HINDU PHILOSOPHY (2) हिन्दु दर्शन :: षड्दर्शन (2) SIX ORGAN

 

SIX ORGANS-BRANCHES :: षड्दर्शन 
हिंदु धार्मिक अवधारण  CONCEPTIONS IN HINDUISM
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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सनातन धर्म में ब्रह्म-परमात्मा-ईश्वर-परमेश्वर को जानने के लिए कई तरह के मार्गों का उल्लेख किया गया है। वेदों का मूल है, ब्रह्म।  यह भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है, जो युग-युगान्तरों (अरबों, खरबों वर्षों से) मनुष्य के चिन्तन से उतरा और हिन्दु (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। वेदों के इन मार्गों के आधार पर ही  6 प्रकार के निम्न दर्शन-षड्दर्शन हैं :- (1). न्याय, (2). वैशेषिक, (3). साँख्य, (4). योग, (5). मीमांसा और (6). वेदांत। वेद और उपनिषद को जान-समझकर ऋषियों ने इनकी समीक्षा-दर्शन की, रचना की। ये धर्म के मार्ग दर्शक सिद्धान्त हैं। ब्रह्म दर्शन को समझकर सभी तरह के विचार, संदेह, शंकाएं मिट जाती हैं। 
वेद को श्रु‍ति ग्रंथ कहा जाता है, अर्थात जिन्होंने इसे सुना। वेद को छोड़कर सभी अन्य ग्रंथों को स्मृति ग्रंथ कहा जाता है, अर्थात सुनी हुई बातों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्मरण रखना और उसे समय तथा काल के अनुसार ढालना। श्रु‍ति ग्रंथ वेद अपरिवर्तनशील है, क्योंकि इनकी रचना मूल छंद और काव्य के रूप में इस तरह के विशेष ध्वनि शब्दों से हुई है जिसके कारण इनमें संशोधन या परिवर्तन करना असंभव है।
वैदिक ज्ञान को अच्छे तरीके से षड्दर्शन और स्मृतियों के माध्यम से समझाया गया है। वेदों का सार या कहें कि निचोड़ उपनिषद है। उपनिषदों की सँख्या 1,000 से ज्यादा है। उपनिषदों का सार और निचोड़ ‘ब्रह्मसूत्र’ है।
ब्रह्मसूत्र का भी सार और निचोड़ गीता है। सभी तरह की स्मृतियां, सूत्र, उपवेद आदि सभी वेदों को अच्छे से समझने और समझाने वाले ग्रंथ हैं। पुराण, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ इतिहास को प्रकट करते हैं। 
श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥ 
जहाँ कहीं भी वेदों और दूसरे ग्रंथों में विरोध दिखता हो, वहाँ वेद की बात ही मान्य होगी, अर्थात वेद ही प्रमाण हैं। [वेदव्यास]
Photo: षड्दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित हैं :-
(1). न्याय :- महिर्ष अक्षपाद गौतम,
(2). वैशेषिक :- महिर्ष कणाद,
(3). साँख्य :- महिर्ष कपिल,
(4). योग :- महिर्ष पतंजलि,
(5). पूर्व मीमांसा :- महिर्ष जैमिनी और
(6). वेदान्त (उत्तर मीमांसा) :- महिर्ष बादरायण।
तथा (7). चार्वाक, (8). बौद्ध, (9). जैन। इन 3 को 'अवैदिक दर्शन' (नास्तिक-दर्शन) कहा जाता है। वेद को प्रमाण मानने वाले आस्तिक और न मानने वाले नास्तिक हैं, इस दृष्टि से उपर्युक्त न्याय-वैशेषिकादि षड्दर्शन को आस्तिक और चार्वाकादि दर्शन को नास्तिक कहा गया है।
वेद ज्ञान को समझने व समझाने के लिए दो प्रयास हुए :-
(1). दर्शनशास्त्र और 
(2). ब्राह्यण और उपनिषदादि ग्रन्थ।
ब्राह्यण और उपनिषदादि ग्रन्थों में अपने-अपने विषय के आप्त ज्ञाताओं द्वारा अपने शिष्यों, श्रद्धावान व जिज्ञासु लोगों की मूल वैदिक ज्ञान को सरल भाषा में विस्तार से समझाया गया है। वेद ज्ञान को तर्क से समझाने के लिए ही ये छः दर्शन शास्त्र लिखे गये। सभी दर्शन मूल वेद ज्ञान को तर्क से सिद्ध करते है। प्रत्येक दर्शन शास्त्र का अपना-अपना विषय है। दर्शन शास्त्र सूत्र रूप में लिखे गये है। प्रत्येक दर्शन अपने लिखने का उद्देश्य अपने प्रथम सूत्र में ही लिख देता है तथा अन्त में अपने उद्देश्य की पूर्ति का सूत्र देता है। वैदिक ज्ञान की अद्वितीय पुस्तक भगवद्गीता के ज्ञान का आधार वेद, उपनिषद और दर्शन शास्त्र ही है।
एषा तेSभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रुणु। 
बुद्धया युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥ [भगवद्गीता 2.39]
हे अर्जुन! यह बुद्धि (ज्ञान) जो साँख्य के अनुसार मैंने तुझे कहा है, अब यही बुध्दि मैं तुझे योग के अनुसार कहुँगा, जिसके ज्ञान से तू कर्म-बन्धन को नष्ट कर सकेगा।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविषै: पृथक्। ब्रह्यसूत्रपवैश्चैव हेतुमदिभर्विनिधैश्चितै:॥ [भगवद्गीता 13.4]
इस क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मतत्वों) के विषय में ऋषियों ने वेदों ने विविध भाँति से समझाया है। (इन्ही के विषय) में ब्रह्यसूत्रों में पृथक्-पृथक् (शरीर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में) युक्तियुक्त ढंग से (तर्क से) कथन किया है।
(2.1). पूर्व मीमांसा :: पाणिनि के अनुसार मीमांसा शब्द का अर्थ जिज्ञासा है। जिज्ञासा अर्थात् जानने की लालसा।
अत: पूर्व-मीमांसा शब्द का अर्थ है जानने की प्रथम जिज्ञासा। इसके सोलह अध्याय हैं। 
मनुष्य जब इस संसार में अवतरित हुआ उसकी प्रथम जिज्ञासा यही रही थी कि वह क्या करे ? अतएव इस दर्शनशास्त्र का प्रथम सूत्र मनुष्य की इस इच्छा का प्रतीक है।
इस दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष जैमिनी है। इस ग्रन्थ में 12 अध्याय, 60 पाद और 2,631सूत्र है।
