AYURVED (6-9) आयुर्वेद

 
 AYURVED (6-9) आयुर्वेद  
A TREATISE  ON ANCIENT SYSTEM OF MEDICINE
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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AYURVED (6) आयुर्वेद :: वात, कफ व पित्त ::
आयुर्वेद के मूल सिद्धान्त :: आयुर्वेद, के विद्वान मनीषियों नें चिकित्सा-विधि को ज्ञान एवं तर्क युक्त बनानें के लिये बहुत से मूल सिद्धान्तों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते हुये संरचनायें की हैं। ये इस प्रकार रचित की गयीं हैं :–
त्रिदोष :: मुख्यतः यह तीन होते हैं जिन्हें वात, पित्त और कफ कहते हैं (ये एकल दोष कहे जाते हैं)। जब वात और पित्त अथवा पित्त और कफ अथवा वात और कफ ये दो दोष मिल जाते हैं, तब इस मिश्रण को द्विदोषज कहते हैं। जब वात, पित्त और कफ ये तीनों दोष एक साथ मिल जाते हैं, तब इस मिश्रण को त्रिदोषज या सन्निपातज कहते हैं।
त्रिदोष के पांच भेद तथा हरेक दोष के पांच भेद आयुर्वेद के मनीषियों नें निर्धारित किये हैं :: 
वात दोष के पांच भेद :: (1). समान वात, (2).  व्यान वात, (3). उदान वात, (4). प्राण वात और (5). अपान वात हैं।
वात दोष को  वायु दोष भी कहते हैं।
पित्त दोष के पांच भेद होते हैं :: (1). पाचक पित्त, (2). रंजक पित्त, (3). भ्राजक पित्त, (4). लोचक पित्त और (5). साधक पित्त। 
इसी प्रकार कफ दोष के पांच भेद होते हैं :: (1). श्लेष्मन कफ, (2). स्नेहन कफ, (3). रसन कफ, (4). अवलम्बन कफ
और (5). क्लेदन कफ। 
सप्त धातु :: (1). रस धातु, (2). रक्त धातु, (3). माँस धातु, (4). मेद धातु, (5). अस्थि धातु, (6). मज्जा धातु और (7). शुक्र धातु। 
सप्त धातु, वातादि दोषों से कुपित होंतीं हैं .जिस दोष की कमी या अधिकता होती है, सप्त धातुयें तदनुसार रोग अथवा शारीरिक विकृति उत्पन्न करती हैं। 
मल तीन प्रकार के होतें हैं ::  (1). पुरीष, (2). मूत्र और (3). स्वेद। 
अष्टाङ्ग आयुर्वेद :: (1). शल्य, (2). शालाक्य , (3). काय चिकित्सा, (4). भूत विद्या, (5). कौमार भृत्य, (6). अगद तन्त्र, (7). रसायन और (8). बाजीकरण। 
आयुर्वेद में तीन प्रकार के दोषों से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। ये तीन दोष वात, कफ व पित्त है। मनुष्य के शरीर की समस्त आन्तरिक गतिविधियाँ, वात द्वारा ही संचालित होती है।शरीर में सारी बीमारियाँ वात-पित्त और कफ के बिगड़ने से ही होती हैं। सिर से लेकर छाती के बीच तक जितने रोग होते हैं, वो सब कफ बिगड़ने के कारण होते हैं। छाती के बीच से लेकर पेट और कमर के अंत तक, जितने रोग होते हैं, वो पित्त बिगड़ने के कारण होते हैं और कमर से लेकर घुटने और पैरों के अंत तक जितने रोग होते हैं, वो सब वात के बिगड़ने के कारण होते हैं। पेट में गैस बनने के कारण सिर दर्द होता है तो इसे कफ का रोग नहीं कहेंगे, अपितु पित्त का रोग कहेंगे; क्योंकि  पित्त बिगड़ने से गैस हो रही है और सिर दर्द हो रहा है। 14 वर्ष की आयु तक कफ के रोग ज्यादा होते हैं। बार बार खांसी, सर्दी, छींके आना आदि। 14 वर्ष से 60 साल तक पित्त के रोग सबसे ज्यादा होते हैं। बार बार पेट दर्द करना, गैस बनना, खट्टी खट्टी डकारे आना आदि। उसके बाद बुढ़ापे में वात के रोग सबसे ज्यादा होते हैं जैसे घुटने दुखना, जोड़ों का दर्द इत्यादि-इत्यादि। हाथ की कलाई में वात-पित्त और कफ की तीन नाड़ियाँ होती हैं, जिनका प्रयोग रोग निदान हेतु किया जाता है, जिसके लिए बहुत अभ्यास की आवश्यकता है। 
पित्त पंगु कफः पंगु पंगवो मल धातवः। वायुना यत्र नीयते तत्र गच्छन्ति मेघवत्॥ 
पित्त, कफ और मल व धातु सभी निष्क्रिय हैं। स्वयं ये गति नहीं कर सकते। शरीर में विद्यमान वायु ही इन्हें खून में घुलकर इधर से उधर ले जा सकती है।कफ और पित्त लगभग एक जैसे होते हैं। नाक से निकलने वाली बलगम को कफ कहते हैं। कफ थोड़ा गाढ़ा और चिपचिपा होता है मुँह  में से निकलने वाली बलगम को पित्त कहते हैं। ये कम चिपचिपा और द्रव्य जैसा होता है। शरीर से निकले वाली वायु को वात कहते हैं।
वाग्बट्ट की रचना अष्टांग हृदयं में 7000 सूत्र हैं। उनके अनुसार वात, पित्त और कफ संतुलित रखना सर्वोत्तम कला और  कौशल्य है। उसमें सबसे महत्व पूर्ण और पहला सूत्र है :- भोजनान्ते विषं वारी। अर्थात खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर पीने के बराबर है।
आयुर्वेद के अनुसार आग जलेगी तो खाना पचेगा, खाना पचेगा तो उसका रस बनेगा, जो रस बनेगा तो उसी रस से मांस, मज्जा, रक्त, वीर्य, हड्डिया, मल-मूत्र और अस्थि बनेगा और सबसे अंत मे मेद बनेगा। ये तभी होगा जब खाना पचेगा। अगर खाना खाने के तुरंत बाद पानी पी लिया, तो जठराग्नि नहीं जलेगी, खाना नहीं पचेगा और वही खाना फिर सड़ेगाऔर सड़ने के बाद उससे जहर बनेंगे। 
पित्त :: अक्सर सुबह के समय, खाना न पचने पर उल्टी करते समय जो हरे व पीले रंग का तरल पदार्थ मुँह के रास्ते बाहर आता है उसे ही पित्त कहते हैं। यह स्वाद में खट्टा, कड़वा व कसैला होता है। इसका रंग नीला, हरा व पीला हो सकता है। यह शरीर में तरल पदार्थ के रूप में पाया जाता है। यह वज़न में वात की अपेक्षा भारी तथा कफ की तुलना में हल्का होता है। पित्त यूं तो सम्पूर्ण शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में रहता है, लेकिन इसका मुख्य स्थान हृदय से नाभि तक है। समय की दृष्टि से वर्ष के दौरान यह मई से सितम्बर तक तथा दिन में दोपहर के समय तथा भोजन पचने के दौरान पित्त अधिक मात्रा में बनता है। युवावस्था में शरीर में पित्त का निर्माण अधिक होता है।पित्त से लगभग 40 रोग-बीमारियाँ होती है। जैसे-शरीर में जलन, खट्टी डकार, दुर्गन्धयुक्त अधिक पसीना आना, लाल चकत्ते निकलना, पीलिया,  मुँह का तीखापन, गल्पाक, गुदा में जलन, आँखों में जलन, मुंख की दुर्गन्ध, मुंह के छाले आदि।
लक्षण-प्रकृति :: पित्त प्रधान व्यक्ति के मुँह का स्वाद कड़वा, जीभ व आंखों का रंग लाल, शरीर गर्म, ऐसे व्यक्ति को क्रोध अधिक आता है।युवावस्था में बाल सफेद होना, नेत्र लाल या पीेले होना, बार-बार पेशाब जाना, पेशाब का रंग लाल या पीला होना, गर्म पेशाब आना, पेशाब में जलन होना,  दस्त लगना, नाखून पीले होना, देह पीली होना, नाक से रक्त बहना, अधिक भूख लगना, ठण्डी चीजें अच्छी लगना, अधिक पसीना आना, शरीर में फोड़े होना, बेचैनी होना, गुस्सा आना, भूख-प्यास ज्यादा लगना, पीली त्वचा,  गर्मी सहन ना होना, धूप-आग बुरी लगती है।
कार्य :: सन्तुलित पित्त जहाँ शरीर को बल व बुद्धि देता है, वहीं असंतुलित पित्त बहुत घातक सिद्ध होता है। 
इसके प्रमुख कार्य हैं :: भोजन को पचाना, नेत्र ज्योति सही रखना, त्वचा को निर्मल और कान्तियुक्त बनाना, स्मृति तथा बुद्धि प्रदान करना, भूख प्यास की अनुभूति कराना, मल को बाहर कर शरीर को निर्मल करना।
इलाज :: देशी गाय का घी, त्रिफला।
निदान ::  नाड़ी की गति कूदती (-मेंढक या कौवे की चाल वाली), उत्तेजित व भारी होती है।
पित्त के प्रकार ::  शरीर को गर्मी देने वाला तत्व ही पित्त कहलाता है। पित्त शरीर का पोषण करता है। यह शरीर को बल देने वाला है। लारग्रंथि, अमाशय, अग्नाशय, लीवर व छोटी आँत से निकलने वाला रस भोजन को पचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब तक यह शरीर गर्म है  तभी तक मनुष्य जीवित है। जब शरीर की गर्मी समाप्त हो जाती है अर्थात् शरीर ठण्डा हो जाता है, तो उस मनुष्य को मृत घोषित कर दिया जाता है। 
शरीर में पित्त का निर्माण अग्नि तथा जल तत्व से हुआ है। जल इस अग्नि के साथ मिलकर इसकी तीव्रता को शरीर की जरूरत के अनुसार सन्तुलित करता है। पित्त शारीरिक अग्नि का दूसरा नाम है। 
अग्नि के दो गुण विशेष होते हैं :: (1). वस्तु को जला कर नष्ट कर देना,  (2). ऊर्जा प्रदान करना। प्रभु ने मानव शरीर में इसे जल में धारण करवाया है जिस का अर्थ है कि पित्त की अतिरिक्त गर्मी को जल नियन्त्रित करके उसे शरीर ऊर्जा के रूप में प्रयोग में लाता है। 
असंतुलित पित्त के कारण :: (1). कड़वा, खट्टा, गर्म व जलन पैदा करने वाले भोजन का सेवन करना। (2). तीक्ष्ण द्रव्यों का सेवन करना। (3). तला हुआ व अधिक मिर्च, मसालेदार भोजन करना। (4). अधिक परिश्रम करना। (5). नशीले पदार्थों का सेवन करना।  (6). ज्यादा देर तक तेज धूप में रहना। (7). अधिक नमक का सेवन करना।
पित्त को शरीर में क्षेत्र व कार्य के आधार पर विभाजन :-
(1). पाचक पित्त :: यह पंच अग्नियों (-पाचक ग्रन्थियों) से निकलने वाले रसों का सम्मिश्रित रूप है। इसमें अग्नि तत्व की प्रधानता पायी जाती है। ये पाँच रस इस प्रकार हैः-
(1-i). लार ग्रन्थियों से बनने वाला लार रस। (1-ii). आमाशय में बनने वाला आमाशीय रस। (1-iii). अग्नाशय का स्त्राव। (1-iv).  पित्ताशय से बनने वाला पित्त रस।   (1-v). आन्त्र रस।
पाचक पित्त पक्कवाशय और आमाशय के बीच रहता है। इसका मुख्य कार्य भोजन में मिलकर उसका शोषण करना है। यह भोजन को पचा कर पाचक रस व मल को अलग-अलग करता है। यह पक्कवाशय में रहते हुए दूसरे पाचक रसों को शक्ति देता है। शरीर को गर्म रखना भी इसका मुख्य कार्य है। जब पाचक पित्त शरीर में कुपित होता है तो शरीर में निम्न लिखित विकार-रोग हो सकते हैं :-
जठराग्नि का मन्द होना, दस्त लगना, खूनी पेचिश, कब्ज बनना, मधुमेह, मोटापा, अम्लपित्त, अल्सर, शरीर में कैलस्ट्रोल का अधिक बनना, हृदय रोग। यदि शरीर में पाचक पित्त सम अवस्था मे बनता है तो पाचन शक्ति सुदृढ़ है। जब शरीर में पाचन और उत्सर्जन क्रियाएँ सन्तुलित होती हैं तो मनुष्य उपरोक्त रोगों से बच सकता है। 
पित्त को सन्तुलित करने के लिए सहायक क्रियाएँ ::
शुद्धि क्रियाएँ :- कुंजल, शंख प्रक्षालन ( यह हृदय रोगियों के लिए निषेध है)।  
आसन :: त्रिकोणासन, जानुशिरासन, कोणासन, सर्पासन, पादोतानासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, शवासन।
प्राणायाम :: अग्निसार, शीतली, चन्द्रभेदी, उड्डियान बन्ध व बाह्य कुम्भक का अभ्यास।
