Saturday, November 14, 2015

CHANDR DYNASTY चंद्र वंश

CHANDR-LUNAR DYNASTY चंद्र वंश 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com   hindutv.wordpress.com    santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com   
चन्द्र वंश की उत्पत्ति सहस्त्रों सिरवाले विराट पुरुष नारायण के नाभि-सरोवर के कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा जी के पुत्र हुए अत्रि। वे अपने गुणों के कारण ब्रह्मा जी के समान ही थे। उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चन्द्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को ब्राह्मण, ओषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। उन्होंने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इससे उनका घमंड बढ़ गया और उन्होंने बलपूर्वक बृहस्पति की पत्नी तारा को हर लिया। देवगुरु बृहस्पति ने अपनी पत्नी को लौटा देने के लिये उनसे बार-बार याचना की, परन्तु वे इतने मतवाले हो गये थे कि उन्होंने किसी प्रकार उनकी पत्नी को नहीं लौटाया। ऐसी परिस्थिति में उसके लिये देवता और दानव में घोर संग्राम छिड़ गया। 
दानवों के गुरु शुक्राचार्य जी ने देवगुरु बृहस्पति जी के द्वेष से असुरों के साथ चन्द्रमा का पक्ष ले लिया और महादेव जी ने स्त्रेहवश समस्त भूतगणों के साथ अपने विद्यागुरु अंगिरा जी के पुत्र बृहस्पति का पक्ष लिया। देवराज इन्द्र ने भी समस्त देवताओं के साथ अपने गुरु बृहस्पति जी का ही पक्ष लिया। इस प्रकार तारा के निमित्त से देवता और असुरों का संहार करने वाला घोर संग्राम हुआ।
तदनन्तर अंगिरा ऋषि ने ब्रह्मा जी के पास जाकर यह युद्ध बंद कराने की प्रार्थना की। इस पर ब्रह्मा जी ने चन्द्रमा को बहुत डाँटा-फटकारा और तारा को उसके पति बृहस्पति जी के हवाले कर दिया। जब बृहस्पति जी को यह मालूम हुआ कि तारा तो गर्भवती है, तब उन्होंने कहा- 'दुष्टे! मेरे क्षेत्र में यह तो किसी दूसरे का गर्भ है। इसे तू अभी त्याग दे, तुरन्त त्याग दे। डर मत, मैं तुझे जलाऊँगा नहीं। क्योंकि एक तो तू स्त्री है और दूसरे मुझे भी सन्तान की कामना है। देवी होने के कारण तू निर्दोष भी है ही' अपने पति की बात सुनकर तारा अत्यन्त लज्जित हुई। उसने सोने के समान चमकता हुआ एक बालक अपने गर्भ से अलग कर दिया। उस बालक को देखकर बृहस्पति और चन्द्रमा दोनों ही मोहित हो गये और चाहने लगे कि यह हमें मिल जाय। अब वे एक-दूसरे से इस प्रकार ज़ोर-ज़ोर से झगड़ा करने लगे कि 'यह तुम्हारा नहीं, मेरा है।' ऋषियों और देवताओं ने तारा से पूछा कि 'यह किसका लड़का है।' परन्तु तारा ने लज्जावश कोई उत्तर न दिया। बालक ने अपनी माता की झूठी लज्जा से क्रोधित होकर कहा 'दुष्टे! तू बतलाती क्यों नहीं? तू अपना कुकर्म मुझे शीघ्र-से-शीघ्र बतला दे'। उसी समय ब्रह्मा जी ने तारा को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझा-बुझाकर पूछा। तब तारा ने धीरे से कहा कि 'चन्द्रमा का।' इसलिये चन्द्रमा ने उस बालक को ले लिया। परीक्षित! ब्रह्माजी ने उस बालक का नाम रखा 'बुध' क्योंकि उसकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी। ऐसा पुत्र प्राप्त करके चन्द्रमा को बहुत आनन्द हुआ। 
परीक्षित! बुध के द्वारा इला के गर्भ से पुरूरवा का जन्म हुआ। एक दिन इन्द्र की सभा में देवर्षि नारद जी पुरूरवा के रूप, गुण, उदारता, शील-स्वभाव, धन-सम्पत्ति और पराक्रम का गान कर रहे थे। उन्हें सुनकर उर्वशी के हृदय में कामभाव का उदय हो आया और उससे पीड़ित होकर वह देवांगना पुरूरवा के पास चली आयी। यद्यपि उर्वशी को मित्रावरुण के शाप से ही मृत्युलोक में आना पड़ा था। फिर भी पुरुषशिरोमणि पुरूरवा मूर्तिमान कामदेव के समान सुन्दर हैं- यह सुनकर सुर-सुन्दरी उर्वशी ने धैर्य धारण किया और वह उनके पास चली आयी। देवांगना उर्वशी को देखकर राजा पुरूरवा के नेत्र हर्ष से खिल उठे। उनके शरीर में रोमांच हो आया। राजा पुरूरवा ने कहा- सुन्दरी! तुम्हारा स्वागत है। बैठो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ? तुम मेरे साथ विहार करो और हम दोनों का यह विहार अनन्त काल तक चलता रहे। 
उर्वशी ने कहा- 'राजन! आप सौन्दर्य के मूर्तिमान स्वरूप हैं। भला, ऐसी कौन कामिनी है जिसकी दृष्टि और मन आप में आसक्त न हो जाय? क्योंकि आपके समीप आकर मेरा मन रमण की इच्छा से अपना धैर्य खो बैठा है। राजन! जो पुरुष रूप-गुण आदि के कारण प्रशंसनीय होता है, वही स्त्रियों को अभीष्ट होता है। अत: मैं आपके साथ अवश्य विहार करूँगी। परन्तु मेरे प्रेमी महाराज! मेरी एक शर्त है। मैं आपको धरोहर के रूप में भेड़ के दो बच्चे सौंपती हूँ। आप इनकी रक्षा करना। वीरशिरोमणे! मैं केवल घी खाऊँगी और मैथुन के अतिरिक्त और किसी भी समय आपको वस्त्रहीन न देख सकूँगी।' परम मनस्वी पुरूरवा ने ठीक है- ऐसा कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली। और फिर उर्वशी से कहा- 'तुम्हारा यह सौन्दर्य अद्भुत है। तुम्हारा भाव अलौकिक है। यह तो सारी मनुष्यसृष्टि को मोहित करने वाला हे। और देवि! कृपा करके तुम स्वयं यहाँ आयी हो। फिर कौन ऐसा मनुष्य है जो तुम्हारा सेवन न करेगा?
परीक्षित! तब उर्वशी कामशास्त्रोक्त पद्धति से पुरुषश्रेष्ठ पुरूरवा के साथ विहार करने लगी। वे भी देवताओं की विहारस्थली चैत्ररथ, नन्दनवन आदि उपवनों में उसके साथ स्वच्छन्द विहार करने लगे। देवी उर्वशी के शरीर से कमल केसर की सी सुगन्ध निकला करती थी। उसके साथ राजा पुरूरवा ने बहुत वर्षों तक आनन्द-विहार किया। वे उसके मुख की सुरभि से अपनी सुध-बुध खो बैठते थे। इधर जब इन्द्र ने उर्वशी को नहीं देखा, तब उन्होंने गन्धर्वों को उसे लाने के लिये भेजा और कहा- 'उर्वशली के बिना मुझे यह स्वर्ग फीका जान पड़ता है' वे गन्धर्व आधी रात के समय घोर अन्धकार में वहाँ गये और उर्वशी के दोनों भेड़ों को, जिन्हें उसने राजा के पास धरोहर रखा था, चुराकर चलते बने। उर्वशी ने जब गन्धर्वों के द्वारा ले जाये जाते हुए अपने पुत्र के समान प्यारे भेड़ों की 'बें-बें' सुनी, तब वह कह उठी कि 'अरे, इस कायर को अपना स्वामी बनाकर मैं तो मारी गयी। यह नंपुसक अपने को बड़ा वीर मानता है। यह मेरे भेड़ों को भी न बचा सका। इसी पर विश्वास करने के कारण लुटेरे मेरे बच्चों को लूटकर लिये जा रहे हैं। मैं तो मर गयी। देखो तो सही, यह दिन में तो मर्द बनता है और रात में स्त्रियों की तरह डरकर सोया रहता है' परीक्षित! जैसे कोई हाथी को अंकुश से बेध डाले, वैसे ही उर्वशी ने अपने वचन-बाणों से राजा को बींध दिया। राजा पुरूरवा को बड़ा क्रोध आया और हाथ में तलवार लेकर वस्त्रहीन अवस्था में ही वे उस ओर दौड़ पड़े। गन्धर्वों ने उनके झपटते ही भेड़ों को तो वहीं छोड़ दिया और स्वयं बिजली की तरह चमकने लगे। जब राजा पुरूरवा भेड़ों को लेकर लौटे, तब उर्वशी ने उस प्रकाश में उन्हें वस्त्रहीन अवस्था में देख लिया। (बस, वह उसी समय उन्हें छोड़कर चली गयी)। 
परीक्षित! राजा पुरूरवा ने जब अपने शयनागार में अपनी प्रियतमा उर्वशी को नहीं देखा तो वे अनमने हो गये। उनका चित्त उर्वशी में ही बसा हुआ था। वे उसके लिये शोक से विह्वल हो गये और उन्मत्त की भाँति पृथ्वी में इधर-उधर भटकने लगे। एक दिन कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के तटपर उन्होंने उर्वशी और उसकी पाँच प्रसन्नमुखी सखियों को देखा और बड़ी मीठी वाणी से कहा- 'प्रिये! तनिक ठहर जाओ। एक बार मेरी बात मान लो। निष्ठुरे! अब आज तो मुझे सुखी किये बिना मत जाओ। क्षणभर ठहरो; आओ हम दोनों कुछ बातें तो कर लें। देवि! अब इस शरीर पर तुम्हारा कृपा-प्रसाद नहीं रहा, इसी से तुमने इसे दूर फेंक दिया है। अत: मेरा यह सुन्दर शरीर अभी ढेर हुआ जाता है और तुम्हारे देखते-देखते इसे भेड़िये और गीध खा जायँगे'। 
उर्वशी ने कहा- राजन! तुम पुरुष हो। इस प्रकार मत मरो। देखो, सचमुच ये भेड़िये तुम्हें खा न जायँ। स्त्रियों की किसी के साथ मित्रता नहीं हुआ करती। स्त्रियों का हृदय और भेड़ियों का हृदय बिलकुल एक-जैसा होता है। स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता तो उनमें स्वाभाविक ही रहती है। तनिक-सी बात में चिढ़ जाती हैं और अपने सुख के लिये बड़े-बड़े साहस के काम कर बैठती हैं, थोड़े-से स्वार्थ के लिये विश्वास दिलाकर अपने पति और भाई तक को मार डालती हैं। इनके हृदय में सौहार्द तो है ही नहीं। भोले-भाले लोगों को झूठ-मूठ का विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं और नये-नये पुरुष की चाट से कुलटा और स्वच्छन्दचारिणी बन जाती हैं। तो फिर तुम धीरज धरो। तुम राजराजेश्वर हो। घबराओ मत। प्रति एक वर्ष के बाद एक राज तुम मेरे साथ रहोगे। तब तुम्हारे और भी सन्तानें होंगी।
राजा पुरूरवा ने देखा कि उर्वशी गर्भवती है, इसलिये वे अपनी राजधानी में लौट आये। एक वर्ष के बाद फिर वहाँ गये। तब तक उर्वशी एक वीर पुत्र की माता हो चुकी थी। उर्वशी के मिलने से पुरूरवा को बड़ा सुख मिला और वे एक रात उसी के साथ रहे। प्रात:काल जब वे विदा होने लगे, तब विरह के दु:ख से वे अत्यन्त दीन हो गये। उर्वशी ने उनसे कहा- 'तुम इन गन्धर्वों की स्तुति करो, ये चाहें तो तुम्हें मुझे दे सकते हैं। तब राजा पुरूरवा ने गन्धर्वों की स्तुति की। परीक्षित! राजा पुरूरवा की स्तुति से प्रसन्न होकर गन्धर्वों ने उन्हें एक अग्निस्थाली (अग्निस्थापन करने का पात्र) दी। राजा ने समझा यही उर्वशी है, इसलिये उसको हृदय से लगाकर वे एक वन में दूसरे वन में घूमते रहे। 
जब उन्हें होश हुआ, तब वे स्थाली को वन में छोड़कर अपने महल में लौट आये एवं रात के समय उर्वशी का ध्यान करते रहे। इस प्रकार जब त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ, तब उनके हृदय में तीनों वेद प्रकट हुए। फिर वे उस स्थान पर गये, जहाँ उन्होंने वह अग्निस्थली छोड़ी थी। जब उस स्थान पर शमीवृक्ष के गर्भ में एक पीपल का वृक्ष उग आया था, उसे देखकर उन्होंने उससे दो अरणियाँ (मन्थनकाष्ठ) बनायीं। फिर उन्होंने उर्वशीलोक की कामना से नीचे की अरणिको उर्वशी, ऊपर की अरणिको पुरूरवा और बीच के काष्ठ को पुत्ररूप से चिन्तन करते हुए अग्नि प्रज्वलित करने वाले मन्त्रों से मन्थन किया। उनके मन्थन से 'जातवेदा' नामक अग्नि प्रकट हुआ। राजा पुरूरवा ने अग्निदेवता को त्रयीविद्या के द्वारा आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि- इन तीन भागों में विभक्त करके पुत्ररूप से स्वीकार कर लिया। फिर उर्वशीलोक की इच्छा से पुरूरवा ने उन तीनों अग्नियों द्वारा सर्वदेवस्वरूप इन्द्रियातीत यज्ञपति भगवान श्रीहरि का यजन किया। 
यदु वंश :: शर्मिष्ठा और देवयानी का प्रसंग :- किसी समय दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। उनके साथ में गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी भी थी। शर्मिष्ठा अति मानिनी तथा अति सुन्दर राजपुत्री थी; किन्तु रूप लावण्य में देवयानी भी किसी प्रकार कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र उतार कर स्नान करने लगीं। उसी समय भगवान शंकर माता पार्वती के साथ उधर आ निकले। भगवान शंकर को आते देखकर वे सभी कन्याएँ लज्जावश दौड़ कर अपने-अपने वस्त्र पहनने लगीं। शीघ्रतावश शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिये। इस पर देवयानी ने क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से कहा कि एक असुर पुत्री होकर उसने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण कर उसका अपमान किया है। देवयानी ने शर्मिष्ठा को इस प्रकार से और भी अनेक अपशब्द कहे। देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुएँ में धकेल दिया।
शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् दैववश राजा ययाति शिकार खेलते हुये वहाँ पर आ पहुँचे। अपनी प्यास बुझाने के लिये वे कुएँ के निकट गये और उस कुएँ में वस्त्रहीन देवयानी को देखा। उन्होंने देवयानी के देह को ढँकने के लिये अपना दुपट्टा उस पर डाल दिया और उसका हाथ पकड़कर, उसे कुएँ से बाहर निकाला। इस पर देवयानी ने प्रेम पूर्वक राजा ययाति से कहा कि उन्होंने उसका हाथ पकड़ा था। अतः उसने उनको अपने पति रूप में स्वीकार कर लिया था। उसने बताया कि वो गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी थी और एक ब्राह्मण पुत्री होने के बावजूद वृहस्पति के पुत्र कच के शाप  के कारण, उसका  विवाह किसी ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता था।देव गुरु वृहस्पति के पुत्र कच गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रह कर सञ्जीवनी विद्या सीखने आये थे। देवयानी ने उन पर मोहित होकर उनके सामने अपना प्रणय निवेदन किया था। किन्तु गुरुपुत्री होने के कारण कच ने उसके प्रणय निवेदन को अस्वीकार कर दिया। इस पर देवयानी ने रुष्ट होकर कच को अपनी पढ़ी हुई विद्या को भूल जाने का शाप दिया। कच ने भी देवयानी को शाप दे दिया कि उसे कोई भी ब्राह्मण पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा।इसलिये उसने आग्रह किया कि ययाति प्रारब्ध समझ कर उसे पत्नी  स्वीकार कर लें। ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
देवयानी वहाँ से अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई तथा उनसे समस्त वृत्तांत कहा। शर्मिष्ठा के किये हुये कर्म पर शुक्राचार्य को बहुत क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गये। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा, अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से अनुनय-विनय करने लगे। इस प्रकार अनुनय-विनय किये जाने से शुक्राचार्य का क्रोध कुछ शान्त हुआ और वे बोले कि वे उसके उत्तर से संतुष्ट थे। परन्तु उन्हें देवयानी को भी प्रसन्न करना जरूरी था।वृषपर्वा ने देवयानी को प्रसन्न करने के लिये उन्होंने उससे कहा कि वे उसकी प्रसन्नता के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। देवयानी ने उनकी पुत्री शर्मिष्ठा को दासी के रूप में माँग लिया। राक्षस जाति और अपने परिवार पर आये संकट को टालने के लिये शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया।
शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ, उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। कुछ काल उपरान्त देवयानी के पुत्रवती होने पर शर्मिष्ठा ने भी पुत्रोत्पत्ति की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया, जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया। राजा ययाति के देवयानी से दो पुत्र यदु तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्य, अनु तथा पुरु हुये। जब देवयानी को ययाति तथा शर्मिष्ठा के सम्बंध के विषय में पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के घर चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर उनसे कहा कि वे स्त्री लम्पट, मन्द बुद्धि तथा क्रूर थे। इसलिये शुक्राचार्य ने उन्हें तत्काल वृद्धावस्था को प्राप्त होने का श्राप दे दिया। उनके शाप से भयभीत होकर राजा ययाति अनुनय करते हुये दैत्य शुक्राचार्य से बोले कि उनकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुये, उनकी तृप्ति नहीं हुई थी। इस शाप में तो उनकी पुत्री का भी अहित था। तब विचार कर के गुरु शुक्रचार्य ने कहा कि कोई उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो वे उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते थे। 
इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु से कहा कि  वो अपने नाना के द्वारा दी गई उनकी  वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था उन्हें दे दे। यदु ने आदर पूर्वक कहा कि असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर वो जीवित नहीं रहना चाहता था। ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की माँग की। सबसे छोटे पुत्र पुरु को छोड़ कर अन्य पुत्रों ने उनकी माँग को स्वीकार नहीं किया। पुरु ने अपने पिता को अपनी युवावस्था सहर्ष प्रदान कर दी। पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा कि उसने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः ययाति ने यदु को राज्याधिकार से वंचित करके राज्य पुरु को दे दिया। ययाति ने श्राप भी दिया कि उसके वंशज सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेंगे। राजा ययाति के इसी पुत्र यदु के वंश में भगवान् श्री कृष्ण का अवतार हुआ  तथा शिशुपाल ने धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में ययाति के इसी शाप का उल्लेख किया था।