ग्रन्थ का आरम्भ ही महिर्ष जैमिनि इस प्रकार करते है :-
अधातो धर्मजिज्ञासा॥ 
अब धर्म करणीय कर्म के जानने की जिज्ञासा है। इस जिज्ञासा का उत्तर देने के लिए यह पूर्ण 16 अध्याय वाला ग्रन्थ रचा गया है। धर्म एक विस्तृत अर्थवाला शब्द है। अत: इसके विषय में 16 अध्याय और 64 पादोंवाला ग्रन्थ लिखना उचित ही था।
धर्म की व्याख्या यजुर्वेद में की गयी है। वेद के प्रारम्भ में ही यज्ञ की महिमा का वर्णन है। वैदिक परिपाटी में यज्ञ का अर्थ देव-यज्ञ ही नहीं है, वरन् इसमें मनुष्य के प्रत्येक प्रकार के कार्यों-कर्म का समावेश हो जाता है।
शास्त्रोक्त प्रत्येक कार्य-कर्म यज्ञ ही है। सभी प्रकार के कर्मों की व्याख्या इस दर्शन शास्त्र में है।
ज्ञान उपलब्धि के जिन छह साधनों की चर्चा इसमें की गई है, वे है-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद अपौरूषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है और वेद-प्रतिपादित अर्थ को ही धर्म कहा गया है।
मीमांसा सिद्धान्त में वक्तव्य के दो विभाग हैं :: पहला है, अपरिहार्य विधि जिसमें उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग और अधिकार विधियां शामिल है। दूसरा विभाग है, अर्थवाद जिसमें स्तुति और व्याख्या की प्रधानता है।
(2.2). ब्रह्यसूत्र (उत्तर मीमांसा) :: जब मनुष्य जीवन-यापन करने लगता है तो उसके मन में दूसरी जिज्ञासा जो उठती है, वह है ब्रह्य-जिज्ञासा। ब्रह्यसूत्र का प्रथम सूत्र ही है :-
अथातो ब्रह्यजिज्ञासा॥ 
अर्थात ब्रह्म को  जानने की लालसा-इच्छा-जिज्ञासा।
इस जिज्ञासा का चित्रण श्वेताश्वर उपनिषद् में बहुत बहुत भली-भाँति किया गया है। उपनिषद् का प्रथम मंत्र है-
ब्रह्यवादिनो वदन्ति :-
किं कारणं ब्रह्य कुत: स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा:।
अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्यविदो व्यवस्थाम्॥ 
अर्थात ब्रह्म का वर्णन करने वाले कहते हैं,  इस (जगत्) का कारण क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए हैं ? कहाँ स्थित और कैसे स्थित हैं ? यह सुख-दु:ख क्यों होता है ? ब्रह्म की जिज्ञासा करने वाला यह जानने चाहते हैं कि जो उत्पन्न हुआ है वह सब क्या है, क्यों हैं, कैसे है ? इत्यादि।
पहली जिज्ञासा कर्म धर्म की जिज्ञासा थी और दूसरी जिज्ञासा जगत् का मूल कारण जानने ज्ञान की थी।
इस दूसरी जिज्ञासा का उत्तर ही ब्रह्म सूत्र अर्थात् उत्तर मीमांसा है। चूँकि यह दर्शन वेद के परम ओर अन्तिम तात्पर्य का दिग्दर्शन कराता है, इसलिए इसे वेदान्त दर्शन के नाम से ही जाना जाता हैं
वेदस्य अन्त: अन्तिमो भाग ति वेदान्त:॥  
यह वेद के अन्तिम ध्येय ओर कार्य क्षेत्र की शिक्षा देता है।
ब्रह्मसूत्र के प्रवर्तक महिर्ष बादरायण है। इस दर्शन में चार अध्याय, प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद (कुल 16 पाद) और सूत्रों की संख्या 555 है।
तीन ब्रह्म अर्थात् मूल पदार्थ हैं :- प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा और तीनों ही अनादि है। इनका आदि-अन्त नहीं। तीनों ब्रह्म कहलाते हैं और जिसमें ये तीनों विद्यमान हैं, अर्थात् जगत् वह परम ब्रह्म है। प्रकृति जो जगत् का उपादान कारण है, परमाणुरूप है जो त्रिट (तीन शक्तियो-सत्व, राजस् और तमस् का संयोग) है। इन तीनों अनादि पदार्थों का वर्णन ब्रह्यसूत्र (उत्तर मीमांसा) में है। जीवात्मा का वर्णन करते हुए इसके जन्म-मरण के बन्धन में आने का वर्णन भी ब्रह्यसूत्र में है। साथ ही मरण-जन्म से छुटकारा पाने का भी वर्णन है। परमात्मा जो अपने शब्द रूप में तत्वों से संयुक्त होकर भासता है, परन्तु उसका अपना शुद्ध रूप नेति-नेति शब्दों से ही व्यक्त होता है। यह दर्शन भी वेद के कहे मन्त्रों की व्याख्या में ही है।
(2.3). साँख्य दर्शन :: साँख्य सृष्टि रचना की व्याख्या एवं प्रकृति और पुरूष की पृथक-पृथक व्याख्या करता है। साँख्य सर्वाधिक पौराणिक दर्शन माना जाता है। भारतीय समाज पर इसका इतना व्यापक प्रभाव हो चुका था कि महाभारत (श्रीमद्भगवद्गीता), विभिन्न पुराणों, उपनिषदों, चरक संहिता और मनु संहिता में साँख्य के विशिष्ट उल्लेख मिलते है। इसके पारंपरिक जन्मदाता कपिल मुनि थे। साँख्य दर्शन में छह अध्याय और 451 सूत्र है।
प्रकृति से लेकर स्थुल-भूत पर्यन्त सारे तत्वों की संख्या की गणना किये जाने से इसे सांख्य दर्शन कहते है।  साँख्य सांख्या द्योतक है। इस शास्त्र का नाम  साँख्य दर्शन इसलिए पड़ा कि इसमें 25 तत्व या सत्य-सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। साँख्य दर्शन की मान्यता है कि संसार की हर वास्तविक वस्तु का उद्गम पुरूष और प्रकृति से हुआ है। पुरूष में स्वयं आत्मा का भाव है जबकि प्रकृति पदार्थ और सृजनात्मक शक्ति की जननी है। विश्व की आत्मायें संख्यातीत है जिसमें चेतना तो है पर गुणों का अभाव है। वही प्रकृति मात्र तीन गुणो के समन्वय से बनी है। इस त्रिगुण सिद्धान्त के अनुसार सत्व, राजस्व तथा तमस की उत्पत्ति होती है। प्रकृति की अविकसित अवस्था में यह गुण निष्क्रिय होते है पर परमात्मा के तेज सृष्टि के उदय की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही प्रकृति के तीन गुणो के बीच का समेकित संतुलन टूट जाता है। साँख्य  के अनुसार 24 मूल तत्व होते है जिसमें प्रकृति और पुरूष पच्चीसवाँ है। प्रकृति का स्वभाव अन्तर्वर्ती और पुरूष का अर्थ व्यक्ति-आत्मा है। विश्व की आत्माएँ  साँख्यतीत है। ये सभी आत्मायें समान है और विकास की तटस्थ दर्शिकाएँ हैं। आत्माएँ किसी न किसी रूप में प्रकृति से संबंधित हो जाती है और उनकी मुक्ति इसी में होती है कि प्रकृति से अपने विभेद का अनुभव करे। जब आत्माओं और गुणों के बीच की भिन्नता का गहरा ज्ञान हो जाये तो इनसे मुक्ति मिलती है और मोक्ष संभव होता है।