भोजन :: सुपाच्य भोजन, सलाद, हरी सब्जियाँ तथा ताजे फलों का सेवन भी पाचक पित्त को सम अवस्था में रखने में सहायक है।
(2). रंजक पित्त :: यह पित्त लीवर में बनता है और पित्ताशय में रहता है। शरीर में भोजन के पचने पर जो रस बनता है, रंजक पित्त उसे शुद्ध करके उससे खून बनाने का कार्य करता है। अस्थियों की मज्जा से जो रक्त कण बनते हैं, उन्हें यह पित्त लाल रंग में रंगने का कार्य करता है। उसके बाद इसे रक्त भ्रमण प्रणाली के माध्यम से पूरे शरीर में पहुँचा दिया जाता है। यदि इस पित्त का सन्तुलन बिगड़ जाता है, तो शरीर में लीवर से सम्बन्धित रोग आते हैं जैसे कि :- पीलिया, अल्परक्तता तथा शरीर में कमजोरी आना अर्थात् शरीर की कार्य क्षमता कम हो जाना इत्यादि।यह निम्न लिखित क्रियाओं के अभ्यास से नियन्त्रित होता है।
शुद्धि क्रियाएं :: अनिमा, कुन्जल। 
आसन :: त्रिकोणासन, पश्चिमोत्तानासन, कोणासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, मन्डूकासन, पवन मुक्तासन, आकर्ण धनुरासन। प्राणायाम :- कपाल भाति, अनुलोम-विलोम, बाह्य कुम्भक, अग्निसार तथा उडिडयान बन्ध का अभ्यास। 
(3). साधक पित्त :: यह पित्त हृदय में रहता है। बुद्धि को तेज करता है और प्रतिभा के विकास में सहायक है।उत्साह एवं आनन्द की अनुभूति करवाता है। आध्यात्मिक शक्ति देता है। सात्विक वृत्ति का निर्माण करता है। ईष्र्या, द्वेष व स्वार्थ की भावना को समाप्त करता है। साधक पित्त के कुपित होने पर स्नायु तन्त्र तथा मानसिक रोग होने लगते हैं यथा :- नीरसता, माईग्रेन, मूर्छा, अधरंग, अनिद्रा, उच्च व निम्न रक्तचाप, हृदय रोग व अवसाद। 
निम्न लिखित क्रियाओं के अभ्यास से यह सन्तुलित रहता है :-
शुद्धि क्रियाएं :: सूत्र नेति, जल नेति, कुंजल आदि।
आसन :: सूर्य नमस्कार पहली व बारवीं स्थिति, शशांक आसन, शवासन, योग निद्रा।
प्राणायाम :: अनुलोम-विलोम, भ्रामरी व नाड़ी शोधन, उज्जायी प्राणायाम, व ध्यान। आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना, महापुरुषों के प्रवचन सुनना, आत्म-चिन्तन करना तथा लोकहित के कार्य करना इसमें लाभप्रद है।
(4). आलोचक पित्त :: यह पित्त आंखों में रहता है। देखने की क्रिया का संचालन करता है। नेत्र ज्योति को बढ़ाना तथा दिव्य दृष्टि को बनाए रखना, इसके मुख्य कार्य हैं। जब आलोचक पित्त कुपित होता है ,तो नेत्र सम्बन्धी दोष शरीर में आने लगते हैं यथा नज़र कमजोर होना, आंखों में काला मोतिया व सफेद मोतिया के दोष आना।
इस पित्त को नियन्त्रित करने के लिये साधक को नीचे लिखी क्रियाओं का अभ्यास करना चाहिये :-
शुद्धि क्रियाएं :: आई वाश कप से प्रतिदिन आंखें साफ करें। नेत्रधोति का अभ्यास करें। मुँह में पानी भरकर आँखों में शुद्ध जल के छींटे लगाएं। दोनो आई वाश कपों में पानी भरें, तत्पश्चात् आई वाश कप में आंखों को डुबो कर आंख की पुतलियों को तीन-चार बार ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं व वृत्ताकार दिशा में घुमाएं। इसके लिए शुद्ध जल या त्रिफले के पानी का प्रयोग कर सकते हैं।
आसन :: कोणासन, उष्ट्रासन, भुजंगासन, धनुर व मत्स्यासन, ग्रीवा चालन, शवासन तथा नेत्र सुरक्षा क्रियाएं।
प्राणायाम :: गहरे लम्बे श्वास, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, मूर्छा प्राणायाम।
ध्यान :: प्रतिदिन 10 मिनट ध्यान में बैठें।
भोजन ::  हरी व पत्तेदार सब्जियों का सेवन अधिक करें।
(5). भ्राजक पित्त :: यह पित्त सम्पूर्ण शरीर की त्वचा में रहता है। भ्राजक पित्त शरीर में विभिन्न कार्य जैसे कि त्वचा को कान्तिमान बनाना, शरीर को सौन्दर्य प्रदान करना, विटामिन डी को ग्रहण करना तथा वायुमण्डल में पाए जाने वाले रोगाणुओं से शरीर की रक्षा आदि करता है।
इसके कुपित होने पर शरीर में नीचे लिखे रोग आने की सम्भावना बनी रहती है :-
त्वचा पर सफेद तथा लाल चकत्तों का दोष होना, चर्म रोग का होना,  शरीर में फोड़ा, फुन्सी होना, एग्जिमा, त्वचा का फटना आदि।
भ्राजक पित्त को शरीर में सम अवस्था में रखने के लिए नीचे लिखी क्रियाएं करनी चाहिए :-
शुद्धि क्रियाएं :- कुंजल, नेति व शंख प्रक्षालन।
आसन :- सूर्य नमस्कार, नौकासन, चक्रासन, हस्तपादोत्तानासन।
प्राणायाम :- गहरे लम्बे श्वास, प्लाविनी, तालबद्ध व नाड़ी शोधन प्राणायाम तथा तीनों बन्धों का बाह्य व आन्तरिक कुम्भक के साथ अभ्यास करें, (-हृदय रोगी के लिए कुम्भक निषेध है)।
विशेष क्रिया :- पूरे शरीर में तेल की मालिश करें। सर्दी के मौसम में सूर्य स्नान करें।
कफ :- इसकी रचना-उत्पत्ति-निर्माण पृथ्वी व जल तत्व से हुई है। यह अन्न व जल का सम्मिश्रित रूप है और पृथ्वी तत्व की अधिकता के कारण यह सघन-गाढ़ा-चिपचिपा-लसलसा है तथा जल की प्रधानता के कारण यह शीतल प्रकृति का है। थूक या बलगम के रास्ते यह मुँह से बाहर आता है।
बीमारियाँ-रोग :- इससे लगभग 20 प्रकार के रोग होते हैं, जैसे :-आलस्य, गल्कंड, विना खाए पेट भारी होना, बलासक, शरीर पर चकत्ते, ह्रदयोप्लेप, मुंह का फीकापन आदि।
लक्षण :- मोटापा, आलस्य, सब काम आराम से करते है, गुस्सा ना आना, किसी चीज को देर से समझना, मुंह से बलगम आना, भूख- प्यास कम लगना, चिकने नाख़ून व त्वचा, मधुरभाषी।
निदान-पहचान :- नाड़ी की गति मंद-मंद (-कबूतर या मोर चाल युक्त), कमजोर व कोमल नाड़ी।
इलाज :- गुड़ और शहद।
वात-वायु दोष :- जब शरीर में वायु तत्व सामान्य से अधिक हो जाता है, तो इसे वात दोष कहा जाता है। नाडी देखते समय अंगूठे के पास पहली अंगुली में ज़्यादा स्पंदन महसूस होगा।सामान्यतः शरीर में वात शाम के समय और रात्रि के अंतिम प्रहर में बढ़ता है। इस समय किसी रोग की तीव्रता बढना रोग के वात रोग होने की तरफ इशारा करता है।जीवन के अंतिम प्रहर यानी बुढापे में भी वात प्रबल होता है।वात के साथ पित्त दोष भी होने से इसे नियंत्रित करना थोड़ा मुश्किल  हो जाता है, पर असंभव नहीं। वात यानी हवा का गुण है कि वह फुलाता है। इसलिए वात दोष होने से शरीर कभी कभी फूल जाता है। हवा का एक अन्य गुण है सुखाना। इसलिए कभी कभी वात रोगी सुख के काँटा हो जाता है; कितना भी खाएँ-पीयें, शरीर कृशकाय ही रहता है।सुखाने के गुण के कारण ही वात जब बढ़कर संधियों (-joints) में, रक्त नलिकाओं में प्रविष्ट होता है, तो वहाँ भी सुखाता है। इससे संधियों का द्रव्य सूख जाता है और अर्थराइटिस की शुरुवात होने लगती है। घुटनों में हवा भरेगी और उठते बैठते कड़-कड़ की आवाज़ आएगी और दर्द शुरू हो जाएगा। रक्त नलिकाओं की दीवार रुखी हो जाने से वहाँ कुछ ना कुछ चिपकने लगेगा और वह संकरी  जायेगी। उसकी लचक-लौंच कम होने से रक्तदाब (-ब्लड प्रेशर ) बढेगा। सुखाने के गुण के कारण ही त्वचा रुखी होने लगेगी। एडियों में दरारें पड़ने लगेंगी। बाल रूखे होंगे। रूसी (-dandruff)  होगा। 
इसके बिगड़ने से मुख्यतः 80 प्रकार की  बीमारियाँ होती हैं, जैसे हड्डियों और मांसपेशियों में जकड़न, याद दास्त की कमी, फटी एड़िया, सूखी त्वचा, किसी भी तरह का दर्द, लकवा, भ्रम, विषाद, कान व आँख के रोग, मुख सूखना, कब्ज, आदि।
लक्षण :- मुंह में कड़वाहट, फटी त्वचा, नाखुनो का खुरदरा होना, ठण्ड बर्दास्त ना होना, कार्य जल्दी करने की प्रवृति, रंग काला, अनियमित पाचन, नीद कम आना, खट्टा व मीठे चीज के खाने की इच्छा करना, मैले नेत्र रूखे बाल।निदान-पहचान :- नाड़ी की गति तेज व अनियमित , टेढ़ी-मेढ़ी (-सर्पाकार) होती है। तेल मालिश और चूने का प्रयोग इलाज में सहायक हैं।(1). दांत कमज़ोर हो कर हिलने लगेंगे। (2). परेशानी, बेचैनी, नसों काकमजोर होनाचिड़चिड़ापन, कम्पवात आदि रहेगा। (3). घबराहट या ज़्यादा डर लगने से भी वात बढ़ता है। अतः डरावनी, भयानक फ़िल्में, क्राइम सीरियल आदि देखने  से  भी  वात  बढता है। (4). स्वप्न आते हैं। रात्रि के अंतिम प्रहर में स्वप्न ज़्यादा आते है; क्योंकि यह वात का समय है। (5). शरीर में  वात का घर है; पैर और पेट में बड़ी आँत। इसलिए वात रोगी का पेट फूला हुआ और कड़क महसूस होगा, जैसे किसी गुब्बारे में हवा भरी हो। पेट छूने में नर्म नहीं लगेगा। ज़्यादा भाग दौड़ और चलना फिरना होने से पैरों पर काम का दबाव बढ़ता है और वात बढ़ता है। इसके  लिए घुटने और नीचे के  पैरों को, तलवों को खूब दबाये, तेल मलें। कुछ डकारें आ जाएंगी और आराम मिलेगा। (6). शादी ब्याह में खूब भाग दौड़ करने से वात बढ़ जाता है। इसलिए आखिर में खूब घी वाली खिचड़ी खा कर, गर्म कढ़ी पी जाती है। वात निकल जाता है। आराम मिलता है। (7). हवा का गुण है, चलना या रुकना। जब वात बढेगा तब शरीर की सामान्य हलन चलन की क्रियाएं, जैसे आँतों का हलन चलन प्रभावित होगा और कब्ज होगी। कितना भी सलाद खाएं; कब्ज बनी रहेगी। मल सूख जाएगा। (8). मन चंचल रहेगा, कल्पनाएँ ज़्यादा करेगा, कभी कुछ सोचेगा; कभी कुछ, मूड़ बदलता रहेगा। (9). ज़्यादा वात विकार हिस्टीरिया, मानसिक विकार भी पैदा कर देता है। (10). कोई भी बदलाव वात बढ़ा देता है, फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा. जितना बड़ा बदलाव, उतना ज़्यादा वात बढेगा। जैसे सुबह उठे :- बदलाव है (-सोते से उठे); सो वात थोड़ा बढ़ा. धूप से छाँव में या छाँव से धूप में गए, वात बढेगा, एसी कमरे से गर्मी में आये या गए, वात बढेगा, मौसम में बदलाव :- अचानक सर्दी या गर्मी बढ़ने से वात बढेगा। अचानक गंभीर चोट लगी, मानसिक आघात लगा, वात बहुत बढेगा। ऐसे समय यंह सावधानी बरतें कि  किसी रुखी या ठंडी वस्तु का सेवन ना करें, ठंडा पानी  या शीतल पेय  ना पिए। गर्म पानी पीयें। (11). जब विवाह होता है; तो यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। इसलिए पति पत्नी कम से कम छः महीने महीने तक रुखी और ठंडी वस्तु जैसे आइस क्रीम आदि का सेवन ना करें। इससे मन में रूखापन नहीं आयेंगा और नए रिश्ते आसानी से बन पायेंगे और ज़िन्दगी भर बने रहेंगे।  आज कल तो पति पत्नी शादी में एक दूसरे को आइसक्रीम खिलाते है और रुखा डाइट फ़ूड लेते हैं। ठंडा पानी, शीतल पेय लेते है। फिर रिश्तों की बुनियाद कमज़ोर रह जाती है।