राजा ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्होंने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया।
कौरवों के जन्म की कथा :- महर्षि वेदव्यास को धृतराष्ट्र से बहुत प्रेम था। उनके हस्तिनापुर आने पर गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की; जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को वरदान मांगने को कहा। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलवान सौ पुत्र होने का वर मांगा। समय पर गांधारी को गर्भ ठहरा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रहा। इससे गांधारी घबरा गई और उसने अपना गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के समान एक मांस पिण्ड निकला।
महर्षि वेदव्यास ने अपनी योगदृष्टि से यह सब देख लिया और वे तुरंत गांधारी के पास आए। तब गांधारी ने उन्हें वह मांस पिण्ड दिखाया। महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा कि तुम जल्दी से सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का प्रबंध कर दो तथा इस मांस पिण्ड पर जल छिड़को। जल छिड़कने पर उस मांस पिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। व्यासजी ने कहा कि मांस पिण्डों के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद ही खोलना। इतना कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांस पिण्डों से पहले दुर्योधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई।
पांडवों के जन्म की कथा :- एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों-कुन्ती तथा माद्री, के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक ऋषि और उनकी पत्नी को मृग के रूप में मैथुनरत देखा। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये ऋषि ने पाण्डु को शाप दिया कि उसने उन्हें मैथुन के समय बाण मारा था; अतः जब कभी भी वो मैथुनरत होंगे, उनकी मृत्यु हो जायेगी।इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले कि वो अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के वन में ही रहेंगे। दोनों ही रानियों ने  पाण्डु ने उनके साथ वन में अपने साथ रहने की इच्छा जाहिर कि जिसे पाण्डु ने स्वीकार कर लिया। 
इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा कि कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता। अतः वो उनको अपने साथ ले जाने में असमर्थ थे। 
ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी कुन्ती से बोले कि उनका जन्म लेना ही वृथा हो रहा क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता था। कुन्ती ने कहा उन्हें  दुर्वासा ऋषि ने ऐसा मन्त्र प्रदान कियाथा जिससे वो किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती थी। पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।
एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।त्रेता के पूर्व सत्ययुग में एकमात्र प्रणव (ॐकार) ही वेद था। सारे वेद-शास्त्र उसी के अन्तर्भूत थे। देवता थे एकमात्र नारायण; और कोई न था। अग्नि भी तीन नहीं, केवल एक था और वर्ण भी केवल एक 'हंस' ही था। परीक्षित! त्रेता के प्रारम्भ में पुरूरवा से ही वेदत्रयी और अग्नित्रयी का आविर्भाव हुआ। राजा पुरूरवा ने अग्नि को सन्तानरूप से स्वीकार करके गन्धर्व लोग की प्राप्ति की।
चन्द्र की उत्पत्ति :- तपस्वी अत्रि और अनुसूया की संतान बताया गया है जिसका नाम सोम है। दक्ष प्रजापति की सत्ताईस पुत्रियाँ थीं जिनके नाम पर सत्ताईस नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं। चन्द्रमा का इनमें से रोहिणी के प्रति विशेष अनुराग था। चन्द्रमा के इस व्यवहार से अन्य पत्नियाँ दुखी हुईं तो दक्ष ने उसे शाप दिया कि वह क्षयग्रस्त हो जाए जिसकी वजह से पृथ्वी की वनस्पतियाँ भी क्षीण हो गईं। विष्णु के बीच में पड़ने पर समुद्र मंथन से चन्द्रमा का उद्धार हुआ और क्षय की अवधि पाक्षिक हो गई। ब्रह्मा जी के पुत्र अत्रि ऋषि की तपस्या के दौरान उनकी आंखों से जल बहने लगा जिसके कारण दसों दिशाएं गर्भवती हो गईं। लेकिन उनका तेज ग्रहण न कर पाने के कारण दिशाओं ने उसका त्याग कर दिया। लेकिन बाद में ब्रह्मा ने संभाला और उसे लेकर वे दूर चले गए। उसी तेज पूर्ण बालक का नाम चंद्र रखा गया। औषधियों ने उसे पति के रूप में स्वीकार किया।
चन्द्र ने हजारों वर्ष तक विष्णु की उपासना की और उनसे यज्ञ में भाग ग्रहण करने का अधिकार पा लिया। इसके बाद चन्द्र ने एक यज्ञ आयोजित किया जिसमें अत्रि होता बने, ब्रह्मा उदगाता, विष्णु स्वयं ब्रह्मा बनें और भृगु अध्वर्यु। भगवान् शंकर ने रक्षपाल की भूमिका निभाई और इस तरह चन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया।
उसने अपने गुरु की पत्नी तारा को भी अपनी सहचरी बना दिया। जब बृहस्पति ने तारा को लौटाने का अनुरोध किया तो चन्द्रमा ने उसकी एक भी नहीं सुनी और अपनी जिद पर अड़ा रहा तो भगवान् शिव को क्रोध आ गया। उसके कारण ही चन्द्रमा ने तारा को लौटाया। जब तारा के पुत्र हुआ तो उसका नाम बुध रखा गया, वह चंद्रमा का पुत्र था।
मनु की पुत्री इला और बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ और चंद्रवंश चला। पुरुरवा ने 'प्रतिष्ठान' में अपनी राजधानी स्थापित की। पुरुरवा व अप्सरा उर्वशी से कई पुत्र हुए। सबसे बड़े आयु को गद्दी का अधिकार मिला। दूसरे पुत्र अमावसु ने कन्नौज (कान्यकुब्ज) में राज्य की स्थापना की। अमावसु का पुत्र नहुष आयु के बाद अधिकारी हुआ। नहुष का लड़का ययाति भारत का पहला चक्रवर्ती सम्राट बना।
पुरुरवा ने उर्वशी से आठ संतानें उत्पन्न कीं। इनमें से मुख्य पुत्र आयु के पांच पुत्र हुए और उनमें रजि के सौ पुत्र हुए और जो राजेश कहलाए।
चन्द्र वंश :- इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न राजा नहुष आयु के पहले पुत्र नहुष ने यति, ययाति, शर्याति, उत्तर, पर, अयाति और नियति सात पुत्र हुए। ययाति राजा बना और उसने अपनी पहली पत्नी से द्रुह्य, अनु और पुरु तथा दूसरी देवयानी से यदु और तुरवशु पुत्र उत्पन्न किए।
याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे; इसलिये राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके कर दिया।ययाति बिरजा के गर्भ से उत्पन्न महाराज नहुष के पुत्र थे। इनके पिता नहुष को अगस्त आदि ऋषियों ने इन्द्रप्रस्थ से गिरा दिया और अजगर बना दिया; क्योंकि उसने इंद्रासन के साथ-साथ इन्द्राणी शची को भी पाने की अभिलाषा-लालसा में सप्तऋषियों को पालकी ढ़ोने में लगा दिया, जिसमें वो स्वयं सवार था और सर्प-सर्प  (शीघ्र-चलो, शीघ्र चलो) कहकर,  उनको पैर से ऐड़ लगाई और उन्हें दुत्कारा। ययाति के ज्येष्ठ भ्राता ने राज्य लेने से इन्कार कर दिया, तब ययाति राजा के पद पर आसीन हुए। उन्होंने अपने चारों छोटे भाइयों को, चार दिशाओं का शासक नियुक्त कर दिया। उन्होंने राक्षस-दैत्य गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से विवाह किया। राक्षस राज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा, जिसे देवयानी ने वृषपर्वा से दासी  के रूप में प्राप्त किया था, से भी उन्होंने तीन पुत्र पैदा किये। देवयानी से दो पुत्र यदु और तुर्वसु हुए तथा शर्मिष्ठा से दुह्यु, अनु और पुरु नामक तीन पुत्र हुए। यदु के नाम से यादव वंश चला। 
तदोपरांत उन्होंने अपने पुत्र दुह्यु को दक्षिण-पूर्व की दिशा में, यदु को दक्षिण दिशा में, तुर्वसु को पश्चिम दिशा में तथा अनु को उत्तर दिशा का शासक बना दिया। पुरु को राज सिंहासन पर बिठाकर, उसके सब बड़े भाईयों को उसके अधीन कर स्वयम वन में तपस्या करने चले गए। उन्होंने ऐसी आत्म आराधना की जिससे अल्प काल में ही परमात्मा से मिलकर मोक्षधाम को प्राप्त हुए। देवयानी भी सब राज नियमों से विरक्त होकर भगवान् का भजन करते हुए परमात्मा में लीन हो गई। [Please refer to चन्द्र वंश की उत्पत्ति santoshkathasagar.blogspot.com]
SUDYUMN-ILA: Manu was the son of Bhagwan Sury and Sandhya. Manu was married to Shraddha. They organised a Putr Kameshti Yagy under Rishi Vashishth. The queen prayed to get a girl child. Consequently, a girl was born to them. She was named Ila. But the King requested Vashishth to transform her into a boy. Then he was named Sudyumn. One day Sudyumn had gone on a hunting excursion. Riding the horse with his ministers, Sudyumn reached a forest at the foothills of Meru Mountain. The forest was the nuptial abode of Bhagwan Shiv and Mata Parvati. As soon as Sudyumn and his companions entered the forests, they all, even horses, got converted into females. This happened because of an earlier event. Once, Mata Parvati was sitting naked in the lap of Bhagwan Shiv when suddenly some great sages arrived there to have a sight of Bhagwan Shiv. Mata Parvati sank with shyness and ran to don some cloth. When the sages saw that Maa Gauri-Bhagwan Shiv were enjoying intimacy, they moved at once to the hermitage of Nar-Narayan. Right at that moment, in order to please Mata Parvati, Bhagwan Shiv said that any male except him, would turn into a female as soon as he entered the forest. It was because of these words of Bhagwan Shiv, that Sudyumn and his companions were transformed into females. While Sudyumn was roaming as woman, Budh, the son of Chandr, fell in love with her and they agreed to get married. From their marriage, a son, Pururava was born. Sudyumn, as a woman, prayed to Bhagwan Shiv to free him from woman hood. Bhagwan Shiv blessed Sudyumn that he would be a man for a month and a woman for another. Thus this cycle would continue through out his life.. Thereafter, Sudyumn returned to his kingdom and began to rule it religiously. He got three sons in due course, Utkal, Gay and Vimal. In the twilight of his life, Sudyumn gave his kingdom to Pururava and he took exile.
चन्द्रवंश क्षत्रिय ब्रह्मा जी के दूसरे पुत्र अत्री की संतान हैं। महर्षि अत्री की धर्मपत्नी अनुसूया का बड़ा पुत्र सोम था। सोम का वंश होने से यह सोम या चन्द्रवंश कहलाया।ब्रह्मा जी के पुत्र अत्रि ऋषि की तपस्या के दौरान उनकी आंखों से जल बहने लगा जिसके कारण दसों दिशाएं गर्भवती हो गईं। लेकिन उनका तेज ग्रहण न कर पाने के कारण दिशाओं ने उसका त्याग कर दिया। लेकिन बाद में ब्रह्मा जी ने संभाला और उसे लेकर वे दूर चले गए। उसी तेज पूर्ण बालक का नाम चंद्र रखा गया। औषधियों ने उसे पति के रूप में स्वीकार किया।
चन्द्र ने हजारों वर्ष तक भगवान् विष्णु की उपासना की और उनसे यज्ञ में भाग ग्रहण करने का अधिकार पा लिया। इसके बाद चन्द्र ने एक यज्ञ आयोजित किया जिसमें अत्रि होता बने, ब्रह्मा उदगाता, विष्णु स्वयं ब्रह्मा बनें और भृगु अध्वर्यु। भगवान् शंकर ने रक्षपाल की भूमिका निभाई और इस तरह चन्द्र सम्पूर्ण ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया।
उसने अपने गुरु की पत्नी तारा को भी अपनी सहचरी बना दिया। जब बृहस्पति ने तारा को लौटाने का अनुरोध किया तो चन्द्रमा ने उसकी एक भी नहीं सुनी और अपनी जिद पर अड़ा रहा तो भगवान् शिव को क्रोध आ गया। उसके कारण ही चन्द्रमा ने तारा को लौटाया। जब तारा के पुत्र हुआ तो उसका नाम बुध रखा गया, वह चंद्रमा का पुत्र था।
मनु की पुत्री इला और बुध से पुरुरवा का जन्म हुआ और चंद्रवंश चला। पुरुरवा ने प्रतिष्ठान में अपनी राजधानी स्थापित की। पुरुरवा व अप्सरा उर्वशी से कई पुत्र हुए। सबसे बड़े आयु को गद्दी का अधिकार मिला। दूसरे पुत्र अमावसु ने कन्नौज (-कान्यकुब्ज) में राज्य की स्थापना की। अमावसु का पुत्र नहुष आयु के बाद अधिकारी हुआ। नहुष का लड़का ययाति भारत का पहला चक्रवर्ती सम्राट बना।
पुरुरवा ने उर्वशी से आठ संतानें उत्पन्न कीं। इनमें से मुख्य पुत्र आयु के पांच पुत्र हुए और उनमें रजि के सौ पुत्र हुए और जो राजेश कहलाए।
 सोम या चन्द्र का पुत्र बुध था, जिसका विवाह मनु की पुत्री इला से हुआ था।  बुध ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठानपुर को बनाया था, जो चिरकाल तक इस की राजधानी बना रहा।  बुध का पुत्र पुरुरवा हुआ जिसने उर्वशी नाम की अप्सरा से आयु नामक पुत्र उत्पन्न किया। 
आयु का पुत्र नहुष और नहुष का पुत्र ययाति। ययाति की दो पत्निय थी। इनकी एक रानी श्मिष्ठा जो दानव राज वृषपर्वा की पुत्री थी।  उसके तीन पुत्र हुए  (1). द्र्हू, (2).  पुरु (-चन्द्रवंशीय रजा हुए) और (3). अनु . ययाति की दूसरी रानी देवयानि जो की असुर गुरु शुकर्चार्य की पुत्री थी, जिससे दो पुत्र हुए। (1). यदु,  (2). दुर्व्रसू। 
चन्द्र वंशी नरेशों की नामावली :- [परमपिता ब्रम्हा से प्रजापति दक्ष, दक्ष से अदिति, अदिति से बिस्ववान, बिस्ववान से मनु, मनु से इला, इला से पुरुरवा हुए जिन्होंने उर्वशी से विवाह किया, पुरुरवा से आयु] (1). ऋषि अत्री से उत्पत्ति,  (2). सोम या चन्द्र (3). बुध, (4). पुरुरवा, (5). आयु, (6). नहुष, (7). ययाति, (8). पुरु, (9). जनमेजय, (10). प्रचिनवान, (11). प्रवीर, (12). मनस्यु, (13). अभयद, (14). सुघु, (15). बहुगत, (16). संयति, (17). अहंयाति, (18). रोद्राशव, (19). त्रतेयु, (20). मतनार, (21). तसु, (22). एलिन, (23). दुष्यंत, (24). भरत, (25). मन्यु, (26). वृहक्ष्त्र, (27). सुहोत्र, (28). हस्ती, (29). अजमीढ़, (30). ऋश, (31). संवरण, (32). कुरु, (33). जन्हु, (34). जन्मेजय, (35). सुरथ, (36). विदुरथ, (37). सार्वभोम, (38). जयत्सेन, (39). आराधित, (40). अयुतायु, (41). अक्रोधन, (42). देवातिथि, (43). ऋश, (44). भीमसेन, (45). दिलीप, (46). प्रतीप, (48). शांतनु, (49). विचित्रवीर्य, पाण्डु, (50). युधिष्ठर, (51). परीक्षित, (52). जन्मेजय, (53). शतानीक, (54). सह्स्त्रनिक, (55). अश्वमेधदत, (56). अधिसिभ्कृष्ण, (57). निच्शु, (58). उष्ण, (59).  चित्ररथ, (60). शुचिरथ, (61). व्र्सिमान, (62).  सुषेण, (63). सुनीथ, (64). रुच, (65). सुकिबल, (66). सुखीबल, (67). सुनय, (68). मेधावी, (70). न्र्पंजय, (71). म्रद। 
***(6). आयु से नहुष हुए,  जो इन्द्र के पद पर भी आसीन हुए, परन्तु सप्तर्षियों के श्राप के कारण पदच्युत हुए। 
(7). नहुष के बड़े पुत्र यति थे जो सन्यासी हो गए, इसलिए उनके दुसरे पुत्र ययाति राजा हुए। ययाति के पुत्रों से ही समस्त वंश चले। ययाति के पाँच पुत्र थे। देवयानी से यदु और तर्वासु तथा शर्मिष्ठा से दृहू, अनु, एवं पुरु। यदु से यादवों का यदुकुल चला, जिसमें आगे चलकर भगवान् श्री कृष्ण ने जन्म लिया। तर्वासु से मलेछ, दृहू से भोज तथा पुरु।  
(8). पुरु से सबसे प्रतापी पुरुवंश चला। अनु का वंश ज्यादा नहीं चला। पुरु के कौशल्या से जन्मेजय हुए। 
(9). जन्मेजय के अनंता से प्रचिंवान हुए। 
(10). प्रचिंवान के अश्म्की से संयाति हुए। 
(16). संयाति के वारंगी से अहंयाति हुए। 
(17). अहंयाति के भानुमती से सार्वभौम।
(23). दुष्यंत के शकुंतला से भरत। 
(24). भरत के सुनंदा से भमन्यु। 
(25). मन्यु-भमन्यु के वृहक्ष्त्र-विजय से सुहोत्र। 
(27). सुहोत्र के सुवर्णा से हस्ती, जिनके नाम पर पूरे प्रदेश का नाम हस्तिनापुर पड़ा। 28 वें राजा हस्ती ने हस्तिनापुर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया। इसके बाद कुरु ने कुरुक्षेत्र तक अपने राज्य का विस्तार किया। 
(28). हस्ती के यशोधरा से विकुंठन, विकुंठन के सुदेवा से अजमीढ़। 
