलय उत्पन्न होता है। श्राद्ध कर्ता पिंड पूजन कर प्रार्थना करता है कि उसके परिवार पर पितरों की कृपा दृष्टि बनी रहे। पितरों को अन्न एवं शक्ति प्राप्त हो प्रार्थना करने से श्राद्ध कर्ता की ओर चैतन्य तथा शक्तिके प्रवाह आकृष्ट होते है। श्राद्ध कर्ता के स्थानप र चैतन्य तथा शक्ति के वलय जागृत होते हैं। श्राद्ध कर्ता के भाव पूर्ण पिंड पूजन से पूर्वज दोष की तीव्रता घटती है। पिंड पूजन करने से अतृप्त पितर भुव लोक से पिंड की ओर सहजता से आकृष्ट होते हैं तथा उनकी इच्छाएं पूर्ण होकर उन्हें गति मिलती है। इस प्रकार से पितरों के कष्ट न्यून होते हैं। यह श्राद्ध विधि में पिंड पूजन का महत्त्व स्पष्ट होता है।
BRAHMAN SANSKAR-RITES  ब्राह्मण संस्कार ::  ब्राह्मण के तीन जन्म  होते हैं। (1). माता के गर्भ से, (2). यज्ञोपवीत से व (3) यज्ञ की दीक्षा लेने  से।यज्ञोपवीतके समय गायत्री माता व और आचार्य पिता होते हैं। वेद की शिक्षा देने से आचार्य  पिता कहलाता है। यज्ञोपवीत के बिना, वह किसी भी वैदिक कार्य का अधिकारी नहीं होता। जब तक वेदारम्भ न हो, वह शूद्र के समान है।     
जिस ब्राह्मण के 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हों, वही ब्रह्म लोक व ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। इनके बिना  वह शूद्र के समान है। 
गर्वाधन, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकार के वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्च महायज्ञ(जिनसे पितरों, देवताओं, मनुष्यों, भूतऔर ब्रह्म की तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री, शूलगव, आश्र्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणि, सप्त्सोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। ये चालीस ब्राह्मण के संस्कार हैं। 
इनके साथ ब्राह्मण में 8 आत्म गुण भी होने चाहियें : 
अनसूया: दूसरों के गुणों में दोष बुद्धि न रखना, गुणी  के गुणों को न छुपाना, अपने गुणों को प्रकट न करना, दुसरे के दोषों को देखकर प्रसन्न न होना। 
दया: अपने-पराये, मित्र-शत्रु में अपने समान व्यवहार करना और दूसरों का  दुःख दूर करने की इच्छा रखना। 
क्षमा: मन, वचन या शरीर से दुःख पहुँचाने वाले पर क्रोध न करना व वैर न करना। 
अनायास: जिन शुभ कर्मों को करने से शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म को हठात् न करना। 
मंगल: नित्य अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों को न करना। 
अकार्पन्य: मेहनत, कष्ट व न्यायोपार्जित धन से, उदारता पूर्वक थोडा-बहुत नित्य दान करना।  
शौच: अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करना, निन्दित पुरुषों का संग न करना और सदाचार में स्थित रहना। 
अस्पृहा: ईश्वर की कृपा से थोड़ी-बहुत संपत्ति से भी संतुष्ट रहना और दूसरे के धन की, किंचित मात्र भी इच्छा न रखना। 
जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् संपन्न हुए हों और वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो, तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है।
VALUES-VIRTUES-ETHICS-MORALS :: How one nurtures a child is significant, since his personality will reflect, what he has learnt in his early childhood. Mother is the first teacher, followed by the father and later during schooling, the teachers and the environment of the school, in addition to the society. Impact of the playgroup, friends, TV, films, web, social sites-media, too is significant. He learns one thing or the other from each and every thing around him.
It is a matter of faith and experience that the child is born with some inborn tendencies, which are hard to tackle-modify-improve. His previous births, show off their impact, time and again. Some children are born with inborn faculties, traits which distinguish them from others. Sixth sense, enlightenment, wisdom, prudence, thoughtfulness, superhuman characters, excellence in specific fields, religiosity etc., are observed in some of the children, who are often called gifted children. 
Still, it is the duty of the parents-school and the society to make him a law abiding citizen. Efforts should be made to make him righteous, virtuous, pious, honest, brave, diligent, hard working. One should try to inculcate goodness in him. He must learn how to behave with elders, seniors, teachers and the respected members of the society. He has to  be taught, how to be polite and negotiable. He must not be allowed to use foul-abusive language, since refining of behavior is always possible. One may have to become tough in dealing with him. He should be able to face the realities of life-rigors, simultaneously.
It's possible to make him a perfect gentleman.
From the early childhood, he undergoes various sanctifying-purifying essential rites. The rites-rituals just begin, when he start taking solid food. There after investiture, with sacred thread takes place. He is sent to the Ashram of the Guru to learn and become a useful citizen. 
GOOD HABITS-PRACTICES-संस्कार :: सामान्यतया संस्कार मनुष्यों में पाये जाने वाले अच्छे-बुरे आचर-विचार, आदतें, व्यवहार, बातचीत, खाना-पीना, उठना बैठना, कपड़े पहनना, संयम आदि को अभिव्यक्त करते हैं। संस्कार हिन्दु धर्म में प्रचलित विभिन्न क्रिया-कलापों यथा जनेऊ, नामकरण आदि को भी बताते हैं।माहौल से दूर रखना, अच्छी संगती देना, अच्छी बातें सिखाना, बुजुर्गों का आदर-सम्मान, प्यार से बात करना, बगैर बात न हँसना, समय से खाना-पीना, गाली न बकना, मार-पीट से दूर रहना, समय से सोना-जागना, नहाना-धोना, नशा न करना, बगैर अवसर न बोलना, दिल लगाकर पढ़ाई करना, भगवान को याद रखना  आदि कुछ अच्छे संस्कार हैं। 
They generally reflect  perfecting-finishing-refining-adoring of the behavior-movements-habits of human beings from one society to another, one culture to another and from this country to that. They describe in born faculty-power-instinct to influence-impress or nurture ideas-concepts. They are the sanctifying or purifying rites observed in different parts of the world.
सुबह जल्दी सूर्योदय से पहले उठना और शाम को जल्दी सोना। दिन में न सोना। 6 से 8 घंटे सोना। 
शौच, दंत-मंजन, व्यायाम, स्नान, पूजा।
माँ-बाप, गुरु, बुजुर्ग, बड़े बहन-भाई आदि को प्रणाम करना, शीश नवाना, पैर छूना। 
मांस-मीट, मदिरा, नशे का सेवन नहीं करना। 
झगड़ा, दबंगई, मार-पीट न करना।
जोर से न बोलना, प्यार-नर्मी-विनय पूर्वक बातचीत करना।
अपनी मर्याद में रहना। नियम, कायदे-कानून को मानना। 
अच्छी आदतें ग्रहण करना चरित्र का निर्माण करना। 
25 वर्ष की उम्र तक अध्ययन-ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना। 
अतिथि सत्कार-परन्तु  ध्यान में रखते हुए ऐरे-गैरेनत्थू-खेरे का घर में न घुसाना। 
सोच समझकर मित्र-सम्बन्ध बनाना। 
पराये मर्द से हँसी-ठट्ठा-ठिठौली न करना। पति की अनुपस्थिति में घर में प्रवेश न करने देना। संयम-शील की रक्षा करना। शील संयम बनाये रखना। 
कम खाना, गम खाना, कम बोलना, कभी नुकसान नहीं करता। 
Get up early in the morning before Sun rise. One should should have a proper sleep after Sun set varying between 6-8 hours. In case one is tired, he should have a proper nap.
Timely regular exercise, cleaning, bathing  and prayer.
Respecting-honoring, bowing in front of parents-elders and teachers & touching their feet.
One should not consume meat, eggs, fish, wine, narcotics.
One should never engage in fight, quarrel.
Acquire good habits, manners and try to become an ideal citizen.
Never speak loudly. Talk politely, diligently-properly, respectfully.
One should not cross the limit in any walk of life. Obey rules and the laws of the land.
One should observe chastity till the age of 25 years. Touching, starring, chasing girls-women should be a taboo till this age. Never indulge in sex with the other women.
Honoring-welcoming the guest. One should not permit the undesirable-unknown person inside the house. Its dangerous.
One should grow intimacy only after examining, analyzing, understanding the person in touch-relation-contact.
The women must avoid the company of other male members. Mixing, enjoying, laughing, cutting jokes is usually harmful-dangerous. She should protect her modesty-honor-chastity-virginity.
Eating less, controlling fury-anger-frenzy, speaking little is always good-beneficial.