(12). जब बच्चा होता है तो माँ के जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव है। इसलिए छः महीने तक सावधानी लेनी होती है। वरना शरीर फूल कर कमज़ोर हो जाता है। कई बार दूध सूख जाता है। कई बार गंभीर बीमारियाँ इसी समय हमला करती हैं। जैसे दमा, अर्थराइटिस, रक्तचाप , पाइल्स, हिस्टीरिया आदि। (13). वात यानी हवा शरीर में घुसने के द्वार है नाक, कान, मुंह आदि। इसलिए नाक, कान आदि में तेल डालें। कान ढकना चाहिए।आजकल के युवा गाड़ी चलाते नहीं उड़ाते हैंऔर कान ढकते नहीं। फिर उनमें उन्माद, अचानक तीव्र आवेश, दुबलापन या मोटापा, बाल झडना आदि समस्याएँ पाई जाती हैं।इसलिए याद रखें कि गाड़ी उड़ाना नहीं चलाना है और कान ढकने में शर्म आती हो तो रुई डाल लें। (14). बस या ट्रेन में खुली खिड़की के पास बैठने से सिरदर्द होने लगता है, क्योंकि वात बढ़ जाता है। (15). वात दोष दूर होता है गर्म पेय, गर्म पानी और शुद्ध घी और छने (-filtered) तेल से। (16). कई बार ऐसा देखा गया की किसी को गंभीर चोट लगी और उसे अस्पताल ले  जाया जा रहा है। उस वक्त उसे किसी ने ठंडा पानी पिला पिला दिया और वह अचानक मर गया। किसी के करीबी व्यक्ति की मौत हुई। वह रो रहा है। किसी ने उसे ठंडा पानी पिला दिया; उनकी भी बोलो राम हो गया।करीबी लोग सोचते रह जाते हैं कि ये अचानक क्या और कैसे हुआ ? इसलिए यह जानना ज़रूरी है की गंभीर चोट या मानसिक आघात लगे तो व्यक्ति को पीने के लिए गर्म जल दें। (17). वात दोष ना हो, इसलिए ध्यान रखें कि पानी गटा गट ना पीयें। मुंह में धीरे-धीरे एक-एक घूंट पीयें। कभी भी पानी खड़े खड़े होकर ना पिए। हो सके तो उकड़ूँ बैठ कर पीयें। जिससे वात के अंग-निचला पेट और पिंडलियाँ दबती है और उनमें वात नहीं घुसता। (18). दूध हमेशा घी डाल  कर खड़े खड़े पीयें।(19). रिफाइंड तेल का प्रयोग कभी ना करे। कच्ची घानी का कोई भी तेल जैसे मूँगफली, तिल, नारियल, सरसों उत्तम  है। (20). वात बढाने वाला भोजन शाम 4 बजे के बाद ना ले। जैसे मूली, बैंगन, आलू, गोभी आदि। (21). जीवन के अंतिम प्रहर यानी बुढापे में भी वात प्रबल होता है।
पित्त, कफ़, वात दोष को दूर रखने में जीवन शैली-आचरण भी सहयोगी है। अतः जातक को चाहिए कि जीवन मूल्यों का पालन करे, जो निम्न हैं :-
अहिंसा :- इस गुण को धारण करने वाले व्यक्ति को क्रोध नहीं आता। ऐसे व्यक्ति में दुश्मनी और दुर्भावना कभी जन्म नहीं ले सकती। क्रोध अग्नि का ही रूप है जो कुपित पित्त का परिणाम होता है। इस प्रकार अहिंसा रूपी गुण के आने से पित्त दोष स्वतः शान्त हो जाता है।
सत्य :- मन, वचन तथा कर्म से सत्य का पालन किया जाता है। सत्य के लिए दो बातों का होना आवश्यक है। (1). सत्य कथन की वाणी में मधुरता हो, कड़वाहट नहीं,  (2). उससे दूसरों का भला होता हो। जो व्यक्ति सत्य का पालन करता है, उसका जीवन सरल तथा निर्भीक बनता है। इस गुण को धारण करने पर शरीर में वात, पित्त व कफ तीनों ही सन्तुलित होते हैं।
अस्तेय :- चोरी न करना-ईमानदारी की कमाई से जीवन चलाना। जो व्यक्ति ईमानदारी की कमाई से गुजर करता है उसका मन शान्त रहता है। जो व्यक्ति बेईमानी की कमाई से गुजर करता है, उसका मन चंचल होता है। ऐसे व्यक्ति के शरीर में प्राण का प्रवाह सम अवस्था में नहीं होता। अतः उसमें वात् दोष आने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं यदि व्यक्ति अस्तेय का पालन करता है, तो उसके शरीर में वात का सन्तुलन बना रहता है।
ब्रह्मचर्य :- मन, वचन एवं कर्म से इन्द्रियों तथा मन पर नियन्त्रण करना ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का गुण आने पर साधक अन्तरंग साधना की ओर बढ़ने लगता है। यह गुण ग्रहण करने पर स्नेहन कफ तथा साधक पित्त विशेष कर प्रभाव में आते हैं। स्नेहन कफ के ठीक रहने पर शरीर की सभी ग्रन्थियाँ ठीक प्रकार से कार्य करती हैं और व्यक्ति का शरीर स्वस्थ रहता है। साधक पित्त ठीक होने पर व्यक्ति को अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर होने में सहायता मिलती है।
अपरिग्रह :- जब व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करता उसे अपरिग्रह कहते है। इस गुण का विकास होने पर व्यक्ति की शक्ति व समय की बचत होने लगती है जो वह प्रभु के कार्य में लगा सकता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति आवश्यकता से अधिक संचय करता है तो उसमें लोभ व अहंकार पैदा होता है। अपरिग्रह का गुण आने से कफ व पित्त विशेष रूप से सन्तुलित होते हैं।
तप :- शरीर, इन्द्रियों व मन का संयम तप है। तप से अन्दर की इच्छाएं नष्ट हो जाती है। इच्छाएं अधिक करने वाले व्यक्ति में वात् दोष अधिक होते हैं, उनका मन अशान्त रहता है तप का गुण ग्रहण करने से यह दोष ठीक होता है।
स्वाध्याय :- अपने आप को जानना अर्थात् आत्म अनुसंधान करना स्वाध्याय कहलाता है। आत्म चिन्तन करना आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना, महापुरुषों के उपदेशों को सुनकर, उन पर मनन करना, अपने भीतर जाना स्वाध्याय है। इस गुण के ग्रहण करने पर विशेषतः स्नेहन कफ, साधक पित्त व व्यान प्राण प्रभाव में आते हैं।
उपवास :- सभी रोगों की शुरुआत मन्दाग्नि कम होने पर होती है ।किसी भी औषधि से अच्छा उपवास है। 
CLEANSING ACTION FOR THE BODY IN AYURVED शरीर-शोधन :: 
शरीर-शोधन : मानव शरीर पित्त, वात और कफ़ से प्रभावित होकर अन्यानेक दोषों बीमारियों को जन्म देता है। 
आयुर्वेद में शरीर-शोधन के लिए छ: क्रियाओं : धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति का प्रावधान है।
धौति के 3 प्रकार हैं वारि धौति, ब्रह्म दातौन और वास धौति।
वारि-धौति अर्थात् कॄञ्जर कर्म :– खाली पेट लवण-मिश्रित गुनगुना पानी पीकर छाती हिलाकर वमन की तरह निकाल दिया जाता है। इसको गजकरणी भी कहते है, क्योंकि जैसे हाथी सूंड से जल खींचकर फेंकता है उसी प्रकार इसमे जल पीकर निकाला जाता है। आरम्भ में पानी का निकालना कठिन होता है। तालु से ऊपर छोटी जिह्वा को सीधे हाथ की दो अंगुलियों से दबाने से पानी निकलने लगता है।
ब्रह्मदातौन :– सूत की बनी हुई बारीक रस्सी के टुकड़े को अथवा रबर की ट्यूब को लवण ‍मिश्रित गुनगुने पानी को खाली पेट पीने के पश्चात बिना दांत लगाये गले से दूध के घूंट के सदृश निगला जाता है, फिर छाती हिलाकर उसको निकाल सारे पानी को वमन के सदृश निकाल दिया जाता है।
वास-धौति (वस्त्र-धौति) :: धौति लगभग चार अंगुल चौड़ी, लगभग पंद्रह हाथ लंबी, बारीक मलमल जैसे कपडे की बनी होती है। खाली पेट पानी अथवा आरम्भ मे दूध मे भीगी हुई धौति के एक सिरे को अंगुली से हलक मे ले जाकर बिना दांत लगाये शनै:-शनै: दूध के घूंट के सदृश निगला जाता है। आरम्भ मे निगलना कठिन होता है और उल्टी अती है, इसलिए एक घूंट गुनगुने पानी के साथ निगली जाती है। प्रथम दिन एक साथ नहीं निगली जा सकती है। शनै:-शनै: अभ्यास बढाया जाता है। सब धौति निगलने के पश्चात कुछ अंश मुंह के बाहर रखना पडता है। इसके बाद नौली को चालन करके धौति तथा सब पिये हुए पानी को अमन के सदृश निकाल दिया जाता है।इन क्रियाओं से कफ और पित्त रोग दूर होकर शरीर शुद्ध और हलका हो जाता है और मन सुगमता से एकाग्र होने लगता है।
घेरण्ड-संघिता मे धौतिकर्म के चार निम्न भेद हैं :–(I) अन्त धौति, (II) दन्त-धौति, (III हृद्धौति  और (IV) मूल शोधन।
(I) अन्तधौति :– इसके भी चार भेद हैं – वात सार, वारिंसार, वह्निसार और बहिष्कृत। 
वातासर अन्तधौति :- इस क्रिया में मुख को कौए ‍की चोंच के समान करके अर्थात् दोनों ‍होठों ‍को सिकोडकर धीरे-धीरे वायु का पान किया जाता है।  पेट में वायु पूर्णतया भरने तक इसे किया जाता है और फिर वायु को पेट के अंदर चारों ओर संचालित करके धीरे-धीरे नासिका पुट के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इसे काकी-मुद्रा और काक-प्राणायाम भी कहते है।फल :– ह्रदय, पेट और कण्ठ की व्याधियों का दूर होना, शरीर का शुद्ध और निर्मल होना, क्षुधा की वृद्धि, मन्दाग्नि का नाश, फेंफड़ों का विकास कण्ठ मे सुरीलापन होना। यह वीर्य के लिए भी लाभदायक है।
वारिंसार अन्तधौति :– इसमे मुख द्वारा धीरे-धीरे जल पी कर कण्ठ तक भर लिया जाता है। फिर उदर मे चारों ओर संचालित करके गुदामार्ग द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।इस क्रिया को शंख-प्रक्षालन भी कहते है। क्योंकि शंख के चक्राकार मार्ग मे पानी डालने से घूमता हुआ जल जिस प्रकार बाहर आ जाता है उसी प्रकार से मुख से जल पीने पर कुछ समय पश्चात मल को साथ लेकर अंतडियों को शुद्ध करता हुआ गुदा द्वार से बाहर आ जाता है।फल :- देह का ‍निर्मल होना, कोष्ठबद्धता तथा पेट के आमादि सब रोगों का दूर होना, तथा शरीर का शुद्ध होकर कांतिमान होना भी है।
बह्निसार अन्तधौति :– नाभि की गांठ को मेरूपृष्ठ में बार-बार लगाया जाता है। उदर को इस प्रकार बार-बार फुलाया और सिन्कोडा जाता है कि नाभि ग्रन्थि पीठ मे लग जाया करे। इससे उदर के समस्त रोग नष्ट होते ‍है और जठराग्नि प्रदीप्त होती है।
बहिष्कृत अन्तधौति :– कौए की चोंच के सदृश मुख बनाकर इतनी मात्रा मे वायु का पान किया जाता है कि पेट भर जाय, फिर उस वायु ‍को डेढ़ घंटे तक (अथवा यथाशक्ति) पेट मे धारण किये रहना पड़ता है।तत्पश्चात गुदामार्ग द्वारा बाहर निकाया जाता है। जब तक आधे पहर तक वायु को रोकने का अभ्यास न ‍हो जाये, तब तक इस क्रिया को नहीं करना चाहिए, अन्यथा वायु के कुपित होने का भय बना रहता है।फल :– इससे सब ना‍डियां शुद्ध होती है। जैसी यह क्रिया कठिन है वैसे ही इसका लाभ अकथ्य तथा अगम्य है।
(II) दन्त-धौति :– यह भी चार प्रकार ‍की होती है :–दन्तमूल, जिह्वामूल, कर्णरन्ध्र और कपालरन्ध्र। 
दन्त मूल धौति :– खैर का रस सूखी मिट्टी अथवा अन्य किसी औषधि-विशेष से दांतों की जड़ों को अच्छी प्रकार साफ किया जाता है।
जिह्वामूल धौति :– तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गलें के भीतर डालकर जीभ को जड़ तक बार-बार घिसा जाता है। इस प्रकार ‍धीरे-धीरे कफ बाहर निकल जाता है।