प्रकृति मूल रूप में सत्व, रजस्, तमस की साम्यावस्था है। तीनों आवेश परस्पर एक दूसरे को नि:शेष (neutralise) कर रहे होते हैं। जैसे त्रिकंटी की तीन टाँगें एक दूसरे को नि:शेष करती हैं।
परमात्मा का तेज परमाणु (त्रित) की साम्यावस्था को भंग करता है और असाम्यावस्था आरंभ होती है। रचना-कार्य में यह प्रथम परिवर्तन है।
इस अवस्था को महत् कहते है। यह प्रकृति का प्रथम परिणाम है। मन और बुध्दि इसी महत् से बनते हैं। इसमें तत्व की तीन शक्तियाँ बर्हिमुख होने से आस-पास के परमाणुओं को आकर्षित करने लगती है। अब परमाणु के समूह बनने लगते है। तीन प्रकार के समूह देखे जाते है। एक वे है जिनसे रजस् गुण शेष रह जाता है। यह तेजस अहंकार कहलाता है। 
दूसरा परमाणु-समूह वह है जिसमें सत्व गुण प्रधान होता है वह वैकारिक अहंकार कहलाता है। 
तीसरा परमाणु-समूह वह है जिसमें तमस् गुण प्रधान होता है। यह भूतादि अहंकार है।
इन अहंकारों को वैदिक भाषा में आप: कहा जाता है। ये (अहंकार) प्रकृति का दूसरा परिणाम है।
तदनन्तर इन अहंकारों से पाँच तन्मात्राएँ (रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द) पाँच महाभूत बनते है अर्थात् तीनों अहंकार जब एक समूह में आते है तो वे परिमण्डल कहाते है।
और भूतादि अहंकार एक स्थान पर (न्यूयादि संख्या में) एकत्रित हो जाते है तो भारी परमाणु-समूह बीच में हो जाते है और हल्के उनके चारो ओर घूमने लगते है।  दार्शनिक भाषा में इन्हें परिमण्डल कहते हैं। परिमण्डलों के समूह पाँच प्रकार के हैं। इनको महाभूत कहते हैं।
(1). पार्थिव, (2). जलीय, (3). वायवीय, (4). आग्नेय और (5). आकाशीय। 
साँख्य का प्रथम सूत्र है :-
अथ त्रिविधदुख: खात्यन्त: निवृत्तिरत्यन्त पुरूषार्थ:॥1॥ 
अर्थात् तीनों प्रकार के दु:खों-आधिभौतिक (शारीरिक), आधिदैविक एवं आध्यात्मिक से स्थायी एवं निर्मूल रूप से छुटकारा पाने के लिए सर्वोकृष्ट प्रयत्न का इस ग्रन्थ में वर्णन कर रहे हैं।
साँख्य का उद्देश्य तीनों प्रकार के दु:खों की निवृत्ति करना है। तीन दु:ख निम्न हैं :- 
आधिभैतिक :- यह मनुष्य को होने वाली शारीरिक दु:ख है जैसे बीमारी, अपाहिज होना इत्यादि।
आधिदैविक :- यह देवी प्रकोपों द्वारा होने वाले दु:ख है जैसे बाढ़, आंधी, तूफान, भूकंप इत्यादि के प्रकोप।
आध्यात्मिक :- यह दु:ख सीधे मनुष्य की आत्मा को होते हैं जैसे कि कोई मनुष्य शारीरिक व दैविक दु:खों के होने पर भी दुखी होता है। उदाहरणार्थ-कोई अपनी संतान अपना माता-पिता के बिछुड़ने पर दु:खी होता है अथवा कोई अपने समाज की अवस्था को देखकर दु:खी होता है।
साँख्य का एक अन्य सूत्र है :-
सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति: प्रकृतेर्महान,
महतोSहंकारोSहंकारात् पंचतन्मात्राण्युभयमिनिन्द्रियं 
तन्मात्रेभ्य: स्थूल भूतानि पुरूष इति पंचविंशतिर्गण:॥ 
अर्थात् सत्व, रजस और तमस की साम्यावस्था को प्रकृति कहते है। साम्यावस्था भंग होने पर बनते हैं :- महत्, तीन अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, 10 इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत। पच्चीसवाँ गुण है पुरूष।
(2.4). वैशेषिक दर्शन :: मूल पदार्थ-परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन तो ब्रह्यसूत्र में है। ये तीन पदार्थ ब्रह्य कहाते है। प्रकृति के परिणाम अर्थात् रूपान्तर दो प्रकार के हैं। महत् अहंकार, तन्मात्रा तो अव्यक्त है, इनका वर्णन सांख्य दर्शन में है। परिमण्डल पंच महाभूत तथा महाभूतों से बने चराचर जगत् के सब पदार्थ व्यक्त पदार्थ कहलाते हैं। इनका वर्णन वैशेषिक दर्शन में है।
वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष कणाद है। चूंकि ये दर्शन परिमण्डल, पंच महाभूत और भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन करता है, इसलिए वैशेषिक दर्शन विज्ञान-मूलक है।
वैशेषिक दर्शन के प्रथम दो सूत्र है :-
अथातो धर्म व्याख्यास्याम:॥ 
धर्म की व्याख्या :-
यतोSभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:॥ 
जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है वह धर्म है।
कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें छब्बीस के बजाय 7 ही तत्वों को विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।
ये तत्व हैं :-द्रव्य, गुण, कर्म, समन्वय, विशेष और अभाव।