मनुष्य जन्म से ही अच्छे-बुरे संस्कार लेकर पैदा होता है। उसका पुनर्जन्म भी पूर्वजन्म के संस्कारों के आधार पर ही होता है। अच्छे सुसंस्कृत परिवारों में भी बुरे-दुर्जन पैदा हो जाते हैं और दुराचारी-निकृष्ट कोटि के लोगों के यहाँ सदाचारी हरी भक्त। कंस उग्रसेन जैसे धर्मपरायण व्यक्ति के घर पैदा हुआ। रावण के पिता ऋषि थे और भाई विभीषण राम भक्त। राक्षस राज प्रह्लाद हिरण्यकुश के पुत्र हैं। 
प्रारंभिक संस्कार माँ से और परिवार से आते हैं। फिर बच्चा संगति, विद्यालय, किताबों, अध्यापकों, फिल्म, टेलीविज़न, इंटरनेट आदि से सीखता है।आजकल के माँ-बाप तो बच्चे को चुप कराने के लिए टेबलेट पकड़ा देते हैं। स्कूलों में सदाचार शिक्षा का नितांत अभाव है।  वहाँ खुद अध्यापकों को सदाचार-अध्यात्म की शिक्षा की जरूरत है। 
संस्कार MENDING DESTINY प्रारब्ध शुद्धि :: वर्तमान जन्म में मनुष्य को प्रारब्ध, संचित व वर्तमान कर्मों का मिला-जुला फल प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि, यदि मनुष्य चाहे तो, अपने भविष्य को स्वयं निर्धारित कर सकता है। आवश्कता है, केवल द्रढ़ इच्छा शक्ति की। सात्विक-सत कर्म पूर्व जन्मों के, तामसिक व राजसिक कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं। राजा बाहु बलि व मार्कंडेय जी इसके उदहारण हैं। One can script the deeds of his present birth, through firm determination-faith-purity-asceticism. This birth observes the outcome of destiny, accumulated deeds and the current deeds of present birth. One can easily modify-manipulate the destiny, through devotion to the Almighty-Allah-God. Righteous-virtuous-pious deeds can cleanse the dirt of previous births.
Mighty demon king Bahubali (-son of Virochan and grandson of Prahlad Ji) and saint-Rishi Markandey Ji are the examples of it. 
संस्कार SATVIK-VIRTUOUS, RAJSIK-ARISTOCRATIC and TAMSIK-WICKED PRACTICES सात्विक, राजसिक, तामसिक गुण-धर्म प्रवृतियाँ  :: Each and every individual born as a human being possesses Satvik, Rajsik and Tamsik characters in varied proportions, which moves them to heavens, earth and hells respectively, . Excess of Satvik-divine-austere-pious-pure-righteous-virtuous characters paves the way to higher abodes-heavens. Those with excessive Tamsik characters book their berth in the hells-lower specie-life forms by virtue of the sins they have been accumulating all over their life.
Presence of Sat Yug, Treta Yug, Dwapar Yug and Kalyug पृथ्वी पर सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग। 
सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलयुग चारों हर वक्त भूमि पर रहते हैं। कल युग में यह प्रधान व अन्य गौण हैं। 
The earth witnesses the presence of Sat Yug, Treta Yug, Dwapar Yug and Kalyug simultaneously.  During Kal Yug its chatactricies dominates the behavior style-mode of functioning-way of life. 
संस्कार PURITY-PIOUSITY-VIRTUOUSNESS बाह्य  व आन्तरिक पवित्रता :: Internal purity is connected to the mind-thoughts-ideas-concepts-visualization of things-happenings. Our soul perpetuate from one life to another vibrating between one incarnation to another, depending upon the deeds, our performances in respective births. Often we think-act through our perception of likes or dislikes, what do not please us make us react, otherwise. We give more weightage to our relations, determined by heart-attachments. Warnings come from the brain but we prefer to discard them. As a matter of fact one should think twice before acting. Ethics-virtues-purity of thoughts-righteousness-honesty leads to holiness, higher abodes, closer to the God.
PhotoExternal purity is equally important. It involves our behaviour-actions-dealings with others-society. What we speak is important.We should not hurt the sentiments of others. One should not insult others. One should avoid watching-listening-mixing with the wretched-vulgar-indecent. Avoid commenting over them as well. Try to adhere to truth-honesty. 
Bathing in holy rivers, shrines, holy places do help us. Regular bathing is equally important, since it keep one free from germs, fit and fine.When ever one visit a shrine-holy place-holy river-temple-place of worship he must discard negative thoughts-ideas-actions-wretchedness-meat-wine-woman-vulgarity. It ensures protection from hell and placement in higher abodes-heavens. 
मन चंगा तो कथौती में गंगा। बाह्य व आन्तरिक पवित्रता, दोनों ही मनुष्य के भविष्य का निर्धारण करतीं हैं, उसके अगले जन्मों को तय करतीं हैं। 
संस्कार VIRTUES-GOOD QUALITIES OF HUMAN BEINGS :: It enumerates virtues as Daevi-Sampat or divine qualities. Fearlessness, purity of heart, steadfastness in the Yog of Wisdom, alms-giving, self-restraint, sacrifice, study of the scriptures, austerity, straightforwardness, harmlessness, truth, absence of wrath, renunciation, peacefulness, absence of crookedness, compassion to living beings, non-covetousness, mildness, modesty, absence of fickleness, vigor, forgiveness, purity and absence of envy and pride are manifestations of the fundamental virtues.[ SHRI MAD BHAGWAT GEETA]
ACQUISITION OF KNOWLEDGE :: One should be willing to learn for improvement of his destiny and the present in addition to the next incarnations. Its essential to make both ends meet, earn livelihood and growing of the children and caring the elders. This is possible by understanding the text of the scriptures-Veds, Purans-Upnishads-Ramayan, Maha Bharat and Geeta. There are 64 arts and sciences which were taught at length In ancient India. India is the store house of learning to assimilation in the Ultimate. One must be ready to inculcate virtues in his children.
ADAPTABILITY :: One should make  efforts to abandon-restrain-abstain him self from, evil-wickedness-satanic-devil deeds, behavior. He should adjust him self according to changed circumstances as far as  possible.
ADORING VIRTUOUS :: One acquires the characteristics of the virtuous-righteous-honest-pious just by keeping the company and following him, adoring; him which will lead him to releasing from the world full f troubles-tensions-worries-pains-sorrow-injustice.
APPEASEMENT :: One should make efforts to calm, quite, so that a person who is angry relaxes and becomes normal. Sometimes concessions are given to potent enemies to satisfy him, retract.
APPRECIATION: One must appreciate the good qualities-virtues of others and always try to learn and implement them in his life. Life stories of great men, philosophers, scholars, scientists are always beneficial-admirable-adorable. 
ASSOCIATION WITH THE NOBLE PEOPLE-ENLIGHTENED-SCHOLARS-PHILOSOPHERS-SAINTS :: This is always beneficial as it paves the way for detachment-relinquishment, breaking of bonds-ties with the worldly affairs, for the one who is seeking Salvation-assimilation in the Almighty, Liberation, and Ultimate bliss-Parmanand.
ASTEY अस्तेय :: Self restraint from stealing-theft-burglary is desirable. Stealing leads to hells. One must not steal. Stealing, storing stolen goods, selling-buying them are equivalent and leads to punishment as greatest sins.
चोरी एक ऐसा अपराध है, जो मनुष्य को नर्क ले जाता है और वहाँ से मुक्ति के तदुपरान्त हीन योनियों में जन्म प्रदान करता है। चोरी करने वाला, चोरी का माल खरीदने वाला, बेचने वाला बराबर के अपराधी हैं।
ASSIMILATION IN THE ALMIGHTY-SALVATION मोक्ष-LIBERATION मुक्ति :: This should be the ultimate goal of one's incarnations. However, Bhakti-Devotion-dedication to the Almighty is considered to be the better choice for an individual.For better-detailed understanding of the subject please refer to chapters on Salvation on santoshkipathshala.blogspot.com
ATTENTIVENESS :: Listen to the saints-priests-Pundits with attention-carefully-cautiously. Some words may be there to change the path of life leading to heaven-higher abodes-loss of vices-wickedness-sins. Try to accept the gist-central idea-theme behind the sermons.
AUSTERITY :: Its essential to gain wisdom in addition to mere theoretical knowledge. One has to lead a simple life and follow the path of morality. He has to be ideal. 
BENEVOLENCE :: One has to do something for the welfare of the society-others as soon an opportunity arrive. Always try to help the deserving-needy person. Good deeds-activities prevents one from sins and the hells ultimately.