कर्णरन्ध्र-धौति :– तर्जनी और अनामिका अंगुलियों के योग से दोनो कानो के छिद्रों को साफ किया जाता है, इससे एक प्रकार का नाद प्रकट होता है।
कपालरन्ध्र धौति :– निद्रा से उठने पर, भोजन के अन्त में और सूर्य के अस्त होने पर सिर के गढ़े को दाहिने हाथ के अंगूठे द्वारा प्रतिदिन जल से साफ किया जाता है। इससे नाडियां स्वच्छ हो जाती है और दृष्टि दिव्य होती है।
(III) हृद्धौति :– इसके तीन भेद हैं  :– दण्ड धौति, वमन धौति, वास धौति और दण्ड धौति। 
केलेंडर के दण्ड, हल्दी के दण्ड, चिकने बेंत के दण्ड अथवा वट वृक्ष की जटा-डाढि को धीरे-धीरे ह्रदयस्थल पर  लगया जाता है। इससे पित्त, कफ, अकुलाहट आदि विकारी मल बाहर निकल जातें हैं और ह्रदय के सारे रोग नष्ट हो जाते है। इसको भोजन के पूर्व करना चाहिये।
वमन धौति :– भोजन करने के पश्चात कण्ठ तक पानी पी कर भरा जाता है और थोडी देर तक उपर की ओर लेकर उस पानी को मुख द्वारा बाहर निकाला जाता है। पानी कण्ठ के अंदर न जाने पाये इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। इससे कफ-दोष और पित्त-दोष दूर होते है।
वास-धौति (वस्त्र-धौति) :– लगभग छ: अंगुल चौडा और लगभग अठारह हाथ का बारीक वस्त्र किंचित् उष्ण (गर्म) जल से भिगोकर गुरू के बताये हुए क्रम से पहिले दिन एक हाथ, दूसरे दिन दो ‍हाथ, तीसरे दिन तीन हाथ अथवा इससे न्यूनाधिक युक्ति पूर्वक अंदर ले जाया जाता है और फिर धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है।इसको भोजन के पहले करना चाहिये। इससे गुल्म, ज्वर, पील्हा, कुष्ठ एवं कफ-पित्त आदि अन्य विकार नष्ट होते है।
(IV) मूलशोधन (गणेश-क्रिया) :– कच्ची मूली की जड़ से अथवा तर्जनी अंगुली से यन्त्रपूर्वक सावधानी से बार-बार जल द्वारा गुदामार्ग को साफ किया जाता है। इसके पश्चात घृत या मक्खन उस स्थान पर लगाया जाता है। इससे उदर रोग का काठिन्य दूर ‍होता है। आजनित एवं अजीर्ण जनित रोग उत्पन्न नही होते और शरीर की पुष्टि और कान्ति की वृद्धि होती है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। इससे सब प्रकार के अर्श-रोग तथा वीर्यदोष भी दूर होते है।
वस्ति :– वस्ति मूलाधार के समीप है। इसके साफ करने के कर्म को वस्ति कर्म कहते है। एक चिकनी नली ‍को गुदा में ले जाकर नौलि-कर्म की सहायता से गुदामार्ग द्वारा वस्ति मे जल चढाया और निकाला जाता है।
साधारणतया इस क्रिया का कठिन है। उसके स्थान पर एनिमा से काम लिया जा सकता है। इससे आंतों का मल जल के साथ मिलकर पतला हो जाता है और शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल जाता है।
सावधानी-नोट :- ये सभी क्रियाएं योग्य प्रशिक्षक के बताये अनुसार ही की जाता हैं।
DISEASES-DISORDERS CAUSED BY SATURN & PROTECTION शनि के कारण रोग, प्रभाव एवं निवारण के उपाय :: आयुर्वेद में तीन प्रकार के दोषों से रोगों की उत्पत्ति मानी गई है। ये तीन दोष वात, कफ व पित्त है। मनुष्य के शरीर की समस्त आन्तरिक गतिविधियाँ वात द्वारा ही संचालित होती है। 
किसी भी रोग की उत्पत्ति जातक के प्रारंभ और पूर्व जन्म के पापों का परिणाम है। फिर इसका इलाज करके सुरक्षित रहा जा सकता है। आशीर्वाद-दुआ, पूजा-पाठ, व्यायाम-प्राणयाम-योग, भक्ति रोग निवारण में समर्थ हैं।रोग विशेष की उत्पत्ति जातक के जन्म समाय मे किसी राशि एवं नक्षत्र विशेष पर पापग्रहों की उपस्थिति, उन पर पाप दृष्टि, पापग्रहों की राशि एवं नक्षत्र में उपस्थित होना, पापग्रह अध्ष्ठिित राशि के स्वामी द्वारा युति या दृष्टि रोग की संभावना को बताती है। इन रोग कारक ग्रहों की दशा एवं दशाकाल में प्रतिकूल गोचर रहने पर रोग की उत्पत्ति होती है। प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि एवं भाव मानव शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो का प्रतिनिधित्व करते है।
कालस्य मौलिः क्रिय आननं गौर्वक्षो नृयुग्मो हृदयं कुलीरः। का्रेडे मृगेन्दोेथ कटी कुमारी अस्तिस्तुला मेहनमस्य कौर्पिः॥ 
इरूवास उरू मकरश्र जानु जंघे घटोेन्त्यश्ररणौ प्रतीकान्।सच्न्तियेत्कालनरस्य सूतौ पुष्टान्कृशान्नुः शुभपापयोगात्॥ 
मेष राशि को सिर में, वृष मुँह में, मिथुन छाती में, कर्क ह्रदय में, सिंह पेट में, कन्या कमर में, तुला बस्ति में अर्थात पेडू में, वृश्च्कि लिंग में, धनु जांघो में, मकर घुटनों में, कुंभ पिंण्डली में तथा मीन राशि को पैरो में स्थान दिया गया है। इन राशियों के अनुसार ही नक्षत्रों को उन अंगो में स्थापित करने से  मानव शरीराकृति बनती है।
इन नक्षत्रों व राशियों को आधार मानकर ही शरीर के किसी अंग विशेष में रोग या कष्ट का पूर्वानुभान किया जा सकता है। शनि तमोगुणी ग्रह क्रुर एवं दयाहीन, लम्बे नाखुन एवं रूखे-सूखे बालों वाला, अधोमुखी, मंद गति वाला एवं आलसी ग्रह है। इसका आकार दुर्बल एवं आँखें अन्दर की ओर धंसी हुई हैं। जहाँ  पृथकता कारक ग्रह होने के नाते इसकी जन्मांग में जिस राशि एवं नक्षत्र से सम्बन्ध हो, उस अंग विशेष में कार्य से पृथकत्ता अर्थात बीमारी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। शनि को स्नायु एवं वात कारक ग्रह है। नसों वा नाडियों में वात का संचरण शनि के द्वारा ही होता है। 
आत्मादयो गगनगैं बलिभिर्बलक्तराः।दुर्बलैर्दुर्बलाः ज्ञेया विपरीत शनैः फलम्॥ 
कुण्डली में शनि की स्थिति अधिक विचारणीय है। इसका अशुभ होकर किसी भाव में उपस्थित होने उस भाव एवं राशि सम्बधित अंग में दुःख अर्थात रोग उत्पन्न करेगा। गोचर में भी शनि एक राशि में सर्वाधिक समय तक रहता है जिससे उस अंग-विशेष की कार्यशीलता में परिवर्तन आना रोग को न्यौता देना है। कुछ विशेष योगों में शनि भिन्न-भिन्न रोग देता है।शनि के अशुभ होने पर शरीरगत वायु का क्रम टूट जाता है। अशुभ शनि जिस राशि, नक्षत्र को पीड़ित करेगा उसी अंग में वायु का संचार अनियंत्रित हो जायेगा, जिससे परिस्थिति अनुसार अनेक रोग जन्म ले सकते है। नैसर्गिक कुण्डली में शनि को दशम व एकादश भावों का प्रतिनिधि माना गया है। इन भावो का पीडित होना घुटने के रोग, समस्त जोडों के रोग, हड्डी, मांसपेशियों के रोग, चर्च रोग, श्वेत कुष्ठ, अपस्मार, पिंडली में दर्द, दाये पैर,  बाँये पैर, कान व हाथ में रोग, स्नायु निर्बलता, हृदय रोग व पागलपन देता है। रोग निवृति भी एकादश के प्रभाव में है। उदरस्थ वायु में समायोजन से शनि पेट मज्जा को जहाँ शुभ होकर मज़बूत बनाता है; वहीं अशुभ होने पर इसमें निर्बलता लाता है। फलस्वरूप जातक की पाचन शक्ति में अनियमितता के कारण भोजन का सही पाचन नहीं होता जो रस, धातु, मांस, अस्थि को कमजोर करता है। समस्त रोगों की जड पेट है। पाचन शक्ति मज़बूत होकर जहाँ प्याज-रोटी खाने वालों को भी शनि सुडौल दिखाता है वहीं पंचमेवा खाने वाला बिना पाचन शक्ति के थका-हारा हुआ मरीज लगता है। मुख्य तौर पर शनि को वायु विकार का कारक मानते है, जिससे अंग वक्रता, पक्षाघात, सांस लेने में परेशानी होती है। शनि का लौह धातु पर अधिकार है। शरीर में लौह तत्व की कमी होने पर एनीमिया, पीलिया रोग भी हो जाता है। अपने पृथकत्ता कारक प्रभाव से शनि अंग विशेष को घात-प्रतिघात द्वारा पृथक् कर देता है। इस प्रकार अचानक दुर्घटना से फे्रकच्र होना भी शनि का कार्य हो सकता है। यदि इसे अन्य ग्रहो का भी थोडा प्रत्यक्ष सहयोग मिल जाये तो, यह शरीर में कई रोगों को जन्म दे सकता है। जहाँ सभी ग्रह बलवान होने पर शुभ फलदायक माने जाते है, वहीं शनि दुःख का कारक होने से इसके विषय विपरित फल माना है। 
ARTHRITIS वातरोग :- (1). छठा भाव रोग भाव है। जब इस भाव या भावेश से शनि का सम्बन्ध बनता है तो वात रोग होता है। (2). लग्नस्थ बृहस्पति पर सप्तमस्थ शनि की दृष्टि वातरोग कारक है। (3). त्रिकोण भावों में या सप्तम में मंगल हो व शनि सप्त्म में हो तो गठिया होता है। (4). शनि क्षीण चंद्र से द्वादश भाव में युति करें तो आथ्र्रराइटिस होता है। (5). छठे भाव में शनि पैरोें में कष्ट देता है। (6). शनि की राहु मंगल से युति एवं सूर्य छठे भाव में हो तो पैरों में विकल होता है। (7). छठे या आठवें भाव में शनि, सुर्य चन्द्र से युति करें तो हाथों में वात विकार के कारण दर्द होता है। (8). शनि लग्नस्थ शुक्र पर दृष्टि करें तो नितम्ब में कष्ट होता है। (9). द्वादश स्थान मंे मंगल शनि की युति वात रोग कारक है। (10). षष्ठेश व अष्टमेश की लग्न में शनि से युति वात रोग कारक है। (11). चंद्र एवं शनि की युति हो एवं शुभ ग्रहों की दृष्टि नहीं हों तो जातक को पैरों में कष्ट होता हैं।
STOMACH DISORDERS उदर रोग-विकार :- ये उत्पत्र करने में भी शनि की प्रमुख भूमिका है। सूर्य एवं चन्द्र को बदहजमी-अपच उत्पन्न करते हैं यदि सूर्य या चंद्र पर शनि का प्रभाव हो। चंद्र व बृहस्पति को यकृत का कारक भी माना जाता है। शनि का प्रभाव यकृत को कमजोर एवं निष्क्रिय प्रभावी बनाता हैं। बुध पर शनि के दुष्प्रभाव से आंतों में खराबी उत्पन्न होती हैं। एपेण्डीसाइटिस भी बृहस्पति पर शनि के अशुभ प्रभाव से ही होता  है। शुक्र को धातु एवं गुप्तांगों का प्रतिनिधि माना जाता हैं। जब शुक्र शनि द्वारा पीड़ित हो तो जातक को धातु सम्बंधी कष्ट होता है। जब शुक्र पेट का कारक होकर स्थित होगा तो पेट की धातुओं का क्षय शनि के प्रभाव से होगा। 
(1). कर्क, वृश्चिक, कुंभ नवांश में शनिचंद्र से योग करें तो यकृत विकार के कारण पेट में गुल्म रोग होता है। (2). द्वितीय भाव में शनि होने पर संग्रहणी रोग होता हैं। इस रोग में उदरस्थ वायु के अनियंत्रित होने से भोजन बिना पचे ही शरीर से बाहर मल के रुप में निकल जाता हैं। (3).  सप्तम में शनि मंगल से युति करे एवं लग्रस्थ राहू बुध पर दृष्टि करे तब अतिसार रोग होता है। (4).  मीन या मेष लग्र में शनि तृतीय स्थान में उदर मे दर्द होता है।(5). सिंह राशि में शनि चंद्र की यूति या षष्ठ या द्वादश स्थान में शनि मंगल से युति करे या अष्टम में शनि व लग्र में चंद्र हो या मकर या कुंभ लग्रस्थ शनि पर पापग्रहों की दृष्टि उदर रोग कारक है।(6). कुंभ लग्र में शनि चंद्र के साथ युति करे या षष्ठेश एवं चंद्र लग्रेश पर शनि का प्रभाव या पंचम स्थान में शनि की चंद्र से युति प्लीहा रोग कारक है।