वैसे वैशेषिक दर्शन बहुत कुछ न्याय दर्शन के समरूप है और इसका लक्ष्य जीवन में सांसारिक वासनाओं को त्याग कर सुख प्राप्त करना और ईश्वर के गंभीर ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा अंतत: मोक्ष प्राप्त करना है। न्याय-दर्शन की तरह वैशेषिक भी प्रश्नोत्तर के रूप में ही लिखा गया है।
जगत में पदार्थों की संख्या केवल छह है। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय। क्योंकि इस दर्शन में विशेष पदार्थ सूक्ष्मता से निरूपण किया गया है। इसलिए इसका नाम वैशेषिक दर्शन है।
धर्म विशेष पसूताद द्रव्यगुणकर्म सामान्य विशेष समवायानां
पदार्थांना सधम्र्यवैधम्र्याभ्यिं तत्वज्ञानान्नि: श्रेयसम्।। [वैशेषिक 1.1.8]
अर्थात् धर्म-विशेष से उत्पन्न हुए पदार्थ यथा, द्रव्य, गण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-रूप पदार्थों के सम्मिलित और विभक्त धर्मो के अघ्ययन-मनन और तत्वज्ञान से मोक्ष होता है। ये मोक्ष विश्व की अणुवीय प्रकृति तथा आत्मा से उसकी भिन्नता के अनुभव पर निर्भर कराता है।
वैशेषिक दर्शन में पदार्थों का निरूपण निम्नलिखित रूप से हुआ है :-
जल : यह शीतल स्पर्श वाला तरल पदार्थ है।
तेज : उष्ण स्पर्श वाला गुण है।
काल : सारे कायो की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश में निमित्त होता है।
आत्मा : इसकी पहचान चैतन्य-ज्ञान है।
मन : यह मनुष्य क अभ्यन्तर में सुख-दु:ख आदि के ज्ञान का साधन है।
पंचभूत : पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। 
पंच इन्द्रिय : घ्राण, रसना, नेत्र, त्वचा और श्रोत्र। 
पंच-विषय : गंध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द। 
बुध्दि : ये ज्ञान है और केवल आत्मा का गुण है। नया ज्ञान अनुभव है और पिछला स्मरण।
सँख्या : सँख्या, परिमाण, पृथकता, संयोग और विभाग। 
आदि गुण : सारे गुण द्रव्यों में रहते हैं।
अनुभव : यथार्थ (प्रमा, विद्या) एवं अयथार्थ, (अविद्या)। 
स्मृति : पूर्व के अनुभव के संस्कारों से उत्पन्न ज्ञान। 
सुख : इष्ट विषय की प्राप्ति जिसका स्वभाव अनुकूल होता है। अतीत के विषयों के स्मरण एवं भविष्यत में उनके संकल्प से सुख होता है। सुख मनुष्य का परमोद्देश्य होता है।
दु:ख : इष्ट के जाने या अनिष्ट के आने से होता है जिसकी प्रकृति प्रतिकूल होती है।
इच्छा : किसी अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही इच्छ है जो फल या उपाय के हेतु होती है। धर्म, अधर्म या
अदृष्ठ : वेद-विहित कर्म जो कर्ता के हित और मोक्ष का साधन होता है, धर्म कहलाता है। अधर्म से अहित और दु:ख होता है जो प्रतिषिद्ध कर्मो से उपजता है। अदृष्ट में धर्म और अधर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।
वैशेषिक दर्शन के मुख्य पदार्थ
(1). द्रव्य : द्रव्य गिनती में 9 हैं। 
 पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि॥ (विशैषिक 1.1.5) 
अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
(2). गुण : गुणों की सँख्या  चौबीस मानी गयी है जिनमें कुछ सामान्य ओर बाकी विशेष कहलाते हैं। जिन गुणों से द्रव्यों में विखराव न हो उन्हें सामान्य (सँख्या, वेग, आदि) और जिनसे बिखराव (रूप, बुध्दि, धर्म आदि) उन्हें विशेष गुण कहते है।
(3). कर्म : किसी प्रयोजन को सिद्ध करने में कर्म की आवश्यकता होती है, इसलिए द्रव्य और गुण के साथ कर्म को भी मुख्य पदार्थ कहते हैं। चलना, फेंकना, हिलना आदि सभी कर्म हैं। मनुष्य के कर्म पुण्य-पाप रूप होते हैं।
(4). सामान्य : मनुष्यों में मनुष्यत्व, वृक्षों में वृक्षत्व जाति सामान्य है और ये बहुतों में होती है। दिशा, काल आदि में जाति नहीं होती क्योंकि ये अपने आप में अकेली है।
(5). विशेष : देश काल की भिन्नता के बाद भी एक दूसरे के बीच पदार्थ जो विलक्षणता का भेद होता है
है वह उस द्रव्य में एक विशेष की उपस्थिति से होता है। उस पहचान या विलक्षण प्रतीति का एक निमित्त होता है-यथा गोमें गोत्व जाति से, शर्करा में मिठास से।
(6). समभाव : जहाँ गुण व गुणी का संबंध इतना घना है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
(7). अभाव : इसे भी पदार्थ माना गया है। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव अथवा किसी एक वस्तु में दूसरी वस्तु के गुणों का अभाव (ये घट नहीं, पट है) आदि इसके उदाहरण है।
(2.5). न्याय दर्शन :: महिर्ष अक्षपाद गौतम द्वारा प्रणीत न्याय दर्शन एक आस्तिक दर्शन है जिसमें ईश्वर कर्म-फल प्रदाता है। इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्रमाण है। न्याय शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है परन्तु दार्शनिक साहित्य में न्याय वह साधन है जिसकी सहायता से किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्ध या किसी सिद्धान्त का निराकरण होता है-
नीयते प्राप्यते विविक्षितार्थ सिद्धिरनेन इति न्याय:॥ 
अत: न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है।
इस ग्रन्थ में पा¡च अध्याय है तथा प्रत्येक अध्याय में दो दो आह्रिक हैं। कुल सूत्रों की संख्या 539 हैं।
न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पडद्यताल के उपायों का वर्णन किया गया है कहा है कि सत्य की खोज के लिए सोलह तत्व है। उन तत्वों के द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्यता (वास्तविकता) का पता किया जा सकता है। ये सोलह तत्व हैं :-