(29). अजमीढ़ से संवरण। 
(31). संवरण के तपती से कुरु हुए,  जिनके नाम से ये वंश कुरुवंश कहलाया। 
(32). कुरु के शुभांगी से विदुरथ। 
(36). विदुरथ के संप्रिया से अनाश्वा। अनाश्वा के अमृता से परीक्षित, परीक्षित के सुयशा से भीमसेन।  
(37). भीमसेन-सार्वभौम के सुनंदा से जयत्सेन। 
(38). जयत्सेन के सुश्रवा से अवाचीन। अवाचीन के मर्यादा से अरिह। अरिह के खल्वंगी से महाभौम। महाभौम के शुयशा से अनुतनायी। 
(40). अयुतायु-अनुतनायी के कामा से अक्रोधन।
(41). अक्रोधन के कराम्भा से देवातिथि हुए। 
(42). देवातिथि के मर्यादा से अरिह। अरिह के सुदेवा से ऋक्ष। ऋक्ष के ज्वाला से मतिनार। मतिनार के सरस्वती से तंसु। तंसु के कालिंदी से इलिन। इलिन के राथान्तरी से दुष्यंत।  
(37). भीमसेन के कुमारी से प्रतिश्रवा। प्रतिश्रावा से प्रतीप, प्रतीप के सुनंदा से तीन पुत्र देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु का जन्म हुआ। देवापि किशोरावस्था में ही सन्यासी हो गए एवं बाह्लीक युवावस्था में अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ने में लग गए इसलिए सबसे छोटे पुत्र शांतनु को गद्दी मिली। 
(48). शांतनु के गंगा से देवव्रत हुए जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए. भीष्म का वंश आगे नहीं बढा क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रम्हचारी रहने की प्रतिज्ञा की थी। शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए। चित्रांगद की मृत्यु युवावस्था में ही हो गयी। विचित्रवीर्य कि दो रानियाँ थी, अम्बिका और अम्बालिका।  विचिचित्रवीर्य भी संतान प्राप्ति के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गए, लेकिन महर्षि व्यास की कृपा से उनका वंश आगे चला। 
(49). विचित्रवीर्य के महर्षि व्यास की कृपा से अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पांडु तथा अम्बिका की दासी से विदुर का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र से दुर्योधन, दुशासन, इत्यादि 100 पुत्र एवं दुशाला नामक पुत्री हुई। इनके एक वैश्य कन्या से युयुत्सु नमक पुत्र भी हुआ जो दुर्योधन से छोटा और दुशासन से बड़ा था।  इतने पुत्रों के बाद भी इनका वंश आगे नहीं चला, क्योंकि इनके समूल वंश का नाश महाभारत के युद्घ में हो गया।  किन्दम ऋषि के श्राप के कारण पांडु संतान उत्पत्ति में असमर्थ थे। उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को दुर्वासा ऋषि के मंत्र से संतान उत्पत्ति की आज्ञा दी। कुंती के धर्मराज से युधिष्ठिर, पवनदेव से भीम और इन्द्रदेव से अर्जुन हुए तथा माद्री के अश्वनीकुमारों से नकुल और सहदेव का जन्म हुआ। इन  पाँचों के जन्म में एक-एक साल का अंतर था। जिस दिन भीम का जन्म हुआ उसी दिन दुर्योधन का भी जन्म हुआ। 
(50). युधिष्ठिर के द्रौपदी से प्रतिविन्ध्य एवं देविका से यौधेय हुए। भीम के द्रौपदी से सुतसोम, जलन्धरा से सवर्ग तथा हिडिम्बा से घतोत्कच हुआ। घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक हुआ। नकुल के द्रौपदी से शतानीक एवं करेनुमती से निरमित्र हुए। सह्देव के द्रौपदी से श्रुतकर्मा तथा विजया से सुहोत्र हुए।  इन चारों भाइयों के वंश नहीं चले। अर्जुन के द्रौपदी से श्रुतकीर्ति, सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इलावान तथा चित्रांगदा से बभ्रुवाहन हुए। इनमें से केवल अभिमन्यु का वंश आगे चला। अभिमन्यु के उत्तरा से परीक्षित हुए, इन्हें ऋषि के श्रापवश तक्षक ने डसा-काठा और ये मृत्यु को प्राप्त हुए। 
 (51). परीक्षित से जन्मेजय हुए. इन्होने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पयज्ञ करवाया जिसमे सर्पों के कई जातियां समाप्त हो गयी, लेकिन तक्षक जीवित बच गया। 
(52). जन्मेजय से शतानीक तथा शंकुकर्ण। 
(53). शतानीक से अश्वामेघ्दत्त।  
ययाति के पुत्रो से प्रारम्भ वंश :- (1). यदु से यादव, (2). तुर्वसु से यवन (-Europeans, present day Jews and Christians), (3). दुह्यु से भोज, (4). अनु से मल्लेछ (-Present day Muslims), (5). पुरु से पौरव।
यदु को दक्षिण दिशा में चर्मणवती वर्तमान चम्बल क्षेत्र, वेववती (-वेतवा) और शुक्तिमती (-केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। वह अपने सब भाइयो मे श्रेष्ठ एवं तेजस्वी निकला। यदु का विवाह धौमवर्ण की पाँच कन्यायों के साथ हुआ था। श्रीमद भागवत महापुराण के अनुसार यदु के चार देवोपम पुत्र :- सहस्त्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु थे। इनमे से सहस्त्रजित और क्रोष्टा के वंशज पराक्रमी हुए तथा इस धरा पर ख्याति प्राप्त किया।सृष्टि उत्पत्ति से यदु तक और यदु से श्री कृष्ण के मध्य यादव वन्शावली (-प्रमुख यादव राजवंश) इस प्रकार है:-परमपिता नारायण, ब्रह्मा, अत्रि, चन्द्रमा (-चन्द्रमा से चद्र वंश चला), बुध, पुरुरवा, आयु, नहुष, ययाति, यदु (-यदु से यादव वंश चला), क्रोष्टु, वृजनीवन्त, स्वाहि(-स्वाति), रुषाद्धगु, चित्ररथ, शशविन्दु, पृथुश्रवस, अन्तर (-उत्तर),, सुयग्य, उशनस, शिनेयु, मरुत्त, कन्वलवर्हिष, रुक्मकवच, परावृत्ज्या, मघ, विदर्भ्कृ, त्भीम, कुन्ती, धृष्ट, निर्वृति, विदूरथ, दशाह, व्योमन, जीमूत, विकृति, भीमरथ, रथवर, दशरथ, येकादशरथ, शकुनि, करंभ, देवरात, देवक्षत्र, देवन, मधु, पुरूरवस, पुरुद्वन्त, जन्तु (-अन्श), सत्वन्तु, भीमसत्व .भीमसत्व के दो पुत्र थे (1). कुकुर और (2). देवमीढ़-देविमूढस। कुकुर से अन्धक और देवमीढ़ से वृष्णि वंश चला। 
भीमसत्व के बाद यादव राजवंशो की प्रधान शाखा से दो मुख्य शखाएँ हो गईं :- पहला अन्धक वंश और दूसरा वृष्णि वंश। अन्धक वंश में कंस का जन्म हुआ तथा वृष्णि वंश में भगवान श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था।
अन्धक वंश :- (1). कुकुर और देविमूढस (-देविमूढस के दो रानिया थीं). (2). धृष्ट, (3) कपोतरोपन, (4). विलोमान, (5). अनु, (6). दुन्दुभि, (7). अभिजित, (8). पुनर्वसु, (9). आहुक, (10-i). उग्रसेन का यक्ष से उत्त्पन्न नाजायज़ पुत्र कंस और पुत्री देवकी, देवकी का विवाह वासुदेव जी से हुआ जिनसे भगवान् श्री कृष्ण उतपन्न हुए , (10-ii). देवक का पुत्र शूर।
वृष्णि वंश  :- देविमूढस (-देवमीढ़) के दो रानियाँ थीें। पहली मदिषा और दूसरी वैश्यवर्णा। पहली रानी मदिषा के गर्भ से शूर उत्पन्न हुए। शूर की पत्नी भोज राजकुमारी से दस पुत्र तथा पांच पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। (1). वासुदेव से भगवान् श्री कृष्ण और बलराम जी, (2). देवभाग से उद्धव नामक पुत्र, (3). देवश्रवा से शत्रुघ्न (-एकलव्य) नामक पुत्र, (4). अनाधृष्टि से यशस्वी नामक पुत्र हुआ, (5). कनवक से तन्द्रिज और तन्द्रिपाल नामक दो पुत्र, (6). वत्सावान के गोद लिए पुत्र कौशिक थे, (7). गृज्जिम से वीर और अश्वहन नामक दो पुत्र हुए, (8). श्याम अपने छोटे भाई शमीक को पुत्र मानते थे, (9). शमीक के कोइ संतान नही थी, (10). गंडूष के गोद लिए हुए चार पुत्र थे और इनके अतिरिक्त शूर के पांच कन्याए भी उत्पन्न हुई थी जिनके नाम उनके पुत्रों सहित :: (1). पृथुकी से दन्तवक्र  (-पूर्व जन्म में कुम्भकर्ण, हिरण्याक्ष और भगवान् श्री विष्णु के वैकुण्ठ लोक का द्वारपाल विजय) नामक पुत्र, (2). पृथा (कुंती) से :- युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन नामक तीन पुत्र, (3). श्रुतदेवा से :- जगृहु नामक पुत्र, (4). श्रुतश्रवा से :- श्रुतश्र।  
यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्त्रजित के एक पौत्र का नाम था हैहय। हैहय के वंशज हैहयवंशी यादव क्षत्रिय कहलाए। हैहय के हजारों पुत्र थे। उनमे से केवल पाँच ही जीवित बचे थे। बाकी सब युद्ध करते हुए भगवान् परशुराम के हाथों मारे गए।बचे हुए पुत्रों के नाम थे :- जयध्वज, शूरसेन,वृषभ, मधु और ऊर्जित। जयध्वज के तालजंघ नामक एक पुत्र था। तालजंघ के वंशज तालजंघ क्षत्रिय कहलाये। तालजंघ के भी सौ पुत्र थे। उनमें से अधिकांश को राजा सगर ने मार डाला था। तालजंघ के जीवित बचे पुत्रों में एक का नाम था वीतिहोत्र। वीतिहोत्र के मधु नामक एक पुत्र हुआ। मधु के वंशज माधव कहलाये। मधु के कई पुत्र थे। उनमें से एक का नाम था वृष्णि। वृष्णि के वंशज वाष्र्णेव कहलाये। 
यदु के दूसरे पुत्र का नाम क्रोष्टा था। क्रोष्टा के बाद उसकी बारहवीं पीढी में विदर्भ नामक एक राजा हुए। विदर्भ के कश, क्रथ और रोमपाद नामक तीन पुत्र थे। विदर्भ के तीसरे वंशधर रोमपाद के पुत्र का नाम था बभ्रु। बभ्रु के कृति, कृति के उशिक और उशिक के चेदि नामक पुत्र हुआ।चेदि के नाम पर चेदिवंश का प्रादुर्भाव हुआ। इसी चेदिवंश में शिशुपाल आदि उत्पन्न हुए। विदर्भ के दुसरे पुत्र क्रथ के कुल में आगे चल सात्वत नामक एक प्रतापी राजा हुए। उनके नाम पर यादवों को कई जगह सात्वत वंशी भी कहा गया है। सात्वत के सात पुत्र थे। उनके नाम थे :- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देववृक्ष, महाभोज और अन्धक। इनसे अलग अलग सात कुल चले। उनमें से वृष्णि और अन्धक कुल के वंशज अन्य की अपेक्षा अधिक विख्यात हुए। वृष्णि के नाम पर वृष्णिवंश चला। इस वंश में लोक रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था जिससे यह वंश परम पवित्र हो गया और इस धरा पर सर्वाधिक विख्यात हुआ। भगवान् श्री कृष्ण की माता देवकी का जन्म अन्धक वंश में हुआ था। इस कारण अन्धक वंश ने भी बहुत ख्याति प्राप्त की।
अन्धक के वंशज अन्धक वंशी यादव कहलाये। अन्धक के कुकुर, भजमन, शुचि और कम्बलबर्हि नामक चार लड़के थे। इनमें से कुकुर के वंशज बहुत प्रसिद्द हुए। कुकुर के पुत्र का नाम था वह्नि। वह्नि के विलोमा, विलोमा के कपोतरोमा और कपोतरोमा के अनु नामक पुत्र हुआ। अनु के पुत्र का नाम था, अन्धक। अन्धक के पुत्र का नाम दुन्दुभि और दुन्दुभि के पुत्र का नाम था अरिद्योत। अरिद्योत के पुनर्वसु नाम का एक पुत्र हुआ। पुनर्वसु के दो संतानें थीं :- पहला आहुक नाम का पुत्र और दूसरा आहुकी नाम की कन्या। आहुक के देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए। देवक के देववान, उपदेव, सुदेव, देववर्धन नामक चार पुत्र तथा धृत, देवा, शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी नामक चार कन्यायें थीं। आहुक के छोटे बेटे उग्रसेन के कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान नामक नौ पुत्र और कन्सा, कंसवती, कंका, शुरभु और राष्ट्र्पालिका नामक पाँच कन्यायें।
सात्वत के पुत्रो से जो वंश परंपरा चली उनमें सर्वाधिक विख्यात वंश का नाम है वृष्णि-वंश। इसमें सर्वव्यापी भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया था जिससे यह वंश परम पवित्र हो गया। वृष्णि के दो रानियाँ थीं :- एक नाम था गांधारी और दूसरी का माद्री। माद्री के एक देवमीढुष नामक एक पुत्र हुआ। देवमीढुष के भी मदिषा और वैश्यवर्णा नाम की दो रानियाँ थी।
देवमीढुष की बड़ी रानी मदिषा के गर्भ दस पुत्र हुए, उनके नाम थे :- वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सुजग्य, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। उनमें वसुदेव जी सबसे बड़े थे। वसुदेव के जन्म के समय देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश से पुष्प की वर्षा की थी और आनक तथा दुन्दुभी का वादन किया था। इस कारण वसुदेव जी को आनकदुन्दु भी कहा जाता है। 
श्रीहरिवंश पुराण में वसुदेव के चौदह पत्नियों होने का वर्णन आता है, उनमें रोहिणी, इंदिरा, वैशाखी, भद्रा और सुनाम्नी नामक पांच पत्नियाँ पौरव वंश से, देवकी आदि सात पत्नियाँ अन्धक वंश से तथा सुतनु तथा वडवा नामक, वासूदेव की देखभाल करने वाली, दो स्त्रियाँ अज्ञात अन्य वंश से थीं। उग्रसेन के बड़े भाई देवक के देवकी सहित सात कन्यायें थीं। उन सबका विवाह वसुदेव जी से हुआ था। देवक की छोटी कन्या देवकी के विवाहोपरांत उसका चचेरा भाई कंस जब रथ में बैठा कर, उन्हें घर छोड़ने जा रहा था, तो मार्ग में आकाशवाणी हुई कि कंस जिसे वह बहुत ज्यादा प्यार से ससुराल पहुँचाने जा रहा था, उसी के आठवे पुत्र के हाथों उसकी मृत्यु निश्चित थी। देववाणी सुनकर कंस अत्यंत भयभीत हो गया और वसुदेव तथा देवकी को कारागार में बंद कर दिया। महायशस्वी भगवान् श्री कृष्ण का जन्म इसी कारागार में हुआ था। भगवान् श्री कृष्ण ने देवकी के गर्भ से अवतार लिया और वसुदेव जी को भगवान् श्री कृष्ण के पिता होने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। वसुदेव के एक पुत्र का नाम बलराम था। बलराम जी भगवान् श्री कृष्ण के बड़े भाई थे। उनका जन्म वसुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ से हुआ था। रोहिणी गोकुल में वसुदेव के चचेरे भाई नन्द के यहाँ गुप्त रूप से रह रही थी। 
यादवो ने कालान्तर मे अपने केन्द्र दशार्न, अवान्ति, विदर्भ् एवं महिष्मती मे स्थापित कर लिए। बाद मे मथुरा और द्वारिका यादवो की शक्ति के महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली केन्द्र बने। इसके अतिरिक्त शाल्व मे भी यादवों की शाखा स्थापित हो गई। मथुरा महाराजा उग्रसेन के अधीन था और द्वारिका वसुदेव के। महाराजा उग्रसेन का पुत्र कंस था और वासुदेव के पुत्र श्री कृष्ण थे।
देवमीढुष की दूसरी रानी वैश्यवर्णा के गर्भ से पर्जन्य नामक पुत्र हुआ। पर्जन्य के नन्द सहित नौ पुत्र हुए, जिनके नाम थे :- धरानन्द, ध्रुवनन्द, उपनंद, अभिनंद, सुनंद, कर्मानन्द, धर्मानंद, नन्द और वल्लभ। नन्द से नन्द वंशी यादव शाखा का प्रादुर्भाव हुआ। नन्द और उनकी पत्नी यशोदा ने गोकुल में भगवान् श्री कृष्ण का पालन-पोषण किया। इस कारण वह आज भी परम यशस्वी और श्रद्धेय हैं। वसुदेव और नन्द वृष्णि-वंशी यादव थे और दोनों चचेरे भाई थे।
Chandra Vansh later recognised as Kuru Vansh, had its descendants called Pandavs. Arjun had a son named Erawan from Nag Kenya Ullupi. Babbru Vahan was his son, from the daughter of Mani Pur King. Abhimanyu, his son from Subhdra (-Bhagwan Shri Krashan’s sister) died bravely during Maha Bharat, whose son Parikshit, killed in the womb by Ashwasthama by the misuse of Brahmastr  and enlivened by Bhagwan Shri Krishan, took over the reins of Hastina Pur after the Pandavs went to heaven. His soul relinquished the body before being bitten by Takshak-the snake.
Parikshit had four sons: Jan Majay, Shrut Sen, Ugra Sen and Bhim Sen. Jan Majay’s son Shataneek attained Moksh (-Salvation) by acquiring Vedic knowledge-education-learning from Yagy Vallaky, weaponry-marshal arts from Krap and after renunciation from comforts-luxuries attained self realization-enlightenment from Mahrishi Shaunik.
Names of his descendants :: Shataneek-Ashwa Madh Dutt-Adhiseen Krishan-Nichunku-Ushn-Vichtr Rath-Shashi Rath-Vrashni-Man-Shushan-Sunith-Nrap-Chakshu-Sukhaval-Paripalve-Sunay-Medhavi-Ripunjay-Mradu-Tigm-Brahad Rath-Vasu Dan-Shataneek (II)-Udyan-Ahiner-Dand Pani-Nirmitr-Kshamak. Kshamak deserted the throne and went to Kalap Gram, where he was killed by the Mallechs. He had a son named Preydyot, born after the advice and fruitful efforts of Dev Rishi Narad, who organized Mallech (-term used to identify the inhabitants of west Asia and Europe-present day, Jews, Christians and Muslims) Yagy which led to the destruction of Mallechs in that region.
The Vansh which evolved out of Brahmns and Kshatriys, which had mighty Raj Rishis (-mighty people leading the life of saints-sages) in its courts, terminated-ended with Kshemak. Nichunku Moved to Kaushambi after Hastina Pur was swayed by the mighty holy revered, river deity Ganga.
राजा युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियाँ :: महाभारत के बाद से आधुनिक काल तक सम्राट युधिष्ठिर की 30 पीढ़ियों  के सभी राजाओं का विवरण जिन्होंने महाभारत युद्ध के पश्चात् ने 1770 वर्ष 11 माह 10 दिन तक राज्य किया था -