CARDINAL VIRTUES :: One should inculcate these for spiritual upliftment. (1). PURITY: Of body, mind and soul., (2). SELF CONTROL: Discipline-restraint  of body, mind and soul., (3). DETACHMENT: Relinquishment-Vairagy over worldly issues.,(4). TRUTH: In thought word and deed-action. (5). NON VIOLENCE: (-Ahinsa ) towards all. 
CHASTITY-CELIBACY-FIDELITY-MORALITY-ASCETICISM  ब्रह्मचर्य :: It connects one with the God. It retains the vigour, health, potency, memory, strength of a person. It protects one in an hour of need. The student's life up to the age of 25 years is considered to be meant for celibacy. One is not supposed to interact with opposite sex during this period. While one is out of the Ashram for begging alms, he has to keep his eyes down facing earth, and call every women Maata-mother. Brahmchary in thought, word and deeds-practice is desirable. Please refer to: LONGEVITY-दीर्घायु on (1) santoshkipathshala.blogspot.com & (2) SEX EDUCATION (काम शिक्षा) on: bhartiyshiksha.blogspot.com  स्त्री और पुरुष दोनों के लिए ही संयम, उत्तम चरित्र अति आवश्यक हैं। पुरुष के लिये वीर्य और स्त्री के लिए कुँवारे पन की रक्षा जरूरी है। पुरुष को अन्य स्त्री और स्त्री को परपुरुष से सम्बंधों से दूर ही रहना चाहिये। यह उत्तम स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। 
Observe this for control over body, mind and the soul. Never think of sex before 25 years of age and there after once only when the ovulation takes place in wife.
CLEANLINESS :: Cleanliness is Godliness. One should take bath in the morning without fail, regularly. One should wear clean cloths and sweep the house regularly. His ideas-thoughts should also be clean. Never use vulgar language, abuses, harsh words Never plan to endanger others life-property-family. Always remember the God. Keep the devil-Shaetan away from you.
COURTESY :: As a part of good manners one should be courteous towards others, as a matter of routine. It odes not mean that he has to bend or bow down in front of every one. 
COMPASSION (KARUNA करुणा) ::  It provides the ability to feel, think, realize for the welfare of others. 
DISCIPLINE ::  One who is disciplined, systematic who's life is orderly is sure to get success in life. Sun rise and Sun set are fixed, planetary motion is fixed, seasons are fixed-disciplined. One has to inculcate in him the tendency to be regular-in time. One has to complete the task-job in due period of time. One should wake up and sleep in time. There should be rhythm in his activities-working. Don't leave a job pending for future-tomorrow as it will never come.
DETERMINATION-DECISION निश्चय-निर्णय :: Determination is key to success. Unless one takes a decision, he can not proceed forward.Decisions may be reviewed as per need of the situation and circumstances. One has to find whether the direction chosen by him is correct or not. Negative thinking, is always harmful-dangerous. One should analyse the pros and cons of his plans-ideas-thoughts, in advance. Positive thinking is always beneficial.Firm decision in right-righteous direction, opens up new avenues-vistas of elevation. Rigidity-stiffness is always harmful as compared to flexibility.One should be able to restrain himself. Too much flexibility is also dangerous. One should give it a thought before, to decide what he has to do? He should not jump to conclusions-decisions.There should always be scope to modify change-retract if faults are observed at some stage. Nothing should be done in a hurry-haste makes waste. Stubbornness-obstinacy-persistence-dogmatic attitude, should always be avoided. One should himself like the wires-cords of musical instruments, which produce sweet-adorable-melodious-rhythmic-sound-notes-chords-tunes.It's good-advisable to  consult the elders-knowledgeable people. One should not tie his legs by taking vows.
किसी भी काम  की सफलता के लिये निश्चय-निर्णय  करना आवश्यक है। निश्चय करने से पहले यह भी देखना जरुरी है कि हमारे सोच की दिशा क्या है। विपरीत या उल्टा सोचने से कार्य में बाधा आयेगी। सकारात्मक सोच उन्नति के लिए परमावश्यक है। सही दिशा में दृढ निश्चय उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, नए रास्ते  खोलता है। जरुरत से ज्यादा सख्ती या लचीलापन घातक है,  जहाँ तक संभव हो जिद्द से बचना। स्वयं को वीणा के ऐसे तारों की तरह बनाओ जिनसे मधुर स्वर निकलता हो। 
DEVOTION BHAKTI भक्ति :: सत्य, त्रेता और द्वापर युग में ज्ञान और वैराग्य मुक्ति के साधन थे। कलियुग में केवल भक्ति ही ब्रह्म सायुज्य-मोक्ष की प्राप्ति करने वाली है। परमात्मा ने यही विचार करके सत्स्वरूप भक्ति की रचना की है। श्री हरी ने भक्ति को ज्ञान व वैराग्य पुत्र रूप में तथा मुक्ति को दासी के रूप में प्रदान किया। कलियुग में मुंक्ति पाखण्ड रूपी  दोष से पीड़ित होकर क्षीण होनी लगी और भक्ति की आज्ञा से तुरन्त बैकुण्ठलोक को चली गई। भक्ति के स्मरण करने पर मुक्ति धरालोक पर आती तो है, परन्तु तुरन्त चली जाती है। कलियुग एक ऐसा युग है, जिसमें मात्र प्रेमरूपी भक्ति  को धारण करने से प्राणी भगवान् के अभय धाम-लोक को प्राप्त करता है। इन लोगों को यमराज स्वप्न में भी परेशान नहीं करते। भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस या दैत्य आदि का साया भी ऐसे लोगों पर नहीं पड़ता। भगवान् मात्र भक्ति से ही वश में हो जाते हैं। मनुष्यों का सहस्त्रों जन्मों के पुण्य-प्रताप से भक्ति में अनुराग होता है। भक्ति से तो स्वयं भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र भी सामने उपस्थित हो जाते हैं। जो भक्त से द्रोह करता है, वो तीनो लोकों में दुःख ही दुःख पाता है। प्रह्लाद और  ध्रुव ने भक्ति के माध्यम से श्री हरी को प्राप्त किया। श्रीमद्भागवत भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के माध्यम से महान विवेक की उत्पत्ति करता है। भगवान् वेद व्यास ने इसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थापना के लिए इसे प्रकाशित किया। [श्रीमद्भागवत 2-4-71]
During the Saty, Treta and Dwapr age-cosmic era, Enlightenment and Relinquishment were the means to attain Salvation-Moksh-Assimilation in God-Liberation. During the present era Kali Yug, devotion is the only means-source of attaining the Almighty. The Almighty created Bhakti-devotion for the welfare of the Humans due to the intricate-devastating nature of Kali Yug leading to loss of virtues-righteousness-piousity-honesty-values. Kali Yug is the period during which the majority of the population will indulge in dishonesty-wretchedness-frauds-vulgarity-sensuality-sexuality-passions-un holi acts, Hippocracy, Atheism, sinful acts. People will moves away from morality, culture & values. They will discard & dishonor the scriptures. 5151 years of Kali Yug has passed and the total duration of it is 4,80, 000 years. Bhakti was blessed with Gyan & Vaeragy as sons and Mukti as a slave. Mukti could not survive the on slaught of Hippocracy-deceitful acts-hearsay, dissimulation and im posterity and left for the Vaikunth Lok-the Abode of the Almighty Bhagwan Shri Krashn. However, it visits off & on,  as and when, invited by Bhakti.
One who develops devotion in the Almighty with love & affection attains the Ultimate abode, which is the source of fearlessness. Those who are devoted to the Almighty are not shadowed by the Yum Raj-the deity of death and reincarnations.
Ghosts, demons, Rakshas, Shaitan-devils, giants, Dracula remain away from such people. The Almighty is controlled by the devotees and their devotion. The Almighty present himself before the devotee to bless him-grant vows. Any one who acts against the Bhakt-devotee find trouble-pain-sorrow-grief-torture in all abodes. Bhakt Prahlad (-the mighty demon king and son of Hirany Kashyap) & Dhruv got the Ultimate boons from the Almighty by virtue of Bhakti-devotion. Shri Mad Bhagvat generates the Bhakti, Gyan and Vaeragy, leading to evolution of prudence-brilliance, Piousity. Bhagwan Ved Vyas produced it, for the welfare of masses  and establishment of Bhakti, Gyan and Vaeragy leading to evolution of prudence-brilliance, during this era called Kali Yug.