(1). प्रमाण, (2). प्रमेय, (3). संशय, (4). प्रयोजन, (5). दृष्टान्त, (6). सिद्धान्त, (7). अवयव, (8). तर्क, (9). निर्णय, (10). वाद, (11). जल्प, (12). वितण्डा, (13). हेत्वाभास, (14). छल, (15). जाति और (16). निग्रहस्थान। 
इन सबका वर्णन न्याय दर्शन में है और इस प्रकार इस दर्शन शास्त्रको तर्क करने का व्याकरण कह सकते हैं। वेदार्थ जानने में तर्क का विशेष महत्व है। अत: यह दर्शन शास्त्र वेदार्थ करने में सहायक है।
दर्शनशास्त्र में कहा गया है :-
तत्त्वज्ञानान्नि: श्रेयसाधिगम:॥ 
अर्थात्- इन सोलह तत्वों के ज्ञान से निश्रेयस् की प्राप्ति होती है। (सत्य की खोज में सफलता प्राप्ति होती है)।
न्याय दर्शन के चार विभाग :-
(5.1). सामान्य ज्ञान की समस्या का निराकरण,
(5.2). जगत की समस्या का निराकरण,
(5.3). जीवात्मा की मुक्ति,
(5.4). परमात्मा का ज्ञान। 
न्याय दर्शन में आघ्यात्मवाद की अपेक्षा तर्क एवं ज्ञान का आधिक्य हैइसमें तर्क शास्त्र का प्रवेश इसलिए कराया गया क्योंकि स्पष्ट विचार एवं तर्क-संगत प्रमाण परमानन्द की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। न्याय दर्शन में (1).. सामान्य ज्ञान (2). संसार की क्लिष्टता (3). जीवात्मा की मुक्ति एवं (4). परमात्मा का ज्ञान; इन चारों गंभीर उद्देश्यों को लक्ष्य बनाकर प्रमाण आदि 16 पदार्थ उनके तार्किक समाधान के माने गये हैं, किन्तु इन सबमें प्रमाण ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय है।
किसी विषय में यथार्थ ज्ञान पर पहुँचने और अपने या दूसरे के अयथार्थ ज्ञान की त्रुटि ज्ञात करना ही इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य है।
दु:ख का अत्यन्तिक नाश ही मोक्ष है।
न्याय दर्शन की अन्तिम दीक्षा यही है कि केवल ईश्वरीयता ही वांछित है, ज्ञातव्य है और प्राप्य है, यह संसार नहीं।
पदार्थ और मोक्ष :- मुक्ति के लिए इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है जो 16 पदार्थों के तत्वज्ञान से होता है। इनमें प्रमाण और प्रमेय भी है। तत्वज्ञान से मिथ्या-ज्ञान का नाश होता है। राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके यही मोक्ष दिलाता है। सोलह पदार्थों का तत्व-ज्ञान निम्नलिखित क्रम से मोक्ष का हेतु बनाता है।
दु:ख-जन्म प्रवृति-दोष मिथ्यामानानाम उत्तरोत्तरापाये तदनंन्तरा पायायदपवर्ग:॥ 
अर्थात-दु:ख, जन्म, प्रवृति (धर्म-अधर्म), दोष (राग, द्वेष) और मिथ्या ज्ञान, इनमें से उत्तरोतर नाश द्वारा इसके पूर्व का नाश होने से अपवर्ग अर्थात् मोक्ष होता है।
इनमें से प्रमेय के तत्व-ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है और प्रमाण आदि पदार्थ उस ज्ञान के साधन है। युक्ति तर्क है जो प्रमाणों की सहायता करता है। पक्ष-प्रतिपक्ष के द्वारा जो अर्थ का निश्चय है, वही निर्णय है। दूसरे अभिप्राय से कहे शब्दों का कुछ और ही अभिप्राय कल्पना करके दूषण देना छल है।
आत्मा का अस्तित्व :- आत्मा, शरीर और इन्द्रियों में केवल आत्मा ही भोगने वाला है। इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख-दु:ख और ज्ञान उसके चिह्म हैं, जिनसे वह शरीर से अलग जाना पड़ता है। उसके भोगने का घर शरीर है। भोगने के साधन इन्द्रिय है। भोगने योग्य विषय रूप, रस,गंध, शब्द और स्पर्श हैं। भोग का अनुभव बुध्दि है और अनुभव कराने वाला अंत:करण मन है। सुख-दु:ख का अनुभव करान फल है और अत्यान्तिक रूप से उससे छूटना ही मोक्ष है।
(2.6). योग दर्शन :: योगदर्शन छः आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में से एक है। इसके प्रणेता पतञ्जलि मुनि हैं।
प्रकृति, पुरुष के स्वरुप के साथ ईश्वर के अस्तित्व को मिलाकर मनुष्य जीवन की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति के लिये दर्शन का एक बड़ा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रुप योगदर्शन में प्रस्तुत किया गया है। इसका प्रारम्भ पतञ्जलि मुनि के योगसूत्रों से होता है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मन (चित) की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखकर जीवन में सफल हो सकता है और अपने अन्तिम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।
योग की प्रक्रिया विश्व के बहुत से देशों में प्रचलित है। अधिकांशत: यह आसनों के रूप में जानी जाती है। कहीं-कहीं प्राणायाम भी प्रचलित है। यह आसन इत्यादि योग दर्शन का बहुत ही छोटा भाग है।
इस दर्शन की व्यवहारिक और आध्यात्मिक उपयोगिता सर्वमान्य है क्योकि योग के आसन एवं प्राणायाम का मनुष्य के शरीर एवं उसके प्राणों को बलवान एवं स्वस्थ्य बनाने में सक्षम योगदान रहा है।
इस दर्शन के प्रवर्तक महर्ष पतंजलि है। यह दर्शन चार पदों में विभक्त है, जिनके सम्पूर्ण सूत्र संख्या 194 है। ये चार पद हैं :- समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।
योग दर्शन के प्रथम दो सूत्र है।
अथ योगानुशासनम्॥1॥  