क्रमांक                   शासक                                                 वर्ष....माह.. दिन
(1). राजा युधिष्ठिर           (Raja Yudhisthir)...                36.... 08.... 25
(2).  राजा परीक्षित         (Raja Parikshit)......              60.... 00..... 00
(3). राजा जनमेजय         (Raja Janmejay)....              84.... 07...... 23
(4). अश्वमेध                   (Ashwamedh ).........             82.....08..... 22
(5). द्वैतीयरम                 (Dwateeyram )........             88.... 02......08
(6). क्षत्रमाल                   (Kshatramal)...........            81.... 11.....   27
(7).चित्ररथ                      (Chitrarath)............             75......03.....18
(8). दुष्टशैल्य                   (Dushtashailya)......            75.....10...... 24
(9).राजा उग्रसेन             (Raja Ugrasain).......            78.....07......21
(10). राजा शूरसेन          (Raja Shoorsain)......            78....07.......21
(11). भुवनपति                (Bhuwanpati)............          69....05......05
(12). रणजीत                  (Ranjeet)...................          65....10.....  04
(13). श्रक्षक                    (Shrakshak)...............         64.....07......04
(14). सुखदेव                  (Sukhdev)..................        62....  00......24
(15). नरहरिदेव               (Narharidev).............        51.....10.......02
(16). शुचिरथ                  (Suchirath)................      42......11.......02
(17). शूरसेन द्वितीय        (Shoorsain II)........           58.....10.......08
(18). पर्वतसेन                (Parvatsain )...............     55.....08.......10
(19). मेधावी                    (Medhawi).................       52.....10......10
(20). सोनचीर                 (Soncheer).................     50.....08.......21
(21). भीमदेव                  (Bheemdev)................    47.....09.......20
(22). नरहिरदेव द्वितीय   (Nraharidev II)...              45.....11.......23
(23). पूरनमाल                (Pooranmal)...............   44.....08.......07
(24). कर्दवी                    (Kardavi).....................  44.....10........08
(25). अलामामिक           (Alamamik)...............     50....11........08
(26). उदयपाल               (Udaipal)...................... 38....09........00
(27). दुवानमल                (Duwanmal).................  40....10.......26
(28). दामात                    (Damaat).......................32....00......00
(29).भीमपाल                  (Bheempal)................... 58....05.....08
(30). क्षेमक                     (Kshemak).....................48....11.......21