SKIN DISEASES कुष्ठ रोग,  दाग, दाद, छाजन, फोडे-फुंसी व एक्जीमा : यह योग से खास पीडा़ नहीं पहुँचाता। इन ग्रहों के कुछ शुभ प्रभाव से कुष्ठ भले ही न हो मगर वात के सूक्ष्म प्रभाव के कारण दाग, दाद, छाजन, फोडे-फुंसी व एक्जीमा का प्रकोप अवश्य दिखाई देगा। (1). शनि की मंगल व सूर्य से युति रक्त कुष्ठ होता है।(2). लग्न में शनि षष्ठेश से युति करे तो कफ विकार जनित कुष्ठ होता है।(3). सिंह व कन्या लग्न में शनि सूर्य की युति लग्न में हो तो रक्त कुष्ठ होता है।(4). शनि की मेष या वृषभ राशि में युति चन्द्र मंगल से हो तो सफेद कुष्ठ होता है।(5). शनि कर्क या मीन राशि में चन्द्र मंगल शुक्र से युति करे तो रक्त कुष्ठ होता है।(6). शनि सूर्य से युति करे तो कृष्ण कुष्ठ होता है।(7). शनि चन्द्र की नवम में युति दाद रोग कारक है।(8). जल राशिस्थ द्वितीयस्थ चन्द्र पर शनि की दृष्टि दाद रोग देती है।
HEART TROUBLE हृदय रोग :- हृदय को स्वस्थ बनाये रखने हेतु सूर्य एवं चंद्र व इनकी राशियों पर शनि का शुभ प्रभाव आवश्यक है। इस दृष्टि में शुक्र हृदय को मजबूती देता हैं उच्चस्थ शुक्र वाला जातक दृढ दिलवाला होता है। जब इन सभी कारकोें,भाव चतुर्थ व पंचम व इनके भावेशों पर शनि का अशुभ प्रभाव पडता हैं तो जातक हृदय विकार से ग्रसित होता हैं। (1). चतुर्थ में शनि हृदय रोग कारक है। यदि बृहस्पति व चंद्र भी शनि से पीडित हो तो हृदय रोग भी तीव्र होता है।(2). मीन लग्न में शनि चतुर्थ में हो एवं सूर्य पीडित हो तो हृदय रोग होता है। (3). चतुर्थ भावस्थ शनि बृहस्पति व मंगल से युति करे तो हृदय रोग होता है।(4). षष्ठेश शनि चतुर्थ भाव में पापयुक्त हो तो हृदय रोग होता है।
शनि की युति से उत्पन्न  अन्य रोग :- (1). सूर्य व शनि किसी भी प्रकार से सम्बन्ध करें तो खांसी होती है। (2). चतुर्थेश के साथ शनि युति करे व मंगल की दृष्टि हो तो पत्थर से घात होता है। (3). मकर लग्न में शनि चतुर्थ में पापग्रहों से युति करें तो जल घात होता है। (4). मेष, वृश्चिक, कर्क या सिंह राशि में शनि शुक्र से युति हाथ-पैर कटने का योग बनाते है। (5). शनि पर पापग्रहों की दृष्टि हो तो बवासीर रोग होता है। (6). लग्नस्थ शनि पर सप्तमस्थ मंगल दृष्टि कर तो बवासीर होता है। (7). सप्तम में शनि , वृश्चिक में मंगल व लग्न में सूर्य हो तो बवासीर रोग होता है। (8). शनि बारहवें भाव में हो एवं लग्नेश व मंगल सप्तम हो तो भी बवासीर रोग होता है या लग्न्ेाश या मंगल देखे तब भी बवासीर होता है। (9). मिथुन या कर्क लग्न में शनि पर राहु केतु का प्रभाव चातुर्थिक ज्वर कारक है। (10). शनि चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो पागलपन होता है। (11). छठे या आठवे भाव में शनि मंगल से युति करें तब पागलपन होता है। (12). चंद्र शनि की युति पर मंगल की दृष्टि हो तो उसे किसी पूर्व रोगी के कारण सम्पर्क क्षय होता है। (13). लग्न पर मंगल शनि की दृष्टि भी क्षयरोग कारक है। (14). छठे या द्वादश भाव में शनि मंगल से युति करें तो गण्डमाला रोग होता है। (15). लग्नस्थ शनि सूर्य पर चंद्र शुक्र की दृष्टि गुप्तांग काटने का योग बनता है। (16). शनि चंद्र से युति कर मंगल से चतुर्थ या दशम में हो तो संभोग शक्ति में कमी होती है। (17). लग्न में शनि धनु या वृषभ राशि में हो तो अल्प काम शक्ति होती है।(18). नेत्र स्थान में पापग्रह शनि से दृष्ट हो तो रोग से आंखें नष्ट होती है। (19). द्वितीयेश व द्वादशेश शनि, मंगल व गुलिक से युति करें तो नेत्र रोग होता है। (20). लग्नगत सिंह राशि में सूर्य चंद्र पर शनि मंगल की दृष्टि से आंखें नष्ट होती है। (21). पंचम में शनि बृहस्पति से युति करें एवं लग्न में चंद्र हो तो धातुरोग होता है।(22). षष्ठेश त्रिक स्थानों में शनि से दृष्ट हो तो बहरापन होता है।(23). शनि से चतुर्थ में बुध व षष्ठेश त्रिक में हो तों व्यक्ति बहरा होता है।(24). शनि सूर्य चंद्र के साथ सप्तम में युति करें तो दंतरोग होता है। (25). मकर या कुंभ लग्नस्थ शनि हो तो जातक गंजा होता है। (26). अष्टमस्थ शुक्र पर शनि राहू की दृष्टि मधुमेह रोग कारक है। (27). धनु और मकर लग्न में शनि त्रिक भावों में बृहस्पति से युति करे तो जातक गंूगा होता है। (28). लग्न में शनि सूर्य, मंगल से युति करे तो कामला/पीलिया रोग होता है अर्थात शनि का किसी भी ग्रह के साथ युति दृष्टि द्वारा सम्बन्ध बनाना जातक को उस ग्रह विशेष के कारकत्व में कमजोरी लाकर कमजोर बनाता है।
One should not consider the above effects as final since prayers, Yogasan, regular life, avoidance of meat & meat products, wine-women, drugs and presence of benefice planets in the chart produce safety.
PROTECTION FROM ILL EFFECTS OS SATURN शनि कृत रोगों को दूर करने हेतु उपाय :  (1). शनि मुद्रिका शनिवार के दिन शनि मंत्र का जाप करते हुये धारण करें। काले घोडे की नाल प्राप्त कर घर के मुख्य दरवाजे परके ऊपर लगायें। (2). शनि यंत्र को शनिवार के दिन, शनि की होरा में अष्टगंध में भोजपत्र पर बनाकर उडद के आटे से दीपक बनाकर उसमें तेल डालकर दीप प्रज्जवलित करें। फिर शनि मंत्र का जाप करते हुये यंत्र पर खेजडी के फुल पत्र अर्पित करें। तत्पश्चात इसे धारण करने से राहत मिलती हैं। (3). उडद के आटे की रोटी बनाकर उस पर तेल लगायें। फिर कुछ उडद के दाने उस पर रखें। अब रोगी के उपर से सात बार उसारकर शमशान में उसे रख आयें। घर से निकालते समय व वापिस घर आते समय पीछे कदापि नही देखें एवं न ही इस अवधि में किसी से बात करें। ऐसा प्रयोग 21 दिन करने से राहत मिलती है। पूर्ण राहत न मिलने की स्थिति में इसे बढाकर 43 या 73 दिन तक बिना नागा करें। केवल पुरूष ही प्रयोग करें एवं समय एक ही रखें।(4). मिट्टी के नये छोटे घडे में पानी भरकर रोगी पर से सात बार उसार कर उस जल से 23 दिन खेजडी को सींचें। इस अवधि में रोगी के सिर से नख तक की नाप का काला धागा भी प्रतिदिन खेजडी पर लपेटते रहें। इससे भी जातक को चमत्कारिक ढंग से राहत मिलती हैं। (5). सात शनिवार को बीसों नाखूनों को काटकर घर पर ही इकट्ठे कर लें। फिर एक नारियल, कच्चे कोयले, काले तिल व उडद काले कपउे में बांधकर शरीर से उसारकर किसी बहते पवित्र जल में रोगी के कपडों के साथ प्रवाहित करें। यदि रोगी स्वंय करे तो स्नान कर कपउे वहीं छोड दें एवं नये कपउे पहन कर घर पर आ जाये। राहत अवश्य मिलेगी। (6). किसी बर्तन में तेल को गर्म करके उसमें गुड डालकर गुलगुले उठने के बाद उतार कर उसमें रोगी अपना मुंह देखकर किसी भिखारी को दे या उडद की बनी रोटी पर इसे रखकर भैंसे को खिला दे। शनिकृत रोग का सरलतम उपाय हैं। (7). एक नारियल के गोले में घी व सिंदुर भरकर उसे रोगी पर रखकर शमशान में रख आयें। पीछे नहीं देखना हैं तथा मार्ग में वार्तालाप नहीं करें। घर आकर हाथ-पैर धो लें। (8). शनि के तीव्रतम प्रकोप होने पर शनि मंत्र का जाप करना, सातमुखी रूद्राक्ष की अभिमंत्रित माला धारण करना एवं नित्य प्रति भोजन में से कौओं, कुत्ते व काली गाय को खिलाते रहना, यह सभी उपाय शनि कोष को कम करते हैं। इन उपायों को किसी विदृान की देख-रेख या मार्गदर्शन में करने से वांछित लाभ मिल सकता है शमशान पर जाते समय भय नहीं रखें। तंत्रोक्त धागा पहन कर भी जाने से दुष्टात्माऐं-प्रवृतियां कुछ नही कर पाती हैं।
AYUR VED (7) आयुर्वेद SROT  (स्रोत, stream, spring, source, current of water, torrent) :: The small porous srot help in absorbing nutrients and expelling carbon dioxide. These are the channels in the body which aid in transportation of nutrients, tissues and in expelling waste. Proper flow in the srot signifies proper-good health. But if there is any disturbance to the flow like blockage, deficient or excessive flow and out of channel flow is a disease state. 
Every srot has three parts to it :- 
(1). Srot Mul or root,
(2). Srot Marg or passage and
(3). Srot Munkh or opening.
Different srot in the human body along with their Mul or root :- 
Ann Vah  has its root in the esophagus.
Pran Vah has its root in the left side of the heart.
Ras Vah has its root in the right side of the heart and the vessels.
Ambhu Vah has its root in the pancreas.
Rakt Vah has its root in the liver and spleen.
Mams Vah has its root in the skin.
Med Vah has its root in the fat tissue.
Asthi Vah has its root in the skeletal system.
Majja Vah has its root in the brain.
Shukr Vah has its root in the testicles and nipples.
Artav Vah has its root in the ovaries and aereola of the nipples.
Rajah Vah has its root in the ovaries and womb.
Mano Vah has its root in the heart.
Swed Vah has its root in the sweat glands.
Mutr Vah has its root in the kidneys.
Purish Vah has its root in the rectum.
Stany Vah has its root in the lactation glands.
14 main Srot are there. The first three, are in charge of intake in to the system (Pran, Ann-food, Ambu-Udak-liquids), the next seven are corresponding to the seven tissues (Ras, Rakt, Maans, Med, Asthi, Majja, Shukr, रस, रक्त, माँस, मैदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र), the last three are in charge of outtake from the system (Swed-sweat, Purish-faeces, Mutr-urine, पसीना, मल, मूत्र), the last one is in charge of the mental system (Manas-mind, मस्तिष्क). In the female two more systems, Artav (menopause, मासिक धर्म) and Stan (स्तन), are present which are in charge of menstrual fluid and breast milk respectively.