मनुष्यों के लिए सर्व श्रेष्ठ धर्म वही है जिसमें भगवान श्री कृष्ण की भक्ति कामना रहित हो।  जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्ति से ह्रदय आनन्द स्वरूप परमात्मा की उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् श्री कृष्ण की भक्ति होते ही अनन्य प्रेम से उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्य का आविर्भाव हो जाता है।  [श्रीमद्भागवत 2-1-(6-7)]
भक्ति के प्रभाव से भोजन प्रसाद में, भूख व्रत में, पानी अमृत में, संगीत कीर्तन में, कार्य सेवा में, यात्रा तीर्थ यात्रा में और मनुष्य भक्त में परिवर्तित हो जाते हैं। 
Bhakti transforms food into Prashad, Hunger into Fast, Water into Elixir, Music into Keertan, Action into Service, Work-deeds into Karm, Travel into Pilgrimage, Man into a Human being.
भक्ति को शास्त्रों में मुक्ति और मोक्ष से भी बढ़कर माना गया है। 
Devotion is superior to Liberation and Salvation as pr scriptures.
DONATION CHARITY दान :: Giving alms, food, shelter, asylum, protection-safety, financial help to the needy-one who deserve.
अन्न दान :: अन्न के समान न कोई दान है, न होगा। कल्याण की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को उचित है कि वह अपने कुटुम्ब को कष्ट देकर भी महात्मा ब्राह्मण को दान अवश्य दे। थके मांदे अपरिचित राहगीर को जो बिना क्लेश अन्न (-भोजन) देता है, वो सब धर्मों का फल प्राप्त कर लेता है। अन्न से देवता, पितर, ब्राह्मण और राहगीर को तृप्त करने वाला, अक्षय पुण्य प्राप्त करता है। अन्न दान पाप से मुक्ति दिलाता है। ब्राह्मण को दिया अन्न दान अक्षय और शुद्र को दिया गया दान महान्  पहल दायक है। 
जल दान :: बावली, कुआँ और पोखरा बनवाना चाहिये। जिसके बनवाये गये जलाशय से गौ, ब्राह्मण और साधु पुरुष पानी पीते हैं, उसका कुल तर जाता है। पोखरा बनवाने वाला, तीनों लोक में सम्मानित होता है। मनुष्य, गन्धर्व, पितर, नाग, राक्षस तथा स्थावर प्राणी भी जलाशय का सहारा लेते हैं।जिसके पोखरे में वर्षा ऋतु में ही जल रहता है, उसे अग्निलोक का फल मिलता है। जिसके तालाब में हेमन्त और शिशिर काल तक जल ठहरता है, उसे सहस्त्र गौ दान का फल मिलता है। वसन्त और ग्रीष्म ऋतु तक पानी ठहरने पर मनीषी पुरुष अतिरात्रि और अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है। जिसके पोखरे में गर्मी तक पानी ठहरता है, वह कभी दुर्गम एवं विषम संकट का सामना नहीं करता। One may distribute bottles of water amongest the thirsty, needy, deprived, depraved.
वृक्ष लगाना :: वृक्ष लगाने वाला अपने पितर और वंशजों का भी उद्धार कर  देता है और अक्षय लोकों को प्राप्त करता है। वृक्ष अपने फूलों से देवताओं, पत्तों से पितरों, छाया से समस्त अथितियों का पूजन करते है। किन्नर, राक्षस, मानव, देवता, ऋषि, यक्ष तथा गन्धर्व भी वृक्षों का आश्रय लेते हैं। वृक्ष फल और  फूल से युक्त होकर इस लोक में मनुष्यों को तृप्त करते हैं। वे इस लोक और परलोक में भी पुत्रवत माने गये हैं। 
पशु दान: जो श्रेष्ठ पात्र को गौ, भैंस, हाथी, घोड़े दान देता है, वो अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है। 
धन व वस्त्र दान: जो व्यक्ति सुपात्र को धन, सुवर्ण, धान्य, वस्त्र दान करता है, वो परम गति को प्राप्त करता है।
अति दान :: गौ दान, भूमि दान व विद्या दान अति दान कहलाते हैं। 
भूमि दान: जो व्यक्ति सुपात्र को जोती-बोई एवं फलों से भरी हुई भूमि दान करता है, वो अपनी दस पीढ़ी पहले के पूर्वजों व दस पीढ़ी बाद के वंशजों को तार देता  है और विमान में बैठ कर विष्णु लोक जाता है।
दीप दान :: दीप दान करने से मनुष्य सौभाग्य, अत्यन्त निर्मल विद्या, आरोग्य, परम उत्तम समृद्धि  के साथ-साथ सौभाग्यवती पत्नी, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तथा अक्षय सम्पत्ति पाता है। ब्राह्मण ज्ञान, क्षत्रिय उत्तम राज्य, वैश्य धन और पशु तथा शुद्र सुख की प्राप्ति करता है। कुमारी कन्या को शुभ लक्षणों से युक्त पति, पुत्र-पौत्र तथा बड़ी आयु मिलती है और कभी वैधव्य नहीं देखना पड़ता। स्वामी से वियोग नहीं होता। भयभीत परुष भय से तथा कैदी बंधन मुक्त हो जाता है। दीपदान ब्रह्म हत्या, मानसिक चितां तथा रोगों से भी मुक्ति दिलाता है। दीप का प्रकाश दान करने से मनुष्य रूपवान्  होता है और दक्षिणा देने से स्मरणशक्ति  तथा मेधा (-धारणा शक्ति)   प्राप्त होता है। 
जो लोग मंदिर के दिए में सदा ही यथाशक्ति तेल और बत्ती डालते हैं, वे परम धाम को जाते हैं। जो व्यक्ति स्वयं असमर्थ होते हुए बुझते या बुझे हुए दिए की सूचना देते हैं, वे भी परमधाम के अधिकारी होते हैं। यदि कोई भीख मांगकर भी भगवान विष्णु के सम्मुख दिया जलाता है, तो वो भी पुण्य का भागीदार हो जाता है। दीपक जलाते समय यदि कोई नीच पुरुष भी श्रद्धा से हाथ जोड़कर उसे निहारता है, तो वो भी विष्णुधाम को जाता है। दूसरों को भगवान के सम्मुख दिया जलाने की सलाह देने वाला भी सब पापों से मुक्त हो श्री धाम प्राप्त करता है। अतः मनुष्य को यथा सम्भव भगवान के सम्मुख या मार्ग में राहियों कि सुविधा के लिए दिया अवश्य जलाना चाहिए। [पद्मपुराण]
जो सदा सत्य बोलते हैं, पोखरे के किनारे वृक्ष लगा ते हैं, यज्ञानुष्ठान करते हैं, वे कभी स्वर्ग से भ्रष्ट नहीं होते। 
दान का पात्र :: पुराण वेत्ता पुरुष दान का सर्व श्रेष्ठ पात्र है। वह पतन से त्राण करता है, इसलिए पात्र है। ब्राह्मण शांत होने के साथ ही विशेषतः क्रियावान् हो। इतिहास-पुराणों का ज्ञाता, धर्मज्ञ, मृदुल स्वभाव का पितृ भक्त, गुरुसेवा परायण तथा देवता-ब्राह्मणों का पूजन करने वाला हो। वो गुणवान, जितेन्द्रिय, तपस्वी हो।  जो ब्राह्मण श्रोतिय, कुलीन, दरिद्र, संतुष्ट, विनयी, वेदा भ्यासी, तपस्वी, ज्ञानी और इन्द्रिय संयमी हो उसे ही दिया गया दान अक्षय होता है। 
ENLIGHTENMENT :: Intelligence, memory, learning-education, understanding, cleverness, prudence, psychology, analysis, ability, skill, thinking, meditation, application, followed by practice अभ्यास, Gyan-knowledge, utilisation constitute the mental make up liberation-assimilation in the Ultimate.
Human intelligence makes him survive the onslaught of various ups-downs, rise-falls, worries, bows, sorrows, pains. He makes endeavors to find a way out out of the difficult-intricate situations successfully. 
Memory supports the intelligence by interweaving the possible solutions available in the past and the current knowledge-solutions for finding out possible new solutions-way out. Ancient India saw the utilization of memory to  the extreme. All knowledge, arts, sciences were stored in the memory by the students to utilize in future, at an appropriate situation-opportunity.
Understanding of the content-text is essential while rote memory may be useless. Understanding comes through analysis-comparing-contradictions, assumptions, hypotheses and its testing simultaneously. Application of the learning successfully, builds confidence. Repeated application and fault finding, paves way for improvement, skill and ability. One begins synthesizing the new situations-ventures. It creates interest leading to appreciation and further advancement. One is blessed with farsightedness.Human element needs cleverness and prudence and use of psychology simultaneously. How ever the direction should be positive, helping others, social service. The devotee attains Gyan-enlightenment leading to Salvation.