क्षेमक के प्रधानमन्त्री विश्व ने क्षेमक का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 14 पीढ़ियों ने 500 वर्ष 3 माह 17 दिन तक राज्य किया :-
क्रमांक  शासक                                  King                          वर्ष    माह   दिन
(1). विश्व                             (Vishwa)......................17        3         29
(2). पुरसेनी                          (Purseni)....................42       8         21
(3). वीरसेनी                         (Veerseni).................. 52      10         07
(4). अंगशायी                       (Anangshayi)...........    47      08        23
(5). हरिजित                         (Harijit)....................   35       09       17
(6). परमसेनी                       (Paramseni).............   44       02        23
(7). सुखपाताल                     (Sukhpatal).........        30       02        21
(8). काद्रुत                            (Kadrut)...................  42       09        24
(9). सज्ज                               (Sajj)........................  32        02        14
(10). आम्रचूड़                        (Amarchud).........      27        03        16
(11). अमिपाल                       (Amipal) .............       22         11         25
(12). दशरथ                          (Dashrath)...............  25        04         12
(13). वीरसाल                         (Veersaal)...............  31         08         11
(14). वीरसाल सेन                   (Veersaalsen).......     47           0        14
राजा वीर साल सेन के प्रधानमन्त्री वीरमाह ने वीरसाल सेन का वध करके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 445 वर्ष 5 माह 3 दिन तक राज्य किया-
क्रमांक   शासक                                     King                  वर्ष         माह       दिन
(1). राजा वीरमाह                   (Raja Veermaha)......... 35            10          8
(2). अजितसिंह                      (Ajitsingh)....................27              7         19
(3). सर्वदत्त                           (Sarvadatta)..................28              3        10
(4). भुवनपति                        (Bhuwanpati)................15              4        10
(5). वीरसेन                           (Veersen).......................21              2        13
(6). महिपाल                         (Mahipal)......................40              8         7
(7). शत्रुशाल                          (Shatrushaal)................26             4          3
(8). संघराज                          (Sanghraj)......................17             2         10
(9). तेजपाल                          (Tejpal)......................... 28            11        10
(10). मानिकचंद                    (Manikchand)............    37              7        21
(11). कामसेनी                       (Kamseni)..................     42             5        10
(12). शत्रुमर्दन                       (Shatrumardan)..........    8            11        13
(13). जीवनलोक                    (Jeevanlok).............         28            9        17
(14).हरिराव                           (Harirao)......................  26            10       29
(15). वीरसेन द्वितीय                (Veersen II)........            35              2       20
(16). आदित्य केतु                   (Adityaketu)..........         23            11        13

ततपश्चात् प्रयाग के राजा धनधर ने आदित्यकेतु का वध करके उसके राज्य को अपने अधिकार में कर लिया और उसकी 9 पीढ़ी ने 374 वर्ष 11 माह 26 दिन तक राज्य किया 

 क्रमांक  शासक                                      King                         वर्ष       माह     दिन
(1).  राजा धनधर                      (Raja Dhandhar)...........     23       11         13
(2).  महर्षि                               (Maharshi).........................41         2        29
(3).  संरछि                              (Sanrachhi)........................50        10       19
(4). महायुध                             (Mahayudha).....................30          3         8
(5). दुर्नाथ                                (Durnath)...........................28         5        25
(6). जीवनराज                          (Jeevanraj)....................... 45          2          5
(7). रुद्रसेन                              (Rudrasen)........................ 47          4       28
(8). आरिलक                           (Aarilak)..........................   52        10         8
(9). राजपाल                            (Rajpal)..............................36          0         0

सामन्त महानपाल ने राजपाल का वध करके 14 वर्ष तक राज्य किया।अवन्तिका (वर्तमान उज्जैन) के विक्रमादित्य ने महानपाल का वध करके 93 वर्ष तक राज्य किया। विक्रमादित्य का वध समुद्रपाल ने किया और उसकी 16 पीढ़ियों ने 372 वर्ष 4 माह 27 दिन तक राज्य किया-

क्रमांक   शासक                                     King                                        वर्ष       माह       दिन
(1). समुद्रपाल                           (Samudrapal)                             54           2        20
(2). चन्द्रपाल                             (Chandrapal)                             36           5          4
(3). सहपाल                              (Sahaypal)...................             11            4         11
(4). देवपाल                               (Devpal).....................             27           1         28
(5). नरसिंहपाल                         (Narsighpal)........                    18          0        20
(6). सामपाल                              (Sampal)...............                  27          1         17
(7). रघुपाल                                 (Raghupal)...........                  22          3        25
(8). गोविन्दपाल                          (Govindpal)........                    27           1         17
(9). अमृतपाल                             (Amratpal).........                     36          10       13
(10). बालिपाल                           (Balipal).........                          12           5        27
(11). महिपाल                              (Mahipal)...........                    13            8         4
(12). हरिपाल                              (Haripal)..........                       14            8         4
(13). सीसपाल                             (Seespal).......                          11             10      13
(14). मदनपाल                            (Madanpal)....                         17            10      19
(15). कर्मपाल                              (Karmpal).......                        16            2         2
(16). विक्रमपाल                          (Vikrampal)....                        24           11       13

सीसपाल के स्थान पर भीमपाल का उल्लेख मिलता है। विक्रमपाल ने पश्चिम में स्थित राजा मालकचन्द बोहरा के राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसमे मालकचन्द बोहरा की विजय हुई और विक्रमपाल मारा गया। मालकचन्द बोहरा की 10 पीढ़ियों ने 191 वर्ष 1 माह 16 दिन तक राज्य किया-

  क्रमांक        शासक                                                       वर्ष        माह       दिन
(1).  मालकचन्द                            (Malukhchand)      54            2         10
(2). विक्रमचन्द                             (Vikramchand)       12            7         12
(3). मानकचन्द                             (Manakchand)        10            0          5
(4). रामचन्द                                 (Ramchand)            13           11          8
(5). हरिचंद                                   (Harichand)            14            9        24
(6). कल्याणचन्द                           (Kalyanchand)        10            5          4
(7). भीमचन्द                                 (Bhimchand)          16            2          9
(8). लोवचन्द                                 (Lovchand)             26            3        22
(9). गोविन्दचन्द                             (Govindchand)      31             7        12
(10). रानी पद्मावती                         (Rani Padmavati)  1              0         0

रानी पद्मावती गोविन्दचन्द की पत्नी थीं। कोई सन्तान न होने के कारण पद्मावती ने हरिप्रेम वैरागी को सिंहासनारूढ़ किया जिसकी पीढ़ियों ने 50 वर्ष 0 माह 12 दिन तक राज्य किया !

