HINDU PHILOSOPHY (7) हिंदु दर्शन

  HINDU PHILOSOPHY (7) हिंदु दर्शन
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  
By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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MEDITATION (1) (-ध्यान) :: It involves conceptualisation-image formation of the Almighty. Initially one has to sit quietly, with closed eyes thinking of the Almighty only. He will experience all sorts of hurdles and the mind will travel in all direction. But being a human being, he is capable of channelising all his energies to a spot. Normally the direction to align one self in the morning is East and in the evening, its North. A calm-quite place is essential for such practices. People prefer isolated places, near water bodies or caves. One can practice it at home as well, by placing a pot full of water in front of him. Sit with cross legs or adopt some Asan, like Padmasan. Use a mat-cushion for sitting comfortably. You can use fan or even AC during this. This water should be offered to the Sun in the morning after bathing.
One should concentrate only in him, while forgetting-discarding everything at this moment. Ignore all activities around you and think of him only and nothing else, at the time of meditation.He will show you the way to Dharm, Arth,Kaam and Moksh. उसी में रम जाओ और रमण करो मन को एकाग्र  करो चित्त को भटकने मत दो अभीष्ट पर केंद्रित करो और देखो सफ्लता तुम्हारी है।
MEDITATION (II): One is aware of deep-repeated thinking over certain issues-problems, which forces him to forget everything to find ways and means, to come out of the difficulty. The thinker get involved with it, whole heartedly and all his energies are channelized into finding a solution. Ultimately, he approaches the God. Life in itself is full of difficulties and the prudent-enlightened makes a bid to come out of them. The easiest-simplest method is meditation by focusing-fixing-concentrating the brain-mind into the Almighty.
This is a state when one prevents the mind from roaming around, brings the mind-brain under self restraint-control. Inner self-sensuality-passions are made to fall in line with deep thinking-contemplation. A magic spell is cast, followed by enchantment-charm-delight-happiness.
One has to focus the mind over certain material object like a statue-picture-even Om-Allah-Khuda-Rab-God-Jesus-Bhagwan, written over the wall.  This can be done-achieved, while-talking-walking-moving-standing-sitting-sleeping-waking-opening or closing eyes-pure or impure body state, by continuously reciting-remembering the God. One has to consider himself as an incarnation-organ-part-component(-soul is a component of the Almighty-the Supreme soul) of the God and that he has evolved out of the Almighty and merge into him, ultimately.
Meditation relieves anxiety and helps in solving intricate problems.
Human brain has two lobes-compartments, which drag him into different directions-channels. One may successfully perform two tasks, simultaneously. During emergency-difficulty the two lobes start functioning together. Repeated practice makes one achieve this state quite frequently. This act when utilized to focus-penetrate-channelize into the creator-nurturer-destroyer-all in one, the Almighty; relieves the devotee of all pains-sorrow-grief-problems-difficulty and the cycle of birth and rebirth, obviously.
For best results choice of a peaceful place-solitude-secluded place-cave-hut in the forest is recommended. Continued efforts gives quick results associated with confidence-happiness-success.
Transcendental Meditation requires practice session extending between 10-15 minutes twice-even once depending upon the time available with you, regularly. Don't mind if you could not devote time for it for a number of days. You may restart at you will. It's relaxation of mind, body and soul.One may call it self analysis-identification-realization.
This technique allows the mind to settle and gives one a chance to experience pure awareness, called transcendental consciousness. It allows one to experience the most silent and peaceful level of consciousness-the innermost self. It also allows the brain to attain deep rest-relaxation, helping one to be more efficient and better in cognitive functions. 
Sit with crossed legs comfortably over met-tiger-deer skin-cushion-durri-carpet. You may utilize Padmasan or some other Aasan-posture. Sit with erect back bone-vertebral column, recite om or om em namh: or remain quite.