Knowledge is for the sake of livelihood-earning, sustaining-supporting the family-household, family members, poor, down trodden, needy, welfare of the society, seeking job, development of the country as well as co ordination amongest the members of society, at all levels: Village-Country, State, Nation, World. Learning broadens the thinking, opens up the mind, modifies-corrects-refines the behaviour-etiquette-interaction-dealings. Enlightenment connects one with the Ultimate-God-Almighty and leads to Liberation-Salvation-Devotion.
One who is blessed with wisdom-the quality of being wise, prudence, belief in the thoughts of the ancestors, ancient scriptures, epics; is thoughtful, analytic, balanced headed, speaks only when necessary and to the point. He avoids undue arguments-conflicts, confrontations. His sense of logic is developed. He controls his wishes-desires-will-needs. 
Please go through the content pertaining to Gyan Yog over:: YOG: (KARM, GYAN-SANKHY-ENLIGHTENMENT, DIVINITY-BHAKTI & PRANAYAM) योग :: कर्म, ज्ञान-सांख्य, भक्ति, प्राणायाम santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com 
EARNESTNESS :: One should be duty bound to clear all his debts, commitments, pledges, promises (-वायदा). As a matter of fact one should desist from taking loans or borrowing. He should not be lured to buy on instalment basis having to pay heavy interest over it leading to the interest becoming more than the principal. One's intentions should always be positive.
EFFORTS-PERFORMANCES-DUTY-DEVOTION-DEEDS-RESPONSIBILITY :: One, as human being has to be committed for the upliftment-welfare-peace-universal brotherhood in the society. It should be the endeavour of every one to do something auspicious-virtuous.
EQUANIMITY समता :: One must not differentiate-discriminate-distinguish between various species-castes-races, since each one of them contains the fraction-component of the Almighty-the SOUL, which is eternal, while dealing with them for pity-favours. सभी प्राणियों पर दया करो। व्यर्थ बलि, हत्या-वध मत करो। Great souls, saints who wish to attain Salvation-Liberation develop-generate equanimity in their behaviour-dealings.
ETIQUETTE :: One should behave with others in decently, politely, peacefully without being provocative. A pleasing personality is always beneficial.
FORTITUDE-COURAGE-BRAVERY-MIGHT-STRENGTH-POWER :: One must maintain his calmness-cool, courage, self control in restraint-pain-danger-difficulty. This is the period-occasion when one is tested by the Almighty, for his virtues, morality, faith, devotion. 
FORBEARANCE ::  One should desist from mentioning or describing the help he has done to someone needy-friend or even the family member. He should not be impulsive. There is need for formal refrain-self control-patience, while dealing with the people.
FRUGALITY ::  One should be careful, economical and try to waste nothing. He should do good to others as for as possible. 
GENEROSITY-DONATIONS-CHARITY-CONTEMPLATION :: One should be willing to help others monetarily-financially. He should spare one sixth of his income for this purpose (giving alms, daan, grants to the deserving-needy, destitute poor, down trodden). 
GENTLENESS-KINDNESS-GOODNESS :: One should demonstrate  good-appropriate conduct towards others. 
GRATITUDE :: One should be thankful to those who helped him in an hour of need and always ready-willing to extend help to him or others. He should not forget the acts of services provided by others to him and should remain grateful to them.
HELPING OTHERS परोपकार :: मनुष्य को चाहिए कि वह प्रति दिन कुछ न कुछ ऐसा कार्य अवश्य करे जो जन हित में हो। जो व्यक्ति दूसरों का भला  करता है, उसका भला स्वत: हो जाता है।Do good have good.परमात्मा सब देखता है। वो हमारे अन्दर बैठा है। उसकी आँखें सभी ओर हैं। उससे कुछ भी छुपा नहीं है। परोपकार के नाम पर हम हर किसी की सहयता करने न लगें। ऐसे प्राणी का चुनाव करना पड़ेगा जो असमर्थ है जिसे मदद की जरूरत है। कर भला हो भला, अन्त भले का भला। दूसरों-औरों के लिये अपने घर में आग लगाना परोपकार नहीं है। पहले घर की फिर बाहर की। अंधे को रास्ता दिखाओ, भूखे को रोटी खिलाओ, अनपढ़ को शिक्षित करो, गरीबों की लड़कियों की शादी में मदद करो-दान दो-कन्या दान दो, कुएँ खुदवाओ-पियाऊ बनवाओ, धर्मशाला बनवाओ, मन्दिर का पुनर्निर्माण-निर्माण कराओ, गरीब कि मदद करो। किये जा तू जग में भलाई के काम, तेरे दुख दूर करेगा राम। 
नेकी कर दरिया में डाल। 
Provide medical aid-attention to the needy open charitable hospitals-dispensaries. Be sympathetic with one who is in need of consolation.  If one helps other person, he should abstain from telling-revealing-describing to others. Always avoid propaganda  in this connection.
HONOUR-RESPECT ::  Mutual respect is essential. One should not consider any one inferior than self. All are the creations of the Almighty.
HOSPITALITY ::  One should be friendly and generous in reception and entertainment of guests, demonstrating of magnanimity and the value of service. 
HONESTY :: This is essential to build legitimate trust within relationships and to avoid self-deception. This is said that honesty is the best policy.
HUMILITY :: One has to demonstrate the humble condition-state of mind-humbleness, while dealing with others in behaviour and practice.
HUMANITY :: This has something to deal with others with a sense of equanimity-at par with the Almighty-God.
HUMBLENESS IN PROSPERITY :: One must not be under the impact of-over powered by proud-ego. He should be humble and behave normally.
HOPE आशा, उम्मीद :: It keeps one struggling and facing the difficulties with ease. Never forget the God. He is always with one. The worst times will be over soon.One should not loose heart, sooner or later the days will definitely change for the better.
IMPEDIMENT :: One resolves to over come all hindrances. He is free from the defects in speech. He do not  stammer. He is imminent to what comes or happen.
INDUSTRY-INDUSTRIOUSNESS :: One should continue with his efforts-endeavours whether it is connected to some project or attaining the God, provided it is virtuous-righteous-pious honest. Faith in the Almighty should be unshaken. One should not be lazy-sluggish and lose-waste  no time; be always employ'd in something useful and cut off all unnecessary-useless-wasteful actions.
INDOMITABLE SPIRIT-WILL :: One should be firm-determined in his actions-practices-deeds.
INTEGRITY :: This is the quality which makes one honest and upright in character. This ensures that the possessor acquires the state or condition of being complete.
INVESTIGATION :: One should continue with the search for truth. The ultimate truth is the Almighty. He is within one, like the musk which the musk deer continue chasing. Identify the self and there the God is.
IRRELEVANCE (not to have unwanted-irrelevant company) असंगता :: Undesirable company is always bad. One learns all sorts of evils-bad deeds-bad habits which puts him in trouble time and again. It takes one to Shaiean away from the God and paves the way for Hells. Some times, one is dragged to notoriety unknowing. The parents should be extremely careful, while handling the child. He should be nursed properly. The parents should teach-elaborate-discuss the epics, scriptures along with the teachings of renowned people-sages.
JUSTICE :: One should stand by the truth-reality. Judgement  should be delivered only after understanding the case fully. Inner conscious, intuition, balanced headed ness, prudence, power to analysis, application of past knowledge pays a lot.
KINDNESS, MERCY, PITY :: One should be kind to others specially the needy. But he should be aware that he is not cheated, be fooled, bluffed.
LOYALTY :: One should be faithful to the employer-master till he is with him and never disclose his secrets even after leaving the job-service.
LOVE :: One should love others, all creatures, no doubt. But he should be conscious-careful while dealing with the poisonous-sinners-wicked, safety first. Its a both-two way process. Mutual love is for ever. If one has to love, he should love  the Almighty. Don't intermix passions, sensuality, lust, sex, sexuality with love. It is not love but vice. Love demands sacrifices.
LISTENING ::  Listening to spiritual discourses; prayers, speeches-sermons, discourses is always beneficial.
MODERATION :: One must avoid extremes in behaviour, affairs, handling others. Normal behaviour is appreciable. Always try to be decent with others. 
MODESTY: One should restrain him self from too high opinion of his merits-achievements. He should not boast of his achievements in front of his rivals and even in public. 
NON VIOLENCE (अहिंसा) :: Killing others-animals-birds-animals-humans is a sin. Indiscriminate killing is worst possible sin, leading to hells for millions of years and there after birth as insects, after release from the hells. 