 क्रमांक            शासक                                                       वर्ष       माह     दिन
(1). हरिप्रेम                                     (Hariprem)                  7          5       16
(2). गोविन्दप्रेम                               (Govindprem)           20         2         8
(3). गोपालप्रेम                                (Gopalprem)              15          7       28
(4). महाबाहु                                   (Mahabahu)                 6          8       29
इसके बाद.......राजा महाबाहु ने सन्यास ले लिया । इस पर बंगाल के अधिसेन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर अधिकार जमा लिया। अधिसेन की 12 पीढ़ियों ने 152 वर्ष 11 माह 2 दिन तक राज्य किया जिसका विवरण नीचे दिया जा रहा है।
  क्रमांक                   शासक                                                    वर्ष       माह         दिन
(1).  अधिसेन                                  (Adhisen)                        18           5          21
(2). विल्वसेन                                  (Vilavalsen)                    12           4            2
(3). केशवसेन                                (Keshavsen)                    15           7          1 2
(4). माधवसेन                                (Madhavsen)                   12           4            2
(5). मयूरसेन                                  (Mayursen)                     20          11          27
(6). भीमसेन                                  (Bhimsen)                         5           10           9
(7). कल्याणसेन                             (Kalyansen)                      4            8          21
(8).हरिसेन                                    (Harisen)                          12           0          25
(9). क्षेमसेन                                   (Kshemsen)                       8           11         15
(10). नारायणसेन                           (Narayansen)                    2            2         29
(11). लक्ष्मीसेन                               (Lakshmisen)                   26         10          0
(12). दामोदरसेन                            (Damodarsen)                  11           5        19

दामोदरसेन ने उमराव दीपसिंह को प्रताड़ित किया तो दीपसिंह ने सेना की सहायता से दामोदरसेन का वध करके राज्य पर अधिकार कर लिया तथा उसकी 6 पीढ़ियों ने 107 वर्ष 6 माह 22 दिन तक राज्य किया -

 क्रमांक                                   शासक का नाम                    वर्ष        माह       दिन
(1).  दीपसिंह                           (Deepsingh)                      17            1         26
(2). राजसिंह                            (Rajsingh)                        14            5           0
(3). रणसिंह                             (Ransingh)                         9            8          11
(4). नरसिंह                              (Narsingh)                        45           0          15
(5). हरिसिंह                             (Harisingh)                       13           2          29
(6). जीवनसिंह                         (Jeevansingh)                    8            0            1

पृथ्वीराज चौहान ने जीवनसिंह पर आक्रमण करके तथा उसका वध करके राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया। पृथ्वीराज चौहान की 5 पीढ़ियों ने 86 वर्ष 0 माह 20 दिन तक राज्य किया - 

क्रमांक                                        शासक                                वर्ष        माह  दिन
(1).  पृथ्वीराज                         (Prathviraj)                          12           2    19
(2). अभयपाल                        (Abhayapal)                         14           5    17
(3). दुर्जनपाल                         (Durjanpal)                          11           4     14
(4). उदयपाल                          (Udayapal)                          11            7      3
(5). यशपाल                            (Yashpal)                             36           4     27