ध्यान :: स्थिर चित्त से भगवान  का चिंतन, ध्यान कहलाता है। समस्त उपाधियों से मुक्त मन सहित आत्मा का ब्रह्म विचार में परायण होना ध्यान है। ध्येय रूप आधार में स्थित एवं सजातीय प्रतीतियों से युक्त चित्त को जो विजातीय प्रतीतियों से रहित प्रतीति  होती है, उसको भी ध्यान कहते हैं। जिस किसी प्रदेश में भी ध्येय वस्तु के चिंतन में एकाग्र हुए चित्त को प्रतीति  के साथ जो अभेद-भावना होती है, उसका नाम भी ध्यान है। ध्यान परायण होकर जो व्यक्ति अपने शरीर का त्याग करता है, वह अपने कुल स्वजन और मित्रों का उद्धार करके स्वयं भगवत स्वरुप हो जाता है। प्रति दिन श्रद्धा पूर्वक श्री हरी का ध्यान करने से मनुष्य वह गति पाता  है, जो कि सम्पूर्ण महायज्ञों के द्वारा भी अप्राप्य है
चलते-फिरते, उठते-बैठते-खड़े होते, सोते-जागते, आँख खोलते-मींचते, शुद्ध-अशुद्ध अवस्था में भी निरंतर परमेश्वर का ध्यान करना चाहिए।
भगवान मृत्युंजय, ध्यान करने पर अकाल-मृत्यु  को दूर करने वाले हैं।
साधक को पहले मन को स्थिर करने के लिए स्थूल-मूर्त रूप का ध्यान करना चाहिये। मन के स्थिर हो जाने पर उसे सूक्ष्म तत्व-अमूर्त के चिंतन में लगाना चाहिये।
ध्यानावस्था में समस्याओं का समाधान मिल जाता है।  
ध्यान दो प्रकार का होता है-निर्गुण और सगुण। जो लोग योग-शास्त्रोक्त, यम-नियमादि साधनों के द्वारा परमात्म-साक्षात्कार का प्रयास कर रहे हैं, वे सदा ही ध्यान परायण होकर केवल ज्ञान दृष्टि से परमात्मा का दर्शन करते हैं। 