अर्थात योग की शिक्षा देना इस समस्त शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय समझना चाहिए।
योगश्चित्तवृत्ति निरोध:॥2॥  
अर्थात् चित्त या मन की स्मरणात्मक शक्ति की वृत्तियों को सब बुराई से दूर कर, शुभ गुणो में स्थिर करके, पश्रमेश्वर के समीप अनुभव करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के प्रयास को योग कहा जाता है।
योग है जीवात्मा का सत्य के साथ संयोग अर्थात् सत्य-प्राप्ति का उपाय। यह माना जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है और ज्ञान बुध्दि की श्रेष्ठता से प्राप्त होता है।
भगवद्गीता में कहा गया है :-
एवं बूद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
अर्थात् इस प्रकार बुध्दि से परे आत्मा को जानकर, आत्मा के द्वारा आत्मा को वश में करके (अपने पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है) यही योग है।
इसे प्राप्त करने का उपाय योगदर्शन में बताया है। आत्मा पर नियंत्रण बुध्दि द्वारा, यह योग दर्शन का विषय है। इसका प्रारिम्भक पग योगदर्शन में ही बताया है :-
तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:॥ [योग० 2.1]
अर्थात्–तप (निरंतर प्रयत्न), स्वाध्याय (अध्यात्म–विद्या का अध्ययन) और परमात्मा के आश्रय से योग का कार्यक्रम हो सकता है।
अष्टांग योग :: क्लेशों से मुक्ति पाने व चित्त को समहित करने के लिए योग के 8 अंगों का अभ्यास आवश्यक है। इस अभ्यास की अवधि 8 भागों में विभक्त है- (1). यम, (2). नियम, (3). शासन, (4). प्राणायाम, (5). प्रत्याहार, (6). धारणा, (7). ध्यान और (8). समाधि। 
मुख्यत: योग-क्रियाओं का लक्ष्य है बुतद्ध को विकास देना। यह कहा है कि बुध्दि के विकास का अन्तिम रूप है :- ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा॥ 
श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥ 
अर्थात्-(योग से प्राप्त) बुध्दि से ऋतंभरा कहते है और इन्द्रियों से प्रत्यक्ष तथा अनुमान से होने वाला ज्ञान सामान्य बुध्दि से भिन्न विषय अर्थ वाला हो जाता है।
इसका अभिप्राय यह है कि जो ज्ञान सामान्य बुध्दि से प्राप्त होता है, वह भिन्न है और ऋतंभरा (योग से सिद्ध हुई बुध्दि) से प्राप्त ज्ञान भिन्न अर्थ वाला हो जाता है।
इससे ही अध्यात्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
योग दर्शन में पुरूष तत्व केंद्रीय विषय के रूप में प्रस्तुत हुआ है। यद्यपि पुरूष और प्रकृति दोनों की स्वतंत्र सत्ता मानी गयी है परन्तु तात्विक रूप में पुरूष की सत्ता ही सर्वोच्च है। पुरूष के दो भेद कहे गये हैं । पुरूष को चैतन्य एवं अपरिणामी कहा गया है, किन्तु अविद्या के कारण पुरूष जड़ एवं परिणाम चित्त में स्वयं को आरोपित कर लेता है। पुरूष और चित्त के संयुक्त हो जाने पर विवेक जाता रहता है और पुरूष स्वयं को चित्त रूप में अनुभव करने लगता है। यह अज्ञान ही पुरूष के समस्त दुःखों, क्लेशों का कारण हैं। योग दर्शन का उद्देश्य पुरूष को इस दुःख से, अज्ञान से, मुक्त कराना है। इसी तथ्य को सैद्धान्तिक रूप से योग दर्शन में हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन चार क्रमों में पुरूष दुःखों से मुक्ति पाता है, इसलिये योग में इसे 'चतुर्व्यूह वाद' कहा गया है एवं इस चतुर्व्यूह से मुक्त होना ही योग का परम उद्देश्य है। चतुर्व्यूह वाद की विवेचना में ही योग दर्शन में पुरूष, पुरूषार्थ और पुरूषार्थ शून्यता का दर्शन प्रकट होता है। पुरूष अविद्या ग्रस्त होने पर संसार-चक्र में पड़ता है और पुरूषार्थशून्यता की अवस्था को प्राप्त करता है। पुरूष का परम लक्ष्य कैवल्य की प्राप्ति है। योग में पुरूष को आत्मा का पर्याय माना गया है। अतः आत्मा, जो कि सँख्या में असंख्य है, उसकी कैवल्य प्राप्ति तभी हो सकती है जब चतुर्व्यूह का पुरूषार्थ साधन कर दुःख के त्रिविध रूपों का सामाधान कर लिया जाय। दुःख के तीन रूप हैं :- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक। पुरूषार्थ शून्यता इन त्रितापों से ऊपर की अवस्था है। पुरूषार्थ शून्यता के पश्चात् ही पुरूष की अपने स्वरूप की स्थिति होती है। योगदर्शन में इसे ही कैवल्य अथवा मोक्ष कहा गया है।
पतंजलि को कपिल द्वारा बताया गया साँख्य दर्शन ही अभिमत है। थोड़े में, इस दर्शन के अनुसार इस जगत्‌ में असंख्य पुरुष हैं और एक प्रधान या मूल प्रकृति। पुरुष चित्‌ है, प्रधान अचित्‌। पुरुष नित्य है और अपरिवर्तनशील, प्रधान भी नित्य है परंतु परिवर्तनशील। दोनों एक दूसरे से सदा पृथक हैं, परंतु एक प्रकार से एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। पुरुष के सान्निध्य से प्रकृति में परिवर्तन होने लगते हैं। वह क्षुब्ध हो उठती है। पहले उसमें महत्‌ या बुद्धि की उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार की, फिर मन की। अहंकार से ज्ञानेंद्रियों और कर्मेद्रियों तथा पाँच तन्मात्राओं अर्थात्‌ शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध की, अंत में इन पाँचों से आकाश, वायु, तेज, अप और क्षिति नाम के महाभूतों की। इन सबके संयोग वियोग से इस विश्व का खेल हो रहा है। संक्षेप में, यही सृष्टि का क्रम है। प्रकृति में परिवर्तन भले