अहिंसा परमो धर्म। मांसाहार से सदा बचना चाहिये। व्यर्थ की हिंसा से दूर ही रहना चाहिये। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई तुम पर हमला करे और तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहो। डट कर मुकाबला करो और आता ताई को समूल नष्ट करो। भगवान बुद्ध और गाँधी जी की अहिंसा की नीति सदैव प्रासांगिक नहीं होती।चाणक्य नीति का अनुसरण समयानुसार उचित है। शान्ति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो। ब्राह्मण का वध करने वाले को बृह्म हत्या लग जाती है और वो नरक गामी होता है।
ब्रह्महत्या :: पूर्व काल में वृत्रासुर और इन्द्र में 11,000  वर्ष तक युद्ध हुआ, जिसमें इन्द्र की हार हुई और वे भगवान शिव के शरणागत हुए। इन्द्र को वरदान प्राप्त हुआ और उन्होंने प्रभु कृपा से, वृत्रासुर का वध किया, जो ब्राह्मण पुत्र था। इस लिये उन्हें ब्रह्म हत्या लग गई। वे ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्महत्या ने इन्द्र के शरीर से हटने के लिये अन्य स्थान माँगा, तो उन्होंने उसे 4 भागों में बाँट दिया। 
पहला भाग अग्नि देव को मिला। जो कोई प्रज्वलित अग्नि में बीज, औषध, तिल, फल, मूल, समिधा और कुश  की आहुति नहीं डालेगा, ब्रह्महत्या अग्नि को छोड़ कर उसे लग जायेगी।
दूसरा भाग वृक्ष, औषध और तृण को मिला। जो कोई व्यक्ति मोह वश अकारण, इन्हें काटेगा या चीरेगा, ब्रह्म हत्या, इन्हें छोड़ कर उसे लग जायेगी।
तीसरा भाग अप्सराओं को मिला। जो कोई व्यक्ति रजस्वला स्त्री से मैथुन करेगा, यह तुरन्त उसे लग जायेगी।  
चौथा भाग जल ने गृहण किया। जो व्यक्ति अज्ञानवश जल में थूक, मल-मूत्र डालेगा, वही ब्रह्महत्या का निवास बन जायेगा। 
प्राचीन काल से ही कोई भी न्यायाधीश, इस भय से ब्राह्मण को प्राण दण्ड नहीं देता था। 
OMNIPOTENCE ::  One should be aware that the Almighty has infinite. He should surrender to him and seek asylum-shelter refuse under him, whether he is under distress or not.
ORDER :: One should learn to put every thing in proper order, sequence, systematically. It will always help him in life. All planets and the Sun follows a system.One should be systematic in performing all his duties, deeds, ventures. Proper place, timing, tuning will always help the doer. Let all pros & cons be determined before hand.
PATIENCE ::  Adversity, hard times are the result-outcome of destiny-previous births-past deeds. One can not nullify-over ride them. How ever prayers may help during distress. One should not be afraid of them. He should continue with his endeavours with caution and patience. It may take some more time to yield results as desired.
PEACE-SOLACE-TRANQUILITY-HARMONY :: Mental peace, peace in the country, absence of aggression by neighbours, lack of interference in others affairs are essential features of a civil society. One who is quite, speak only when essential, avoid un necessary gossip, back biting, complaining unnecessarily, interact in the society smoothly, maintains harmonious relations, is supposed to have peace. The person who has detached-relinquished under the patronage-asylum-refuse-shelter of God attains solace-tranquillity. Maintain calm, quite, patience, cool. Do not be disturbed by trifles, accidents common or unavoidable encounters-emergency. One has to maintain his calm & quite, reasonably. However, it should not be sedative.
PENANCES :: Knowing or unknowing one may have performed such deeds which are against religion. His cruelty, dishonesty, wickedness, vices will always obstruct his progress in one or the form. He should undertake penances, fasting, prayers-worship, meditation, donations-generosity-charity, social work, helping the poor in such cases. Helping the elders, parents will also help. Tapas-Tapsya-asceticism is extremely useful.
POPULARITY :: This is never permanent. Public opinion keep on changing. Popularity graph always keep fluctuating for public figures. As a matter of fact one should work of his own for social benefit-cause away from publicity.
PIETY :: One has to be devoted to the God and good work. His behaviour towards the parents should be refined-polished, caring. He should care his parents, Guru and the elders and never desert them.
PRAYERS :: Recitation-singing-listening of Bhajans-prayers, meditation, religious discourses conglomerations, will always help. Never disturb any one during the prayers and other spiritual activities. Prayers should be performed with full concentration-devotion, at a peaceful place, generally alone-in isolation. Mind-brain energies should be focused at the Almighty only. No thought-No ideas-No Plans at this moment. Mind will waver-fluctuate in all possible directions, drag the devotee to desires. Control it. Seek the blessings of elders-Guru-enlightened.
PROPRIETY :: One should always stick to correct behaviour and morals. He should adhere to the state of being reasonably fit in granting of requests. Weigh the pros and cons of own behavior.
PROTECTION :: Give shelter, protection, asylum to the one in need-less fortunate, within limits. never give shelter to one who may deceive-cheat you in future. Do not promise more than your capabilities.
PRUDENCE :: One should judge-weigh-analyse what he speaks. His tongue should be under control. It involves rational thinking, analyses, conclusion, action and speech. He should think of consequences and their result-impact before any action. Never support or reject any one blindly without going into details.
PURITY-SHOUCH (-INTERNAL & EXTERNAL PURITY) :: Austerity, penances, prevention, helping one in cessation-opening ways to cessation from suffering, reciprocating the benefit rendered are the means which draws one close to God.
RESOLUTION :: This is the quality of being resolute, fixity or boldness of determination. One should resolve to perform what he ought; perform without fail.
SANTOSH-SATISFACTION-CONTENTMENT आत्म संतुष्टि :: One can not attain, consume, earn, spend, utilize, enjoy beyond a certain limit. One day or the other saturation will come. Detachment-relinquishment comes thereafter. One must control his needs to minimum, just enough to survive. 
गौ धन, गज धन और रत्न धन खान; जब आवे संतोष धन सब धन दूर समान।  आत्म संतुष्टि मनुष्य को बन्धनों से मुक्ति प्रदान करती है और वह मोक्ष-भक्ति मार्ग का अनुगामी हो जाता है। 
SHAME-SHYNESS शर्म-हया-लज्जा :: Shyness-hesitation, towards elders spiritual superiors, disciplined People and the virtuous, as a mark of respect. Bashfulness-modesty is like an ornament. One who cares for his parents-teachers-elders-God avoid such acts in front of them, which are not good-which are considered bad or anger them; to be done in front of others like sex, nudity, easing, urinating, smoking, drinking or the taboo. This is a manner to show respect-regard for them. Naked bathing, exposure of body brings curse; sufficient to put a soul-person in great distress and hells. 
सामाजिक मर्यादा का पालन हर मनुष्य को करना चाहिये।लज्जा स्त्री का गहना है। 
SILENCE :: Silence is golden. It does not detach one from the living world. It brings peace, solitude, equanimity with it. It transcends  a person to the eternal. One goes beyond or outside the range of human experience-reason-belief-power of description. Silence can be used as a tool for eloquence-skillful use of language, to persuade or to appeal to the feelings, fluent speaking.  
Powerful-strong pulses of brain waves start pushing through the space and are received by the devotee-seeker bringing about a  complete change-metamorphosis in the thoughts pattern-ideas, granting him devotion-prudence-enlightenment. Piousness of thoughts enchant the ascetics all around-all over. Holy person generate-transmit, harmony-peace-solace-tranquility-calm-quietness to the recipients. A stage is reached, where body consciousness, along with thoughts, pertaining to others, pervading the mind, disappear automatically, leaving behind the  worshiper, enchanted with the Supreme. 
Speak only when essential. Too much talk is harmful-dangerous. Advise only when asked-requested for. Never shower-rush with suggestions to any one, who does not care-listen and is inattentive. Always avoid trifling conversation. Avoid the argumentative and the un necessarily confrontations. Ignore the one, who uses abusing language-foul words. Reject those who intend to contradict without reason-logic. Never reveal your ideas-inner self to any one without properly weighing the situation, opportunity and the person.
SILENCE मौन :: कम बोलना अच्छी आदत है। चुप रहना, व्यर्थ की बातचीत-बकबास-वाद विवाद से अच्छा है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और ध्यान केन्द्रित रहता है। एकांत-वन-गुफा  में रहना, घर-गृहस्थी में रहकर कम बोलने से-न बोलने से आसान है। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता है। विवाद में फँसने से अच्छा  है, बात को हँसकर टाल देना-तूल न देना-माँफी मांग लेना। जिन लोगों को हर वक्त बकर-बकर करने की आदत होती है, उनसे दूर ही रहना चाहिये । एक चुप सौ को हराता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि जरुरत के वक्त भी मौन रहो। आवश्यकता पड़ने पर अपनी बात पूरे जोर-शोर-दबाब से कहो।
SPEECH वाणी :: One must not speak, what hurt the sentiments-belief-faith of others. The language should be refined-polished-soft-affectionate. 
ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय औरन कू सीतल करे आपहुं सीतल होए। भाषा सभ्य और सुसंस्कृत हो। जुबान सीरी मुल्क गीरी। जहाँ तक सम्भव गुस्से का इज़हार मत करो। प्रेम से बोलो, मीठा बोलो। तोल के बोलो। खीरा सर से काटिये; मलिए नोन-नमक मिलाय, रहिमन कड़ुए मुखन को चहिये यही सजाए। सभ्य भाषा में सभ्यता के दायरे में बातचीत करो। किसी से अबे-तबे मत करो। खाली अपनी-अपनी ही मत हाँको; दूसरे को भी बोलने का मौंका दो। दूसरा जो कह रहा है, उसे ध्यान से सुनो और उसके बाद ही जबाब दो। जो कहना है स्पष्ट कहो; गोल-मोल-घुमाकर नहीं। सामान्य बातचीत से कूटनीति को दूर ही रखो। 
SPIRITUALITY अध्यात्म ::  Its a vehicle to assimilation in the Almighty. Spiritual insight-upliftment. 
SYMPATHY सहानुभूति  ::  One has to be share the feelings-emotions of others. he should take pity and show tenderness to the, pity, tenderness  to the cause of the poor, needy, downtrodden, deprived. He should share joy-pleasure-happiness over others' achievements.
TEMPERANCE संयम :: One should not consume food-eat or drink beyond limit-need. Fast undesirable foods makes one bulky, sluggish, impotent, unfit. Capacity to perform-work is adversely affected.
TOLERANCE सहनशीलता :: One should never over react to any thing, circumstance, provocation, in citation by others. Up to a certain limit its always helpful and appreciable. But if limit is crossed pay in the same coin.
TRADITIONS-PRACTICES-RITUALS-MORES परम्पराएँ :: Religious ceremonies-congregation-gatherings-assemblies-discourses-meetings-celebrations are always helpful. They connect one with the society. Its becomes easier to deal and identify others. It always help in finding like minded people. It leads to better coordination-affection-ties-bonds.
TRUTH-सत्य :: Speak the truth. God is Ultimate truth-reality. Its a means to attain Salvation. But always speak the truth which is not going to harm any one, un necessarily-without reason-logic. Truth always triumphs-prevails. Truth is truth. One who do not speak the truth reserves his seat in hells. A lie for the sake of humanity-welfare of mankind-to save an innocent person from ruin-disaster-torture-imprisonment-misery-cruelty is better than a plain truth.
एक ऐसा झूंठ जो किसी निर्दोष की रक्षा करता हो वह एक सत्य से उत्तम है।
सत्य: सत्य से मनुष्य  इस लोक पर विजय पाता है। यह परम पद है। सदा सत्य बोलो। सदा सत्य बोलना अच्छा है और यथा सम्भव सत्य ही बोलना चाहिये। किसी बेकसूर-निरीह को बचाने के लिये बोले गए असत्य से पाप नहीं लगता। और ना ही किसी आतताई का वध करने वाले के खिलाफ सत्य बोलना चहिये। अगर सत्य न बोलने से किसी बेकसूर को जान बच जाती है, तो ऐसा सत्य ना बोलना ही अच्छा है। 
सत्य वादी नाम के तपस्वी सरस्वती के तट पर तपस्या के रहे थे।एक व्यापारी लुटेरों से बचने के लिए उनके पास आया तो उन्होंने उसे कुटिआ के अन्दर छुपा दिया। लुटेरे उसे ढूंढते हुए वहाँ आये तो, अन्दर इशारा कर दिया।व्यापारी लूटा और मारा गया। भगवान श्री कृष्ण ने ऐसे सत्य को असत्य से भी हीन-बुरा माना।
सत्य की सदा से ही विजय होती चली आई है। मृत्यु सत्य है।परमात्मा-ब्रह्म ही अन्तिम सत्य है।सत्य ही परम मोक्ष, उत्तम शास्त्र, देवताओं में जाग्रत् तथा परम पद है। तप,यज्ञ, पुण्य कर्म, देवर्षि-पूजन, आद्य विधि और विद्या सत्य में प्रतिष्ठित हैं। सत्य ही यज्ञ, दान और सरस्वती है। सत्य ही व्रतचर्या और ॐ कार है। सत्य से वायु चलती है, सूर्य तपता है, आग जलती है और स्वर्ग टिका हुआ है। सत्यवादी देवताओं के पूजन तथा सम्पूर्ण तीर्थों में स्नान का फल प्राप्त  कर लेता है। सम्पूर्ण यज्ञों की अपेक्षा सत्य का पलड़ा ही भारी है। देवता, पितर और ऋषि सत्य में ही विश्वास रखते हैं।सत्य ही परम धर्म और परम पद है। यह ब्रह्म स्वरूप है। जो मनुष्य अपने, पराये अथवा पुत्र के लिये भी असत्य भाषण नहीं करते, वे स्वर्गगामी होते हैं। ब्राह्मणों में वेद, यज्ञ तथा मंत्र निवास करते हैं। किन्तु जो ब्राह्मण सत्य का परित्याग कर देता है उसमें ये शोभा नहीं देते-उसका त्याग कर देना चाहिये। अतः मनुष्य को सदैव सत्य भाषण ही करना चाहिये।  [पद्मपुराण ] 
ULTIMATE PLEASURE-PERMANAND-BLISS परमानन्द :: This is the state which one will attain, once he attain equanimity, seek shelter-asylum-protection-refuse under the Almighty, is detached-released and relinquished, is devoted to the Almighty-the inner self through speech-voice-talks-expressions and the deeds, attains liberation-assimilation in the Almighty-Salvation & the Ultimate abode; the joy-enjoyment-pleasure achieved is unlimited-infinite-undefined and is called Bliss-PARMANAND-the Ultimate pleasure. 
ULTIMATE SERVICE PARMARTH परमार्थ :: Parmarth-the ultimate earning, is that which restricts one from repeated births leading to placement in the Ultimate abodes, where there is nothing except bliss, association of God. Its not difficult to achieve this. One has to serve the genuine needy in distress without discretion. 
Dedication for social cause-service, helping the deserving, needy. One keeps him self busy to fulfill his never ending trail of desires-motives-wills-ambitions, till the end comes. He forgets the reason behind his birth-incarnation as a human being. He even forget the Almighty, till he is compelled by distress, worries, sorrow, diseases, pain, unfulfilled desires, tensions failure etc. Had he been remembering the God, he could swim across the difficulties swiftly without distress difficulty. He is busy in cheating, looting, snatching, earning more and profit-abnormal-super normal profits, competitions. This is the process which does not let him remember the Ultimate. 
One who earns through pious-righteous-virtuous-honest means and spends the money for the welfare of his family & others, is bound to assimilation in the Ultimate-the Almighty.
मनुष्य-प्राणी मात्र पैदा होने से प्राणान्त तक अपने हित चिन्तन में लगा रहता है। इस प्रक्रिया में वह भगवान् तक को भूल जाता है और उसे तब ही याद करता है, जब उसे कष्ट-दुःख, परेशानी, व्याधि-बीमारी-रोग नहीं हो जाते। दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोए; जो सुख में सुमिरन,  तो दुःख काए को होए। सुबह से शाम तक आपा-धापी, छीना-झपटी, लूट-खसोट-बटमारी में गुजर जाते हैं, परमात्मा की याद तक नहीं आती; तो परमार्थ का मतलब ही क्या है। 
परमार्थ का मतलब है दूसरों-जरूरतमन्दों-गरीब-दुःखी-वृद्ध जन, बड़े-बूढ़ों, माता-पिता की सेवा, दीन-हीन की मदद, दान-पुण्य, धर्म-कर्म आदि-आदि है। परमार्थ का एक गहरा तात्पर्य है परम+अर्थ अर्थात परम: अन्तिम सत्य-परमात्मा व अर्थ: धन-दौलत-रुपया-पैसा। 
जो व्यक्ति सत्य का सहारा लेकर ईमान की कमाई से पूजा-पाठ, धर्म-कर्म करता है, वो अन्ततोगत्वा परमात्मा को पा ही लेता है।
VOW-PROMISE प्रतिज्ञा (वचन-प्रण-कसम-वादा) :: One has to abide by his words-commitment. keep your words. One should always avoid  a vow, since it may not be possible to stick-fulfill it, in the interest of all-public. Even if you have had a vow forgive it, if it helps others, without harming you. Its not a sin. Just to maintain the vow, one may commit one crime after another against the humanity. One takes vows in a fit of rage-anger-frenzy-excitement-enthusiasm. Always remembers the God at such a junction, he will direct you.      