SHUKR VAH SROT (शुक्र वाहिनी स्रोत) ::  The channel carrying nutrients to the male reproductive tissue (sperm) is called Shukr Vah Srot. Shukr Vah Srot makes it essential to examine sperm formation, proper functioning of testicles, erection o penis and the mental state of the diseased. By treating this channel ailments related to infertility etc. are cured.  
Mul, मूल :- Testicles.
Marg, मार्ग :- Vas deferens, epididymis, prostate, urethra and the urogenital tract.
Munkh, मुँख :- Urethral opening.
Sub-dosh related to these srotmasi are :- Kledak Kaph, Avalambak Kaph, Pran Vat, (प्राण वात-वायु), Apan Vat (अपान वात-वायु) and Oj (ओज).
Ayur Ved says that copulating is for reproduction &  pleasure. Over-indulgence in sex wastes too much Oj-(ओज, energy) leading to poor health. After sex, one should not go straight to the shower and let Oj which left the body through the sweat be reabsorbed.
(1.1). REASONS FOR SPERM-SHUKR RELATED PROBLEMS :: 
(1.1.1). Stress :- Leads to impotency in men and unwillingness to copulate in women.
(1.1.2). Malnutrition or excessive eating.
(1.1.3). Copulating during the wrong times of the day.
(1.1.4). Overindulgence in sex.
(1.1.5). Physical Injury.
(1.1.6). Mental trauma. (Such as rape etc.)
(1.1.7). Stopping ejaculation. (one of the things which are forbidden in Ayur Ved)
(1.1.8). Usage of drugs.
(1.1.9). Violent sex activity.
(1.1.10). Extra meditating.
(1.2). SYMPTOMS OF SPERM-SHUKR RELATED PROBLEMS ::
(1.2.1). Impotency and sexual weakness, due to fear, anxiety, stress.
(1.2.2). Infertility.
(1.2.3). Lack of sexual urge.
(1.2.4). Low Oj (ओज-तेज़-शुक्राणुओं  होना).
(1.2.5). Immature-painful ejaculation.
(1.2.6). Obesity (related to low Libido)
(1.2.7). Sperm in urine.
(1.2.8). Blood in sperm.
(1.2.9). Enlarged prostate.
(1.2.10). Fear regarding sex.
(1.3). DISEASES RELATED TO SPERMS-SHUKR :: 
(1.3.1).Sexual diseases. (gonorrhea, syphilis, genital herpes)
(1.3.2). AIDS (Anti immuno deficiency syndrome).
(1.3.3). Inflammation of the genitals.
(1.3.4). Problems with the prostate. (Enlargement, inflammation, tumour etc.)
(1.3.5). Infertility.
(2.1). REASONS FOR  OVUM-MENOPAUSE ELATED PROBLEMS :: To check on Artav Vah Srot, Stan (स्तन, teats-mammary gland of a female, nipples, lactation) and Rajah (menstruation) should be examined. Remember Stan and Raj (रजस्वला, ऱज-मासिक धर्म), menopause) are both the byproducts of ovum disintegration.
The channel carrying nutrients to the female reproductive tissue (ova) is called Artav Vahni Srot.
Mul, मूल :- Ovaries and areola of the nipples.
Marg, मार्ग :- Fallopian tubes, uterus, cervical canal and Yoni (vaginal passage).
Munkh, मुँख :- Yoni Oshth (ओष्ठ अथवा होंठ, the labia-the inner and outer folds of the vulva, at either side of the vagina)
(2.1.1). Relations state.
(2.1.2). Copulating in wrong times.
(2.1.3). Over indulgence in sex.
(2.1.4). Genetics.
(2.1.5). Stress and worries.
(2.1.6). Sexual diseases.
(2.1.7). Anaemia.
(2.1.8). Under or over weight.
(2.1.9). Abortions (whether natural or not).
(2.2). SYMPTOMS OF  OVUM-MENOPAUSE ELATED PROBLEMS :: 
(2.2.1). PMS.
(2.2.2). Painful menstruation.
(2.2.3). Enlarged or painful breasts.
(2.2.4). Fibrocystic changes in ovaries or breasts.
(2.2.5). Low libido.
(2.2.6). Blocked Fallopian tubes.
(2.2.7). Extra excretions.
(2.2.8). Dryness of vagina.
(2.3). MENOPAUSE-OVUM RELATED DISEASES-ARTAV ::
(2.3.1). Sex diseases.
(2.3.2). Vaginitis.
(2.3.3). Endometriosis.
(2.3.4). Abortions which occur again and again.
(2.3.5). Painful penetration.
(2.3.6). Infertility.
(2.3.7). Blockage of Fallopian tubes.
(2.3.8). Uterine prolapse.
(2.3.9). Inflammation or swollen cervix. (cancer of cervix also)
A 13-14 years old girl not yet started menstruating, is a  matter of worry for parents.
AMENORRHOEA :: When a woman miss her period, it leads to anxiety, several questions arise in her mind are :: Why ? How ? What happen to my body ? It is of following two types.
Primary :- The woman never had her menstrual cycle.
Secondary :- Sudden cessation of menstrual cycle. 
Anartav is the condition of non appearance of Artav i.e., Primary Amenorrhoea. Nasht Artav is a condition of destruction of Artav, which resembles secondary amenorrhoea.
Causes of Amenorrhoea (Nasht Artav) :: The aggravated Vat and Kaph obstruct the passage of channels carrying Artav (Artav Vah Srot), destroying it. Though, Artav is not finished completely, yet it is not discharged monthly.
Primary Amenorrhoea is caused by :: 
(1). Imperforate hymen, 
(2). A genesis of the uterus and upper 2/3 of the vagina,
(3). Turner's syndrome and
(4). Constitutional delay.
Secondary amenorrhoea is caused due to :: Pregnancy, Breast-feeding an infant, Discontinuing use of birth-control pills, Emotional stress or psychological disorder, Surgical removal of the ovaries or uterus, Disorder of the endocrine system, including the pituitary, hypothalamus, thyroid, parathyroid, adrenal and ovarian glands, Diabetes mellitus, Tuberculosis, Obesity, anorexia nervosa or bulimia, Strenuous program of physical exercise, such as long-distance running, Poly-cystic ovarian disease (POD), Stein-Leventhal syndrome, Chemotherapy, Pelvic irradiation, Endometrial ablation, Drug therapy-steroids, danazol, anti-psychotics etc.
Premature ovarian failure, diet for Amenorrhoea (Nasht Artav) :- Garlic (लहसुन, lahsun) is very beneficial in Nasht Artav. Decoction of black Til-sesame, mixed with jaggery induces mensuration, Fish, Kulattha, Sour substance (Kanji), Butter milk mixed with half water, Curd, Gaomutr (गौमूत्र, Cow’s urine), Wine, Food capable of increasing Pitt is beneficial.
Herbal Treatment of Amenorrhoea (Nasht Artav-absence or suppression of normal menstrual flow, ऋतुरोध, मासिकधर्म (स्त्रियो का) बन्द होना) ::
(1). Herbs :- Ulatkambal Beej, Gajar Beej, Kumari, Sounth, Krishan til, Jatamansi, Shatavari, Dash Mool, Haritaki, Ashok, Hing.
(2). Preparations :- Kasis (कसिस), Tankan (टंकण ), Gulkand (गुलकंद).
(3). The use of Basti (Uterine instillations) are beneficial.
Each and every patient is an individual entity and the treatment also differs from patient to patient. Rog Nidan (detection of disease, रोग निदान) has its different parameters. Prakrati (प्रकृति, nature) Parikshan (identification, judgement, परीक्षण), Saar (सार, conclusion), Sahan Shakti (सहन-प्रतिरोध शक्ति, immunity, resistance power, tolerance, compactness), Vyayam (व्यायाम, Exercise), Agni (Digestion) all these parameters are  studied by an Ayur Vaedist (वैद्य, चिकित्सक). An Ayur Vaedist makes a clear picture of the individual by understanding a patient as a whole and also  decides what kind of mode of preparation to be used for the patient. Panch Kashay Kalp, (पञ्च कषाय कल्प), RAS (रस, Juice), CHURN (चूर्ण, powder), KALK (कल्क),  PHANT, (फॉण्ट)  is based on this principle.
AYURVED BASICS आयुर्वेद के मूल सिद्धांत  :: अग्निचयन आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है। शरीर, इन्द्रिय सत्व और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है।
आयुर्वेद में आयु के हित (-पथ्य, आहार, विहार), अहित (-हानिकर, आहार, विहार), रोग का निदान और व्याधियों की चिकित्सा कही गई है। हित आहार, सेवन एवं अहित आहार त्याग करने से मनुष्य पूर्ण रुप से स्वस्थ रह सकता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के चरम लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। पुरुषार्थ चतुष्टयं की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है अतः उसकी सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए आयुर्वेद कहता है कि धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है। अतः मनुष्य को हर तरीके से शरीर की रक्षा करना चाहिए।
भाव प्रकाश में कहा गया है कि जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान, हित और अहित आहार विहार का ज्ञान, व्याधि निदान तथा शमन का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उसको आयुर्वेद कहते हैं। 
आयुर्वेद का उद्देश्य :: आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं रोगी हो जाने पर उसके विकार का प्रशमन करना है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ शरीर से ही सम्भव है। अतः आत्मा के शुद्धिकरण के साथ शरीर की शुद्धि व उत्तम स्वास्थ्य भी जरूरी है।
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ :: चरक संहिता-चरक, सुश्रुत संहिता-सुश्रुत, अष्टांग हृदय-वाग्भट्ट, वंगसेन-वंगसेन, माधव निदान-माधवाचार्य, भाव प्रकाश-भाव मिश्र
इन ग्रन्थों के अतिरिक्त वैद्य विनोद, वैद्य मनोत्सव, भैषज्य रत्नावली, वैद्य जीवन आदि अन्य वैद्यकीय ग्रन्थ हैं। वैद्य जीवन के रचयिता पंडितवर लोलिम्बराज हैं। उनके इस ग्रन्थ को अतीत में एवं आधुनिक काल में अधिक श्रद्धा के साथ वैद्यों ने अपनाया है।
आयुर्वेद अवतरण :: इसकी उत्त्पत्ति ब्रह्मा जी से है, जिन्होंने ब्रह्मसंहिता की रचना की थी। ब्रह्मसंहिता में दस लाख श्लोक तथा एक हजार अध्याय हैं। आयुर्वेद का वर्णन सभी चारों वेदों में किया गया है। अथर्ववेद में इसकी गहन व्यख्या-वर्णन है। आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है। ऋग्वेद में आयुर्वेद को उपवेद की संज्ञा दी गयी है। महाभारत में भी आयुर्वेद को उपवेद कहा गया है। पुराणों में भी आयुर्वेद का वृहद-विस्तृत वर्णन है। आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा गया है।  