ही हो परंतु पुरुष ज्यों का त्यों रहता है। फिर भी एक बात होती है। जैसे श्वेत स्फटिक के सामने रंग बिरंगे फूलों को लाने से उसपर उनका रंगीन प्रतिबिंब पड़ता है, इसी प्रकार पुरुष पर प्राकृतिक विकृतियों के प्रतिबिंब पड़ते हैं। क्रमश: वह बुद्धि से लेकर क्षिति तक से रंजित प्रतीत होता है, अपने को प्रकृति के इन विकारों से संबद्ध मानने लगता है। आज अपने को धनी, निर्धन, बलवान्‌ दुर्बल, कुटुंबी, सुखी, दु:खी, आदि मान रहा है। अपने शुद्ध रूप से दूर जा पड़ा है। यह उसका भ्रम, अविद्या है। प्रधान से बने हुए इन पदार्थो ने उसके रूप को ढँक रखा है, उसके ऊपर कई तह खोल पड़ गई है। यदि वह इन खोलों, इन आवरणों को दूर फेंक दे तो उसका छुटकारा हो जायगा। जिस क्रम से बँधा है, उसके उलटे क्रम से बंधन टूटेंगे। पहले महाभूतों से ऊपर उठना होगा। अंत में प्रधान की ओर से मुँह फेरना होगा। यह बंधन वास्तविक नहीं है, परंतु बहुत ही दृढ़ प्रतीत होते हैं। जिस उपयोग से बंधनों को तोड़कर पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो सके उस उपाय का नाम योग है। साँख्य  के आचार्यो का कहना है: यद्वा तद्वा तदुच्छिति: परमपुरुषार्थः :- जैसे भी हो सके पुरुष और प्रधान के इस कृत्रिम संयोग का उच्छेद करना परम पुरुषार्थ हैं।
योग का यही दार्शनिक धरातल है: अविद्या के दूर होने पर जो अवस्था होती है उसका वर्णन विभिन्न आचार्यों और विचारकों के विभिन्न ढंग से किया है। अपने-अपने विचार के अनुसार उन्होंने उसको पृथक नाम भी दिए हैं। कोई उसे कैवल्य कहता है, कोई मोक्ष, कोई निर्वाण। ऊपर पहुँचकर जिसको जैसा अनुभव हो वह उसे उस प्रकार कहे। वस्तुत: वह अवस्था ऐसी है, यतो वाचो निवर्तते अप्राप्य मनसा सह - जहाँ मन ओर वाणी की पहुँच नहीं है। थोड़े से शब्दों में एक और बात का भी चर्चा कर देना आवश्यक है। असंख्य पुरुषों के साथ पतंजलि ने 'पुरुष विशेष' नाम से ईश्वर की सत्ता को भी माना है। सांख्य के आचार्य ऐसा नहीं मानते। वस्तुत: मानने की आवश्यकता भी नहीं है। यदि योग दर्शन में से वह थोड़े से सूत्र निकाल भी लें तो कोई अंतर नहीं पड़ता। योग की साधना की दृष्टि से ईश्वर को मानने, न मानने का विशेष महत्व नहीं है। ईश्वर की सत्ता को मानने वाले और न मानने वाले, दोनों योग में समान रूप से अधिकार रखते हैं।
यम-नियम :: विद्या और अविद्या, बंधन और उससे छुटकारा, सुख और दु:ख सब चित्त में हैं। अत: जो कोई अपने स्वरूप में स्थिति पाने का इच्छुक है उसको अपने चित्त को उन वस्तुओं से हटाने का प्रयत्न करना होगा, जो हठात्‌ प्रधान और उसके विकारों की ओर खींचती हैं और सुख दु:ख की अनुभूति उत्पन्न करती हैं। इस तरह चित्त को हटाने तथा चित्त के ऐसी वस्तुओं से हट जाने का नाम वैराग्य है। यह योग की पहली सीढ़ी है। पूर्ण वैराग्य एकदम नहीं हुआ करता। ज्यों ज्यों व्यक्ति योग की साधना में प्रवृत्त होता है त्यों त्यों वैराग्य भी बढ़ता है और ज्यों ज्यों वेराग्य बढ़ता है त्यों त्यों साधना में प्रवृत्ति बढ़ती है। जैसा पतंजलि ने कहा है :- दृष्ट और अनुश्रविक दोनों प्रकार के विषयों में विरक्ति, गांधी जी के शब्दों में अनासक्ति, होनी चाहिए। स्वर्ग आदि, जिनका ज्ञान हमको अनुश्रुति अर्थात्‌ महात्माओं के वचनों और धर्मग्रंथों से होता है, अनुश्रविक कहलाते हैं। योग की साधना को अभ्यास कहते हैं। इधर कई सौ वर्षो से साधुओं में इस आरम्भ में भजन शब्द भी चल पड़ा है।
चित्त जब तक इंद्रियों के विषयों की ओर बढ़ता रहेगा, चंचल रहेगा। इंद्रियाँ उसका एक के बाद दूसरी भोग्य वस्तु से संपर्क कराती रहेंगी। कितनों से वियोग भी कराती रहेंगी। काम, क्रोध, लोभ, आदि के उद्दीप्त होने के सैकड़ों अवसर आते रहेंगे। सुख दु:ख की निरंतर अनुभूति होती रहेगी। इस प्रकार प्रधान ओर उसके विकारों के साथ जो बंधन अनेक जन्मों से चले आ रहे हैं वे दृढ़ से दृढ़तर होते चले जाएँगे। अत: चित्त को इंद्रियों के विषयों से खींचकर अंतर्मुख करना होगा। इसके अनेक उपाय बताए गए हैं जिनके ब्योरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। साधारण मनुष्य के चित्त की अवस्था क्षिप्त कहलाती है। वह एक विषय से दूसरे विषय की ओर फेंका फिरता है। जब उसको प्रयत्न करके किसी एक विषय पर लाया जाता है तब भी वह जल्दी से विषयंतर की ओर चला जाता है। इस अवस्था को विक्षिप्त कहते हैं। दीर्ध प्रयत्न के बाद साधक उसे किसी एक विषय पर देर तक रख सकता है। इस अवस्था का नाम एकाग्र है। चित्त को वशीभूत करना बहुत कठिन काम है। श्रीकृष्ण ने इसे प्रमाथि बलवत्‌-मस्त हाथी के समान बलवान्‌-बताया है।