विक्रम संवत 1249 (1193 AD) में मोहम्मद गोरी ने यशपाल पर आक्रमण कर उसे प्रयाग के कारागार में डाल दिया और उसके राज्य को अधिकार में ले लिया।
Given below are the tributaries which originated at various points of time and then vanished or merged or identified itself with the main branch.
MAJOR CHANDR VANSHI CLANS :: 
(1). SOM :: All descendents of king Dushyant, father of Bharat are known as Kauravs, Pandavs and Som or Som Vanshi or Chandr Vanshi. King Lakhan Sen was one of the king from this Vansh.
Gotr-Atri, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Maha Laxmi.
State-Pratap Garh.
(2). YADAV :: The Almighty-God took birth in this dynasty as Bhagwan Shri Krashn. Raja Arjun Dev was also from this Vansh.
Gotr-Kondinay, Ved-Yajur Ved, Guru-Durvasa, Kul Devi-Jogeshwari.
States-Dwarka, Karoli, Kathiya War.
(3). BHATI :: It has roots in Som Vansh or Chandr Vansh with the lineage from Pradyumn Ji, the elder son of Bhagwan Shri Krashn. The first king from this Vansh was Raja Jaisa Bhati. This brave king was the son of Baland Yadav. Raja Gaj Singh, Abhay Pal, Prathvi Pal, Maharawal, Ranjit Singh, Maharawal Shalini Vahan were also the kings from this Vansh.  Rawal Jaisal founded Jaisalmer. The temple, palaces of this city are build from yellow stone. Raja Rawal ruled from 1212. The Maha Rajas of Jaisalmer trace their lineage back to Jait Singh, a ruler of the Bhati Rajput clan. The major opponents of the Bhati Rajputs were the powerful Rathor clans of Jodhpur and Bikaner. They used to fight battles for the possession of forts, waterholes or cattle. Jaisalmer was positioned strategically and was a halting point along a traditional trade route traversed by the camel caravans of Indian and Asian merchants. The route linked India to Central Asia, Egypt, Arabia, Persia, Africa and the West. Bhati Rajputs were proficient horse riders, marksman and warriors. Their reign spread to the Punjab, Sindh and beyond, to Afghanistan. The City of Ghazni was named after a brave Bhati warrior. In Lahore, a monument exists to this day, which is called the Bhati Gate, named so probably because it opens in the direction of the Sandal Bar, an area ruled by Rai Sandal Khan Bhati Rajput. They earned too much by imposing the taxes levies on the passing Caravans. They were known as great shooters, with Gun.
Gotr-Atri, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Maha Laxmi 
States :: Jaisalmer, Sirmur, Mysore, Karoli, Jaisawat.
Branches :: Sirmour, Jaiswar, Sarmour, Sirmuria, Kaleria Kshatriy, Jadeja.
(4). JADEJA-CHUDASMA :: The Chudasama and their collateral the Raizada  trace their origin to Bhagwan Shri Krashn.
Gotr-Atri, Mata-Maha Sati Ansuya, Dada-Brahma Ji, Mul Purush-Adi Narayan, Kul Devi-Shri Momai Mata Ji (Amba Ji Maa, Maha Maya/Yog Maya), Sahayak Devi-Aai Shri Khodiyar Mata Ji, Kul Dev-Shri Krashn, Ved-Sam Ved, Kul-Yadu Kul, Vrashni Kul, Vansh-Chandr Vansh, Sakha-Madhyaydini, Kul Dev-Som Nath, Maha Dev (Veraval), Siddh Nath Mahadev (Dwarka)
Isht-Siddheshwar Mahadev, Pravar-Durvasa, Dattatrey, Chandr, Isht Devi-Shri Asha Pura Mata Ji, Adhisthatri-Devi-Maa Hinglaj Devi.
State-Gondal state, Nav Nagar (Gujarat).
(5.1). TANWAR-TOMAR ::  The Tomars (also called Tanwar and Toor) are believed to be an ancient clan of the Chandr Vanshi lineage and descendants of Som or Chandr, (Buddh & Ila), Yayati, Nahush, Puru, Kuru, Hasti, Aja Meedh, Kuru, Shantanu, Dushyant, Yudhishtar, Arjun, Kshemak, Tung Pal, Anang Pal. Tomars are the descendants of the Pandavs originating from Arjun, through his great grandson Emperor Jan Mejay, son of Emperor Parikshit. Tomar clans include Kshatriy, Rajput, Jat and Gurjar’s. Tomars were one of the ruling clan of the Gurjars (or Gujjars) in the Gujar-Pratihar era of North India. (4th-8th century A.D).
Singh Raj was the first king from this Vansh who ruled from 1013. Ang Pal and Tung Pal were also from this Vansh. Tomar Vansh begins from Tung Pal. He was the son of king Yayati from the Vansh of Puru.
Anang Pal conquered and re-established the Delhi Kingdom in CE 792 and founded the city of Dhillika-Dilli-Delhi. Besides Delhi, He covered western U.P. and most of present day Haryana and Punjab. Tomar's rule lasted until CE 1162 when last Tomar King Anang Pal (II) appointed Prithviraj Chauhan, his grandson (his daughter's son) and King of Ajmer-as caretaker, since his own sons were very young at that time. When King Anang Pal returned, Prathvi Raj refused to hand over the kingdom to him. Jagas are a caste in Rajasthan who are hereditary keepers of genealogical records of Rajputs.
Branches:- Pathania, Janjua, Jarral, Janghara, Jatu, Jaraita, Satraura, Raghu, Rulers of Indr Prasth, Uttar Kuru, Dilli, Nur Pur, Tanwar Wati-Tora Wati, Gwalior, Kayastha Pad, Dholpur, Tuar Garh.
Gotr-Atri,Kashyap, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Yogeshwari (or Jogeshwari) Mata, Sarund Mata, Isht Dev-Bhagwan Shri Krashn, Kul Devta-Bhagwan-Shiv.
Original Seat (Mul Kheda): Hastinapur, Conch (Shankh)-Dakshinavarti, Nagada (beating drum for War)-Ranjeet, River-Gomati, Flagpole (in war)-Hanuman Ji on flagpole, Throne, Canopy and Sign Color-Square Green with Moon on it, Mantr-Gayatri Mantr, Gopal Mantr, Tilak-Rama Nandi, Mala-Rudraksh, Mountain Range-Dronanchal, Bird-Garud, Devak (Clan Object)-Gular Tree, also called Udumbar or Umbar tree.
States-Delhi, Gwalior, Nus Pur (Himachal), Paatan (Sikat).
Branches-Beruar, Bir War, Bad War, Katiyar, Katouch, Jinwar, Indoria Kshatriya and Tirota. Indoria has sub branches-Raik War, Jai War.
(5.2). TURH-TOMARS ::  They are  found in Bihar. A branch of Tomars migrated to Bihar from Rajasthan some 500 years ago and settled there as Turh. After suffering a defeat, the Tomar took growing and selling vegetables, to disguise their Rajput identity. Over time Tomar was corrupted to Turh. They are found mainly in Dar Bhanga and Muzaffar Pur districts, with a few also found in the neighbouring Terai region of Nepal, eastern U.P. and western Bihar. They speak Bajjika, Maithili, Bhoj Puri and Hindi. 
The Turh are divided into a number of lineages known as khandans. Marriages are forbidden within the khandan. The largest khandan is the Palak Turh. There main occupation remains the growing and selling of vegetables and have much in common with the Mali-gardener, another community of a similar status.
VIKRAMADITY  :: Vikramaditya, king of Ujjain, won his paramount place in Indian story by driving out Scythian invaders. An era, the Vikram Samvat, beginning in B.C. 57, was founded in honor of his achievements. He reigned at Ujjain in Malwa. He was a liberal ruler, a patron of learning, encouraged art. He was a follower of the Brahmanical religion, a worshipper of Bhagwan Shiv and Bhagwan Vishnu. This great Vikramadity of the year 56 BC is claimed to be a prince of the Tuar dynasty and is supposed to have reigned at Ujjain (Ujjayini). According to the Hindu traditions in India and Nepal, the widely used ancient calendar is Vikram Samvat or Vikram’s era. This is said to have been started by the legendary king following his victory over the Saks or Synthians, in 56 BC.
DILLI-DELHI :: Indr Prasth was the bastion of Lal Kot fort, Mehrauli, Delhi, built by Tomar Rajput ruler, Anang Pal in 736. There are countless villages in Haryana country. The villagers there work hard. They don’t accept domination of others and are experts in making the blood of their enemies flow. Indr himself praised this region. The capital of this region is Dhilli.
The ruler Anang Pal is famous, he slayed his enemies with his sword. The weight (of the Iron pillar) caused the Nag Raj to shake.
Old Fort and lake outside it, Delhi 1383 inscription in Delhi Museum confirms the founding of Delhi by the Tomars.
Prathvi Raj Raso also confirms the founding by the Tomars and the legend of the loose nail (i.e., the Iron pillar). Iron pillar of Chandr Gupta with an inscription by Anang Pal (II) is still singing the glory of Anang Pal. Today Gurjars have around 20 villages of Tomar or Tanwar Gujjars in and around Delhi. These Gurjar Tanwars proved to be the toughest repellents to the Britishers in 1857 during the first war of independence. They captured the Matcalfe house for 12 days cutting all supplies to British Armies and declaring independence for Delhi (though for a small period of time only).
This site is located at the original seat of power Indr Prasth. Delhi was established in 736 by the Tomar-Tuar king Anang Pal Tomar (I), who re-established the Pandav's ancestral capital. The Tomar Rajput dynasty of Delhi lasted until Anang Pal Tomar(III). Anang Pal Tomar (III) appointed his grandson (daughter’s son and son of King of Ajmer), Prithviraj Chauhan, as the heir apparent. Prathvi Raj was merely a caretaker king as long as his grandfather was alive. Prithviraj was never crowned in Delhi. Thus, Chauhan ruler usurped the throne from his maternal grandfather. Anang Pal Tomar (III) had 23 brothers and they each had territory of their own. Anang Pal made Prathvi Raj only as caretaker when he went on a pilgrimage, as his own sons were too young. When Anang Pal returned, Prathvi Raj refused to hand over the kingdom back to him.
Following their loss of control at Delhi after the defeat at Tarain against Shah Buddin Ghori, a branch of the Tomar clan established itself in the area of modern Gwalior in northern Madhy Pradesh. Later, Vir Singh Deo and his descendant Man Singh Tomar built a strong fortress-citadel which still stands there. The Mughal emperor Akbar captured Gwalior in 1559. Some Tomar Rajputs converted to Islam during the Muslim-Mughal rule. Tomar Muslim Rajputs are found in western Rajasthan, Pakistan and Sindh.
TOMARS IN NORTH INDIA :: Tomars moved from Delhi to Haryana (Bhiwani, Mahender Garh and Karnal Districts), Madhy Pradesh (Gwalior and Morena and Bhind Districts), Punjab and Rajasthan (Patan State and surrounding areas). They are spread from Punjab, to Western Uttar Pradesh (Meerut, Badaun, Bareilly, Baraut, Muzaffar Nagar Ghaziabad, Aligarh, Bulandshahr), Bewar (Main Puri) significant parts of Himachal Pradesh, to western Rajasthan to Northern Madhy Pradesh, Bhav Nagar (Gujrat) and even some in Pakistan.
TANWAR-SHAKHS :: These are descendents of Thakur Jatu Singh and now inhabit surrounding villages of Bhiwani (Haryana). It is believed that there were 1440 villages of Tanwar Rajputs from Bhiwani to Agroha. A few famous ones are Bawani Khera, Bapora, Luhari Jatu and Tigrana, Ratera-Ratan Garh. Chhapar, Dev Sar, Halu Vas, Palu Vas, are a few bigger villages in District Bhiwani.
Sub Clans-Jatu Rajputs 
The three brothers Jatu, Raghu and Sutraola divided amongst themselves the Parganah of Hansi, each share was called a Tappa and the names Tappa Jatu, Tappa Raghu and Tappa Sutraola. The descendants of the three brothers went on as opportunity afforded adding to their possessions. Those of Jatu’s were the most extensive. Umar Singh of the family took Tosham hence that Ilaqua (Area) was known as Umrain Tappa. Similarly Bhiwani was called Bachoan Tappa after Bacho who had taken possession of it. Jatu’s descendants at Sewani were called Raes, those at Tulwundi were called Ranas hence the village is still called and recorded as Tulwundi Rana, while those at Kulheri called Chowdris and Pica still retain these titles.
TOMAR-TUAR-JANGHARA ::  Janghara being derived from the words, Jang (war) and Ahar (food)-the men who have an appetite  for war. After the fall of Delhi to the Chauhans, the Janghara parted from the main Tomar branch in disgust. They entered Rohil Khand under the leadership of the prince Dhapu Dham whose warlike nature was proverbial. 
The Janghara Rajputs of Bareilly claim to have ejected the Gwalas-Shepard-cow herd,  in 1388 & 1405. They expelled the Ahirs from their Kingdoms. The Katehriya Rajputs were also defeated and exiled from Rohil Khand by the Janghara Rai’s.
TOMAR-TUAR-JARRAL :: They gained prominence after their conversion to Islam in the 12th century. They are descendants of Pandavs and ruled a certain territory of Northern India from a place later came to be known as Kalanaur. They fought against Muhammad Ghor in both the battles of 1191 and 1192 joining Prathvi Raj Chauhan of Ajmer. They were ferocious and battle hardy Rajputs. Even after conversion they were fond of battles and seized Rajauri from the Pal rulers in 1193 AD.
Jarrals enjoyed fighting the Afghans, the Sikhs, the Dogras and the British and never rested but expanded their state in great length and width of the Punjab Hills. They were ousted from Rajauri State by the combined forces of Sikhs, Dogras and British in 1846. Later, knowing their feats of bravery and courage, the British befriended with them that helped them great in the latter years. It is one of the highest castes of Tomar but due to conversion to Islam were excommunicated by the clan and were not mentioned by the Sagas who note, maintain and narrate Rajput family trees. They reside in India, Jammu, Kashmir, Punjab and other parts now in Pakistan. The descendents of Jarral Rulers reside in Musaman Burj, Wazirabad in Pakistan.
PATHANIA TUAR :: Pathania Rajputs Descendants of Raja Jhet pal, younger brother of Jai Pal Tuar of Delhi. Established his kingdom at Paithan, now called Pathan Kot. Their kingdom was called Dhameri which was later renamed Nur Pur. Famous for their resistance against foreign rule, which they proved by giving battle to invaders till 1849, after which the Kingdom was annexed by the British, the Raja being a minor. This clan has to its credit three Maha Vir Chakra winners in the Indian Army. This clan has also won many other gallantry awards while serving in the British army of India.
JANJUA :: They were descendents of Jan Mejay. Janjua Raja Dhrupet Dev was one of the the descendants.
TOMAR-BERUARI :: It is (Beruar-Birwar) one of the most dominating Rajput sub caste of eastern UP. Balia and Mirza Pur district were once governed by Shudrs of Berua caste. A Tomar prince defeated them and established the rule of Dharm. He and his decedents later called as Berua+ari (Beruari), i.e., enemy of Beruas. There are many villages of this clan in Mithilanchal (Bihar) also. Hati is one of the prominent village of this clan. They are being treated as Amnekh (Superior) Rajput clan in Bihar. 
Sub Branches-Birwar, Badwar, Katiyar, Jinwar, Indoria Kshatriya and Tirota Kshatriya. Indoria Kshatriya has branches – Raik War, Jais War-Jas War.