चरक संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी नें आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान दोनों अश्विनी कुमार को दिया, अश्वनी कुमारों ने यह ज्ञान इन्द्र को दिया, इन्द्र ने यह ज्ञान भरद्वाज को दिया, भरद्वाज ने यह ज्ञान आत्रेय पुनर्वसु को दिया, आत्रेय पुनर्वसु ने यह ज्ञान अग्निवेश, जतूकर्ण, भेल, पराशर, हरीत, क्षारपाणि को दिया ।
सुश्रुत संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति को दिया, दक्ष प्रजापति नें यह ज्ञान अश्वनी कुमारों को दिया, अश्वनीकुमारों से यह ज्ञान धन्वन्तरि को दिया, धन्वन्तरि ने यह ज्ञान औपधेनव, वैतरण, औरभ, पौष्कलावत पौष्‍कलावत, करवीर्य, गोपुर रक्षित और सुश्रुत को दिया। कश्यप संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का ज्ञान अश्वनीकुमारों को दिया और अश्वनीकुमारों ने यह ज्ञान इन्द्र को दिया और इन्द्र ने यह ज्ञान कश्यप, वशिष्ठ, अत्रि, भृगु आदि को दिया।अत्रि ने यह ज्ञान अपने एक पुत्र और अन्य शिष्यों को दिया। सृष्टि के प्रणेता ब्रह्मा जी के द्वारा एक लाख सूत्रों में आयुर्वेद का वर्णन किया गया और इस ज्ञान को दक्ष प्रजापति द्वारा ग्रहण किया गया तत्पश्चात् दक्ष प्रजापति से यह ज्ञान सूर्यपुत्र अश्विन कुमारों को और अश्विन कुमारों से स्वर्गाधिपति इन्द्र को प्राप्त हुआ। इन्द्र के द्वारा यह ज्ञान पुनर्वसु आत्रेय को यह प्राप्त हुआ। शल्य शास्त्र के रुप में यह ज्ञान आदि धन्वन्तरि को प्राप्त हुआ और स्त्री एवं बाल चिकित्सा के रुप में यह ज्ञान इन्द्र से महर्षि कश्यप को दिया गया। चिकित्सा कार्य को करने के लिए स्वर्गाधिपति इन्द्र की अनुमति आवश्यक थी। चरक संहिता को कश्मीर के आयुर्वेदज्ञ दृढ़बल नें पुर्नसंगृहित किया। इस समय के प्रसिद्ध आयुर्वेदज्ञों में मत्त, मांडव्य, भास्कर, सुरसेन, रत्नकोष , शम्भु, सात्विक, गोमुख, नरवाहन, इन्द्रद, काम्बली, व्याडि आदि रहे हैं।
महात्मा बुद्ध के समय में आयुर्वेद विज्ञान नें सबसे अधिक प्रगति रस चिकित्सा विज्ञान और रस विद्या में किया है।रस विद्या तीन भागों :: (1). धातु विद्या (2). रस चिकित्‍सा (3). क्षेम विद्या, में विभाजित हुई।
शल्य विद्या पर प्रतिबन्ध :: कलिंग विजय के पश्‍चात सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर अपनें राज्य में रक्तपात और रक्तपात से संबंधित समस्त कार्यकलापों पर पूर्ण प्रतिबन्ध  लागु कर दिया।
रसौषधियों के बल पर साध्य, कष्ट साध्य और असाध्य रोंगों की चिकित्सा विधियों का विकास हुआ। नागार्जुन तृतीय ने रस विद्या के उत्थान में बहुत योगदान किया। आठ नागार्जुन हुये हैं और आयुर्वेद रस-चिकित्सा विज्ञान के उत्थान और शोध में इन सभी का अमूल्य योगदान रहा।
(1). गुण :: जिन लक्षणों से पद्धार्थ का अनुमान हो उन्हें गुण कहते हैं । शब्द (Sound), स्पर्श (Touch, Contact), रूप (Form), रस (Extract, Juice), गंध (Smell), गुरु (भारी, Heavy), लघु (हल्का, Light), शीत (ठंडा, Cold), उष्ण (गर्म, Hot), स्निग्ध (चिकना, Oily), रूक्ष (रूखा, Mangy), मन्द (धीमा, Slow), तीक्ष्ण (तेज, Fast), स्थिर (Stable) , सर (Unstable), मृदु (कोमल, Soft), कठिन (Hard), विशद (भुरभुरा, Brittle), पिच्छिल (चिपचिपा), श्लक्ष्ण (Smooth), खर (Rough), सूक्ष्म (Micro), स्थूल (Macro), सान्द्र (Humid), द्रव (Liquid); ये गुण हैं ।
(2). पंचमहाभूत :: आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी की संज्ञा पंचमहाभूत है। प्रकृति में जो कुछ पद्धार्थ आदि पाया जाता है, वह इन्हीं पांच तत्वों से बना है ।
(2.1). आकाश का मुख्य गुण ‘शब्द’ है तथा शरीर में कर्णेन्द्रीय (कान) आकाश की ही अभिव्यक्ति है। जिन पद्धार्थों में मृदु, लघु, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, शब्द गुण बहुतायत से हों, उन्हें आकाशीय द्रव्य जानें।
(2.2).  वायु की उत्पत्ति आकाश से होती है अतः एव् इसमें आकाश के गुण भी पाये जाते हैं। वायु का मुख्य गुण ‘स्पर्श’ है तथा शरीरस्थ त्वगेन्द्रीय (त्वचा) वायु की ही अभिव्यक्ति है। जिन पद्धार्थों में लघु, सूक्ष्म, शीत, रूक्ष, खर, विशद, स्पर्श गुण बहुतायत से हों, उन्हें, वायव्य द्रव्य जानें।
(2.3).  अग्नि की उत्पत्ति वायु से होती है, अतःएव् इसमें वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं । अग्नि का मुख्य गुण ‘रूप’ है तथा शरीरस्थ नेत्रेन्द्रीय (आंख) अग्नि की ही अभिव्यक्ति है। जिन पद्धार्थों में लघु, सूक्ष्म, उष्ण, रूक्ष, विशद, रूप गुण बहुतायत से हों, उन्हें आग्नेय द्रव्य जानें।
(2.4).  जल की उत्पत्ति अग्नि से होती है अतःएव् इसमें अग्नि, वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं। जल का मुख्य गुण ‘रस’ है तथा शरीरस्थ जिह्वा (जीभ) जल की ही अभिव्यक्ति है। जिन पद्धार्थों में द्रव, स्निग्ध, शीत, मन्द, मृदु, पिच्छिल, रस गुण बहुतायत से हों, उन्हें आप्य (जलीय) द्रव्य जानें।
(2.5).  पृथ्वी की उत्पत्ति जल से होती है, अतः एव् इसमें जल, अग्नि, वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं। पृथ्वी का मुख्य गुण ‘गंध’ है तथा शरीरस्थ घ्राण (नाक) पृथ्वी की ही अभिव्यक्ति है। जिन पद्धार्थों में गुरू, खर, कठिन, मन्द, स्थिर, विशद, सान्द्र, स्थूल, गंध गुण बहुतायत से हों, उन्हें पार्थिव द्रव्य जानें।
मनुष्य जिस प्रकार के गुणों वाले पद्धार्थ का भोजन, मालिश आदि में प्रयोग करता है, वैसे ही गुणों की शरीर में वृद्धि होती है।
(3). दोष :: वात, पित्त तथा कफ; ये तीन ही दोष हैं। इनकी साम्यावस्था का नाम ही आरोग्य है। इन तीनों को समावस्था में रखना ही चिकित्सा शास्त्र का प्रयोजन है। बढ़े हुये दोषों को क्षीण करना तथा क्षीण हुये दोषों को बढ़ाना चाहिये। इन तीनों दोषों में वात ही प्रधान दोष है। सामान्यतः वात के कुपित रहते हुये पित्त व कफ को शांत करना सरल नहीं होता। वात के शांत होने पर पित्त व कफ को सरलता से शाँत किया जा सकता है।
(3.1). वात :: रूक्ष, शीत, लघु, सूक्ष्म, चल, विशद, खर; ये वात के मुख्य गुण हैं। ऐसे ही गुणों वाले आहार (व कर्म) से वात कुपित होता है तथा विपरीत गुणों (स्निग्ध, उष्ण, गुरु, स्थूल, मृदु, पिच्छिल, श्लक्ष्ण) वाले द्रव्यों (व कर्म) से शाँत होता है।
(3.2). पित्त :: स्नेह युक्त, उष्ण, तीक्ष्ण, द्रव्य, अम्ल (खट्टा) रस , सर, कटु (कड़वा) रस ; ये पित्त के मुख्य गुण हैं । ऐसे ही गुणों वाले आहार (व कर्म) से पित्त कुपित होता है तथा विपरीत गुणों (स्निग्ध, शीत, मृदु, सान्द्र, कषाय (कसैला) रस, तिक्त (तीखा) रस, मधुर रस ) वाले द्रव्यों (व कर्म) से शाँत होता है।
(3.3). कफ :: गुरु, शीत, मृदु, स्निग्ध, मधुर रस, स्थिर, पिच्छिल; ये श्लेष्मा अर्थात कफ के मुख्य गुण हैं। ऐसे ही गुणों वाले आहार (व कर्म) से कफ कुपित होता है तथा विपरीत गुणों वाले द्रव्यों (व कर्म) से शाँत होता है।उपरोक्त दोषों के वर्णन में कुछ रसों (मधुर, अम्ल आदि) का उल्लेख किया गया है।
(4). रस :: जिह्वा के ग्राह्य विषय का नाम ही रस है। रस छः हैं :– (4.1). मधुर :- यह पद्धार्थ में पृथ्वी व जल की अधिकता से बनता है। (4.2). अम्ल (खट्टा) :- यह जल व अग्नि की अधिकता से बनता है। (4.3). लवण (नमकीन) :– यह पृथ्वी व अग्नि की अधिकता से बनता है।  (4.4).  कटु (कड़वा, नीम, गिलोय आदि) :– यह अग्नि व वायु की अधिकता से बनता है। (4.5).  तिक्त (तीखा, हरी मिर्च आदि) :– यह वायु व आकाश की अधिकता से बनता है। (4.6).  कषाय (कसैला, आंवला, बहेड़ा आदि) :– यह पृथ्वी व वायु की अधिकता से बनता है।
दोषों के ऊपर रसों का प्रभाव ::  मधुर, अम्ल व लवण, ये तीन रस वात-नाशक हैं तथा कटु, तिक्त व कषाय, ये तीन रस वात-कारक हैं। मधुर, तिक्त व कषाय, ये तीन रस पित्त-नाशक हैं तथा कटु, अम्ल व लवण, ये तीन रस पित्त-कारक हैं। कटु, तिक्त व कषाय, ये तीन रस कफ-नाशक हैं तथा मधुर, अम्ल व लवण, ये तीन रस कफ-कारक हैं।
(5). आहार की मात्रा :: ऊपर्युक्त विवरण से ऐसा आभास हो सकता है कि किसी बढ़े हुये दोष के निवारण के लिये उस दोष का नाश करने वाले आहार या द्रव्य का भरपेट सेवन किया जा सकता है ? इस तरह की धारणा गलत है क्योंकि आहार मात्रा अग्निबल की अपेक्षा रखती है।
अग्निबल का तात्पर्य उस मात्रा से है जिसे शरीर सुगमता से पचा सके। सामान्यतः तृप्ति से ही अग्निबल का अनुमान लगाया जाता है और तृप्ति से अधिक खाना ही अधिकांश रोगों का कारण है। अग्निबल कम है तो मात्रा भी कम होगी, अग्निबल अधिक है तो मात्रा भी अपेक्षतया अधिक होगी। मात्रा से कम खाने से केवल एक रोग होता है जिसे उदावर्त कहते हैं। यह भी कष्ट साध्य होता है।
लेकिन आहार मात्रा केवल अग्नि बल की अपेक्षा नहीं रखती प्रत्युत द्रव्य की भी अपेक्षा रखती है। इसीलिये आहार को मुख्य रूप से दो प्रकार के भागों में विभक्त किया गया है –
(5.1). लघु द्रव्य :: ये हल्के और सुपाच्य होते हैं। इनमें अग्नि व वायु का अंश अधिक होता है। लघु द्रव्यों को यद्यपि भर पेट खा सकते हैं, तो भी लघु द्रव्यों से अति तृप्ति नहीं करनी चाहिये। मूंग, सांठी के चावल, लाल चावल, सैंधा नमक, आंवला, जौ, दूध, घी, शहद। यद्यपि इन में कुछ द्रव्य गुरु हैं तो भी इनका निरंतर उपयोग कर सकते हैं। उचित मात्रा में खाये जाने के उपरांत भी लघु द्रव्य अल्प दोषकारक होते हैं, क्योंकि उनमें अग्नि व वायु अधिक होने से वे अग्निगुण के विरोधी नहीं होते। लघु द्रव्यों का पाक शीघ्र होता है।
(5.2). गुरु द्रव्य :: ये बादि कारक हैं, इनमें पृथ्वी व जल का अंश अधिक होता है। गुरु द्रव्यों का पाक देर से होता है और लघु द्रव्यों का पाक शीघ्र होता है। गुरु द्रव्यों के अल्प मात्रा में सेवन से लघुता तथा लघु द्रव्यों के अति मात्रा में सेवन से गुरुता हो जाती है। गुरु द्रव्यों की तृप्ति के चार भागों में से केवल तीन या दो भागों का सेवन करना चाहिये। गुरु द्रव्य को भरपेट न खाना चाहिये। उचित मात्रा में खाये जाने के उपरांत भी गुरु द्रव्य अधिक दोषकारक होते हैं, क्योंकि उनमें पृथ्वी व जल अधिक होने से वे अग्निगुण के विरोधी होते हैं। 
पीठी या चावलों के आटे से बने पद्धार्थ, गुड़ खांड आदि ईख के रस से बने पद्धार्थ, रबड़ी खोआ आदि दूध से बने पद्धार्थ, उड़द, नवीन चावल, कमल नाल, भिस, भें, दही, जवी (Oats)। इनका प्रयोग निरंतर नहीं करना चाहिये तथा इनका सेवन भोजन से पूर्व करना चाहिये भोजन के पश्चात नहीं। गुरु द्रव्यों का पाक देर से होता है  गुरु द्रव्यों के अल्प मात्रा में सेवन से लघुता तथा लघु द्रव्यों के अतिमात्रा में सेवन से गुरुता हो जाती है। गुरु द्रव्यों की तृप्ति के चार भागों में से केवल तीन या दो भागों का सेवन करना चाहिये। गुरु द्रव्य को भरपेट नहीं खाना चाहिये।
