SERVING THE GURU गुरु सेवा

SERVING THE GURU  गुरु सेवा 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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Mother is the first teacher-Guru, father is the second Guru and the third Guru is the teacher who educated the human beings for becoming a descent-honest-pious citizen in future.The occasion when one can pay respect to his teachers, falls on Guru Purnima. Special significance is attached to this full Moon night since Bhagwan Ved Vyas was born on this auspicious day. He is one who dictated Maha Bharat to Ganesh Ji. This is known as Vyas Purnima as well, after his name. Kaurav dynasty prolonged due to his conceiving-inseminating, the wives of Chitr Viry and Vichitr Viry, King Shantunu's sons when his mother Saty Wati invited him to do so.
माता-जननी, पहला गुरु, पिता दूसरा गुरु तथा तीसरा गुरु वह व्यक्ति है एक अनघड़ बालक को समाज के योग्य बनता है।आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वेद व्यासजी का जन्म हुआ था। इन्होंने महाभारत आदि कई महान ग्रंथों की रचना की। इस दिन गुरु की पूजा कर सम्मान करने की परंपरा प्रचलित है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार करता है इसलिए यह कहा गया है। 
ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।गुरु पूर्णिमा अर्थात सद्गुरु के पूजन का पर्व। गुरु की पूजा, गुरु का आदर किसी व्यक्ति की पूजा नहीं है अपितु गुरु के देह के अंदर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा है उसका आदर है, ज्ञान का आदर है, ज्ञान का पूजन है, ब्रह्मज्ञान का पूजन है।
I pay respect-reverence [valuing, respect, prising, cherishing, treasuring, admiration, regard, esteem, high opinion, acknowledgement, recognition, realisation]
to the Guru, since he guided to me become a respectable citizen-a human being. guru Purnima is the day when I can remember him and pay my tributes and felicitate him. Honouring the teacher is honouring the Almighty present in our hearts. Bhagwan Shiv is considered to be the one who is aware of the Almighty-The Par Brahm Parmeshwar and is considered to be the ultimate Guru. Honouring a teachers means we honor learning-enlightenment knowledge.
Special significance is attributed-attributed to the status of teacher since he is one who creates-generated to good qualities-virtues-morals-righteousness-piousness-honesty in his disciple. Its he who inculcates the qualities-abilities to make the student learn how to interact-mingle in the society and earn his livelihood through intelligence-prudence-learning-skills-ability. He is the one who help the learner in over powering the wickedness-evils-demonic tendencies-wretchedness in him self.
गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरु: साक्षात्परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:॥ 
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। 
Its the teacher who grants second birth-life to the child. he takes the follower from darkness to aura-light-brightness.
हिंदू धर्म में सदैव गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है क्योंकि गुरु ही अपने शिष्यों को नवजीवन प्रदान करता है उन्हें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है।
The break up of Guru is Gu-darkness and ru light-enlightenment. Thus the Guru is the one who directs the learner from unawareness to awareness. he is the one ensures success for his disciple.
गुरु शब्द में ही गुरु का महिमा का वर्णन है। गु का अर्थ है अंधकार और रु का अर्थ है प्रकाश। इसलिए गुरु का अर्थ है: अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला अर्थात जीवन में सफलता हेतु  विद्यार्थी का उचित मार्गदर्शन करने वाला। 
One who obtains the blessing of his teachers-elders-pundits-scholars-philosopher gets success in life.
इस दिन जो व्यक्ति गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है। महर्षि वेदव्यास ने भविष्योत्तर पुराण में गुरु पूर्णिमा के बारे में लिखा है ::
मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय: प्रयत्नत:। आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा॥ 
पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:। फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै:॥ 
दक्षिणाभि: सुपुष्टाभिर्मत्स्वरूप प्रपूजयेत। एवं कृते त्वया विप्र मत्स्वरूपस्य दर्शनम्॥ 
One should offer cloths, ornaments, fruits-sweets, gifts-money etc. on the occasion of Guru Poornima to be liberated.
आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्म दिवस है। इसे गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन पूरी श्रृद्धा के साथ गुरु को सुंदर वस्त्र, आभूषण, गाय, फल, पुष्प, रत्न, स्वर्ण मुद्रा आदि समर्पित कर उनका पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं।
Those who suffer due to the retro-gate Jupiter must serve their elders-Guru-Pundits with dedication and seek their blessings. he should offer cloths with yellowish tinge-shade-colour to the needy-poor-elders-parents-grand parents and the virtuous. He should be attentive to the sages-ascetics-hermits-recluse and offer the basic amenities-essentials goods to survive if they need them without being asked and without disclosing the help-nature of help offered to them.