निर्गुण: परमात्मा हाथ और पैर से रहित है, तो भी वह सब कुछ ग्रहण करता है और सर्वत्र जाता है। मुख के बिना ही भोजन करता है और नाक के बिना ही सूंघता है। उसके कान नहीं हैं तथापि वह सब कुछ सुनता है। वह सबका साक्षी और इस जगत का स्वामी है। रूप हीन होकर भी रूप से संबद्ध हो पांचों इंद्रियों के वशीभूत सा प्रतीत होता है। वह सब लोकों का प्राण है, सम्पूर्ण चराचर जगत के प्राणी उसकी पूजा करते हैं। बिना जीभ के ही वह सब कुछ वेद-शास्त्रों के अनुकूल बोलता है। उसके त्वचा नहीं है तथापि वह शीत-उष्ण आदि, सब प्रकार के स्पर्श अनुभव करता है। सत्ता और आनन्द उसके स्वरूप हैं। वह जितेन्द्रिय, एकरूप, आश्रय विहीन, निर्गुण, ममता रहित, व्यापक, सगुण, निर्मल, ओजस्वी, सबको वश में करने वाला, सब ओर देखने वाला और सर्वज्ञों में श्रेष्ठ है। वह व्यापक और सर्वमय है। इस प्रकार जो अनन्य  बुद्धि से उस सर्वमय ब्रह्म का ध्यान करता है, वह निराकार एवं अमृत तुल्य परम पद को प्राप्त होता है। 
This involves mental image formation or conceptualisation of the Almighty, who has no shape or size. He is undefined yet unique. He is present each and every where, including us. He has no sense organs, still he is performing all functions. He is without hands or legs, still he is able to act-perform what ever is essential. He is free from desires or activities, still he acts. He does not eat, still he accepts the offerings of the devotees. He is without tongue and yet he recites the Shloks-enchants-rhymes of Ved-Puran-Upnishad. He is without skin, still he experiences cold or warmth. He has full control over all sensuality-passions. He is one and only one-unique. There is no one-nothing to support him, yet he supports every one. He has no sentiments. He is pure, orator, source of all energy, mesmerise every one-controls every one-looks in all directions and above all the enlightened. He is present in each one of us and all directions-material-immaterial objects. His qualities-characters are unlimited-infinite. he has no boundaries.
One who utilize his mind-brain-intelligence, to attain him, is able to liberate himself and assimilate in him.
सगुण :: इस ध्यान का विषय किंवा साकार रूप है। वह निराकार-रोग-व्याधि से रहित है। उसका कोई आलम्ब-आधार नहीं है, वही सब का आलम्ब है। जिनके संकल्प से यह संसार वासित है वे श्री हरी इस संसार को वासित करने के कारण वासुदेव कहलाते हैं। 
उनका श्री विग्रह वर्षा ऋतु के सजल मेघ के समान श्याम है। उनकी प्रभा सूर्य के तेज को भी लज्ज्ति करती है। उनके दाहिने भाग के एक हाथ में बहुमूल्य मणियों से चित्रित शंख शोभा पा रहा है और दूसरे हाथ में बड़े-बड़े असुरों का संहार करने वाली कौमुद गदा विराजमान है। उन जगदीश्वर के बायें हाथों में पद्म और शंख सुशोभित हैं। वे चतुर्भज हैं। वे सम्पूर्ण देवताओं के स्वामी हैं। श्राङ्ग धनुष धारण करने के कारण श्राङ्गी उन्हें भी कहते हैं। वे लक्ष्मी के स्वामी हैं।  
शंख के समान मनोहर ग्रीवा, सुन्दर गोलाकार मुखमण्डल तथा पद्म-पत्र के समान बड़ी-बड़ी ऑंखें हैं। कुन्द जैसे चमकते दांतों से ह्रषिकेश की बड़ी शोभा हो रही है। वे निद्रा के ऊपर शासन करते हैं। उनका नीचे का होंठ मूंगे के सामान लाल है। नाभि कमल से प्रकट होने के कारन उन्हें पद्मनाभ कहते हैं। वे अत्यन्त तेजस्वी किरीट के कारण बड़ी शोभा पा रहे हैं। श्री वत्स के चिन्ह ने उनकी छवि को और बढ़ा दिया है। श्री केशव का वक्ष स्थल कौस्तुभ मणि से अलंकृत है। वे जनार्दन सूर्य के समान तेजस्वी कुण्डलों से अत्यंत देदीप्यमान हो रहे है। केयूर, हार, कड़े, कटिसूत्र करघनी तथा अंगूठियों से उनके श्री अंग विभूषित हैं, जिससे उनकी शोभा और बढ़ गयी है। भगवान  तपाये हुए सुवर्ण के रंग का पीताम्बर धारण किये हुए हैं तथा गरुड़ जी की पीठ पर विराजमान हैं। वे भक्तों की पाप राशि को दूर करने वाले हैं। इस प्रकार सगुण चिन्तन करना चाहिये। 
इसका अभ्यास करने से मनुष्य मन, वाणी तथा शरीर द्वारा होने वाले सभी पापों से मुक्त हो जाता है और अंत में वह विष्णु लोक को प्राप्त करता है।   
समाधि :: जो चैतन्य स्वरूप से युक्त और प्रशांत महासागर की भांति स्थिर हो,  जिसमें आत्मा  के सिवाय किसी अन्य वस्तु की प्रतीति न हो, उस ध्यान को समाधि  कहते हैं। जो ध्यान के समय अपने चित्त को ध्येय-परमात्मा, में लगा कर वायु हीन प्रदेश की अग्नि शिखा के भांति अविचल एवं स्थिर भाव से बैठा रहता  है, वह योगी समाधिस्थ कहा गया  है। जो न सुनता है , न सूँघता है, न देखता है, न रसास्वादन करता है, न स्पर्श का अनुभव करता है, न मन में संकल्प उठने देता है, न अभिमान करता है और न बुद्धि से किसी दूसरी-अन्य, वस्तु को जानता ही  है, केवल  काष्ठ (वृक्ष) की भांति अविचल भाव से ध्यान में स्थित रहता  है, ऐसे चिंतन परायण पुरुष को समाधिस्थ कहते हैं। जो अपने आत्म स्वरुप श्री विष्णु के ध्यान में संलग्न रहता है, उसके सामने अनेक दिव्य विघ्न उपस्थित होते हैं , वे सिद्धि की सूचनादेने वाले हैं। बड़े बड़े विघ्न, लालच, लोभ, ज्ञान, सिद्धियाँ, प्रतिभा, सद्गुण, सम्पूर्ण शील, कलाएँ, कन्याएँ बिना बुलाए उपस्थित होती हैं। जो इनको तिनके की भांति निस्सार मानकर त्याग देता है, उसी पर भगवान विष्णु की कृपा होती है और वे प्रसन्न होते हैं। 

 हरी ओम तत्  सत्।  

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