(6). भोजन :: एक दिन-रात (24 घंटे) में दो बार भोजन को उत्तम कहा गया है। पहला भोजन मध्याह्न के आस-पास व दूसरा भोजन संध्योपरांत रात्रि में। इन दोनों भोजनों में किसी एक बार ही भरपेट भोजन करे, शेष बारी में भूख से कुछ कम खाये।
आहार की उचित विधि :: शरीर की आहार नली में सबसे नीचे वात का आश्रय पक्कवाशय है। अतःएव आहार में सबसे पहले गुरु, स्निग्ध, मधुर गुण वाले द्रव्य खाने चाहिये क्योंकि ये गुण वात को शांत करते हैं। पक्कवाशय के ऊपर अग्नि स्थित है। चूंकि स्वास्थय की दृष्टि से अग्नि को स्थिर या बढ़ाना आवश्यक है।
अतः एव तदनोपरांत उष्ण, अम्ल, लवण गुण वाले द्रव्य खाने चाहिये क्योंकि ये गुण अग्नि की वृद्धि करते हैं। अग्नि के ऊपर आमाशय में पित्त स्थित है। अतःएव तदनोपरांत कषाय व तिक्त रस वाले द्रव्य खाने चाहिये क्योंकि ये गुण पित्त को शाँत करते हैं। पित्त के ऊपर कफ का स्थान है। चूंकि पित्त को शांत करने वाले कषाय व तिक्त रस वाले द्रव्य कफ को भी शाँत करते तथापि कफ की विशेष शांति के लिये आहार के अंत में कटु रस का प्रयोग किया जा सकता है।
जल पान-नाश्ता विधि  :: भोजन के पहले जल पीने से धातुऔं का ह्रास होता है। भोजन के मध्य में थोडा सा जल औषध रूप हो जाता है। भोजन के अंत में जल पीना दोषकारक है। आहार के जीर्ण हो जाने पर जलपान अमृत तुल्य हो जाता है। अगर भूख अधिक लगती हो और उपर्युक्त विधि का पालन कठिन मालुम पड़ता हो तो इस विधि में प्रातः नाश्ता या सांयः नाश्ता अथवा दोनों समय का नाश्ता शामिल कर सकते हैं। प्रातः नाश्ते का समय मध्याह्न भोजन से कम से कम एक प्रहर (3 घंटे) पहले होना चाहिये और सांयः नाश्ते का समय रात्रि भोजन से कम से कम एक प्रहर (3 घंटे) पहले होना चाहिये। प्रातः नाश्ता विशेषतः चिकनाई रहित, लघु व मात्रा में अल्प होना चाहिये। प्रातः नाश्ते में परांठा, पूड़ी, जलेबी, दही आदि गुरु द्रव्यों का निषेध है।
(6). मसाले ::  भारतीय रसोई में प्रयुक्त होने वाले मसाले हैं :– हींग, जीरा, धनिया, पोदीना, काली मिर्च, अजवायन, तेजपत्र, लौंग, जायफल, जावित्रि, केसर, सौंठ, पिप्पली, राई, मेथी, हल्दी, लहसुन, कढ़ीपत्ता, बड़ी इलायची आदि  । इन सभी में अग्नि का अंश अधिक होने के कारण ये आग्नेय द्रव्य कहलाते हैं ।
मनुष्य का स्वास्थय कायाग्नि के आश्रित है जबकि प्राकृत रूप से प्राप्त आहार द्रव्य दाल, सब्जी, गेहूं, चावल आदि पृथ्वी व जल प्रधान तत्वों से बना होता है जिन से अग्नि का विरोध होता है । इसी विरोध को कम करने के लिये आहार का संस्कार उपर्युक्त आग्नेय द्रव्यों द्वारा किया जाता है ताकि कायाग्नि पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।अग्निचयन आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है। शरीर, इन्द्रिय सत्व और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है।
CLEANSING ACTION FOR THE BODY शरीर-शोधन ::
शरीर-शोधन : मानव शरीर पित्त, वात और कफ़ से प्रभावित होकर अन्यानेक दोषों बीमारियों को जन्म देता है। 
आयुर्वेद में शरीर-शोधन के लिए छ: क्रियाओं : धौति, वस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति का प्रावधान है।
धौति के 3 प्रकार हैं वारि धौति, ब्रह्म दातौन और वास धौति।
Photo: वारि-धौति अर्थात् कॄञ्जर कर्म :– खाली पेट लवण-मिश्रित गुनगुना पानी पीकर छाती हिलाकर वमन की तरह निकाल दिया जाता है। इसको गजकरणी भी कहते है, क्योंकि जैसे हाथी सूंड से जल खींचकर फेंकता है उसी प्रकार इसमे जल पीकर निकाला जाता है। आरम्भ में पानी का निकालना कठिन होता है। तालु से ऊपर छोटी जिह्वा को सीधे हाथ की दो अंगुलियों से दबाने से पानी निकलने लगता है।
ब्रह्मदातौन :– सूत की बनी हुई बारीक रस्सी के टुकड़े को अथवा रबर की ट्यूब को लवण ‍मिश्रित गुनगुने पानी को खाली पेट पीने के पश्चात बिना दांत लगाये गले से दूध के घूंट के सदृश निगला जाता है, फिर छाती हिलाकर उसको निकाल सारे पानी को वमन के सदृश निकाल दिया जाता है।
वास-धौति (वस्त्र-धौति)  : धौति लगभग चार अंगुल चौड़ी, लगभग पंद्रह हाथ लंबी, बारीक मलमल जैसे कपडे की बनी होती है। खाली पेट पानी अथवा आरम्भ मे दूध मे भीगी हुई धौति के एक सिरे को अंगुली से हलक मे ले जाकर बिना दांत लगाये शनै:-शनै: दूध के घूंट के सदृश निगला जाता है। आरम्भ मे निगलना कठिन होता है और उल्टी अती है, इसलिए एक घूंट गुनगुने पानी के साथ निगली जाती है। प्रथम दिन एक साथ नहीं निगली जा सकती है। शनै:-शनै: अभ्यास बढाया जाता है। सब धौति निगलने के पश्चात कुछ अंश मुंह के बाहर रखना पडता है। इसके बाद नौली को चालन करके धौति तथा सब पिये हुए पानी को अमन के सदृश निकाल दिया जाता है।इन क्रियाओं से कफ और पित्त रोग दूर होकर शरीर शुद्ध और हलका हो जाता है और मन सुगमता से एकाग्र होने लगता है।
घेरण्ड-संघिता मे धौतिकर्म के चार निम्न भेद हैं :–(I) अन्त धौति, (II) दन्त-धौति, (III हृद्धौति  और (IV) मूल शोधन।
(I) अन्तधौति :– इसके भी चार भेद हैं – वात सार, वारिंसार, वह्निसार और बहिष्कृत। 
वातासर अन्तधौति :- इस क्रिया में मुख को कौए ‍की चोंच के समान करके अर्थात् दोनों ‍होठों ‍को सिकोडकर धीरे-धीरे वायु का पान किया जाता है।  पेट में वायु पूर्णतया भरने तक इसे किया जाता है और फिर वायु को पेट के अंदर चारों ओर संचालित करके धीरे-धीरे नासिका पुट के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। इसे काकी-मुद्रा और काक-प्राणायाम भी कहते है।फल :– ह्रदय, पेट और कण्ठ की व्याधियों का दूर होना, शरीर का शुद्ध और निर्मल होना, क्षुधा की वृद्धि, मन्दाग्नि का नाश, फेंफड़ों का विकास कण्ठ मे सुरीलापन होना। यह वीर्य के लिए भी लाभदायक है।
वारिंसार अन्तधौति :– इसमे मुख द्वारा धीरे-धीरे जल पी कर कण्ठ तक भर लिया जाता है। फिर उदर मे चारों ओर संचालित करके गुदामार्ग द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है।इस क्रिया को शंख-प्रक्षालन भी कहते है। क्योंकि शंख के चक्राकार मार्ग मे पानी डालने से घूमता हुआ जल जिस प्रकार बाहर आ जाता है उसी प्रकार से मुख से जल पीने पर कुछ समय पश्चात मल को साथ लेकर अंतडियों को शुद्ध करता हुआ गुदा द्वार से बाहर आ जाता है।फल :- देह का ‍निर्मल होना, कोष्ठबद्धता, तथा पेट के आमादि सब रोगों का दूर होना, तथा शरीर का शुद्ध होकर कांतिमान होना भी है।
बह्निसार अन्तधौति :– नाभि की गांठ को मेरूपृष्ठ में बार-बार लगाया जाता है। उदर को इस प्रकार बार-बार फुलाया और सिन्कोडा जाता है कि नाभि ग्रन्थि पीठ मे लग जाया करे। इससे उदर के समस्त रोग नष्ट होते ‍है और जठराग्नि प्रदीप्त होती है।
बहिष्कृत अन्तधौति :– कौए की चोंच के सदृश मुख बनाकर इतनी मात्रा मे वायु का पान किया जाता है कि पेट भर जाय, फिर उस वायु ‍को डेढ़ घंटे तक (अथवा यथाशक्ति) पेट मे धारण किये रहना पड़ता है।तत्पश्चात गुदामार्ग द्वारा बाहर निकाया जाता है। जब तक आधे पहर तक वायु को रोकने का अभ्यास न ‍हो जाये, तब तक इस क्रिया को नहीं करना चाहिए, अन्यथा वायु के कुपित होने का भय बना रहता है।फल :– इससे सब ना‍डियां शुद्ध होती है। जैसी यह क्रिया कठिन है वैसे ही इसका लाभ अकथ्य तथा अगम्य है।
(II) दन्त-धौति :– यह भी चार प्रकार ‍की होती है :–दन्तमूल, जिह्वामूल, कर्णरन्ध्र और कपालरन्ध्र। 
दन्त मूल धौति :– खैर का रस सूखी मिट्टी अथवा अन्य किसी औषधि-विशेष से दांतों की जड़ों को अच्छी प्रकार साफ किया जाता है।
जिह्वामूल धौति :– तर्जनी, मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को गलें के भीतर डालकर जीभ को जड़ तक बार-बार घिसा जाता है। इस प्रकार ‍धीरे-धीरे कफ बाहर निकल जाता है।
कर्णरन्ध्र-धौति :– तर्जनी और अनामिका अंगुलियों के योग से दोनो कानो के छिद्रों को साफ किया जाता है, इससे एक प्रकार का नाद प्रकट होता है।
कपालरन्ध्र धौति :– निद्रा से उठने पर, भोजन के अन्त में और सूर्य के अस्त होने पर सिर के गढ़े को दाहिने हाथ के अंगूठे द्वारा प्रतिदिन जल से साफ किया जाता है। इससे नाडियां स्वच्छ हो जाती है और दृष्टि दिव्य होती है।
(III) हृद्धौति :– इसके तीन भेदहैं  :– दण्ड धौति, वमन धौति, वास धौति और दण्ड धौति। 
केलेंडर के दण्ड, हल्दी के दण्ड, चिकने बेंत के दण्ड अथवा वट वृक्ष की जटा-डाढि को धीरे-धीरे ह्रदयस्थल पर  लगया जाता है। इससे पित्त, कफ, अकुलाहट आदि विकारी मल बाहर निकल जातें हैं और ह्रदय के सारे रोग नष्ट हो जाते है। इसको भोजन के पूर्व करना चाहिये।
वमन धौति :– भोजन करने के पश्चात कण्ठ तक पानी पी कर भरा जाता है और थोडी देर तक उपर की ओर लेकर उस पानी को मुख द्वारा बाहर निकाला जाता है। पानी कण्ठ के अंदर न जाने पाये इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है। इससे कफ-दोष और पित्त-दोष दूर होते है।
वास-धौति (वस्त्र-धौति) :– लगभग छ: अंगुल चौडा और लगभग अठारह हाथ का बारीक वस्त्र किंचित् उष्ण (गर्म) जल से भिगोकर गुरू के बताये हुए क्रम से पहिले दिन एक हाथ, दूसरे दिन दो ‍हाथ, तीसरे दिन तीन हाथ अथवा इससे न्यूनाधिक युक्ति पूर्वक अंदर ले जाया जाता है और फिर धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है।इसको भोजन के पहले करना चाहिये। इससे गुल्म, ज्वर, पील्हा, कुष्ठ एवं कफ-पित्त आदि अन्य विकार नष्ट होते है।
(IV) मूलशोधन (गणेश-क्रिया) :– कच्ची मूली की जड़ से अथवा तर्जनी अंगुली से यन्त्रपूर्वक सावधानी से बार-बार जल द्वारा गुदामार्ग को साफ किया जाता है। इसके पश्चात घृत या मक्खन उस स्थान पर लगाया जाता है। इससे उदर रोग का काठिन्य दूर ‍होता है। आजनित एवं अजीर्ण जनित रोग उत्पन्न नही होते और शरीर की पुष्टि और कान्ति की वृद्धि होती है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करती है। इससे सब प्रकार के अर्श-रोग तथा वीर्यदोष भी दूर होते है।
वस्ति :– वस्ति मूलाधार के समीप है। इसके साफ करने के कर्म को वस्ति कर्म कहते है। एक चिकनी नली ‍को गुदा में ले जाकर नौलि-कर्म की सहायता से गुदामार्ग द्वारा वस्ति मे जल चढाया और निकाला जाता है।
साधारणतया इस क्रिया का कठिन है। उसके स्थान पर एनिमा से काम लिया जा सकता है। इससे आंतों का मल जल के साथ मिलकर पतला हो जाता है और शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल जाता है।
सावधानी-नोट:-ये सभी क्रियाएं योग्य प्रशिक्षक के बताये अनुसार ही की जाता हैं। 

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