HINDU PHILOSOPHY (1) हिंदु दर्शन

HINDU PHILOSOPHY हिंदु दर्शन  
Concepts and Extracts in Hinduism BY Pt. Santosh Bhardwaj
santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com   hindutv.wordpress.com    bhagwatkathamrat.wordpress.com    hinduism.blog.com    jagatguru.blog.com   jagatgurusantosh.blog.com
ब्रह्मा जी के प्राकट्य के साथ उन्हें भगवान् श्री हरी विष्णु ने वेदों का उपदेश दिया। यह ज्ञान गँगा नारद आदि ऋषियों के माध्यम से एक कल्प से दूसरे कल्प, एक पीढ़ी से दुसरी पीढ़ी तक निरंतर अनवरत चलती चली आ रही है।  समय कल के अनुरूप मनीषियों ने पुराण, उपनिषद आदि की रचना जन कल्याण के लिए की। हर ग्रन्थ के भाष्य, विवेचनाएँ लिखी-की गईं। मनीषियों विद्वानों के द्वारा तत्त्वों के अन्वेषण की प्रवृत्ति तभी से चली आ रही है और विचारों में द्विविध प्रवृत्ति और द्विविध लक्ष्य के दर्शन होते हैं। प्रथम प्रवृत्ति प्रतिभा या प्रज्ञामूलक है तथा द्वितीय प्रवृत्ति तर्कमूलक है।
प्रज्ञा के बल से ही पहली प्रवृत्ति तत्त्वों के विवेचन में कृतकार्य होती है और दूसरी प्रवृत्ति तर्क के सहारे तत्त्वों के समीक्षण में समर्थ होती है। ज्ञान का उपयोग लक्ष्य निर्धारण और अर्जन-धनोपार्जन तथा ब्रह्म का साक्षात्कामोक्ष रहा है। प्रज्ञा (-बुद्धि, विवेक, ज्ञान, समझ, Intellect, Intelligence, Knowledge, Understanding, Wisdom, Prudence) मूलक और तर्क-मूलक (-logic, argument, contention) प्रवृत्तियों के परस्पर सम्मिलन से आत्मज्ञान-परमात्मतत्व, परमात्मज्ञान, तत्त्वज्ञान का आविर्भाव हुआ। उपनिषदों के ज्ञान का संतुलित उपयोग-प्रयोग आत्मा और परमात्मा के एकीकरण को सिद्ध करने वाले प्रतिभामूलक वेदान्त में हुआ।

मनीषियों ने कर्म, ज्ञान और भक्तिमय त्रिपथ का उपदेश मनुष्य के कल्याण हेतु किया ताकि उसका कल्मष दूर करके उसे पवित्र, नित्य-शुद्ध-बुद्ध और सदा स्वच्छ बनाकर उसका आध्यात्मिक विकास किया जा सके। यह पतित पावनी ज्ञान की धारा दर्शन कहलाती है। 
दर्शन ::  दर्शन का अर्थ है देखना। मनुष्य का दृष्टिकोण क्या है, कैसे है, किसलिए है, किस कारण है, क्यों है, किसके लिए है, इसके परिणाम क्या होंगे इन सब प्रश्नों का समाधान ढूँढता है दर्शन शास्त्र। इस व्यक्ति के मत, राय का निर्धारण भी करता है।  
आचार्य पाणिनी ने धात्वर्थ में प्रेक्षण शब्द का प्रयोग किया है। प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तश्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है। इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम दर्शन है। जहाँ पर इन सिद्धान्तों का संकलन हो, उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा, यथा : न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन मीमांसा दर्शन आदि-आदि।
दर्शन ग्रन्थों को दर्शन शास्त्र भी कहते हैं। यह शास्त्र शब्द शासु अनुशिष्टौ से निष्पन्न होने के कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करने के कारण ही दर्शन-शास्त्र कहलाने का अधिकारी है। दर्शन अर्थात् साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है।
भारत जगत गुरु है। संस्कृति, इतिहास इसके साक्षी हैं। दर्शन शस्त्र मानव मूल्यों का निर्धारण-संचालन करता है। यह प्रेरणा का स्त्रोत्र भी है। वैयक्तिक जीवन के सम्मार्जन और परिष्करण में यह नितान्त-अत्यावश्यक है। इसकी उपयोगिता बहु आयामी है।आध्यात्मिक पवित्रता एवं उन्नयन, बिना दर्शन-आदर्शमानकों के अभाव में असंभव है। प्रमाण और तर्क सशोधन, मनुष्य के जीवन में मार्ग दर्शन में सहायक हैं। 
"किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:" अर्थात संसार में करणीय क्या है और अकरणीय क्या है ? [श्रीमद्भगवद्गीताइस विषय में विद्वान एक मत नहीं हैं। यहाँ भी परम लक्ष्य एवं पुरुषार्थ की प्राप्ति में दर्शन सहायक है। 
दर्शन द्वारा विषयों को हम संक्षेप में दो वर्गों में रख सकते हैं। लौकिक-अपरा-भौतिक-जड़ और अलौकिक-परा-आध्यात्मिक-चेतन। यह ज्ञात से अज्ञात, जड़ से चेतन, प्रकृति से परमात्मा की ओर ले जाने में सहायक है। 
दर्शन का मूल वेद हैं। वेद धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि सभी के मूल-प्रेरणा स्रोत हैं। कोई भी धार्मिक आयोजन, अनुष्ठान, सांस्कृतिक कृत्य वेद-मंत्रों का गायन के बगैर अधूरा है। दर्शन का आधार और प्रमाण भी वेद ही हैं। वेदों में दर्शन के अतिरिक्त जीवन शैली, काव्य, चिकित्सा, ज्योतिष, काव्य, ज्ञान-विज्ञान का समावेश है। 

Comments

Popular posts from this blog

ENGLISH CONVERSATION (2) हिन्दी-अंग्रेजी बातचीत

ENGLISH CONVERSATION (3) हिन्दी-अंग्रेजी बातचीत

HINDU MARRIAGE हिन्दु-विवाह पद्धति