Vows broken for the sack of the community-social welfare-humanity-mankind are virtuous-pious-righteous, not sin.
Commitments made by King Dashrath, the father of Raja Ram, to Kaekai led to the exile of Bhagwan Ram an incarnation of Lord Vishnu (incarnation of the Almighty himself), under a pre planned strategy to eliminate demons-giants-Rakshash-Rawan from the earth.
Vows made by Devwrt (-Bhishm Pitamah), to solemnize the marriage of his father King Shantnu (-a lesser incarnation of God) with Saty Wati resulted in the Maha Bharat.
Vow taken by the Almighty Shri Krishan, (-complete incarnation), not to raise weapons against any one, by broken deliberately, to maintain the honor of his Devotee-Bhishm Pitamah.
One should do everything possible to support the humanity, including rejections  of vows.
Vow by Kautily (-Vishnu Gupt, Chanky) resulted in the elimination of Nand dynasty and beginning of Maury Vansh.
प्रतिज्ञा करने से हमेशा बचना चाहिये। कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि प्रतिज्ञा समाज के हित में नहीं होती, बल्कि यह व्यक्ति को स्वयं नुकसान पहुंचाती है। प्रतिज्ञा का पालन नहीं करना कोई ऐसा पाप नहीं है जिसका प्रायश्चित नहीं हो सकता। प्रतिज्ञा अक्सर जोश-गुस्से-आवेश-क्रोध  में आकर की जाती है। उसको पूरा करने हेतु मनुष्य एक के बाद दूसरा पाप करता चला जाता है। ऐसा अवसर आए तो परमात्मा को अवश्य याद करना, वही सही राह दिखायेगा।  
पवित्र सामाजिक कार्यों हेतु कसम के तोड़ने से पाप नहीं लगता।
राजा दशरथ द्वारा कैकयी को दिये वचन निभाने के लिये ही, भगवान राम को वनवास भोगना पड़ा। यह सब एक पूर्वनियोजित योजना के तहत, संभव हुआ। राक्षसों, दानवों, दैत्यों को मारने के लिये ही यह रामावतार हुआ। 
भीष्म पितामह-देवव्रत, ने अपने पिता राजा शान्तनु का विवाह सत्यवती से कराने के लिए, जो वचन दिया-प्रतिज्ञा की, उसे पूरा करने के कारण ही वो महा भारत का युद्ध नहीं रोक पाए।  
परन्तु, भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्त-भीष्म पितामह  की इज्जत रखने हेतु, अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी रथ का पहिया लेकर ही उन पर वार करने को प्रस्तुत हुए।भीष्म ने भी उनके भाव को समझकर अपना हाथ रोक लिया। 
मनुष्य को मानवता की रक्षा हेतु अपनी कसम-वचन-मर्यादा-वादा तोडना पड़े, तो कोई पाप नहीं लगता-लगे तो भी प्रायश्चित हो जायेगा। 
कौटिल्य (-विष्णु गुप्त, चाणक्य) की प्रतिज्ञा के कारण  ही नन्द वंश का नाश हुआ व मौर्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ। 
(1). Nyayoparjit Dhan न्यायोपार्जित धन :: Earning through honest, legal, pious, righteous and morally right means. There should be no cheating, forgery or deceptive means adopted for this.
(2). Uchit Vivah उचित विवाह ::  One should marry a girl (or a boy) of his own or her own cultural, caste, country, region, species and religious back-ground. Never marry within the family.
(3). Shishtachar शिष्टाचार :: Giving respect to the cultured and noble people. One has to to be polite, graceful with others.
(4). Shatruta Tyag शत्रुता त्याग :: Rejection of enmity, anonymity, envious nature, hatred or spite against any one. Eliminate the torturer, invader, attacker, rapist.
(5). Indriy Vijay इन्द्रिय विजय-संयम :: Exercising control over one's sense organs, sensuality, sexuality, lust, imprudence, vulgarity, wicked desires.
(6). Anisht Sthan Tyag अनिष्ट स्थान त्याग :: Rejection-evacuation of a place where the mental peace-health is at stake. 
(7). Uchit Grah उचित गृह :: Limiting one's desires relating to home, caution pertaining to norms of culture, society and religion.
(8). Pap Bhay-fear पाप भय :: Rejection of  sins and acceptance of virtues-goodness-morality.
(9). Deshachar Palan देशाचार पालन  :: Conforming to the proper codes and conduct-customs-mores-rituals of the society, region and the nation.
(10). Lok Priyta लोक प्रियता :: Popularity-winning a place in the heart of everyone and captivating everyone's mind.
(11). Uchit Vyay उचित व्यय :: Curtailing undue expenditure, saving for the lean season, future events, unforeseen circumstances, education of children, health care, necessities.
(12). Uchit Vyavahar उचित व्यवहार :: Decent-graceful-proper behavior according to the time and situation.
(13). Mata Pita Pujan माता पिता पूजन ::  Caring, respecting, honouring, parents-elders.
(14). Satsang सत्संग :: Familiarity-company of the cultured-noble-virtuous.
(15). Akrtaghnata अकृतघ्नता 
Rejection of enmity-animosity-grudge-ill will for benefactors. Gratefulness. 
(16). Ajirn Bhojan अजीर्ण भोजन त्याग :: Rejection of indigestible food, meat, over eating, fast food, feasting. Regular fasting. 
(17). Uchit ahar उचित आहार :: Balanced diet, to sustain. जीने के लिए खाना। Avoidance of over feeding.
(18). Gyani Puja ज्ञानी पूजन :: Devotion-honouring-worshipping, scholars-enlightened-renounced.
(19). Nindit Kary निन्दित कार्य त्याग :: Renouncing-rejection of all evil-wickedness-immorality actions that are objectionable in the eyes of society and religion.
(20). Bharan Poshan भरण पोषण :: Nourishment-nurture, inculcation of values-virtues, support and maintain the members of one's family and those who seek one's aid and refuge.
(21). Dirgh-Darshati दीर्घ दृष्टि :: Far farsightedness, cause and effect relationship, consequences of one's action.
(22). Dharm-shrawan धर्म श्रवण :: Hearing-listening to epics, scriptures, stories pertaining to the Almighty to  will purify will, intentions, desires, intentions, deeds.
(23). Daya दया  :: Kindness-pity-tenderness to creatures in distress. To excuse, pardon.
(24). Buddhi बुद्धि बल :: Observing Yam-Niyam-eight rules; that make the intellect well developed and sharp and subtle.(memory, prudence, presence of mind)
(25). Gun-Paksh Pat गुण पक्षपात :: Respect-favouring virtues and efforts to get render them free from faults-defects.
(26). Duragrah Tyag दुराग्रह त्याग :: Rejection of undue demands-insistence; compelling one to do nasty things. What one do like for himself, should not be pressed for others
(27). Gyanarjan ज्ञानार्जन First stage :: Brahmchary-celibacy, attainment of education-learning-knowledge. Acquisition of knowledge, understanding, applicability, skills, ability, interest, aptitude, appreciation.
(28). Sewa Bhakti सेवा, भक्ति :: Rendering service to man kind, great men-benefactors, elders, parents, Guru and the needy.
(29). Tri Varg Sadhana त्रि वर्ग साधना :: Efforts to achieve-realize-attain the objectives of Dharm-performance of duties-Varnashram Dharm (Righteousness), Arth (-earning, Money), Kam (-reproduction for the continuance of the race).
(30). Desh Kal Gyan देश, काल ज्ञान :: Knowledge, understanding of place, time and the perception.
(31). Bala bal Vichar  बला-बल विचार :: Assessing one's ability before plunging into any action.
(32). Lok Yatra लोक यात्रा :: Travel undertaken for the benefit-upliftment of  the society. 
(33). Paropkar Parivanta परोपकार परिवन्ता  :: Benevolence towards the helpless, poor, needy and the destitute. Social welfare, helping others-downtrodden-poor-needy.
(34). Lajja Shyness लज्जा :: To be shameful. Shyness-hesitation, towards elders spiritual superiors, disciplined People and the virtuous, as a mark of respect.
(35). Soumyta  सौम्यता :: Cheerfulness, softness, politeness-tenderness and sweet-temperament.

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