GWALIOR :: Gwalior fort was built by the Tuar-Tomars of Gwalior, Anang Pal (II) & Anay Pal in 1046. Inscription on the Iron pillar at Mahrauli was made in 1052, by them. Grandson of Jey Pal Tuar, Bhum Pal Tomar (1081), settled in Narwar area (Near Gwalior). Mahendr Pal Tomar (1105), Hira Pal Tomar (1130), Bagh Pal Tomar (1151), Pritam Pal Tomar (1175), Dilip Pal Tomar (1200), Bir Pal Tomar, Anup pal Tomar, Son Pal Tomar, Sultan Pal Tomar, Kunwar Pal Tomar, Brahm Dev Tomar, (1350). (Brahm Pal has been shown as descendant of Anang Pal (III) or Dakt Pal, the last Tomar king of Delhi). Vir Singh Dev (1375). A Zamindar of Dandroli, captured fort from a Sayyid King of Gwalior (1432). Udharan Dev, brother of Vir Singh Dev, ruled for some time. Lakshman Dev Tomar, Viram Dev (1400), son of Vir Singh Dev. Gan Pati Dev Tomar (1419). Dugarendr (Dungar) Singh (1424), consolidated Gwalior as a major power of central India. Kirti Singh Tomar (1454), fought with Rana Kumbha of Mewar against Muhammadan Kings of Malwa (Mehmood Khilji). Mangal Dev was younger son of Kirti Singh and had an estate of 120 villages in Dhodri and Amba, of Tomar Garh. He tried to recapture Gwalior after the fall of Tomars in 1516. Kalyan Mal Tomar (1479), Man Singh Tomar (1486) was a musician and father of Dhrupat Gharana. Greatest of the Tomar Kings of Gwalior was Vikramaditya Tomar (1516-1518). Ibrahim Lodhi captured Gwalior fort. Ram Shah Tomar (1526), ousted from Gwalior, fought at Haldi Ghati with Maha Rana Pratap. Shali Vahan Tomar (1576) fought at Haldi Ghati for Maha Rana Pratap and was killed. Shyam Shah Tomar (1595), accepted Akbar as suzerain and held Gwalior fort. Mitra Sen, brother of Shyam Shah, for sometime he held Gwalior fort. Sangram Shah Tomar (1670), Kishen Singh Bijay Singh, sought refuge in Mewar. Uday Singh, sought refuge in Mewar. Narayan  Das Tomar, Tora Wati-Patan, Rajasthan.
TORA WATI PATAN :: It was  established by King Anang Pal (II) while he was the ruler at Delhi. Patan is a city in Rajasthan ruled by the Tomars since 12th Century. Patan was capital of Tanwara Wati or Tora Wati state. It is one of the oldest remaining states ruled by the Tanwar’s who were direct descendants of Anang Pal Tomar. The kings of Tora Wati Patan are descendants of Anang Pal Tomar, king of Delhi. They have ruled since the fall of Delhi in 1192, under Prithviraj Chauhan.
TOMARS AT PATAN :: Rao Salun Ji (Shali Vahan), fought Khilji Kings for 12 years, son of Anang Pal (II), last Tomar king of Delhi. Rao Nihal Ji, Rao Doth Ji (Dohtha Ji) Rao Popat Raj Ji Rao Peepal Raj Ji (fought against Bhinv Raj Sankhla of Bihar and killed him, founded Patan Fort) Rao Rana Ji Rao Alsi Ji (Asal Ji) Rao Kamal Ji (Kavarsi) Rao Mahi Pal Ji Rao Bhopal Ji, founded the Sarun Mata Temple in 1276 and the temple of Kul Devi of Tanwar Rajputs. Rao Bachh Raj Ji, Rao Bhadar Ji, Rao Bahadur Singh Ji Rao Prathvi Raj Ji Rao, Kalyan Ji Rao, Kumbha Ji Rao,  Baharsi Ji Rao Jagmal Ji Rao Puran Mal Ji Rao, Lakhan Ji Rao, Loon Karan Ji Rao, Kanwal Raj Ji (Keval Ji), married and had issue. Rao Udho Ji, heir apparent, moved away from Patan and established Thikana Gaonri (or Gaondi) and was ancestor of the Thakur Sahebs of Mandholi, Gaonri, Puranbas. Rao Aasal Ji, Rao Kheebu (Pev Ji), Rao Shah Mal Ji, Rao Karpoori Ji, Rao Beeko Ji, Rao Chhota Asal Ji, Rao Bal Bhadr Singh Ji, Rao Dal Pat Singh Ji, Rao Pratap Singh Ji,  Rao Kesri Singh Ji (Singh Raj), Rao Fateh Singh Ji, Rao Jaswant Singh Ji, Rao Ghasi Ram Ji,  Rao Bansi Ram Ji, Rao Sam Rath Singh Ji (1757), Rao Sam Pat Singh Ji (1757-1790).
BATTLE OF PATAN ::  De Boignes the French bigot defeated Rajput confederacy at Patan and took all the gold from Patan Fort. Rao Jawahar Singh Ji (1790),  Rao Laxman Singh Ji , Kunwar Pratap Singh Ji, Rao Mukund Singh Ji, Rao Kishan Singh (1873), Rao Mukund Singh (1873), born about (1862), son of Kunwar Pratap Singh, younger brother of Rao Kishan Singh. Rao Khuman Singh, married and had issue. Rao Maharaj Singh, Rao Sahib Uday Singh, married 1928 in Kathmandu, Rani Thagendr Rajy Lakshmi Kumari Devi, daughter of Mohan Sham Sher of Nepal. Rao Sahib Bir Bikram Singh Ji (1991), born 18 August 1932, married 28 April 1960, Rani Sahiba Raghu Raj Kumari [presently the Raj Mata Sahiba of Patan], daughter of Maharaj Pratap Singh Ji of Bhupal Garh (Mewar). Rao Sahib Dig Vijay Singh Ji, Rao of Patan and Head of the Tomar clan in India, since 11 September 1991.
BUHANA :: Bhawani Singh, Founder of Buhana (Jhunjhunu) in 1234. Rao Lakha Ji Tanwar (1523–1544) of Gaonri Captured Mandholi from Jat Rulers, placed Inder Pal Ji Tanwar at Mandholi.
MAONDA KALAN ::  Two brothers Shyam Das Ji and Sunder Das Ji moved from Gaonri and founded Maonda Kalan. There Jagirdari was spread over twelve villages from Dudas on one side to Purana Baas. One of the sons of Sunder Das Ji moved from Maonda Kalan and founded Dantil.
BANETHI :: Near Kot Putli, Rajasthan Gaonri.
NUR PUR :: It was founded in the 11th century (1095 A.D.), by Raja Jhet Pal, younger brother of the Ruler of Delhi (Anay Pal Tomar). Originally known as Dhameri, its name was changed to Nur Pur by Jehan Gir in honor of Queen Nur Jehan. 
PATHAN KOT :: Jhet Pal Pathania was a yougner brother of Tomar king of Delhi. Khetr Pal, Sukhin Pal, Jagat Pal, Ram Pal, Gopal, Arjun Pal, Varsh Pal, Jatan Pal, Vidurath Pal, Jagan Pal, Kirat Pal, Kasho Pal. Jas Pal (1313-1353) married and had 9 sons, each of whom was progenitor of a branch of the Pathania family. Kailash Pal (1353-1397), Nag Pal (1397-1438), Prathi Pal (1438-1473), Bhil Pal (1473-1513), Bakht Mal (1513-1558), died in 1558. Pahari Mal  was a brother of Bakht Mal(1558-1580). 
DHAMERI NUR PUR :: Basu Dev (1580-1613), enjoyed a mansab of 1500 under emperor Akbar, which was increased to 3500 by emperor Jahangir. He married and had issue. He died in the thana of Shah Bad in 1613.  He lost Pargana of Pathan Kot and moved capital to Dhameri. Suraj Mal, Jagat Singh, Madho Singh, granted the title of Raja by Emperor Jahangir. He died after 1623. Suraj Mal (1613-1618), was granted a mansab of 2000. He died 1618 in Chamba. Jagat Singh (1618-1646) was patronised by Jehan Gir. He rebelled against Shah Jehan but was restored and accompanied Dara Shikoh to Kandahar. Rup Singh (1646-1661) lost Tara Garh as it was taken away from him & granted 1500 mansab. Man Dhata Singh (1661-1700), Daya Dhata (1700-1735), Fateh Singh (1735-1770), Indar Singh–younger son & Ruler at Reh. Prathvi Singh (1770-1805), Bir Singh (1805-1846), born 1785, last ruling Chief of Nur Pur, married a daughter of Jit Singh of Chamba and had issue. He died in battle in, 1846. Jaswant Singh (1846-1898) Gagan Singh (1898-1952), 6th Viceregal Darbari in Kangra District, an honorary magistrate in Kangra District, the hereditary title of Raja was conferred on him on 15 March 1909 by the Viceroy, married and had issue. He died in 1952. Devendr Singh 1952. Reh Mian Indar Singh of Reh, married a daughter of the Raja of Kangra, settled in that state and was ancestor of the Reh branch of the Nur Pur Royal Family, married and had issue.
DHOLPUR :: It was founded in circa 700 AD, Raja Dholan Deo Tanwar founded Dholpur in 1004. His descendants were ruling in the time of Babar and surrendered to Humayun. Dholan Deo Tomar held the state between rivers Chambal and Banganga in early eleventh century. His dynasty ruled till 1505. Sikander Lodhi obliterating it, merging it with Mughal states. It was later captured by Mughal Babur. It was later merged with Gohad state existing as such till 1806 when Rana Keerat Singh of Gohad (1803-1805), became the first ruler of Dholpur.
KAYASTH PAD DHOLPUR ::  In 1873 Rais ud-Daulah, Sipahdar ul-Mulk, Maha Raja Dhiraj Shri Sawai, Maha Raj Rana Nihal Singh, Lokindr Bahadur, Diler Jung, Jai Deo of Dholpur invited Thakur Saheb Karan Singh Ji of Muse Pur. In 1876, the family of the Thakur of Hussait, who were descendants of Raja Dholan Deo Tomar, titled  him as the Raja of Kaysath Pad Thikana. He was succeeded by his son Raja Pratap Arjun Singh Tomar who was also a member of the His Majesty’s Guards. Kayasth Pad family is now headed by Raja Saheb Ravendr Singh Ji Saheb Tomar. Bikaner, Lakha Sar, Sawant Sar and Janjheu villages still have some Tanwar population. 
(6). KALCHURI :: It belongs to Haihy Vansh. Raja Kart Viry hailed from this Vansh.
Gotr-Krishnatrey, Kashyap, Kul Devi-Durga and Vindhy Vasini, Devta-Bhagwan Shiv. 
States-Ratan Pur, Rai Pur, Koushal (M.P.) and Maha Shakti City. The inscription from this Vansh are kept in the museum at Nagpur.
(7). KOUSHIK :: Gotr-Koushik, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Yogeshwari, Devta-Bhagwan Shiv. Raja Koushik belongs to this Vansh.
State-Gorakh Pur, Gopal Pur.
(8). SENGAR :: Gotr-Gautam, Shandily, Ved-Yajur Ved, Devi-Vindhy Vasini, River-Sengar. 
Kings from this Vansh were Chitr Rath, Dash Rath, Dharm Rath.
States-Chedi Pradesh, Dakshin Pradesh, Sourashtr, Malwa, Champa Nagri.
(9). CHANDEL :: In the early 10th century, the Chandels ruled the fortress-city of Kalinjar. A dynastic struggle (912-914) among the Pratihars provided them with the opportunity to extend their domain. They captured the strategic fortress of Gwalior (950) under the leadership of Dhanga who ruled between 950-1008. An offshoot founded by Jay Sakti ruled the areas across Bundelkhand with Khajuraho as their capital. The dynasty came to an end after Alauddin Khilji conquered Bundelkhand.
Gotr-Chandatrey or Chandrayan, Sheshdhar, Parashar and Gautam, Kul Devi-Maniya Devi, Devta-Hanuman Ji.
Kings-Veer Shishu Pal, Chandr Brahma, Yashovarman.
State-Chanderi-Gwalior. Chanderi Nagar, Khajuraho Temple, Madan Sagar of Mahoba are the glory symbols of this Vansh. The mark of Hanuman was engraved on the coins of Chandel Vansh.
Chandel, Chanderi Nagar, Khajuraho Temple, Madan Sagar of Mahoba are the glory symbols of this Vansh. The image of Hanuman was engraved on the coins of Chandel Vansh empire.
(10). GAHER WAR :: Gotr-Kashyap, Ved-Sam Ved, Devta-Bhagwan Vishnu, Bhagwan Maha Dev.
State-Kashi and Kashi Puri. 
Kashy, Din Das, Manik Chand were the kings from this Vansh. 
Sub branch-Bundela. It originated from Bundel Khand. Kher Wad is a tributary of Bundela.
(11). JANAK WAR :: Gotr-Koushik, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Chandika.
It might be liked to Maha Raj Janmejay, grandson of Arjun.
States-Chhaoni in Gujarat, Japaner near Nee mach and Paw Garh.
(12). JHALA :: Gotr-Kashyap, Ved-Sam Ved, Kul Devi-Durga, Maha Kali, Isht-Maha Dev.
Veer Kundmal, Har Pal, Vijay Pal were prominent kings from this Vansh.
States-Kuntal Pur, Sekhri Garh, Kranti Garh, Bikaner, Kathiya War, Jhala War, Limdi. When the three prince of Raja Harpal and Rani Shakti Devi were playing, an elephant lifted them. Rani Shakti Dev cached them (Jhel lena in Hindi) in her hands and from then this Vansh is named Jhala.
(13). PALWAR :: Gotr-Vayaghr, Ved-Sam Ved, Dev-Nag.
As they lived in Pali village, this Vansh is named as Pala War.
(14). GANGA :: Gotr-Kanv Yan, Ved-Sam Ved.
This Vansh was named after Raja Gangey. The famous Jagan Nath temple at Puri was build by this Vansh. This Vansh also had its own calendar.
(15). BILADARIYA :: Gotr-Atri, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Yogeshwari. Raja Bhog Pal migrated to Biladar and thereafter this Vansh came into existence.
(16). PURU :: Gotr-Bahryaspty, Ved-Yajur Ved, Devi-Durga, Devta-Bhagwan Shiv.
Paurav (-Poras) was the son of King Ila. He fought with Alexander at the basin of river Jhelum. Branch-Bhardwaj.
(17). KHAATI :: It is from Garhwal. Kursela was their state. They are Bihari Kshatriy.
Gotr-Atri, Bhardwaj, Kul Devi-Durga. 
(18). KANH :: It begun from Raja Kanh Singh. The city of Kanpur is founded by them. Kaithola was their capital.
Gotr-Bhardwaj, Ved-Sam Ved.
Branch-Kanpuria.
(19). KURU :: It begun from Raja Kuru as a branch of  Yadu Vansh.
Gotr-Bhardwaj, Ved-Yajur Ved, Devta-Bandi. 
(20). KATOCH :: The Katoch clan of the Chandr Vanshi lineage is considered to be one of the oldest surviving clan in the world. They are simultaneously mentioned in Maha Bharat and the recorded history of Alexander's war records. One of the Indian kings who fought Alexander on the river Beas was a Katoch king named Parmanand Chandr alias-famously known as Porus. In past centuries, they ruled several princely states in the region. The originator of the clan was Raja Nak Bhumi Chand. Their famous Maha Raja Sansar Chand-II was a great ruler. The ruler Raja Nak Bhumi Chand Katoch founded the Jwala Ji Temple (now in Himachal Pradesh).
Gotr-Kashyap, Shounak, Isht-Nag Devta.
The fort and temple of Kangra (Himachal) were build by this dynasty. The temple of Ambika Devi is situated inside the fort.
Branch-Jaswal, Guleria.
(21). BANAFAR :: Gotr-Koundily, Kashyap, Ved-Yajur Ved, Kul Devi-Sharda. King Daksh Raj and Bachh Raj belonged to this Vansh. Alha and Udal were their sons, also known as Mal Khan and Sul Khan respectively.
Branch-Pathania.
(22). BHARDWAJ :: It begun from king Puru.
Gotr-Bhardwaj, Ved-Sam Ved, Kul Devi-Sharda.                     
(23). SARNIHA :: They belonged to Saran Garh and hence called as Sarniha.
Gotr-Bhardwaj, Kul Devi-Durga.
Branch-Karmwar.
(24). CHOUKAT KHAMB :: It got the name for breaking apart the pillars (Khamb, spokes) of the Rath-chariot of enemy to defeat them.
Branch-Bachhil.
(25). DRAHYA :: It begun from Raja Drahayu, the third brother of Raja Yadu. Tri Pura was their capital. This Vansh is from Bengal.
(26). BHANGAKIA ::  This clan are the erstwhile rulers of Chhota and Burra Bhangal in Kangra District of Himachal Pradesh.
(27). JADAUN :: As the descendants of Yadu, they are classified as under the Chandr Vanshi branch of the Rajput caste hierarchy. Aphariy clan of Yadu Vanshi Ahirs also claims descent from Jadauns, although, they are Yadavs. Jadauns also occupied the forts of Bijai Garh, built by Pundir Rajputs, at Bayana and Timan Garh near Karauli. The distance between the two forts is about 50 km. The Great Fort of Majhola in Muradabad District of Uttar Pradesh was also built by the Jadauns. Jadauns are among the 36 royal clans of Rajputs.
Kul Devi-Kaila Devi (Karauli)
(28). JARRAL :: They are found amongest both  Hindu and Muslim Rajput tribes of Jammu and Kashmir in India and Azad Kashmir and Punjab in Pakistan. This Rajput tribe belongs to Chandr Vanshi lineage. They claim to be descendants of Pandavs through Arjun. After the death of Parikshit-grandson of Arjun, his elder son Janmejay (-जनमेजय) became Maha Raja-emperor of Hastinapur and his younger brother Prince Nakashen became the king of Indr Prasth. They moved to Kalanaur in Punjab. Raja Nak married several women and his descendants were titled known as Jarrals. In 1187 after defeat by Muslim King Shab-u-Din they lost Kalanaur. Shab-u-Din invited the Jarral Raja to accept Islam and the Raja accepted Islam but many other Jarrals did not accept Islam and moved to different parts such as Jammu, Punjab and Himachal Pradesh. After conversion the Muslim Jarral become an out caste. The other Rajput rulers broke their relations with Muslim Jarrals after which the Muslim Jarrals became weak and moved to Rajauri district in Kashmir and defeated Sardar Aman Pal the king of Rajauri. After this the royal Dynasty of Muslim Jarrals ruled over Rajauri for 670 years. The Hindu Jarrals also moved to various places in Jammu region in Bhaderwah, Bhalessa the main families of Hindu Jarral Rajput are found and the Muslim Jarrals are found in Azad Kashmir, Noweshra and Rajouri-Poonchh. But there are majority of Muslims in this caste.
(29). PAHORE ::  The Pahores who converted to Islam are called  Khan or Jam or Malik. Some Rajput and Jats too use this title.
(30). RAIZADA :: They are the  descendants of the ruler of Juna Gadh, a kingdom in the Saurashtr peninsula. Juna Gadh was ruled by the Chudasama Rajputs, who were a branch of the Lunar or Chandr Vanshi lineage. 




1 comment:

  1. The author of this blog deserves my heart-felt thanks for such a vivid narration of the Lunar Race almost from beginning to present era. His compilation of mythological as well as historical data are quite praise worthy. I wonder how people have not shared their comments yet.

    ReplyDelete