इस दिन सभी लोग अपने-अपने गुरु की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि गुरु की कृपा के बिना कहीं भी सफलता नहीं मिलती।जिन लोगों की कुंडली में गुरु प्रतिकूल स्थान पर होता है, उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते है। वे लोग यदि गुरु पूर्णिमा के दिन नीचे लिखे उपाय करें तो उन्हें इससे काफी लाभ होता है। यह उपाय इस प्रकार हैं- (1). भोजन में केसर का प्रयोग करें और स्नान के बाद नाभि तथा मस्तक पर केसर का तिलक लगाएं। (2). साधु, ब्राह्मण एवं पीपल के वृक्ष की पूजा करें। (3). गुरु पूर्णिमा के दिन स्नान के जल में नागरमोथा नामक वनस्पति डालकर स्नान करें। (4). पीले रंग के फूलों के पौधे अपने घर में लगाएं और पीला रंग उपहार में दें। (5). केले के दो पौधे विष्णु भगवान के मंदिर में लगाएं। (6). गुरु पूर्णिमा के दिन साबूत मूंग मंदिर में दान करें और 12 वर्ष से छोटी कन्याओं के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लें। (7). शुभ मुहूर्त में चांदी का बर्तन अपने घर की भूमि में दबाएं और साधु संतों का अपमान नहीं करें। (8). जिस पलंग पर आप सोते हैं, उसके चारों कोनों में सोने की कील अथवा सोने का तार लगाएं।
**गुरु बनने से पहले गुरु के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आये होंगे, अनेक अनुकूलताएं-प्रतिकूलताएं आयी होंगी, उनको सहते हुए भी वे साधना में रत रहे, ‘स्व’ में स्थित रहे, समता में स्थित रहे।
TRIBUTES TO THE GURU-TEACHER गुरु वन्दना ::
ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं; द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं; भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि॥
brahmanandam paramasukhadaṃ kevalaṃ gyanmurtim; 
dvandvateetam gagansadrasham  tattvmasyadilkṣhyam.
ekam nityam vimlamchalam sarvdheesakshibhutam;
bhavateetam trigunrahitam sadgurum tam namami.
मैं उस सद्गुरु के समक्ष दण्डवत प्रणाम करता हूँ जो ज्ञानमूर्ति परब्रह्म परमेश्वर के सदृशय परमानन्द प्रदान करने वाले हैं, परमात्मतत्व के ज्ञाता हैं, जो द्वन्द-परेशानी-दुःख से मुक्ति प्रदायक हैं, जो आकाश के समान विस्तृत-विशाल हैं, जो सत्य की मूर्ति हैं, जो कि स्वयं अपने आप में परिपूर्ण (-मुकम्मल, निष्कलंक, बेदाग़, उत्तम), दृढ़ (- स्थिर, निरंतर, अचल, अडिग) सभी भावनाओं व त्रिगुणों से भी ऊपर हैं। 
One bow-offer his obeisances-tributes to the Guru-teacher who is like the Par Brahm Parmeshwar-the Almighty, Parmanand-bliss-Ultimate pleasure-joy, the only the source of true-tangible form  manifestation-personification of knowledge-enlightenment, beyond the dilemma-tussle of joy-sorrow, life-death, like the sky which is fatherly protecting & vast, indicator-shower of great truths,  indicates-explains-shows which are perennial, always unblemished (-complete, entire, whole, accomplished, impeccable, thoroughbred, taint less, stainless, flawless, unshaded, unspotted, soil less, unshadowed, spotless, unblamable, unshaded), steadfast (-good, perfect, masterly, surpassing, complete, finished, total, overall, thorough, firm, strong,  tenacious, resolute, determined, stable, static, stationary, constant, stagnant, continuous, sustained, continued, continual, unremitting, immovable, invariable, irreplaceable, unshakeable, still, wiry, sure, unbending), witness -observer of everyone's cosmic intelligence, beyond existence or emotions, beyond the three GUN-characteristics i.e.,  Satv (-pure, pious, virtuous, honest, truth, Rajas (action) & Tamas (-inertia, lazy, lethargic). 

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