आसन :: चित्त को वश में करने में एक चीज से सहायता मिलती है। यह साधारण अनुभव की बात है कि जब तक शरीर चंचल रहता है, चित्त चंचल रहता है और चित्त की चंचलता शरीर को चंचल बनाए रहती है। शरीर की चंचलता नाड़ीसंस्थान की चंचलता पर निर्भर करती है। जब तक नाड़ीसंस्थान संक्षुब्ध रहेगा, शरीर पर इंद्रिय ग्राह्य विषयों के आधात होते रहेंगे। उन आधातों का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ेगा जिसके फलस्वरूप चित्त और शरीर दोनों में ही चंचलता बनी रहेगी। चित्त को निश्चल बनाने के लिये योगी वैसा ही उपाय करता है जैसा कभी-कभी युद्ध में करना पड़ता है। किसी प्रबल शत्रु से लड़ने में यदि उसके मित्रों को परास्त किया जा सके तो सफलता की संभावना बढ़ जाती है। योगी चित्त पर अधिकार पाने के लिए शरीर और उसमें भी मुख्यत: नाड़ी संस्थान, को वश में करने का प्रयत्न करता है। शरीर भौतिक है, नाड़ियाँ भी भौतिक हैं। इसलिये इनसे निपटना सहज है। जिस प्रक्रिया से यह बात सिद्ध होती है उसके दो अंग हैं: आसन और प्राणायाम। आसन से शरीर निश्चल बनता है। बहुत से आसनों का अभ्यास तो स्वास्थ्य की दृष्टि से किया जाता है। पतंजलि ने इतना ही कहा है: स्थिर सुखमासनम्‌ : जिसपर देर तक बिना कष्ट के बैठा जा सके वही आसन श्रेष्ठ है। यही सही है कि आसनसिद्धि के लिये स्वास्थ्य संबंधी कुछ नियमों का पालन आवश्यक है। जैसा श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-
युक्ताहार बिहारस्य, युक्त चेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दु:खहा॥
खाने, पीने, सोने, जागने सभी का नियंत्रण करना होता है।
प्राणायाम :: प्राणायाम शब्द के संबंध में बहुत भ्रम फैला हुआ है। इस भ्रम का कारण यह है कि आज लोग प्राण शब्द के अर्थ को प्राय: भूल गए हैं। बहुत से ऐसे लोग भी, जो अपने को योगी कहते हैं, इस शब्द के संबंध में भूल करते हैं। योगी को इस बात का प्रयत्न करना होता है कि वह अपने प्राण को सुषुम्ना में ले जाय। सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदंड की नली में स्थित है और मस्त्तिष्क के नीचे तक पहुँचती है। यह कोई गुप्त चीज नहीं है। आँखों से देखी जा सकती है। करीब-करीब कनष्ठाि उँगली के बराबर मोटी होती है, ठोस है, इसमें कोई छेद नहीं है। प्राण का और साँस या हवा करनेवालों को इस बात का पता नहीं है कि इस नाड़ी में हवा के घुसने के लिये और ऊपर चढ़ने के लिये कोई मार्ग नहीं है। प्राण को हवा का समानार्थक मानकर ही ऐसी बातें कही जाती हैं कि अमुक महात्मा ने अपनी साँस को ब्रह्मांड में चढ़ा लिया। साँस पर नियंत्रण रखने से नाड़ीसंस्थान को स्थिर करने में निश्चय ही सहायता मिलती है, परंतु योगी का मुख्य उद्देश्य प्राण का नियंत्रण है, साँस का नहीं। प्राण वह शक्ति है जो नाड़ीसंस्थान में संचार करती है। शरीर के सभी अवयवों को और सभी धातुओं को प्राण से ही जीवन और सक्रियता मिलती है। जब शरीर के स्थिर होने से ओर प्राणायाम की क्रिया से, प्राण सुषुम्ना की ओर प्रवृत्त होता है तो उसका प्रवाह नीचे की नाड़ियों में से खिंच जाता है। अत: ये नाड़ियाँ बाहर के आधातों की ओर से एक प्रकार से शून्यवत्‌ हो जाती हैं।
प्रत्याहार :: प्राणयाम का अभ्यास करना और प्राणायाम में सफलता पा जाना दो अलग अलग बातें हैं। परंतु वैराग्य और तीव्र संवेग के बल से सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अभ्यास दृढ़ होता है, त्यों-त्यों साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। एक और बात होती है। वह जितना ही अपने चित्त को इंद्रियों और उनके विषयों से दूर खींचता है उतना ही उसकी ऐंद्रिय शक्ति भी बढ़ती है अर्थात्‌ इंद्रियों की विषयों के भोग की शक्ति भी बढ़ती है। इसीलिये प्राणायाम के बाद प्रत्याहार का नाम लिया जाता है। प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को उनके विषयों से खींचना। वैराग्य के प्रसंग में यह उपदेश दिया जा चुका है परंतु प्राणायम तक पहँचकर इसकों विशेष रूप से दुहराने की आवश्यकता है। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के ही समुच्चय का नाम हठयोग है।
धारणा, ध्यान, समाधि :: खेद की बात है कि कुछ अभ्यासी यहीं रुक जाते हैं। जो लोग आगे बढ़ते हैं उनके मार्ग को तीन विभागों में बाँटा जाता है: धारणा, ध्यान और समाधि। इन तीनों को एक दूसरे से बिल्कुल पृथक करना असंभव है। धारण पुष्ट होकर ध्यान का रूप धारण करती है और उन्नत ध्यान ही समाधि कहलाता है। पतंजलि ने तीनों को सम्मिलित रूप से संयम कहा है। धारणा वह उपाय है जिससे चित्त को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। यहाँ उपाय शब्द का एकवचन में प्रयोग हुआ है परंतु वस्तुत: इस काम के अनेक उपाय हैं। इनमें से कुछ का चर्चा उपनिषदों में आया है। वैदिक वाड्मय में विद्या शब्द का प्रयोग किया गया है। किसी मंत्र के जप, किसी देव, देवी या महात्मा के विग्रह या सूर्य, अग्नि, दीपशिखा आदि को शरीर के किसी स्थान विशेष जेसे हृदय, मूर्घा, तिल अर्थात दोनों आँखों के बीच के बिंदु, इनमें से किसी जगह कल्पना में स्थिर करना, इस प्रकार के जो भी उपाय किए जायँ वे सभी धारणा के अंतर्गत हैं। 
ब्रह्म प्रणव संयानं, नादों ज्योतिर्मय: शिव:। स्वयमाविर्भवेदात्मा मेयापायेऽशुमानिव॥
प्रणव के अनुसंधान से, ज्योतिर्मय और कल्याणकारी नाद उदित होता है। फिर आत्मा स्वयं उसी प्रकार प्रकट होता है, जेसे कि बादल के हटने पर चंद्रमा प्रकट होता है। आदि शब्द आंकार को परमात्मा का प्रतीक कहा जाता है। योगियों में सर्वत्र ही इसकी महिमा गाई गई है। आरंभ में शब्द था। वह शब्द परमात्मा के साथ था। वह शब्द परमात्मा था। 

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